
Dvārakāyāṃ Sāhāyya-vibhāgaḥ (Alliance Allocation at Dvārakā) / उद्योगपर्व अध्याय ७
Upa-parva: Dvārikā-gamana / Nārāyaṇīya-sainyavaraṇa Episode (Udyoga Parva, early chapters)
Vaiśaṃpāyana reports that intelligence networks inform Duryodhana of Kṛṣṇa’s return to Dvārakā. Duryodhana travels swiftly to seek aid, while Arjuna independently reaches the Ānarta region and enters Dvārakā the same day. Both encounter Kṛṣṇa at rest; Duryodhana seats himself near Kṛṣṇa’s head, whereas Arjuna stands respectfully near his feet with folded hands. Upon waking, Kṛṣṇa first notices Arjuna and extends due welcome to both, then asks the purpose of their arrival. Duryodhana requests alliance, arguing parity of friendship and kinship ties. Kṛṣṇa acknowledges Duryodhana’s earlier arrival but notes he saw Arjuna first; he therefore offers support to both, granting Arjuna the right of first choice per procedural norm. Kṛṣṇa presents two options: the formidable Nārāyaṇa forces (armed) for one side, or Kṛṣṇa himself (unarmed, weapon-laid-aside) for the other. Arjuna selects Kṛṣṇa as non-combatant guide, desiring renown aligned with Kṛṣṇa’s fame and requesting charioteership; Kṛṣṇa accepts. Duryodhana departs satisfied with the army, later augmented by Kṛtavarmā’s akṣauhiṇī. After Duryodhana leaves, Kṛṣṇa queries Arjuna’s rationale; Arjuna articulates that counsel and association with Kṛṣṇa’s stature are strategically and reputationally decisive. Arjuna returns to Yudhiṣṭhira accompanied by Kṛṣṇa and Dāśārha leaders.
Chapter Arc: दूतों के प्रस्थान और राजनय की हलचल के बीच कथा द्वारका की ओर मुड़ती है—जहाँ एक ही पुरुष, श्रीकृष्ण, दोनों पक्षों के लिए निर्णायक सहारा बन सकते हैं। → धनंजय अर्जुन स्वयं द्वारका पहुँचते हैं, जबकि दुर्योधन भी उसी उद्देश्य से वहाँ आता है। कृष्ण-बलराम के नगर में वृष्णि-अन्धक-भोजों की उपस्थिति, और ‘किसे पहले वर दिया जाए’—यह प्रश्न तनाव को तीव्र करता है। → शास्त्र-परम्परा के अनुसार ‘पहले बालक’ को वर देने की बात उठती है और अर्जुन को प्राथमिकता मिलती है; कृष्ण अर्जुन को चुनने का अवसर देते हैं—अर्जुन कृष्ण का सारथ्य माँगते हैं, जबकि दुर्योधन कृष्ण की नारायणी सेना ले लेता है। → कृतवर्मा दुर्योधन को एक अक्षौहिणी सेना देता है; अर्जुन कृष्ण-सहित प्रसन्न होकर युधिष्ठिर के पास लौटते हैं—पाण्डवों के लिए यह नैतिक-रणनीतिक विजय बनती है। → अब प्रश्न यह रह जाता है—कृष्ण के सारथ्य से पाण्डवों का धर्म-युद्ध किस दिशा में मुड़ेगा, और दुर्योधन की सेना-प्राप्ति युद्ध को कितना उग्र करेगी?
Verse 1
ऑपन--माजल बछ। अ>-छऋाज सप्तमो<ध्याय: श्रीकृष्णका दुर्योधन तथा अर्जुन दोनोंको सहायता देना वैशम्पायन उवाच पुरोहितं ते प्रस्थाप्य नगरं नागसाह्दयम् | दूतान् प्रस्थापयामासु: पार्थिवेभ्यस्ततस्ततः
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! ‘নাগসাহ্বয়’ নগর (হস্তিনাপুর)-এ পুরোহিতকে অগ্রে প্রেরণ করে পাণ্ডবরা তারপর নানা দিকের রাজাদের কাছে সর্বত্র দূত পাঠাতে লাগল।
Verse 2
प्रस्थाप्य दूतानन्यत्र द्वारकां पुरुषर्षभ: । स्वयं जगाम कौरव्य: कुन्तीपुत्रो धनंजय:,अन्य सब स्थानोंमें दूत भेजकर कुरुकुलनन्दन कुन्तीपुत्र नरश्रेष्ठ धनंजय स्वयं द्वारकापुरीको गये
অন্যান্য স্থানে দূত পাঠিয়ে, পুরুষশ্রেষ্ঠ—কুরুবংশের গৌরব, কুন্তীপুত্র ধনঞ্জয়—স্বয়ং দ্বারকায় গেলেন।
Verse 3
गते द्वारवतीं कृष्णे बलदेवे च माधवे । सह वृष्ण्यन्धकै: सर्वेरभोजैश्न शतशस्तदा
বৈশম্পায়ন বললেন—যখন মাধব শ্রীকৃষ্ণ ও বলদেব শত শত বৃষ্ণি, অন্ধক ও ভোজদের সঙ্গে দ্বারাবতীর দিকে যাত্রা করলেন, তখন ধৃতরাষ্ট্রপুত্র রাজা দুর্যোধন গোপনে নিযুক্ত চরদের দ্বারা পাণ্ডবদের সকল গতিবিধি নজরে রাখছিল।
Verse 4
सर्वमागमयामास पाण्डवानां विचेष्टितम् । धृतराष्ट्रात्मजो राजा गूढै: प्रणिहितै श्चरै:
ধৃতরাষ্ট্রপুত্র রাজা দুর্যোধন গোপনে প্রেরিত চরদের দ্বারা পাণ্ডবদের সকল কার্যকলাপের সম্পূর্ণ সংবাদ জেনে নিলেন।
Verse 5
स श्रुत्वा माधवं यानन््तं सदश्वैरनिलोपमै: । बलेन नातिमहता द्वारकामभ्ययात् पुरीम्
মাধব (শ্রীকৃষ্ণ) যাত্রা করছেন শুনে, সেও বায়ুর ন্যায় বেগবান উৎকৃষ্ট অশ্ব এবং অতি বৃহৎ নয় এমন এক বাহিনী নিয়ে দ্বারকা নগরীর দিকে রওনা হল।
Verse 6
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्ोगपर्वमें पुरोहितप्रस्थानविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ,तमेव दिवसं चापि कौन्तेय: पाण्डुनन्दन: । आनर्तनगरीं रम्यां जगामाशु धनंजय:
সেই দিনই কুন্তীপুত্র, পাণ্ডুনন্দন ধনঞ্জয় (অর্জুন) দ্রুত রমণীয় আনর্ত-নগরীতে পৌঁছে গেলেন।
Verse 7
कुन्तीकुमार पाण्डुनन्दन अर्जुनने भी उसी दिन शीघ्रतापूर्वक रमणीय द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थान किया ।।
কুরুবংশের আনন্দবর্ধক সেই দুই পুরুষসিংহ দ্বারকায় গিয়ে শয়নরত অবস্থায় নিদ্রিত শ্রীকৃষ্ণকে দেখলেন; তারপর তাঁরা দুজনেই সেই নিদ্রিত কৃষ্ণের নিকট অগ্রসর হলেন।
Verse 8
ततः शयाने गोविन्दे प्रविवेश सुयोधन: । उच्छीर्षतश्न॒ कृष्णस्य निषसाद वरासने,श्रीकृष्णके शयनकालमें पहले दुर्योधनने उनके भवनमें प्रवेश किया और उनके सिरहानेकी ओर रखे हुए एक श्रेष्ठ सिंहासनपर बैठ गया
তখন গোবিন্দ (শ্রীকৃষ্ণ) শয়নরত থাকতেই সুয়োধন (দুর্যোধন) প্রবেশ করল এবং কৃষ্ণের শিয়রের কাছে স্থাপিত উৎকৃষ্ট সিংহাসনে বসে পড়ল।
Verse 9
ततः किरीटी तस्यानुप्रविवेश महामना: । पश्चाच्चैव स कृष्णस्य प्रह्दोडतिषछ्ठत् कृताञ्जलि:
তারপর মহামনা কিরীটধারী অর্জুন সেই কক্ষে প্রবেশ করলেন এবং গভীর বিনয়ে করজোড় করে কৃষ্ণের পাদদেশের দিকে পিছনে দাঁড়িয়ে রইলেন।
Verse 10
प्रतिबुद्धः स वार्ष्णेयो ददर्शाग्रे किरीटिनम् । स तयोः स्वागतं कृत्वा यथावत् प्रतिपूज्य तौ
জাগ্রত হয়ে বার্ষ্ণেয় (শ্রীকৃষ্ণ) সামনে কিরীটিন (অর্জুন)কে দেখলেন। তারপর তিনি উভয়েরই স্বাগত জানিয়ে যথাবিধি তাদের সম্মান করলেন।
Verse 11
तदागमनजं हेतुं पप्रच्छ मधुसूदन: । ततो दुर्योधन: कृष्णमुवाच प्रहसन्निव
তখন মধুসূদন তাদের আগমনের কারণ জিজ্ঞাসা করলেন। এরপর দুর্যোধন যেন হাসিমুখে কৃষ্ণকে বলল।
Verse 12
जागनेपर वृष्णिकुलभूषण श्रीकृष्णने पहले अर्जुनको ही देखा। मधुसूदनने उन दोनोंका यथायोग्य आदर-सत्कार करके उनसे उनके आगमनका कारण पूछा। तब दुर्योधनने भगवान् श्रीकृष्णसे हँसते हुएसे कहा-- ।।
জাগ্রত হয়ে বৃষ্ণিকুলভূষণ শ্রীকৃষ্ণ প্রথমেই অর্জুনকে দেখলেন। মধুসূদন উভয়কে যথোচিত সম্মান দিয়ে তাদের আগমনের কারণ জিজ্ঞাসা করলেন। তখন দুর্যোধন হাসিমুখে যেন শ্রীকৃষ্ণকে বলল— “এই আসন্ন সংঘাতে আপনি এখানে আমাকে সহায়তা দিন; কারণ আপনার মৈত্রী আমার প্রতিও এবং অর্জুনের প্রতিও সমান।”
Verse 13
तथा सम्बन्धकं तुल्यमस्माकं त्वयि माधव । अहं चाभिगत: पूर्व त्वामद्य मधुसूदन
বৈশম্পায়ন বললেন—“হে মাধব! তেমনি আপনার সঙ্গে আমাদের বন্ধনও একই রকম। আমি পূর্বেও আপনার কাছে এসেছিলাম, আর আজ আবার, হে মধুসূদন, আপনার কাছে এলাম।”
Verse 14
पूर्व चाभिगतं सन््तो भजन्ते पूर्वसारिण: । त्वं च श्रेष्ठठमो लोके सतामद्य जनार्दन | सततं सम्मतश्वैव सद्वृत्तमनुपालय
বৈশম্পায়ন বললেন—“সজ্জনেরা পূর্বকাল থেকে স্বীকৃত আচরণকেই মান্য করে; তারা পূর্বপুরুষদের দেখানো পথে চলে। আর হে জনার্দন! আজ আপনি জগতে সৎপুরুষদের মধ্যে শ্রেষ্ঠতম, সর্বদা সম্মানিত। অতএব সদাচার সর্বদা রক্ষা করুন।”
Verse 15
दुर्योधन और अर्जुनका श्रीकृष्णसे युद्धके लिये सहायता माँगना “माधव! (पाण्डवोंके साथ हमारा) जो युद्ध होनेवाला है
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—“হে রাজন! এতে কোনো সন্দেহ নেই যে আপনি আমার গৃহে আগে এসেছেন; কিন্তু আমি প্রথমে দেখেছি পার্থ ধনঞ্জয় অর্জুনকেই।”
Verse 16
तव पूर्वाभिगमनात् पूर्व चाप्यस्य दर्शनात् । साहाय्यमुभयोरेव करिष्यामि सुयोधन,सुयोधन! आप पहले आये हैं और अर्जुनको मैंने पहले देखा है; इसलिये मैं दोनोंकी ही सहायता करूँगा
“হে সুয়োধন! আপনি আগে এসেছেন, আর তাকে আমি আগে দেখেছি; তাই আমি উভয় পক্ষকেই সহায়তা করব।”
Verse 17
प्रवारणं तु बालानां पूर्व कार्यमिति श्रुति: । तस्मात् प्रवारणं पूर्वमर्ह: पार्थो धनंजय:
“শ্রুতি বলে—প্রথমে কনিষ্ঠদেরই তাদের অভীষ্ট বস্তু দেওয়া উচিত; অতএব বয়সে কনিষ্ঠ হওয়ায় প্রথমে পার্থ ধনঞ্জয়ই নিজের কাম্য বস্তু পাওয়ার অধিকারী।”
Verse 18
मत्संहननतुल्यानां गोपानामर्बुदं महत् | नारायणा इति ख्याता: सर्वे संग्रामयोधिन:
শ্রীকৃষ্ণ বললেন—আমার কাছে গোপদের এক বিরাট বাহিনী আছে—সংখ্যায় এক ‘অর্বুদ’; তাদের দেহবল ও গঠন আমারই তুল্য। তারা সকলেই ‘নারায়ণ’ নামে খ্যাত এবং প্রত্যেকেই যুদ্ধে অবিচল যোদ্ধা।
Verse 19
ते वा युधि दुराधर्षा भवन्त्वेकस्थ सैनिका: । अयुध्यमान: संग्रामे न्यस्तशस्त्रो5हमेकत:
যুদ্ধে অদম্য সেই যোদ্ধারা একত্র হয়ে এক পক্ষের সঘন বাহিনী হয়ে থাকুক। আর আমি যুদ্ধক্ষেত্রে এক পাশে থাকব—অস্ত্র নামিয়ে রেখে, যুদ্ধ না করে।
Verse 20
एक ओरे तो वे दुर्धर्ष सैनिक युद्धके लिये उद्यत रहेंगे और दूसरी ओरसे अकेला मैं रहूँगा; परंतु मैं न तो युद्ध करूँगा और न कोई शस्त्र ही धारण करूँगा ।।
একদিকে সেই দুর্ধর্ষ সৈন্যরা যুদ্ধের জন্য প্রস্তুত থাকবে, আর অন্যদিকে একা আমি; কিন্তু আমি না যুদ্ধ করব, না কোনো অস্ত্র ধারণ করব। এই দুটির মধ্যে, হে পার্থ, যা তোমার হৃদয়ে অধিক প্রিয় মনে হয়, তুমি আগে সেটিই বেছে নাও; কারণ ধর্মানুসারে প্রথম পছন্দের অধিকার তোমারই।
Verse 21
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु कृष्णेन कुन्तीपुत्रो धनंजय: । अयुध्यमानं संग्रामे वरयामास केशवम्
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! কৃষ্ণ এ কথা বলার পর কুন্তীপুত্র ধনঞ্জয় যুদ্ধক্ষেত্রে যুদ্ধ না করা কেশবকেই (সহায়রূপে) বেছে নিলেন।
Verse 22
नारायणममित्रघ्नं कामाज्जातमजं नृषु । सर्वक्षत्रस्थ पुरतो देवदानवयोरपि
—সেই নারায়ণকে, যিনি শত্রুনাশক; যিনি অজন্মা হয়েও স্বেচ্ছায় মানুষের মধ্যে প্রকাশিত হয়েছেন—দেব, দানব এবং সকল ক্ষত্রিয়ের সম্মুখে।
Verse 23
दुर्योधनस्तु तत् सैन्यं सर्वमावरयत् तदा । सहस्राणां सहस्र॑ तु योधानां प्राप्प भारत
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন দুর্যোধন সেই সমগ্র সেনাবাহিনী নিজের অধীনে আনল। হে ভারত, হে জনমেজয়! সহস্র সহস্র যোদ্ধা লাভ করে এবং মনে করে যে কৃষ্ণকে সে বোকা বানিয়েছে, সে পরম আনন্দে উল্লসিত হল। তার যুদ্ধবল ভয়ংকর হয়ে উঠল; ধর্মের আশ্রয়ে নয়, কেবল বাহিনী-সঞ্চয়ের দম্ভে সে নিজের পক্ষকে দৃঢ় করল।
Verse 24
कृष्णं चापद्वतं ज्ञात्वा सम्प्राप परमां मुदम् । दुर्योधनस्तु तत् सैन्यं सर्वमादाय पार्थिव:
বৈশম্পায়ন বললেন—কৃষ্ণকে বোকা বানানো হয়েছে জেনে দুর্যোধন পরম আনন্দ পেল। হে জনমেজয়! সেই রাজা সমগ্র সেনাবাহিনী নিজের অধিকারে নিল। অগণিত যোদ্ধা পেয়ে সে উল্লসিত হল, তার আত্মবিশ্বাস ফুলে উঠল; তার শক্তি ভয়ংকর বলে মনে হল। এ সেই মুহূর্ত—যখন ছল ও সঞ্চয়জাত জয়ের মদ মনকে আচ্ছন্ন করে এবং যুদ্ধের নৈতিক ফাটল আরও গভীর করে।
Verse 25
ततो<भ्ययाद् भीमबलो रौहिणेयं महाबल: । सर्व चागमने हेतुं स तस्मै संन्यवेदयत् | प्रत्युवाच तत: शौरिर्धार्तराष्ट्रमिदं वच:
তারপর ভীমবল দুর্যোধন মহাবলী রোহিণীনন্দন বলরামের কাছে গেল। সে নিজের আগমনের সমস্ত কারণ তাঁকে নিবেদন করল। তখন, হে জনমেজয়! শৌরি বলরাম ধৃতরাষ্ট্রপুত্রকে এই কথা বললেন। যুদ্ধের প্রাক্কালে এ এক সংকটক্ষণ—যেখানে স্নেহ, আত্মীয়তা ও ধর্ম—সব কিছুরই পরীক্ষা হতে চলেছিল।
Verse 26
बलदेव उवाच विदितं ते नरव्याप्र सर्व भवितुमरहति । यन्मयोक्तं विराटस्य पुरा वैवाहिके तदा
বলদেব বললেন—হে নরব্যাঘ্র! এখন তোমার সব কিছু জানা উচিত। রাজা বিরাটের বিবাহোৎসবে পূর্বে আমি যা বলেছিলাম, তা নিশ্চয়ই তোমার জানা হয়ে গেছে।
Verse 27
निगृह्मोक्तो हृषीकेशस्त्वदर्थ कुरुनन्दन । मया सम्बन्धकं तुल्यमिति राजन् पुनः पुन:
হে কুরুনন্দন! তোমার স্বার্থে হৃষীকেশ কৃষ্ণকে বারবার অনুরোধ করা হয়েছিল—প্রায় চাপই দেওয়া হয়েছিল। আর হে রাজন! আমি বারবার বলেছিলাম, উভয় পক্ষের সঙ্গেই আমার সম্পর্ক সমান; তাই আমাকে সমভাব রেখে সংযমের সঙ্গে কথা ও কাজ করতে হবে।
Verse 28
न च तद् वाक्यमुक्तं वै केशवं प्रत्यपद्यत । न चाहमुत्सहे कृष्णं विना स्थातुमपि क्षणम्
সে কথা বলা হলেও কেশব তা গ্রহণ করলেন না। আর আমি কৃষ্ণকে ছাড়া এক মুহূর্তও থাকতে সাহস করি না।
Verse 29
कुरुनन्दन! तुम्हारे लिये मैंने श्रीकृष्णको बाध्य करके कहा था कि हमारे साथ दोनों पक्षोंका समानरूपसे सम्बन्ध है। राजन! मैंने वह बात बार-बार दुहरायी, परंतु श्रीकृष्णको जँची नहीं और मैं श्रीकृष्ण-को छोड़कर एक क्षण भी अन्यत्र कहीं ठहर नहीं सकता ।।
কুরুনন্দন! তোমার জন্য আমি শ্রীকৃষ্ণকে অনুরোধে-চাপে বলেছিলাম—‘আমাদের উভয় পক্ষের সঙ্গেই সমান সম্পর্ক আছে।’ রাজন! আমি কথাটি বারবার বলেছি, কিন্তু শ্রীকৃষ্ণের তা পছন্দ হয়নি; আর আমি শ্রীকৃষ্ণকে ছেড়ে এক মুহূর্তও অন্যত্র থাকতে পারি না। অতএব বাসুদেবের দিকে চেয়ে আমার মনে দৃঢ় সিদ্ধান্ত জন্মাল—আমি না পার্থের সাহায্য করব, না দুঃশাসনপুত্র দুর্যোধনের।
Verse 30
जातो<सि भारते वंशे सर्वपार्थिवपूजिते । गच्छ युध्यस्व धर्मेण क्षात्रेण पुरुषर्षभ,पुरुषरत्न! तुम समस्त राजाओंद्वारा सम्मानित भरत-वंशमें उत्पन्न हुए हो। जाओ, क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध करो
তুমি সকল রাজাদের দ্বারা সম্মানিত ভরতবংশে জন্মেছ। অতএব যাও—ক্ষত্রধর্ম অনুসারে ধর্মসম্মতভাবে যুদ্ধ করো, হে পুরুষশ্রেষ্ঠ।
Verse 31
वैशम्पायन उवाच इत्येवमुक्तस्तु तदा परिष्वज्य हलायुधम् । कृष्णं चापद्व॒तं ज्ञात्वा युद्धान्मेने जितं जयम्
বৈশম্পায়ন বললেন—এভাবে বলা হলে তখন দুর্যোধন হলায়ুধ (বলরাম)কে বুকে জড়িয়ে ধরল; আর কৃষ্ণকে নিজের অনুকূলে হয়েছে মনে করে সে যুদ্ধেই জয় নিশ্চিত বলে ভাবল।
Verse 32
सो<भ्ययात् कृतवर्माणं धृतराष्ट्रसुतो नृप: । कृतवर्मा ददौ तस्य सेनामक्षौहिणीं तदा
তখন ধৃতরাষ্ট্রপুত্র রাজা দুর্যোধন কৃতবর্মার কাছে গেল। সেই সময় কৃতবর্মা তাকে এক অক্ষৌহিণী সেনা দিল।
Verse 33
तदनन्तर धुृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन कृतवर्मके पास गया। कृतवर्माने उसे एक अक्षौहिणी सेना दी ।।
এরপর ধৃতরাষ্ট্রপুত্র রাজা দুর্যোধন কৃতবর্মার কাছে গেল। কৃতবর্মা তাকে এক অক্ষৌহিণী সেনা দিলেন। সেই সমগ্র ভয়ংকর সেনাবাহিনীতে পরিবৃত কুরু-নন্দন দুর্যোধন উৎফুল্লচিত্তে, মিত্র ও সুহৃদদের আনন্দ বাড়াতে বাড়াতে, মহাসন্তোষে হস্তিনাপুরের দিকে প্রত্যাবর্তন করল।
Verse 34
ततः पीताम्बरधरो जगत्स्रष्टा जनार्दन: । गते दुर्योधने कृष्ण: किरीटिनमथाब्रवीत् । अयुध्यमान: कां बुद्धिमास्थायाहं वृतस्त्वया
তারপর দুঃর্যোধন চলে গেলে, পীতাম্বরধারী জগত্স্রষ্টা জনার্দন শ্রীকৃষ্ণ কিরীটধারী অর্জুনকে বললেন—“পার্থ! আমি যুদ্ধ করব না; তবে তুমি কোন বুদ্ধি ও কোন অভিপ্রায়ে আমাকে বেছে নিয়েছ?”
Verse 35
अर्जुन उवाच भवान् समर्थस्तान् सर्वान् निहन्तुं नात्र संशय: । निहन्तुमहमप्येक: समर्थ: पुरुषर्षभ
অর্জুন বলল—“ভগবান! আপনি একাই তাদের সকলকে বিনাশ করতে সক্ষম; এতে কোনো সংশয় নেই। আর হে পুরুষশ্রেষ্ঠ, আপনার কৃপায় আমিও একাই সেই সকল শত্রুকে ধ্বংস করতে সক্ষম।”
Verse 36
भवांस्तु कीर्तिमॉल्लोके तद् यशस्त्वां गमिष्यति । यशसां चाहमप्यर्थी तस्मादसि मया वृत:
অর্জুন বলল—“কিন্তু আপনি জগতে খ্যাতিমান; আপনি যেখানে থাকবেন, সেই যশই আপনার অনুসরণ করবে। আমিও যশ কামনা করি; তাই আপনাকেই আমি বেছে নিয়েছি।”
Verse 37
सारथ्य॑ं तु त्वया कार्यमिति मे मानसं सदा । चिररात्रेप्सितं काम॑ तद् भवान् कर्तुमहति
অর্জুন বলল—“আপনাকেই আমার সারথি হতে হবে—এটাই আমার হৃদয়ের স্থির সংকল্প। বহু দিন ও বহু রাত্রি ধরে যে কামনা আমি লালন করেছি, অনুগ্রহ করে আপনি তা পূর্ণ করুন।”
Verse 38
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ।।
বিদ্যা ও বিনয়ে সম্পন্ন ব্রাহ্মণ, গাভী, হাতি, কুকুর এবং কুকুরের মাংস ভক্ষণকারী—এদের সকলের প্রতিই পণ্ডিতেরা সমদৃষ্টি রাখেন। এর নীতিবোধ এই নয় যে আচরণ বা ধর্মকর্তব্যের ভেদ মুছে ফেলতে হবে; বরং সকল জীবের অন্তরে একই আত্মাকে দেখে সামাজিক মর্যাদা বা প্রজাতিভেদের জন্ম দেওয়া অবজ্ঞা, নিষ্ঠুরতা ও পক্ষপাতকে সংযত করা।
Verse 39
वैशग्पायन उवाच एवं प्रमुदित: पार्थ: कृष्णेन सहितस्तदा । वृतो दशार्हप्रवरै: पुनरायाद् युधिष्ठिरम्
বৈশম্পায়ন বললেন—এভাবে উদ্দেশ্য সিদ্ধ হওয়ায় আনন্দিত পৃথাপুত্র অর্জুন, কৃষ্ণকে সঙ্গে নিয়ে, দশার্হ যাদবদের শ্রেষ্ঠ বীরদের দ্বারা পরিবৃত হয়ে, পুনরায় যুধিষ্ঠিরের নিকট ফিরে এলেন। এতে বোঝায়—ব্যক্তিগত সংকল্পও শেষ পর্যন্ত ন্যায়সঙ্গত নেতার কাছে জবাবদিহিমূলক পরামর্শে নিবেদিত হওয়া উচিত।
The chapter contrasts procedural priority and moral legitimacy against strategic opportunism: who should choose first, and whether victory is better pursued through sheer armed strength or through principled guidance and counsel.
The episode frames intelligence, restraint, and right association as decisive forms of power: selecting guidance (buddhi) can outweigh selecting force (bala), especially when outcomes depend on clarity of purpose and ethical direction.
No explicit phalaśruti is stated here; its meta-significance is narrative-structural—establishing Kṛṣṇa’s non-combatant role and the alliance distribution that conditions later events and ethical readings of agency.