
Nahuṣa Abhiṣeka and the Crisis of Restraint (नहुषाभिषेकः—दमभ्रंशः)
Upa-parva: Nahushopākhyāna (Exemplum of Nahuṣa and Indrāṇī) — Udyoga Parva embedded narrative
Śalya recounts an exemplum in which devas and ṛṣis collectively propose Nahuṣa’s consecration as deva-rāja in Indra’s absence. Nahuṣa initially demurs, citing weakness and inability to protect them, but the assembly assures him that their tapas will empower him and that he will gain tejas by beholding various classes of beings. Installed in sovereignty, he enjoys celestial pleasures—gardens, mountains, music, gandharvas and apsarases—until a marked ethical reversal occurs: having obtained a rare boon and high station, the previously dharmic Nahuṣa becomes governed by kāma. Seeing Indra’s queen Indrāṇī, he publicly demands her attendance, declaring himself Indra and ordering Śacī brought at once. Indrāṇī, distressed, seeks refuge with Bṛhaspati, reminding him of his prior assurances regarding her protection and marital integrity. Bṛhaspati affirms the truth of his word, promises Indra’s swift return, and urges her not to fear. On hearing that Indrāṇī has taken shelter with Bṛhaspati, Nahuṣa becomes angry, signaling the escalation from personal desire to antagonism against institutional counsel.
Chapter Arc: स्वर्ग में इन्द्र के लुप्त हो जाने से अराजकता फैलती है; देवता और ऋषि मिलकर पृथ्वीपति नहुष के पास आते हैं और लोक-हित के लिए उसे इन्द्र-पद पर अभिषिक्त करने का प्रस्ताव रखते हैं। → नहुष इन्द्रासन पाकर तेजस्वी-यशस्वी होकर भी भोग-विलास में डूबता जाता है; गन्धर्व-अप्सराएँ, ऋतुएँ और सुखशीतल सुगन्धित वायु तक उसके ऐश्वर्य को पुष्ट करते हैं, पर भीतर अहंकार बढ़ता है—वह स्वयं को देवलोकों का स्वामी मानकर शची के न आने पर क्रुद्ध होता है। → नहुष सभा में आदेश देता है कि शची शीघ्र उसके निवास में लाई जाए; इन्द्र की महिषी को अपने अधिकार में लेने की उसकी दुष्ट आकांक्षा देव-व्यवस्था और मर्यादा पर सीधा आघात बन जाती है। → शची मन-ही-मन व्याकुल होकर बृहस्पति के पास जाती है और संरक्षण/उपाय माँगती है; देवगुरु के वचनों को सत्य करने का आग्रह (वाणी की प्रतिष्ठा) कथा को आगे की युक्ति और परिणति की ओर मोड़ देता है। → क्या बृहस्पति शची की रक्षा हेतु ऐसा उपाय बताएँगे जिससे नहुष का मद टूटे और इन्द्र-पद की मर्यादा पुनः स्थापित हो?
Verse 1
अपन का छा ] अतप+डऑफाा<ज एकादशोब< ध्याय: देवताओं तथा ऋषियोंके अनुरोधसे राजा नहुषका इन्द्रके पदपर अभिषिक्त होना एवं काम-भोगमें आसक्त होना और चिन्तामें पड़ी हुई इन्द्राणीको बृहस्पतिका आश्वासन शल्य उवाच ऋषयो<थाब्रुवन् सर्वे देवाश्न त्रिदिवेश्वरा: । अयं वै नहुष: श्रीमान् देवराज्येडभिषिच्यताम्
শল্য বললেন— তখন সকল ঋষি এবং ত্রিদিবের অধিপতি দেবতারা বললেন— “এই শ্রীমান নহুষকেই দেবরাজ্যের পদে অভিষিক্ত করা হোক।”
Verse 2
तेजस्वी च यशस्वी च धार्मिकश्नैव नित्यदा । शल्य कहते हैं--युधिष्ठिर! इस प्रकार (स्वर्गमें अराजकता हो जानेपर) ऋषियों, सम्पूर्ण देवताओं एवं देवेश्वरोंने परस्पर मिलकर कहा--'ये जो श्रीमान् नहुष हैं, इन्हींको देवराजके पदपर अभिषिक्त किया जाय; क्योंकि ये तेजस्वी, यशस्वी तथा नित्य-निरन्तर धर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं! ।। १ इ ।। ते गत्वा त्वब्रुवन् सर्वे राजा नो भव पार्थिव,ऐसा निश्चय करके वे सब लोग राजा नहुषके पास जाकर बोले--'पृथिवीपते! आप हमारे राजा होइये'--राजन्! तब नहुषने पितरोंसहित उन देवताओं तथा ऋषियोंसे अपने हितकी इच्छासे कहा--
শল্য বললেন—ঋষিগণ, সকল দেবতা ও দেবেশ্বর পরস্পর মিলিত হয়ে বললেন—‘এই শ্রীমান্ নহুষকেই দেবরাজ ইন্দ্রের পদে অভিষিক্ত করা হোক; কারণ তিনি তেজস্বী, যশস্বী এবং সর্বদা ধর্মে অবিচল।’
Verse 3
स तानुवाच नहुषो देवानृषिगणांस्तथा । पितृभि: सहितान् राजन् परीप्सन् हितमात्मन:,ऐसा निश्चय करके वे सब लोग राजा नहुषके पास जाकर बोले--'पृथिवीपते! आप हमारे राजा होइये'--राजन्! तब नहुषने पितरोंसहित उन देवताओं तथा ऋषियोंसे अपने हितकी इच्छासे कहा--
হে রাজন, তখন নহুষ পিতৃগণের সহিত সেই দেবতা ও ঋষিসমূহকে—নিজ কল্যাণ কামনা করে—উত্তর দিলেন।
Verse 4
] दुर्बलो5हं न मे शक्तिर्भवतां परिपालने । बलवागञ्जायते राजा बलं शक्रे हि नित्यदा,“'मैं तो दुर्बल हूँ, मुझमें आपलोगोंकी रक्षा करनेकी शक्ति नहीं है। बलवान् पुरुष ही राजा होता है। इन्द्रमें ही बलकी नित्य सत्ता है”
‘আমি দুর্বল; তোমাদের রক্ষা করার শক্তি আমার নেই। বলবানই রাজা হয়; নিত্য বল তো শক্র—ইন্দ্রের মধ্যেই বিরাজমান।’
Verse 5
तमन्लुवन् पुनः सर्वे देवा ऋषिपुरोगमा: । अस्माकं तपसा युक्त: पाहि राज्यं त्रिविष्टपे,यह सुनकर सम्पूर्ण देवता तथा ऋषि पुनः उनसे बोले--'राजेन्द्र! आप हमारी तपस्यासे संयुक्त हो स्वर्गके राज्यका पालन कीजिये। हमलोगोंमें प्रत्येकको एक-दूसरेसे घोर भय बना रहता है, इसमें संशय नहीं है। अतः आप अपना अभिषेक कराइये और स्वर्गके राजा होइये
এ কথা শুনে ঋষিদের অগ্রে রেখে সকল দেবতা আবার তাঁকে বললেন—‘আমাদের তপস্যার শক্তিতে সংযুক্ত হয়ে ত্রিবিষ্টপ (স্বর্গ)-রাজ্য রক্ষা ও শাসন করুন।’
Verse 6
परस्परभयं घोरमस्माकं हि न संशय: । अभिषिच्यस्व राजेन्द्र भव राजा त्रिविष्टपे,यह सुनकर सम्पूर्ण देवता तथा ऋषि पुनः उनसे बोले--'राजेन्द्र! आप हमारी तपस्यासे संयुक्त हो स्वर्गके राज्यका पालन कीजिये। हमलोगोंमें प्रत्येकको एक-दूसरेसे घोर भय बना रहता है, इसमें संशय नहीं है। अतः आप अपना अभिषेक कराइये और स्वर्गके राजा होइये
‘আমাদের মধ্যে পরস্পরের প্রতি ভয় অত্যন্ত ভয়ংকর—এতে সন্দেহ নেই। অতএব, হে রাজেন্দ্র, আপনি অভিষিক্ত হন এবং ত্রিবিষ্টপ (স্বর্গ)-এর রাজা হন।’
Verse 7
देवदानवयक्षाणामृषीणां रक्षसां तथा । पितृगन्धर्वभूतानां चक्षुविषयवर्तिनाम्,“देवता, दानव, यक्ष, ऋषि, राक्षस, पितर, गन्धर्व और भूत--जो भी आपके नेत्रोंके सामने आ जायूँगे, उन्हें देखते ही आप उनका तेज हर लेंगे और बलवान हो जायूँगे। अतः सदा धर्मको सामने रखते हुए आप सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति होइये
শল্য বললেন—দেব, দানব, যক্ষ, ঋষি, রাক্ষস, পিতৃগণ, গন্ধর্ব ও ভূত—যারা তোমার দৃষ্টিসীমায় আসবে, তাদেরকে মাত্র দেখামাত্রই তুমি তাদের তেজ হরণ করবে এবং প্রবল পরাক্রান্ত হবে। অতএব সর্বদা ধর্মকে অগ্রে রেখে তুমি সকল লোকের অধিপতি হও।
Verse 8
तेज आदास्यसे पश्चन् बलवांश्व भविष्यसि । धर्म पुरस्कृत्य सदा सर्वलोकाधिपो भव,“देवता, दानव, यक्ष, ऋषि, राक्षस, पितर, गन्धर्व और भूत--जो भी आपके नेत्रोंके सामने आ जायूँगे, उन्हें देखते ही आप उनका तेज हर लेंगे और बलवान हो जायूँगे। अतः सदा धर्मको सामने रखते हुए आप सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति होइये
তারপর তুমি অপরের তেজ কেড়ে নেবে এবং প্রবল পরাক্রান্ত হবে। সর্বদা ধর্মকে অগ্রে রেখে তুমি সকল লোকের সর্বাধিপতি হও।
Verse 9
ब्रह्मर्षश्षापि देवांश्व गोपायस्व त्रिविष्टपे अभिषिक्त: स राजेन्द्र ततो राजा त्रिविष्टपे,“आप स्वर्गमें रहकर ब्रह्मर्षियों तथा देवताओंका पालन कीजिये।” युधिष्ठिर! तदनन्तर राजा नहुषका स्वर्ममें इन्द्रके पदपर अभिषेक हुआ
“স্বর্গে অবস্থান করে ব্রহ্মর্ষি ও দেবগণকে রক্ষা করো।” এই উপদেশ পেয়ে, হে রাজশ্রেষ্ঠ, ত্রিবিষ্টপে সেখানেই তার অভিষেক হল; এবং তারপর রাজা নহুষ স্বর্গে ইন্দ্রের আসনে প্রতিষ্ঠিত হলেন।
Verse 10
इस प्रकार श्रीमह्माभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें वृत्रवधके प्रसंगमें इन्द्रविजयविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ,धर्म पुरस्कृत्य तदा सर्वलोकाधिपो5भवत् | सुदुर्लभं वरं लब्ध्वा प्राप्य राज्यं त्रिविष्टपे
তখন ধর্মকে অগ্রে রেখে সে সকল লোকের অধিপতি হল। অতি দুর্লভ বর লাভ করে সে ত্রিবিষ্টপে (স্বর্গে) রাজ্য অর্জন করল।
Verse 11
देवोद्यानेषु सर्वेषु नन्दनोपवनेषु च,देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सहा, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे
শল্য বললেন—রাজা নহুষ, দেবসমৃদ্ধির পরিপূর্ণতায়, সকল স্বর্গীয় উদ্যানেই ক্রীড়া করতেন—বিশেষত নন্দন ও তার উপবনে; কৈলাসে, হিমালয়ের শিখরে, মন্দর, শ্বেতগিরি, সহ্য, মহেন্দ্র ও মালয় পর্বতে; তদ্রূপ সমুদ্র ও নদীনদীর তীরে। অপ্সরা ও দেবকন্যাদের সঙ্গ নিয়ে তিনি নানাবিধ ক্রীড়া-রস উপভোগ করতেন, কর্ণ ও মনকে আনন্দিত করে এমন বিচিত্র দিব্য কাহিনি শুনতেন, এবং সর্বপ্রকার বাদ্যযন্ত্র ও মধুর কণ্ঠে গীত গানের সুধা আস্বাদন করতেন।
Verse 12
कैलासे हिमवत्पृष्ठे मन्दरे श्वेतपर्वते । सहो महेन्द्रे मलये समुद्रेषु सरित्सु च,देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सहा, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे
শল্য বললেন— কৈলাসে, হিমবতের উচ্চ শিখরে, মন্দর ও শ্বেতপর্বতে, সহ্য, মহেন্দ্র ও মালয় পর্বতে, আর সমুদ্র ও নদীনদীর মধ্যে—দেবরাজ নহুষ দেবোদ্যানসমূহের পূর্ণ ঐশ্বর্যে ও নন্দনবনের উপবনে অপ্সরা ও দেবকন্যাদের সঙ্গে নানা রকম ক্রীড়ায় মত্ত ছিল। কর্ণ ও মনকে মোহিত করে এমন বহু প্রকার দিব্য কাহিনি সে শুনত, এবং সর্বপ্রকার বাদ্যযন্ত্রের সঙ্গে মধুর স্বরে গীত গান উপভোগ করত।
Verse 13
अप्सतेभि: परिवृतो देवकन्यासमावृतः । नहुषो देवराजो<थ क्रीडन् बहुविधं तदा,देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सहा, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे
অপ্সরাদের দ্বারা পরিবৃত এবং দেবকন্যাদের দ্বারা বেষ্টিত, দেবরাজের আসনে অধিষ্ঠিত নহুষ তখন নানাবিধ ক্রীড়ায় রত ছিল।
Verse 14
शृण्वन् दिव्या बहुविधा: कथा: श्रुतिमनोहरा: । वादित्राणि च सर्वाणि गीत॑ च मधुरस्वनम्,देवराज नहुष सम्पूर्ण देवोद्यानोंमें, नन्दनवनके उपवनोंमें, कैलासमें, हिमालयके शिखरपर, मन्दराचल, श्वेतगिरि, सहा, महेन्द्र तथा मलयपर्वतपर एवं समुद्रों और सरिताओंमें, अप्सराओं तथा देवकन्याओंके साथ भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे, कानों और मनको आकर्षित करनेवाली नाना प्रकारकी दिव्य कथाएँ सुनते थे तथा सब प्रकारके वाद्यों और मधुर स्वरसे गाये जानेवाले गीतोंका आनन्द लेते थे
সে কর্ণ ও মনকে মোহিত করে এমন বহু প্রকার দিব্য কাহিনি শুনত, আর সর্বপ্রকার বাদ্যযন্ত্রের সঙ্গে মধুর স্বরে গীত গান উপভোগ করত।
Verse 15
विश्वावसुनरिदश्न गन्धर्वाप्सरसां गणा: । ऋतव: षट् च देवेन्द्रं मूर्तिमन्त उपस्थिता:,विश्वावसु, नारद, गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय तथा छहों ऋतुएँ शरीर धारण करके देवेन्द्रकी सेवामें उपस्थित होती थीं
বিশ্বাবসু, নারদ, গন্ধর্ব ও অপ্সরাদের সমূহ, এবং ছয় ঋতুও দেহধারণ করে দেবেন্দ্রের সেবায় উপস্থিত থাকত।
Verse 16
मारुत: सुरभिववाति मनोज्ञ: सुखशीतल: । एवं च क्रीडतस्तस्य नहुषस्य दुरात्मन:
সুগন্ধি বায়ু বইছিল—মনোহর, সুখদ ও শীতল। আর এভাবেই আরামে ক্রীড়ায় মত্ত সেই দুরাত্মা নহুষ (কালক্রমে অগ্রসর হচ্ছিল)।
Verse 17
सतां संदृश्य दुष्टात्मा प्राह सर्वानू सभासद:,आगच्छतु शची महां क्षिप्रमद्य निवेशनम् । उन्हें देखकर दुष्टात्मा नहुषने समस्त सभासदोंसे कहा--“इन्द्रकी महारानी शची मेरी सेवामें क्यों नहीं उपस्थित होतीं? मैं देवताओंका इन्द्र हूँ और सम्पूर्ण लोकोंका अधीदश्वर हूँ। अतः शचीदेवी आज मेरे महलमें शीघ्र पधारें!
সজ্জনদের সভা দেখে দুষ্টাত্মা নহুষ সকল সভাসদকে বলল— “শচী আজই শীঘ্র আমার নিবাসে আসুক। ইন্দ্রের মহিষী দেবী কেন আমার সেবায় উপস্থিত হয় না? আমি দেবতাদের ইন্দ্র এবং সমগ্র লোকের অধীশ্বর; অতএব শচীদেবী অবিলম্বে আমার প্রাসাদে আসুক।”
Verse 18
इन्द्रस्य महिषी देवी कस्मान्मां नोपतिष्ठति । अहमिन्द्रोडस्मि देवानां लोकानां च तथेश्वर:
ইন্দ্রের মহিষী দেবী কেন আমার সেবায় উপস্থিত হয় না? কারণ আমি দেবতাদের ইন্দ্র এবং লোকসমূহেরও অধীশ্বর।
Verse 19
तच्छुत्वा दुर्मना देवी बृहस्पतिमुवाच ह,यह सुनकर शचीदेवी मन-ही-मन बहुत दुःखी हुईं और बृहस्पतिसे बोलीं--'ब्रह्मन! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ, आप नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये। विप्रवर! आप मुझसे कहा करते हैं कि तुम समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, देवराज इन्द्रकी प्राणवल्लभा, अत्यन्त सुखभागिनी, सौभाग्यवती, एकपत्नी और पतिव्रता हो जब राजा नहुषने सुना कि इन्द्राणी अंगिराके पुत्र बृहस्पतिकी शरणमें गयी है, तब वे बहुत कुपित हुए ।। इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि इन्द्राणीभये एकादशो<5ध्याय: ।। ११ |। इस प्रकार श्रीमह़्ा भारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोट्रोगपर्वमें इन्द्राणीभयविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ
এ কথা শুনে দেবী শচী অন্তরে ব্যথিত হয়ে বৃহস্পতিকে বললেন— “হে ব্রাহ্মণ! আমি আপনার শরণে এসেছি; নহুষের হাত থেকে আমাকে রক্ষা করুন।”
Verse 20
रक्ष मां नहुषाद् ब्रह्मंस्त्वामस्मि शरणं गता । सर्वलक्षणसम्पन्नां ब्रह्मुंस्त्वं मां प्रभाषसे,यह सुनकर शचीदेवी मन-ही-मन बहुत दुःखी हुईं और बृहस्पतिसे बोलीं--'ब्रह्मन! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ, आप नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये। विप्रवर! आप मुझसे कहा करते हैं कि तुम समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, देवराज इन्द्रकी प्राणवल्लभा, अत्यन्त सुखभागिनी, सौभाग्यवती, एकपत्नी और पतिव्रता हो
“হে ব্রাহ্মণ! আমি আপনার শরণে এসেছি; নহুষের হাত থেকে আমাকে রক্ষা করুন। হে ব্রাহ্মণ! আপনি তো আমাকে সর্ব শুভ লক্ষণে সম্পন্ন বলে প্রশংসা করেন।”
Verse 21
देवराजस्य दयितामत्यन्तं सुखभागिनीम् । अवैधव्येन युक्तां चाप्येकपत्नीं पतिव्रताम्,यह सुनकर शचीदेवी मन-ही-मन बहुत दुःखी हुईं और बृहस्पतिसे बोलीं--'ब्रह्मन! मैं आपकी शरणमें आयी हूँ, आप नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये। विप्रवर! आप मुझसे कहा करते हैं कि तुम समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, देवराज इन्द्रकी प्राणवल्लभा, अत्यन्त सुखभागिनी, सौभाग्यवती, एकपत्नी और पतिव्रता हो
“তিনি দেবরাজের প্রিয়তমা, পরম সুখভাগিনী; অবৈধব্য-যোগে যুক্ত, একপত্নীব্রতা ও পতিব্রতা।”
Verse 22
उक्तवानसि मां पूर्वमृतां तां कुरु वै गिरम् । नोक्तपूर्व च भगवन् वृथा ते किंचिदीश्वर
শল্য বলল—“আপনি পূর্বে আমাকে যা বলেছিলেন, তা সত্য করে দিন; সেই পূর্বপ্রতিশ্রুতি পূর্ণ করুন। আর হে ভগবান, হে ঈশ্বর! আগে না বলা কোনো ভিত্তিহীন কথা বলবেন না; হে নৃপতি, আপনার বাক্য যেন বৃথা না যায়।”
Verse 23
गए हु जज्क्ज्खट गण ै हि! हा ८2 252 ८ ६ / हि | 6) |] हे ४ ८८८ / | ६] रह ५00 /$ ॥ बृहस्पतिरथोवाच शक्राणीं भयमोहिताम्,यह सुनकर बृहस्पतिने भयसे व्याकुल हुई इन्द्राणीसे कहा--*देवि! मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब अवश्य सत्य होगा। तुम शीघ्र ही देवराज इन्द्रको यहाँ आया हुआ देखोगी। नहुषसे तुम्हें डरना नहीं चाहिये। मैं सच्ची बात कहता हूँ, थोड़े ही दिनोंमें तुम्हें इन्द्रसे मिला दूँगा'
ভয়ে ও বিভ্রান্তিতে কাঁপতে থাকা শক্রাণীকে বৃহস্পতী বললেন—“দেবি! আমি তোমাকে যা বলেছি, তা সবই অবশ্যই সত্য হবে। অচিরেই তুমি দেবরাজ ইন্দ্রকে এখানে ফিরে আসতে দেখবে। নহুষকে ভয় কোরো না। আমি সত্য বলছি—কয়েক দিনের মধ্যেই আমি তোমাকে ইন্দ্রের সঙ্গে মিলিয়ে দেব।”
Verse 24
यदुक्तासि मया देवि सत्यं तद् भविता ध्रुवम् द्रक्ष्य्से देवराजानमिन्द्रं शीघ्रमिहागतम्,यह सुनकर बृहस्पतिने भयसे व्याकुल हुई इन्द्राणीसे कहा--*देवि! मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब अवश्य सत्य होगा। तुम शीघ्र ही देवराज इन्द्रको यहाँ आया हुआ देखोगी। नहुषसे तुम्हें डरना नहीं चाहिये। मैं सच्ची बात कहता हूँ, थोड़े ही दिनोंमें तुम्हें इन्द्रसे मिला दूँगा'
বৃহস্পতী বললেন—“দেবি! আমি তোমাকে যা বলেছি, তা নিঃসন্দেহে সত্য হবে। অচিরেই তুমি দেবরাজ ইন্দ্রকে এখানে আগত দেখবে। নহুষকে ভয় কোরো না; আমি সত্য বলছি—শীঘ্রই আমি তোমাকে আবার ইন্দ্রের সঙ্গে মিলিয়ে দেব।”
Verse 25
न भेतव्यं च नहुषात् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । समानयिष्ये शक्रेण न चिराद् भवतीमहम्,यह सुनकर बृहस्पतिने भयसे व्याकुल हुई इन्द्राणीसे कहा--*देवि! मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब अवश्य सत्य होगा। तुम शीघ्र ही देवराज इन्द्रको यहाँ आया हुआ देखोगी। नहुषसे तुम्हें डरना नहीं चाहिये। मैं सच्ची बात कहता हूँ, थोड़े ही दिनोंमें तुम्हें इन्द्रसे मिला दूँगा'
“নহুষকে ভয় কোরো না; আমি তোমাকে এ কথা সত্য বলে বলছি। অচিরেই আমি নিজে তোমাকে শক্র (ইন্দ্র)-এর সঙ্গে মিলিয়ে দেব।”
Verse 26
अथ शुश्राव नहुष: शक्राणीं शरणं गताम् | बृहस्पतेरज्ञिरसश्लुक्रोध स नृपस्तदा
তখন নহুষ শুনল যে শক্রাণী (ইন্দ্রাণী) আশ্রয় গ্রহণ করেছে; আর সেই সময়েই সেই রাজা বৃহস্পতী ও আঙ্গিরস ঋষিদের ক্রোধের পাত্র হল।
Verse 106
धर्मात्मा सततं भूत्वा कामात्मा समपद्यत | धर्मको आगे रखकर उस समय राजा नहुष सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति हो गये। वे परम दुर्लभ वर पाकर स्वर्गके राज्यको हस्तगत करके निरन्तर धर्मपरायण रहते हुए भी कामभोगमें आसक्त हो गये
ধর্মপরায়ণ হয়েও রাজা নহুষ কামবশে পতিত হলেন। ধর্মকে অগ্রে রেখে তিনি সর্বলোকের অধিপতি হলেন; কিন্তু দুর্লভ বর লাভ করে ও স্বর্গরাজ্য অধিকার করে, নিত্য ধর্মনিষ্ঠ বলেই প্রতীয়মান হয়েও তিনি ইন্দ্রিয়ভোগে আসক্ত হয়ে পড়লেন।
Verse 166
सम्प्राप्ता दर्शन देवी शक्रस्य महिषी प्रिया । उनके लिये वायु मनोहर, सुखद, शीतल और सुगन्धित होकर बहते थे। इस प्रकार क्रीड़ा करते हुए दुरात्मा राजा नहुषकी दृष्टि एक दिन देवराज इन्द्रकी प्यारी महारानी शचीपर पड़ी
তখন শক্রের (ইন্দ্রের) প্রিয় মহিষী দেবী শচী দৃষ্টিগোচর হলেন। তাঁর জন্য বায়ু মনোহর, সুখদ, শীতল ও সুগন্ধিত হয়ে বইতে লাগল। এভাবে স্বেচ্ছাচারী ভোগে মত্ত দুষ্টচিত্ত নহুষ একদিন দেবরাজ ইন্দ্রের প্রিয় মহারানী শচীর দিকে দৃষ্টি নিক্ষেপ করল।
Verse 183
आगच्छतु शची महां क्षिप्रमद्य निवेशनम् । उन्हें देखकर दुष्टात्मा नहुषने समस्त सभासदोंसे कहा--“इन्द्रकी महारानी शची मेरी सेवामें क्यों नहीं उपस्थित होतीं? मैं देवताओंका इन्द्र हूँ और सम्पूर्ण लोकोंका अधीदश्वर हूँ। अतः शचीदेवी आज मेरे महलमें शीघ्र पधारें!
“শচী আজই শীঘ্র আমার নিবাসে আসুন।” তাঁকে দেখে দুষ্টচিত্ত নহুষ সভাসদদের সকলকে বলল—“ইন্দ্রের মহিষী শচী কেন আমার সেবায় উপস্থিত হন না? আমি দেবতাদের ইন্দ্র এবং সর্বলোকের অধীশ্বর। অতএব শচীদেবী আজই শীঘ্র আমার প্রাসাদে আসুন।”
Verse 226
तस्मादेतद् भवेत् सत्य त्वयोक्त द्विजसत्तम । 'भगवन्! आपने पहले जो वैसी बातें कही हैं, अपनी उन वाणियोंको सत्य कीजिये। देवगुरो! आपके मुखसे पहले कभी कोई व्यर्थ या असत्य वचन नहीं निकला है, अतः द्विजश्रेष्ठी आपका यह पूर्वोक्त वचन भी सत्य होना चाहिये”
অতএব, হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, আপনার বলা কথাই সত্য হোক। ভগবন, আপনি পূর্বে যে কথা উচ্চারণ করেছিলেন, এখন তা কর্মে সত্য করে তুলুন। দেবগুরু, আপনার মুখ থেকে কখনও বৃথা বা অসত্য বাক্য নির্গত হয়নি; সুতরাং আপনার সেই পূর্বোক্ত বাক্যও সত্যই হওয়া উচিত।
The dilemma is how a ruler, even when legitimately empowered, must restrain desire and speech; Nahuṣa’s claim over Indrāṇī shows the collapse of rāja-dharma when authority is treated as personal entitlement.
Power amplified by external support (tapas, appointment, acclaim) requires internal discipline; without self-governance, sovereignty becomes ethically unstable and turns against both subjects and advisory institutions.
No explicit phalaśruti appears in these verses; the chapter functions as an instructive exemplum embedded in counsel-narrative, where the ‘fruit’ is interpretive—recognizing how dharma deteriorates through unrestrained kāma and anger.