
Adhyāya 59: Vidura’s Admonition to Duryodhana after the Summons of Draupadī (सभा पर्व)
Upa-parva: Dyūta-anunaya / Vidura-nīti in the Dice-Game Aftermath (Sabhā-parva context)
The chapter opens with Duryodhana instructing the chamberlain (kṣattar) to bring Draupadī promptly to the assembly and to have her undertake menial cleaning, framing the command as a celebration of the Pandavas’ defeat. Vidura replies with a sequence of tightly linked warnings: Duryodhana is depicted as bound by the ‘noose’ of delusion, provoking forces beyond his control; anger is likened to handling deadly serpents; and Draupadī is argued not to be legitimately reduced to servitude because she was staked by one lacking rightful agency (anīśa) at the time of the wager. Vidura further characterizes gambling as a generator of enmity and great danger, and he develops an ethics of speech: avoid cruel, inflammatory, and destabilizing words whose effects return upon the speaker. Through analogies (self-harmful fruit, perilous door to naraka, inversions where stones float and boats sink), the counsel culminates in a prognosis that the Kuru line is approaching a comprehensive collapse because salutary advice is not heard and greed alone increases.
Chapter Arc: राजसूय-यश से दीप्त पाण्डव सभा में समस्त नरेश यथार्ह आसनों पर विराजते हैं; उसी भव्य शान्ति के बीच शकुनि का द्यूत-प्रस्ताव एक अशुभ छाया की तरह उतरता है। → शकुनि युधिष्ठिर को खेल के लिए उकसाता है। युधिष्ठिर द्यूत को ‘निकृति’ (छल), ‘पाप’ और क्षात्र-धर्म से परे बताकर आपत्ति करता है—जहाँ न पराक्रम है, न स्थिर नीति। फिर भी सभा-धर्म, क्षत्रिय-प्रतिस्पर्धा और चुनौती-स्वीकार की मर्यादा उसे खींचती है। दुर्योधन बीच में आकर कहता है कि दाँव पर धन-रत्न वह देगा, पर खेलेगा उसका मामा शकुनि—यानी खेल असमान और पूर्व-नियोजित होने का संकेत स्पष्ट होता जाता है। → युधिष्ठिर का निर्णायक प्रतिवाद—‘दूसरे के लिए दूसरे का जुआ मुझे विषम प्रतीत होता है’—और उसी क्षण दुर्योधन का कठोर उत्तर कि दाँव वह लगाएगा और शकुनि उसकी ओर से खेलेगा; यह घोषणा द्यूत को ‘प्रतिस्पर्धा’ से ‘षड्यंत्र’ में बदल देती है। → सभा में नियम-रूपरेखा बनती है: दुर्योधन दाँव देगा, शकुनि खेलेगा, और युधिष्ठिर को चुनौती स्वीकार करने के लिए नैतिक दबाव में रखा जाएगा। अध्याय का अंत निर्णय की दहलीज़ पर है—विवेक ने चेताया, पर प्रतिष्ठा और सभा-रीति ने जकड़ लिया। → युधिष्ठिर क्या द्यूत से विनिवृत्त होंगे, या ‘क्षत्रिय-लज्जा’ के नाम पर उसी खेल में उतरेंगे जो छल की गंध दे रहा है?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २३६ श्लोक मिलाकर कुल ६१३ “लोक हैं) भस्न्यैमा+ज () अिमान- एकोनषशष्टितमो< ध्याय: जूएके अनौचित्यके सम्बन्धमें युधिष्ठदिर और शकुनिका संवाद वैशम्पायन उवाच प्रविश्य तां सभां पार्था युधिष्ठिरपुरोगमा: । समेत्य पार्थिवान् सर्वान् पूजा्हनिभिपूज्य च,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्ठिर आदि कुन्तीकुमार उस सभामें पहुँचकर सब राजाओंसे मिले। अवस्थाक्रमके अनुसार समस्त पूजनीय राजाओंका बारी- बारीसे सम्मान करके सबसे मिलने-जुलनेके पश्चात् वे यथायोग्य सुन्दर रमणीय गलीचोंसे युक्त विचित्र आसनोंपर बैठे
বৈশম্পায়ন বললেন— জনমেজয়! যুধিষ্ঠিরকে অগ্রে রেখে পাণ্ডবরা সেই রাজসভায় প্রবেশ করলেন। সেখানে উপস্থিত সকল রাজাদের সঙ্গে সাক্ষাৎ করে, যাঁরা পূজনীয় তাঁদের যথাবিধি সম্মান জানালেন। তারপর সকলের সঙ্গে যথোচিত সম্ভাষণ সম্পন্ন করে, মনোরম গালিচা-বিছানো বিচিত্র আসনে তাঁরা উপবিষ্ট হলেন।
Verse 2
यथावय: समेयाना उपविष्टा यथार्हतः । आसजनेषु विचित्रेषु स्पर्थ्यास्तरणवत्सु च,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्ठिर आदि कुन्तीकुमार उस सभामें पहुँचकर सब राजाओंसे मिले। अवस्थाक्रमके अनुसार समस्त पूजनीय राजाओंका बारी- बारीसे सम्मान करके सबसे मिलने-जुलनेके पश्चात् वे यथायोग्य सुन्दर रमणीय गलीचोंसे युक्त विचित्र आसनोंपर बैठे
বৈশম্পায়ন বললেন— তাঁরা একত্র হয়ে বয়স ও মর্যাদা অনুযায়ী যথাযোগ্য স্থানে বসলেন—বিচিত্র ও শোভাময় আসনে, যেগুলি মনোহর গালিচা ও আচ্ছাদনে সজ্জিত ছিল।
Verse 3
तेषु तत्रोपविष्टेषु सर्वेष्वथ नृपेषु च शकुनि: सौबलस्तत्र युधिष्ठिरमभाषत,उनके एवं सब नरेशोंके बैठ जानेपर वहाँ सुबलकुमार शकुनिने युधिष्ठिरसे कहा
সেখানে সকল রাজা যথাস্থানে উপবিষ্ট হলে, সুবলপুত্র শকুনি তখন যুধিষ্ঠিরকে সম্বোধন করল।
Verse 4
शकुनिरुवाच उपस्तीर्णा सभा राजन सर्वे त्वयि कृतक्षणा: । अक्षानुप्त्वा देवनस्य समयो<स्तु युधिष्ठिर,शकुनि बोला--महाराज युधिष्ठिर! सभामें पासे फेंकनेवाला वस्त्र बिछा दिया गया है, सब आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब पासे फेंककर जूआ खेलनेका अवसर मिलना चाहिये
শকুনি বলল— রাজন যুধিষ্ঠির! সভায় পাশা খেলার জন্য বস্ত্র বিছানো হয়েছে; সকলেই আপনারই অপেক্ষায় আছে। এখন পাশা নিক্ষেপ করে দ্যূত খেলার সময় হওয়া উচিত।
Verse 5
युधिछिर उवाच निकृतिर्देवनं पापं न क्षात्रो5त्र पराक्रम: । न च नीतिर्धुवा राजन कि त्वं द्यूत॑ प्रशंभसि,युधिष्ठिरने कहा--राजन्! जूआ तो एक प्रकारका छल है तथा पापका कारण है! इसमें न तो क्षत्रियोचित पराक्रम दिखाया जा सकता है और न इसकी कोई निश्चित नीति ही है। फिर तुम द्यूतकी प्रशंसा क्यों करते हो?
যুধিষ্ঠির বললেন— রাজন! দ্যূত হলো এক প্রকার ছল এবং পাপের কারণ। এতে ক্ষত্রিয়ের পরাক্রম প্রকাশ পায় না, আর কোনো স্থির নীতিও থাকে না। তবে তুমি কেন এই পাশাখেলার প্রশংসা করছ?
Verse 6
न हि मान प्रशंसन्ति निकृती कितवस्य हि । शकुने मैव नो जैषीरमार्गेण नृशंसवत्,शकुने! जुआरियोंका छल-कपटमें ही सम्मान होता है; सज्जन पुरुष वैसे सम्मानकी प्रशंसा नहीं करते। अतः तुम क्रूर मनुष्यकी भाँति अनुचित मार्गसे हमें जीतनेकी चेष्टा न करो
যুধিষ্ঠির বললেন—প্রতারণা ও জুয়াড়ির কপট কৌশলে অর্জিত সম্মান সত্যই প্রশংসনীয় নয়। হে শকুনি! নিষ্ঠুরের মতো অধর্ম পথে আমাদের পরাজিত করতে চেষ্টা কোরো না; প্রতারণায় তোমার জয় হোক না।
Verse 7
शकुनिरुवाच यो वेत्ति संख्यां निकृती विधिज्ञ- श्रेष्टास्वखिन्न: कितवो$क्षजासु । महामतिर्यश्न जानाति द्यूतं स वै सर्व सहते प्रक्रियासु,शकुनि बोला--जिस अंकपर पासा पड़ता है, उसे जो पहले ही समझ लेता है, जो शठताका प्रतीकार करना जानता है एवं पासे फेंकने आदि समस्त व्यापारोंमें उत्साहपूर्वक लगा रहता है तथा जो परम बुद्धिमान् पुरुष द्यूतक्रीड़ाविषयक सब बातोंकी जानकारी रखता है, वही जूएका असली खिलाड़ी है; वह द्यूतक्रीड़ामें दूसरोंकी सारी शठतापूर्ण चेष्टाओंको सह लेता है
শকুনি বলল—যে পাশার পড়বার সংখ্যা আগেই বুঝতে পারে, যে নিয়ম জানে ও প্রতারণার কলায় পারদর্শী, যে শ্রেষ্ঠ প্রতিদ্বন্দ্বীর সামনেও নিরুৎসাহ হয় না, এবং তীক্ষ্ণ বুদ্ধিতে জুয়ার প্রতিটি প্রক্রিয়া জানে—সেই প্রকৃত জুয়াড়ি; খেলায় ওঠা সব কপট কৌশল সে সহ্য করেও পরাস্ত করতে পারে।
Verse 8
अक्षग्लह: सो5भिभवेत् परं न- स्तेनैव दोषो भवतीह पार्थ । दीव्यामहे पार्थिव मा विशड्कां कुरुष्य पाणं च चिरं च मा कृथा:
যুধিষ্ঠির বললেন—পাশার সেই নৈপুণ্যবান খেলোয়াড় নিশ্চয়ই আমাদের পরাভূত করবে; কিন্তু হে পার্থ, এ বিষয়ে দোষ তারই হবে। হে রাজন, আমরা খেলি—সন্দেহ কোরো না; পণ স্থির করো, বিলম্ব কোরো না।
Verse 9
कुन्तीनन्दन! यदि पासा विपरीत पड़ जाय तो हम खिलाड़ियोंमेंसे एक पक्षको पराजित कर सकता है; अतः जय-पराजय दैवाधीन पासोंके ही आश्रित है। उसीसे पराजयरूप दोषकी प्राप्ति होती है। हारनेकी शंका तो हमें भी है, फिर भी हम खेलते हैं। अतः भूमिपाल! आप शंका न कीजिये, दाँव लगाइये, अब विलम्ब न कीजिये ।। युधिषछिर उवाच एवमाहायमसितो देवलो मुनिसत्तम: । इमानि लोकद्दाराणि यो वै भ्राम्यति सर्वदा,युधिष्ठिरने कहा--मुनिश्रेष्ठ असित-देवलने, जो सदा इन लोदद्दारोंमें भ्रमण करते रहते हैं, ऐसा कहा है कि जुआरियोंके साथ शठतापूर्वक जो जूआ खेला जाता है, पाप है। धर्मानुकूल विजय तो युद्धमें ही प्राप्त होती है; अतः क्षत्रियोंके लिये युद्ध ही उत्तम है, जूआ खेलना नहीं
যুধিষ্ঠির বললেন—হে কুন্তীনন্দন! পাশা যদি প্রতিকূলে পড়ে, তবে খেলোয়াড়দের এক পক্ষকে পরাজিত করে; অতএব জয়-পরাজয় ভাগ্যাধীন এবং পাশার উপরেই নির্ভরশীল। সেখান থেকেই পরাজয়রূপ দোষ জন্মায়। আমাদেরও হারার আশঙ্কা আছে, তবু আমরা খেলি। অতএব হে ভূমিপাল, সন্দেহ কোরো না; পণ ধরো, আর এখন বিলম্ব কোরো না।
Verse 10
इदं वै देवनं पापं निकृत्या कितवै: सह । धर्मेण तु जयो युद्धे तत्परं न तु देवनम्,युधिष्ठिरने कहा--मुनिश्रेष्ठ असित-देवलने, जो सदा इन लोदद्दारोंमें भ्रमण करते रहते हैं, ऐसा कहा है कि जुआरियोंके साथ शठतापूर्वक जो जूआ खेला जाता है, पाप है। धर्मानुकूल विजय तो युद्धमें ही प्राप्त होती है; अतः क्षत्रियोंके लिये युद्ध ही उत्तम है, जूआ खेलना नहीं
যুধিষ্ঠির বললেন—প্রতারণাসহ জুয়াড়িদের সঙ্গে জুয়া খেলা নিঃসন্দেহে পাপ। ধর্মসম্মত বিজয় যুদ্ধেই লাভ হয়; অতএব ক্ষত্রিয়দের জন্য যথার্থ পথ যুদ্ধসাধনা, জুয়া নয়।
Verse 11
नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिम्मायया न चरन्त्युत । अजिद्दमशठं युद्धमेतत् सत्पुरुषव्रतम्,श्रेष्ठ पुरुष वाणीद्वारा किसीके प्रति अनुचित शब्द नहीं निकालते तथा कपटपूर्ण बर्ताव नहीं करते। कुटिलता और शठतासे रहित युद्ध ही सत्पुरुषोंका व्रत है
যুধিষ্ঠির বললেন—সৎপুরুষেরা অশোভন বাক্যে তাদের বাণীকে কলুষিত করেন না, আর মায়া-কপটের পথে চলেন না। এ যুদ্ধ বক্রতা ও প্রতারণাহীন; সংঘর্ষে এই সরলতাই ধার্মিকদের ব্রত।
Verse 12
शत्तितो ब्राह्मणान् नून॑ रक्षितुं प्रयतामहे । तद् वै वित्त मातिदेवीर्मा जैषी: शकुने परान्
যুধিষ্ঠির বললেন—আমরা আমাদের সাধ্য অনুযায়ী ব্রাহ্মণদের রক্ষা করতে অবশ্যই চেষ্টা করছি। অতএব, হে ধনবান শকুনি, অন্যদের—আমার ভাইদের—পরাজিত কোরো না।
Verse 13
शकुने! हमलोग जिस धनसे अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेका ही प्रयत्न करते हैं, उसको तुम जूआ खेलकर हमलोगोंसे हड़पनेकी चेष्टा न करो ।। निकृत्या कामये नाहं सुखान्युत धनानि वा । कितवस्येह कृतिनो वृत्तमेतन्न पूज्यते,मैं धूर्ततापूर्ण बर्तावके द्वारा सुख अथवा धन पानेकी इच्छा नहीं करता; क्योंकि जुआरीके कार्यको विद्वान् पुरुष अच्छा नहीं समझते
যুধিষ্ঠির বললেন—হে শকুনি! যে ধন দিয়ে আমরা সাধ্য অনুযায়ী ব্রাহ্মণদের রক্ষা ও প্রতিপালনের চেষ্টা করি, তা পাশাখেলায় জিতে আমাদের কাছ থেকে কেড়ে নিতে চেষ্টা কোরো না। আমি প্রতারণার পথে সুখ বা ধন চাই না; কারণ এ জগতে জুয়াড়ির আচরণ জ্ঞানীরা সম্মানযোগ্য মনে করেন না।
Verse 14
शकुनिरुवाच श्रोत्रिय: श्रोत्रियानेति निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषो5भ्येति नाहुस्तां निकृतिं जना:,शकुनि बोला--युधिष्ठिर! श्रोत्रिय दिद्वान् दूसरे श्रोत्रिय विद्वानोंके पास जब उन्हें जीतनेके लिये जाता है, तब शठतासे ही काम लेता है। विद्वान् अविद्वानोंको शठतासे ही पराजित करता है; परंतु इसे जनसाधारण शठता नहीं कहते
শকুনি বলল—যুধিষ্ঠির! এক শ्रोত্রিয় পণ্ডিত যখন অন্য শ्रोত্রিয় পণ্ডিতদের কাছে তাদের পরাস্ত করতে যায়, তখন সে কৌশলই অবলম্বন করে। তেমনি পণ্ডিত ব্যক্তি অপণ্ডিতকে চাতুর্যে জয় করে; কিন্তু লোকেরা একে ‘প্রতারণা’ বলে না।
Verse 15
अक्षेहि शिक्षितो5भ्येति निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषो5भ्येति नाहुस्तां निकृतिं जना:,धर्मराज! जो द्यूतविद्यामें पूर्ण शिक्षित है, वह अशिक्षितोंपर शठतासे ही विजय पाता है। विद्वान् पुरुष अविद्वानोंको जो परास्त करता है, वह भी शठता ही है; किंतु लोग उसे शठता नहीं कहते
যুধিষ্ঠির বললেন—পাশাখেলায় যে সম্পূর্ণ প্রশিক্ষিত, সে অপ্রশিক্ষিতদের উপর কেবল ছলেই জয়ী হয়। তেমনি পণ্ডিত ব্যক্তি যখন অপণ্ডিতকে পরাস্ত করে, সেটিও এক প্রকার ছল; কিন্তু লোকেরা তাকে ছল বলে না।
Verse 16
अकृतान्त्र कृतास्त्रश्न दुर्बलं बलवत्तर: । एवं कर्मसु सर्वेषु निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषो5भ्येति नाहुस्तां निकृतिं जना:,धर्मराज युधिष्ठिर! अस्त्रविद्यामें निपुण योद्धा अनाड़ीको एवं बलिष्ठ पुरुष दुर्बलको शठतासे ही जीतना चाहता है। इस प्रकार सब कार्योंमें विद्वान् पुरुष अविद्वानोंको शठतासे ही जीतते हैं; किंतु लोग उसे शठता नहीं कहते
ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির! যেমন অস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী যোদ্ধাকে কোনো অনভিজ্ঞ ব্যক্তি ছলনা করে জয় করতে চায়, তেমনি শক্তিমান দুর্বলকে কপটতায় পরাভূত করে। এইভাবেই সকল কর্মে বিদ্বানরা কৌশল-প্রয়োগে অবিদ্বানদের উপর প্রাধান্য লাভ করে; কিন্তু লোকেরা তাকে ‘শঠতা’ বলে না।
Verse 17
एवं त्वं मामिहाभ्येत्य निकृतिं यदि मन्यसे । देवनाद् विनिवर्तस्व यदि ते विद्यते भयम्
যদি তুমি এখানে আমার কাছে এসে মনে কর যে আমার সঙ্গে ছল করবে, তবে দেব-নাদের ধ্বনি শুনেই ফিরে যাও—যদি তোমার মধ্যে এখনও ভয় অবশিষ্ট থাকে।
Verse 18
इसी प्रकार आप यदि मेरे पास आकर यह मानते हैं कि आपके साथ शठता की जायगी एवं यदि आपको भय मालूम होता है तो इस जूएके खेलसे निवृत्त हो जाइये ।। युधिछिर उवाच आहूतो न निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् । विधिश्व॒ बलवान् राजन् दिष्टस्यास्मि वशे स्थित:,युधिष्ठिरने कहा--राजन्! मैं बुलानेपर पीछे नहीं हटता, यह मेरा निश्चित व्रत है। दैव बलवान है। मैं दैवके वशमें हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—রাজন! আহ্বান পেলে আমি ফিরে যাই না; এ আমার স্থির ব্রত। বিধি প্রবল; আমি দैবের অধীনেই অবস্থান করি।
Verse 19
अस्मिन् समागमे केन देवनं मे भविष्यति । प्रतिपाणश्च॒ को<न्यो<$स्ति ततो द्यूतं प्रवर्तताम्,अच्छा तो यहाँ जिन लोगोंका जमाव हुआ है, उनमें किसके साथ मुझे जूआ खेलना होगा? मेरे मुकाबलेमें बैठकर दूसरा कौन पुरुष दाँव लगायेगा? इसका निश्चय हो जाय, तो जूएका खेल प्रारम्भ हो
তবে এই সভাসমাগমে কার সঙ্গে আমার পাশাখেলা হবে? আমার প্রতিপক্ষে বসে কে দান ধরবে? তা স্থির হোক, তারপর দ্যূত শুরু করা যাক।
Verse 20
दुर्योधन उवाच अहं दातास्मि रत्नानां धनानां च विशाम्पते
দুর্যোধন বলল—হে প্রজাপতি! আমি রত্ন ও ধনের দাতা।
Verse 21
युधिछिर उवाच अन्येनान्यस्यथ वै द्यूतं विषमं प्रतिभाति मे । एतद् विद्वन्नुपादत्स्व काममेवं प्रवर्तताम्,युधिष्ठिरने कहा--दूसरेके लिये दूसरेका जूआ खेलना मुझे तो अनुचित ही प्रतीत होता है। विद्वन्! इस बातको समझ लो, फिर इच्छानुसार जूएका खेल प्रारम्भ हो
যুধিষ্ঠির বললেন—অন্যের পক্ষ থেকে অন্যের জুয়া খেলা আমার কাছে অন্যায় ও অসঙ্গত বলে মনে হয়। হে বিদ্বান, বিষয়টি স্পষ্টভাবে বুঝে নাও; তারপর ইচ্ছা হলে সেইভাবেই খেলা চলুক।
Verse 59
इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरशकुनिसंवादे एकोनषष्टितमो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापवके अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें युधिष्ठिस्शकुनिसंवादविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দ্যূতপর্বে যুধিষ্ঠির-শকুনি সংলাপবিষয়ক ঊনষাটতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 203
मदर्थ देविता चायं शकुनिर्मातुलो मम । दुर्योधन बोला--महाराज! दाँवपर लगानेके लिये धन और रत्न तो मैं दूँगा; परंतु मेरी ओरसे खेलेंगे ये मेरे मामा शकुनि
দুর্যোধন বলল—মহারাজ! পণের জন্য ধনরত্ন আমি দেব; কিন্তু আমার পক্ষ থেকে পাশা ফেলবে আমার মামা শকুনি।
Whether coercive treatment of Draupadī can be justified through a wager when the one staking her is argued to be without rightful autonomy (anīśa); the dilemma tests the boundary between procedural claims and substantive dharma.
That a ruler must restrain anger and humiliating speech, avoid policy driven by greed, and recognize that dyūta and cruelty generate durable enmity and institutional ruin; ethical counsel is framed as a governance necessity.
No formal phalaśruti appears; instead, the chapter provides prognostic meta-commentary through Vidura’s warnings that ignoring pathya-vākya (beneficial counsel) accelerates collective downfall, positioning the episode as a cautionary ethical exemplar.