
उद्योगपर्व — अध्याय १३५: कुन्त्याः कृष्णं प्रति संदेशः (Kuntī’s Message to Kṛṣṇa)
Upa-parva: Kuntī-vākya (Kuntī’s Counsel to Kṛṣṇa) — Udyoga Parva Context Unit
Kuntī addresses Kṛṣṇa, requesting that he convey her words to Arjuna and the Pāṇḍavas. She recalls a divine utterance heard at Arjuna’s birth predicting his Indra-like prowess, victory over assembled Kurus, and restoration of a lost ancestral share, aided by Vāsudeva. She affirms Arjuna’s steadfastness and asks that dharma be allowed to manifest as truth through Kṛṣṇa’s agency. She instructs Kṛṣṇa to remind Arjuna of Bhīma’s constant readiness and unappeased resolve until adversaries are brought to an end. Kuntī also asks Kṛṣṇa to speak to Draupadī—praised for conduct aligned with dharma—while emphasizing that her deepest grief is not exile or lost kingship but the harsh words Draupadī endured in the royal assembly. She requests that Arjuna be urged to stand in Draupadī’s stead and that the prior contempt and insults be recalled as moral evidence. The chapter closes with Vaiśaṃpāyana narrating Kṛṣṇa’s respectful departure, the Kurus’ astonished discussion, and Kṛṣṇa’s swift journey as he confers with Karṇa and proceeds onward.
Chapter Arc: राजनीति के अँधेरे मोड़ पर एक माँ का तेजस्वी हस्तक्षेप—विदुला अपने पुत्र संजय को कायरता और निराशा से उबारने के लिए वाणी को शस्त्र बनाती है: ‘राजा को कभी भयभीत नहीं होना चाहिए।’ → विदुला बताती है कि भयभीत राजा को देखकर राज्य-तंत्र टूटने लगता है—अमात्य अलग हो जाते हैं, बल बिखरता है, कुछ लोग शत्रु की शरण जाते हैं, कुछ साथ छोड़ देते हैं, और जो पहले अपमानित थे वे प्रतिशोध के लिए तत्पर हो उठते हैं। वह संजय को समझाती है कि उन्नति चाहने वाले पुरुष के लिए सही सचिव/सहायक और दृढ़ निश्चय ही रक्षा-कवच हैं। → माँ के ‘वाग्बाण’ संजय के भीतर जड़ता को भेद देते हैं—वह ‘सदश्व इव क्षिप्तः’ (उत्तेजित घोड़े की तरह) उठ खड़ा होता है और विदुला के अनुशासन के अनुसार युद्ध/उद्यम के लिए स्वयं को तैयार करता है। → विदुला संजय के भीतर क्षत्रिय-धर्म का आदर्श रूप जगाती है—तेज, बल, धृति, और ‘अपराजित जेतार’ बनने की आकांक्षा; वह उसे असाधुओं का नियन्ता और धर्मचारियों का गोप्ता बनने का लक्ष्य देती है। अध्याय विदुला-उपदेश की पूर्णता के साथ समाप्त होता है। → अगले प्रसंग की ओर संकेत—इस उपदेश को सुनकर क्षत्राणियों/स्त्रियों में भी वीर-गुणों की प्रशंसा और आदर्श-निर्माण का विस्तार होता है, मानो यह वाणी व्यापक क्षत्रिय-समाज को उद्यत करने वाली हो।
Verse 1
ऑपनआ कराता छा अकाल षट्त्रिशर्दाधिकशततमो< ध्याय: विदुलाके उपदेशसे उसके पुत्रका युद्धके लिये उद्यत होना मातोवाच नैव राज्ञा दर: कार्यो जातु कस्याज्चिदापदि । अथ चेदपि दीर्ण: स्यान्नैव वर्तेत दीर्णवत्,माता बोली--पुत्र! कैसी भी आपत्ति क्यों न आ जाय, राजाको कभी भयभीत होना या घबराना नहीं चाहिये। यदि वह डरा हुआ हो तो भी डरे हुएके समान कोई बर्ताव न करे
মাতা বললেন—পুত্র! যে কোনো বিপদই আসুক, রাজাকে কখনও ভয়ে ভেঙে পড়া উচিত নয়। অন্তরে কাঁপলেও, বাহিরে ভীতের মতো আচরণ করবে না।
Verse 2
दीर्ण हि दृष्टवा राजानं सर्वमेवानुदीर्यते । राष्ट्र बलममात्याश्न पृथक् कुर्वन्ति ते मती:,राजाको भयभीत देखकर उसके पक्षके सभी लोग भयभीत हो जाते हैं। राज्यकी प्रजा, सेना और मन्त्री भी उससे भिन्न विचार रखने लगते हैं
রাজাকে ভেঙে পড়তে দেখে সকলেই আতঙ্কিত হয়। রাজ্যের প্রজা, সেনা এবং মন্ত্রীরাও পৃথক পৃথক মত গড়ে তোলে।
Verse 3
शत्रूनेके प्रपद्यन्ते प्रजहत्यपरे पुनः । अन््ये तु प्रजिहीर्षन्ति ये पुरस्ताद् विमानिता:,उनमेंसे कुछ लोग तो उस राजाके शत्रुओंकी शरणमें चले जाते हैं, दूसरे लोग उसका त्यागमात्र कर देते हैं और कुछ लोग जो पहले राजाद्वारा अपमानित हुए होते हैं, वे उस अवस्थामें उसके ऊपर प्रहार करनेकी भी इच्छा कर लेते हैं
তাদের মধ্যে কেউ শত্রুদের আশ্রয়ে যায়, কেউ আবার তাকে পরিত্যাগ করে। আর যাদের আগে সে অপমান করেছিল, তারা তখন তাকে আঘাত করতে পর্যন্ত উদ্যত হয়।
Verse 4
य एवात्यन्तसुहृदस्त एन॑ पर्युपासते । अशक्तय: स्वस्तिकामा बद्धवत्सा इडा इव,जो लोग अत्यन्त सुहृद होते हैं, वे ही उस संकटके समय उस राजाके पास रह जाते हैं; परंतु वे भी असमर्थ होनेके कारण बाँधे हुए बछड़ेवाली गायोंकी भाँति कुछ कर नहीं पाते, केवल मन-ही-मन उसकी मंगलकामना करते रहते हैं
সেই সংকটকালে কেবল যাঁরা পরম সুহৃদ, তাঁরাই রাজার কাছে থেকে যান; কিন্তু অক্ষম বলে বাঁধা বাছুরওয়ালা গাভীর মতো কিছুই করতে পারেন না—শুধু অন্তরে তাঁর মঙ্গল কামনা করেন।
Verse 5
शोचन्तमनुशोचन्ति पतितानिव बान्धवान् | अपि ते पूजिता: पूर्वमपि ते सुह्ददो मता:,जो विपत्तिकी अवस्थामें शोक करते हुए राजाके साथ-साथ स्वयं भी वैसे ही शोकमग्न हो जाते हैं, मानो उनके कोई सगे भाई-बन्धु विपन्न हो गये हों, क्या ऐसे ही लोगोंको तूने सुहृद् माना है? कया तूने भी पहले ऐसे सुहृदोंका सम्मान किया है?
যাঁরা বিপন্ন রাজাকে দেখে তাঁর সঙ্গে সঙ্গে নিজেরাও শোক করেন—যেন তাঁদেরই আপনজন পতিত হয়েছে—তুমি কি তাঁদেরই সত্য সুহৃদ বলে মেনেছ? আর পূর্বে কি তাঁদের সম্মানও করেছিলে?
Verse 6
ये राष्ट्रमभिमन्यन्ते राज्ञो व्यसनमीयुष: । मा दीदरस्त्वं सुहृदो मा त्वां दीर्ण प्रहासिषु:
রাজা বিপদে পড়তেই যারা রাজ্যের দিকে মন দেয়, তাদের ভয় কোরো না। তোমার সুহৃদদের মনোবল ভেঙে যেতে দিও না, আর দুঃখে ভেঙে পড়ে উপহাসের পাত্র হয়ো না।
Verse 7
जो संकटमें पड़े हुए राजाके राज्यको अपना ही मानकर उसकी तथा राजाकी रक्षाके लिये कृतसंकल्प होते हैं, ऐसे सुह्दोंको तू कभी अपनेसे विलग न कर और वे भी भयभीत अवस्थामें तेरा परित्याग न करें ।। प्रभावं पौरुषं बुद्धिं जिज्ञासन्त्या मया तव । विदधत्या समाश्वासमुक्त तेजोविवृद्धये
তোমার প্রকৃত প্রভাব, পৌরুষ ও বুদ্ধির পরিচয় জানতে চেয়ে, তোমার তেজ ও আত্মবিশ্বাস বৃদ্ধি পায় বলে আমি সান্ত্বনার বাক্য বলেছি। অতএব যে সুহৃদরা সংকটে রাজার রাজ্যকে নিজের বলে জেনে রাজা ও রাজ্য—উভয়ের রক্ষায় দৃঢ়সংকল্প হয়, তাদের থেকে তুমি কখনো বিচ্ছিন্ন হয়ো না; আর ভয় উপস্থিত হলে তারা যেন তোমাকে ত্যাগ না করে।
Verse 8
मैं तेरे प्रभाव, पुरुषार्थ और बुद्धि-बलको जानना चाहती थी, अतः तुझे आश्वासन देते हुए तेरे तेज (उत्साह)-की वृद्धिके लिये मैंने उपर्युक्त बातें कही है ।। यदेतत् संविजानासि यदि सम्यग ब्रवीम्यहम् । कृत्वा सौम्यमिवात्मानं जयायोत्तिष्ठ संजय,संजय! यदि मैं यह सब ठीक कह रही हूँ और यदि तू भी मेरी इन बातोंको ठीक समझ रहा है तो अपने-आपको उमग्र-सा बनाकर विजयके लिये उठ खड़ा हो
সঞ্জয়! যদি তুমি আমার কথার মর্ম সত্যই বুঝে থাকো, আর আমি যদি যথার্থই বলি, তবে মনকে শান্ত ও স্থির করে বিজয়ের জন্য উঠে দাঁড়াও। তোমাকে আশ্বস্ত করতে এবং তোমার উদ্যম বাড়াতে আমি এ কথা বলেছি।
Verse 9
अस्ति न: कोशनिचयो महान् हाविदितस्तव । तमहं वेद नान्यस्तमुपसम्पादयामि ते,अभी हमलोगोंके पास बड़ा भारी खजाना है जिसका तुझे पता नहीं है, उसे मैं ही जानती हूँ, दूसरा नहीं। वह खजाना मैं तुझे सौंपती हूँ
শিশুটি বলল—আমাদের কাছে এক মহাধনভাণ্ডার আছে, যা তোমার অজানা। তা আমি একাই জানি, আর কেউ নয়; সেই ধনভাণ্ডারই আমি আজ তোমার হাতে সমর্পণ করছি।
Verse 10
सन्ति नैकतमा भूय: सुहृदस्तव संजय । सुखदुःखसहा वीर संग्रामादनिवर्तिन:,वीर संजय! अभी तो तेरे सैकड़ों सुहृद् हैं। वे सभी सुख-दुःखको सहन करनेवाले तथा युद्धसे पीछे न हटनेवाले हैं
হে বীর সঞ্জয়! তোমার সুহৃদ কেবল অল্প নয়—অগণিত। তারা সকলেই সুখ-দুঃখ সমভাবে সহ্য করে এবং যুদ্ধে কখনও পিছু হটে না।
Verse 11
तादृशा हि सहाया वै पुरुषस्य बुभूषत: । इष्टं जिहीर्षत: किंचित् सचिवा: शत्रुकर्शन,शत्रुसूदन! जो पुरुष अपनी उन्नति चाहता है और शत्रुके हाथसे अपनी अभीष्ट सम्पत्तिको हर लाना चाहता है, उसके सहायक और मन्त्री पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त सुहृद हुआ करते हैं
হে শত্রুকর্ষণ! যে পুরুষ উন্নতি কামনা করে এবং শত্রুর হাতে হৃত প্রিয় সম্পদ অন্তত কিছু অংশ হলেও পুনরুদ্ধার করতে চায়, তার জন্য পূর্বোক্ত গুণসম্পন্ন সুহৃদ সহায় ও মন্ত্রীই আবশ্যক।
Verse 12
यस्यास्त्वीदृशकं वाक्यं श्र॒ुत्वापि स्वल्पचेतस: । तमस्त्वपागमत् तस्य सुचित्रार्थपदाक्षरम्,(कुन्ती बोली--) श्रीकृष्ण! संजयका हृदय यद्यपि बहुत दुर्बल था तो भी विदुलाका वह विचित्र अर्थ, पद और अक्षरोंसे युक्त वचन सुनकर उसका तमोगुणजनित भय और विषाद भाग गया
(কুন্তী বললেন—) হে শ্রীকৃষ্ণ! সঞ্জয়ের হৃদয় যদিও দুর্বল ছিল, বুদ্ধিও অল্প; তবু বিদুলার সেই বিচিত্র অর্থ, পদ ও অক্ষরে গাঁথা বাক্য শুনে তার অন্তরের তমোগুণজাত ভয় ও বিষাদ দূর হয়ে গেল।
Verse 13
पुत्र बवाच उदके भूरियं धार्या मर्तव्यं प्रवणे मया । यस्य मे भवती नेत्री भविष्यद्धूतिदर्शिनी,पुत्र बोला--माँ! मेरा यह राज्य शत्रुरूपी जलमें डूब गया है, अब मुझे इसका उद्धार करना है, नहीं तो युद्धमें शत्रुओंका सामना करते हुए अपने प्राणोंका विसर्जन कर देना है; जब मुझे भावी वैभवका दर्शन करानेवाली तुझ-जैसी संचालिका प्राप्त है, तब मुझमें ऐसा साहस होना ही चाहिये
পুত্র বলল—মা! আমার এই রাজ্য শত্রুরূপী জলে ডুবে গেছে; এখন আমাকে একে উদ্ধার করতেই হবে, নচেৎ যুদ্ধে শত্রুর সম্মুখে প্রাণ বিসর্জন দিতে হবে। যখন ভবিষ্যৎ ঐশ্বর্যের দিশা দেখানো তোমার মতো নেত্রী আমার আছে, তখন আমার মধ্যে এমন সাহস থাকা উচিতই।
Verse 14
अहं हि वचन त्वत्त: शुश्रूषुरपरापरम् । किंचित् किंचित् प्रतिवर्दस्तूष्णीमासं मुहुर्मुहु:,मैं बराबर तेरी नयी-नयी बातें सुनना चाहता था। इसीलिये बारंबार बीच-बीचमें कुछ- कुछ बोलकर फिर मौन हो जाता था
আমি তোমার একের পর এক নতুন নতুন কথা শুনতে উদ্গ্রীব ছিলাম। তাই মাঝে-মাঝে সামান্য কথা বলে আবার বারবার নীরব হয়ে যেতাম—যাতে তোমার নব উপদেশ অবিরত চলতে পারে।
Verse 15
अतृप्यन्नमृतस्येव कृच्छाल्लब्धस्य बान्धवात् | उद्यच्छाम्येष शत्रूणां नियमाय जयाय च,तेरे ये अमृतके समान वचन बड़ी कठिनाईसे सुननेको मिले थे। उन्हें सुनकर मैं तृप्त नहीं होता था। यह देखो, अब मैं शत्रुओंका दमन और विजयकी प्राप्ति करनेके लिये बन्धु- बान्धवोंके साथ उद्योग कर रहा हूँ
কষ্টসাধ্যভাবে কোনো স্বজনের কাছ থেকে প্রাপ্ত অমৃতের মতো তোমার সেই অমৃতসম বাণী শুনেও আমি তৃপ্ত হতে পারিনি। দেখো—এখন আমি স্বজনদের সঙ্গে উঠে পড়েছি, শত্রুদের সংযত ও দমন করে বিজয় লাভের জন্য।
Verse 16
कुन्त्युवाच सदश्व इव स क्षिप्त: प्रणुन्नो वाक्यसायकै: । तच्चकार तथा सर्व यथावदनुशासनम्,कुन्ती कहती है--श्रीकृष्ण! माताके वाग्बाणोंसे बिधकर और तिरस्कृत होकर चाबुककी मार खाये हुए अच्छे घोड़ेके समान संजयने माताके उस समस्त उपदेशका यथावत््रूपसे पालन किया
কুন্তী বললেন—হে শ্রীকৃষ্ণ! আমার বাক্যরূপ বাণে বিদ্ধ ও তাড়িত হয়ে সে চাবুকের আঘাতে তাড়িত উৎকৃষ্ট অশ্বের মতো কর্মে প্রবৃত্ত হল; এবং আমি যে সমগ্র অনুশাসন দিয়েছিলাম, তা সে যথাযথভাবে পালন করল।
Verse 17
इदमुद्धर्षणं भीम॑ तेजोवर्धनमुत्तमम् । राजानं श्रावयेन्मन्त्री सीदन्तं शत्रुपीडितम्,यह उत्तम उपाख्यान वीरोंके लिये अत्यन्त उत्साह-वर्धक और कायरोंके लिये भयंकर है। यदि कोई राजा शत्रुसे पीड़ित होकर दुःखी एवं हताश हो रहा हो तो मन्त्रीको चाहिये कि उसे यह प्रसंग सुनाये
হে ভীম! এ এক উৎকৃষ্ট উদ্দীপনা—বীর্যবর্ধক শ্রেষ্ঠ উপাখ্যান। শত্রু-পীড়ায় যে রাজা হতাশায় ডুবে যায়, মন্ত্রীর উচিত তাকে এই প্রসঙ্গ শুনিয়ে সাহস জাগানো।
Verse 18
जयो नामेतिहासो<यं श्रोतव्यो विजिगीषुणा । महीं विजययते क्षिप्रं श्रुत्वा शत्रृंक्ष मर्दति,यह जय नामक इतिहास है। विजयकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको इसका श्रवण करना चाहिये। इसे सुनकर युद्धमें जानेवाला राजा शीघ्र ही पृथ्वीपर विजय पाता और शत्रुओंको रौंद डालता है
এটি ‘জয়’ নামে ইতিহাস। বিজয়কামী পুরুষের এ কথা অবশ্যই শোনা উচিত। এটি শুনে যুদ্ধে অগ্রসর রাজা দ্রুত পৃথিবীতে জয় লাভ করে এবং শত্রুদের পদদলিত করে।
Verse 19
इदं पुंसवनं चैव वीराजननमेव च । अभीद्षणं गर्भिणी श्रुत्वा ध्रुवं वीरं प्रजायते,यह आख््यान पुत्रकी प्राप्ति करानेवाला है तथा साधारण पुरुषमें वीरभाव उत्पन्न करनेवाला है। यदि गर्भवती स्त्री इसे बारंबार सुने तो वह निश्चय ही वीर पुत्रको जन्म देती है
এই আখ্যানটি পুংসবন-সংস্কারের ন্যায় পুত্রপ্রাপ্তি ঘটায় এবং সাধারণ পুরুষের মধ্যেও বীরভাব জাগায়। গর্ভবতী নারী যদি এটি বারবার শোনেন, তবে তিনি নিশ্চিতই এক বীর পুত্র প্রসব করবেন।
Verse 20
विद्याशूरं तप:शूरं दानशूरं तपस्विनम् । ब्राह्मयया श्रिया दीप्यमानं साधुवादे च सम्मतम्
পুত্র বলল—তিনি বিদ্যায় বীর, তপস্যায় বীর, দানে বীর—সত্যই এক তপস্বী। ব্রাহ্ম্য শ্রী ও আধ্যাত্মিক দীপ্তিতে তিনি উজ্জ্বল, এবং সাধুজনের প্রশংসা ও সম্মতিতে সর্বত্র স্বীকৃত।
Verse 21
अर्चिष्मन्तं बलोपेतं महाभागं महारथम् | धृतिमन्तमनाधृष्यं जेतारमपराजितम्
পুত্র বলল—তিনি দীপ্তিমান, বলশালী, মহাভাগ্যবান, মহারথী; ধৈর্যশীল ও অদম্য—চিরবিজয়ী, কখনো পরাজিত নন।
Verse 22
नियन्तारमसाधूनां गोप्तारं धर्मचारिणाम् | ईदृशं क्षत्रिया सूते वीर॑ सत्यपराक्रमम्
হে সূত! ক্ষত্রিয়েরা এমনই বীরকে জন্ম দেয়—যে অসাধুদের দমন করে এবং ধর্মাচারীদের রক্ষা করে; যার পরাক্রম সত্যের ভিত্তিতে প্রতিষ্ঠিত।
Verse 135
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें विदुलाको पुत्रका उपदेशविषयक एक सौ पैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে বিদুলার পুত্রকে প্রদত্ত উপদেশ-বিষয়ক একশো পঁয়ত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 136
इसे सुनकर प्रत्येक क्षत्राणी विद्याशूर, तप:शूर, दानशूर, तपस्वी, ब्राह्मी शोभासे सम्पन्न, साधुवादके योग्य, तेजस्वी, बलवान, परम सौभाग्यशाली, महारथी, धैर्यवान्, दुर्धर्ष विजयी, किसीसे भी पराजित न होनेवाले, दुष्टोंका दमन करनेवाले, धर्मात्माओंके रक्षक तथा सत्य- पराक्रमी वीर पुत्रको उत्पन्न करती है ।। इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि विदुलापुत्रानुशासनसमाप्तौ षट्त्रिंयाधिकशततमो<्ध्याय:
এ কথা শুনে প্রত্যেক ক্ষত্রিয় নারী এমন এক বীরপুত্র প্রসব করে—যে বিদ্যায় শূর, তপস্যায় শূর, দানে শূর; সংযমী তপস্বী; ব্রাহ্মী দীপ্তিতে বিভূষিত; সাধুজনের প্রশংসার যোগ্য; তেজস্বী ও বলবান; পরম সৌভাগ্যশালী; মহারথী; ধৈর্যবান; দুর্ধর্ষ বিজয়ী; কারও দ্বারা অপরাজেয়; দুষ্টদমনকারী; ধর্মাত্মাদের রক্ষক; এবং সত্য-পরাক্রমশালী বীর। এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের ভগবদ্যানপর্বে বিদুলার পুত্র-অনুশাসন সমাপ্ত হল; এটি ছত্রিশ অধিক একশো পঁয়ত্রিশতম অধ্যায়।
The chapter weighs endurance of loss (kingdom, exile) against the non-negotiable duty to address public degradation and violated protection norms, presenting redress as an ethical necessity rather than mere retaliation.
Dharma is portrayed as the sustaining principle of society; when dharma is upheld through truthful action and responsible agency, outcomes align with satya—yet this requires disciplined resolve and ethically framed strategy.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-level closure is narrative (Vaiśaṃpāyana’s report of Kṛṣṇa’s departure and ensuing reactions), positioning Kuntī’s counsel as a hinge that legitimizes subsequent strategic movements.