Adhyaya 62
Udyoga ParvaAdhyaya 6228 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; कूटनीति/शान्ति-प्रयासों के बीच कौरव-पक्ष का हठ और उग्रता बढ़ती हुई।

Adhyaya 62

Udyoga Parva Adhyaya 62 — Duryodhana’s Claim of Victory and Vidura’s Allegories on Discord and Risk

Upa-parva: Vidura-nīti / Vidura’s Counsel to Dhritarashtra (contextual unit within Udyoga Parva)

The chapter opens with Duryodhana challenging the premise that the Pāṇḍavas can be assured victory despite comparable birth and human status among Kuru elites. He asserts his own martial readiness, naming allies (notably Karṇa and Duḥśāsana) and projecting a post-victory ritual program of grand sacrifices and lavish gifts. Vidura replies with a didactic narrative: a hunter’s snare is carried off by two birds who, when they quarrel mid-flight, fall and are captured—an exemplum that interprets kin-discord as the mechanism by which opponents gain control. Vidura then articulates positive duties among relatives: shared meals, dialogue, inquiry, and regular meetings, explicitly rejecting hostility as a kin-duty. He adds a second field-observation allegory from Gandhamādana: intoxicating honey situated on a perilous cliff, guarded by serpents, where seekers perish by focusing on reward and ignoring the precipice. Vidura applies this to Duryodhana’s desire for sole sovereignty—perceiving “honey” (power) while neglecting the “cliff” (strategic peril and moral consequence). The chapter concludes with pragmatic counsel to Dhṛtarāṣṭra: draw Yudhiṣṭhira close (seek settlement), because in a duel of contending forces victory is not guaranteed, and overconfidence is strategically unsound.

Chapter Arc: हस्तिनापुर के राजसभा-परिसर में दुर्योधन अपने पक्ष की ‘अपराजेयता’ का घोष करता है—पाण्डवों के साथ समान बल, पराक्रम, आयु, प्रतिभा और शास्त्र-ज्ञान का दावा करते हुए वह युद्ध को ही न्यायोचित परिणाम बताने लगता है। → दुर्योधन आत्मविश्वास को अहंकार में बदल देता है: वह अस्त्र-कौशल, शीघ्रता और रण-योग्यता में अपनी ओर के योद्धाओं की गणना कर पाण्डवों को तुच्छ ठहराता है। इसी उग्र वाणी के बीच विदुर का प्रतिवचन उठता है—राजधर्म का स्मरण कराते हुए वे भय और हिंसा के स्वभाव पर दृष्टान्त देते हैं कि जैसे क्रव्याद पशुओं से प्राणी सदा भयभीत रहते हैं, वैसे ही दमनकारी से प्रजा काँपती है। → विदुर ‘दम’ (इन्द्रिय-निग्रह/संयम) की महिमा को चरम पर ले जाते हैं: जो सब प्राणियों को अभय देता है, जो सर्वभूतहितैषी और मैत्रीभावी है, जो समुद्र-सा गम्भीर और ज्ञान-तृप्त है—वही मनुजोत्तम है; और जो नैष्कर्म्य/वैराग्य में स्थित, जितेन्द्रिय होकर लोक में चलता है, वह ब्रह्मभाव की ओर उन्नत होता है। इस नैतिक-दार्शनिक शिखर के सामने दुर्योधन का रण-घोष और भी कठोर होकर उभरता है। → दुर्योधन अंततः खुला युद्ध-निश्चय प्रकट करता है—अपने, कर्ण और दुःशासन के बल पर पाँचों पाण्डवों को मार देने की डींग (रण-उन्माद) तक पहुँचता है। विदुर का उपदेश सभा में धर्म का दीपक तो जलाता है, पर दुर्योधन की जिद को मोड़ नहीं पाता। → धर्म-वाणी और युद्ध-हठ आमने-सामने खड़े हैं—अब प्रश्न यह रह जाता है कि क्या कोई शान्ति-प्रयास दुर्योधन के भीतर प्रवेश कर पाएगा, या विनाश का रथ आगे ही बढ़ेगा?

Shlokas

Verse 1

/ ऑऔपन---मा छा | अ-क्राछ त्रेषष्टितमोड्ध्याय: दुर्योधनद्वारा अपने पक्षकी प्रबलताका वर्णन करना और विदुरका दमकी महिमा बताना दुर्योधन उवाच सदृशानां मनुष्येषु सर्वेषां तुल्यजन्मनाम्‌ । कथमेकान्ततस्तेषां पार्थानां मन्यसे जयम्‌,दुर्योधन बोला--पितामह! मनुष्योंमें हम और पाण्डव शिक्षाकी दृष्टिसे समान हैं, हमारा जन्म भी एक ही कुलमें हुआ है; फिर आप यह कैसे मानते हैं कि युद्धमें एकमात्र कुन्तीकुमारोंकी ही विजय होगी

দুর্যোধন বলল—পিতামহ! মানুষের মধ্যে আমরা সকলেই সমান, জন্মেও সমকুলজাত। তবে আপনি কীভাবে এত নিশ্চিত হয়ে মনে করেন যে জয় কেবল সেই পার্থদের (পৃথাপুত্রদের)ই হবে?

Verse 2

वयं च तेडपि तुल्या वै वीर्येण च पराक्रमै: । समेन वयसा चैव प्रातिभेन श्रुतेन च

বীর্য ও পরাক্রমে আমরা এবং তারাও সমান; বয়সেও সমান, প্রতিভা ও শ্রুতি-শাস্ত্রজ্ঞানে ও সমকক্ষ।

Verse 3

बल, पराक्रम, समवयस्कता, प्रतिभा और शास्त्रज्ञान--इन सभी दृष्टियोंसे हमलोग और पाण्डव समान ही हैं ।। अस्त्रेण योधयुग्या च शीघ्रत्वे कौशले तथा । सर्वे सम समजातीया: सर्वे मानुषयोनय:,अस्त्र-बल, योद्धाओंके संग्रह, हाथोंकी फुर्ती तथा युद्धकौशलमें भी हम और वे एक-से ही हैं, सभी समान जातिके हैं और सब-के-सब मनुष्ययोनिमें ही उत्पन्न हुए हैं

অস্ত্রবিদ্যা, যোদ্ধা সমাবেশ, হাতের দ্রুততা ও যুদ্ধকৌশলে আমরা এবং তারাও এক। আমরা সকলেই সমজাতীয়, এবং সকলেই মানবযোনিতে জন্মেছি।

Verse 4

0 | ॥॥ पितामह विजानीषे पार्थेषु विजयं कथम्‌ । नाहं भवति न द्रोणे न कृपे न च बाह्वलिके

পিতামহ! আপনি জানেন, পার্থদের পক্ষে কীভাবে জয় সম্ভব। কিন্তু আমার জয় হবে না—না দ্রোণের দ্বারা, না কৃপের দ্বারা, না বাহ্বলীকেও ভরসা করে।

Verse 5

अहं वैकर्तन: कर्णो भ्राता दुःशासनश्न मे

আমার পক্ষে আছে বৈকর্তন কর্ণ, আর আমার ভাই দুঃশাসনও আছে।

Verse 6

ततो राजन्‌ महायज्जैविविधैर्भूरिदक्षिणै:

তখন, হে রাজন, আমি নানাবিধ মহাযজ্ঞ করব, এবং প্রচুর দক্ষিণা প্রদান করব।

Verse 7

यदा परिकरिष्यन्ति ऐणेयानिव तन्‍्तुना । अतरित्रानिव जले बाहुभिमामका रणे,जैसे व्याध हरिणके बच्चोंको जाल या फंदेमें फँसाकर खींचते हैं और जैसे जलका प्रवाह कर्णधाररहित नौकारोहियोंको भँवरमें डुबो देता है, उसी प्रकार जब मेरे सैनिक अपने बाहुबलसे पाण्डवोंको पीड़ित करेंगे, उस समय रथ और हाथीसवारोंसे भरी हुई मेरी विशाल वाहिनीकी ओर देखते हुए वे पाण्डव और वह श्रीकृष्ण सब अपना अहंकार त्याग देंगे

দুর্যোধন বলল—যখন আমার যোদ্ধারা রণে বাহুবলে পাণ্ডবদের এমনভাবে ধরে টেনে আনবে, যেমন ব্যাধ জালে ধরা হরিণশাবককে টেনে আনে; আর যখন তারা হালবিহীন নৌকার আরোহীদের মতো স্রোতে ভাসিয়ে ঘূর্ণিতে ডুবিয়ে দেবে—তখন রথ ও গজারোহীতে পরিপূর্ণ আমার বিশাল সেনাদল দেখে সেই পাণ্ডবেরা এবং কেশবও অহংকার ত্যাগ করবে।

Verse 8

पश्यन्तस्ते परांस्तत्र रथनागसमाकुलान्‌ । तदा दर्प विमोक्ष्यन्ति पाण्डवा: स च केशव:,जैसे व्याध हरिणके बच्चोंको जाल या फंदेमें फँसाकर खींचते हैं और जैसे जलका प्रवाह कर्णधाररहित नौकारोहियोंको भँवरमें डुबो देता है, उसी प्रकार जब मेरे सैनिक अपने बाहुबलसे पाण्डवोंको पीड़ित करेंगे, उस समय रथ और हाथीसवारोंसे भरी हुई मेरी विशाल वाहिनीकी ओर देखते हुए वे पाण्डव और वह श्रीकृष्ण सब अपना अहंकार त्याग देंगे

যখন তারা সেখানে রথ ও যুদ্ধহস্তীতে পরিপূর্ণ সেই বিশাল বাহিনীকে দেখবে, তখন পাণ্ডবেরা এবং কেশবও অহংকার ত্যাগ করবে।

Verse 9

विदुर उवाच इह निःश्रेयसं प्राहुर्वद्धा निश्चितदर्शिन: । ब्राह्मणस्य विशेषेण दमो धर्म: सनातन:,विदुरने कहा--सिद्धान्तके जाननेवाले वृद्ध पुरुष कहते हैं कि इस संसारमें दम ही कल्याणका परम साधन है। ब्राह्मणके लिये तो विशेषरूपसे है। वही सनातनधर्म है

বিদুর বললেন—এই জগতে স্থিরদৃষ্টিসম্পন্ন বৃদ্ধজনেরা বলেন, আত্মসংযমই পরম কল্যাণের উপায়। বিশেষত ব্রাহ্মণের জন্য আত্মদমনই সনাতন ধর্ম।

Verse 10

तस्य दान क्षमा सिद्धिर्यथावदुपपद्यते । दमो दानं तपो ज्ञानमधीतं चानुवर्तते

এমন ব্যক্তির ক্ষেত্রে দান ও ক্ষমার সিদ্ধি যথাযথভাবে উদ্ভূত হয়। আত্মসংযমের পেছনে দান, তপস্যা, জ্ঞান এবং অধ্যয়নকৃত বিদ্যাও স্বাভাবিক অনুচর হয়ে চলে।

Verse 11

जो दमरूपी गुणसे युक्त है, उसीको दान, क्षमा और सिद्धिका यथार्थ लाभ प्राप्त होता है; क्योंकि दम ही दान, तपस्या, ज्ञान और स्वाध्यायका सम्पादन करता है ।। दमस्तेजो वर्धयति पवित्र दम उत्तमम्‌ | विपाप्मा वृद्धतेजास्तु पुरुषो विन्दते महत्‌,दम तेजकी वृद्धि करता है। दम पवित्र एवं उत्तम साधन है। दमसे निष्पाप एवं बढ़े हुए तेजसे सम्पन्न पुरुष परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है

বিদুর বললেন— যে ব্যক্তি দম (আত্মসংযম) নামক গুণে যুক্ত, সেই-ই দান, ক্ষমা ও সিদ্ধির প্রকৃত ফল লাভ করে; কারণ দমের দ্বারাই দান, তপস্যা, জ্ঞান ও স্বাধ্যায় সম্পূর্ণ হয়। দম অন্তর্জ্যোতি বৃদ্ধি করে; দম পবিত্র এবং সর্বোত্তম উপায়। দমের দ্বারা পাপমুক্ত ও বর্ধিত তেজে দীপ্ত পুরুষ পরম ব্রহ্মকে লাভ করে—এটাই সত্য মহত্ত্ব।

Verse 12

क्रव्याद्धय इव भूतानामदान्ते भ्य: सदा भयम्‌ । येषां च प्रतिषेधार्थ क्षत्रं सृष्टं स्‍्वयम्भुवा,जैसे मांसभोजी हिंसक पशुओंसे सब जीव डरते रहते हैं, उसी प्रकार अदान्त (असंयमी) पुरुषोंसे सभी प्राणियोंको सदा भय बना रहता है, जिनको हिंसा आदि दुष्कर्मोंसे रोकनेके लिये ब्रह्माजीने क्षत्रिय-जातिकी सृष्टि की है

বিদুর বললেন— যেমন মাংসভোজী হিংস্র জন্তুর ভয়ে সকল প্রাণী সদা সন্ত্রস্ত থাকে, তেমনই অসংযমী মানুষের ভয়ে সকল সত্তা সর্বদা ভীত থাকে। এমন লোকদের—হিংসা প্রভৃতি দুষ্কর্ম থেকে নিবৃত্ত করতে—স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মা ক্ষত্রশক্তির সৃষ্টি করেছিলেন।

Verse 13

आश्रमेषु चतुर्ष्वाहुर्दममेवोत्तमं व्रतम्‌ । तस्य लिड़ूं प्रवक्ष्यामि येषां समुदयो दम:,चारों आश्रमोंमें दमको ही उत्तम व्रत बताया गया है। यह दम जिन पुरुषोंके अभ्यासमें आकर उनके अभ्युदयका कारण बन जाता है, उनमें प्रकट होनेवाले चिह्लोंका मैं वर्णन करता हूँ

চার আশ্রমেই দম (আত্মসংযম)কেই সর্বোত্তম ব্রত বলা হয়েছে। যাদের মধ্যে দমের উদয় হয়, তাদের মধ্যে যে লক্ষণগুলি প্রকাশ পায়, তা আমি বলছি।

Verse 14

क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम्‌ | इन्द्रियाभिजयो धैर्य मार्दवं हवीरचापलम्‌,राजेन्द्र! जिस पुरुषमें क्षमा, धैर्य, अहिंसा, सम-दर्शिता, सत्य, सरलता, इन्द्रियसंयम, धीरता, मृदुता, लज्जा, स्थिरता, उदारता, अक्रोध, संतोष और श्रद्धा--ये गुण विद्यमान हैं, वह पुरुष दान्त (इन्द्रियविजयी) माना गया है

হে রাজেন্দ্র! যে পুরুষের মধ্যে ক্ষমা, ধৃতি, অহিংসা, সমতা, সত্য, সরলতা, ইন্দ্রিয়জয়, ধৈর্য, মৃদুতা, লজ্জা এবং অচঞ্চলতা—এই গুণগুলি দৃঢ়ভাবে বর্তমান থাকে, তাকেই দান্ত (ইন্দ্রিয়বিজয়ী) বলা হয়।

Verse 15

अकार्पण्यमसंरम्भ: संतोष: श्रद्दधानता । एतानि यस्य राजेन्द्र स दान्त: पुरुष: स्मृत:,राजेन्द्र! जिस पुरुषमें क्षमा, धैर्य, अहिंसा, सम-दर्शिता, सत्य, सरलता, इन्द्रियसंयम, धीरता, मृदुता, लज्जा, स्थिरता, उदारता, अक्रोध, संतोष और श्रद्धा--ये गुण विद्यमान हैं, वह पुरुष दान्त (इन्द्रियविजयी) माना गया है

হে রাজেন্দ্র! যার মধ্যে কৃপণতা বা হীনতা নেই, যে উত্তেজনাহীন, যে সন্তুষ্ট, এবং যে শ্রদ্ধায় স্থির—তাকেই ‘দান্ত’ (আত্মসংযমী) বলে স্মরণ করা হয়।

Verse 16

कामो लोभश्व दर्पश्न मन्युर्निद्रा विकत्थनम्‌ । मान ईर्ष्या च शोकश्न नैतद्‌ दान्तो निषेवते । अजिदट्दममशठं शुद्धमेतद्‌ दान्तस्य लक्षणम्‌,दमनशील पुरुष काम, लोभ, अभिमान, क्रोध, निद्रा, आत्मप्रशंसा, मान, ईर्ष्या तथा शोक--इन दुर्गुणोंको अपने पास नहीं फटकने देता। कुटिलता और शठताका अभाव तथा आत्मशुद्धि यह दमयुक्त पुरुषका लक्षण है

বিদুর বললেন— কাম, লোভ, দম্ভ, ক্রোধ, অতিনিদ্রা ও আত্মপ্রশংসা; আর সম্মানলালসা, ঈর্ষা ও শোক—এ সব দান্ত (ইন্দ্রিয়সংযমী) পুরুষ গ্রহণ করে না। সরলতা, সংযম, কপট-শঠতার অভাব এবং অন্তঃশুদ্ধি—এগুলিই সত্য সংযমীর লক্ষণ।

Verse 17

अलोलुपस्तथाल्पेप्सु: कामानामविचिन्तिता । समुद्रकल्प: पुरुष: स दान्त: परिकीर्तित:,जो निर्लोभ, कम-से-कम चाहनेवाला, भोगोंके चिन्तनसे दूर रहनेवाला तथा समुद्रके समान गम्भीर है, उस पुरुषको दान्त (इन्द्रियसंयमी) कहा गया है

বিদুর বলেন— যে নির্লোভ, অল্পইচ্ছুক, বিষয়ভোগের চিন্তায় নিমগ্ন নয়, এবং সমুদ্রের মতো গভীর ও স্থির— সেই পুরুষই ‘দান্ত’ (ইন্দ্রিয়সংযমী) বলে প্রশংসিত।

Verse 18

सुवृत्त: शीलसम्पन्न: प्रसन्नात्मा55त्मविद्‌ बुध: । प्राप्पेह लोके सम्मान सुगतिं प्रेत्य गच्छति,जो सदाचारी, शीलवान, प्रसन्नचित्त तथा आत्मज्ञानी विद्वान्‌ है वह इस जगतमें सम्मान पाकर मृत्युके पश्चात्‌ उत्तम गतिका भागी होता है

যে সদাচারী, শীলসম্পন্ন, প্রসন্নচিত্ত, আত্মজ্ঞ এবং প্রজ্ঞাবান— সে এই লোকেতে সম্মান লাভ করে এবং মৃত্যুর পরে শুভ গতি প্রাপ্ত হয়।

Verse 19

अभयं यस्य भूतेभ्य: सर्वेषामभयं यत: । स वै परिणतप्रज्ञ: प्रख्यातो मनुजोत्तम:,जिसे समस्त प्राणियोंसे निर्भयता प्राप्त हो गयी हो तथा जिससे सभी प्राणियोंका भय दूर हो गया हो, वह परिपक्व बुद्धिवाला पुरुष मनुष्योंमें श्रेष्ठ कहा गया है

যার কাছে সকল প্রাণীর থেকে নির্ভয়তা এসেছে, এবং যার দ্বারা সকল প্রাণী নির্ভয় হয়— সেই ব্যক্তি পরিণতপ্রজ্ঞ, প্রসিদ্ধ এবং মানুষের মধ্যে শ্রেষ্ঠ বলে কথিত।

Verse 20

सर्वभूतहितो मैत्रस्तस्मान्नोद्विजते जन: । समुद्र इव गम्भीर: प्रज्ञातृप्त: प्रशाम्यति,जो सम्पूर्ण भूतोंका हित चाहनेवाला और सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला है, उससे किसी भी पुरुषको उद्वेग नहीं प्राप्त होता है। जो समुद्रके समान गम्भीर एवं उत्कृष्ट ज्ञानरूपी अमृतसे तृप्त है, वही परम शान्तिका भागी होता है

যে সর্বভূতের হিতকামী এবং সকলের প্রতি মৈত্রীভাবসম্পন্ন, তার দ্বারা কেউ বিচলিত হয় না। যে সমুদ্রের মতো গম্ভীর এবং প্রজ্ঞায় তৃপ্ত, সেই-ই পরম শান্তিতে স্থিত হয়।

Verse 21

कर्मणा5<चरितं पूर्व सद्धिराचरितं च यत्‌ । तदेवास्थाय मोदन्ते दान्ता: शमपरायणा:,जो कर्तव्य कर्मोंद्वारा आचरित है तथा पहलेके साधुपुरुषोंके द्वारा जिसका आचरण किया गया है, उसे अपनाकर शम-दमसे सम्पन्न पुरुष सदा आनन्दमग्न रहते हैं

যে কর্ম কর্তব্যধর্মরূপে পালনীয় এবং যা পূর্বকালের সৎপুরুষেরা আচরণ করেছেন, সেই পথেই স্থিত থেকে শম-দমে সংযত, আত্মসংযমী জনেরা সদা আনন্দে মগ্ন থাকে।

Verse 22

नैष्कर्म्य वा समास्थाय ज्ञानतृप्तो जितेन्द्रिय: । कालाकाडुक्षी चरँंल्लोके ब्रह्म॒ुभूयाय कल्पते,अथवा जो ज्ञानसे तृप्त जितेन्द्रिय पुरुष नैष्कर्म्यका आश्रय लेकर कालकी प्रतीक्षा करता हुआ अनासक्तभावसे लोकमें विचरता रहता है, वह ब्रह्मभावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है

অথবা যে ব্যক্তি জ্ঞানতৃপ্ত, ইন্দ্রিয়জয়ী, নিষ্কর্ম্যের সাধনায় প্রতিষ্ঠিত হয়ে নির্ধারিত সময়ের প্রতীক্ষা করতে করতে অনাসক্তভাবে জগতে বিচরণ করে—সে ব্রহ্মভাব লাভের যোগ্য হয়।

Verse 23

शकुनीनामिवाकाशे पदं नैवोपलभ्यते । एवं प्रज्ञानतृप्तस्य मुनेर्वर्त्म न दृश्यते,जैसे आकाशमें पक्षियोंके चरणचिह्न नहीं दिखायी देते हैं, वैसे ही ज्ञानानन्दसे तृप्त मुनिका मार्ग दृष्टिगोचर नहीं होता है अर्थात्‌ समझमें नहीं आता है

যেমন আকাশে পাখিদের পদচিহ্ন পাওয়া যায় না, তেমনই প্রজ্ঞায় তৃপ্ত মুনির পথও দৃষ্টিগোচর হয় না।

Verse 24

उत्सृज्यैव गृहान्‌ यस्तु मोक्षमेवाभिमन्यते । लोकास्तेजोमयास्तस्य कल्पन्ते शाश्वता दिवि,जो गृहस्थाश्रमको त्यागकर मोक्षको ही आदर देता है, उसके लिये द्युलोकमें तेजोमय सनातन स्थानकी प्राप्ति होती है

যে ব্যক্তি গৃহত্যাগ করে কেবল মোক্ষকেই পরম লক্ষ্য বলে গ্রহণ করে, তার জন্য দিব্যলোকে তেজোময় চিরস্থায়ী লোকসমূহ প্রস্তুত হয়।

Verse 46

अन्येषु च नरेन्‍्द्रेषु पराक्रम्य समारभे । दादाजी! ऐसी दशामें भी आप कैसे जानते हैं कि विजय कुन्तीपुत्रोंकी ही होगी। मैं, आप, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, बाह्निक तथा अन्य राजाओंके पराक्रमका भरोसा करके युद्धका आरम्भ नहीं कर रहा हूँ

অন্য রাজাদের পরাক্রমের ভরসায়ও আমি এই যুদ্ধ আরম্ভ করছি না। তবু, পূজনীয় পিতামহ, আপনি কীভাবে নিশ্চিত হন যে বিজয় কেবল কুন্তীপুত্রদেরই হবে? আমি না শুধু নিজের শক্তির উপর, না দ্রোণ, কৃপ, বাহ্লীক ও অন্যান্য বহু নৃপতির পরাক্রমের উপর নির্ভর করে এই সংঘর্ষ শুরু করছি।

Verse 56

पाण्डवान्‌ समरे पञ्च हनिष्याम: शितै: शरै: । मैं, विकर्तनपुत्र कर्ण तथा मेरा भाई दुःशासन--हम तीन ही मिलकर युद्धभूमिमें पाँचों पाण्डवोंको तीक्ष्ण बाणोंसे मार डालेंगे

সমরে আমরা তীক্ষ্ণ শর দ্বারা পাঁচ পাণ্ডবকে বধ করব। আমি, বিকর্তনপুত্র কর্ণ এবং আমার ভ্রাতা দুঃশাসন—আমরা তিনজন মিলেই রণভূমিতে পাঁচ পাণ্ডবকে নিধন করব।

Verse 63

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि विदुरवाक्ये त्रिषष्टितमो5ध्याय: ।। ६३ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें विदुरवाक्यसम्बन्धी तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত যানসন্ধিপর্বে ‘বিদুরবাক্য’ নামক তেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 66

ब्राह्मणांस्तर्पयिष्यामि गोभिरश्रैर्धनेन च । राजन! तदनन्तर पर्याप्त दक्षिणावाले विविध महायज्ञोंका अनुष्ठान करके गायें, घोड़े और धन दानमें देकर ब्राह्मणोंको तृप्त करूँगा

রাজন! গাভী, অশ্ব ও ধন দান করে আমি ব্রাহ্মণদের তৃপ্ত করব। তারপর পর্যাপ্ত দক্ষিণাসহ নানা মহাযজ্ঞ সম্পাদন করে, গাভী-অশ্ব ও ধন বিতরণ করে ব্রাহ্মণদের সম্পূর্ণ সন্তুষ্ট করব।

Frequently Asked Questions

The pressure point is whether a ruler should pursue exclusive sovereignty through escalation despite uncertain outcomes, or prioritize kin-preserving settlement and prudent governance when counsel indicates high strategic and moral risk.

The instruction is that internal quarrel converts strength into vulnerability (the birds), and that fixation on reward can obscure lethal constraints (the honey on the cliff), urging disciplined judgment, unity, and restraint.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-function is instructional nīti—positioning ethical-political discernment as the practical prerequisite for stability and as a narrative rationale for subsequent events.