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Shloka 14

Sanatsujāta–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda: Pramāda as Mṛtyu

Chapter 42

ध्तराष्ट्र वाच कल्मषं तपसो ब्रूहि श्रुतं निष्कल्मषं तप: । सनत्सुजात येनेदं विद्यां गुह्ूं सनातनम्‌,धृतराष्ट्र बोले--सनत्सुजातजी! मैंने दोषरहित तपस्याका महत्त्व सुना। अब तपस्याके जो दोष हैं, उन्हें बताइये, जिससे मैं इस सनातन गोपनीय ब्रह्मतत्त्वको जान सकूँ

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—হে সনৎসুজাত! আমি নিষ্কলুষ তপস্যার মাহাত্ম্য শুনেছি। এখন তপস্যার যে কলুষতা/দোষ আছে তা বলুন, যাতে আমি এই সনাতন, গূঢ় বিদ্যাকে জানতে পারি।

सनत्युजात उवाच