
Droṇa–Vidura–Gāndhārī Counsel in the Royal Assembly (धर्मार्थयुक्ता सभा-उपदेश-प्रकरणम्)
Upa-parva: Sanatsujāta Parva (Court Admonitions and Dharmic Counsel Context)
The chapter presents a sequence of formal admonitions in court. Droṇa, speaking after Bhīṣma’s position, recalls Kuru lineage precedents (Pratīpa, Śaṃtanu, Devavrata/Bhīṣma, and Pāṇḍu) to argue that the polity has historically been sustained by duty-driven restraint and orderly succession. He highlights administrative roles: Dhṛtarāṣṭra enthroned, Vidura serving with disciplined humility, and Bhīṣma overseeing alliance and conflict policy. Droṇa then issues a direct policy recommendation to Duryodhana: grant the Pāṇḍavas half the kingdom, affirming parity in ācārya-affiliation and grounding success in dharma (yato dharmas tato jayaḥ). Vidura responds by confronting Bhīṣma with the urgency of intervention, depicting Duryodhana’s greed as the proximate cause of impending Kuru destruction and urging decisive prevention, including withdrawal from complicity or constraining harmful agency. Finally, Gāndhārī publicly rebukes Duryodhana before assembled rulers and sages, invoking kuladharma and legitimacy: with Bhīṣma, Dhṛtarāṣṭra, and Vidura in place, Duryodhana’s bid for exclusive sovereignty is framed as delusion and a violation of inherited order; she endorses acceptance of Bhīṣma’s and Vidura’s guidance and affirms Yudhiṣṭhira’s rightful governance.
Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को सुनाते हैं कि युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण कौरव-सभा में प्रकट हुए भीष्म के वचनों का वृत्तान्त कहते हैं—कूटनीति, उपदेश और कुल-धर्म की कठोर वाणी से भरी सभा का चित्र खुलता है। → दीर्घ संवाद और बार-बार की गुप्त मन्त्रणा के बाद कृष्ण लौटते हैं; पाण्डव विराट आदि नरेशों को विदा कर संधि-वार्ता के परिणाम जानना चाहते हैं। युधिष्ठिर एक-एक कर पूछते हैं—धृतराष्ट्र, द्रोण, गान्धारी, विदुर और अन्य सभासदों ने दुर्योधन से क्या कहा, और उसने क्या ग्रहण किया। → कृष्ण (वायुदेव-उवाच शैली में) स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने हस्तिनापुर जाकर तथ्य, पथ्य और हित वचन कहे, पर ‘दुर्मति’ दुर्योधन ने उन्हें नहीं माना; भीष्म की चेतावनी—‘वृद्धों की बात सुनो, शंका मत करो, नहीं तो स्वयं और पृथ्वी दोनों का नाश करोगे’—सभा के ऊपर वज्र की तरह गिरती है। → कृष्ण का निष्कर्ष स्थिर होता है: कौरव-सभा में नीति-वचन कहे गए, पर दुर्योधन का हठ नहीं टूटा; पाण्डवों के लिए शान्ति का द्वार संकुचित और युद्ध का मार्ग प्रशस्त दिखता है। → युधिष्ठिर की अगली जिज्ञासा और पाण्डवों का निर्णय-क्षण निकट है—क्या अंतिम उपाय शेष है, या रण ही धर्म-निर्णय बनेगा?
Verse 1
ऑपन--माज छा अप ऋाज-ज सप्तचत्वारिशर्दाधिकशततमोब« ध्याय: युधिष्ठटिरके पूछनेपर श्रीकृष्णका कौरवसभामें व्यक्त किये हुए भीष्मजीके वचन सुनाना वैशम्पायन उवाच आगम्य हास्तिनपुरादुपप्लव्यमरिंदम: । पाण्डवानां यथावृत्तं केशव: सर्वमुक्तवान्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शत्रुओंका दमन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने हस्तिनापुरसे उपप्लव्यमें आकर पाण्डवोंसे वहाँका सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों कह सुनाया
বৈশম্পায়ন বললেন— জনমেজয়! শত্রুদমনকারী কেশব শ্রীকৃষ্ণ হস্তিনাপুর থেকে উপপ্লব্যে এসে সেখানে যা ঘটেছিল, ঠিক যেমন ঘটেছিল তেমনই সমস্ত বিবরণ পাণ্ডবদের জানালেন।
Verse 2
सम्भाष्य सुचिरं काल मन्त्रयित्वा पुन: पुन: । स्वमेव भवन शौरिविंश्रामार्थ जगाम ह,दीर्घकालतक बातचीत करके बारंबार गुप्त मन्त्रणा करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण विश्रामके लिये अपने वासस्थानको गये
দীর্ঘক্ষণ কথোপকথন করে এবং বারবার গোপন পরামর্শ করে শৌরি শ্রীকৃষ্ণ বিশ্রামের জন্য নিজের বাসস্থানে ফিরে গেলেন।
Verse 3
विसृज्य सर्वान् नृपतीन् विराटप्रमुखांस्तदा । पाण्डवा भ्रातर: पञ्च भानावस्तं गते सति
তখন বিরাট প্রমুখ সকল রাজাকে বিদায় দিয়ে, সূর্য অস্ত গেলে পাঁচ পাণ্ডব ভ্রাতা সেখান থেকে অগ্রসর হলেন।
Verse 4
संध्यामुपास्य ध्यायन्तस्तमेव गतमानसा: । आनाय्य कृष्णं दाशाहईं पुनर्मन्त्रममन्त्रयन्
সন্ধ্যা-উপাসনা সম্পন্ন করে, মনকে একমাত্র তাঁরই মধ্যে স্থির রেখে ধ্যান করতে করতে, তাঁরা দাশার্হবংশীয় শ্রীকৃষ্ণকে ডেকে আনলেন এবং পুনরায় তাঁর সঙ্গে গোপন পরামর্শ করলেন।
Verse 5
तदनन्तर सूर्यास्त होनेपर पाँचों भाई पाण्डव विराट आदि सब राजाओंको विदा करके संध्योपासना करनेके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णमें ही मन लगाकर कुछ कालतक उन्हींका ध्यान करते रहे। फिर दशार्हकुलभूषण श्रीकृष्णको बुलाकर वे उनके साथ गुप्त मन्त्रणा करने लगे ।। युधिछिर उवाच त्वया नागपुरं गत्वा सभायां धृतराष्ट्रज: । किमुक्त: पुण्डरीकाक्ष तन्नः शंसितुमहसि,युधिष्ठिर बोले--कमलनयन! आपने हस्तिनापुर जाकर कौरवसभामें धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे क्या कहा, यह हमें बतानेकी कृपा करें
যুধিষ্ঠির বললেন— হে পদ্মনয়ন! আপনি নাগপুর (হস্তিনাপুর) গিয়ে সভায় ধৃতরাষ্ট্রপুত্র (দুর্যোধন)-কে কী বলেছিলেন? অনুগ্রহ করে তা আমাদের বলুন।
Verse 6
वायुदेव उवाच मया नागपुरं गत्वा सभायां धृतराष्ट्रज: | तथ्यं पथ्यं हितं चोक्तो न च गृह्नाति दुर्मति:,भगवान् श्रीकृष्णने कहा--राजन्! मैंने हस्तिनापुर जाकर कौरवसभामें धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनसे यथार्थ लाभदायक और हितकर बात कही थी; परंतु वह दुर्बुद्धि उसे स्वीकार ही नहीं करता था
বায়ুদেব বললেন—আমি নাগপুর (হস্তিনাপুর) গিয়ে রাজসভায় ধৃতরাষ্ট্রপুত্রকে সত্য, পাথ্য ও হিতকর কথা বলেছিলাম; কিন্তু সেই দুর্মতি তা গ্রহণ করল না।
Verse 7
युधिष्टिर उवाच तस्मिन्नुत्पथमापन्ने कुरुवृद्धः पितामह: । किमुक्तवान् हृषीकेश दुर्योधनममर्षणम्,युधिष्ठिरने पूछा--हृषीकेश! दुर्योधनके कुमार्गका आश्रय लेनेपर कुरुकुलके वृद्ध पुरुष पितामह भीष्मने ईर्ष्या और अमर्षमें भरे हुए दुर्योधनसे क्या कहा?
যুধিষ্ঠির বললেন—হে হৃষীকেশ! দুঃশাসন-সহ দুর্যোধন যখন কুপথে প্রবৃত্ত হল, তখন কুরুদের বৃদ্ধ পিতামহ ভীষ্ম সেই ঈর্ষাপরায়ণ, অসহিষ্ণু দুর্যোধনকে কী বলেছিলেন?
Verse 8
आचार्यो वा महाभाग भारद्वाज: किमब्रवीत् । पिता वा धृतराष्ट्रस्तं गान्धारी वा किमब्रवीत्,महाभाग! भरद्वाजनन्दन आचार्य द्रोणने उस समय क्या कहा? पिता धृतराष्ट्र और माता गान्धारीने भी दुर्योधनसे उस समय क्या बात कही?
যুধিষ্ঠির বললেন—হে মহাভাগ! ভরদ্বাজনন্দন আচার্য দ্রোণ তখন কী বলেছিলেন? আর তার পিতা ধৃতরাষ্ট্র কিংবা মাতা গান্ধারী সে সময় তাকে কী বলেছিলেন—আমাকে বলুন।
Verse 9
पिता यवीयानस्माकं क्षत्ता धर्मविदां वर: । पुत्रशोकाभिसंतप्त: किमाह धृतराष्ट्रजम्
যুধিষ্ঠির বললেন—আমাদের পিতার কনিষ্ঠ ভ্রাতা, ক্ষত্তা বিদুর—ধর্মজ্ঞদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—পুত্রশোকে দগ্ধ হয়ে ধৃতরাষ্ট্রপুত্রকে কী বলেছিলেন?
Verse 10
हमारे छोटे चाचा धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ विदुरने भी, जो हम पुत्रोंके शोकसे सदा संतप्त रहते हैं, दुर्योधनसे क्या कहा? ।। कि च सर्वे नृपतय: सभायां ये समासते । उक्तवन्तो यथातत्त्वं तद् ब्रूहि त्वं जनार्दन
আর রাজসভায় যে সকল নৃপতি সমবেত ছিলেন, তাঁরা বিষয়ের সত্য অনুযায়ী যা বলেছিলেন—হে জনার্দন, তা-ই আমাকে বলুন।
Verse 11
जनार्दन! इसके सिवा जो समस्त राजालोग सभामें बैठे थे, उन्होंने अपना विचार किस रूपमें प्रकट किया? आप इन सब बातोंको ठीक-ठीक बताइये ।। उतक्तवान् हि भवान् सर्व वचन कुरुमुख्ययो: । धार्तराष्ट्रस्य तेषां हि वचन॑ कुरुसंसदि
যুধিষ্ঠির বললেন— হে জনার্দন! এ ছাড়া সভায় উপবিষ্ট অন্যান্য সকল রাজা কীভাবে তাঁদের মত প্রকাশ করেছিলেন? যা যেমন ঘটেছিল, সবই যথাযথ আমাকে বলুন। আপনি তো কুরুপ্রধানদের সমস্ত বক্তব্য আগেই বলেছেন; এখন কুরুসভায় ধৃতরাষ্ট্র ও তাঁর পক্ষের হয়ে যে কথাগুলি বলা হয়েছিল, সেগুলিও বর্ণনা করুন।
Verse 12
कामलोभाभिभूतस्य मन्दस्य प्राज्ञमानिन: । अप्रियं हृदये महां तन्न तिष्ठति केशव
যুধিষ্ঠির বললেন— হে কেশব! যে ব্যক্তি কাম ও লোভে আচ্ছন্ন, বুদ্ধিতে মন্দ অথচ নিজেকে জ্ঞানী মনে করে—তার হৃদয়ে কোনো মহান, অপ্রিয় সত্য স্থির হয়ে থাকে না।
Verse 13
कृष्ण! आपने कौरवसभामें निश्चय ही कुरुश्रेष्ठ भीष्म और धृतराष्ट्रके समीप सब बातें कह दी थीं। परंतु आपकी और उनकी उन सब बातोंको मेरे लिये हितकर होनेके कारण अपने लिये अप्रिय मानकर सम्भवत: काम और लोभसे अभिभूत मूर्ख एवं पण्डितमानी दुर्योधन अपने हृदयमें स्थान नहीं देता ।। तेषां वाक्यानि गोविन्द श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो । यथा च नाभिपसद्येत कालस्तात तथा कुरु । भवान् हि नो गति: कृष्ण भवान् नाथो भवान् गुरु:,गोविन्द! मैं उन सबकी कही हुई बातोंको सुनना चाहता हूँ। तात! ऐसा कीजिये, जिससे हमलोगोंका समय व्यर्थ न बीते। श्रीकृष्ण! आप ही हमलोगोंके आश्रय, आप ही रक्षक तथा आप ही गुरु हैं
যুধিষ্ঠির বললেন— হে কৃষ্ণ! কৌরবসভায় কুরুশ্রেষ্ঠ ভীষ্ম ও ধৃতরাষ্ট্রের সম্মুখে আপনি নিশ্চয়ই সমস্ত কথা বলে দিয়েছিলেন। কিন্তু যা আমার মঙ্গলকর, তা নিজের জন্য অপ্রিয় মনে করে—কাম ও লোভে আচ্ছন্ন, মূঢ় হয়েও পণ্ডিতমন্য—দুর্যোধন সম্ভবত সেই কথাগুলিকে হৃদয়ে স্থান দেয় না। গোবিন্দ! আমি তাদের সকলের বলা কথাগুলি শুনতে চাই। প্রিয়জন, এমন ব্যবস্থা করুন যেন আমাদের সময় বৃথা না যায়। হে কৃষ্ণ! আপনিই আমাদের আশ্রয়, আপনিই আমাদের রক্ষক, আপনিই আমাদের গুরু।
Verse 14
वायुदेव उवाच शृणु राजन् यथा वाक्यमुक्तो राजा सुयोधन: । मध्ये कुरूणां राजेन्द्र सभायां तन्निबोध मे,श्रीकृष्ण बोले--राजेन्द्र! मैंने कौरवसभामें राजा दुर्योधनसे जिस प्रकार बातें की हैं, वह बताता हूँ; सुनिये
বায়ুদেব বললেন— হে রাজন! শোনো। কুরুদের মধ্যবর্তী রাজসভায় রাজা সুয়োধনকে যে কথা বলা হয়েছিল, তা যেমন ছিল তেমনই আমি বলছি; আমার কাছ থেকে তা জেনে নাও।
Verse 15
मया विश्राविते वाक््ये जहास धृतराष्ट्रज: । अथ भीष्म: सुसंक्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्,मैंने जब अपनी बात दुर्योधनसे सुनायी, तब वह हँसने लगा। यह देख भीष्मजी अत्यन्त कुपित हो उससे इस प्रकार बोले--
আমি যখন আমার বার্তা শোনালাম, তখন ধৃতরাষ্ট্রের পুত্র হেসে উঠল। তা দেখে ভীষ্ম অত্যন্ত ক্রুদ্ধ হয়ে তাকে এই কথা বললেন—
Verse 16
दुर्योधन निबोधेदं कुलार्थे यद् ब्रवीमि ते । तच्छुत्वा राजशार्दूल स्वकुलस्य हितं कुरु,“दुर्योधन! मैं अपने कुलके हितके लिये तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। नृपश्रेष्ठी उसे सुनकर अपने कुलका हितसाधन करो
দুর্যোধন, বুঝে নাও—কুলের মঙ্গলের জন্যই আমি তোমাকে যা বলছি। রাজশার্দূল, মনোযোগ দিয়ে তা শুনে নিজের বংশের কল্যাণসাধন করো।
Verse 17
मम तात पिता राजन् शान्तनुर्लोकविश्रुत: । तस्याहमेक एवासं पुत्र: पुत्रवतां वर:,“तात! मेरे पिता शान्तनु विश्वविख्यात नरेश थे, जो पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ समझे जाते थे। राजन! मैं उनका इकलौता पुत्र था
হে রাজন, আমার পিতা শান্তনু ছিলেন বিশ্ববিখ্যাত নৃপতি। পুত্রবানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ গণ্য সেই মহারাজের আমি একমাত্র পুত্র ছিলাম।
Verse 18
तस्य बुद्धि: समुत्पन्ना द्वितीय: स्थात् कथं सुतः । एकपुत्रमपुत्रं वै प्रवदन््ति मनीषिण:,“अत: उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि "मेरे दूसरा पुत्र कैसे हो? क्योंकि मनीषी पुरुष एक पुत्रवालेको पुत्रहीन ही बताते हैं
তখন তাঁর মনে ভাব জাগল—“কেমন করে আমার দ্বিতীয় পুত্র হবে? কারণ জ্ঞানীরা বলেন, এক পুত্র থাকাও যেন পুত্রহীনতারই সমান।”
Verse 19
न चोच्छेदं कुलं यायाद् विस्तीर्येच्च कथं यश: । तस्याहमीप्सितं बुद्ध्वा कालीं मातरमावहम्,“किसी प्रकार इस कुलका उच्छेद न हो और इसके यशका सदा विस्तार होता रहे'-- उनकी आन्तरिक इच्छा जानकर मैं कुलकी भलाई और पिताकी प्रसन्नताके लिये राजा न होने और जीवनभर ऊध्वरिता (नैप्ठिक ब्रह्मचारी) रहनेकी दुष्कर प्रतिज्ञा करके माता काली (सत्यवती)-को ले आया। ये सारी बातें तुमको अच्छी तरह ज्ञात हैं। मैं उसी प्रतिज्ञाका पालन करता हुआ सदा प्रसन्नतापूर्वक यहाँ निवास करता हूँ
“এই বংশ যেন বিনষ্ট না হয়, আর এর যশ যেন বিস্তৃত হতে থাকে”—এই অন্তরের কামনা জেনে আমি মাতা কালী (সত্যবতী)-কে এখানে নিয়ে এলাম।
Verse 20
प्रतिज्ञां दुष्करां कृत्वा पितुरर्थे कुलस्य च । अराजा चोध्वरिताश्व यथा सुविदितं तव । प्रतीतो निवसाम्येष प्रतिज्ञामनुपालयन्,“किसी प्रकार इस कुलका उच्छेद न हो और इसके यशका सदा विस्तार होता रहे'-- उनकी आन्तरिक इच्छा जानकर मैं कुलकी भलाई और पिताकी प्रसन्नताके लिये राजा न होने और जीवनभर ऊध्वरिता (नैप्ठिक ब्रह्मचारी) रहनेकी दुष्कर प्रतिज्ञा करके माता काली (सत्यवती)-को ले आया। ये सारी बातें तुमको अच्छी तरह ज्ञात हैं। मैं उसी प्रतिज्ञाका पालन करता हुआ सदा प्रसन्नतापूर्वक यहाँ निवास करता हूँ
পিতা ও কুলের কল্যাণে আমি সেই দুঃসাধ্য প্রতিজ্ঞা করেছিলাম—রাজা হব না এবং ঊর্ধ্বরেতা (আজীবন কঠোর ব্রহ্মচারী) থাকব। যেমন তোমার ভালোই জানা, সেই প্রতিজ্ঞা পালন করে আমি এখানে সন্তুষ্টচিত্তে বাস করি।
Verse 21
“राजन! सत्यवतीके गर्भसे कुरुकुलका भार वहन करनेवाले धर्मात्मा महाबाहु श्रीमान् विचित्रवीर्य उत्पन्न हुए, जो मेरे छोटे भाई थे
বায়ু বললেন—হে রাজন! সত্যবতীর গর্ভ থেকে কুরুবংশের ভার বহনকারী ধর্মাত্মা, মহাবাহু, শ্রীমান্ বিচিত্রবীর্য জন্মেছিলেন; তিনি ছিলেন আমার কনিষ্ঠ ভ্রাতা।
Verse 22
स्वर्याते5हं पितरि तं स्वराज्ये संन्यवेशयम् । विचित्रवीर्य राजानं भृत्यो भूत्वा ह्धश्चर:,'पिताके स्वर्गवासी हो जानेपर मैंने अपने राज्यपर राजा विचित्रवीर्यको ही बिठाया और स्वयं उनका सेवक होकर राज्यसिंहासनसे नीचे खड़ा रहा
পিতা স্বর্গগত হলে আমি আমারই রাজ্যে রাজা বিচিত্রবীর্যকে প্রতিষ্ঠিত করলাম। তারপর তাঁর ভৃত্য হয়ে রাজসিংহাসনের নীচে দাঁড়িয়ে রইলাম, ধর্মের আদেশেই কেবল চললাম।
Verse 23
तस्यां जज्ञे महाबाहु: श्रीमान् कुरुकुलोद्वह: । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कनीयान् मम पार्थिव,तस्याहं सदृशान् दारान् राजेन्द्र समुपाहरम् । जित्वा पार्थिवसड्घातमपि ते बहुश: श्रुतम् 'राजेन्द्र! उनके लिये राजाओंके समूहको जीतकर मैंने योग्य पत्नियाँ ला दीं। यह वृत्तान्त भी तुमने बहुत बार सुना होगा
হে রাজন! তাঁর গর্ভেই জন্মালেন মহাবাহু, শ্রীমান, কুরুবংশের ধারক ধর্মাত্মা বিচিত্রবীর্য—তিনি আমার কনিষ্ঠ। হে রাজেন্দ্র! তাঁর জন্য আমি রাজাদের সমাবেশ জয় করে উপযুক্ত পত্নীদের এনে দিয়েছিলাম; এ কাহিনি তুমি বহুবার শুনেছ।
Verse 24
ततो रामेण समरे द्वन्द्ययुद्धमुपागमम् । स हि रामभयादेभिननागिरैरविप्रवासित:,“तदनन्तर एक समय मैं परशुरामजीके साथ द्वन्धयुद्धके लिये समरभूमिमें उतरा। उन दिनों परशुरामजीके भयसे यहाँके नागरिकोंने राजा विचित्रवीर्यको इस नगरसे दूर हटा दिया था
তারপর আমি রণক্ষেত্রে রাম (পরশুরাম)-এর সঙ্গে দ্বন্দ্বযুদ্ধে প্রবৃত্ত হলাম। কারণ সেই সময় রামের ভয়ে এ নগরের নাগরিকেরা রাজা বিচিত্রবীর্যকে নগর থেকে দূরে সরিয়ে দিয়েছিল—প্রায় নির্বাসিত করেছিল।
Verse 25
दारेष्वप्यतिसक्तश्न यक्ष्माणं समपद्यत | यदा त्वराजके राष्ट्र न ववर्ष सुरेश्वर: । तदाभ्यधावन् मामेव प्रजा: क्षुद्धयपीडिता:,“वे अपनी पत्नियोंमें अधिक आसक्त होनेके कारण राजयक्ष्माके रोगसे पीड़ित हो मृत्युको प्राप्त हो गये। तब बिना राजाके राज्यमें देवराज इन्द्रने वर्षा बंद कर दी, उस दशामें सारी प्रजा क्षुधाके भयसे पीड़ित हो मेरे ही पास दौड़ी आयी”
স্ত্রীসঙ্গের প্রতি অতিরিক্ত আসক্ত হয়ে তিনি রাজযক্ষ্মায় আক্রান্ত হলেন এবং সেই রোগে পীড়িত হয়ে প্রাণ ত্যাগ করলেন। তারপর রাজ্য যখন রাজাহীন হল, তখন দেবরাজ ইন্দ্র বৃষ্টি রোধ করলেন; সেই অবস্থায় ক্ষুধায় কাতর সমস্ত প্রজা আশ্রয়ের জন্য একমাত্র আমার কাছেই ছুটে এল।
Verse 26
प्रजा ऊचु: उपक्षीणा: प्रजा: सर्वा राजा भव भवाय नः । ईती: प्रणुद भद्रं ते शान्तनो: कुलवर्धन,प्रजा बोली--शान्तनुके कुलकी वृद्धि करनेवाले महाराज! आपका कल्याण हो। राज्यकी सारी प्रजा क्षीण होती चली जा रही है। आप हमारे अभ्युदयके लिये राजा होना स्वीकार करें और अनावृष्टि आदि ईतियोंका भय दूर कर दें
প্রজারা বলল—শান্তনুর কুলবর্ধক মহারাজ, আপনার মঙ্গল হোক। সমগ্র প্রজা ক্ষীণ হয়ে যাচ্ছে। আমাদের কল্যাণের জন্য আপনি রাজা হন এবং অনাবৃষ্টি প্রভৃতি উপদ্রব দূর করুন।
Verse 27
पीड्यन्ते ते प्रजा: सर्वा व्याधिभिर्भुशदारुणै: । अल्पावशिष्टा गाड़ेय ता: परित्रातुमहसि,गंगानन्दन! आपकी सारी प्रजा अत्यन्त भयंकर रोगोंसे पीड़ित है। प्रजाओंमेंसे बहुत थोड़े लोग जीवित बचे हैं। अतः आप उन सबकी रक्षा करें
গঙ্গানন্দন গাঙ্গেয়! আপনার সমগ্র প্রজা ভয়ংকর ও কঠোর রোগে পীড়িত। অল্প কয়েকজন মাত্র জীবিত আছে; অতএব আপনি তাদের সকলকে রক্ষা করুন।
Verse 28
व्याधीन् प्रणुद वीर त्वं प्रजा धर्मेण पालय । त्वयि जीवति मा राष्ट्र विनाशमुपगच्छतु,वीर! आप रोगोंको हटावें और धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करें। आपके जीते-जी इस राज्यका विनाश न हो जाय
বীর! তুমি রোগসমূহ দূর করো এবং ধর্মানুসারে প্রজাকে পালন করো। তুমি জীবিত থাকতেই যেন এই রাষ্ট্র বিনাশে না পতিত হয়।
Verse 29
भीष्म उवाच प्रजानां क्रोशतीनां वै नैवाक्षुभ्यत मे मन: । प्रतिज्ञां रक्षमाणस्य सद् वृत्तं स्मरतस्तथा,भीष्म कहते हैं--प्रजाओंकी यह करुण पुकार सुनकर भी प्रतिज्ञाकी रक्षा और सदाचारका स्मरण करके मेरा मन क्षुब्ध नहीं हुआ
ভীষ্ম বললেন—প্রজাদের করুণ আর্তনাদ শুনেও আমার মন একটুও বিচলিত হল না; কারণ আমি প্রতিজ্ঞা রক্ষায় নিবদ্ধ ছিলাম এবং সদাচারের স্মৃতি দৃঢ়ভাবে ধারণ করেছিলাম।
Verse 30
ततः: पौरा महाराज माता काली च मे शुभा | भृत्या: पुरोहिताचार्या ब्राह्मणाश्व बहुश्रुता: । मामूचुर्भशसंतप्ता भव राजेति संततम्,महाराज! तदनन्तर मेरी कल्याणमयी माता सत्यवती, पुरवासी, सेवक, पुरोहित, आचार्य और बहुश्रुत ब्राह्मण अत्यन्त संतप्त हो मुझसे बार-बार कहने लगे--*तुम्हीं राजा होओ, नहीं तो महाराज प्रतीपके द्वारा सुरक्षित राष्ट्र तुम्हारे निकट पहुँचकर नष्ट हो जायगा। अतः महामते! तुम हमारे हितके लिये राजा हो जाओ!
ভীষ্ম বললেন—মহারাজ! তখন নগরবাসী, আমার মঙ্গলময়ী মাতা কালী (সত্যবতী), ভৃত্যবর্গ, পুরোহিত, আচার্য এবং বহু-শ্রুত ব্রাহ্মণগণ গভীর দুঃখে বারবার আমাকে বললেন—“আপনি রাজা হন।”
Verse 31
प्रतीपरक्षितं राष्ट्र त्वां प्राप्प विनशिष्यति । स त्वमस्मद्धितार्थ वै राजा भव महामते,महाराज! तदनन्तर मेरी कल्याणमयी माता सत्यवती, पुरवासी, सेवक, पुरोहित, आचार्य और बहुश्रुत ब्राह्मण अत्यन्त संतप्त हो मुझसे बार-बार कहने लगे--*तुम्हीं राजा होओ, नहीं तो महाराज प्रतीपके द्वारा सुरक्षित राष्ट्र तुम्हारे निकट पहुँचकर नष्ट हो जायगा। अतः महामते! तुम हमारे हितके लिये राजा हो जाओ!
ভীষ্ম বললেন— তুমি যদি রাজ্য গ্রহণ না করো, তবে রাজা প্রতীপের দ্বারা রক্ষিত এই রাষ্ট্র তোমার নিকট এসে বিনষ্ট হবে। অতএব, হে মহামতি, আমাদের কল্যাণের জন্য তুমি রাজা হও, হে মহারাজ।
Verse 32
इत्युक्त: प्राञ्जलिर्भूत्वा दु:खितो भृशमातुर: । तेभ्यो न्यवेदयं तत्र प्रतिज्ञां पितृगौरवात्,उनके ऐसा कहनेपर मैं अत्यन्त आतुर और दु:खी हो गया और मैंने हाथ जोड़कर उन सबसे पिताके महत्त्वकी ओर दृष्टि रखकर की हुई प्रतिज्ञाकें विषयमें निवेदन किया
তাঁরা এ কথা বললে আমি গভীর শোক ও তীব্র ব্যাকুলতায় আচ্ছন্ন হলাম। তখন করজোড়ে দাঁড়িয়ে পিতৃগৌরবের প্রতি শ্রদ্ধাবশত আমি তাদের কাছে আমার গ্রহণ করা প্রতিজ্ঞার কথা নিবেদন করলাম।
Verse 33
ऊर्ध्वरेता हरराजा च कुलस्यार्थे पुन: पुन: । विशेषतस्त्वदर्थ च धुरि मा मां नियोजय,फिर माता सत्यवतीसे कहा--'माँ! मैंने इस कुलकी वृद्धिके लिये और विशेषतः तुम्हें ही यहाँ ले आनेके लिये राजा न होने और नैछ्लिक ब्रह्मचारी रहनेकी बारंबार प्रतिज्ञा की है। अतः तुम इस राज्यका बोझ सँभालनेके लिये मुझे नियुक्त न करो”
ভীষ্ম বললেন— হে রাজন, বংশের কল্যাণের জন্য এবং বিশেষত তোমারই জন্য আমি বারবার প্রতিজ্ঞা করেছি—আমি আজীবন ব্রহ্মচারী থাকব এবং রাজত্ব গ্রহণ করব না। অতএব সিংহাসনের ভার বহনে আমাকে নিয়োজিত কোরো না।
Verse 34
ततोऊहं प्राञ्जलि भूत्वा मातरं सम्प्रसादयम् । नाम्ब शान्तनुना जात: कौरवं वंशमुद्रहन्,अहं प्रेष्पश्न॒ दासश्न॒ तवाद्य सुतवत्सले । राजन! तत्पश्चात् पुन: हाथ जोड़कर माताको प्रसन्न करनेके लिये मैंने विनयपूर्वक कहा --“अम्ब! मैं राजा शान्तनुसे उत्पन्न होकर कौरववंशकी मर्यादाका वहन करता हूँ। अतः अपनी की हुई प्रतिज्ञाको झूठी नहीं कर सकता।” यह बात मैंने बार-बार दुहरायी। इसके बाद फिर कहा--'पुत्रवत्सले! विशेषतः तुम्हारे ही लिये मैंने यह प्रतिज्ञा की थी। मैं तुम्हारा सेवक और दास हूँ (मुझसे वह प्रतिज्ञा तोड़नेके लिये न कहो)”
তখন আমি করজোড়ে মাতাকে প্রসন্ন করতে বিনীতভাবে বললাম— “অম্বে, আমি রাজা শান্তনুর সন্তান; কৌরব বংশের মর্যাদা বহন করি, তাই আমার প্রতিজ্ঞাকে মিথ্যা করতে পারি না।” আমি এ কথা বারবার বললাম। পরে আবার বললাম— “পুত্রবৎসলে, বিশেষত তোমারই জন্য আমি এই প্রতিজ্ঞা করেছিলাম। আজও আমি তোমার সেবক ও দাস; আমাকে তা ভাঙতে বলো না।”
Verse 35
प्रतिज्ञां वितथां कुर्यामिति राजन् पुन: पुनः । विशेषततस्त्वदर्थ च प्रतिज्ञां कृतवानहम्
ভীষ্ম বললেন— হে রাজন, আমি বারবার মনে মনে বলেছি— ‘আমি যেন আমার প্রতিজ্ঞাকে মিথ্যা না করি।’ আর এই প্রতিজ্ঞা আমি বিশেষত তোমারই জন্য গ্রহণ করেছিলাম।
Verse 36
एवं तामनुनीयाहं मातरं जनमेव च,महाराज! इस प्रकार माता तथा अन्य लोगोंको अनुनय-विनयके द्वारा अनुकूल करके माताके सहित मैंने महामुनि व्यासको प्रसन्न करके भाईकी स्ट्रियोंसे पुत्र उत्पन्न करनेके लिये उनसे प्रार्थना की। भरतकुल-भूषण! महर्षिने कृपा की और उन स्त्रियोंसे तीन पुत्र उत्पन्न किये
ভীষ্ম বললেন—মহারাজ! এইভাবে মাতা ও অন্যান্যদের বিনয়ভরে অনুকূল করে, মাতাসহ আমি মহামুনি ব্যাসকে প্রসন্ন করলাম এবং রাজবংশ যাতে লুপ্ত না হয়, সেইজন্য ভ্রাতার পত্নীদের দ্বারা পুত্র উৎপন্ন করতে তাঁর কাছে প্রার্থনা করলাম। ভরতকুল-ভূষণ! মহর্ষি করুণাবশে সম্মতি দিলেন এবং সেই নারীদের গর্ভে তিন পুত্র জন্ম দিলেন।
Verse 37
अयाचं भ्रातृदारेषु तदा व्यासं महामुनिम् | सह मात्रा महाराज प्रसाद्य तमृषिं तदा,महाराज! इस प्रकार माता तथा अन्य लोगोंको अनुनय-विनयके द्वारा अनुकूल करके माताके सहित मैंने महामुनि व्यासको प्रसन्न करके भाईकी स्ट्रियोंसे पुत्र उत्पन्न करनेके लिये उनसे प्रार्थना की। भरतकुल-भूषण! महर्षिने कृपा की और उन स्त्रियोंसे तीन पुत्र उत्पन्न किये
ভীষ্ম বললেন—তখন, মহারাজ! মাতাসহ আমি মহামুনি ব্যাসের কাছে প্রার্থনা করলাম। সেই ঋষিকে প্রসন্ন করে ভ্রাতার পত্নীদের মধ্যে পুত্র উৎপন্ন করার জন্য তাঁকে অনুরোধ করলাম। ভরতবংশ-ভূষণ! মহর্ষি করুণাবশে সেই নারীদের গর্ভে তিন পুত্র জন্ম দিলেন।
Verse 38
अपत्यार्थ महाराज प्रसाद कृतवांश्व सः । त्रीन् स पुत्रानजनयत् तदा भरतसत्तम,महाराज! इस प्रकार माता तथा अन्य लोगोंको अनुनय-विनयके द्वारा अनुकूल करके माताके सहित मैंने महामुनि व्यासको प्रसन्न करके भाईकी स्ट्रियोंसे पुत्र उत्पन्न करनेके लिये उनसे प्रार्थना की। भरतकुल-भूषण! महर्षिने कृपा की और उन स्त्रियोंसे तीन पुत्र उत्पन्न किये
ভীষ্ম বললেন—মহারাজ! সন্তানলাভের জন্য তিনি অনুগ্রহ করলেন। তখন, ভরতশ্রেষ্ঠ! তিনি তিন পুত্র জন্ম দিলেন।
Verse 39
अन्ध: करणहीनत्वान्न वै राजा पिता तव । राजा तु पाण्डुरभवन्महात्मा लोकविश्रुत:,तुम्हारे पिता अंधे थे, अतः नेत्रेन्द्रियसे हीन होनेके कारण राजा न हो सके, तब लोकविख्यात महामना पाण्डु इस देशके राजा हुए
ভীষ্ম বললেন—তোমার পিতা অন্ধ ছিলেন; দৃষ্টিশক্তিহীন হওয়ায় তিনি রাজা হতে পারেননি। তখন লোকবিখ্যাত মহাত্মা পাণ্ডু এই রাজ্যের শাসক হলেন।
Verse 40
स राजा तस्य ते पुत्रा: पितुर्दायाद्यहारिण: । मा तात कल हं कार्षी राज्यस्यार्ध प्रदीयताम्,पाण्डु राजा थे और उनके पुत्र पाण्डव पिताकी सम्पत्तिके उत्तराधिकारी हैं। अतः वत्स दुर्योधन! तुम कलह न करो। आधा राज्य पाण्डवोंको दे दो
ভীষ্ম বললেন—সেই রাজা পাণ্ডু তোমার পিতার ন্যায়সঙ্গত উত্তরাধিকারী ছিলেন, আর তাঁর পুত্র পাণ্ডবরা পিতৃসম্পত্তির বৈধ অধিকারী। অতএব, বৎস দুর্যোধন! কলহ কোরো না; রাজ্যের অর্ধেক তাদেরকে দাও।
Verse 41
मयि जीवति राज्यं कः सम्प्रशासेत् पुमानिह । मावमंस्था वचो महां शममिच्छामि व: सदा,मेरे जीते-जी मेरी इच्छाके विरुद्ध दूसरा कौन पुरुष यहाँ राज्य-शासन कर सकता है? ऐसा समझकर मेरे कथनकी अवहेलना न करो। मैं सदा तुमलोगोंमें शान्ति बनी रहनेकी शुभ कामना करता हूँ
Bhīṣma said: “So long as I am alive, what man here could presume to govern the kingdom against my will? Therefore do not disregard my words. I continually desire that peace and concord be maintained among you.”
Verse 42
न विशेषो<स्ति मे पुत्र त्वयि तेषु च पार्थिव । मतमेतत् _पितुस्तुभ्यं गान्धार्या विदुरस्य च,राजन! मेरे लिये तुममें और पाण्डवोंमें कोई अन्तर नहीं है। तुम्हारे पिताका, गान्धारीका और विदुरका भी यही मत है
Bhishma said: “My son, O king, I make no distinction between you and those Pandavas. This is also the settled view of your father, of Gandhari, and of Vidura.” In the ethical frame of the episode, Bhishma affirms impartial kinship and urges the ruler to recognize that dharma requires equal regard and fairness toward both sides, not favoritism born of attachment.
Verse 43
श्रोतव्यं खलु वृद्धानां नाभिशड्कीर्वचो मम । नाशयिष्यसि मा सर्वमात्मानं पृथिवीं तथा,तुम्हें बड़े-बूढ़ोंकी बातें सुननी चाहिये। मेरी बातपर शंका न करो, नहीं तो तुम सबको, अपनेको और इस भूतलको भी नष्ट कर दोगे
One must indeed listen to the counsel of elders. Do not doubt my words; otherwise you will bring ruin upon everything—upon yourself, upon all around you, and even upon the earth itself.
Verse 147
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि भगवद्धाक्ये सप्तचत्वारिंशदधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें भगवद्वाक्यसम्बन्धी एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Thus, in the Śrī Mahābhārata, within the Udyoga Parva, in the section known as the Bhagavad-yāna Parva, the portion titled “Bhagavad-vākya,” the one-hundred-and-forty-seventh chapter concludes. (This is a colophon marking the end of the chapter rather than a spoken verse.)
Verse 356
अहं प्रेष्पश्न॒ दासश्न॒ तवाद्य सुतवत्सले । राजन! तत्पश्चात् पुन: हाथ जोड़कर माताको प्रसन्न करनेके लिये मैंने विनयपूर्वक कहा --“अम्ब! मैं राजा शान्तनुसे उत्पन्न होकर कौरववंशकी मर्यादाका वहन करता हूँ। अतः अपनी की हुई प्रतिज्ञाको झूठी नहीं कर सकता।” यह बात मैंने बार-बार दुहरायी। इसके बाद फिर कहा--'पुत्रवत्सले! विशेषतः तुम्हारे ही लिये मैंने यह प्रतिज्ञा की थी। मैं तुम्हारा सेवक और दास हूँ (मुझसे वह प्रतिज्ञा तोड़नेके लिये न कहो)”
Bhishma said: “O king, O mother who loves her son, today I am your attendant and your servant.” Then, again with folded hands, I spoke humbly to please my mother: “Mother, I am born of King Shantanu and I bear the honor and discipline of the Kuru line; therefore I cannot make my vowed promise false.” I repeated this again and again. Then I added: “O son-loving mother, it was especially for your sake that I made this vow. I am your servant and your slave—do not ask me to break my pledge.”
The dilemma is whether to preserve dynastic stability through an equitable division of sovereignty (acknowledging rightful claims and precedent) or to pursue exclusive control despite counsel, thereby risking systemic collapse and collective harm.
The chapter teaches that political success is normatively tethered to dharma: leadership must integrate restraint, legitimacy, and counsel, and elders/ministers bear responsibility to intervene when governance choices predictably generate widespread loss.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-level function is archival and argumentative—preserving authoritative counsel (Droṇa, Vidura, Gāndhārī) as a moral record that frames subsequent outcomes as consequences of disregarded guidance.