Adhyaya 42
Udyoga ParvaAdhyaya 4263 Verses

Adhyaya 42

Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Pramāda as Mṛtyu (Chapter 42)

Upa-parva: Sanatsujātīya Parva

Vaiśaṃpāyana reports that Dhṛtarāṣṭra, having respected Vidura’s statement, questions Sanatsujāta on the claim that “death does not exist.” Sanatsujāta reconciles the apparent contradiction by distinguishing conventional death from the deeper cause: “pramāda” (negligence/carelessness) and “moha” (delusion) function as death in lived experience, while sustained vigilance (apramāda) is likened to immortality. He describes death not as a visible predator but as an internalized pattern expressed through anger, desire, and delusion, which repeatedly precipitate downfall. The chapter then turns to dharma–adharma causality: both yield results, yet dharma is stronger and can dispel adharma when enacted by the discerning. In its latter portion, the discourse sketches normative brāhmaṇa ideals—restraint, non-exploitative livelihood, equanimity regarding honor, and Vedic knowledge as true wealth—while warning that obsession with status (māna) and its social economy obstructs higher prosperity (brāhmī śrī). The closing verse lists “doors” or prerequisites—truth, straightforwardness, modesty, self-control, purity, and learning—as antidotes to pride and delusion.

Chapter Arc: राजसभा के भीतर युद्ध की आहट के बीच धृतराष्ट्र का प्रश्न उठता है—जिसके पास वेद-ज्ञान है, फिर भी पाप-लेप क्यों लगता है, और ‘मौन’ व ‘तप’ का वास्तविक स्वरूप क्या है? → सनत्सुजात धृतराष्ट्र को बाह्य आडंबर से हटाकर अंतर्मुखी साधना की ओर ले जाते हैं—मौन को वाणी-निरोध नहीं, बल्कि उस स्थिति के रूप में बताते हैं जहाँ मन-प्रवेश न कर सके और वेद-शब्द ब्रह्ममय होकर प्रकाशित हो। साथ ही वे क्रोध, काम, लोभ, मोह आदि बारह मानवीय दोषों को त्याज्य ठहराकर आत्मसंयम (दम), अप्रमाद और तप की कसौटी रखते हैं। → धर्म-ज्ञान और वेद-पाठ के बावजूद पाप-लेप के प्रश्न पर निर्णायक उत्तर उभरता है—सत्य से च्युत होने पर संकल्प विकृत होता है, और कर्म (यज्ञ/धर्म) भी सत्य-आधार के बिना गिरने लगता है; इसलिए शुद्ध तप वही है जो निष्कल्मष हो और अंतःकरण को सत्य-ब्रह्म में स्थिर करे। → सनत्सुजात साधक-मार्ग स्पष्ट करते हैं—इंद्रियों की चेष्टा से विरत होकर, मन से भी न चेष्टते हुए, तृष्णींभूत उपासना द्वारा अंतरात्मा में प्रसिद्ध ब्रह्म की ओर लौटना; सत्य में स्थित ब्राह्मण/योगी ‘सर्वदर्शी’ और ‘सर्वविद्’ होता है, और क्षत्रिय भी धर्म में स्थित रहकर ब्रह्म-दर्शन कर सकता है। → धृतराष्ट्र के भीतर यह बोध उभरता है कि दोषों का त्याग और सत्य-आश्रय ही वास्तविक रक्षा है—पर क्या वह अपने पुत्र-मोह और राजधर्म के द्वंद्व में इस उपदेश को आचरण में उतार पाएगा?

Shlokas

Verse 1

अफ्--#क+ त्रिचत्वारिशो<्ध्याय: ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, 8 अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण ध्तराष्ट्र वाच कस्यैष मौन: कतरन्नु मौनं प्रब्रूहि विद्वत्निठ मौनभावम्‌ । मौनेन विद्वानुत याति मौनं कथं मुने मौनमिहाचरन्ति,धृतराष्ट्र बोले--विद्वन्‌! यह मौन किसका नाम है? [वाणीका संयम और परमात्माका स्वरूप] इन दोनोंमेंसे कौन-सा मौन है? यहाँ मौनभावका वर्णन कीजिये। क्या विद्वान्‌ पुरुष मौनके द्वारा मौनरूप परमात्माको प्राप्त होता है? मुने! संसारमें लोग मौनका आचरण किस प्रकार करते हैं?

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে বিদ্বান! এই ‘মৌন’ কাকে বলে? আর প্রকৃত মৌনই বা কোনটি? এখানে মৌনভাব ব্যাখ্যা করুন। মৌনের দ্বারা কি জ্ঞানী ‘মৌনরূপ’ পরমকে লাভ করে? হে মুনি! এই জগতে লোকেরা কীভাবে মৌন আচরণ করে?

Verse 2

सनत्युजात उवाच यतो न वेदा मनसा सहैन- मनुप्रविशन्ति ततो5थमौनम्‌ । यत्रोत्थितो वेदशब्दस्तथायं स तन्मयत्वेन विभाति राजन,सनत्सुजातने कहा--राजन्‌! जहाँ मनके सहित वाणीरूप वेद नहीं पहुँच पाते, उस परमात्माका ही नाम मौन है; इसलिये वही मौनस्वरूप है। वैदिक तथा लौकिक शब्दोंका जहाँसे प्रादुर्भाव हुआ है, वे परमेश्वर तन्‍्मयतापूर्वक ध्यान करनेसे प्रकाशमें आते हैं

সনৎসুজাত বললেন—হে রাজন! যেখানে মনসহ বেদবাণীও তাঁকে প্রবেশ করে ধরতে পারে না, তাকেই ‘মৌন’ বলা হয়। যাঁহা থেকে বেদের শব্দের উদ্ভব, সেই পরমেশ্বরই তন্ময় ধ্যানে নিমগ্ন সাধকের কাছে প্রকাশিত হন।

Verse 3

धृतराष्ट उवाच ऋचो यजूषि यो वेद सामवेदं च वेद यः । पापानि कुर्वन्‌ पापेन लिप्यते कि न लिप्यते,धृतराष्ट्र बोले--विद्वन्‌! जो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदको जानता है तथा पाप करता है, वह उस पापसे लिप्त होता है या नहीं?

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে বিদ্বান! যে ঋগ্বেদ, যজুর্বেদ ও সামবেদ জানে, তবু পাপ কর্ম করে—সে কি সেই পাপে লিপ্ত হয়, না লিপ্ত হয় না?

Verse 4

सनत्युजात उवाच नैनं सामान्यूचो वापि न यजूंष्यविचक्षणम्‌ । त्रायन्ते कर्मण: पापाजन्न ते मिथ्या ब्रवीम्यहम्‌,सनत्सुजातने कहा--राजन्‌! मैं तुमसे असत्य नहीं कहता; ऋक्‌ू, साम अथवा यजुर्वेद कोई भी पाप करनेवाले अज्ञानीकी उसके पापकर्मसे रक्षा नहीं करते

সনৎসুজাত বললেন—হে রাজন! আমি তোমাকে মিথ্যা বলছি না। যে বিবেকহীন, তাকে তার কর্মজাত পাপ থেকে না সামগান রক্ষা করে, না ঋক্‌মন্ত্র, না যজুর্মন্ত্র।

Verse 5

नच्छन्दांसि वृजिनात्‌ तारयन्ति मायाविनं मायया वर्तमानम्‌ | नीडं शकुन्ता इव जातपक्षा- श्छन्दांस्येनं प्रजहत्यन्तकाले,जो कपटपूर्वक धर्मका आचरण करता है, उस मिथ्याचारीका वेद पापोंसे उद्धार नहीं करते। जैसे पंख निकल आनेपर पक्षी अपना घोंसला छोड़ देते हैं, उसी प्रकार अन्तकालमें वेद भी उसका परित्याग कर देते हैं

ছন্দসমূহ (বৈদিক মন্ত্র) প্রতারণায় জীবনযাপনকারী মায়াবীকে পাপ থেকে উদ্ধার করে না। যেমন ডানা গজালে পাখি বাসা ত্যাগ করে, তেমনি অন্তিম কালে বেদও সেই ভণ্ডকে পরিত্যাগ করে।

Verse 6

ध्तराष्ट्र रवाच न चेद्‌ वेदा विना धर्म त्रातुं शक्ता विचक्षण । अथ कस्मात्‌ प्रलापो<यं ब्राह्मणानां सनातन:,धृतराष्ट्र बोले--विद्वन्‌! यदि धर्मके बिना वेद रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हैं, तो वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके पवित्र होनेका प्रलाप- चिरकालसे क्‍यों चला आता है?

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে বিচক্ষণ! যদি ধর্ম ছাড়া বেদ রক্ষা করতে সক্ষম না হয়, তবে ব্রাহ্মণদের পবিত্রতার এই চিরন্তন প্রবাদ কেন চলে আসছে?

Verse 7

सनत्सुजात उवाच तस्यैव नामादिविशेषरूपै- रिदं जगद्‌ भाति महानुभाव | निर्दिश्य सम्यक्‌ प्रवदन्ति वेदा- स्तद्‌ विश्ववैरूप्यमुदाहरन्ति,सनत्सुजातने कहा--महानुभाव! परब्रह्म परमात्माके ही नाम आदि विशेष रूपोंसे इस जगत्‌की प्रतीति होती है। यह बात वेद अच्छी तरह निर्देश करके कहते हैं, किंतु वास्तवमें उसका स्वरूप इस विश्वसे विलक्षण बताया जाता है

সনৎসুজাত বললেন—মহানুভাব! সেই পরব্রহ্ম পরমাত্মারই নামাদি বিশেষ রূপের দ্বারা এই জগৎ প্রকাশিত হয়। বেদসমূহ এ কথা স্পষ্টভাবে নির্দেশ করে বলেন; কিন্তু সত্যতই তাঁর স্বরূপ এই বহুরূপ বিশ্ব থেকে সম্পূর্ণ ভিন্ন ও অতীত বলে ঘোষণা করেন।

Verse 8

तदर्थमुक्ते तप एतदिज्या ताभ्यामसौ पुण्यमुपैति विद्वान । पुण्येन पापं विनिहत्य पश्चात्‌ संजायते ज्ञानविदीपितात्मा,उसीकी प्राप्तिके लिये वेदमें तप और यज्ञोंका प्रतिपादन किया गया है। इन तप और यज्ञोंके द्वारा उस श्रोत्रिय विद्वान्‌ पुरुषको पुण्यकी प्राप्ति होती है। फिर उस निष्काम कर्मरूप पुण्यसे पापको नष्ट कर देनेके पश्चात्‌ उसका अन्तःकरण ज्ञानसे प्रकाशित हो जाता है

সেই পরম লক্ষ্য লাভের জন্যই বেদে তপস্যা ও যজ্ঞের বিধান আছে। এই দুইয়ের দ্বারা শ্রোত্রিয় বিদ্বান পুরুষ পুণ্য অর্জন করেন। পরে সেই নিষ্কাম কর্মরূপ পুণ্য দ্বারা পাপ বিনাশ হয়; পাপ দূর হলে তাঁর অন্তঃকরণ জ্ঞানে দীপ্ত হয়ে ওঠে।

Verse 9

ज्ञानेन चात्मानमुपैति विद्वा- नथान्यथा वर्गफलानुकाडक्षी | अस्मिन्‌ कृतं तत्‌ परिगृहा सर्व- ममुत्र भुड़क्त्वा पुनरेति मार्गम्‌,तब वह दिद्दान्‌ पुरुष ज्ञानसे परमात्माको प्राप्त होता; किंतु इसके विपरीत जो भोगाभिलाषी पुरुष धर्म, अर्थ, और कामरूप त्रिवर्गफलकी इच्छा रखते हैं, वे इस लोकमें किये हुए सभी कर्मोंको साथ ले जाकर उन्हें परलोकमें भोगते हैं तथा भोग समाप्त होनेपर पुनः इस संसारमार्गमें लौट आते हैं

সত্য জ্ঞানের দ্বারাই বিদ্বান পুরুষ আত্মাকে লাভ করেন। কিন্তু যে ব্যক্তি ধর্ম-অর্থ-কাম—এই ত্রিবর্গের ফল কামনা করে, সে এ লোকের কৃত সমস্ত কর্ম সঙ্গে নিয়ে পরলোকে তার ফল ভোগ করে; ভোগ শেষ হলে আবার সংসারপথে ফিরে আসে।

Verse 10

अस्मिल्लोके तपस्तप्तं फलमन्यत्र भुज्यते । ब्राह्मणानामिमे लोका ऋद्धे तपसि तिष्ठताम्‌

এই লোকের তপস্যার ফল অন্যত্র ভোগ করা হয়। যাঁরা সমৃদ্ধ তপসে অটল ব্রাহ্মণ, এই লোকসমূহ তাঁদেরই।

Verse 11

इस लोकमें जो तपस्या (सकामभावसे) की जाती है, उसका फल परलोकमें भोगा जाता है; परंतु जो ब्रह्मोपासक इस लोकमें निष्कामभावसे गुरुतर तपस्या करते हैं, वे इसी लोकमें तत्त्वज्ञानरूप फल प्राप्त करते हैं (और मुक्त हो जाते हैं)। इस प्रकार एक ही तपस्या ऋद्ध और समृद्धके भेदसे दो प्रकारकी है ।। धृतराष्ट उवाच कथं समृद्धमसमृद्धं तपो भवति केवलम्‌ | सनत्सुजात तद्‌ ब्रूहि यथा विद्याम तद्‌ वयम्‌,धृतराष्ट्रने पूछा--सनत्सुजातजी! विशुद्ध भावयुक्त केवल तप ऐसा प्रभावशाली बढ़ा- चढ़ा कैसे हो जाता है? यह इस प्रकार कहिये, जिससे हम उसे समझ लें

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে সনৎসুজাত! এক ও অভিন্ন তপস্যা কীভাবে কোথাও ‘সমৃদ্ধ’ আর কোথাও ‘অসমৃদ্ধ’ হয়? এমনভাবে বলুন, যাতে আমরা তা যথার্থভাবে বুঝতে পারি।

Verse 12

सनत्युजात उवाच निष्कल्मषं तपस्त्वेतत्‌ केवलं परिचक्षते । एतत्‌ समृद्धमप्यूद्धं तपो भवति केवलम्‌,सनत्सुजातने कहा--राजन्‌! यह तप सब प्रकारसे निर्दोष होता है। इसमें भोगवासनारूप दोष नहीं रहता। इसलिये यह विशुद्ध कहा जाता है और इसीलिये यह विशुद्ध तप सकाम तपकी अपेक्षा फलकी दृष्टिसे भी बहुत बढ़ा-चढ़ा होता है

সনৎসুজাত বললেন—হে রাজন! এই তপস্যাকে সম্পূর্ণ নিষ্কলুষ বলা হয়—কামনা ও স্বার্থপরতার কলুষ থেকে মুক্ত। এই শুদ্ধতার কারণেই এই ‘শুদ্ধ তপ’ কাম্য উদ্দেশ্যে করা তপস্যার তুলনায় ফলেও অধিক শ্রেষ্ঠ ও মহিমান্বিত।

Verse 13

तपोमूलमिदं सर्व यन्मां पृच्छसि क्षत्रिय । तपसा वेददविद्वांस: परं त्वमृतमाप्तुयु:,राजन्‌! तुम जिस (तपस्या)-के विषयमें मुझसे पूछ रहे हो, यह तपस्या ही सारे जगतका मूल है; वेदवेत्ता विद्वान इस (निष्काम) तपसे ही परम अमृत मोक्षको प्राप्त होते हैं

সনৎসুজাত বললেন—হে ক্ষত্রিয়! তুমি যে বিষয়ে আমাকে জিজ্ঞাসা করছ, তার মূলই তপস্যা; সত্যই, এই সমস্তই তপের উপর প্রতিষ্ঠিত। এই তপস্যার দ্বারাই বেদজ্ঞ ঋষিগণ পরম ‘অমৃত’ অবস্থা—সর্বোচ্চ মুক্তি—লাভ করেন।

Verse 14

ध्तराष्ट्र वाच कल्मषं तपसो ब्रूहि श्रुतं निष्कल्मषं तप: । सनत्सुजात येनेदं विद्यां गुह्ूं सनातनम्‌,धृतराष्ट्र बोले--सनत्सुजातजी! मैंने दोषरहित तपस्याका महत्त्व सुना। अब तपस्याके जो दोष हैं, उन्हें बताइये, जिससे मैं इस सनातन गोपनीय ब्रह्मतत्त्वको जान सकूँ

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে সনৎসুজাত! আমি নিষ্কলুষ তপস্যার মাহাত্ম্য শুনেছি। এখন তপস্যার যে কলুষতা/দোষ আছে তা বলুন, যাতে আমি এই সনাতন, গূঢ় বিদ্যাকে জানতে পারি।

Verse 15

सनत्युजात उवाच क्रोधादयो द्वादश यस्य दोषा- स्तथा नृशांसानि दशत्रि राजन्‌ | धर्मादयो द्वादशैते पितृणां शास्त्रे गुणा ये विदिता द्विजानाम्‌,सनत्सुजातने कहा--राजन्‌! तपस्याके क्रोध आदि बारह दोष हैं तथा तेरह प्रकारके नृशंस मनुष्य होते हैं। मन्वादिशास्त्रोंमें कथित ब्राह्मणोंके धर्म आदि बारह गुण प्रसिद्ध हैं

সনৎসুজাত বললেন—হে রাজন! তপস্যার ক্রোধ প্রভৃতি বারোটি দোষ আছে; আর মানুষের মধ্যে নৃশংসতার তেরোটি রূপও দেখা যায়। পিতৃপরম্পরার শাস্ত্রে দ্বিজদের ধর্ম প্রভৃতি বারোটি গুণ সুপরিচিত ও বিদিত।

Verse 16

क्रोध: कामो लोभमोहौ विधित्सा कृपासूये मानशोकौ स्पृहा च | ईर्ष्या जुगुप्सा च मनुष्यदोषा वर्ज्या: सदा द्वादशैते नराणाम्‌,काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिकीर्षा, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निन्दा-मनुष्योंमें रहनेवाले ये बारह दोष मनुष्योंके लिये सदा ही त्याग देनेयोग्य हैं

ক্রোধ, কাম, লোভ, মোহ, বিধিৎসা (অন্যকে বশে আনা/ক্ষতি করার প্রবৃত্তি), করুণাহীনতা, অসূয়া, অহংকার, শোক, স্পৃহা, ঈর্ষা এবং জুগুপ্সা (ঘৃণা/নিন্দা)—এগুলি মানুষের বারোটি দোষ; এগুলি সর্বদা পরিত্যাজ্য।

Verse 17

एकैक: पर्युपास्ते ह मनुष्यान्‌ मनुजर्षभ । लिप्समानोड्तरं तेषां मृगाणामिव लुब्धक:,नरश्रेष्ठ! जैसे व्याध मृगोंको मारनेका छिद्र (अवसर) देखता हुआ उनकी टोहमें लगा रहता है, उसी प्रकार इनमेंसे एक-एक दोष मनुष्योंका छिद्र देखकर उनपर आक्रमण करता है

সনৎসুজাত বললেন—হে নরশ্রেষ্ঠ! এই দোষগুলির প্রত্যেকটি মানুষের উপর ওত পেতে থাকে। যেমন ব্যাধ হরিণের ফাঁক (অবসর) খুঁজে আঘাত হানে, তেমনি মানুষের দুর্বল স্থান দেখে সুযোগ পেলেই প্রত্যেক দোষ আক্রমণ করে।

Verse 18

विकत्थन: स्पृहयालुर्मनस्वी बिभ्रत्‌ कोपं चपलो<रक्षणश्न | एतान्‌ पापा: षण्नरा: पापधर्मान्‌ प्रकुर्वते नो त्रसनन्‍्त: सुदुर्गे

সনৎসুজাত বললেন—যারা আত্মশ্লাঘায় মত্ত, লালসাগ্রস্ত, স্বেচ্ছাচারী; ক্রোধে ত্বরিত, চঞ্চল এবং সংযমহীন—এমন ছয় প্রকার পাপী মানুষ ভয়ংকর সংকটে পড়েও ভীত না হয়ে পাপকর্মে প্রবৃত্ত হয়।

Verse 19

अपनी बहुत बड़ाई करनेवाले, लोलुप, तनिक-से भी अपमानको सहन न करनेवाले, निरन्तर क्रोधी, चंचल और अश्रितोंकी रक्षा नहीं करनेवाले--ये छः प्रकारके मनुष्य पापी हैं। महान्‌ संकटमें पड़नेपर भी ये निडर होकर इन पापकर्मोंका आचरण करते हैं ।। सम्भोगसंविद्‌ विषमो5तिमानी दत्तानुतापी कृपणो बलीयान्‌ । वर्गप्रशंसी वनितासु द्वेष्टा एते परे सप्त नृशंसवर्गा:

সনৎসুজাত বললেন—ভোগ-সঙ্গমের কৌশলে চতুর, আচরণে পক্ষপাতী ও অন্যায়, অতিমাত্রায় অহংকারী, দান করে পরে অনুতপ্ত, কৃপণ, বলের দম্ভে নির্ভরশীল, নিজের দলকেই প্রশংসা করে, এবং নারীদের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করে—এরা সাত প্রকার নির্মম ও পাপী শ্রেণীর মানুষ।

Verse 20

सम्भोगमें ही मन लगानेवाले, विषमता रखनेवाले, अत्यन्त मानी, दान देकर पश्चात्ताप करनेवाले, अत्यन्त कृपण, अर्थ और कामकी प्रशंसा करनेवाले तथा स्त्रियोंके द्वेषी--ये सात और पहलेके छ: कुल तेरह प्रकारके मनुष्य नृशंसवर्ग (क्रूर-समुदाय) कहे गये हैं ।। धर्मश्न सत्यं च दमस्तपश्च अमारत्सरय द्वीस्तितिक्षानसूया । यज्ञश्न दानं च धृति: श्रुतं च व्रतानि वै द्वादश ब्राह्मणस्य,धर्म, सत्य, इन्द्रियनिग्रह, तप, मत्सरताका अभाव, लज्जा, सहनशीलता, किसीके दोष न देखना, यज्ञ करना, दान देना, धैर्य और शास्त्रज्ञान--ये ब्राह्मण-के बारह व्रत हैं

সনৎসুজাত বললেন—ধর্ম, সত্য, ইন্দ্রিয়সংযম, তপস্যা, অমৎসরতা, লজ্জা, সহিষ্ণুতা, দোষ-অন্বেষণ না করা, যজ্ঞ, দান, ধৈর্য এবং শ্রুতি/শাস্ত্রজ্ঞান—এগুলোই ব্রাহ্মণের দ্বাদশ ব্রত।

Verse 21

यस्त्वेते भ्य: प्रभवेद्‌ द्वादशभ्य: सर्वामपीमां पृथिवीं स शिष्यात्‌ । त्रिभिद्वाभ्यामेकतो वार्थितो य- स्तस्य स्वमस्तीति स वेदितव्य:,जो इन बारह व्रतों (गुणों)-पर अपना प्रभुत्व रखता है, वह इस सम्पूर्ण पृथ्वीके मनुष्योंको अपने अधीन कर सकता है। इनमेंसे तीन, दो या एक गुणसे भी जो युक्त है, उसके पास सभी प्रकारका धन है, ऐसा समझना चाहिये

সনৎসুজাত বললেন—যে এই দ্বাদশ ব্রতের উপর কর্তৃত্ব লাভ করে, সে সমগ্র পৃথিবীকেই শাসনে আনতে পারে। আর এদের মধ্যে তিনটি, দুটি কিংবা একটি গুণও যার আছে—পরামর্শ চাইতে গেলে—তাকে নিজের সত্য সম্পদে সমৃদ্ধ বলে জানতে হবে।

Verse 22

दमस्त्यागो<प्रमादश्न एतेष्वमृतमाहितम्‌ | तानि सत्यमुखान्याहुर्ब्राह्मणा ये मनीषिण:

সনৎসুজাত বললেন—দম, ত্যাগ এবং অপরমাদ—এই তিনের মধ্যেই অমৃত প্রতিষ্ঠিত। জ্ঞানী ব্রাহ্মণেরা বলেন, এগুলিই সত্যের প্রধান দ্বার।

Verse 23

दम, त्याग और अप्रमाद--इन तीन गुणोंमें अमृत-का वास है। जो मनीषी (बुद्धिमान) ब्राह्मण हैं, वे कहते हैं कि इन गुणोंका मुख सत्यस्वरूप परमात्माकी ओर है (अर्थात्‌ ये परमात्माकी प्राप्तिके साधन हैं) ।। दमो हराष्टादशगुण: प्रतिकूलं कृताकृते । अनृतं॑ चाभ्यसूया च कामार्थो च तथा स्पृहा

সনৎসুজাত শিক্ষা দেন—দম, ত্যাগ ও অপরমাদ—এই তিনেই অমৃতের নিবাস। মনীষী ব্রাহ্মণেরা বলেন, এই গুণগুলি সত্যস্বরূপ পরমাত্মার দিকেই মুখ করে আছে—অর্থাৎ সত্য উপলব্ধির সরাসরি উপায়। তিনি আরও বলেন, দম অষ্টাদশগুণসমষ্টি; তা কর্তব্য-অকর্তব্যে বিপরীত আচরণের বিরোধী এবং মিথ্যা, দোষদৃষ্টি, কাম-অর্থলোভ ও স্পৃহাকে প্রতিহত করে।

Verse 24

क्रोध: शोकस्तथा तृष्णा लोभ: पैशुन्यमेव च । मत्सरश्न विहिंसा च परितापस्तथारति:

সনৎসুজাত বললেন—ক্রোধ, শোক, তৃষ্ণা, লোভ ও পৈশুন্য; মাত্সর এবং হিংসার প্রবৃত্তি; অন্তর্দাহ ও অরতি—এগুলোই সেই ক্লেশ, যা মনকে অশান্ত করে সৎ আচরণ থেকে দূরে ঠেলে দেয়।

Verse 25

अपस्मारश्नातिवादस्तथा सम्भावना55त्मनि । एतैविंमुक्तो दोषैर्य: स दान्त: सद्धिरुच्यते

সনৎসুজাত বলেন—অপস্মার (চিত্তবিভ্রান্তি/বিস্মৃতি), অতিবাদ (অতিরিক্ত বিতর্কপ্রবণ বাক্য) এবং আত্মসম্ভাবনা (আত্মগর্ব)—এই দোষগুলি থেকে যে মুক্ত, তাকেই সজ্জনেরা ‘দন্ত’—সংযমী—বলে মানেন।

Verse 26

दम अठारह गुणोंवाला है। (निम्नांकित अठारह दोषोंके त्यागको ही अठारह गुण समझना चाहिये)--कर्तव्य-अकर्तव्यके विषयमें विपरीत धारणा, असत्य-भाषण, गुणोंमें दोषदृष्टि, सत्रीविषयक कामना, सदा धनोपार्जनमें ही लगे रहना, भोगेच्छा, क्रोध, शोक, तृष्णा, लोभ, चुगली करनेकी आदत, डाह, हिंसा, संताप, शास्त्रमें अरति, कर्तव्यकी विस्मृति, अधिक बकवाद और अपनेको बड़ा समझना--इन दोषोंसे जो मुक्त है, उसीको सत्पुरुष दाना (जितेन्द्रिय) कहते हैं ।। मदोडष्टादशदोष: स्यात्‌ त्यागो भवति षड्विध: । विपर्यया: स्मृता एते मददोषा उदाहृता:,मदमें अठारह दोष हैं; ऊपर जो दमके विपर्यय सूचित किये गये हैं, वे ही मदके दोष बताये गये हैं। त्याग छः: प्रकारका होता है, वह छहों प्रकारका त्याग अत्यन्त उत्तम है; किंतु इनमें तीसरा अर्थात्‌ कामत्याग बहुत ही कठिन है, इसके द्वारा मनुष्य त्रिविध दुःखोंको निश्चय ही पार कर जाता है। कामका त्याग कर देनेपर सब कुछ जीत लिया जाता है

সনৎসুজাত বললেন—দম অষ্টাদশ গুণের সমষ্টি; অর্থাৎ অষ্টাদশ দোষ ত্যাগ করলেই দম সিদ্ধ হয়: কর্তব্য-অকর্তব্যে বিপরীত বুদ্ধি, মিথ্যাভাষণ, গুণে দোষদৃষ্টি, নারী-বিষয়ক কামনা, ধনসঞ্চয়ে আসক্তি, ভোগেচ্ছা, ক্রোধ, শোক, তৃষ্ণা, লোভ, পৈশুন্য, মাত্সর, হিংসা, অন্তর্দাহ/সন্তাপ, শাস্ত্রে অরতি, কর্তব্যবিস্মৃতি, অতিবাদ এবং আত্মসম্ভাবনা (অহংকার)। যে এ দোষগুলি থেকে মুক্ত, সজ্জনেরা তাকেই ‘দন্ত’—সংযমী—বলে মানেন। ‘মদ’ (অহংজনিত গর্ব)-এরও অষ্টাদশ দোষ আছে—এগুলোই দমের বিপরীত রূপ। ত্যাগ ছয় প্রকার; সবই শ্রেষ্ঠ, কিন্তু তৃতীয়—কামত্যাগ—অত্যন্ত দুরূহ। এর দ্বারা মানুষ ত্রিবিধ দুঃখ অতিক্রম করে; কাম ত্যাগ হলে যেন সবই জয় করা হয়।

Verse 27

श्रेयांस्तु षड्विधस्त्यागस्तृतीयो दुष्करो भवेत्‌ । तेन दुःखं तरत्येव भिन्न॑ तस्मिन्‌ जितं कृते,मदमें अठारह दोष हैं; ऊपर जो दमके विपर्यय सूचित किये गये हैं, वे ही मदके दोष बताये गये हैं। त्याग छः: प्रकारका होता है, वह छहों प्रकारका त्याग अत्यन्त उत्तम है; किंतु इनमें तीसरा अर्थात्‌ कामत्याग बहुत ही कठिन है, इसके द्वारा मनुष्य त्रिविध दुःखोंको निश्चय ही पार कर जाता है। कामका त्याग कर देनेपर सब कुछ जीत लिया जाता है

সনৎসুজাত বললেন— ত্যাগ ছয় প্রকার, এবং তা পরম উৎকৃষ্ট সাধনা। কিন্তু তৃতীয় ত্যাগটি সাধন করা অত্যন্ত কঠিন। সেই ত্যাগের দ্বারা মানুষ নিশ্চিতই দুঃখ অতিক্রম করে; আর তা দৃঢ় হলে যেন সবই জয় করা হয়।

Verse 28

श्रेयांस्तु षड्विधस्त्याग: श्रियं प्राप्प न हृष्यति । इष्टापूर्ते द्वितीयं स्यान्नित्यवैराग्ययोगत:,राजेन्द्र! छ: प्रकारका जो सर्वश्रेष्ठ त्याग है, उसे बताते हैं। लक्ष्मीको पाकर हर्षित न होना--यह प्रथम त्याग है; यज्ञ-होमादिमें तथा कुएँ, तालाब और बगीचे आदि बनानेमें धन खर्च करना दूसरा त्याग है और सदा वैराग्यसे युक्त रहकर कामका त्याग करना-यह तीसरा त्याग कहा गया है। महर्षिलोग इसे अनिर्वचनीय मोक्षका उपाय कहते हैं। अतः यह तीसरा त्याग विशेष गुण माना गया है

সনৎসুজাত বললেন— শ্রেষ্ঠ ত্যাগ ছয় প্রকার। লক্ষ্মী লাভ করেও উল্লসিত না হওয়া—এ প্রথম। যজ্ঞ-হোমাদি ও কূপ, পুকুর, উদ্যান প্রভৃতি লোককল্যাণকর্মে ধন নিবেদন করা—এ দ্বিতীয়। আর নিত্য বৈরাগ্যে প্রতিষ্ঠিত হয়ে কাম-ত্যাগ করা—এ তৃতীয়, পরম ত্যাগ; ঋষিগণ একে অবর্ণনীয় মোক্ষের উপায় বলেন।

Verse 29

कामत्यागश्न राजेन्द्र स तृतीय इति स्मृत: । अप्यवाच्यं वदन्त्येतं स तृतीयो गुण: स्मृत:,राजेन्द्र! छ: प्रकारका जो सर्वश्रेष्ठ त्याग है, उसे बताते हैं। लक्ष्मीको पाकर हर्षित न होना--यह प्रथम त्याग है; यज्ञ-होमादिमें तथा कुएँ, तालाब और बगीचे आदि बनानेमें धन खर्च करना दूसरा त्याग है और सदा वैराग्यसे युक्त रहकर कामका त्याग करना-यह तीसरा त्याग कहा गया है। महर्षिलोग इसे अनिर्वचनीय मोक्षका उपाय कहते हैं। अतः यह तीसरा त्याग विशेष गुण माना गया है

সনৎসুজাত বললেন— হে রাজেন্দ্র, কাম-ত্যাগই তৃতীয় (শ্রেষ্ঠ) ত্যাগ বলে স্মৃত। জ্ঞানীরা একে ‘অবর্ণনীয়’—মোক্ষের উপায়—বলে থাকেন; তাই এই তৃতীয় ত্যাগকে বিশেষ গুণ গণ্য করা হয়।

Verse 30

त्यक्तेद्रव्यैर्यद्‌ भवति नोपयुक्तैश्न कामतः । न च द्रव्यैस्तद्‌ भवति नोपयुक्तैश्न कामत:,(वैराग्यपूर्वक) पदार्थोंके त्यागसे जो निष्कामता आती है, वह स्वेच्छापूर्वक उनका उपभोग करनेसे नहीं आती। अधिक धन-सम्पत्तिके संग्रहसे निष्कामता नहीं सिद्ध होती तथा कामनापूर्तिके लिये उसका उपभोग करनेसे भी कामका त्याग नहीं होता

সনৎসুজাত বললেন— বৈরাগ্যসহকারে বস্তু ত্যাগ করলে যে নিষ্কামতা জন্মায়, তা ইচ্ছামতো ভোগে জন্মায় না। কেবল ধন-সঞ্চয়ে নিষ্কামতা সিদ্ধ হয় না; আর কামনা পূরণের জন্য তা ভোগ করাও কাম-ত্যাগ নয়।

Verse 31

न च कर्मस्वसिद्धेषु दुःखं तेन च न ग्लपेत्‌ सर्वरेव गुणैर्युक्तो द्रव्यवानपि यो भवेत्‌,जो पुरुष सब गुणोंसे युक्त और धनवान्‌ हो, यदि उसके किये हुए कर्म सिद्ध न हों तो उनके लिये दुःख एवं ग्लानि न करे

সনৎসুজাত বললেন— যে ব্যক্তি সকল গুণে ভূষিত এবং ধনবানও, তার কর্ম যদি সিদ্ধ না হয়, তবে সে যেন দুঃখ না করে এবং আত্মগ্লানিতে না ডুবে।

Verse 32

अप्रिये च समुत्पन्ने व्यथां जातु न गच्छति । इष्टान्‌ पुत्रांश्व दारांश्ष न याचेत कदाचन,कोई अप्रिय घटना हो जाय तो कभी व्यथाको न प्राप्त हो (यह चौथा त्याग है)। अपने अभीष्ट पदार्थ--स्त्री-पुत्रादिकी कभी याचना न करे (यह पाँचवाँ त्याग है)

অপ্রিয় কিছু ঘটলে কখনও ব্যথিত হবে না। প্রিয় বস্তু—স্ত্রী-পুত্রাদি—কখনও ভিক্ষা করে চাইবে না।

Verse 33

अ्हते याचमानाय प्रदेयं तच्छुभं भवेत्‌ । अप्रमादी भवेदेतै: स चाप्यष्टगुणो भवेत्‌,सुयोग्य याचकके आ जानेपर उसे दान करे (यह छठा त्याग है)। इन सबसे कल्याण होता है। इन त्यागमय गुणोंसे मनुष्य अप्रमादी होता है। उस अप्रमादके भी आठ गुण माने गये हैं--सत्य, ध्यान, अध्यात्मविषयक विचार, समाधान, वैराग्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह

যে অনিষ্ট না করে প্রার্থনা করে, এমন যোগ্য প্রার্থীর প্রতি দান করা উচিত—তা মঙ্গলজনক। এই ত্যাগময় অনুশাসনে মানুষ অপ্রমাদী হয়; আর সেই অপ্রমাদকে অষ্টগুণসম্পন্ন বলা হয়েছে।

Verse 34

सत्यं ध्यानं समाधान चोटद्यं वैराग्यमेव च । अस्तेयं ब्रह्मचर्य च तथा संग्रहमेव च,सुयोग्य याचकके आ जानेपर उसे दान करे (यह छठा त्याग है)। इन सबसे कल्याण होता है। इन त्यागमय गुणोंसे मनुष्य अप्रमादी होता है। उस अप्रमादके भी आठ गुण माने गये हैं--सत्य, ध्यान, अध्यात्मविषयक विचार, समाधान, वैराग्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह

সত্য, ধ্যান, অন্তঃসমাধান, শৌচাদি শৃঙ্খলা, বৈরাগ্য; অচৌর্য, ব্রহ্মচর্য এবং অপরিগ্রহ—এই ত্যাগময় গুণে কল্যাণ হয়। এগুলি সাধলে মানুষ অপ্রমাদী হয়।

Verse 35

एवं दोषा मदस्योक्तास्तान्‌ दोषान्‌ परिवर्जयेत्‌ । तथा त्यागो<प्रमादश्न स चाप्यष्टगुणो मत:

এইভাবে মদের (মত্ততার) দোষগুলি বলা হল; তাই সেই দোষগুলি পরিহার করা উচিত। তদ্রূপ ত্যাগ ও অপ্রমাদ অনুশীলন করা কর্তব্য; এবং সেই অপ্রমাদকে অষ্টগুণসম্পন্ন বলা হয়েছে।

Verse 36

ये आठ गुण त्याग और अप्रमाद दोनोंके ही समझने चाहिये। इसी प्रकार जो मदके अठारह दोष पहले बताये गये हैं, उनका सर्वथा त्याग करना चाहिये। प्रमादके आठ दोष हैं, उन्हें भी त्याग देना चाहिये ।। अष्टौ दोषा: प्रमादस्य तान्‌ दोषान्‌ परिवर्जयेत्‌ । इन्द्रियेभ्यश्ष॒ पडचभ्यो मनसश्वैव भारत । अतीतानागतेभ्यश्व मुक्त्युपेत: सुखी भवेत्‌,भारत! पाँच इन्द्रियाँ और छठा मन--इनकी अपने-अपने विषयोंमें जो भोगबुद्धिसे प्रवृत्ति होती है, छः तो ये ही प्रमादविषयक दोष हैं और भूतकालकी चिन्ता तथा भविष्यकी आशा--दो दोष ये हैं। इन आठ दोषोंसे मुक्त पुरुष सुखी होता है

অপ্রমাদের (অবধানহীনতার) আটটি দোষ আছে; সেই দোষগুলি পরিত্যাগ করা উচিত। হে ভারত! পাঁচ ইন্দ্রিয় ও ষষ্ঠ মন—ভোগবুদ্ধিতে নিজ নিজ বিষয়ে ধাবিত হয়; এ ছয়টি প্রমাদজন্য দোষ। অতীতের চিন্তা ও ভবিষ্যতের আকাঙ্ক্ষা—আরও দুই। এই আট দোষ থেকে মুক্ত ব্যক্তি সুখী হয়।

Verse 37

सत्यात्मा भव राजेन्द्र सत्ये लोका: प्रतिष्ठिता: । तांस्तु सत्यमुखानाहुः सत्ये हमृतमाहितम्‌,राजेन्द्र! तुम सत्यस्वरूप हो जाओ, सत्यमें ही सम्पूर्ण लोक प्रतिष्ठित हैं। वे दम, त्याग और अप्रमाद आदि गुण भी सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले हैं; सत्यमें ही अमृतकी प्रतिष्ठा है

সনৎসুজাত বললেন— রাজেন্দ্র, তুমি সত্যাত্মা হও; সত্যের উপরেই সকল লোক প্রতিষ্ঠিত। তাই শম, ত্যাগ ও অপ্রমাদ প্রভৃতি যে সাধনা সত্যের দিকে নিয়ে যায়, জ্ঞানীরা তাকে ‘সত্যমুখ’ বলেন; কারণ অমৃতও সত্যেই প্রতিষ্ঠিত।

Verse 38

निवृत्तेनैव दोषेण तपोव्रतमिहाचरेत्‌ । एतदू धातृकृतं वृत्तं सत्यमेव सतां व्रतम्‌,दोषोंको निवृत्त करके ही यहाँ तप और व्रतका आचरण करना चाहिये, यह विधाताका बनाया हुआ नियम है। सत्य ही श्रेष्ठ पुरुषोंका व्रत है। मनुष्यको उपर्युक्त दोषोंसे रहित और गुणोंसे युक्त होना चाहिये। ऐसे पुरुषका ही विशुद्ध तप अत्यन्त समृद्ध होता है। राजन! तुमने जो मुझसे पूछा है, वह मैंने संक्षेपसे बता दिया। यह तप जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके कष्टको दूर करनेवाला, पापहारी तथा परम पवित्र है

দোষ থেকে নিবৃত্ত হয়েই এ জগতে তপ ও ব্রত পালন করা উচিত—এ বিধাতা (ধাত্রী)-প্রতিষ্ঠিত নিয়ম। সজ্জনদের ব্রত তো একমাত্র সত্যই।

Verse 39

दोषैरेतैर्वियुक्तस्तु गुणैरेतै: समन्वित: । एतत्‌ समृद्धमत्यर्थ तपो भवति केवलम्‌,दोषोंको निवृत्त करके ही यहाँ तप और व्रतका आचरण करना चाहिये, यह विधाताका बनाया हुआ नियम है। सत्य ही श्रेष्ठ पुरुषोंका व्रत है। मनुष्यको उपर्युक्त दोषोंसे रहित और गुणोंसे युक्त होना चाहिये। ऐसे पुरुषका ही विशुद्ध तप अत्यन्त समृद्ध होता है। राजन! तुमने जो मुझसे पूछा है, वह मैंने संक्षेपसे बता दिया। यह तप जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके कष्टको दूर करनेवाला, पापहारी तथा परम पवित्र है

যে ব্যক্তি এই দোষসমূহ থেকে মুক্ত এবং এই গুণসমূহে সমন্বিত, তার তপস্যাই প্রকৃতপক্ষে অতিশয় সমৃদ্ধ ও ফলপ্রদ হয়।

Verse 40

यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र संक्षेपात्‌ प्रत्रवीमि ते । एतत्‌ पापहरं पुण्यं जन्ममृत्युजरापहम्‌,दोषोंको निवृत्त करके ही यहाँ तप और व्रतका आचरण करना चाहिये, यह विधाताका बनाया हुआ नियम है। सत्य ही श्रेष्ठ पुरुषोंका व्रत है। मनुष्यको उपर्युक्त दोषोंसे रहित और गुणोंसे युक्त होना चाहिये। ऐसे पुरुषका ही विशुद्ध तप अत्यन्त समृद्ध होता है। राजन! तुमने जो मुझसे पूछा है, वह मैंने संक्षेपसे बता दिया। यह तप जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थाके कष्टको दूर करनेवाला, पापहारी तथा परम पवित्र है

রাজেন্দ্র, তুমি যা আমাকে জিজ্ঞাসা করছ, তা আমি সংক্ষেপে বলছি। এই উপদেশ পুণ্যদায়ক, পাপহর এবং জন্ম-মৃত্যু-জরার দুঃখ নাশকারী।

Verse 41

धृतराष्ट उवाच आख्यानपज्चमैवेंदिर्भूयिष्ठं कथ्यते जन: । तथा चान्ये चतुर्वेदास्त्रिवेदाश्व॒ तथा परे,धृतराष्ट्रने कहा--मुने! इतिहास-पुराण जिनमें पाँचवाँ है, उन सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा कुछ लोगोंका विशेषरूपसे नाम लिया जाता है (अर्थात्‌ वे पंचवेदी कहलाते हैं), दूसरे लोग चतुर्वेदी और त्रिवेदी कहे जाते हैं

ধৃতরাষ্ট্র বললেন— মুনে! আখ্যানে (ইতিহাস-পুরাণে) পঞ্চম গণ্য করে বেদের সঙ্গে যাঁদের ‘পঞ্চবেদী’ বলা হয়, এমন লোকের নাম বিশেষভাবে প্রচলিত। তদ্রূপ কেউ ‘চতুর্বেদী’, আর কেউ ‘ত্রিবেদী’ বলেও পরিচিত।

Verse 42

इस प्रकार श्रीमह्या भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्युजातपर्वमें बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,दविवेदाश्नैकवेदाश्वाप्पनचश्व तथा परे | तेषां तु कतरः स स्याद्‌ यमहं वेद वै द्विजम्‌ इसी प्रकार कुछ लोग द्विवेदी, एकवेदी तथा अनूच- कहलाते हैं। इनमेंसे कौन-से ऐसे हैं, जिन्हें मैं निश्चितरूपसे ब्राह्मण समझूँ?

কেউ দ্বিবেদী, কেউ একবেদী, আর কেউ পতিত বা হীন বলে পরিচিত। এদের মধ্যে কাকে আমি সত্যিই ‘দ্বিজ’—প্রকৃত ব্রাহ্মণ—রূপে গ্রহণ করব? হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, তুমি যে মানদণ্ড জান, সেই অনুসারে আমাকে বলো।

Verse 43

सनत्युजात उवाच एकस्य वेदस्याज्ञानाद्‌ वेदास्ते बहवः कृता: । सत्यस्यैकस्य राजेन्द्र सत्ये कश्चिदवस्थित:,सनत्सुजातने कहा--राजन्‌! सृष्टिके आदिमें वेद एक ही थे, परंतु न समझनेके कारण (एक ही वेदके) बहुत-से विभाग कर दिये गये हैं। उस सत्यस्वरूप एक वेदके सारतत्त्व परमात्मामें तो कोई बिरला ही स्थित होता है इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सनत्सुजातपर्वणि सनत्सुजातवाक्ये त्रिचत्वारिंशो ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्ााभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सनत्युजातपर्वमें सनत्युजातवाक्यविषयक तैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

সনৎসুজাত বললেন—হে রাজেন্দ্র! আদিতে বেদ একটিই ছিল; কিন্তু তা যথার্থভাবে না বোঝার ফলে সেই এক বেদই বহু ভাগে বিভক্ত হয়ে বহু বেদ নামে পরিচিত হয়েছে। কিন্তু সেই এক সত্য—পরম সত্যে—কেবল অতি বিরল কেউ দৃঢ়ভাবে প্রতিষ্ঠিত থাকে।

Verse 44

एवं वेदमविज्ञाय प्राज्ञोडहमिति मन्यते । दानमध्ययन यज्ञो लोभादेतत्‌ प्रवर्तते,इस प्रकार वेदके तत्त्वको न जानकर भी कुछ लोग "मैं विद्वान्‌ हूँ" ऐसा मानने लगते हैं; फिर उनकी दान, अध्ययन और यज्ञादि कर्मोमें (सांसारिक सुखकी प्राप्तिरूप फलके) लोभसे प्रवृत्ति होती है

এইভাবে বেদের তত্ত্ব না জেনেও মানুষ নিজেকে ‘আমি জ্ঞানী’ বলে মনে করে। তারপর দান, অধ্যয়ন ও যজ্ঞ প্রভৃতিতে তার প্রবৃত্তি সত্যের সাধনার জন্য নয়, বরং ফললাভের লোভ থেকেই হয়।

Verse 45

सत्यात्‌ प्रच्यवमानानां संकल्पश्च तथा भवेत्‌ | ततो यज्ञ: प्रतायेत सत्यस्यैवावधारणात्‌,वास्तवमें जो सत्यस्वरूप परमात्मासे च्युत हो गये हैं, उन्हींका वैसा संकल्प होता है। फिर सत्यरूप वेदके प्रामाण्यका निश्चय करके ही उनके द्वारा यज्ञोंका विस्तार (अनुष्ठान) किया जाता है

যারা সত্য থেকে বিচ্যুত, তাদের সংকল্পও তেমনই পতিত হয়। তারপর তারা সত্যরূপ বেদের প্রামাণ্য স্থির করে তবেই যজ্ঞের বিস্তার ও অনुष্ঠানে প্রবৃত্ত হয়।

Verse 46

मनसान्यस्य भवति वाचान्यस्याथ कर्मणा । संकल्पसिद्ध: पुरुष: संकल्पानधितिष्ठति,किसीका यज्ञ मनसे, किसीका वाणीसे तथा किसीका क्रियाके द्वारा सम्पादित होता है। सत्यसंकल्प पुरुष संकल्पके अनुसार ही लोकोंको प्राप्त होता है

কারও যজ্ঞ মন দিয়ে সম্পন্ন হয়, কারও বাক্য দিয়ে, আর কারও কর্ম দিয়ে। কিন্তু যার সংকল্প সত্য ও সিদ্ধ, সে নিজের সংকল্পে দৃঢ় থাকে এবং সেই অনুসারেই ফল লাভ করে।

Verse 47

अनैभृत्येन चैतस्य दीक्षितव्रतमाचरेत्‌ । नामैतद्‌ धातुनिर्वत्तं सत्यमेव सतां परम्‌,किंतु जबतक संकल्प सिद्ध न हो, तबतक दीक्षित व्रतका आचरण अर्थात्‌ यज्ञादि कर्म करते रहना चाहिये। यह दीक्षित नाम “दक्षि व्रतादेशे” इस धातुसे बना है। सत्पुरुषोंके सत्यस्वरूप परमात्मा ही सबसे बढ़कर हैं

সনৎসুজাত বলেন—যতক্ষণ না সংকল্প সিদ্ধ হয়, ততক্ষণ দাসভাব-নিরপেক্ষ হয়ে দীক্ষিত-ব্রত পালন করতে হবে; যজ্ঞাদি বিধিবদ্ধ কর্ম অব্যাহত রাখতে হবে। ‘দীক্ষিত’ শব্দটি ধাতু-নির্গত বটে, কিন্তু ব্যুৎপত্তির ঊর্ধ্বে সদ্জনদের কাছে পরম সত্য হল সত্যস্বরূপ পরমাত্মাই।

Verse 48

ज्ञानं वै नाम प्रत्यक्ष परोक्षं जायते तपः । विद्याद्‌ बहु पठन्तं तु द्विजं वै बहुपाठिनम्‌,क्योंकि परमात्माके ज्ञानका फल प्रत्यक्ष है और तपका फल परोक्ष है (इसलिये ज्ञानका ही आश्रय लेना चाहिये)। बहुत पढ़नेवाले ब्राह्मणको केवल बहुपाठी (बहुज्ञ) समझना चाहिये

পরমাত্ম-জ্ঞানের ফল প্রত্যক্ষ, আর তপস্যার ফল পরোক্ষ; অতএব জ্ঞানেরই আশ্রয় গ্রহণ করা উচিত। যে দ্বিজ বহু পাঠ করে, তাকে কেবল ‘বহুপাঠী’ (বহুজ্ঞ) বলেই জানা উচিত।

Verse 49

तस्मात्‌ क्षत्रिय मा मंस्था जल्पितेनैव वै द्विजम्‌ । य एव सत्यान्नापैति स ज्ञेयो ब्राह्मणस्त्वया,इसलिये महाराज! केवल बातें बनानेसे ही किसीको ब्राह्मण न मान लेना। जो सत्यस्वरूप परमात्मासे कभी पृथक्‌ नहीं होता, उसीको तुम ब्राह्मण समझो

অতএব, হে ক্ষত্রিয়! কেবল বাক্‌চাতুর্য বা অধিক কথায় কাউকে ব্রাহ্মণ বলে মনে কোরো না। যে সত্যস্বরূপ পরমাত্মা থেকে কখনও বিচ্যুত হয় না, তাকেই তুমি ব্রাহ্মণ বলে জেনো।

Verse 50

छन्दांसि नाम क्षत्रिय तान्यथर्वा पुरा जगौ महर्षिसड्घ एष: । छन्‍्दोविदस्ते य उत नाधीतवेदा न वेदवेद्यस्य विदुर्हि तत्त्वम्‌,राजन! अथर्वा मुनि एवं महर्षिसमुदायने पूर्व-कालमें जिनका गान किया है, वे ही छन्‍्द (वेद) हैं। किंतु सम्पूर्ण वेद पढ़ लेनेपर भी जो वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमात्माके तत्त्वको नहीं जानते, वे वास्तवमें वेदके विद्वान्‌ नहीं हैं

সনৎসুজাত বললেন—“হে ক্ষত্রিয়! প্রাচীনকালে ঋষি অথর্বা এই মহর্ষিসঙ্ঘের সম্মুখে যে স্তোত্র গেয়েছিলেন, সেগুলিই ‘ছন্দ’—বৈদিক মন্ত্র। কিন্তু যারা বেদ অধ্যয়ন করেও বেদের দ্বারা জ্ঞেয় পরমাত্ম-তত্ত্ব জানে না, তারা প্রকৃতপক্ষে বেদজ্ঞ নয়, হে রাজন।”

Verse 51

छन्दांसि नाम द्विपदां वरिष्ठ स्वच्छन्दयोगेन भवन्ति तत्र । छन्‍्दोविदस्तेन च तानधीत्य गता न वेदस्य न वेद्यमार्या:,नरश्रेष्ठ! छन्‍द (वेद) उस परमात्मामें स्वच्छन्द सम्बन्धसे स्थित (स्वतः:प्रमाण) हैं। इसलिये उनका अध्ययन करके ही वेदवेत्ता आर्यजन वेद्यरूप परमात्माके तत्त्वको प्राप्त हुए हैं

সনৎসুজাত বললেন—“হে নরশ্রেষ্ঠ! বাক্‌রূপের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এই ছন্দসমূহ সেখানে পরমাত্মায় স্বতঃসিদ্ধ, স্বচ্ছন্দ সংযোগে প্রতিষ্ঠিত। অতএব যারা ছন্দকে যথার্থ জানে, তারা তা অধ্যয়ন করে কেবল বেদের অক্ষরে আবদ্ধ থাকে না; আর্যজন বেদ দ্বারা জ্ঞেয় পরম সত্যকে লাভ করে।”

Verse 52

न वेदानां वेदिता कश्रिदस्ति वश्चित्‌ त्वेतान्‌ बुध्यते वापि राजन्‌ | यो वेद वेदान्‌ न स वेद वेद्यं सत्ये स्थितो यस्तु स वेद वेद्यम्‌

হে রাজন, প্রকৃত অর্থে বেদের ‘বেদিতা’ কেউই নয়; কদাচিৎ কেউ এদের কিছুটা মাত্র বুঝতে পারে। যে বেদ জানে, সে-ও বেদে নির্দেশিত জ্ঞেয় পরম তত্ত্বকে জানে না—কিন্তু যে সত্যে প্রতিষ্ঠিত, সেই-ই প্রকৃত জ্ঞেয়কে জানে।

Verse 53

राजन! वास्तवमें वेदके तत्त्वको जाननेवाला कोई नहीं है अथवा यों समझो कि कोई बिरला ही उनका रहस्य जान पाता है। जो केवल वेदके वाक्योंको जानता है, वह वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य परमात्माको नहीं जानता; किंतु जो सत्यमें स्थित है, वह वेददवेद्य परमात्माको जानता है ।। न वेदानां वेदिता कश्रिदस्ति वेद्येन वेदं न विदुर्न वेद्यम्‌ । यो वेद वेदं स च वेद वेद्यं यो वेद वेद्यं नस वेद सत्यम्‌,जाननेवालोंमेंसे कोई भी वेदोंको अर्थात्‌ उनके रहस्यको जाननेवाला नहीं है; क्योंकि जाननेमें आनेवाले मन-बुद्धि आदिके द्वारा न तो कोई वेदके रहस्यको जान पाता है और न जाननेयोग्य परमात्मतत्त्वको ही। जो मनुष्य केवल कर्म-विधायक वेदको जानता है; वह तो बुद्धिद्वारा जाननेमें आनेवाले पदार्थोंको ही जानता है; किंतु जो बुद्धिद्वारा जाननेयोग्य पदार्थोकोी जानता है, वह (सकामी पुरुष) वास्तविक तत्त्व परब्रह्म परमात्माको नहीं जानता

হে রাজন, বেদের তত্ত্বের প্রকৃত জ্ঞাতা প্রায় কেউই নয়; কেবল কোনো বিরল জনই তার রহস্য উপলব্ধি করে। যে কেবল বেদের বাক্য জানে, সে বেদের দ্বারা জ্ঞেয় পরমাত্মাকে জানে না; কিন্তু যে সত্যে প্রতিষ্ঠিত, সে-ই সেই বেদাতীত পরমাত্মাকে জানে। সাধারণ জ্ঞেয় বস্তু দিয়ে না বেদের রহস্য জানা যায়, না সেই পরম তত্ত্ব; যে বেদকে তার সারার্থে জানে, সে জ্ঞেয়কেও জানে; আর যে কেবল ‘জ্ঞেয়’ জানার দাবি করে, সে সত্য জানে না।

Verse 54

यो वेद वेदान्‌ स च वेद वेद्यं नतं विदुर्वेदविदो न वेदा: । तथापि वेदेन विदन्ति वेदं ये ब्राह्मणा वेदविदो भवन्ति,जो महापुरुष वेदोंके रहस्यको जानता है, वह जाननेयोग्य परमात्माको भी जानता है; परंतु उस (जाननेवाले)-को न तो वेदोंके शब्दोंको जाननेवाला जानता है और न वेद ही जानते हैं। तथापि वेदके रहस्यको जाननेवाले जो ब्रह्मवेत्ता महापुरुष हैं, वे उस वेदके द्वारा ही वेदके रहस्यको जान लेते हैं (अर्थात्‌ वेदोंका कथन इतना गुप्त है कि केवल शब्दज्ञानसे उसका रहस्य एवं उसमें वर्णित परमात्मतत्त्व समझमें नहीं आता। अन्त:करण शुद्ध होनेपर सदगुरु या प्रभुकी कृपासे ही साधक उसे समझ पाता है)

যে মহাপুরুষ বেদকে তার রহস্যসহ জানেন, তিনিই জ্ঞেয় পরম তত্ত্বকেও জানেন; কিন্তু কেবল শব্দ-বিদ্যায় পারদর্শী তথাকথিত ‘বেদবিদ্’রা তাঁকে চেনে না, আর বেদও কেবল গ্রন্থরূপে তাঁকে ধরতে পারে না। তবু যাঁরা ব্রহ্মজ্ঞ, প্রকৃত বেদবিদ্ ব্রাহ্মণ, তাঁরা বেদের অন্তঃসার গ্রহণ করে বেদের সত্য অর্থ বেদ দ্বারাই উপলব্ধি করেন।

Verse 55

धामांशभागस्य तथा हि वेदा यथा च शाखा हि महीरुहस्य । संवेदने चैव यथा55मनन्ति तस्मिन्‌ हि सत्ये परमात्मनो<र्थे,द्वितीयाके चन्द्रमाकी सूक्ष्म कलाको बतानेके लिये जैसे वृक्षकी शाखाकी ओर संकेत किया जाता है, उसी प्रकार उस सत्यस्वरूप परमात्माका ज्ञान करानेके लिये ही वेदोंका भी उपयोग किया जाता है; ऐसा विद्वान पुरुष मानते हैं

যেমন মহাবৃক্ষের সূক্ষ্ম অংশ বোঝাতে তার শাখার দিকে ইঙ্গিত করা হয়, তেমনি সত্যস্বরূপ পরমাত্মার বোধ করাতে বেদ ব্যবহৃত হয়—এমনই জ্ঞানীরা বলেন। শাস্ত্র কেবল নির্দেশক; লক্ষ্য সেই পরম সত্য।

Verse 56

अभिजानामि ब्राह्मण व्याख्यातारं विचक्षणम्‌ | यश्छिन्नविचिकित्स: स व्याचष्टे सर्वसंशयान्‌,मैं तो उसीको ब्राह्मण समझता हूँ, जो परमात्माके तत्त्वको जाननेवाला और वेदोंकी यथार्थ व्याख्या करनेवाला हो, जिसके अपने संदेह मिट गये हों और जो दूसरोंके भी सम्पूर्ण संशयोंको मिटा सके

আমি তাকেই সত্য ব্রাহ্মণ বলে জানি—যিনি বিচক্ষণ ব্যাখ্যাতা, পরমাত্মতত্ত্বজ্ঞ এবং বেদের যথার্থ ব্যাখ্যা করতে সক্ষম; যার নিজের সংশয় ছিন্ন হয়েছে এবং যিনি অন্যদেরও সকল সংশয় দূর করতে পারেন।

Verse 57

नास्य पर्येषणं गच्छेत्‌ प्राचीनं नोत दक्षिणम्‌ | नार्वाचीनं कुतस्तिर्यड्नादिशं तु कथठचन,इस आत्माकी खोज करनेके लिये पूर्व, दक्षिण, पश्चिम या उत्तरकी ओर जानेकी आवश्यकता नहीं है; फिर आग्नेय आदि कोणोंकी तो बात ही क्या है? इसी प्रकार दिग्विभागसे रहित प्रदेशमें भी उसे नहीं ढूँढ़ना चाहिये

আত্মার অনুসন্ধানে পূর্ব বা দক্ষিণ, পশ্চিম বা উত্তর—কোনো দিকেই যেতে হয় না; তাহলে আগ্নেয়াদি মধ্যদিকের কথা তো আরওই নয়। দিকবিভাগহীন কোনো দেশেও তাকে খুঁজতে নেই।

Verse 58

तस्य पर्येषणं गच्छेत्‌ प्रत्यर्थिषु कथठ्चन । अविचिन्वन्निमं वेदे तप: पश्यति त॑ प्रभुम्‌,आत्माका अनुसंधान अनात्मपदार्थो्में तो किसी तरह करे ही नहीं, वेदके वाक्योंमें भी न ढूँढ़कर केवल तपके द्वारा उस प्रभुका साक्षात्कार करे

সেই পরম তত্ত্বের অনুসন্ধান অনাত্ম বস্তুসমূহে কোনোভাবেই করা উচিত নয়। কেবল বেদের বাক্যে তাকে খুঁজে বেড়ানো না করে, তপস্যার দ্বারা সেই প্রভুকে দর্শন করে।

Verse 59

तृष्णीम्भूत उपासीत न चेष्टेन्मनसापि च । उपावर्तस्व तद्‌ ब्रह्म अन्तरात्मनि विश्रुतम्‌,वागादि इन्द्रियोंकी सब प्रकारकी चेष्टासे रहित होकर परमात्माकी उपासना करे, मनसे भी कोई चेष्टा न करे। राजन्‌! तुम भी अपने हृदयाकाशगमें स्थित उस विख्यात परमेश्वरकी बुद्धिपूर्वक उपासना करो

বাক্‌ প্রভৃতি ইন্দ্রিয়ের সকল চেষ্টাহীন হয়ে পরমাত্মার উপাসনা কর; মনেও কোনো চঞ্চলতা রেখো না। হে রাজন, তুমিও অন্তরাত্মায় প্রতিষ্ঠিত সেই প্রসিদ্ধ ব্রহ্মকে স্থির বুদ্ধিতে উপাসনা কর।

Verse 60

मौनान्न स मुनिर्भवति नारण्यवसनान्मुनि: । स्वलक्षणं तु यो वेद स मुनि: श्रेष्ठ उच्यते,मौन रहने अथवा जंगलमें निवास करनेमात्रसे कोई मुनि नहीं होता। जो अपने आत्माके स्वरूपको जानता है, वही श्रेष्ठ मुनि कहलाता है

মৌন থাকলেই কেউ মুনি হয় না, আর অরণ্যবাসীর বেশ ধারণ করলেইও মুনি হয় না। যে নিজের আত্মার স্বলক্ষণ—নিজ সত্য স্বরূপ—জানে, সেই-ই শ্রেষ্ঠ মুনি বলে কথিত।

Verse 61

सर्वार्थानां व्याकरणाद्‌ वैयाकरण उच्यते । तन्मूलतो व्याकरणं व्याकरोतीति तत्‌ तथा,सम्पूर्ण अर्थोको व्याकृत (प्रकट) करनेके कारण ज्ञानी पुरुष 'वैयाकरण” कहलाता है। यह समस्त अर्थोंका प्रकटीकरण मूलभूत ब्रह्मसे ही होता है, अतः वही मुख्य वैयाकरण है; विद्वान्‌ पुरुष भी इसी प्रकार अर्थोंको व्याकृत (व्यक्त) करता है, इसलिये वह भी वैयाकरण है

সমস্ত অর্থকে বিশ্লেষণ করে প্রকাশ করে বলেই জ্ঞানীকে ‘বৈয়াকরণ’ বলা হয়। কিন্তু মূলত সকল অর্থের প্রকটন ব্রহ্ম থেকেই হয়; অতএব তিনিই প্রধান বৈয়াকরণ, আর পণ্ডিতও সেই রীতিতে অর্থকে ব্যক্ত করে বলেই বৈয়াকরণ নামে অভিহিত।

Verse 62

प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्नर: । सत्ये वै ब्राह्मणस्तिष्ठंस्तद्‌ विद्वान्‌ सर्वविद्‌ भवेत्‌,जो (योगी) सम्पूर्ण लोकोंको प्रत्यक्ष देख लेता है, वह मनुष्य उन सब लोकोंका द्रष्टा कहलाता है; परंतु जो एकमात्र सत्यस्वरूप ब्रह्ममें ही स्थित है, वही ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण सर्वज्ञ होता है

যে যোগী প্রত্যক্ষভাবে সকল লোককে দর্শন করে, সে সেই সকল লোকের দ্রষ্টা বলে গণ্য হয়; কিন্তু যে কেবল সত্যস্বরূপ ব্রহ্মেই প্রতিষ্ঠিত থাকে, সেই ব্রহ্মবিদ্ ব্রাহ্মণই প্রকৃতপক্ষে সর্বজ্ঞ হয়।

Verse 63

धर्मादिषु स्थितो<प्येवं क्षत्रिय ब्रह्म पश्यति । वेदानां चानुपूर्व्येण एतद्‌ बुद्धया ब्रवीमि ते,राजन! पूर्वोक्त धर्म आदिमें स्थित होनेसे तथा वेदोंका क्रमसे (विधिवत) अध्ययन करनेसे भी मनुष्य इसी प्रकार परमात्माका साक्षात्कार करता है। यह बात अपनी बुद्धिद्वारा निश्चय करके मैं तुम्हें बता रहा हूँ

হে ক্ষত্রিয়! ধর্মাদি অনুশাসনে প্রতিষ্ঠিত থেকেও মানুষ এইরূপে ব্রহ্মকে দর্শন করতে পারে। তদ্রূপ, যথাক্রমে ও বিধিপূর্বক বেদ অধ্যয়ন করলেও সেই একই প্রত্যক্ষ উপলব্ধি লাভ হয়—এ কথা আমি নিজের বুদ্ধিতে স্থির করে, হে রাজন, তোমাকে বলছি।

Frequently Asked Questions

Dhṛtarāṣṭra confronts a tension between the observable fact of mortality and the teaching that “death does not exist,” prompting a redefinition of death as a moral-psychological condition rooted in negligence and delusion.

Sanatsujāta’s core instruction is that pramāda (carelessness) generates ruin and repeated downfall, while apramāda (disciplined vigilance) enables clarity, restraint over desire/anger, and a functional transcendence of ‘death’ as inner collapse.

No explicit phalaśruti formula appears in the provided passage; the chapter’s internal meta-logic frames benefit indirectly by presenting apramāda, truth, self-control, purity, and learning as practical ‘doors’ to higher welfare and stability.