Adhyaya 31
Udyoga ParvaAdhyaya 3132 Versesयुद्ध आरम्भ नहीं; कूटनीति और नैतिक दबाव का चरण—सभा-निर्णय की ओर घटनाएँ तीव्र।

Adhyaya 31

Udyoga Parva, Adhyaya 31 — Yudhiṣṭhira’s Instructions to Sañjaya (Peace Appeal and Five-Village Proposal)

Upa-parva: Sanjaya-Dhritarashtra Sandesha (Embassy Discourse) — within Udyoga Parva

Yudhiṣṭhira addresses Sañjaya with a theological-political premise: the Disposer (dhātā/īśāna) places opposites under control—strength and weakness, youth and age, learning and folly—thereby framing human agency as constrained yet responsible. He then instructs Sañjaya to report matters accurately and to proceed to the Kuru court with proper salutations. Sañjaya is to honor Dhṛtarāṣṭra, emphasizing that the Pāṇḍavas’ continued welfare has depended on royal favor and urging non-neglect of those once sheltered. He must also bow to Bhīṣma and remind him of his role in sustaining the Śaṃtanu lineage, requesting guidance so that the grandsons may live in mutual goodwill. Vidura is asked to advocate non-violent resolution as an act of welfare. Finally, Sañjaya is to repeatedly persuade Suyodhana (Duryodhana), recalling past injuries endured by the Pāṇḍavas—exile, public humiliation of Kṛṣṇā (Draupadī), and other hardships—while asserting restraint: they have tolerated suffering and still seek peace. The chapter culminates in a concrete settlement formula: grant even a small portion of kingdom—specified as five villages—for the five brothers, so that Kuru-Pāñcāla relations may normalize and the polity avoid destructive escalation. Yudhiṣṭhira declares readiness for either peace or conflict but prioritizes dharma-consistent conciliation.

Chapter Arc: पाण्डवों के सकाश से संजय तीव्र वेग से हस्तिनापुर पहुँचते हैं और द्वारपाल से कहते हैं—धृतराष्ट्र को तुरंत मेरे आगमन का समाचार दो; मैं युधिष्ठिर का कुशल-संदेश लेकर आया हूँ। → धृतराष्ट्र संजय का अभिनन्दन कर युधिष्ठिर, अर्जुन और पाण्डवों की कुशल-क्षेम पूछते हैं; संजय उत्तर देते हुए धीरे-धीरे राजा के सामने कठोर सत्य रखते हैं—आप पुत्रवश होकर संशययुक्त नीति अपना रहे हैं, जिससे पृथ्वी पर ‘अधर्म’ की निन्दा आपके नाम से जुड़ रही है। → संजय धृतराष्ट्र को सीधे चेताते हैं कि अयोग्यों (शकुनि, कर्ण आदि) का संग्रह और योग्य जनों का निग्रह राज्य को दुर्बल करता है; यदि युधिष्ठिर पर पाप-आरोपण कर अन्याय किया गया तो लोक-निन्दा और विनाश अवश्यंभावी होगा। → संजय अपना संदेश-कर्तव्य पूरा कर देते हैं और संकेत करते हैं कि वास्तविक निर्णय सभा में सब कौरवों के समक्ष होना चाहिए; वे थकान का निवेदन कर विश्राम की अनुमति माँगते हैं। → प्रातःकाल जब समस्त कौरव सभा में एकत्र होंगे, तब संजय सार्वजनिक रूप से पाण्डव-पक्ष का संदेश और नीति-उपदेश रखेंगे—यह अगले प्रसंग का द्वार खोलता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--+र< बक। है २ द्वात्रिशोड्ध्याय: अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना वैशम्पायन उवाच (धर्मराजस्य तु वच: श्रुत्वा पार्थो धनंजय: । उवाच संजयं तत्र वासुदेवस्य शृण्वतः ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरकी बात सुनकर कुन्तीपुत्र अर्जुनने भगवान्‌ श्रीकृष्णके सुनते हुए वहाँ संजयसे इस प्रकार कहा। अर्जुन उवाच पितामहं शान्तनवं धृतराष्ट्रं च संजय । द्रोणं सपुत्रं शल्यं च महाराजं च बाह्विकम्‌ ।। विकर्ण सोमदत्तं च शकुनिं चापि सौबलम्‌ | विविंशतिं चित्रसेनं जयत्सेनं च संजय ।। भगदत्तं तथा चैव शूरं रणकृतां वरम्‌ ।। ये चाप्यन्ये कुरवस्तत्र सन्ति राजानश्रैद्‌ भूमिपाला: समेता: । युयुत्सव: पार्थिवा: सैन्धवाश्न समानीता धार्तराष्ट्रेण सूत ।। यथान्यायं कुशलं वन्दनं च समागमे मद्धवचनेन वाच्या: । ततो ब्रूया: संजय राजमध्ये दुर्योधनं पापकृतां प्रधानम्‌ ।। अर्जुन बोले--संजय! शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, धृतराष्ट्र, पुत्रसहित द्रोणाचार्य, महाराज शल्य, बाह्नीक, विकर्ण, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, विविंशति, चित्रसेन, जयत्सेन तथा योद्धाओंमें श्रेष्ठ शूरवीर भगदत्त--इन सबसे और दूसरे भी जो कौरव वहाँ रहते हैं, युद्धकी इच्छासे जो-जो राजा वहाँ एकत्र हुए हैं तथा दुर्योधनने जिन-जिन भूमिपालों और सिंधुदेशीय वीरोंको बुला रखा है, उन सबसे भी यथोचित रीतिसे मिलकर मेरी ओरसे कुशल और अभिवादन कहना। तत्पश्चात्‌ राजाओंकी मण्डलीमें पापियोंके सिरमौर दुर्योधनको मेरा संदेश सुना देना। वैशम्पायन उवाच एवं प्रतिष्ठाप्प धनंजयस्तं ततोडर्थवद्‌ धर्मवच्चैव पार्थ: । उवाच वाक्यं स्वजनप्रहर्ष वित्रासनं धृतराष्ट्रात्मजानाम्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इस प्रकार कुन्तीपुत्र धनंजयने संजयको जानेकी अनुमति देकर अर्थ और धर्मसे युक्त बात कही, जो स्वजनोंको हर्ष देनेवाली तथा धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी भयभीत करनेवाली थी। अर्जुनेन समादिष्टस्तथेत्युक्त्वा तु संजय: । पार्थानामन्त्रयामास केशवं च यशस्विनम्‌ ।। ) अर्जुनके इस प्रकार आदेश देनेपर संजयने “तथास्तु” कहकर उसे शिरोधार्य किया। तत्पश्चात्‌ उसने अन्य कुन्तीकुमारों तथा यशस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्णसे जानेकी अनुमति माँगी। अनुज्ञात: पाण्डवेन प्रययौं संजयस्तदा । शासन धृतराष्ट्रस्य सर्व कृत्वा महात्मन:,पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर संजय महामना राजा धुृतराष्ट्रके सम्पूर्ण आदेशोंका पालन करके उस समय वहाँसे प्रस्थित हुए

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের কথা শুনে পার্থ ধনঞ্জয় অর্জুন, বাসুদেব শ্রীকৃষ্ণের শ্রবণে, সেখানেই সঞ্জয়কে বললেন। অর্জুন বললেন—সঞ্জয়! শান্তনুনন্দন পিতামহ ভীষ্ম, ধৃতরাষ্ট্র, পুত্রসহ দ্রোণাচার্য, মহারাজ শল্য, বাহ্লীক, বিকর্ণ, সোমদত্ত, সুবলপুত্র শকুনি, বিবিংশতি, চিত্রসেন, জয়ৎসেন এবং রণকর্মে শ্রেষ্ঠ শূর বীর ভগদত্ত—এদের সকলকে, এবং সেখানে উপস্থিত অন্যান্য কৌরবদের, যুদ্ধাভিলাষে সমবেত রাজা-ভূপালদের, আর ধৃতরাষ্ট্রপুত্রের আহ্বানে আগত সৈন্ধব বীরদেরও—আমার পক্ষ থেকে যথাবিধি কুশল-সংবাদ ও প্রণাম জানাবে। তারপর রাজসমাজের মধ্যে পাপকর্মীদের প্রধান দুর্যোধনকে আমার বার্তা শোনাবে। বৈশম্পায়ন বললেন—এইভাবে ধনঞ্জয় সঞ্জয়কে বিদায় দিয়ে অর্থসমৃদ্ধ ও ধর্মসম্মত বাক্য বললেন, যা স্বজনদের আনন্দিত করে এবং ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রদের ভীত করে। অর্জুনের আদেশ পেয়ে সঞ্জয় “তথাস্তु” বলে তা শিরোধার্য করল; পরে অন্যান্য পাণ্ডব ও যশস্বী কেশবের নিকট বিদায় প্রার্থনা করল। পাণ্ডবদের অনুমতি পেয়ে সঞ্জয় তখন যাত্রা করল—মহাত্মা ধৃতরাষ্ট্রের আদেশ পালন করবার জন্য।

Verse 2

सम्प्राप्य हास्तिनपुरं शीघ्रमेव प्रविश्य च । अन्त:पुरं समास्थाय द्वा:स्थं वचनमब्रवीत्‌ २ ।। हस्तिनापुर पहुँचकर उन्होंने शीघ्र ही राजभवनमें प्रवेश किया और अन्तःपुरके निकट जाकर द्वारपालसे कहा--

হাস্তিনাপুরে পৌঁছে তিনি তৎক্ষণাৎ রাজপ্রাসাদে প্রবেশ করলেন এবং অন্তঃপুরের নিকটে গিয়ে দ্বারপালকে কথা বললেন।

Verse 3

आचक्ष्व धृतराष्ट्राय द्वाःस्थ मां समुपागतम्‌ | सकाशात्‌ पाण्दुपुत्राणां संजयं मा चिरं कृथा:,'द्वारपाल! तुम राजा धृतराष्ट्रको मेरे आनेकी सूचना दो और कहो--'पाण्डवोंके पाससे संजय आया है।” विलम्ब न करो

হে দ্বারপাল! ধৃতরাষ্ট্রকে জানাও যে আমি এসেছি; আর বলো—“পাণ্ডুপুত্রদের নিকট থেকে সঞ্জয় এসেছে।” বিলম্ব কোরো না।

Verse 4

जागर्ति चेदभिवदेस्त्वं हि द्वाःस्थ प्रविशेयं विदितो भूमिपस्य । निवेद्यमत्रात्ययिकं हि मे$स्ति द्वाःस्थो5थ श्रुत्वा नृपतिं जगाम,'द्वारपाल! यदि महाराज जागते हों तो तुम उन्हें मेरा प्रणाम कहना। उनकी सूचना मिल जानेपर मैं भीतर प्रवेश करूँगा। मुझे उनसे एक आवश्यक निवेदन करना है।' यह सुनकर द्वारपाल महाराजके पास गया और इस प्रकार बोला

হে দ্বারপাল! যদি মহারাজ জাগ্রত থাকেন তবে তাঁকে আমার প্রণাম জানাবে। ভূমিপতির নিকট আমার আগমনের সংবাদ পৌঁছালে আমি ভিতরে প্রবেশ করব। আমার একটি অতীব জরুরি নিবেদন আছে। এ কথা শুনে দ্বারপাল নৃপতির কাছে গেল।

Verse 5

द्वाःस्थ उवाच संजयो<5थ भूमिपते नमस्ते दिदृक्षया द्वारमुपागतस्ते । प्राप्तो दूत: पाण्डवानां सकाशात्‌ प्रशाधि राजन्‌ किमयं करोतु,द्वारपालने कहा--महाराज! आपको नमस्कार है। पाण्डवोंके पाससे लौटे हुए दूत संजय आपके दर्शनकी इच्छासे द्वारपर खड़े हैं। राजन! आज्ञा दीजिये, ये संजय क्या करें?

দ্বাররক্ষক বলল—হে ভূমিপতি, আপনাকে প্রণাম। পাণ্ডবদের নিকট থেকে ফিরে আসা দূত সঞ্জয় আপনার দর্শন কামনায় দ্বারে উপস্থিত। রাজন, আজ্ঞা দিন—তিনি কী করবেন?

Verse 6

ध्ृतराष्टर उवाच आचक्ष्व मां कुशलिनं कल्पमस्मै प्रवेश्यतां स्वागतं संजयाय । न चाहमेतस्य भवाम्यकल्प: स मे कस्माद्‌ द्वारि तिछेच्च सक्त:,धृतराष्ट्रने कहा--द्वारपाल! संजयका स्वागत है। उसे कहो कि मैं सकुशल हूँ, अतः इस समय उससे भेंट करनेको तैयार हूँ। उसे भीतर ले आओ। उससे मिलनेमें मुझे कभी भी अड़चन नहीं होती। फिर वह दरवाजेपर सटकर क्‍यों खड़ा है?

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—দ্বাররক্ষক, সঞ্জয়কে স্বাগত জানাও। তাকে বলো, আমি কুশলেই আছি এবং এখনই সাক্ষাৎ দিতে প্রস্তুত; তাকে ভিতরে নিয়ে এসো। তার সঙ্গে দেখা করতে আমি কখনও অপ্রস্তুত নই—তবে সে কেন দ্বারে লেগে দাঁড়িয়ে আছে?

Verse 7

वैशम्पायन उवाच ततः प्रविश्यानुमते नृपस्य महद्‌ वेश्म प्राज्ञशूरार्यगुप्तम्‌ । सिंहासनस्थं पार्थिवमाससाद वैचित्रवीर्य प्राउजलि: सूतपुत्र:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इस प्रकार राजाकी आज्ञा पाकर सूतपुत्र संजयने बुद्धिमान, शूरवीर तथा श्रेष्ठ पुरुषोंसे सुरक्षित विशाल राजभवनमें प्रवेश किया और सिंहासनपर बैठे हुए विचित्रवीर्यनन्दन महाराज धृतराष्ट्रके पास जा हाथ जोड़कर कहा

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়, রাজার অনুমতি পেয়ে সূতপুত্র সঞ্জয় জ্ঞানী, বীর ও আর্যজনদের দ্বারা সুরক্ষিত বিশাল রাজপ্রাসাদে প্রবেশ করল। সিংহাসনে উপবিষ্ট বিচিত্রবীর্যবংশীয় ধৃতরাষ্ট্রের নিকট গিয়ে সে করজোড়ে বিনীতভাবে দাঁড়াল।

Verse 8

संजय उवाच संजयो<हं भूमिपते नमस्ते प्राप्तोडस्मि गत्वा नरदेव पाण्डवान्‌ | अभिवाद्य त्वां पाण्डुपुत्रो मनस्वी युधिष्िर: कुशलं चान्वपृच्छत्‌,संजय बोला--भूपाल! आपको नमस्कार है। नरदेव! मैं संजय हूँ और पाण्डवोंके पास जाकर लौटा हूँ। उदारचित्त पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरे आपको प्रणाम करके आपकी कुशल पूछी है

সঞ্জয় বলল—হে ভূপাল, আপনাকে প্রণাম। হে নরদেব, আমি সঞ্জয়; পাণ্ডবদের কাছে গিয়ে এখন ফিরে এসেছি। মহামনা পাণ্ডুপুত্র যুধিষ্ঠির আপনাকে প্রণাম করে আপনার কুশল জিজ্ঞাসা করেছেন।

Verse 9

स ते पुत्रान्‌ पृच्छति प्रीयमाण: कच्चित्‌ पुत्रै: प्रीयसे नप्तृभिश्च । तथा सुदहृद्धिः सचिवैश्व राजन्‌ ये चापि त्वामुपजीवन्ति तैश्व,उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ आपके पुत्रोंका समाचार पूछा है। राजन्‌! आप अपने पुत्रों, नातियों, सुहृदों, मन्त्रियों तथा जो आपके आश्रित रहकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उन सबके साथ आनन्दपूर्वक हैं न?

তিনি আনন্দিত হয়ে আপনার পুত্রদের সংবাদ জানতে চান। রাজন, আপনি কি আপনার পুত্র ও পৌত্রদের সঙ্গে, সুহৃদ ও মন্ত্রীদের সঙ্গে, এবং যারা আপনার আশ্রয়ে জীবিকা নির্বাহ করে তাদের সঙ্গেও—সৌহার্দ্য ও সন্তোষে আছেন?

Verse 10

धृतराष्ट्र रवाच अभिनन्द्य त्वां तात वदामि संजय अजातशत्रुं च सुखेन पार्थम्‌ । कच्चित्‌ स राजा कुशली सपुत्र: सहामात्य: सानुज: कौरवाणाम्‌,धृतराष्ट्रने कहा--तात संजय! मैं तुम्हारा स्वागत करके पूछता हूँ कि कुन्तीनन्दन अजातशत्रु युधिष्ठिर सुखसे हैं न? क्या कौरवोंके राजा युधिष्ठिर अपने पुत्र, मन्त्री तथा छोटे भाइयोंसहित सकुशल हैं?

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—তাত সঞ্জয়, তোমাকে অভ্যর্থনা করে জিজ্ঞাসা করছি: কুন্তীনন্দন অজাতশত্রু পার্থ (যুধিষ্ঠির) কি সুখে আছেন? কৌরবদের সেই রাজা কি পুত্র, মন্ত্রী ও কনিষ্ঠ ভ্রাতাদেরসহ কুশল-মঙ্গল আছেন?

Verse 11

संजय उवाच सहामात्य: कुशली पाण्डुपुत्रो बुभूषते यच्च तेडग्रे55त्मनो5 भूत्‌ । निर्णिक्तर्मार्थकरो मनस्वी बहुश्रुतो दृष्टिमाज्छीलवांश्ष,संजयने कहा--पाए्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर अपने मन्त्रियोंसहित सकुशल हैं और पहले आपके सामने जो उनका राज्य और धन आदि उन्हें प्राप्त था, उसे पुनः वापस लेना चाहते हैं। वे विशुद्धभावसे धर्म और अर्थका सेवन करनेवाले, मनस्वी, विद्वान, दूरदर्शी और शीलवान हैं

সঞ্জয় বললেন—পাণ্ডুপুত্র যুধিষ্ঠির মন্ত্রীদেরসহ কুশল আছেন। আপনার সম্মুখে যা একদা তাঁর ছিল—রাজ্য ও ধন—তা তিনি পুনরুদ্ধার করতে চান। তিনি অন্তরে নির্মল; ধর্ম ও ন্যায়সঙ্গত অর্থের পথে চলেন; মহৎচিত্ত, বহুশ্রুত, দূরদর্শী ও শীলবান।

Verse 12

परो धर्मात्‌ पाण्डवस्यानृशंस्यं धर्म: परो वित्तचयान्मतो<स्य । सुखप्रिये धर्महीने5नपार्थे5- नुरुध्यते भारत तस्य बुद्धि:,भारत! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी दृष्टिमें अन्य धर्मोकी अपेक्षा दया ही परम धर्म है। वे धनसंग्रहकी अपेक्षा धर्मपालनको ही श्रेष्ठ मानते हैं। उनकी बुद्धि धर्मविहीन एवं निष्प्रयोजन सुख तथा प्रिय वस्तुओंका अनुसरण नहीं करती है

হে ভারত, পাণ্ডব যুধিষ্ঠিরের কাছে করুণা ও অহিংসাই অন্য সব ধর্মেরও ঊর্ধ্বে। ধনসঞ্চয়ের চেয়ে তিনি ধর্মাচরণকে শ্রেষ্ঠ মনে করেন। ধর্মহীন ও উদ্দেশ্যহীন সুখ এবং প্রিয় বস্তুগুলির পেছনে তাঁর বুদ্ধি ধাবিত হয় না।

Verse 13

परप्रयुक्त: पुरुषो विचेष्टते सूत्रप्रोता दारुमयीव योषा । इमं दृष्टवा नियमं पाण्डवस्य मन्ये परं कर्म दैवं मनुष्यात्‌,महाराज! सूतमें बँधी हुई कठपुतली जिस प्रकार दूसरोंसे प्रेरित होकर ही नृत्य करती है, उसी प्रकार मनुष्य परमात्माकी प्रेरणासे ही प्रत्येक कार्यके लिये चेष्टा करता है। पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके इस कष्टको देखकर मैं यह मानने लगा हूँ कि मनुष्यके पुरुषार्थकी अपेक्षा दैव (ईश्वरीय) विधान ही बलवान है

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ, যেমন সুতোয় বাঁধা কাঠের পুতুল অন্যের টানে নড়ে ও নাচে, তেমনি মানুষও অপরের প্রেরণায়ই কর্মে প্রবৃত্ত হয়। পাণ্ডব যুধিষ্ঠিরের উপর এই কঠোর নিয়তি-বন্ধন দেখে আমার মনে হয়, মানব-পুরুষার্থের চেয়ে দৈব-বিধানই অধিক বলবান।

Verse 14

इमं च दृष्टवा तव कर्मदोषं पापोदर्क घोरमवर्णरूपम्‌ | यावत्‌ पर: कामयते5तिवेलं तावन्नरोडयं लभते प्रशंसाम्‌,आपका कर्मदोष अत्यन्त भयंकर, अवर्णनीय तथा भविष्यमें पाप एवं दुःखकी प्राप्ति करानेवाला है। इसे भी देखकर मैं इसी निश्चयपर पहुँचा हूँ कि परमात्माका विधान ही प्रधान है। जबतक विधाता चाहता है, तभीतक यह मनुष्य सीमित समयतक ही प्रशंसा पाता है

সঞ্জয় বললেন—আপনার আচরণের এই দোষও আমি দেখছি—অতিশয় ভয়ংকর, ভাষায় অতিক্রম্য, এবং ভবিষ্যতে পাপ ও দুঃখের তিক্ত ফলদায়ী। এটিও দেখে আমি এই সিদ্ধান্তে পৌঁছেছি যে পরম বিধাতার বিধানই নির্ণায়ক। যতক্ষণ নিয়ন্তা চান, ততক্ষণই মানুষ প্রশংসা লাভ করে—তাও সীমিত সময়ের জন্য।

Verse 15

अजातगशशभत्रुस्तु विहाय पाप॑ं जीर्णा त्वचं सर्प इवासमर्थाम्‌ । विरोचतेडहार्यवृत्तेन वीरो युधिष्ठिरस्त्वयि पापं विसृज्य,जैसे सर्प पुरानी केंचुलको, जो शरीरमें ठहर नहीं सकती, उतारकर चमक उठता है, उसी प्रकार अजातशत्रु वीर युधिष्ठिर पापका परित्याग करके और उस पापको आपपर ही छोड़कर अपने स्वाभाविक सदाचारसे सुशोभित हो रहे हैं

সঞ্জয় বললেন—যেমন সাপ দেহে আর লেগে না থাকা জীর্ণ খোলস ঝেড়ে ফেলে দীপ্ত হয়ে ওঠে, তেমনই অজাতশত্রু বীর যুধিষ্ঠির পাপ ত্যাগ করে, সেই পাপের ভার তোমার উপর ন্যস্ত করে, নিজের স্বাভাবিক সদাচারে উজ্জ্বল হয়ে উঠেছেন।

Verse 16

हन्तात्मन: कर्म निबोध राजन्‌ धर्मार्थयुक्तादार्यवृत्तादपेतम्‌ । उपक्रोशं चेह गतो5सि राजन्‌ भूयश्व पापं प्रसजेदमुत्र,महाराज! जरा आप अपने कर्मपर तो ध्यान दीजिये। धर्म और अर्थसे युक्त जो श्रेष्ठ पुरुषोंका व्यवहार है, आपका बर्ताव उससे सर्वथा विपरीत है। राजन! इसीके कारण इस लोकमें आपकी निन्दा हो रही है और पुनः: परलोकमें भी आपको पापमय नरकका दुःख भोगना पड़ेगा

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, নিজের কর্মের দিকে দৃষ্টি দাও। ধর্ম ও অর্থে সংযত আর্যজনের আচরণ থেকে তোমার ব্যবহার সম্পূর্ণ বিচ্যুত। এই কারণেই এ লোকেতে তুমি নিন্দিত হচ্ছ; আর হে মহারাজ, পরলোকে পাপ আবার তোমাকে গ্রাস করবে—নরকসম দুঃখ ভোগ করতে হবে।

Verse 17

स त्वमर्थ संशयितं विना तै- राशंससे पुत्रवशानुगो5स्य । अधर्मशब्दश्न महान्‌ पृथिव्यां नेदं कर्म त्वत्समं भारताग्रय,भरतवंशशिरोमणे! आप इस समय अपने पुत्रोंके वशमें होकर पाण्डवोंको अलग करके अकेले उनकी सारी सम्पत्ति ले लेना चाहते हैं; पहले तो इसकी सफलतामें ही संदेह है। (और यदि आप सफल हो भी जाय॑ँ तो) इस भूमण्डलमें इस अधर्मके कारण आपकी बड़ी भारी निन्‍्दा होगी। अतः यह कार्य कदापि आपके योग्य नहीं है

সঞ্জয় বললেন—পুত্রদের বশে পড়ে তুমি পাণ্ডবদের পৃথক করে তাদের সমগ্র সম্পদ একাই গ্রাস করতে চাও, অথচ এমন কৌশলের সাফল্যই সন্দেহজনক। আর সফল হলেও, এই অধর্মের জন্য পৃথিবীজুড়ে ‘অধর্ম’ ধ্বনি উঠবে এবং তোমার ঘোর অপযশ হবে। হে ভরতশ্রেষ্ঠ, এ কর্ম তোমার যোগ্য নয়।

Verse 18

हीनप्रज्ञो दौष्कुलेयो नृशंसो दीर्घ वैरी क्षत्रविद्यास्वधीर: । एवंधर्मानापद: संश्रयेयु- हीनवीरयों यश्न भवेदशिष्ट:,जो लोग बुद्धिहीन, नीच कुलमें उत्पन्न, क्रूर, दीर्घकालतक वैरभाव बनाये रखनेवाले, क्षत्रियोचित युद्धविद्यामें अनभिज्ञ, पराक्रमहीन और अशिष्ट होते हैं, ऐसे ही स्वभावके लोगोंपर आपत्तियाँ आती हैं

যারা বুদ্ধিহীন, নীচ কুলজাত, নিষ্ঠুর, দীর্ঘকাল বৈরভাব পোষণকারী, ক্ষত্রিয়োচিত যুদ্ধবিদ্যায় অদক্ষ, পরাক্রমহীন ও অশিষ্ট—বিপদ-আপদ এমন স্বভাবের লোকদেরই আশ্রয় করে।

Verse 19

कुले जातो बलवान्‌ यो यशस्वी बहुश्ुतः सुखजीवी यतात्मा । धर्माधर्मो ग्रथितौ यो बिभर्ति स हास्य दिष्टस्य वशादुपैति,जो कुलीन, बलवान, यशस्वी, बहुज्ञ विद्वान, सुखजीवी और मनको वशमें रखनेवाला है तथा जो परस्पर गुँथे हुए धर्म और अधर्मको धारण करता है, वही भाग्यवश अभीष्ट गुण- सम्पत्ति प्राप्त करता है

যে কুলীন, বলবান, যশস্বী, বহুশ্রুত পণ্ডিত, সুখে জীবনযাপনকারী ও সংযতচিত্ত; এবং যে নিজের মধ্যে গাঁথা ধর্ম-অধর্ম—উভয়ই বহন করে—সে-ই ভাগ্যের বশে অভীষ্ট গুণ ও সম্পদ লাভ করে।

Verse 20

कथं हि मन्त्राग्रयधरो मनीषी धर्मार्थयोरापदि सम्प्रणेता । एवं युक्त: सर्वमन्त्रैरहीनो नरो नृशंसं कर्म कुर्यादमूढ:,आप श्रेष्ठ मन्त्रियोंका सेवन करनेवाले हैं, स्वयं भी बुद्धिमान्‌ हैं, आपत्तिकालमें धर्म और अर्थका उचित-रूपसे प्रयोग करते हैं, सब प्रकारकी अच्छी सलाहोंसे भी आप युक्त हैं। फिर आप-जैसे साधनसम्पन्न दिद्वान्‌ पुरुष ऐसा क्रूरतापूर्ण कार्य कैसे कर सकते हैं?

সঞ্জয় বললেন—যে ব্যক্তি শ্রেষ্ঠ পরামর্শ ধারণ করে, প্রজ্ঞাবান, এবং সংকটকালে ধর্ম ও অর্থনীতির যথাযথ পথপ্রদর্শক; যে কোনো শুভ উপদেশে অপূর্ণ নয়—সে অবিবেচক নয়, তবু কীভাবে নিষ্ঠুর কর্ম করতে পারে?

Verse 21

तव हामी मन्त्रविद: समेत्य समासते कर्मसु नित्ययुक्ता: । तेषामयं बलवान निश्चय श्र कुरुक्षये नियमेनोदपादि,सदा कर्मोामें नियुक्त किये हुए ये आपके मन्त्रवेत्ता मन्‍्त्री कर्ण आदि एकत्र होकर बैठक किया करते हैं। इन्होंने (पाण्डवोंको राज्य न देनेका) जो प्रबल निश्चय कर लिया है, यह अवश्य ही कौरवोंके भावी विनाशका कारण बन गया है

সঞ্জয় বললেন—আপনার নীতিজ্ঞ পরামর্শকেরা সর্বদা রাষ্ট্রকার্যে প্রস্তুত থেকে একত্র হয়ে সভায় বসেন। কিন্তু পাণ্ডবদের প্রতি ন্যায় না করার যে দৃঢ় সংকল্প তারা করেছে, সেটিই কুরুদের দেশে কৌরবদের অনিবার্য বিনাশের কারণ হয়ে উঠেছে।

Verse 22

अकालिकं कुरवो नाभविष्यन्‌ पापेन चेत्‌ पापमजातशत्रु: । इच्छेज्जातु त्वयि पापं विसृज्य निन्दा चेयं तव लोके5भविष्यत्‌,राजन्‌! यदि अजातशत्रु युधिष्ठिर (आपको ही दोषी ठहराकर) आपपर ही सारे पापों (दोषों)-का भार डालकर (आपकी ही भाँति) पापके बदले पाप करनेकी इच्छा कर लें तो सारे कौरव असमयमें ही नष्ट हो जायँ और संसारमें केवल आपकी निन्दा फैल जाय

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন! যদি অজাতশত্রু যুধিষ্ঠির কখনও সংযম ত্যাগ করে, আপনার ওপরই দোষ আরোপ করে, পাপের বদলে পাপ করতে উদ্যত হন, তবে কৌরবরা অকালেই বিনষ্ট হবে; আর জগতে নিন্দা কেবল আপনার নামেই ছড়াবে।

Verse 23

किमन्यत्र विषयादीश्वराणां यत्र पार्थ: परलोकं सम द्रष्टम्‌ । अत्यक्रामत्‌ स तथा सम्मतः स्या- न्न संशयो नास्ति मनुष्यकार:,ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो लोकपालोंके अधिकार-से बाहर हो? तभी तो अर्जुन (इन्द्रकील पर्वतपर लोकपालोंसे मिलकर एवं उनसे अस्त्र प्राप्त करके भू और भुवर्लोकको लाँघकर) स्वर्गलोकको देखनेके लिये गये थे। इस प्रकार लोकपालोंद्वारा सम्मानित होनेपर भी यदि उन्हें कष्ट भोगना पड़ता है तो निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि दैवबलके सामने मनुष्यका पुरुषार्थ कुछ भी नहीं है

সঞ্জয় বললেন—লোকপালদের অধিকারসীমার বাইরে আর কী আছে? তাদেরই পরিসরে পার্থ অর্জুন একদা ভূ ও ভুবর্লোক অতিক্রম করে স্বর্গলোক দর্শনে গিয়েছিলেন। তবু লোকপালদের দ্বারা সম্মানিত হয়েও যদি তাঁর দুঃখ ভোগ করতে হয়, তবে নিঃসন্দেহে বলা যায়—দৈবের সামনে মানবপ্রয়াস ক্ষুদ্র।

Verse 24

एतान्‌ गुणान्‌ कर्मकृतानवेक्ष्य भावाभावी वर्तमानावनित्यौ । बलिह्ि राजा पारमविन्दमानो नान्यत्‌ कालात्‌ कारणं तत्र मेने,ये शौर्य, विद्या आदि गुण अपने पूर्वकर्मके अनुसार ही प्राप्त होते हैं और प्राणियोंकी वर्तमान उन्नति तथा अवनति भी अनित्य हैं। यह सब सोचकर राजा बलिने जब इसका पार नहीं पाया, तब यही निश्चय किया कि इस विषयमें काल (दैव)-के सिवा और कोई कारण नहीं है

সঞ্জয় বললেন—শৌর্য, বিদ্যা প্রভৃতি গুণ যে পূর্বকর্মের ফল, আর জীবদের বর্তমান উন্নতি ও অবনতি—উভয়ই অনিত্য—এ কথা ভেবে রাজা বলি এর অন্ত পেতে পারলেন না; তখন তিনি স্থির করলেন, এ বিষয়ে কালের (দৈবের) বাইরে আর কোনো কারণ নেই।

Verse 25

चक्षु:श्रोत्रे नासिका त्वक्‌ च जिद्दा ज्ञानस्यैतान्यायतनानि जन्‍्तो: । तानि प्रीतान्येव तृष्णाक्षयान्ते तान्यव्यथो दुःखहीन: प्रणुद्यात्‌,आँख, कान, नाक, त्वचा तथा जिह्ठा--ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ समस्त प्राणियोंके रूप आदि विषयोंके ज्ञानके स्थान (कारण) हैं। तृष्णाका अन्त होनेके पश्चात्‌ ये सदा प्रसन्न ही रहती हैं। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह व्यथा और दु:खसे रहित हो तृष्णाकी निवृत्तिके लिये उन इन्द्रियोंको अपने वशमें करे

সঞ্জয় বললেন—চোখ, কান, নাক, ত্বক ও জিহ্বা—এই পাঁচ ইন্দ্রিয়ই জীবের বিষয়-জ্ঞান লাভের আসন। তৃষ্ণা ক্ষয় হলে এরা স্বভাবতই শান্ত ও প্রসন্ন থাকে। অতএব অন্তরের অস্থিরতা ও দুঃখ থেকে মুক্ত হয়ে তৃষ্ণা-নিবৃত্তির জন্য মানুষকে ইন্দ্রিয়সমূহ সংযত করে বিষয় থেকে ফিরিয়ে আনতে হবে।

Verse 26

न त्वेव मन्ये पुरुषस्य कर्म संवर्तते सुप्रयुक्ते यथावत्‌ । मातुः पितु: कर्मणाभिप्रसूत: संवर्धते विधिवद्‌ भोजनेन,कहते हैं, केवल पुरुषार्थका अच्छे ढंगसे प्रयोग होनेपर भी वह उत्तम फल देनेवाला होता है, जैसे माता-पिताके प्रयत्नसे उत्पन्न हुआ पुत्र विधिपूर्वक भोजनादिद्वारा वृद्धिको प्राप्त होता है; परंतु मैं इस मान्यतापर विश्वास नहीं करता (क्योंकि इस विषयमें दैव ही प्रधान है)

সঞ্জয় বললেন—আমি মনে করি না যে মানুষের চেষ্টা, যতই সঠিকভাবে ও যথাযথভাবে প্রয়োগ করা হোক, একাই অভিপ্রেত ফল এনে দেয়। মাতা-পিতার প্রচেষ্টায় সন্তান জন্মায়, কিন্তু বিধিমতো আহারাদি পুষ্টি পেলে তবেই সে বৃদ্ধি পায়। তেমনি মানব-প্রচেষ্টারও নিয়ন্ত্রণের বাইরে থাকা সহায়ক শর্ত দরকার; এ বিষয়ে ভাগ্যই প্রধান নির্ণায়ক।

Verse 27

प्रियाप्रिये सुखदु:खे च राजन्‌ निन्दाप्रशंसे च भजन्त एव । परस्त्वेनं गर्हयते5पराधे प्रशंसते साधुवृत्तं तमेव,राजन्‌! इस जगतमें प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख, निन्दा-प्रशंसा--ये मनुष्यको प्राप्त होते ही रहते हैं। इसीलिये लोग अपराध करनेपर अपराधीकी निन्दा करते हैं और जिसका बर्ताव उत्तम होता है, उस साधु पुरुषकी ही प्रशंसा करते हैं

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, এই জগতে প্রিয়-অপ্রিয়, সুখ-দুঃখ, নিন্দা-প্রশংসা—এসব মানুষের ভাগ্যে অবধারিতভাবেই এসে পড়ে। তাই অপরাধ করলে লোকেরা অপরাধীকে তিরস্কার করে, আর যার আচরণ মহৎ, সেই সাধুজনকেই প্রশংসা করে, হে রাজন।

Verse 28

स त्वां गहें भारतानां विरोधा- दन्तो नूनं भवितायं प्रजानाम्‌ । नो चेदिदं तव कर्मापराधात्‌ कुरून्‌ दहेत्‌ कृष्णवर्त्मेव कक्षम्‌,अतः आप जो भरतवंशमें विरोध फैलाते हैं, इसके कारण मैं तो आपकी निन्‍्दा करता हूँ: क्योंकि इस कौरव-पाण्डवविरोधसे निश्चय ही समस्त प्रजाओंका विनाश होगा। यदि आप मेरे कथनानुसार कार्य नहीं करेंगे तो आपके अपराधसे अर्जुन समस्त कौरववंशको उसी प्रकार दग्ध कर डालेंगे, जैसे आग घास-फ़ूसके समूहको जला देती है

সঞ্জয় বললেন—ভারতদের মধ্যে বিরোধ ছড়ানোর জন্য আমি নিশ্চয়ই তোমাকে তিরস্কার করি; কারণ এই শত্রুতার ফলেই প্রজাদের সর্বনাশ অবশ্যম্ভাবী। আর তুমি যদি আমার কথামতো না চলো, তবে তোমার কর্মদোষে অর্জুন কুরুদের এমনই দগ্ধ করবে, যেমন অগ্নি কালো পথ ধরে এগিয়ে শুকনো ঘাসের ঝোপকে ভস্ম করে দেয়।

Verse 29

त्वमेवैको जातु पुत्रस्य राजन्‌ वशं गत्वा सर्वलोके नरेन्द्र । कामात्मन: श्लाघनो द्यूतकाले नागा: शमं पश्य विपाकमस्य,राजन्‌! महाराज! समस्त संसारमें एकमात्र आप ही अपने स्वेच्छाचारी पुत्रकी प्रशंसा करते हुए उसके अधीन होकर द्यूतक्रीड़ाके समय जो उसकी प्रशंसा करते थे तथा (राज्यका लोभ छोड़कर) शान्त न हो सके, उसका अब यह भयंकर परिणाम अपनी आँखों देख लीजिये

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, নরেন্দ্র, সমগ্র জগতে একমাত্র তুমিই কামবশ পুত্রের অধীন হয়ে—বিশেষত পাশাখেলার সময়—তার প্রশংসা করেছিলে। তুমি শান্ত হয়ে থামতে পারোনি বলেই, এখন সেই আচরণের ভয়ংকর পরিণাম নিজের চোখে দেখো, হে রাজন।

Verse 30

अनाप्तानां संग्रहात्‌ त्वं नरेन्द्र तथा>5प्तानां निग्रहाच्चैव राजन | भूमिं स्फीतां दुर्बलत्वादनन्ता- मशक्तरस्त्वं रक्षितुं कौरवेय

সঞ্জয় বললেন—হে নরেন্দ্র, যারা সত্যনিষ্ঠ নয় তাদের তুমি কাছে টেনেছ, আর যারা অনুগত ও সক্ষম তাদের তুমি দমন করে দূরে সরিয়েছ। তাই তুমি দুর্বল হয়ে পড়েছ। হে কৌরবকুলজাত, এই বিস্তৃত ও সমৃদ্ধ রাজ্য রক্ষা করার শক্তি এখন তোমার আর নেই।

Verse 31

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्ठिरसंदेशविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,नरेन्द्र! आपने ऐसे लोगों (शकुनि-कर्ण आदि)-को इकट्ठा कर लिया है, जो विश्वासके योग्य नहीं हैं तथा विश्वसनीय पुरुषों (पाण्डवों)-को आपने दण्ड दिया है, अतः कुरुकुलनन्दन! अपनी इस (मानसिक) दुर्बलताके कारण आप अनन्त एवं समृद्धिशालिनी पृथिवीकी रक्षा करनेमें कभी समर्थ नहीं हो सकते ।। अनुज्ञातो रथवेगावधूत: श्रान्तोडभिपदोे शयन नृसिंह । प्रात: श्रोतार: कुरव: सभाया- मजातशकत्रोर्वचनं समेता:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত সঞ্জয়যানপর্বে যুধিষ্ঠিরের বার্তাবিষয়ক একত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল। “হে নরেন্দ্র, শকুনি-কর্ণ প্রভৃতি অবিশ্বাসযোগ্য লোকদের তুমি কাছে টেনেছ, আর বিশ্বাসযোগ্য পাণ্ডবদের তুমি দণ্ড দিয়েছ। অতএব, হে কুরুকুলনন্দন, মনের এই দুর্বলতার কারণে তুমি কখনও এই অনন্ত ও সমৃদ্ধ পৃথিবী রক্ষা করতে সক্ষম হবে না।” অনুমতি পেয়ে দূত রথের বেগে কাঁপতে কাঁপতে ক্লান্ত হয়ে শয়নে গেল। প্রাতে কৌরবরা সভায় সমবেত হয়ে অজাতশত্রু (যুধিষ্ঠির)-এর বচন শুনতে বসল।

Verse 32

नरश्रेष्ठी इस समय रथके वेगसे हिलने-डुलनेके कारण मैं थक गया हूँ, यदि आज्ञा हो तो सोनेके लिये जाऊँ। प्रातःकाल जब सभी कौरव सभामें एकत्र होंगे, उस समय वे अजातशत्रु युधिष्ठिरके वचन सुनेंगे ।। धृतराष्ट उवाच अनुज्ञातो<स्यावसथं परेहि प्रपद्यस्व शयनं सूतपुत्र । प्रात: श्रोतार: कुरव: सभाया- मजातकशत्रोर्वचनं त्वयोक्तम्‌,धृतराष्ट्रने कहा--सूतपुत्र! मैं आज्ञा देता हूँ, तुम अपने घर जाओ और शयन करो। सबेरे सब कौरव सभामें एकत्र हो तुम्हारे मुखसे अजातशत्रु युधिष्ठिरके संदेशको सुनेंगे इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि धृतराष्ट्रसंजयसंवादे द्वात्रिंशोड्थ्याय: इस प्रकार श्रीमह्ााभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें धृतराष्रसंजयसंवादविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—“হে সূতপুত্র, তোমার অনুমতি রইল; তুমি নিজের আবাসে যাও এবং বিশ্রাম নাও। প্রাতে কৌরবরা সভায় সমবেত হলে, তারা তোমার মুখে অজাতশত্রু যুধিষ্ঠিরের বার্তা শুনবে।”

Frequently Asked Questions

Whether to pursue maximal retribution for documented injuries or to accept a minimal, dignity-preserving settlement to prevent wider societal harm—balancing justice claims with responsibility for collective stability.

Even under the notion of a cosmic disposer shaping circumstances, ethical agency remains operative: one should exhaust respectful negotiation, speak truthfully, and choose proportionate aims aligned with dharma before accepting escalation.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as pragmatic-ethical instruction within the narrative, emphasizing how disciplined speech, protocol, and limited demands operate as dharmic instruments in crisis.