ट्रुपदो मत्स्यराजश्न संक्रुद्धक्ष धनंजय: । न शेषयेयु: समरे वायुयुक्ता इवाग्नय:,राजा द्रुपद, मत्स्यनरेश विराट और क्रोधमें भरा हुआ अर्जुन--ये तीनों वायुका सहारा पाकर प्रज्वलित हुई त्रिविध अग्नियोंके समान जब युद्धभूमिमें आक्रमण करेंगे, तब किसीको जीता नहीं छोड़ेंगे
রাজা দ্রুপদ, মৎস্যরাজ বিরাট এবং ক্রোধে দগ্ধ ধনঞ্জয় অর্জুন—এই তিনজন যখন সমরক্ষেত্রে বায়ু-সহায় তিন অগ্নির মতো ঝাঁপিয়ে পড়বে, তখন কাউকেই জীবিত রেখে দেবে না।
विदुर उवाच