Adhyaya 120
Udyoga ParvaAdhyaya 12032 Verses

Adhyaya 120

ययातिदौहित्रपुण्यसमुच्चयः | Yayāti and the Grandsons’ Consolidation of Merit

Upa-parva: Yayāti–Dauhitra-Dharma Episode (Udyoga Parva context)

Nārada narrates a restorative sequence in which King Yayāti, recognized by virtuous descendants, appears in a transfigured, celestial form—adorned with divine garlands and ornaments and moving without touching the earth. Yayāti (or the narrative focus upon him) becomes the occasion for a structured offering of merits by his grandsons. Vasumanas declares that whatever unblemished attainment he gained among all varṇas, along with the fruits of generosity and forbearance, should be joined to Yayāti. Pratardana contributes fame born of kṣatriya-dharma and the recognized fruit of being called ‘vīra’ through sustained martial commitment paired with dharma. Śibi Auśīnara offers the power of satya, asserting he has never spoken untruth even amid battle, peril, and calamity, and that he would relinquish life, kingdom, and pleasures rather than abandon truth; he links satya to dharma and to divine favor. Aṣṭaka, the Mādhavī-suta, adds sacrificial merit, citing numerous rites (including Puṇḍarīka, Gosava, and Vājapeya) and emphasizing that wealth was not hoarded but utilized in ritual obligations. As each dauhitra speaks, Yayāti progressively relinquishes the earth and ascends to heaven; collectively, the kings’ accumulated sukṛta rescues Yayāti from a fallen heavenly state, explicitly portraying intergenerational dharma as efficacious and transferable within the narrative’s moral economy.

Chapter Arc: गालव-चरित्र के प्रसंग में कथा अचानक स्वर्गलोक की ओर मुड़ती है—राजा ययाति, जो कभी पुण्यबल से देवलोक पहुँचे थे, अब अपने तेज और वैभव के क्षय के संकेतों से घिरते दिखते हैं: मुरझाई दिव्य माला, ढीले आभूषण, और चेतना का डगमगाना। → ययाति का दिव्य रूप क्रमशः म्लान होता जाता है; वे स्वर्गवासियों को देखना चाहते हैं पर अंधकार-सा आवरण उन्हें ढक लेता है। बार-बार ‘देखते हुए भी न देख पाना’ और ‘शून्य मन’ का वर्णन उनके पतन को अनिवार्य बनाता है। स्वर्ग की ऊँचाई से पृथ्वी की ओर गिरते हुए वे भय, लज्जा और आत्मचिंतन के बीच झूलते हैं। → देववाणी-सा आदेश आता है—‘गच्छ, पतस्व’—और ययाति तीन बार उत्तर देते हैं कि वे ‘सत्स्व’ (सज्जनों/धर्म के बीच) गिरना चाहते हैं। यही क्षण उनके पतन को केवल दंड नहीं, बल्कि धर्म-चयन का निर्णायक मोड़ बना देता है: स्वर्ग से गिरना तय है, पर गिरने का स्थान और संगति वे धर्म के अनुसार चुनते हैं। → पृथ्वी और स्वर्ग के बीच धूममयी नदी-सी धारा का बिंब बनता है—मानो आकाशगंगा भूमि की ओर बह रही हो—और ययाति चार लोकपालोपम राजाओं (प्रतर्दन, वसुमना, शिबि-औशीनर, अष्टक) के बीच आ गिरते हैं, जो वाजपेय यज्ञ से देवेश्वर को तृप्त कर रहे हैं। ययाति अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं—न वे प्रतिग्रह-धन ब्राह्मण हैं, न पर-पुण्य-विनाश में उनकी बुद्धि प्रवृत्त है—और संवाद का केंद्र ‘पुण्य का बँटवारा/संतति-धर्म’ बनता है। → चार राजाओं के पुण्य-संचय और ययाति के पतन के बीच प्रश्न खड़ा रहता है—क्या वे अपने पुण्य का अंश देकर ययाति को संभालेंगे, या ययाति को किसी अन्य उपाय (दौहित्र/संतति-सम्बन्ध) से पुनः उन्नति का मार्ग खोजना होगा?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रके प्रयंगमें ययातिमोहविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १२० ॥। अपना छा | क्र एकविशर्त्याधेकशततमो< ध्याय: ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौह्रित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुनः स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना-अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना नारद उवाच अथ प्रचलित: स्थानादासनाच्च परिच्युत: । कम्पितेनेव मनसा धर्षित: शोकवल्लिना,नारदजी कहते हैं--राजन्‌! तत्पश्चात्‌ ययाति अपने सिंहासनसे गिरकर उस स्वर्गीय स्थानसे भी विचलित हो गये। उनका हृदय काँप-सा उठा और शोकाग्नि उन्हें दग्ध करने लगी

নারদ বললেন—তারপর যযাতি স্বর্গীয় স্থান থেকে বিচ্যুত হয়ে এবং সিংহাসন থেকে পতিত হয়ে, আঘাতপ্রাপ্তের ন্যায় কাঁপতে থাকা মনে শোকলতার দ্বারা আচ্ছন্ন হলেন।

Verse 2

म्लानसग्भ्रष्टविज्ञान: प्रभ्रष्टमुकुटाड्रद: । विघूर्णन्‌ स्रस्तसर्वाज्र: प्रभ्रष्टाभरणाम्बर:,उन्होंने जो दिव्य कुसुमोंकी माला पहन रखी थी, वह मुरझा गयी। उनकी ज्ञानशक्ति लुप्त होने लगी। मुकुट और बाजूबन्द शरीरसे अलग हो गये। उन्हें चक्कर आने लगा। उनके सारे अंग शिथिल हो गये और वस्त्र तथा आभूषण भी खिसक-खिसककर गिरने लगे

তাঁর মালা ম্লান হয়ে গেল; বোধবুদ্ধি ক্ষয় হতে লাগল। মুকুট ও বাহুবন্ধ সরে গেল। তিনি ঘূর্ণায়মান হয়ে পড়লেন; সর্বাঙ্গ শিথিল হল, অলংকার ও বস্ত্রও সরে সরে পড়তে লাগল।

Verse 3

अदृश्यमानस्तान्‌ पश्यन्नपश्यंश्न पुनः पुनः । शून्य: शून्येन मनसा प्रपतिष्यन्‌ महीतलम्‌,वे अन्धकारसे आवृत होनेके कारण स्वयं स्वर्गवासियोंको नहीं दिखायी देते थे; परंतु वे उन्हें बार-बार देखते और कभी नहीं भी देख पाते थे। पृथ्वीपर गिरनेसे पहले शून्य-से होकर शून्य हृदयसे राजा यह चिन्ता करने लगे कि मैंने अपने मनसे किस धर्मदूषक अशुभ वस्तुका चिन्तन किया है, जिसके कारण मुझे अपने स्थानसे भ्रष्ट होना पड़ा है

তিনি নিজে অদৃশ্য হয়ে সেই দেবগণকে কখনও দেখতেন, কখনও আবার বারবার দেখতেন না। পৃথিবীতে পতিত হতে উদ্যত হয়ে তিনি শূন্যপ্রায় হলেন; শূন্যচিত্তে তিনি নিম্নে পতিত হতে লাগলেন।

Verse 4

कि मया मनसा ध्यातमशुभं धर्मदूषणम्‌ | येनाहं चलितः स्थानादिति राजा व्यचिन्तयत्‌,वे अन्धकारसे आवृत होनेके कारण स्वयं स्वर्गवासियोंको नहीं दिखायी देते थे; परंतु वे उन्हें बार-बार देखते और कभी नहीं भी देख पाते थे। पृथ्वीपर गिरनेसे पहले शून्य-से होकर शून्य हृदयसे राजा यह चिन्ता करने लगे कि मैंने अपने मनसे किस धर्मदूषक अशुभ वस्तुका चिन्तन किया है, जिसके कारण मुझे अपने स्थानसे भ्रष्ट होना पड़ा है

রাজা চিন্তা করতে লাগলেন—“আমি মনে কোন অশুভ, ধর্মদূষক ভাবনা ধারণ করেছিলাম, যার ফলে আমি আমার স্থান থেকে বিচ্যুত হলাম?”

Verse 5

ते तु तत्रेव राजान: सिद्धा श्चाप्सरसस्तथा । अपश्यन्त निरालम्बं तं ययातिं परिच्युतम्‌,स्वर्गके राजर्षि, सिद्ध और अप्सरा--सभीने स्वर्गसे भ्रष्ट हो अवलम्बशून्य हुए राजा ययातिको देखा

সেখানেই রাজারা, সিদ্ধগণ ও অপ্সরাগণ স্বর্গপদ থেকে চ্যুত, কোনো আশ্রয়হীন রাজা যযাতিকে দেখল।

Verse 6

अथैत्य पुरुष: कश्ित्‌ क्षीणपुण्पनिपातक: । ययातिमब्रवीद्‌ राजन्‌ देवराजस्य शासनात्‌,राजन! इतनेमें ही पुण्यरहित पुरुषोंको स्वर्गसे नीचे गिरानेवाला कोई पुरुष देवराजकी आज्ञासे वहाँ आकर ययातिसे इस प्रकार बोला--

তখন এক সত্তা এল—যার কাজ ক্ষীণপুণ্যদের স্বর্গ থেকে নীচে পতিত করা। দেবরাজের আদেশে সে রাজা যযাতিকে বলল।

Verse 7

अतीव मदमसत्तस्त्वं न कंचिन्नावमन्यसे । मानेन भ्रष्ट: स्वर्गस्ते ना्हस्त्वं पार्थिवात्मज,*राजपुत्र! तुम अत्यन्त मदमत्त हो और कोई भी ऐसा महान पुरुष यहाँ नहीं है, जिसका तुम तिरस्कार न करते हो। इस मानके कारण ही तुम अपने स्थानसे गिर रहे हो। अब तुम यहाँ रहनेके योग्य नहीं हो

রাজপুত্র! তুমি অতিশয় মদোন্মত্ত; এখানে এমন কেউ নেই যাকে তুমি অবজ্ঞা কর না। এই মান-অহংকারেই তোমার স্বর্গপদ ভ্রষ্ট হয়েছে; তুমি আর এখানে থাকার যোগ্য নও।

Verse 8

न च प्रज्ञायसे गच्छ पतस्वेति तमब्रवीत्‌ | पतेयं सत्स्विति वचस्त्रिरुकत्वा नहुषात्मज:

সে বলল—“তুমি বোঝ না; যাও, নীচে পতিত হও।” তখন নহুষপুত্র ‘আমি পড়ব—তাই হোক’ এই বাক্য তিনবার উচ্চারণ করে তা মেনে নিল।

Verse 9

“तुम्हें यहाँ कोई नहीं जानता है; अतः: जाओ, नीचे गिरो।” जब उसने ऐसा कहा, तब नहुषपुत्र ययाति तीन बार ऐसा कहकर नीचे जाने लगे कि मैं सत्पुरुषोंके बीचमें गिर ।। पतिष्यंश्चिन्तयामास गति गतिमतां वर: । एतस्मिन्नेव काले तु नैमिषे पार्थिवर्षभान्‌

পতিত হতে উদ্যত হয়ে, গতিপথের জ্ঞানীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ যযাতি ভাবতে লাগল—তার পতন কোথায় হবে। ঠিক সেই সময়ে নৈমিষারণ্যে শ্রেষ্ঠ রাজারা সমবেত ছিলেন।

Verse 10

प्रतर्दनो वसुमना: शिबिरौशीनरोडष्टक:

নারদ বললেন—“এরা প্রতর্দন, বসুমান, শিবি, ঔশীনর এবং দষ্টক।”

Verse 11

तेषामध्वरजं धूम॑ स्वर्गद्वारमुपस्थितम्‌

নারদ বললেন—“তাদের যজ্ঞ থেকে ওঠা ধোঁয়াই যেন স্বর্গদ্বার হয়ে সামনে উপস্থিত ছিল।”

Verse 12

ययातिरुपजिघ्रन्‌ वै निपपात महीं प्रति । उनके यज्ञका धूम मानो स्वर्गका द्वार बनकर उपस्थित हुआ था। ययाति उसीको सूँघते हुए पृथ्वीकी ओर गिर रहे थे || ११ ह ।। भूमौ स्वर्गे च सम्बद्धां नदीं धूममयीमिव । गड्जां गामिव गच्छन्तीमालम्ब्य जगतीपति:,भूतलसे स्वर्गतक धूममयी नदी-सी प्रवाहित हो रही थी, मानो आकाशगंगा भूमिपर जा रही हों। भूपाल ययाति उसी धूमलेखाका अवलम्बन करके लोकपालोंके समान तेजस्वी तथा अवभृथ स्नानसे पवित्र अपने चारों सम्बन्धियोंके बीचमें गिरे

নারদ বললেন—“রাজা যযাতি যেন তা শুঁকতে শুঁকতে পৃথিবীর দিকে পতিত হলেন। তাঁর যজ্ঞের ধোঁয়া স্বর্গ ও ভূমিকে যুক্ত করা ধোঁয়াময় নদীর মতো—যেন গঙ্গাই লোকধামে অবতীর্ণ হচ্ছে; সেই ধোঁয়ার স্রোত আঁকড়ে ধরেই পৃথিবীপতি নীচে নেমে এলেন।”

Verse 13

श्रीमत्स्ववभृथाग्रयेषु चतुर्षु प्रतिबन्धुषु । मध्ये निपतितो राजा लोकपालोपमेषु स:,भूतलसे स्वर्गतक धूममयी नदी-सी प्रवाहित हो रही थी, मानो आकाशगंगा भूमिपर जा रही हों। भूपाल ययाति उसी धूमलेखाका अवलम्बन करके लोकपालोंके समान तेजस्वी तथा अवभृथ स्नानसे पवित्र अपने चारों सम्बन्धियोंके बीचमें गिरे

নারদ বললেন—“শ্রীময় অবভৃথ-স্নানের শ্রেষ্ঠ আচারসমূহে, লোকপালসম দীপ্তিমান চার নিকট আত্মীয়ের মধ্যে—রাজা তাদের মাঝখানেই পতিত হলেন।”

Verse 14

चतुर्षु हुतकल्पेषु राजसिंहमहाग्निषु । पपात मध्ये राजर्षिययाति: पुण्यसंक्षये,वे चारों श्रेष्ठ राजा उन चार विशाल अग्नियोंके समान तेजस्वी थे, जो हविष्यकी आहुति पाकर प्रज्वलित हो रहे हों। राजर्षि ययाति अपना पुण्य क्षीण होनेपर उन्हींके मध्यभागमें गिरे

চারটি হুতকল্প, রাজসিংহসম মহাগ্নির মধ্যে—পুণ্য ক্ষয় হলে—রাজর্ষি যযাতি মাঝখানে পতিত হলেন।

Verse 15

तमाहु: पार्थिवा: सर्वे दीप्यमानमिव श्रिया । को भवान्‌ कस्य वा बन्धुर्देशस्य नगरस्य वा,अपनी दिव्य कान्तिसे उद्धासित होनेवाले उन महाराजसे सभी भूपालोंने पूछा--“आप कौन हैं? किसके भाई-बन्धु हैं तथा किस देश और नगरमें आपका निवास-स्थान है? आप यक्ष हैं या देवता? गन्धर्व हैं या राक्षस? आपका स्वरूप मनुष्यों-जैसा नहीं है। बताइये, आप कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करना चाहते हैं!

তখন সকল রাজা তাঁকে যেন ঐশ্বর্যে দীপ্তিমান দেখে জিজ্ঞাসা করলেন— “আপনি কে? কার আত্মীয়? কোন দেশ ও কোন নগর থেকে এসেছেন? আপনি কি যক্ষ, না দেবতা, গন্ধর্ব, না রাক্ষস? আপনার রূপ তো মানুষের মতো নয়। বলুন—আপনি কোন উদ্দেশ্য সাধন করতে চান?”

Verse 16

यक्षो वाप्यथवा देवो गन्धर्वो राक्षसो5पि वा । न हि मानुषरूपो5सि को वार्थ: काडुक्ष्यते त्वया,अपनी दिव्य कान्तिसे उद्धासित होनेवाले उन महाराजसे सभी भूपालोंने पूछा--“आप कौन हैं? किसके भाई-बन्धु हैं तथा किस देश और नगरमें आपका निवास-स्थान है? आप यक्ष हैं या देवता? गन्धर्व हैं या राक्षस? आपका स्वरूप मनुष्यों-जैसा नहीं है। बताइये, आप कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करना चाहते हैं!

তাঁরা জিজ্ঞাসা করলেন— “আপনি যক্ষ, না দেবতা, গন্ধর্ব, না রাক্ষস? কারণ আপনি মানব-রূপ নন। বলুন—আপনি কোন উদ্দেশ্য কামনা করেন?”

Verse 17

ययातिरुवाच ययातिरस्मि राजर्षि: क्षीणपुण्यश्ष्युतो दिव: । पतेयं सत्स्विति ध्यायन्‌ भवत्सु पतितस्तत:,ययातिने कहा--मैं राजर्षि ययाति हूँ। अपना पुण्य क्षीण होनेके कारण स्वर्गसे नीचे गिर गया हूँ। गिरते समय मेरे मनमें यह चिन्तन चल रहा था कि मैं सत्पुरुषोंके बीचमें गिरूँ। अतः आपलोगोंके बीचमें आ पड़ा हूँ

যযাতি বললেন— “আমি রাজর্ষি যযাতি। পুণ্য ক্ষয় হওয়ায় স্বর্গ থেকে পতিত হয়েছি। পতনের সময় মনে এই ভাবই ছিল— ‘সজ্জনদের মধ্যেই যেন পতিত হই।’ তাই তোমাদের মাঝেই এসে পড়েছি।”

Verse 18

राजान ऊचु. सत्यमेतद्‌ भवतु ते काडुशक्षितं पुरुषर्षभ । सर्वेषां न: क्रतुफलं धर्मश्न प्रतिगृह्मयताम्‌,वे राजा बोले--पुरुषशिरोमणे! आपका यह मनोरथ सफल हो। आप हम सब लोगोंके यज्ञोंका फल और धर्म ग्रहण करें

রাজারা বললেন— “পুরুষশ্রেষ্ঠ! আপনার কাম্য ইচ্ছা সত্য হোক। আমাদের সকলের যজ্ঞফল এবং ধর্মপুণ্যও গ্রহণ করুন।”

Verse 19

ययातिरुवाच नाहं प्रतिग्रहधनो ब्राह्मण: क्षत्रियो हाहम्‌ | नच मे प्रवणा बुद्धि: परपुण्यविनाशने,ययातिने कहा--प्रतिग्रह ही जिसका धन है, वह ब्राह्मण मैं नहीं हूँ। मैं तो क्षत्रिय हूँ। अतः मेरी बुद्धि पराये पुण्यका (ग्रहण करके उनका पुण्य) क्षय करनेके लिये उद्यत नहीं है

যযাতি বললেন— “আমি প্রতিগ্রহকে ধন মনে করা ব্রাহ্মণ নই; আমি ক্ষত্রিয়। তাই অন্যের পুণ্য গ্রহণ করে তা ক্ষয় করাতে আমার বুদ্ধি প্রবৃত্ত নয়।”

Verse 20

नारद उवाच एतस्मिन्नेव काले तु मृगचर्याक्रमागताम्‌ । माधवीं प्रेक्ष्य राजानस्तेडभिवाद्येदमब्रुवन्‌

নারদ বললেন—ঠিক সেই সময় রাজারা মাধবীকে দেখলেন; তিনি বনভ্রমণ-সম মৃগচর্যা করে ক্রমে সেখানে এসে পৌঁছেছিলেন। তাঁকে প্রণাম করে তারা বিনীতভাবে এই কথা বলল।

Verse 21

किमागमनकृत्यं ते कि कुर्म:ः शासनं तव । आज्ञाप्या हि वयं सर्वे तव पुत्रास्तपोधने

“আপনার আগমনে আমরা কীভাবে অভ্যর্থনা করব? আপনার কোন আদেশ পালন করব? তপোধনে, আমরা সকলেই আপনার পুত্র; আমরা আপনারই নির্দেশাধীন।”

Verse 22

नारदजी कहते हैं--इसी समय उन राजाओंने अपनी माता माधवीको देखा, जो मृगोंकी भाँति उन्हींके साथ विचरती हुई क्रमश: वहाँ आ पहुँची थी। उसे प्रणाम करके राजाओंने इस प्रकार पूछा--'तपोधने! यहाँ आपके पधारनेका क्या प्रयोजन है? हम आपकी किस आज्ञाका पालन करें? हम सभी आपके पुत्र हैं; अतः हमें आप योग्य सेवाके लिये आज्ञा प्रदान करें” ।। तेषां तद्‌ भाषितं श्रुत्वा माधवी परया मुदा । पितरं समुपागच्छद्‌ ययातिं सा ववन्द च,उनकी ये बातें सुनकर माधवीको बड़ी प्रसन्नता हुई। वह अपने पिता ययातिके पास गयी और उसने उन्हें प्रणाम किया

নারদ বললেন—সেই সময় রাজারা তাঁদের মাতা মাধবীকে দেখলেন; তিনি মৃগীর ন্যায় তাদের সঙ্গেই বিচরণ করে ক্রমে সেখানে এসে পৌঁছেছিলেন। তাঁকে প্রণাম করে রাজারা জিজ্ঞাসা করল—“তপোধনে, আপনি এখানে কেন এসেছেন? আমরা আপনার কোন আদেশ পালন করব? আমরা সকলেই আপনার পুত্র; অতএব উপযুক্ত সেবার জন্য আমাদের নির্দেশ দিন।” তাদের কথা শুনে মাধবী পরম আনন্দে ভরে উঠলেন; তিনি পিতা যযাতির কাছে গিয়ে তাঁকে প্রণাম করলেন।

Verse 23

स्पृष्टवा मूर्थनि तान्‌ पुत्रांस्तापसी वाक्यमब्रवीत्‌ | दौहित्रास्तव राजेन्द्र मम पुत्रा न ते परा:

পুত্রদের মস্তকে হাত রেখে তাপসী বললেন—“হে রাজেন্দ্র, এরা তোমার দৌহিত্র, আর আমার পুত্র; এরা তোমার কাছে পর নয়।”

Verse 24

तदनन्तर तपस्विनी माधवीने उन पुत्रोंके सिरपर हाथ रखकर अपने पितासे कहा --'राजेन्द्र! ये सभी आपके दौहित्र (नाती) और मेरे पुत्र हैं, पराये नहीं हैं ।। इमे त्वां तारयिष्यन्ति दृष्टमेतत्‌ पुरातने । अहं ते दुहिता राजन्‌ माधवी मृगचारिणी

এরপর তপস্বিনী মাধবী পুত্রদের মস্তকে হাত রেখে পিতাকে বললেন—“হে রাজেন্দ্র, এরা সকলেই তোমার দৌহিত্র এবং আমার পুত্র; পর নয়। এরা তোমাকে উদ্ধার করবে—এ কথা প্রাচীন কালে দেখা গেছে। হে রাজন, আমি তোমার কন্যা মাধবী, বনচারিণী।”

Verse 25

'ये आपको तार देंगे। दौहित्रोंके द्वारा मातामह (नाना)-का यह उद्धार पुरातन वेदशास्त्रमें स्पष्ट देखा गया है। राजन! मैं आपकी पुत्री माधवी हूँ और इस तपोवनमें मृगोंके समान जीवनचर्या बनाकर विचरती हूँ ।। मयाप्युपचितो धर्मस्ततो<र्थ प्रतिगृह्मताम्‌ । यस्माद्‌ राजन्‌ नरा: सर्वे अपत्यफलभागिन:

আমিও ধর্ম সঞ্চয় করেছি; অতএব এই উদ্দেশ্যে তা গ্রহণ করুন। কারণ, হে রাজন, সকল মানুষই সন্তানের দ্বারা প্রাপ্ত ফলের অংশীদার।

Verse 26

ततस्ते पार्थिवा: सर्वे शिरसा जननीं तदा

তখন সেই সকল রাজা সেই মুহূর্তে মস্তক নত করে তাঁদের জননীকে শ্রদ্ধাভরে প্রণাম করলেন।

Verse 27

अभिवाद्य नमस्कृत्य मातामहमथाब्रुवन्‌ । उच्चैरनुपमै: स्निग्धैः स्वरैरापूर्य मेदिनीम्‌

মাতামহকে অভিবাদন ও প্রণাম করে তারা তারপর বলল—উচ্চ, অতুলনীয়, স্নিগ্ধ স্বরে, যেন সমগ্র পৃথিবীকে পূর্ণ করে।

Verse 28

मातामहं नृपतयस्तारयन्तो दिवदश्ष्युतम्‌ । तब उन सभी राजाओंने अपनी माताके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और स्वर्गभ्रष्ट नानाको भी नमस्कार करके अपने उच्च, अनुपम और स्नेहपूर्ण स्वरसे पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते हुए उन्हें तारनेके उद्देश्यसे उनसे कुछ कहनेका विचार किया ।। २६-२७ ६ || अथ तस्मादुपगतो गालवो5प्याह पार्थिवम्‌ । तपसो मेड5ष्टभागेन स्वर्गमारोहतां भवान्‌,इसी बीचमें उस वनसे गालव मुनि भी वहाँ आ पहुँचे तथा राजासे इस प्रकार बोले --“महाराज! आप मेरी तपस्याका आठवाँ भाग लेकर उसके बलसे स्वर्गलोकमें पहुँच जाये

স্বর্গচ্যুত মাতামহকে উদ্ধার করতে ইচ্ছুক সেই নৃপতিরা জননীর চরণে মস্তক রেখে প্রণাম করল, নানাকেও নমস্কার করল, এবং উচ্চ, অতুলনীয়, স্নিগ্ধ স্বরে পৃথিবীকে প্রতিধ্বনিত করে তাঁকে বলবার সংকল্প করল। ঠিক তখনই অরণ্য থেকে গালব মুনি এসে রাজাকে বললেন—“মহারাজ, আমার তপস্যার অষ্টমাংশ গ্রহণ করুন; তার শক্তিতে আপনি স্বর্গলোকে আরোহণ করুন।”

Verse 96

चतुरो5पश्यत नृपस्तेषां मध्ये पपात ह । जंगम प्राणियोंमें श्रेष्ठ ययाति गिरते समय अपनी गतिके विषयमें चिन्ता कर रहे थे। इसी समय उन्होंने नैमिषारण्यमें चार श्रेष्ठ राजाओंको देखा और उन्हींके बीचमें वे गिरने लगे

রাজা চারজন নৃপতিকে দেখলেন এবং তাঁদের মধ্যেই পতিত হলেন।

Verse 106

वाजपेयेन यज्ञेन तर्पयन्ति सुरेश्वरम्‌ । वहाँ प्रतर्दन, वसुमना, औशीनर शिबि तथा अष्टक--ये चार नरेश वाजपेययज्ञके द्वारा देवेश्वर श्रीहरिको तृप्त करते थे

নারদ বললেন—বাজপেয় যজ্ঞের দ্বারা তারা দেবেশ্বরকে তৃপ্ত করে। সেই পরম্পরায় প্রতর্দন, বসুমনা, ঔশীনর-বংশীয় শিবি এবং অষ্টক—এই চার রাজা বাজপেয় ক্রিয়ায় দেবেশ্বর শ্রীহরিকে সন্তুষ্ট করতেন।

Verse 121

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते ययातिस्वर्गभ्रंशे एकविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বে, ভগবদ্যানপর্বের অন্তর্গত, গালবচরিত ও যযাতির স্বর্গভ্রংশ-প্রসঙ্গে একশ একুশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 256

तस्मादिच्छन्ति दौहित्रान्‌ यथा त्वं वसुधाधिप । 'पृथ्वीनाथ! मैंने भी महान्‌ धर्मका संचय किया है। उसका आधा भाग आप ग्रहण करें। राजन! सब मनुष्य अपनी संतानोंके किये हुए सत्कर्मोके फलके भागी होते हैं। इसीलिये वे दौहित्रोंकी इच्छा करते हैं, जैसे आपने की थी”

অতএব, হে বসুধাধিপ, যেমন তুমি চেয়েছিলে, তেমনি লোকেরা কন্যাসন্তানের পুত্র—দৌহিত্র—কামনা করে। “হে পৃথিবীনাথ! আমিও মহৎ ধর্মপুণ্য সঞ্চয় করেছি; তার অর্ধাংশ আপনি গ্রহণ করুন। রাজন, সকল মানুষই তাদের বংশধরদের সৎকর্মফলের অংশীদার হয়; এই কারণেই তারা দৌহিত্র কামনা করে—যেমন তুমি একদা করেছিলে।”

Frequently Asked Questions

The chapter stages the problem of decline after prior attainment—Yayāti’s fallen heavenly condition—and addresses how ethical capital (puṇya) is generated and whether it can be ethically extended across kinship lines to restore a diminished state.

The discourse teaches that dharma is plural in practice yet convergent in effect: truthfulness, generosity, sacrificial discipline, and duty-aligned valor each produce durable merit, and coordinated ethical action can function as collective restoration within a moral-causal framework.

Rather than a formal phalaśruti formula, the narrative supplies an implicit results-statement: the assembled descendants ‘rescue’ Yayāti from a fallen heavenly status through their sukṛta, demonstrating the operative consequence (phala) of the enumerated virtues.