
उद्योगपर्व — विदुरनीतिः (Adhyāya 37): आयुःक्षयहेतवः, नीतिसूत्राणि, बलभेदाः, पाण्डव-विग्रहदोषदर्शनम्
Upa-parva: Vidura-nīti (Counsel of Vidura) — Dhṛtarāṣṭra–Vidura Dialogue Unit
Adhyāya 37 presents an extended Vidura-nīti discourse framed by Dhṛtarāṣṭra’s inquiry about why humans fail to attain the full, idealized lifespan taught in Vedic formulations. Vidura answers by enumerating internal and social vices that “cut down” life—excessive speech, pride, over-indulgence/over-giving, anger, intense craving, and betrayal of allies—treating ethical failure as a practical risk factor. He then outlines behavioral prudence: respond to deception with guarded strategy, to virtue with virtue; speak unpleasant but beneficial truth; prioritize interests hierarchically (individual, family, village, realm) while protecting resources for adversity; and avoid unreliable or harmful associates. The chapter includes applied governance guidance on servants, counsel, and the qualities of a competent envoy (dūta). It also offers social cautions (trust boundaries, risky contexts) and lists categories to avoid in transactions. Vidura integrates lifestyle counsel (moderation, cleanliness) with political realism, culminating in warnings about the strategic and reputational costs of hostility toward the Pāṇḍavas. He articulates a fivefold typology of “strength,” privileging prajñā-bala (intelligence) as the highest integrative power, and closes with analogical reasoning (forest–tiger; fire latent in wood; vine–tree) to argue interdependence and the danger of provoking superior forces.
Chapter Arc: हस्तिनापुर के राजप्रासाद में नीति की गंभीर वाणी गूंजती है—विदुर राजधर्म का दर्पण उठाते हैं और बताते हैं कि सम्मान, प्रत्युत्थान और अतिथि-सत्कार से ही राज्य की शुचिता आरम्भ होती है। → विदुर क्रमशः गृहस्थ-धर्म से राजधर्म तक आते हैं: साधु-अतिथि को आसन, पाद्य, मधुपर्क, अन्न देना; लोभ-भय-कृपणता से दान रोकने वाले गृह का जीवन ‘अनर्थ’ कहलाना; फिर राज्य-नीति में प्रवेश—शत्रु को अवसर मिलने पर छोड़ना नहीं, कृतघ्न और असंविभागी राजा का त्याज्य होना, स्त्री/प्रमादी/पतित/अनार्य के हाथ में धन का नाश होना, और दुर्योधन द्वारा पाण्डवों को त्यागकर ‘भारतैश्वर्य’ का दुरुपयोग। → नीति का शिखर तब आता है जब विदुर दुर्योधन के निर्णय पर सीधा प्रहार करते हैं—‘हित्वा तान् परमेष्वासान् पाण्डवानमितौजसः…’—अर्थात जिनके बल से राज्य की कीर्ति टिक सकती थी, उन्हीं को छोड़कर तूने वैभव को अधर्म की ओर मोड़ दिया; साथ ही वे चेताते हैं कि शत्रु को वश में पाकर ढील देना भविष्य का भय बनता है। → विदुर राज-गोपनीयता और कार्य-नीति का सूत्र देते हैं—धर्म/काम/अर्थ के कार्य और मंत्रणा पहले प्रकट न हो; करके दिखायी जाए; राजा की दृष्टि सर्वत्र हो, पर उसकी मंत्रणा बहिरंग-अंतरंग किसी को ज्ञात न हो। नीति का निष्कर्ष: विभाजन-न्याय, कृतज्ञता, संयम, और समयोचित कठोरता ही राज्य को दीर्घजीवी बनाती है। → विदुर की वाणी के बाद प्रश्न हवा में लटकता है—क्या दुर्योधन इस दर्पण में अपना मुख देखेगा, या नीति को ठुकराकर विनाश की ओर और तेज़ बढ़ेगा?
Verse 1
भीकम (2 अमान अष्टात्रेशो5 ध्याय: विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश विदुर उवाच ऊर्ध्व प्राणा ह्ुत्क्रामन्ति यून: स्थविर आयति । प्रत्युत्थानाभिवादा भ्यां पुनस्तान् प्रतिपद्यते
বিদুর বললেন—হে রাজা! কোনো মান্য বৃদ্ধ কাছে এলে যুবকের প্রাণ যেন ঊর্ধ্বে উঠে যায়; কিন্তু সে উঠে অভ্যর্থনা করে প্রণাম জানালে, সেই প্রাণ আবার যথাস্থানে স্থির হয়।
Verse 2
पीठं दत्त्वा साधवे$भ्यागताय आनीयाप: परिनिर्णिज्य पादौ | सुखं पृष्टवा प्रतिवेद्यात्मसंस्थां ततो दद्यादन्नमवेक्ष्य धीर:
ধীর ব্যক্তি উচিত—যখন কোনো সাধুজন অতিথি হয়ে গৃহে আসেন, প্রথমে তাঁকে আসন দিতে, জল এনে তাঁর পা ধুয়ে দিতে; তারপর তাঁর কুশল জিজ্ঞাসা করে নিজের অবস্থাও জানাতে; এবং তাঁর প্রয়োজন বুঝে পরে অন্নভোজন প্রদান করতে।
Verse 3
यस्योदकं मधुपर्क च गां च न मन्त्रवित् प्रतिगृह्नाति गेहे । लोभाद् भयादथ कार्पण्यतो वा तस्यानर्थ जीवितमाहुरार्या:
বিদুর বললেন—যে গৃহে দাতার লোভ, ভয় বা কৃপণতার কারণে মন্ত্রজ্ঞ ব্রাহ্মণ জল, মধুপর্ক ও গাভী গ্রহণ করেন না, সেই গৃহস্থের জীবনকে আর্যগণ অর্থহীন বলে ঘোষণা করেছেন।
Verse 4
चिकित्सक: शल्यकर्तावकीर्णी स्तेन: क्रूरो मद्यपो भ्रूणहा च । सेनाजीवी श्रुतिविक्रायकश्न भृशं प्रियो5प्पतिथिनोंदकार्ह:
চিকিৎসক, শল্যকার, ব্রহ্মচর্যভ্রষ্ট, চোর, নিষ্ঠুর, মদ্যপ, ভ্রূণহন্তা, ভাড়াটে সৈনিক ও বেদ-বিক্রেতা—এরা পাদপ্রক্ষালনেরও যোগ্য নয়; তবু অতিথি হয়ে এলে বিশেষ সম্মানে গ্রহণীয়। অতিথিকে আতিথ্য-জল থেকে বঞ্চিত করা উচিত নয়।
Verse 5
अविक्रयं लवणं पक््वमन्नं दधि क्षीरं मधु तैलं घृतं च । तिला मांसं फलमूलानि शाकं रक्त वास: सर्वगन्धा गुडाश्न
লবণ, রান্না করা অন্ন, দই, দুধ, মধু, তেল, ঘি, তিল, মাংস, ফল ও মূল, শাক, লাল বস্ত্র, নানাবিধ সুগন্ধি এবং গুড়—এসব দ্রব্য বিক্রয়ের যোগ্য নয় বলে বলা হয়েছে।
Verse 6
अरोषणो य: समलोष्टाश्मकाछचन: प्रहीणशोको गतसन्धिविग्रह: । निन्दाप्रशंसोपरत: प्रियाप्रिये त्यजन्नुदासीनवदेष भिक्षुक:
যে ক্রোধহীন, যে মাটির ঢেলা, পাথর ও সোনাকে সমান জ্ঞান করে, যে শোক ত্যাগ করেছে, যে সন্ধি-সংঘর্ষের হিসাবের ঊর্ধ্বে, যে নিন্দা-প্রশংসায় অচঞ্চল, এবং যে প্রিয়-অপ্রিয় আসক্তি ত্যাগ করে উদাসীন সাক্ষীর মতো থাকে—সেই-ই প্রকৃত ভিক্ষু।
Verse 7
नीवारमूलेड्गुदशाक वृत्ति: सुसंयतात्माग्निकार्येषु चोद्य: । वने वसन्नतिथिष्वप्रमत्तो धुरन्धर: पुण्यकृदेष तापस:
যে নীবার (বন্য ধান), কন্দ-মূল, ইঙ্গুদী-ফল ও শাক খেয়ে জীবনধারণ করে, যার মন সুসংযত, যে অগ্নিকর্মে (অগ্নিহোত্রাদি) তৎপর, এবং বনে বাস করেও অতিথিসেবায় কখনো অসতর্ক হয় না—দায়িত্ববাহী সেই পুণ্যকর্মী তাপসই শ্রেষ্ঠ বলে গণ্য।
Verse 8
अपकृत्य बुद्धिमतो दूरस्थोडस्मीति नाश्वसेत् । दीर्घो बुद्धिमतो बाहू याभ्यां हिंसति हिंसित:
বুদ্ধিমান ব্যক্তির অপকার করে ‘আমি তো দূরে আছি’—এই ভরসায় নিশ্চিন্ত হওয়া উচিত নয়। বুদ্ধিমানের বাহু দীর্ঘ; আঘাত পেলে সে সেই বাহুতেই প্রতিশোধ নেয়।
Verse 9
नविश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति
যে বিশ্বাসযোগ্য নয়, তাকে কখনও বিশ্বাস করবে না; আর যে বিশ্বাসযোগ্য, তাকেও অতিরিক্ত বিশ্বাস করবে না। কারণ ভুল বিশ্বাস থেকে যে ভয় জন্মায়, তা মানুষের শিকড় পর্যন্ত কেটে ফেলে।
Verse 10
अर्नार्ष्गुप्तदारश्न॒ संविभागी प्रियंवद: । श्लक्ष्णो मधुरवाक् स्त्रीणां न चासां वशगो भवेत्
মানুষের উচিত ঈর্ষাহীন হওয়া, স্ত্রীলোকদের রক্ষা করা, সম্পদ ন্যায়ভাবে বণ্টন করা, প্রিয়ভাষী হওয়া, শিষ্ট ও পরিশীলিত থাকা, এবং নারীদের প্রতি মধুর বাক্য বলা—তবে কখনও তাদের বশবর্তী হওয়া নয়।
Verse 11
पूजनीया महाभागा: पुण्याश्च गृहदीप्तय: । स्त्रिय: श्रियो गृहस्योक्तास्तस्माद् रक्ष्या विशेषत:
নারীরা পূজনীয়—তারা মহাভাগ্যবতী, পবিত্র এবং গৃহের দীপ্তি। গৃহের শ্রী বলেই তাদের বলা হয়েছে; অতএব তাদের বিশেষভাবে রক্ষা করা উচিত।
Verse 12
पितुरन्त:पुरं दद्यान्मातुर्दद्यान्महानसम् | गोषु चात्मसमं दद्यात् स्वयमेव कृषिं व्रजेत्
অন্তঃপুরের দায় পিতাকে দিক, রান্নাঘরের ব্যবস্থাপনা মাতাকে দিক; গবাদিপশুর বিষয়ে নিজের সমান অংশ দিক; আর কৃষিকর্ম নিজেই করুক।
Verse 13
भृत्यैर्वाणिज्यचारं च पुत्र: सेवेत च द्विजान् । अन्तःपुरकी रक्षाका कार्य पिताको सौंप दे
ভৃত্যদের দ্বারা বাণিজ্য-ব্যবহার করুক, আর পুত্রদের দ্বারা দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) সেবা করাক।
Verse 14
नित्यं सन्तः कुले जाता: पावकोपमतेजस:
বিদুর বলেন—এই বংশে নিরন্তরই সত্যসাধু পুরুষ জন্ম নেন, যাঁদের দীপ্তি অগ্নিসদৃশ; অর্থাৎ মহৎ আচরণ ও ধর্মবল আকস্মিক নয়, উত্তরাধিকারসূত্রে বারবার প্রকাশিত—যা বর্তমান সিদ্ধান্তকে পথ দেখায়।
Verse 15
क्षमावन्तो निराकारा: काष्ठेडग्निरिव शेरते । अच्छे कुलमें उत्पन्न, अग्निके समान तेजस्वी, क्षमाशील और विकारशून्य संत पुरुष सदा काष्ठमें अग्निकी भाँति शान्तभावसे स्थित रहते हैं ।।
বিদুর বলেন—যাঁরা ক্ষমাশীল এবং বাহ্য আড়ম্বরহীন, তাঁরা কাঠের মধ্যে নিহিত অগ্নির মতো শান্ত থাকেন; উচ্চকুলজাত ও অগ্নিসদৃশ দীপ্তিমান হয়েও সাধুজন শক্তিকে সংযমে বেঁধে নীরব স্থিতিতে অবস্থান করেন।
Verse 16
करिष्यन् न प्रभाषेत कृतान्येव तु दर्शयेत्
বিদুর উপদেশ দেন—যে কাজ করতে উদ্যত, সে যেন কেবল কথায় না ভাসে; সম্পন্ন কর্মই হোক তার প্রমাণ।
Verse 17
गिरिपृष्ठमुपारुह प्रासादं वा रहोगतः,अरण्ये नि:शलाके वा तत्र मन्त्रोडभिधीयते । पर्ववकी चोटी अथवा राजमहलपर चढ़कर एकान्त स्थानमें जाकर या जंगलमें तृण आदिसे अनावृत स्थानपर मन्त्रणा करनी चाहिये
বিদুর বলেন—পরামর্শ করতে হবে নিরাপদ গোপন স্থানে: পর্বতের শিখর-প্রান্তে উঠে, বা প্রাসাদের নির্জন কক্ষে, কিংবা অরণ্যের এমন উন্মুক্ত স্থানে যেখানে আড়াল নেই—যাতে গুপ্ত কথা পরের কানে না যায়।
Verse 18
।। नासुद्गत् परमं मन्त्र भारताहति वेदितुम्
বিদুর বলেন—যে ব্যক্তি নীচ প্রবৃত্তির ঊর্ধ্বে ওঠেনি, সে পরম মন্ত্র বুঝতে পারে না; ভারত-সংঘাতে কেবল সংযমে শাসিত মনই সর্বোচ্চ উপদেশ ধারণ করতে সক্ষম।
Verse 19
अपण्डितो वापि सुहृत् पण्डितो वाप्यनात्मवान् | भारत! जो मित्र न हो, मित्र होनेपर भी पण्डित न हो, पण्डित होनेपर भी जिसका मन वशमें न हो, वह अपनी गुप्त मन्त्रणा जाननेके योग्य नहीं है ।।
হে ভারত! যে অজ্ঞ, সে স্নেহশীল হলেও; যে বন্ধু নামে পরিচিত, কিন্তু প্রকৃত বন্ধু নয়; যে নিকটজন হয়েও পণ্ডিত নয়; আর যে পণ্ডিত হয়েও আত্মসংযমহীন—তাকে গূঢ় মন্ত্রণা জানার যোগ্য মনে করা উচিত নয়। রাজা পরীক্ষা না করে কখনও নিজের সচিব/মন্ত্রী নিযুক্ত করবেন না।
Verse 20
अमात्ये हार्थलिप्सा च मन्त्ररक्षणमेव च । कृतानि सर्वकार्याणि यस्य पारिषदा विदु:
যার মন্ত্রীর মধ্যে ধনলোভ নেই এবং যে মন্ত্ররক্ষায় সদা সতর্ক—তার বিষয়ে সভাসদগণ মনে করেন, তার সকল কার্য যেন সম্পন্নই হয়ে গেছে।
Verse 21
धर्मे चार्थे च कामे च स राजा राजसत्तम: । गूढमन्त्रस्य नृपतेस्तस्य सिद्धिरसंशयम्
যে রাজা—রাজাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—ধর্ম, অর্থ ও কাম বিষয়ে নিজের মন্ত্র গোপন রাখে, সেই নৃপতির সিদ্ধি নিঃসন্দেহ।
Verse 22
राजा अच्छी तरह परीक्षा किये बिना किसीको अपना मन्त्री न बनावे; क्योंकि धनकी प्राप्ति और मन्त्रकी रक्षाका भार मन्त्रीपर ही रहता है। जिसके धर्म
রাজা যেন ভালোভাবে পরীক্ষা না করে কাউকে মন্ত্রী না করেন; কারণ ধনসাধন ও রাষ্ট্র-মন্ত্র রক্ষার ভার প্রধানত মন্ত্রীর উপরই থাকে। যার ধর্ম, অর্থ ও কাম-সম্পর্কিত উদ্যোগগুলি সম্পূর্ণ হওয়ার পরেই সভাসদগণ জানতে পারেন—সেই রাজাই রাজাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ। যে নিজের মন্ত্র গোপন রাখে, সে নিঃসন্দেহে সিদ্ধি লাভ করে। কিন্তু যে মোহবশ নিন্দিত ও শাস্ত্রনিষিদ্ধ কর্মে প্রবৃত্ত হয়, সে তাদের বিপরীত ফলের দ্বারা ধ্বংসপ্রাপ্ত হয় এবং জীবন পর্যন্ত হারাতে পারে।
Verse 23
कर्मणां तु प्रशस्तानामनुष्ठानं सुखावहम् । तेषामेवाननुष्ठानं पश्चात्तापकरं मतम्,उत्तम कर्मोंका अनुष्ठान तो सुख देनेवाला होता है, किंतु उन्हींका अनुष्ठान न किया जाय तो वह पश्चात्तापका कारण माना गया है
প্রশস্ত কর্মের অনুশীলন সুখদায়ক; কিন্তু সেই কর্তব্যগুলিই পালন না করা পরবর্তীকালে অনুতাপের কারণ বলে মানা হয়।
Verse 24
अनधीत्य यथा वेदान् न विप्र: श्राद्धमर्हति । एवमश्रुतषाड्गुण्यो न मन्त्र श्रोतुमहीति
যেমন বেদ অধ্যয়ন না-করা ব্রাহ্মণ শ্রাদ্ধকর্মে অধিকারী নয়, তেমনি সন্ধি, বিগ্রহ, যান, আসন, দ্বৈধীভাব ও সমাশ্রয়—এই ষড়্গুণ না-জানা ব্যক্তি গোপন পরামর্শ শোনার যোগ্য নয়।
Verse 25
स्थानवृद्धिक्षयज्ञस्य षाड्गुण्यविदितात्मन: । अनवज्ञातशीलस्य स्वाधीना पृथिवी नूप
হে রাজন! যে সন্ধি-বিগ্রহাদি ষড়্গুণ্যে পারদর্শী, অবস্থান, বৃদ্ধি ও ক্ষয় জানে, এবং যার স্বভাব সর্বত্র সম্মানিত—পৃথিবী তারই অধীন থাকে।
Verse 26
अमोघक्रो धहर्षस्य स्वयं कृत्यान्ववेक्षिण: । आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुदैव वसुन्धरा
যার ক্রোধ ও হর্ষ কখনও বৃথা যায় না, যে নিজেই কর্তব্যকর্ম তদারক করে এবং কোষাগারের উপর নিজস্ব নিশ্চিত নজর রাখে—তার জন্য বসুন্ধরা নিজেই ধনদাত্রী হয়ে ওঠে।
Verse 27
नाममात्रेण तुष्येत छत्रेण च महीपति: । भृत्येभ्यो विसृजेदर्थान् नैक: सर्वहरो भवेत्
মহীপতির উচিত—শুধু ‘রাজা’ নাম ও রাজচিহ্ন ছত্রেই সন্তুষ্ট থাকা; ভৃত্যদের মধ্যে ধন বিতরণ করা, একা সবকিছু গ্রাসকারী না হওয়া।
Verse 28
ब्राह्मणं ब्राह्मणो वेद भर्ता वेद स्त्रियं तथा । अमात्यं नृपतिर्वेद राजा राजानमेव च,ब्राह्मणको ब्राह्मण जानता है, स्त्रीको उसका पति जानता है, मन्त्रीको राजा जानता है और राजाको भी राजा ही जानता है
ব্রাহ্মণকে ব্রাহ্মণই চেনে, স্ত্রীকে তার স্বামী; মন্ত্রীকে রাজা চেনে, আর রাজাকেও রাজাই চেনে।
Verse 29
न शत्रुर्वशमापतन्नो मोक्तव्यो वध्यतां गत: । न्यग्भूत्वा पर्युपासीत वध्यं हन्याद् बले सति । अहताद्धि भयं तस्माज्जायते नचिरादिव
যে শত্রু বশে এসেছে এবং দণ্ডযোগ্য হয়েছে, তাকে মুক্ত করা উচিত নয়। আগে তাকে দমন করে নজরদারিতে রাখতে হবে; আর শক্তি ও সুযোগ নিশ্চিত হলে যে বধ্য, তাকে সংহার করতে হবে। কারণ তাকে অক্ষত রেখে দিলে অল্পদিনের মধ্যেই তার থেকেই আবার ভয় জন্মায়।
Verse 30
वशमें आये हुए वधके योग्य शत्रुको कभी छोड़ना नहीं चाहिये। यदि अपना बल अधिक न हो तो नम्र होकर उसके पास समय बिताना चाहिये और बल होनेपर उसे मार ही डालना चाहिये; क्योंकि यदि शत्रु मारा न गया तो उससे शीघ्र ही भय उपस्थित होता है ।।
যে শত্রু বশে এসেছে এবং বধযোগ্য, তাকে কখনও ছেড়ে দেওয়া উচিত নয়। নিজের শক্তি যথেষ্ট না হলে বিনীত হয়ে তার কাছে সময় কাটিয়ে সুযোগের অপেক্ষা করতে হবে; আর শক্তি অর্জিত হলে তাকে সংহার করতে হবে—কারণ শত্রু বেঁচে থাকলে শীঘ্রই তার থেকেই ভয় উপস্থিত হয়। একই সঙ্গে দেবতা, রাজা ও ব্রাহ্মণদের প্রতি, এবং বৃদ্ধ, শিশু ও রোগীদের প্রতি ক্রোধকে সচেষ্টভাবে সর্বদা সংযত রাখতে হবে।
Verse 31
निरर्थ कलहं प्राज्ञो वर्जयेन्मूढसेवितम् । कीर्ति च लभते लोके न चानर्थेन युज्यते
প্রাজ্ঞ ব্যক্তি অর্থহীন কলহ বর্জন করবে—বিশেষত যা মূর্খদের দ্বারা লালিত ও আশ্রিত। এতে সে জগতে সুনাম লাভ করে এবং অনর্থে জড়ায় না।
Verse 32
मूर्खोंद्रारा सेवित निरर्थक कलहका बुद्धिमान् पुरुषको त्याग कर देना चाहिये। ऐसा करनेसे उसे लोकमें यश मिलता है और अनर्थका सामना नहीं करना पड़ता ।।
মূর্খদের দ্বারা আশ্রিত অর্থহীন কলহ জ্ঞানী পুরুষের ত্যাগ করা উচিত। এতে সে জগতে যশ লাভ করে এবং অনর্থের মুখোমুখি হতে হয় না। যার অনুগ্রহ ফলহীন এবং যার ক্রোধও নিষ্ফল—এমন রাজাকে প্রজারা প্রভু হিসেবে চায় না, যেমন নারীরা নপুংসক স্বামীকে চায় না।
Verse 33
न बुद्धिर्धनलाभाय न जाड्यमसमृद्धये । लोकपर्याय वृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतर:
বুদ্ধি থাকলেই যে ধনলাভ অবশ্যম্ভাবী, তা নয়; আর জড়তা থাকলেই যে দারিদ্র্য অনিবার্য, তাও নয়। জগতের চক্রের পরিবর্তনের বৃত্তান্ত কেবল প্রাজ্ঞ ব্যক্তি জানে, অন্যেরা নয়।
Verse 34
विद्याशीलवयोवृद्धान बुद्धिवृद्धांश्व भारत । धनाभिजातवृद्धांश्व नित्यं मूढोड5वमन्यते,भारत! मूर्ख मनुष्य विद्या, शील, अवस्था, बुद्धि, धन और कुलमें बड़े माननीय पुरुषोंका सदा अनादर किया करता है
বিদুর বললেন—হে ভারত! মোহগ্রস্ত মানুষ বিদ্যা, শীল ও বয়সে শ্রেষ্ঠ, এবং বুদ্ধি, ধন ও কুলে উন্নত মান্যজনদের প্রতি সর্বদা অবজ্ঞা করে; এই অবজ্ঞাই তার মূঢ়তা ও নৈতিক অন্ধত্ব প্রকাশ করে।
Verse 35
अनार्यवृत्तमप्राज्ममसूयकमधार्मिकम् । अनर्था: क्षिप्रमायान्ति वाग्दुष्ट क्रोधनं तथा
যার আচরণ অনার্য, বিচারবুদ্ধি মূঢ়, স্বভাব ঈর্ষাপরায়ণ এবং জীবন ধর্মবিরোধী—তার দিকে অমঙ্গল দ্রুত ধেয়ে আসে; তেমনি কটু বাক্য ও ক্রোধও সর্বনাশ ত্বরান্বিত করে।
Verse 36
जिसका चरित्र निन्दनीय है, जो मूर्ख, गुणोंमें दोष देखनेवाला, अधार्मिक, बुरे वचन बोलनेवाला और क्रोधी है, उसके ऊपर शीघ्र ही अनर्थ (संकट) टूट पड़ते हैं ।।
যার চরিত্র নিন্দনীয়, যে মূঢ়, গুণের মধ্যেও দোষ খোঁজে, অধার্মিক, কটু বাক্য বলে এবং ক্রোধী—তার উপর অমঙ্গল দ্রুত ভেঙে পড়ে। কিন্তু প্রতারণা না করা, দান করা, প্রতিজ্ঞা ভঙ্গ না করা এবং সুচিন্তিত ও যথাযথ বাক্য—এগুলো সকল প্রাণীকে নিজের অনুকূলে আনে।
Verse 37
अविसंवादको दक्ष: कृतज्ञों मतिमानृजु: । अपि संक्षीणकोशो5पि लभते परिवारणम्
যে রাজা কাউকে প্রতারণা করে না, দক্ষ, কৃতজ্ঞ, বুদ্ধিমান এবং সরলস্বভাব—তার কোষাগার ক্ষয় হলেও সে অনুগত সহায়ক ও পরিজন লাভ করে।
Verse 38
धृति: शमो दम: शौचं कारुण्यं वागनिष्ठरा । मित्राणां चानभिद्रोह: सप्तैता: समिध: श्रिय:,धैर्य, मनोनिग्रह, इन्द्रियसंयम, पवित्रता, दया, कोमल वाणी और मित्रसे द्रोह न करना --ये सात बातें लक्ष्मीको बढ़ानेवाली हैं इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरवाक्ये अष्टात्रिंशो 5 ध्याय: ।।
ধৈর্য, শম (মনোনিগ্রহ), দম (ইন্দ্রিয়সংযম), শৌচ (পবিত্রতা), করুণা, অ-কঠোর বাক্য এবং বন্ধুদের প্রতি দ্রোহ না করা—এই সাতটি শ্রী (সমৃদ্ধি)-কে বৃদ্ধি করে এমন সমিধা।
Verse 39
असंविभागी दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रप: । तादृड्नराधिपो लोके वर्जनीयो नराधिप
যে রাজা আশ্রিতদের মধ্যে ধন ন্যায়সঙ্গতভাবে বণ্টন করে না, যে অন্তরে দুষ্ট, উপকারভোলা ও নির্লজ্জ—এমন নরাধিপকে এই লোকেই পরিত্যাগ করা উচিত।
Verse 40
न च रात्रौ सुखं शेते ससर्प इव वेश्मनि । यः कोपयति निर्दोषं सदोषो5भ्यन्तरं जनम्
যে নিজে দোষী হয়েও নিজের গৃহের নির্দোষ আত্মীয়জনকে ক্রুদ্ধ করে তোলে, সে সাপ-থাকা ঘরে বাস করা মানুষের মতো রাতে শান্তিতে ঘুমোতে পারে না।
Verse 41
येषु दुष्टेषु दोष: स्याद् योगक्षेमस्थ भारत । सदा प्रसादनं तेषां देवतानामिवाचरेत्,भारत! जिनके ऊपर दोषारोपण करनेसे योगक्षेममें बाधा आती हो, उन लोगोंको देवताकी भाँति सदा प्रसन्न रखना चाहिये
হে ভারত! দুষ্ট লোকদের দোষ ধরলে যদি যোগক্ষেমে বিঘ্ন ঘটে, তবে তাদের দেবতার মতো করে সর্বদা প্রসন্ন রাখাই উচিত।
Verse 42
येअर्था: स्त्रीषु समायुक्ता: प्रमत्तपतितेषु च । ये चानार्ये समासक्ता: सर्वे ते संशयं गता:,जो धन आदि पदार्थ स्त्री, प्रमादी, पतित और नीच पुरुषोंके हाथमें सौंप दिये जाते हैं, वे संशयमें पड़ जाते हैं
যে ধন-সম্পদ নারী, অসতর্ক, পতিত কিংবা অনার্য (নীচ) লোকের হাতে সঁপে দেওয়া হয়—সেসবই অনিশ্চয়তা ও বিপদের মধ্যে পড়ে।
Verse 43
यत्र स्त्री यत्र कितवो बालो यत्रानुशासिता । मज्जन्ति तेडवशा राजन् नद्यामश्मप्लवा इव
রাজন! যেখানে শাসন নারীর, জুয়াড়ির ও শিশুর হাতে থাকে, সেখানে প্রজারা নদীতে পাথরের নৌকায় বসা মানুষের মতো অসহায় হয়ে বিপদে ডুবে যায়।
Verse 44
प्रयोजनेषु ये सक्ता न विशेषेषु भारत । तानहं पण्डितान् मन्ये विशेषा हि प्रसज्धिन:
হে ভারত! যারা কেবল প্রয়োজনীয় কাজে নিয়োজিত থাকে এবং অতিরিক্ত বিষয়ে নাক গলায় না, তাদেরই আমি প্রকৃত পণ্ডিত মনে করি; কারণ অতিরিক্ততা অনিবার্যভাবে জটিলতা ও সংঘর্ষের কারণ হয়।
Verse 45
य॑ प्रशंसन्ति कितवा यं॑ प्रशंसन्ति चारणा: । य॑ प्रशंसन्ति बन्धक्यो न स जीवति मानव:
যাকে জুয়াড়িরা বাহবা দেয়, যাকে চারণ-গায়করা প্রশংসাগান করে, আর যাকে বারাঙ্গনারা মহিমা করে—সে মানুষ সত্যিকার অর্থে বেঁচে নেই; সে শ্বাস নেয় বটে, কিন্তু ধর্ম ও সংযমহীন বলে মৃতেরই সমান।
Verse 46
हित्वा तान् परमेष्वासान् पाण्डवानमितौजस: । आहितं भारतैश्वर्य त्वया दुर्योधने महत्,भारत! आपने उन महान् धनुर्धर और अत्यन्त तेजस्वी पाण्डवोंको छोड़कर यह महान् ऐश्वर्यका भार दुर्योधनके ऊपर रख दिया है
হে ভারত! সেই পরম ধনুর্ধর, অপরিমেয় পরাক্রান্ত পাণ্ডবদের ত্যাগ করে তুমি ভারত-সাম্রাজ্যের মহৎ ঐশ্বর্যের ভার দুর্যোধনের ওপর চাপিয়ে দিয়েছ।
Verse 47
त॑ द्रक्ष्यसि परिशभ्रष्टं तस्मात् त्वमचिरादिव । ऐश्वर्यमदसम्मूढं बलिं लोकत्रयादिव
অতএব অচিরেই তুমি ঐশ্বর্য-মদে মোহিত দুর্যোধনকে দেখবে—যেমন ত্রিলোকের সাম্রাজ্য থেকে বলি পতিত হয়েছিল—তেমনি সে এই রাজ্য থেকেও পতিত হবে।
Verse 136
तेषां सर्वत्रगं तेज: स्वासु योनिषु शाम्यति । जलसे अनिनि, ब्राह्मणसे क्षत्रिय और पत्थरसे लोहा पैदा हुआ है। इनका तेज सर्वत्र व्याप्त होनेपर भी अपने उत्पत्तिस्थानमें शान्त हो जाता है
তাদের তেজ সর্বত্র বিস্তৃত হতে পারলেও নিজ নিজ উৎস-যোনিতে ফিরে এলে তা শান্ত হয়ে যায়।
Verse 156
स राजा सर्वतश्नक्षुश्रिरमैश्चवर्यम श्रुते । जिस राजाकी मन्त्रणाको उसके बहिरंग एवं अन्तरंग कोई भी मनुष्य नहीं जानते, सब ओर दृष्टि रखनेवाला वह राजा चिरकालतक एऐश्वर्यका उपभोग करता है
যে রাজার মন্ত্রণা তার বাহ্য ও অন্তঃপরিষদের লোকেরাও জানতে পারে না, যে সর্বদিকে সতর্ক দৃষ্টি রেখে নিজের পরিকল্পনা গোপন রাখে, সেই রাজা দীর্ঘকাল সমৃদ্ধি ও ঐশ্বর্য ভোগ করে।
Verse 166
धर्मकामार्थकार्याणि तथा मन्त्रो न भिद्यते धर्म, काम और अर्थसम्बन्धी कार्योंको करनेसे पहले न बतावे, करके ही दिखावे। ऐसा करनेसे अपनी मन्त्रणा दूसरोंपर प्रकट नहीं होती
ধর্ম, কাম ও অর্থ-সম্পর্কিত কাজ আগে থেকে প্রকাশ করা উচিত নয়; কাজ সম্পন্ন করে তবেই ফল দেখানো উচিত। এভাবে করলে নিজের মন্ত্রণা অন্যের কাছে ফাঁস হয় না।
How a ruler should act when knowledge of right policy exists but impulses—anger, pride, craving, and factional loyalty—push governance toward self-harm; the chapter treats ethical lapses as concrete threats to stability, reputation, and longevity.
Discernment and restraint are the highest forms of power: prajñā-bala integrates all other strengths, enabling measured speech, reliable alliances, and proportionate response—thereby preserving both dharma and pragmatic security.
No explicit phalaśruti is stated in this chapter’s presented text; its meta-function is instructional, positioning nīti as preventive medicine for personal and political decline within the pre-war narrative.