
Duryodhana-śibira-praveśaḥ — The Pāṇḍavas Enter the Kaurava Camp; The Burning of Arjuna’s Chariot
Upa-parva: Vijaya-anuśaṅga (Aftermath of Victory and Camp-Entry Episode)
Sañjaya reports that the Pāṇḍavas and allied warriors return from the field toward encampment, accompanied by leading archers such as Yuyutsu and Sātyaki, with Dhṛṣṭadyumna, Śikhaṇḍin, and the Draupadeyas proceeding to their respective quarters. The victors enter Duryodhana’s camp, now emptied of its former splendor and described through similes of a city without festival and a lake bereft of its great beings—an image of depleted sovereignty. Survivors and attendants, marked by austerity and mourning, approach with folded hands. Upon arrival, Kṛṣṇa addresses Arjuna: he instructs him to set down the Gāṇḍīva and inexhaustible quivers and to dismount first. After Arjuna complies, Kṛṣṇa dismounts; immediately thereafter the divine banner’s emblem (the celestial monkey) withdraws, and Arjuna’s chariot—previously burned by numerous celestial weapons, including Brahmāstra-energy deployed by Droṇa and Karṇa—finally ignites and collapses into ash. Arjuna, astonished, asks Kṛṣṇa for an explanation. Kṛṣṇa states that the chariot had already been destroyed by weapon-fire but was held together in battle by Kṛṣṇa’s sustaining presence; once released, it disintegrates. Kṛṣṇa embraces and congratulates Yudhiṣṭhira, affirming the achieved victory and urging prompt attention to post-conflict duties. Yudhiṣṭhira acknowledges Kṛṣṇa’s unique capacity to bear the Brahmāstra’s force and recalls Vyāsa’s maxim linking dharma, Kṛṣṇa, and victory. The Pāṇḍavas recover wealth and royal implements from the camp, then, for auspicious reasons and safety, encamp outside by the sacred river Amoghavatī. Finally, Kṛṣṇa departs swiftly toward Nāgasāhvaya (Hāstinapura) with Dāruka as charioteer, tasked to console Gāndhārī, bereaved of her sons.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को बताता है—भीमसेन ने गदा-युद्ध में दुर्योधन को वैसे ही गिरा दिया जैसे सिंह मदोन्मत्त वनगज को धराशायी कर दे। रणभूमि में एक क्षण को सन्नाटा और अगले ही क्षण उफनता हर्ष फैल जाता है। → पाण्डव-पक्ष (विशेषतः पांचाल और सृंजय) उल्लास में सिंहनाद करता है, पर उसी उल्लास के बीच दुर्योधन की चेतना-सी लौटती है। वह पीड़ा में तड़पते हुए भी कृष्ण की ओर तीखी दृष्टि करता है और वाणी के बाण चलाने लगता है—पुराने अपराधों की स्मृति (विष-प्रयोग, लाक्षागृह, द्यूतसभा में द्रौपदी का अपमान) युद्ध-समाप्ति के क्षण को भी नैतिक मुकदमे में बदल देती है। → अर्ध-उठे शरीर और कटे सर्प-पूँछ जैसी छटपटाहट के साथ दुर्योधन कृष्ण पर उग्र वचन-वर्षा करता है; वहीं भीम की विजय-ध्वनि के पीछे छिपा कठोर सत्य उभरता है—यह केवल शत्रु का पतन नहीं, वर्षों के अधर्म का प्रतिफल है। → दुर्योधन अपने पक्ष, अपने ‘अनुचित’ कर्मों और दूसरों के दोषों पर तर्क करता हुआ भी अंततः पराजय की वास्तविकता स्वीकारने की ओर बढ़ता है। उसके कथन पूर्ण होते ही दिव्य पुष्प-वर्षा होती है—रणभूमि में एक अलौकिक संकेत कि निर्णायक घड़ी आ चुकी है। → दुर्योधन की कटु वाणी और कृष्ण की ओर उठी चुनौती के बाद प्रश्न हवा में लटकता है—अब अंतिम निर्णय किसके ‘धर्म’ को मान्यता देगा: नियमों की शुष्कता या न्याय की अनिवार्यता?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८६३ “लोक मिलाकर कुल ५६३ श्लोक हैं।) फल रत () आज अत+- एकषेष्टितमो< ध्याय: पाण्डव-सैनिकोंद्वारा भीमकी स्तुति
ধৃতরাষ্ট্র বললেন— সঞ্জয়! যুদ্ধক্ষেত্রে ভীমসেনের হাতে দুর্যোধন নিহত হয়েছে দেখে পাণ্ডবরা ও সৃঞ্জয়রা কী করল?
Verse 2
संजय उवाच हतं दुर्योधन दृष्टवा भीमसेनेन संयुगे । सिंहेनेव महाराज मत्तं वनगजं यथा
সঞ্জয় বললেন— মহারাজ! যুদ্ধক্ষেত্রে ভীমসেনের হাতে দুর্যোধনকে নিহত দেখে—যেন সিংহ মত্ত বনহস্তীকে ধরাশায়ী করে।
Verse 3
पज्चाला सृज्जयाश्वैव निहते कुरुनन्दने,कुरुनन्दन दुर्योधनके मारे जानेपर पांचाल और सूंजय तो अपने दुपट्टे उछालने और सिंहनाद करने लगे। हर्षमें भरे हुए इन पाण्डववीरोंका भार यह पृथ्वी सहन नहीं कर पाती थी
সঞ্জয় বললেন— কুরুবংশের নন্দন দুর্যোধন নিহত হতেই পাঞ্চাল ও সৃঞ্জয়রা আনন্দে উন্মত্ত হয়ে উঠল; তারা ঊর্ধ্ববস্ত্র ছুড়ে সিংহের মতো গর্জন করতে লাগল।
Verse 4
आविद्धयन्ुत्तरीयाणि सिंहनादांश्व नेदिरे नैतान् हर्षसमाविष्टानियं सेहे वसुन्धरा
সঞ্জয় বললেন— তারা ঊর্ধ্ববস্ত্র ছুড়ে দিচ্ছিল এবং সিংহনাদ করছিল। আনন্দে আচ্ছন্ন সেই বীরদের ভার যেন এই বসুন্ধরা সহ্য করতে পারছিল না।
Verse 5
ध्नुंष्यन्ये व्याक्षिपन्त ज्याश्वाप्यन्ये तथाक्षिपन् दध्मुरन्ये महाशड्खानन्ये जषघ्नुश्न दुन्दुभीन् ५ ।।
সঞ্জয় বললেন— কেউ ধনুক টংকার তুলল, কেউ ধনুর্জ্যা টেনে ছাড়ল; কেউ মহাশঙ্খ বাজাল, আর অনেকে দুন্দুভি ঢোল পেটাল।
Verse 6
चिक्रीडुश्व तथैवान्ये जहसुश्न॒ तवाहिता: । अन्र॒ुवंश्षासकृद् वीरा भीमसेनमिदं वच:,आपके बहुत-से शत्रु भाँति-भाँतिके खेल खेलने और हास-परिहास करने लगे। कितने ही वीर भीमसेनके पास जाकर इस प्रकार कहने लगे--
সঞ্জয় বললেন—তেমনি তোমার শত্রুরাও নানা রকম ক্রীড়ায় মেতে উঠল এবং বিদ্রূপ করে হাসতে লাগল। বারবার কতক বীর ভীমসেনের কাছে এসে তাকে এই কথাগুলি বলল—
Verse 7
दुष्करं भवता कर्म रणेडद्य सुमहत् कृतम् कौरवेन्द्र रणे हत्वा गदयातिकृतश्रमम्
সঞ্জয় বললেন—আজ রণক্ষেত্রে তুমি এক মহৎ ও দুষ্কর কর্ম সাধন করেছ। গদাযুদ্ধে চরম পরিশ্রমে ক্লান্ত কৌরব-রাজ দুর্যোধনকে যুদ্ধে বধ করে তুমি দুর্লভ বীরত্ব প্রকাশ করেছ।
Verse 8
इन्द्रेणेव हि वृत्रस्य वध॑ परमसंयुगे । त्वया कृतममन्यन्त शत्रोर्वधमिमं जना:
সঞ্জয় বললেন—যেমন পরম সংঘর্ষে ইন্দ্র বৃত্রকে বধ করেছিলেন, তেমনি তোমার দ্বারা সম্পন্ন এই শত্রুবধ—এমনই লোকেরা মনে করতে লাগল।
Verse 9
चरन्तं विविधान् मार्गान् मण्डलानि च सर्वशः । दुर्योधनमिमं शूरं को5न्यो हन्याद् वृकोदरात्
সঞ্জয় বললেন—নানা রকম কৌশল বদলে, সর্বদিকে বৃত্তাকার ভঙ্গিতে ঘুরে চলা এই বীর দুর্যোধনকে ভৃকোদর (ভীম) ছাড়া আর কে বধ করতে পারত?
Verse 10
वैरस्य च गतः पार त्वमिहान्यै: सुदुर्गमम् । अशक्यमेतदन्येन सम्पादयितुमीदूशम्
সঞ্জয় বললেন—তুমি বৈরিতার পার তীরে পৌঁছে গেছ; এখানে তুমি এমন কাজ সাধন করেছ যা অন্যদের পক্ষে অত্যন্ত দুর্গম। এ রকম কীর্তি অন্য কারও দ্বারা সম্পন্ন হওয়া অসম্ভব ছিল।
Verse 11
“आप वैरके समुद्रसे पार हो गये, जहाँ पहुँचना दूसरे लोगोंके लिये अत्यन्त कठिन है। दूसरे किसीके लिये ऐसा पराक्रम कर दिखाना सर्वथा असम्भव है ।।
সঞ্জয় বললেন— তুমি বৈর-সমুদ্র পার হয়ে এমন তীরে পৌঁছেছ, যেখানে পৌঁছানো অন্যদের পক্ষে অত্যন্ত দুরূহ। অন্য কারও পক্ষে এমন পরাক্রম প্রদর্শন করা সর্বথাই অসম্ভব। হে বীর! মত্ত গজরাজের ন্যায় যুদ্ধের অগ্রভাগে সৌভাগ্যবশত তুমি পদতলে দুঃর্যোধনের মস্তক চূর্ণ করেছ।
Verse 12
सिंहेन महिषस्येव कृत्वा सड्भरमुत्तमम् | दुःशासनस्य रुधिरं दिष्ट्या पीतं त्वयानघ
সঞ্জয় বললেন— সিংহ যেমন মহিষের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ে প্রবল আঘাত হানে, তেমনই উৎকৃষ্ট বেগে আক্রমণ করে, হে নিষ্পাপ, সৌভাগ্যবশত তুমি দুঃশাসনের রক্ত পান করেছ।
Verse 13
“अनघ! जैसे सिंहने भैंसेका खून पी लिया हो, उसी प्रकार आपने महान् युद्ध ठानकर दुःशासनके रक्तका पान किया है, यह भी सौभाग्यकी ही बात है ।।
সঞ্জয় বললেন— হে নিষ্পাপ! যেমন সিংহ মহিষের রক্ত পান করে, তেমনই তুমি মহাযুদ্ধের সংকল্প করে সৌভাগ্যবশত দুঃশাসনের রক্ত পান করেছ—এও ভাগ্যেরই ফল। যারা ধর্মাত্মা রাজা যুধিষ্ঠিরের প্রতি অপরাধ করেছিল, তাদের সকলের মস্তকের উপর তুমি নিজের বীর্যে পদ স্থাপন করেছ; বিধি ও তোমার কর্মে এ ঘটেছে—এ সত্যই আনন্দের বিষয়।
Verse 14
अमित्राणामधिष्ठानाद् वधाद् दुर्योधनस्य च । भीम दिष्टया पृथिव्यां ते प्रथितं सुमहद् यश:
সঞ্জয় বললেন— হে ভীম! শত্রুদের উপর কর্তৃত্ব স্থাপন করে এবং দুঃর্যোধনকে বধ করে, সৌভাগ্যবশত পৃথিবীতে তোমার অতি মহান যশ ছড়িয়ে পড়েছে।
Verse 15
एवं नूनं हते वृत्रे शक्रं नन्दन्ति वन्दिन: । तथा त्वां निहतामित्रं वयं नन्दाम भारत
সঞ্জয় বললেন— হে ভারত! নিশ্চয়ই বৃত্র নিহত হলে যেমন বন্দিজন শক্র (ইন্দ্র)-কে আনন্দে প্রশংসা করে, তেমনই আমরা—শত্রুনিধনকারী তোমাকে—আনন্দে অভিনন্দন জানাই।
Verse 16
दुर्योधनवधे यानि रोमाणि हृषितानि न: । अद्यापि न विकृष्यन्ते तानि तद् विद्धि भारत
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! দুর্যোধন-বধের সময় আমাদের দেহে যে রোমাঞ্চ জেগেছিল, তা আজও তেমনি আছে; এখনও প্রশমিত হয়নি। এ কথা সত্য বলে জানো।
Verse 17
इत्यब्रुवन् भीमसेनं वातिकास्तत्र सड़ता: । तान् हृष्टान् पुरुषव्याप्रान् पज्चालान् पाण्डवै: सह
সঞ্জয় বললেন—সেখানে সমবেত দূতেরা এভাবে ভীমসেনকে বলল। তারা পাণ্ডবদের সঙ্গে দাঁড়িয়ে থাকা উল্লসিত, পুরুষব্যাঘ্র পাঞ্চালদের বর্ণনা করল।
Verse 18
ब्रुवतो5सदृशं तत्र प्रोवाच मधुसूदन: । प्रशंसा करनेवाले वीरगण वहाँ एकत्र होकर भीमसेनसे उपर्युक्त बातें कह रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णने जब देखा कि पुरुषसिंह पांचाल और पाण्डव अयोग्य बातें कह रहे हैं, तब वे वहाँ उन सबसे बोले-- ।।
সেখানে তারা এমন কথা বলছিল যা শোভন নয়। তখন মধুসূদন শ্রীকৃষ্ণ বললেন—“হে নরাধিপগণ! যে শত্রু নিহত হয়েছে, তাকে পুনরায় আঘাত করা ন্যায়সঙ্গত নয়।”
Verse 19
तदैवैष हत: पापो यदैव निरपत्रप:
সঞ্জয় বললেন—যেই মুহূর্তে সে সম্পূর্ণ নির্লজ্জ হল, সেই মুহূর্তেই সেই পাপী নিহত হল।
Verse 20
बहुशो विदुरद्रोणकृपगाज्रेयसृज्जयै:
সঞ্জয় বললেন—বিদুর, দ্রোণ, কৃপ, গাঙ্গ্রেয় এবং সৃঞ্জয়দের দ্বারা বারংবার…
Verse 21
नैष योग्योउ्द्य मित्र वा शत्रुर्वा पुरुषाधम:
সঞ্জয় বললেন—এই নরাধম আজ কোনো যোগ্য কাজে উপযুক্ত নয়; না বন্ধু হিসেবে, না শত্রু হিসেবে।
Verse 22
किमनेनाति भुग्नेन वाग्भि: काष्ठसधर्मणा । रथेष्वारोहत क्षिप्रं गच्छामो वसुधाधिपा:
সঞ্জয় বললেন—অতিশয় ভগ্ন, শুকনো কাঠের মতো এই কথায় কী লাভ? হে পৃথিবীপতি গণ, দ্রুত রথে আরোহণ কর; চলো, আমরা যাই।
Verse 23
दिष्टया हतो<यं पापात्मा सामात्यज्ञातिबान्धव: । “यह नराधम अब किसी योग्य नहीं है। न यह किसीका मित्र है और न शत्रु। राजाओ! यह तो सूखे काठके समान कठोर है। इसे कटुवचनोंद्वारा अधिक झुकानेकी चेष्टा करनेसे क्या लाभ? अब शीघ्र अपने रथोंपर बैठो। हम सब लोग छावनीकी ओर चलें। सौभाग्यसे यह पापात्मा अपने मन्त्री
সঞ্জয় বললেন—সৌভাগ্যক্রমে এই পাপাত্মা তার মন্ত্রী, জ্ঞাতি ও বান্ধবসহ নিহত হয়েছে। কৃষ্ণের মুখে এই বিদ্রূপপূর্ণ বাক্য শুনে রাজা দুর্যোধন…
Verse 24
अमर्षवशमापतन्न उदतिष्ठद् विशाम्पते । स्फिग्देशेनोपविष्ट: स दोर्भ्या विष्टभ्य मेदिनीम्
সঞ্জয় বললেন—অসহ্য ক্রোধে আচ্ছন্ন হয়ে প্রজাপতি (রাজা) উঠলেন না। নিতম্বের ভর দিয়ে বসে, দুই বাহু দিয়ে ভূমিকে ঠেস দিয়ে রইলেন।
Verse 25
प्रजानाथ! श्रीकृष्णके मुखसे यह आक्षेपयुक्त वचन सुन राजा दुर्योधन अमर्षके वशीभूत होकर उठा और दोनों हाथ पृथ्वीपर टेककर चूतड़के सहारे बैठ गया ।।
হে প্রজানাথ! শ্রীকৃষ্ণের মুখে এই আক্ষেপময় বাক্য শুনে রাজা দুর্যোধন অসহ্য ক্রোধে উঠে পড়ল; তারপর দুই হাত দিয়ে ভূমি ঠেস দিয়ে নিতম্বের ভরে আবার বসে গেল। ভ্রূকুটি কুঁচকে সে বাসুদেবের দিকে দৃষ্টি স্থির করল; রাজার দেহ অর্ধোত্থিত অবস্থায়ই রইল।
Verse 26
प्रहृष्मनसस्तत्र कृष्णेन सह पाण्डवा: । संजयने कहा--महाराज! जैसे कोई मतवाला जंगली हाथी सिंहके द्वारा मारा गया हो
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! সেখানে কৃষ্ণসহ পাণ্ডবেরা, রণভূমিতে ভীমসেনের হাতে দুর্যোধন নিহত হয়েছে দেখে—যেন উন্মত্ত বনহস্তী সিংহের দ্বারা পতিত—অন্তরে পরম হর্ষে উল্লসিত হল; প্রাণান্তকারী সেই ভয়ংকর যন্ত্রণার কথাও তারা ভাবল না।
Verse 27
कंसदासस्य दायाद न ते लज्जास्त्यनेन वै
সঞ্জয় বললেন—হে কংসদাসের উত্তরাধিকারী! এ কারণে কি তোমার সত্যিই লজ্জা নেই?
Verse 28
ऊरू भिन्धीति भीमस्य स्मृतिं मिथ्या प्रयच्छता
সঞ্জয় বললেন—“উরুতে আঘাত করো”—এই বলে ভীমকে মিথ্যা স্মৃতি জুগিয়ে (কেউ) যুদ্ধের গতি বিভ্রান্ত করে চালিত করছিল।
Verse 29
घातयित्वा महीपालानूजुयुद्धानू सहस्रश:
সঞ্জয় বললেন—সোজাসুজি সম্মুখযুদ্ধে লিপ্ত সহস্র সহস্র রাজাকে নিহত করিয়ে (তারা/সে) এগিয়ে চলল।
Verse 30
जिह्नौरुपायैर्बहुभिर्न ते लज्जा न ते घृणा । “सरलतासे धर्मानुकूल युद्ध करनेवाले सहस्रों भूमिपालोंको बहुत-से कुटिल उपायोंद्वारा मरवाकर न तुम्हें लज्जा आती है और न इस बुरे कर्मसे घृणा ही होती है ।।
সঞ্জয় বললেন—বহু কুটিল উপায়ে ধর্মানুগত সরল যুদ্ধে রত সহস্র সহস্র ভূ-পালকে নিহত করিয়ে তোমার না লজ্জা হয়, না এই পাপকর্মে ঘৃণা জাগে। আর তুমি দিনদিন বীরদের মহাবিনাশ ঘটিয়ে চলেছ।
Verse 31
अश्वत्थाम्न: सनामान हत्वा नागं सुदुर्मते
সঞ্জয় বললেন—হে দুর্মতি! অশ্বত্থামা নামে হাতিটিকে বধ করে তারা একই নামকে আশ্রয় করে লোককে বিভ্রান্ত করতে ঘোষণা করল; যুদ্ধের চাপে থেকেও এই কাজ সেই মুহূর্তের ধর্মবোধকে কলুষিত করল।
Verse 32
स चानेन नृशंसेन धृष्टद्युम्नेन वीर्यवान्
সঞ্জয় বললেন—আর সেই বীর্যবান যোদ্ধাকে নিষ্ঠুর ধৃষ্টদ্যুম্ন আক্রমণ করল; এতে বোঝা যায়, যুদ্ধের উন্মাদনায় কঠোর সংকল্প অনেক সময় আচরণের কোমল সংযমকে ছাপিয়ে যায়।
Verse 33
वधार्थ पाण्डुपुत्रस्य याचितां शक्तिमेव च
সঞ্জয় বললেন—“পাণ্ডুপুত্রকে বধ করার উদ্দেশ্যে সে সেই শক্তি (দিব্য অস্ত্র)টিই প্রার্থনা করল।”
Verse 34
छिन्नहस्त: प्रायगतस्तथा भूरिश्रवा बली
সঞ্জয় বললেন—“তেমনি বলবান ভূরিশ্রবা, যার হাত কেটে দেওয়া হয়েছিল, শেষ পরিণতির দিকে গেল—যুদ্ধে অঙ্গহানি হয়ে মৃত্যুর মধ্যে পতিত হল।”
Verse 35
त्वयाभिसृष्टेन हतः शैनेयेन महात्मना । “बलवान भूरिश्रवाका हाथ कट गया था और वे आमरण अनशनका व्रत लेकर बैठे हुए थे। उस दशामें तुमसे ही प्रेरित होकर महामना सात्यकिने उनका वध किया ।।
সঞ্জয় বললেন—“তোমার প্ররোচনায় মহাত্মা শৈনেয় (সাত্যকি) তাকে বধ করল। এতে বোঝা যায়, বিশেষত ব্রতবদ্ধ ও অসহায় অবস্থায় থাকা ব্যক্তির হত্যায় যে উসকানি দেয়, সেও সেই হত্যার নৈতিক দায় বহন করে।”
Verse 36
व्यंसनेनाश्वसेनस्य पन्नगेन्द्रस्थ वै पुन: । पुनश्न पतिते चक्रे व्यसनार्त: पराजित:
আবার যখন নাগরাজের পিঠে আরূঢ় অশ্বসেন পতিত হল, আর চক্রও পুনরায় খসে পড়ল, তখন সে দুর্যোগে জর্জরিত হয়ে পরাজিত হল।
Verse 37
यदि मां चापि कर्ण च भीष्मद्रोणौ च संयुतौ
যদি তারা আমাকেও—কর্ণসহ—এবং ভীষ্ম ও দ্রোণকে একত্র করে (সম্মুখে আনে) তবুও…
Verse 38
त्वया पुनरनार्येण जिद्ममार्गेण पार्थिवा:
কিন্তু তুমি—অনাৰ্য হয়ে, কুটিল পথে চলেই—রাজাদের (এভাবে) বিপথে নিয়েছ।
Verse 39
वायुदेव उवाच हतस्त्वमसि गान्धारे सभ्रातृसुतबान्धव:
বায়ুদেব বললেন—“হে গান্ধারের অধিপতি, তুমি তোমার ভ্রাতা, পুত্র ও স্বজনসহ নিহত হয়েছ।”
Verse 40
सगण: ससुद्दच्चैव पाप॑ मार्गमनुष्ित: । तवैव दुष्कृतैर्वीरी भीष्मद्रोणी निपातितौ
নিজ অনুচরদেরসহ, দৃঢ় সংকল্পে তুমি পাপপথ অবলম্বন করেছ। হে বীর, তোমারই দুষ্কৃত্যের ফলে ভীষ্ম ও দ্রোণ পতিত হয়েছেন।
Verse 41
कर्णश्र निहतः संख्ये तव शीलानुवर्तक: । भगवान् श्रीकृष्ण बोले--गान्धारीनन्दन! तुमने पापके रास्तेपर पैर रखा था; इसीलिये तुम भाई
বায়ু বললেন—কর্ণও যুদ্ধে নিহত হয়েছে, কারণ সে তোমারই স্বভাব অনুসরণ করত। আর তুমি—মূঢ়—আমার অনুরোধ সত্ত্বেও ন্যায়সঙ্গত পিতৃ-অংশ দিতে চাওনি।
Verse 42
विषं ते भीमसेनाय दत्तं सर्वे च पाण्डवा:
বায়ু বললেন—ভীমসেনকে বিষ দেওয়া হয়েছিল; তাতে সমস্ত পাণ্ডবই বিপদের মুখে পড়েছিল।
Verse 43
प्रदीपिता जतुगृहे मात्रा सह सुदुर्मते । सभायां याज्ञसेनी च कृष्टा द्यूते रजस्वला
বায়ু বললেন—হে অতিমূঢ়, লাক্ষাগৃহে তোমার মাতা দগ্ধ করার চেষ্টা করা হয়েছিল; আর রাজসভায় পাশাখেলার সময় রজস্বলা যাজ্ঞসেনীকেও টেনে আনা হয়েছিল।
Verse 44
तदैव तावद् दुष्टात्मन् वध्यस्त्वं निरपत्रप । सुदुर्मते! तुमने जब भीमसेनको विष दिया, समस्त पाण्डवोंको उनकी माताके साथ लाक्षागृहमें जला डालनेका प्रयत्न किया और निर्लज्ज! दुष्टात्मन्! द्यूतक्रीड़ाके समय भरी सभामें रजस्वला द्रौपदीको जब तुमलोग घसीट लाये, तभी तुम वधके योग्य हो गये थे ।।
বায়ু বললেন—হে দুষ্টাত্মা, নির্লজ্জ! যখন তুমি ভীমসেনকে বিষ দিলে, পাণ্ডবদের মাতাসহ লাক্ষাগৃহে পুড়িয়ে মারতে চাইল, আর পাশাখেলার সময় ভরা সভায় রজস্বলা দ্রৌপদীকে টেনে আনলে—সেই মুহূর্তেই তুমি বধযোগ্য হয়েছিলে।
Verse 45
निकृत्या यत् पराजैषीस्तस्मादसि हतो रणे | तुमने द्यूतक्रीड़ाके जानकार सुबलपुत्र शकुनिके द्वारा उस कलाको न जाननेवाले धर्मज्ञ युधिष्ठिरको, जो छलसे पराजित किया था, उसी पापसे तुम रणभूमिमें मारे गये हो ।।
বায়ু বললেন—ছল করে তুমি অন্যদের পরাজিত করেছিলে, তাই তুমি রণে নিহত হয়েছ। আর পাপী জয়দ্রথ বনে কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)কে যে কষ্ট দিয়েছিল, এবং তোমারই দোষে অভিমন্যুর পাপপূর্ণ বধ সংঘটিত হয়েছিল—এই কারণেই তুমি যুদ্ধক্ষেত্রে পতিত হয়েছ।
Verse 46
यातेषु मृगयां चैव तृणबिन्दोरथाश्रमम् | अभिमन्युश्व यद् बाल एको बहुभिराहवे
বায়ু বললেন—“তারা শিকারে গিয়ে পরে তৃণবিন্দুর আশ্রমে পৌঁছেছিল; আর স্মরণ করো, কিশোর অভিমন্যু কীভাবে যুদ্ধে একাই বহুজনের বিরুদ্ধে দাঁড়িয়েছিল।”
Verse 47
(कुर्वाणं कर्म समरे पाण्डवानर्थकाड्क्षिणम् । यच्छिखण्ड्यवधीद् भीष्म मित्रार्थे न व्यतिक्रम: ।।
তুমি বারবার বলে চলেছ—“আমাদের দ্বারা এইসব অন্যায় কাজ করা হয়েছে।”
Verse 48
बृहस्पतेरुशनसो नोपदेश: श्रुतस्त्वया
বৃহস্পতি ও উশনস (শুক্র)-এর উপদেশ তুমি শোনোনি।
Verse 49
वृद्धा नोपासिताश्वैव हित॑ वाक््यं न ते श्रुतम् तुमने बृहस्पति और शुक्राचार्यके नीतिसम्बन्धी उपदेशको नहीं सुना है, बड़े-बूढ़ोंकी उपासना नहीं की है और उनके हितकर वचन भी नहीं सुने हैं ।।
তুমি না বয়োজ্যেষ্ঠদের সেবা করেছ, না তাদের কল্যাণকর বাক্য শুনেছ। অতিশয় লোভ ও তৃষ্ণার বশে পড়ে তুমি পরাধীন হয়ে গেছ।
Verse 50
दुर्योधन उवाच अधीतं विधिवद् दत्तं भू: प्रशास्ता ससागरा
দুর্যোধন বলল—“আমি বিধিমতো অধ্যয়ন করেছি, নিয়মমাফিক দান করেছি, এবং সাগরসমেত পৃথিবী শাসন করেছি।”
Verse 51
यदि क्षत्रबन्धूनां स्वधर्ममनुपश्यताम्
দুর্যোধন বলল—“যদি যারা কেবল ক্ষত্রিয়দের আত্মীয়মাত্র, অথচ যোদ্ধার পদ দাবি করে, তারা নিজেদের স্বধর্মের দিকে সত্যভাবে দৃষ্টি না রাখে…”
Verse 52
देवाह्ा मानुषा भोगा: प्राप्ता असुलभा नृपै:
“দেব ও মানুষের যোগ্য ভোগ—যা রাজাদের পক্ষেও দুর্লভ—আমি লাভ করেছি।”
Verse 53
ससुहत् सानुगश्नैव स्वर्ग गन्ताहमच्युत
“হে অচ্যুত! আমি আমার সুহৃদ ও অনুচরদের সঙ্গে স্বর্গে গমন করব।”
Verse 54
यूयं निहतसंकल्पा: शोचन्तो वर्तयिष्यथ । अच्युत! मैं सुहदों और सेवकोंसहित स्वर्गलोकमें जाऊँगा और तुमलोग भग्नमनोरथ होकर शोचनीय जीवन बिताते रहोगे || ५३ ह ।।
“তোমরা সংকল্পভঙ্গ হয়ে শোকে দিন কাটাবে। হে অচ্যুত! আমি আমার সুহৃদ ও সেবকদের সঙ্গে স্বর্গলোকে গমন করব; আর তোমরা ভগ্ন-মনোরথ হয়ে করুণ জীবন যাপন করবে। ভীম যে পায়ে আমার মস্তকে আঘাত করেছে, তাতে আমার কোনো বিষাদ নেই; কারণ অল্পক্ষণেই কাক, কঙ্ক ও গৃধ্র এই দেহের উপর পা রাখবে।” সঞ্জয় বললেন—বুদ্ধিমান কুরু-রাজের এই বাক্য শেষ হলে…
Verse 55
अवादयन्त गन्धर्वा वादित्र॑ं सुमनोहरम्
সঞ্জয় বললেন—গন্ধর্বরা অতিশয় মনোহর বাদ্য বাজাল।
Verse 56
जगुश्नाप्सरसो राज्ञो यश:सम्बद्धमेव च | गन्धर्वगण अत्यन्त मनोहर बाजे बजाने लगे और अप्सराएँ राजा दुर्योधनके सुयशसम्बधी गीत गाने लगीं ।।
সঞ্জয় বললেন—অপ্সরারা রাজার যশ-সম্পর্কিত গান গাইতে লাগল, আর গন্ধর্বগণ অতিশয় মনোহর বাদ্য বাজাতে শুরু করল। সেই মুহূর্তে সিদ্ধগণ উচ্চারণ করল—“সাধু! সাধু! হে রাজন!” তারপর পবিত্র ও সুগন্ধময়, কোমল ও সুখদায়ক বায়ু বইতে লাগল। সর্বদিক আলোয় উদ্ভাসিত হল, আর আকাশ বৈদূর্য-মণির মতো দীপ্তি ছড়াল।
Verse 57
ववौ च सुरभिर्वायु: पुण्यगन्धो मृदुः सुख: । व्यराजंश्व दिश: सर्वा नभो वैदूर्यसंनिभम्
সঞ্জয় বললেন—সুগন্ধময় বায়ু বইতে লাগল—পবিত্র গন্ধযুক্ত, কোমল ও সান্ত্বনাদায়ক। সব দিক দীপ্তিতে ঝলমল করল, আর আকাশ বৈদূর্য (লাজুর) পাথরের মতো উজ্জ্বল হয়ে উঠল। এ দৃশ্য যেন শুভ ও অলৌকিক সম্মতির ইঙ্গিত—যেন যুদ্ধের হিংসার মাঝেও ধর্ম এক মুহূর্ত শান্তির রূপে প্রকাশ পেল।
Verse 58
अत्यद्भुतानि ते दृष्टवा वासुदेवपुरोगमा: । दुर्योधनस्य पूजां तु दृष्टवा ब्रीडामुपागमन्,श्रीकृष्ण आदि सब लोग ये अद्भुत बातें और दुर्योधनकी यह पूजा देखकर बहुत लज्जित हुए
সঞ্জয় বললেন—সেই অতিশয় আশ্চর্য ঘটনাগুলি দেখে, এবং বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ)-অগ্রগামী সকলেই দুর্যোধনের প্রতি প্রদত্ত পূজা-সম্মান দেখে লজ্জায় আচ্ছন্ন হল।
Verse 59
हतांश्चाधर्मतः श्रुत्वा शोकार्ता: शुशुचुर्हि ते । भीष्म द्रोणं तथा कर्ण भूरिश्रवसमेव च,भीष्म, द्रोण, कर्ण और भूरिश्रवाको अधर्मपूर्वक मारा गया सुनकर सब लोग शोकसे व्याकुल हो खेद प्रकट करने लगे
সঞ্জয় বললেন—ভীষ্ম, দ্রোণ, কর্ণ এবং ভূরিশ্রবা—এঁদের অধর্মপূর্বক নিহত হওয়ার সংবাদ শুনে তারা শোকে ব্যাকুল হয়ে কাঁদতে লাগল ও বিলাপ প্রকাশ করল।
Verse 60
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वनें श्रीकृष्णका बलदेवजीको सान्त्वना देनाविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ
পাণ্ডবদের মন বিষণ্ণ ও চিন্তায় নিমগ্ন দেখে, মেঘগর্জন ও দুন্দুভির ন্যায় গম্ভীর কণ্ঠস্বরবিশিষ্ট শ্রীকৃষ্ণ তাদের উদ্দেশে এই কথা বললেন।
Verse 61
नैष शक्यो5तिशीघ्रास्त्रस्ते च सर्वे महारथा: । ऋजुयुद्धेन विक्रान्ता हन्तुं युष्माभिराहवे,पुरुषप्रवर! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्य लोग दुर्योधनको मारा गया देख हर्षमें भरकर अपने-अपने शंख बजाने लगे। श्रीकृष्णने पांचजन्य शंख बजाया ।।
সঞ্জয় বললেন— হে পুরুষশ্রেষ্ঠ! এরা সকলেই মহারথী, অতি দ্রুত অস্ত্রপ্রয়োগে পারদর্শী এবং ঋজু-যুদ্ধে সুদৃঢ়; অতএব সরল সম্মুখযুদ্ধে তোমাদের পক্ষে এদের বধ করা সম্ভব নয়। তারপর ভগবান শ্রীকৃষ্ণ ও অন্যরা দুর্যোধনকে পতিত দেখে আনন্দে উল্লসিত হয়ে নিজ নিজ শঙ্খধ্বনি তুললেন। শ্রীকৃষ্ণ পাঞ্চজন্য বাজালেন। হর্ষিত অর্জুন উৎকৃষ্ট শঙ্খ দেবদত্ত ধ্বনিত করলেন; কুন্তীপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির অনন্তবিজয়; আর ভয়ংকর কর্মবীর বৃকোদর ভীম মহাশঙ্খ পৌণ্ড্র বাজালেন। নকুল ও সহদেব যথাক্রমে সুঘোষ ও মণিপুষ্পক বাজালেন। ধৃষ্টদ্যুম্ন জৈত্র এবং সাত্যকি নন্দিবর্ধন ধ্বনিত করলেন। হে ভারতশ্রেষ্ঠ! সেই মহাশঙ্খনাদের গর্জনে সমগ্র আকাশ পূর্ণ হয়ে উঠল, আর পৃথিবী যেন কেঁপে উঠল। এরপর পাণ্ডবসেনায় শঙ্খ, ভেরী, পণব, আনক ও গোমুখ প্রভৃতি বাদ্য বাজতে লাগল; সম্মিলিত শব্দ প্রবল গর্জনে পরিণত হল। আরও অনেকেই স্তোত্র ও মঙ্গলবাণীতে পাণ্ডবদের প্রশংসা করতে লাগল।
Verse 62
“यह दुर्योधन अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाला था, अतः इसे कोई जीत नहीं सकता था और वे भीष्म, द्रोण आदि महारथी भी बड़े पराक्रमी थे। उन्हें धर्मानुकूल सरलतापूर्वक युद्धके द्वारा आपलोग नहीं मार सकते थे ।।
সঞ্জয় বললেন— এই রাজা দুর্যোধনকে কখনও ধর্মসম্মত উপায়ে বধ করা যায় না। তদ্রূপ ভীষ্মপ্রমুখ সকল মহেষ্বাস মহারথী—সোজাসুজি, ধর্মবদ্ধ যুদ্ধে তোমাদের দ্বারা তাদের পতিত করা সম্ভব ছিল না।
Verse 63
मयानेकैरुपायैस्तु मायायोगेन चासकृत् | हतास्ते सर्व एवाजी भवतां हितमिच्छता,“आपलोगोंका हित चाहते हुए मैंने ही बारंबार मायाका प्रयोग करके अनेक उपायोंसे युद्धस्थलमें उन सबका वध किया
সঞ্জয় বললেন— তোমাদের মঙ্গল কামনা করে আমি বারবার মায়াযোগ ও নানা কৌশলের আশ্রয় নিয়েছিলাম; সেই কারণেই যুদ্ধক্ষেত্রে তারা সকলেই নিহত হয়েছে।
Verse 64
यदि नैवंविध॑ जातु कुर्या जिह्ममहं रणे । कुतो वो विजयो भूय: कुतो राज्यं कुतो धनम्
সঞ্জয় বললেন— যদি আমি যুদ্ধের মধ্যে কখনও এ রকম বাঁকা কৌশল অবলম্বন না করতাম, তবে তোমাদের বিজয় কোথায়? রাজ্যই বা কোথায়, ধনই বা কোথা থেকে আসত?
Verse 65
ते हि सर्वे महात्मानश्वत्वारोडतिरथा भुवि | न शकक््या धर्मतो हन्तुं लोकपालैरपि स्वयम्
সঞ্জয় বললেন— ভীষ্ম, দ্রোণ, কর্ণ ও ভূরিশ্রবা—এই চার মহানুভাব পৃথিবীতে অতিরথী রূপে প্রসিদ্ধ ছিলেন। ধর্মযুদ্ধের বিধানে আবদ্ধ থাকলে স্বয়ং লোকপালরাও তাদের বধ করতে সক্ষম হতেন না।
Verse 66
तथैवायं गदापाणिर्धातिराष्ट्री गतक्लम: । न शकक््यो धर्मतो हन्तुं कालेनापीह दण्डिना
সঞ্জয় বললেন—এই গদাধারী ধৃতরাষ্ট্রপুত্র যুদ্ধক্লান্ত নয়; ধর্মসম্মত উপায়ে এখানে তাকে দণ্ডধারী কালও বধ করতে পারত না।
Verse 67
न च वो हृदि कर्तव्यं यदयं घातितो रिपु: । मिथ्यावध्यास्तथोपायैर्बहव: शत्रवोदधिका:
আর এই শত্রু নিহত হয়েছে—এ কথা তোমরা হৃদয়ে ভার করে রেখো না। এর চেয়েও অধিক বলবান বহু শত্রু নানা উপায় ও নীতিকৌশলে বধযোগ্য হয়।
Verse 68
पूर्वरनुगतो मार्गों देवैरसुरघातिभि: । सद्धिश्वानुगतः पन्था: स सर्वैरनुगम्यते
অসুরনাশক পূর্বতন দেবতারা যে পথ অনুসরণ করেছিলেন, সেই পথই সৎপুরুষেরাও গ্রহণ করেছেন; আর সেই পথই সকলের দ্বারা অনুসৃত হয়।
Verse 69
कृतकृत्याश्च सायाह्वे निवासं रोचयामहे । साथ्चनागरथा: सर्वे विश्रमामो नराधिपा:
সন্ধ্যাবেলায় আমাদের কাজ সম্পন্ন হয়েছে; তাই আমরা শিবিরে নিবাস স্থাপন করতে চাই। হে নরাধিপগণ, আমরা সবাই অশ্ব, নাগ (হস্তী) ও রথসহ বিশ্রাম করি।
Verse 70
वासुदेववच: श्रुत्वा तदानीं पाण्डवै: सह । पज्चाला भृशसंदह्ृष्टा विनेदु: सिंहसंघवत्
বাসুদেবের সেই বাক্য শুনে তখন পাণ্ডবদের সঙ্গে সমগ্র পাঞ্চাল অত্যন্ত হর্ষিত হল এবং সিংহদলের মতো গর্জন করে উঠল।
Verse 71
ततः प्राध्मापयन् शड्खान् पाउ्चजन्यं च माधव: । ह्ृष्टा दुर्योधन दृष्टवा निहतं पुरुषर्षभ
তখন মাধব (কৃষ্ণ) শঙ্খধ্বনি করালেন—বিশেষত পাঞ্চজন্য। পুরুষশ্রেষ্ঠ দুর্যোধন নিহত হয়েছে দেখে যোদ্ধারা আনন্দে উল্লসিত হল; অধর্মী নেতার পতনে যুদ্ধের ভার লাঘব ও ধর্মস্থাপনার আভাস মিলল।
Verse 183
असकृद् वाम्भिरुग्राभिनिहतो होष मन्दधी: । “नरेश्वरो! मरे हुए शत्रुको पुनः मारना उचित नहीं है। तुमलोगोंने इस मन्दबुद्धि दुर्योधनको बारंबार कठोर वचनोंद्वारा घायल किया है
সঞ্জয় বললেন: “কঠোর বাক্যে বারবার আঘাতপ্রাপ্ত হয়েও সেই মন্দবুদ্ধি এখনও চিৎকার করে। হে নরেশ্বর! যে শত্রু প্রায় মৃত, তাকে আবার আঘাত করা শোভন নয়। তোমরা কঠিন কথায় এই মন্দমতি দুর্যোধনকে বারংবার বিদ্ধ করেছ।”
Verse 196
लुब्ध: पापसहायश्च सुहदां शासनातिग: । “यह निर्लज्ज पापी तो उसी समय मर चुका था जब लोभमें फँसा और पापियोंको अपना सहायक बनाकर सुहृदोंके शासनसे दूर रहने लगा
সঞ্জয় বললেন: “লোভী, পাপীদের সহায়তায় বলীয়ান, আর সুহৃদদের উপদেশ অতিক্রমকারী—এমন নির্লজ্জ পাপী আসলে সেই মুহূর্তেই মৃত, যখন সে লোভের ফাঁদে পড়ে দুষ্টদের সঙ্গ বেছে নেয় এবং বন্ধুদের পরামর্শ থেকে মুখ ফিরিয়ে নেয়।”
Verse 203
पाण्डुभ्य: प्रार्थ्मानो5पि पित्र्यमंशं न दत्तवान् | “विदुर, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म तथा सूंजयोंके बारंबार प्रार्थना करनेपर भी इसने पाण्डवोंको उनका पैतृक भाग नहीं दिया
সঞ্জয় বললেন: পাণ্ডবদের পক্ষে বারবার অনুরোধ করা সত্ত্বেও সে তাদের পিতৃসম্পত্তির ন্যায্য অংশ দেয়নি। বিদুর, দ্রোণ, কৃপ, ভীষ্ম এবং সঞ্জয়ের পুনঃপুন প্রার্থনাও পাণ্ডবদের ধর্মসঙ্গত উত্তরাধিকার ফিরিয়ে আনতে পারেনি।
Verse 273
अधर्मेण गदायुद्धे यदहं विनिपातित: । '“ओ कंसके दासके बेटे! मैं जो गदायुद्धमें अधर्मसे मारा गया हूँ, इस कुकृत्यके कारण क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती है?
সঞ্জয় বললেন: “গদাযুদ্ধে অধর্মের দ্বারা আমাকে পতিত করা হয়েছে। হে কংসের দাসের পুত্র! এই কুকর্মে তোমার কি লজ্জা জাগে না?”
Verse 286
कि न विज्ञातमेतन्मे यदर्जुनमवोच था: । 'भीमसेनको मेरी जाँघें तोड़ डालनेका मिथ्या स्मरण दिलाते हुए तुमने अर्जुनसे जो कुछ कहा था, क्या वह मुझे ज्ञात नहीं है?
সঞ্জয় বললেন—“এখানে এমন কী আছে যা আমার অজানা? ভীমসেনের আমার উরু ভাঙার প্রতিজ্ঞার মিথ্যা স্মরণ করিয়ে সেই অজুহাতে তুমি অর্জুনকে যা বলেছিলে—তা কি আমার অজানা?”
Verse 303
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य घातितस्ते पितामह: । “जो प्रतिदिन शूरवीरोंका भारी संहार मचा रहे थे, उन पितामह भीष्मका तुमने शिखण्डीको आगे रखकर वध कराया
সঞ্জয় বললেন—“শিখণ্ডীকে অগ্রে রেখে তুমি তোমার পিতামহকে নিহত করালে। যিনি প্রতিদিন বীরযোদ্ধাদের মহাসংহার ঘটাচ্ছিলেন, সেই ভীষ্মই তোমার এই কৌশলে পতিত হলেন।”
Verse 316
आचार्यो न्यासित: शस्त्र कि तन्न विदितं मया । “दुर्मते! अश्वत्थामाके सदृश नामवाले एक हाथीको मारकर तुमलोगोंने द्रोणाचार्यके हाथसे शस्त्र नीचे डलवा दिया था, क्या वह मुझे ज्ञात नहीं है?
সঞ্জয় বললেন—“আচার্য অস্ত্র নামিয়ে দিলেন—এ কথা কি আমার অজানা? হে দুর্মতি! ‘অশ্বত্থামা’ নামধারী এক হাতিকে মেরে তোমরা দ্রোণাচার্যের হাত থেকে অস্ত্র ফেলে দিতে বাধ্য করেছিলে—তা কি আমার অজানা?”
Verse 326
पात्यमानस्त्वया दृष्टो न चैनं त्वमवारय: । “इस नृशंस धृष्टद्युम्नने पराक्रमी आचार्यको उस अवस्थामें मार गिराया, जिसे तुमने अपनी आँखों देखा; किंतु मना नहीं किया
সঞ্জয় বললেন—“তুমি তাকে পতিত হতে দেখেছিলে, তবু তাকে নিবৃত্ত করনি। সেই নিষ্ঠুর ধৃষ্টদ্যুম্ন যে অবস্থায় পরাক্রমী আচার্যকে হত্যা করে ফেলল, তা তুমি স্বচক্ষে দেখেও বাধা দিলে না।”
Verse 336
घटोत्कचे व्यंसयत: कस्त्वत्त: पापकृत्तम: । 'पाण्डुपुत्र अर्जुनके वधके लिये माँगी हुई इन्द्रकी शक्तिको तुमने घटोत्कचपर छुड़वा दिया। तुमसे बढ़कर महापापी कौन हो सकता है?
সঞ্জয় বললেন—“ঘটোৎকচ ধ্বংস হতে থাকলে তোমার চেয়ে বড় পাপী কে? পাণ্ডুপুত্র অর্জুনকে বধ করার জন্য প্রাপ্ত ইন্দ্রের শক্তি তুমি ঘটোৎকচের ওপর নিক্ষেপ করলে—তোমার চেয়ে মহাপাপী আর কে?”
Verse 363
पातित: समरे कर्णश्षृक्रव्यग्रो$ग्रणी्नणाम् । “मनुष्योंमें अग्रगण्य कर्ण अर्जुनको जीतनेकी इच्छासे उत्तम पराक्रम कर रहा था। उस समय नागराज अश्वसेनको जो कर्णके बाणके साथ अर्जुनके वधके लिये जा रहा था
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধে কর্ণ নিহত হলেন—নেতাদের মধ্যে অগ্রগণ্য, বীরদের মধ্যে ব্যাঘ্রসম। অর্জুনকে জয় করার অভিপ্রায়ে তিনি শ্রেষ্ঠ পরাক্রম প্রদর্শন করছিলেন; সেই সময় কর্ণের বাণে আরূঢ় হয়ে অর্জুন-বধে ধাবমান নাগরাজ অশ্বসেনকে তোমরা নিজ প্রচেষ্টায় ব্যর্থ করে দিলে। পরে কর্ণের রথচক্র গর্তে ডুবে গেলে তিনি তা তুলতে ব্যাকুল হয়ে পড়েন; তখন তাঁকে বিপদপীড়িত ও অসহায় জেনে তোমরা তাঁকে পতিত করলে। এই বর্ণনা কেবল যুদ্ধঘটনা নয়; প্রতিদ্বন্দ্বীর দুর্বল মুহূর্তে সুবিধা নেওয়ার নৈতিক টানাপোড়েনও এতে প্রকাশ পায়।
Verse 376
ऋजुना प्रतियुध्येथा न ते स्थाद् विजयो ध्रुवम् | “यदि मेरे, कर्णके तथा भीष्म और द्रोणाचार्यके साथ मायारहित सरलभावसे तुम युद्ध करते तो निश्चय ही तुम्हारे पक्षकी विजय नहीं होती
সঞ্জয় বললেন—তুমি যদি সরলভাবে, কোনো কৌশল-ছলনা (মায়া) ছাড়া যুদ্ধ করতে, তবে তোমার বিজয় নিশ্চিত হতো না। যদি তুমি আমার, কর্ণের, ভীষ্ম ও দ্রোণাচার্যের সঙ্গে সোজাসুজি যুদ্ধ করতে, তবে তোমাদের পক্ষের জয় ধ্রুব ছিল না।
Verse 386
स्वधर्ममनुतिष्ठन्तो वयं चान्ये च घातिता: । 'परंतु तुम-जैसे अनार्यने कुटिल मार्गका आश्रय लेकर स्वधर्म-पालनमें लगे हुए हमलोगोंका तथा दूसरे राजाओंका भी वध करवाया है”
সঞ্জয় বললেন—আমরা এবং অন্যরাও নিজেদের স্বধর্ম পালন করেও নিহত হলাম।
Verse 416
पाण्डवेभ्य: स्वराज्यं च लोभाच्छकुनिनिश्चयात् । ओ मूर्ख! तुम शकुनिकी सलाह मानकर मेरे माँगनेपर भी पाण्डवोंको उनकी पैतृक सम्पत्ति, उनका अपना राज्य लोभवश नहीं देना चाहते थे
বায়ুদেব বললেন—লোভে পড়ে এবং শকুনির পরামর্শে স্থির হয়ে তুমি পাণ্ডবদের তাদের নিজস্ব পৈতৃক রাজ্য—স্বরাজ্য—দাওনি, যদিও আমি নিজে চেয়েছিলাম। হে মূঢ়! ন্যায়ের বদলে লোভ বেছে নিয়ে তুমি তাদের প্রাপ্য অধিকার অস্বীকার করলে এবং সর্বনাশের পথ প্রশস্ত করলে।
Verse 466
त्वद्योषै्निहत: पाप तस्मादसि हतो रणे । जब पाण्डव शिकारके लिये तृणबिन्दुके आश्रमपर चले गये थे
বায়ু বললেন—হে পাপী! নিজেরই দোষে তুমি নিহত হয়েছ; তাই রণে তুমি পতিত। যখন পাণ্ডবরা শিকারের জন্য তৃণবিন্দুর আশ্রমে গিয়েছিল, তখন দুষ্ট জয়দ্রথ অরণ্যে দ্রৌপদীকে ক্লেশ দিয়েছিল। আর হে পাপাত্মা! তোমারই অপরাধে বহু যোদ্ধা একত্র হয়ে যুদ্ধক্ষেত্রে একা কিশোর অভিমন্যুকে হত্যা করেছিল। এই সকল কারণের ফলেই আজ তুমিও রণভূমিতে পতিত হয়েছ।
Verse 473
वैगुण्येन तवात्यर्थ सर्व हि तदनुछितम् । तुम जिन्हें हमारे किये हुए अनुचित कार्य बता रहे हो, वे सब तुम्हारे महान् दोषसे ही किये गये हैं
তোমারই গুরুতর বৈগুণ্যের কারণে তুমি যাকে অনুচিত বলছ, তা সবই প্রকৃতপক্ষে তোমারই দ্বারা ঘটেছে। যে কর্মগুলোকে তুমি ‘আমাদের করা’ বলে দোষারোপ করছ, সেগুলো তোমার মহাদোষ থেকেই উৎপন্ন।
Verse 493
कृतवानस्यकार्याणि विपाकस्तस्य भुज्यताम् | तुमने अत्यन्त प्रबल लोभ और तृष्णाके वशीभूत होकर न करनेयोग्य कार्य किये हैं; अतः उनका परिणाम अब तुम्हीं भोगो
অতিশয় লোভ ও তৃষ্ণার বশে তুমি যা অকৰ্তব্য কর্ম করেছ, তার পরিণত ফল এখন তুমিই ভোগ করো।
Verse 503
मूर्थ्नि स्थितममित्राणां को नु स्वन्ततरो मया । दुर्योधनने कहा--मैंने विधिपूर्वक अध्ययन किया
আমি শত্রুদের মস্তকের উপর পা রেখে দাঁড়িয়েছি। বলো তো, আমার চেয়ে অধিক সৌভাগ্যবান অন্ত কার হয়েছে?
Verse 513
तदिदं निधन प्राप्त को नु स्वन्ततरो मया । अपने धर्मपर दृष्टि रखनेवाले क्षत्रिय-बन्धुओंको जो अभीष्ट है, वही यह मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है; अतः मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ है?
এখন এই মৃত্যু আমার কাছে এসেছে; বলো তো, আমার চেয়ে উত্তম অন্ত কার? স্বধর্মে দৃষ্টি স্থির রাখা ক্ষত্রিয়-বান্ধবদের যে মৃত্যু কাম্য, সেই মৃত্যুই আমি লাভ করেছি; অতএব আমার সমান অন্ত আর কার হতে পারে?
Verse 526
ऐश्वर्य चोत्तमं प्राप्त को नु स्वन्ततरो मया । जो दूसरे राजाओंके लिये दुर्लभ हैं
আমি সর্বোচ্চ ঐশ্বর্য লাভ করেছি; বলো তো, আমার চেয়ে উৎকৃষ্ট অন্ত কার? যে ভোগ অন্য রাজাদের পক্ষে দুর্লভ, দেবতাদের ন্যায় সেগুলোই আমার কাছে সহজে এসেছে। আমি পরম ক্ষমতা ও সমৃদ্ধি পেয়েছি; অতএব আমার চেয়ে মহান অন্ত আর কার?
Verse 543
अपतत् सुमहद् वर्ष पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम् । संजय कहते हैं--राजन! बुद्धिमान् कुरुराज दुर्योधनकी यह बात पूरी होते ही उसके ऊपर पवित्र सुगंधवाले पुष्पोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी
সঞ্জয় বললেন—রাজন! বুদ্ধিমান কুরু-রাজ দুর্যোধন কথাগুলি শেষ করামাত্রই তার উপর পবিত্র সুগন্ধযুক্ত পুষ্পের মহাবৃষ্টি নেমে এল।
Verse 2536
क्ुद्धस्याशीविषस्येव च्छिन्नपुच्छस्य भारत । तत्पश्चात् उसने श्रीकृष्णकी ओर भौंहें टेढ़ी करके देखा
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! ক্রুদ্ধ, লেজ-কাটা বিষধর সাপের মতো সে ভ্রূকুটি কুটিল করে শ্রীকৃষ্ণের দিকে তাকাল; তার দেহ অর্ধেক উঁচু হয়ে উঠেছিল। তখন রাজা দুর্যোধন সেই উন্মত্ত সর্পেরই সদৃশ মনে হচ্ছিল—লেজ ছিন্ন হওয়ায় যে সম্পূর্ণ দেহ তুলতে পারে না, তবু অর্ধদেহ উঁচিয়ে দৃষ্টিতে দংশনের বিষ ঢালে।
Verse 2636
दुर्योधनो वासुदेवं वाग्भिरुग्राभिरार्दयत् उसे प्राणोंका अन्त कर देनेवाली भयंकर वेदना हो रही थी
সঞ্জয় বললেন—দুর্যোধন উগ্র ও কঠোর বাক্যে বসুদেবনন্দন শ্রীকৃষ্ণকে আঘাত করতে লাগল। তার নিজের দেহে প্রাণান্তকর ভয়ংকর যন্ত্রণা উঠছিল, তবু তা উপেক্ষা করে সে নিষ্ঠুর কথায় শ্রীকৃষ্ণকে বিদ্ধ করতে শুরু করল।
The chapter frames a transition dilemma: how victors should move from battlefield success to ethical stewardship—securing people and resources while acknowledging grief and the moral weight of destruction.
It illustrates deferred consequence and sustaining agency: destructive forces may be held in abeyance by higher protection or disciplined order, but once the sustaining condition ends, underlying causality manifests—prompting humility and responsibility after success.
Yes. Yudhiṣṭhira recalls Vyāsa’s maxim: 'yato dharmas tato kṛṣṇo yataḥ kṛṣṇas tato jayaḥ'—a thematic statement that frames victory as aligned with dharma and Kṛṣṇa’s guidance rather than mere force.
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