Adhyaya 63
Udyoga ParvaAdhyaya 6328 Verses

Adhyaya 63

उद्योगपर्व — धृतराष्ट्रस्य दुर्योधनप्रति शक्तिस्मारक-उपदेशः (Udyoga Parva 63: Dhṛtarāṣṭra’s Counsel Reminding Duryodhana of Opponent Strength)

Upa-parva: Dhṛtarāṣṭra–Duryodhana Nīti-Upadeśa (Counsel on Assessing Pāṇḍava Power)

Chapter 63 presents Dhṛtarāṣṭra addressing Duryodhana with a corrective warning: Duryodhana is portrayed as mistaking a wrong path for the right, like an unknowing traveler. Dhṛtarāṣṭra then enumerates the strategic reality of the opposing side by describing the Pāṇḍavas’ exceptional capacities—Yudhiṣṭhira’s firm grounding in dharma, Bhīma’s unmatched physical force, and Arjuna’s superiority as the wielder of the Gāṇḍīva—framed through comparative metaphors that stress disproportionate risk. The counsel expands to allied figures such as Dhṛṣṭadyumna and Sātyaki, and culminates in the assertion that Kṛṣṇa’s presence renders the Pāṇḍava side practically unassailable. Dhṛtarāṣṭra urges Duryodhana to heed the words of well-wishers and senior authorities (Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Vikarṇa, Bāhlīka), emphasizing institutional counsel. The chapter closes by invoking precedent from Virāṭa’s city as an evidentiary case: Arjuna’s demonstrated capacity there is presented as proof that Duryodhana’s forces have previously been checked, and that broader confrontation invites systemic loss. The thematic lesson is a synthesis of ethical restraint and strategic realism: ignoring dharma-aligned counsel and empirical indicators is positioned as a failure of governance judgment.

Chapter Arc: विदुर धृतराष्ट्र के सम्मुख कौटुम्बिक कलह की विनाश-शक्ति का स्मरण कराते हैं और संधि का मार्ग खोलने के लिए एक दृष्टान्त-कथा आरम्भ करते हैं—पक्षियों और जाल की कथा। → दो सदा-साथ रहने वाले पक्षी शिकारी के जाल में फँसते हैं; वे मिलकर जाल उठाकर आकाश में उड़ जाते हैं, परन्तु संकट के बीच एकता डगमगाती है—वे परस्पर दोषारोपण और झगड़े में उतर आते हैं। → जब दोनों पक्षी क्रोध में लड़ते हैं, तभी शिकारी चुपके से पास आकर उन्हें पकड़ लेता है—विदुर का संकेत स्पष्ट हो उठता है कि ‘विभाजन’ ही शत्रु का सबसे बड़ा अवसर है। → विदुर धृतराष्ट्र को नीति-सार सुनाते हैं: एकता में बल है, कलह में सर्वनाश। वे धृतराष्ट्र से आग्रह करते हैं कि युधिष्ठिर को ‘अंक’ (गोद/आश्रय) दें, संधि करें, क्योंकि युद्ध में किसी की भी निश्चित विजय नहीं और पाण्डव-समर्थन (द्रुपद, विराट, अर्जुन आदि) अत्यन्त प्रचण्ड है। → धृतराष्ट्र के भीतर पुत्रमोह और राज्यलोभ के रहते क्या वह विदुर की संधि-नीति स्वीकार करेगा, या दुर्योधन-पक्ष की हठधर्मिता उसे युद्ध की ओर धकेल देगी?

Shlokas

Verse 1

अपर चतु:षष्टितमो<5 ध्याय: विदुरका कौटुम्बिक कलहसे हानि बताते हुए धृतराष्ट्रको संधिकी सलाह देना विदुर उवाच शकुनीनामिहार्थाय पाशं भूमावयोजयत्‌ । वश्चिच्छाकुनिकस्तात पूर्वेषामिति शुश्रुम

বিদুর বললেন—তাত! আমরা পূর্বপুরুষদের মুখে শুনেছি, এক চিড়িমার শকুনিদের জন্য ভূমিতে ফাঁদ পেতেছিল; কিন্তু, বৎস, সেই চিড়িমারও নিজের পাতা ফাঁদেরই বশে পড়ে।

Verse 2

विदुरजी कहते हैं--तात! हमने पूर्वपुरुषोंके मुखसे सुन रखा है कि किसी समय एक चिड़ीमारने चिड़ियोंको फँसानेके लिये पृथ्वीपर एक जाल फैलाया ।। तस्मिन्‌ द्वौ शकुनौ बद्धौ युगपत्‌ सहचारिणौ । तावुपादाय त॑ पाशं जग्मतु: खचरावुभौ

বিদুর বললেন—তাত! আমরা পূর্বপুরুষদের মুখে শুনেছি, এক সময় এক চিড়িমার পাখি ধরার জন্য ভূমিতে জাল পেতেছিল। সেই জালেই একসঙ্গে বিচরণকারী দুই পাখি একই সঙ্গে আবদ্ধ হল। তারা দু’জনেই সেই জাল তুলে নিয়ে—বাঁধা থাকলেও—আকাশে উড়ে গেল।

Verse 3

उस जालमें दो ऐसे पक्षी फँस गये, जो सदा साथ-साथ उड़ने और विचरनेवाले थे। वे दोनों पक्षी उस समय उस जालको लेकर आकाशमें उड़ चले ।। तौ विहायसमाक्रान्तौ दृष्टयवा शाकुनिकस्तदा । अन्वधावदनिर्विण्णो येन येन सम गच्छत:,चिड़ीमार उन दोनोंको आकाशमें उड़ते देखकर भी खिन्न या हताश नहीं हुआ। वे जिधर-जिधर गये, उधर-उधर ही वह उनके पीछे दौड़ता रहा

একই জালে ধরা, সদা সহচর দুই পাখি সেই জাল বহন করে আকাশে উড়ে উঠল। তাদের আকাশে উড়তে দেখে পাখিশিকারি হতাশ হল না; তারা যেদিকেই একসঙ্গে উড়ল, সেদিকেই সে নিরুৎসাহ না হয়ে তাদের পিছু পিছু দৌড়াতে লাগল।

Verse 4

तथा तमनुधावन्तं मृगयुं शकुनार्थिनम्‌ । आश्रमस्थो मुनि: कश्रिद्‌ ददर्शाथ कृताह्विक:,उन दिनों उस वनमें कोई मुनि रहते थे, जो उस समय संध्या-वन्दन आदि नित्यकर्म करके आश्रममें ही बैठे हुए थे। उन्होंने पक्षियोंको पकड़नेके लिये उनका पीछा करते हुए उस व्याधको देखा

ঠিক তখনই, আশ্রমে বসবাসকারী এক মুনি—সন্ধ্যা-বন্দনা প্রভৃতি নিত্যকর্ম সম্পন্ন করে—পাখি ধরার লোভে ছুটে চলা সেই শিকারিকে দেখতে পেলেন।

Verse 5

तावन्तरिक्षगौ शीघ्रमनुयान्तं महीचरम्‌ । श्लोकेनानेन कौरव्य पप्रच्छ स मुनिस्तदा,कुरुनन्दन! उन आकाशचारी पक्षियोंके पीछे-पीछे भूमिपर पैदल दौड़नेवाले उस व्याधसे मुनिने निम्नांकित श्लोकके अनुसार प्रश्न किया--

হে কৌরবকুল-নন্দন! তখন আকাশগামী পাখিদের দ্রুত অনুসরণ করে ভূমিতে পায়ে হেঁটে দৌড়তে থাকা সেই শিকারিকে মুনি এই শ্লোকের দ্বারা প্রশ্ন করলেন।

Verse 6

विचित्रमिदमाश्चर्य मृगहन्‌ प्रतिभाति मे । प्लवमानौ हि खचरौ पदातिरनुधावसि,“अरे व्याध! मुझे यह बात बड़ी विचित्र और आश्चर्यजनक जान पड़ती है कि तू आकाशमें उड़ते हुए इन दोनों पक्षियोंके पीछे पृथ्वीपर पैदल दौड़ रहा है”

“হে শিকারি! আমার কাছে এ বড়ই বিচিত্র ও আশ্চর্য মনে হচ্ছে—ওই দুই আকাশচারী পাখি উড়ে চলেছে, আর তুমি পায়ে হেঁটে মাটির ওপর তাদের পেছনে দৌড়াচ্ছ।”

Verse 7

शाकुनिक उवाच पाशमेकमुभावेतौ सहितौ हरतो मम । यत्र वै विवदिष्येते तत्र मे वशमेष्यत:,व्याध बोला--मुने! ये दोनों पक्षी आपसमें मिल गये हैं, अतः मेरे एकमात्र जालको लिये जा रहे हैं। अब ये जहाँ-कहीं एक दूसरेसे झगड़ेंगे, वहीं मेरे वशमें आ जायँगे

শিকারি বলল—“মুনিবর! এই দুই পাখি একসঙ্গে আমার একমাত্র জালটি নিয়ে যাচ্ছে। তারা যেখানে গিয়ে পরস্পর বিবাদে জড়াবে, সেখানেই তারা আমার বশে এসে পড়বে।”

Verse 8

विदुर उवाच तौ विवादमनुप्राप्ती शकुनौ मृत्युसंधितौ । विगृहा[ च सुददुर्बुद्धी पृथिव्यां संनिपेततु:,विदुरजी कहते हैं--राजन्‌! तदनन्तर कुछ ही देरमें कालके वशीभूत हुए वे दोनों दुर्बद्धि पक्षी आपसमें झगड़ने लगे और लड़ते-लड़ते पृथ्वीपर गिर पड़े

বিদুর বললেন—রাজন! নিয়তির বশে, যেন মৃত্যুর জন্যই বাঁধা, সেই দুই দুর্বুদ্ধি পাখি পরস্পর বিবাদে জড়াল; ঝগড়তে ঝগড়তে তারা শেষে মাটিতে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 9

तौ युध्यमानौ संरब्धौ मृत्युपाशवशानुगौ । उपसृत्यापरिज्ञातो जग्राह मृगहा तदा,जब मौततके फंदेमें फँसे हुए वे पक्षी अत्यन्त कुपित होकर एक-दूसरेसे लड़ रहे थे, उसी समय व्याधने चुपचाप उनके पास आकर उन दोनोंको पकड़ लिया

মৃত্যুর ফাঁসের অধীন হয়ে তারা অন্ধ ক্রোধে লড়াই করছিল; তখন শিকারি নিঃশব্দে, অচেনা অবস্থায় কাছে এসে, তাদের দুজনকেই ধরে ফেলল।

Verse 10

एवं ये ज्ञातयो<र्थषु मिथो गच्छन्ति विग्रहम्‌ तेडमित्रवशमायान्ति शकुनाविव विग्रहात्‌,इसी प्रकार जो कुट॒म्बीजन धन-सम्पत्तिके लिये आपसमें कलह करते हैं, वे युद्ध करके उन्हीं दोनों पक्षियोंकी भाँति शत्रुओंके वशमें पड़ जाते हैं

এইরূপেই যারা ধন-সম্পত্তির জন্য আত্মীয়স্বজনের মধ্যে পরস্পর কলহে জড়ায়, তারা সেই দুই পাখির মতোই নিজেদের বিবাদে শত্রুর অধীন হয়ে পড়ে।

Verse 11

सम्भोजनं संकथन सम्प्रश्नो5थ समागम: । एतानि ज्ञातिकार्याणि न विरोध: कदाचन,साथ बैठकर भोजन करना, आपसमें प्रेमसे वार्तालाप करना, एक-दूसरेके सुख- दुःखको पूछना और सदा मिलते-जुलते रहना--ये ही भाई-बन्धुओंके काम हैं, परस्पर विरोध करना कदापि उचित नहीं है

একসঙ্গে বসে আহার করা, স্নেহভরে কথাবার্তা বলা, পরস্পরের কুশল-অকুশল জিজ্ঞাসা করা এবং নিয়ত মিলিত থাকা—এগুলোই আত্মীয়দের কর্তব্য; পরস্পর বিরোধ কখনোই নয়।

Verse 12

ये सम काले सुमनस: सर्वे वृद्धानुपासते । सिंहगुप्तमिवारण्यमप्रधृष्या भवन्ति ते,जो शुद्ध हृदयवाले मनुष्य समय-समयपर बड़े-बूढ़ोंकी सेवा एवं संग करते रहते हैं, वे सिंहसे सुरक्षित वनके समान दूसरोंके लिये दुर्धर्ष हो जाते हैं (शत्रु उनके पास आनेका साहस नहीं करते हैं)

যারা শুভমনা, শুদ্ধহৃদয় মানুষ সময়ে সময়ে বৃদ্ধদের সেবা ও সান্নিধ্য করে, তারা সিংহ-রক্ষিত অরণ্যের মতোই অপ্রধর্ষ্য হয়ে ওঠে।

Verse 13

ये3र्थ संततमासाद्य दीना इव समासते । श्रियं ते सम्प्रयच्छन्ति द्विषद्धयों भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) जो धनको पाकर भी सदा दीनोंके समान तृष्णासे पीड़ित रहते हैं, वे (आपसमें कलह करके) अपनी सम्पत्ति शत्रुओंको दे डालते हैं

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যারা ধন লাভ করেও সর্বদা দীনদের মতো তৃষ্ণায় দগ্ধ থাকে, তারা পরস্পর কলহে নিজেদের ঐশ্বর্য নষ্ট করে শত্রুর হাতে তুলে দেয়।

Verse 14

धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च । धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ,भरतकुलभूषण धृतराष्ट्र! जैसे जलते हुए काष्ठ अलग-अलग कर दिये जानेपर जल नहीं पाते, केवल धुआँ देते हैं और परस्पर मिल जानेपर प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार कुटुम्बीजन आपसी फूटके कारण अलग-अलग रहनेपर अशक्त हो जाते हैं तथा परस्पर संगठित होनेपर बलवान्‌ एवं तेजस्वी होते हैं

হে ভরতশ্রেষ্ঠ ধৃতরাষ্ট্র! যেমন জ্বলন্ত কাঠ আলাদা করলে শিখা ওঠে না, কেবল ধোঁয়া দেয়, আর একত্র রাখলে দাউদাউ করে জ্বলে ওঠে—তেমনি আত্মীয়স্বজন বিভেদে বিচ্ছিন্ন হলে দুর্বল হয়, আর ঐক্যে শক্তিশালী ও দীপ্তিমান হয়।

Verse 15

इदमन्यत्‌ प्रवक्ष्यामि यथा दृष्टं गिरो मया । श्रुत्वा तदपि कौरव्य यथा श्रेयस्तथा कुरु,कौरवनन्दन! पूर्वकालमें किसी पर्वतपर मैंने जैसा देखा था, उसके अनुसार यह एक दूसरी बात बता रहा हूँ। इसे भी सुनकर आपको जिसमें अपनी भलाई जान पड़े, वही कीजिये

হে কৌরবনন্দন! আমি আরেকটি কথা বলছি—যেমন আমি নিজে দেখেছিলাম, তেমনই আমার বাক্যে রয়ে গেছে। সেটিও শুনে, যা তোমার মঙ্গল সাধন করে, তাই করো।

Verse 16

वयं किरातै: सहिता गच्छामो गिरिमुत्तरम्‌ । ब्राह्मणैदेवकल्पैश्न विद्याजम्भकवार्तिकै:ः,एक समयकी बात है, हम बहुत-से भीलों और देवोपम ब्राह्मणोंके साथ उत्तर-दिशामें गन्धमादन पर्वतपर गये थे। हमारे साथ जो ब्राह्मण थे, उन्हें मन्त्र-यन्त्रादिरूप विद्या और ओषधियोंके साधन आदिकी बातें बहुत प्रिय थीं

এক সময় আমরা বহু কিরাত (ভীল) ও দেবতুল্য ব্রাহ্মণদের সঙ্গে উত্তরদিকে এক পর্বতের দিকে গিয়েছিলাম। আমাদের সঙ্গে থাকা ব্রাহ্মণরা বিদ্যা, মন্ত্র-যন্ত্র ও ঔষধি-সাধনার কথাবার্তায় আসক্ত ছিলেন।

Verse 17

कुञ्जभूतं गिरिं सर्वमभितो गन्धमादनम्‌ । दीप्यमानौषधिगणं सिद्धगन्धर्वसेवितम्‌,समस्त गन्धमादन पर्वत सब ओरसे कुंज-सा जान पड़ता था। वहाँ दिव्य ओषधियाँ प्रकाशित हो रही थीं। सिद्ध और गन्धर्व उस पर्वतपर निवास करते थे

চারিদিকে গন্ধমাদন পর্বতটি যেন এক বিশাল কুঞ্জের মতো দেখাত। সেখানে দিব্য ঔষধির সমূহ দীপ্ত হয়ে উঠেছিল, আর সেই শিখরে সিদ্ধ ও গন্ধর্বদের আনাগোনা ও বাস ছিল।

Verse 18

तत्रापश्याम वै सर्वे मधु पीतकमाक्षिकम्‌ । मरुप्रपाते विषमे निविष्टं कुम्भसम्मितम्‌,वहाँ हम सब लोगोंने देखा, पर्वतकी एक दुर्गम गुफामें जहाँसे कोई कूल-किनारा न होनेके कारण गिरनेकी ही अधिक सम्भावना रहती है, एक मधुकोष है। वह मक्खियोंका तैयार किया हुआ नहीं था। उसका रंग सुवर्णके समान पीला था और वह देखनेमें घड़ेके समान जान पड़ता था

সেখানে আমরা সকলেই দেখলাম এক গুচ্ছ মধু—সোনালি-হলুদ বর্ণের, মৌমাছির তৈরি নয়। তা ছিল দুর্গম পর্বত-ফাটলে, বিপজ্জনক খাদের ধারে, যেখানে পা পিছলালেই পতনের আশঙ্কা; আকারে তা যেন কলসের মতোই দেখাচ্ছিল।

Verse 19

आशीविषै रक्ष्यमाणं कुबेरदयितं भूशम्‌ । यत्‌ प्राप्य पुरुषो म्त्योउप्यमरत्वं नियच्छति,भयंकर विषधर सर्प उस मधुकी रक्षा करते थे। कुबेरको वह मधु अत्यन्त प्रिय था। हमारे साथी औषधसाधक ब्राह्मणलोग यह बता रहे थे कि इस मधुको पाकर मरणथधर्मा मनुष्य भी अमरत्व प्राप्त कर लेता है। इसको पीनेसे अंधेको दृष्टि मिल जाती है और बूढ़ा भी जवान हो जाता है

সে মধু ছিল ভয়ংকর বিষধর সাপদের দ্বারা রক্ষিত, আর কুবেরের অতি প্রিয়। বলা হয়, তা লাভ করলে মৃত্যুধর্মী মানুষও অমরত্ব লাভ করতে পারে।

Verse 20

अचक्षुर्लभते चक्षुरवृद्धो भवति वै युवा । इति ते कथयन्ति सम ब्राह्मणा जम्भसाधका:,भयंकर विषधर सर्प उस मधुकी रक्षा करते थे। कुबेरको वह मधु अत्यन्त प्रिय था। हमारे साथी औषधसाधक ब्राह्मणलोग यह बता रहे थे कि इस मधुको पाकर मरणथधर्मा मनुष्य भी अमरत्व प्राप्त कर लेता है। इसको पीनेसे अंधेको दृष्टि मिल जाती है और बूढ़ा भी जवान हो जाता है

জম্ভসাধক সেই ব্রাহ্মণেরা আমাদের বলতেন—তা লাভ করলে অন্ধ দৃষ্টি পায়, আর যে বৃদ্ধ হয়ে গেছে সেও আবার যৌবন ফিরে পায়।

Verse 21

ततः किरातास्तद्‌ दृष्टवा प्रार्थयन्तो महीपते । विनेशुर्विषमे तस्मिन्‌ ससर्पे गिरिगह्दरे,महाराज! उस समय उस मधुका अद्भुत गुण सुनकर और उसे प्रत्यक्ष देखकर भीलोंने उसे पानेकी चेष्टा की; परंतु सर्पोंसे भरी हुई उस दुर्गम पर्वतगुहामें जाकर वे सब-के-सब नष्ट हो गये

তারপর, হে মহীপতে! তা দেখে এবং তা পাওয়ার লোভে কিরাতেরা (ভীলেরা) সেই দুর্গম, সাপভরা পর্বত-গুহায় প্রবেশ করল; আর সেখানেই তারা সকলেই বিনষ্ট হল।

Verse 22

तथैव तव पुत्रो5यं पृथिवीमेक इच्छति । मधु पश्यति सम्मोहात्‌ प्रपातं नानुपश्यति,इसी प्रकार आपका यह पुत्र दुर्योधन अकेला ही सारी पृथ्वीका राज्य भोगना चाहता है। यह मोहवश केवल मधुको ही देखता है, भावी पतन या विनाशकी ओर इसकी दृष्टि नहीं जाती है

ঠিক তেমনই আপনার এই পুত্র একাই সমগ্র পৃথিবী ভোগ করতে চায়। মোহে সে কেবল মধুর মাধুর্যই দেখে; প্রপাত—আসন্ন পতন ও বিনাশ—তার চোখে পড়ে না।

Verse 23

दुर्योधनो योद्धुमना: समरे सव्यसाचिना । न च पश्यामि तेजो<स्य विक्रमं वा तथाविधम्‌,दुर्योधन समरभूमिमें सव्यसाची अर्जुनके साथ युद्ध करनेकी बात सोचता है, परंतु मैं इसके भीतर अर्जुनके समान तेज या पराक्रम नहीं देखता

দুর্যোধন সমরক্ষেত্রে সব্যসাচী অর্জুনের সঙ্গে যুদ্ধ করতে উদ্যত; কিন্তু আমি তার মধ্যে অর্জুনসম তেজ বা তেমন পরাক্রম দেখি না।

Verse 24

एकेन रथमास्थाय पृथिवी येन निर्जिता । भीष्मद्रोणप्रभृतय: संत्रस्ता: साधुयायिन:,जिस वीरने अकेले ही रथपर बैठकर सारी पृथ्वीपर विजय पायी है, विराटनगरपर चढ़ाई करने गये हुए भीष्म और द्रोण-जैसे महान्‌ योद्धाओंको भी जिसने भयभीत करके भगा दिया है, उसके सामने आपका पुत्र क्या पराक्रम कर सकता है? यह आप ही देखिये। आज भी वह वीर आपकी मैत्रीपूर्ण दृष्टिकी प्रतीक्षा कर रहा है और आपकी आज्ञासे वह कौरवोंका सारा अपराध क्षमा कर सकता है

যে বীর একাই রথে আরূঢ় হয়ে সমগ্র পৃথিবী জয় করেছে, আর যার সম্মুখে ধর্মযাত্রায় অগ্রসর ভীষ্ম-দ্রোণ প্রমুখও ভীত হয়ে পশ্চাদপসরণ করেছিল—তার বিরুদ্ধে আপনার পুত্র কী পরাক্রম দেখাবে? আপনি নিজেই বিবেচনা করুন। আজও সেই মহাবীর আপনার মৈত্রীপূর্ণ দৃষ্টির প্রতীক্ষায় আছে; আর আপনার আদেশে কৌরবদের সমস্ত অপরাধ ক্ষমা করতে পারে।

Verse 25

विराटनगरे भग्ना: कि तत्र तव दृश्यताम्‌ । प्रतीक्षमाणो यो वीर: क्षमते वीक्षितं तव,जिस वीरने अकेले ही रथपर बैठकर सारी पृथ्वीपर विजय पायी है, विराटनगरपर चढ़ाई करने गये हुए भीष्म और द्रोण-जैसे महान्‌ योद्धाओंको भी जिसने भयभीत करके भगा दिया है, उसके सामने आपका पुत्र क्या पराक्रम कर सकता है? यह आप ही देखिये। आज भी वह वीर आपकी मैत्रीपूर्ण दृष्टिकी प्रतीक्षा कर रहा है और आपकी आज्ञासे वह कौरवोंका सारा अपराध क्षमा कर सकता है

বিরাটনগরে তারা পরাভূত হয়ে পালিয়েছিল—সেখানে তোমার কোন শক্তি দেখা যায়? যে বীর আজও তোমার মৈত্রীপূর্ণ দৃষ্টির প্রতীক্ষায় আছে, সে তোমার অনুকম্পাময় দৃষ্টি পেলেই কৌরবদের সমস্ত অপরাধ ক্ষমা করতে সক্ষম।

Verse 26

ट्रुपदो मत्स्यराजश्न संक्रुद्धक्ष धनंजय: । न शेषयेयु: समरे वायुयुक्ता इवाग्नय:,राजा द्रुपद, मत्स्यनरेश विराट और क्रोधमें भरा हुआ अर्जुन--ये तीनों वायुका सहारा पाकर प्रज्वलित हुई त्रिविध अग्नियोंके समान जब युद्धभूमिमें आक्रमण करेंगे, तब किसीको जीता नहीं छोड़ेंगे

রাজা দ্রুপদ, মৎস্যরাজ বিরাট এবং ক্রোধে দগ্ধ ধনঞ্জয় অর্জুন—এই তিনজন যখন সমরক্ষেত্রে বায়ু-সহায় তিন অগ্নির মতো ঝাঁপিয়ে পড়বে, তখন কাউকেই জীবিত রেখে দেবে না।

Verse 27

अड्के कुरुष्व राजानं धृतराष्ट्र युधिष्ठिरम्‌ । युध्यतोर्हि द्वयोर्युद्धे नैकान्तेन भवेज्जय:,महाराज धृतराष्ट्र!्‌ आप राजा युधिष्ठिरको अपनी गोदमें बैठा लीजिये; क्योंकि जब दोनों पक्षोंमें युद्ध छिड़ जायगा, तब विजय किसकी होगी, यह निश्चितरूपसे नहीं कहा जा सकता

মহারাজ ধৃতরাষ্ট্র! আপনি রাজা যুধিষ্ঠিরকে আপনার কোলে বসান; কারণ উভয় পক্ষের যুদ্ধ শুরু হলে কার নিশ্চিত জয় হবে—এ কথা একান্তভাবে বলা যায় না।

Verse 64

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि विदुरवाक्ये चतु:षष्टितमो5ध्याय: ।। घड़े ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें विदुरवाक्यविषयक चौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত যানসন্ধিপর্বে বিদুরবাক্য-বিষয়ক চৌষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether to persist in a pride-driven course that disregards ethical counsel and realistic appraisal, or to adopt restraint and listen to elders whose advice aims at preventing broader harm to the polity.

Sound action requires aligning intention with dharma and evidence: strategic decisions should be guided by accurate assessment, humility before expertise, and awareness that moral blindness often manifests as misreading the path ahead.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the meta-function is implicit—positioning this counsel as a diagnostic node in the epic where ignored advice becomes a narrative marker for preventable escalation.