Adhyaya 53
Sabha ParvaAdhyaya 5327 Verses

Adhyaya 53

अक्षदेवन-प्रवर्तनम् | Commencement of the Dice Game

Upa-parva: Dyūta-Āhvāna (Dice-Invitation) Episode

Chapter 53.0 is a tightly structured dialogue that transitions from invitation to enacted contest. Śakuni announces the assembly is prepared and urges Yudhiṣṭhira to begin play, implying timeliness and readiness as justifications. Yudhiṣṭhira responds with an ethical critique: gambling is framed as sinful deception (nikṛti), lacking kṣātra valor and stable nīti; he warns against victory achieved by cruel or crooked means. Śakuni counters by redefining competence in dice as knowledge of procedure and calculation, normalizing endurance of the game’s processes. Yudhiṣṭhira cites ascetic authority (Asita Devala) to argue that righteous victory belongs to straightforward combat rather than trick-based play, and he emphasizes non-deceptive conduct as a satpuruṣa-vrata. Despite this, he accepts participation due to a vow not to withdraw when challenged and attributes events to overpowering destiny (diṣṭa/vidhi). Duryodhana declares himself the provider of wealth and jewels for the wagering while appointing Śakuni as his agent-player. The narrative frame (Vaiśaṃpāyana) then depicts the court’s convening—Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Vidura, and other kings—followed by the first wager of ornaments and Śakuni’s immediate declaration of Yudhiṣṭhira’s loss, establishing the chapter’s theme: ethical warning voiced, procedure activated, and institutional witnessing enabling escalation.

Chapter Arc: दुर्योधन धृतराष्ट्र के सम्मुख युधिष्ठिर के राजसूय-अभिषेक का वैभव गिनाने लगता है—कौन-कौन सत्यसंध, महाव्रती, यशस्वी राजा उनके चरणों में उपस्थित थे। → वह एक-एक कर उपहारों और सेवाओं का वर्णन करता है: असंख्य गौएँ, स्वर्ण-विभूषित रथ, श्वेत काम्बोज अश्व, दक्षिणात्य वस्त्र-आभूषण, मगध की सामग्री, गजेन्द्र, जल-कलश, और विविध प्रदेशों की राजकीय भेंटें—यह सब सुनाते-सुनाते उसका स्वर प्रशंसा से जलन में बदलता जाता है। → वैभव की सूची अचानक विषाद-घोष में फट पड़ती है: ‘यह युग मानो अन्धे विधाता से बँधा है—कनीयान बढ़ते हैं, ज्येष्ठ घटते हैं’; युधिष्ठिर की उन्नति देखकर वह स्वयं को कृश, विवर्ण और शोकाकुल बताता है। → धृतराष्ट्र के सामने दुर्योधन का ‘अभिषेक-वर्णन’ वस्तुतः ‘संताप-वर्णन’ बन जाता है—युधिष्ठिर की समृद्धि को वह अपने अपमान और हानि के रूप में अनुभव करता है, और यही भाव आगे की नीति-चालों का बीज बनता है। → दुर्योधन का यह संताप अब किस उपाय में बदलेगा—क्या वह इसे सहन करेगा या छल-प्रपंच का मार्ग चुनेगा?

Shlokas

Verse 1

मिस अल ह्यु हि त्रिपज्चाशत्तमो<ध्याय: दुर्योधनद्वारा युधिष्ठिरके अभिषेकका वर्णन दुर्योधन उवाच आयंस्तु ये वै राजान: सत्यसंधा महाव्रता: । पर्याप्तविद्या वक्तारो वेदोक्तावभूथप्लुता:

দুর্যোধন বলল—যে রাজারা এখানে এসেছেন, তাঁরা সত্য-সংকল্প, মহাব্রতধারী, বিদ্যায় পরিপূর্ণ, বাক্যে দক্ষ এবং বেদোক্ত মন্ত্র ও বিধানে সুপ্রশিক্ষিত।

Verse 2

धृतिमन्तो दह्वीनिषेवा धर्मात्मानो यशस्विन: । मूर्धाभिषिक्तास्ते चैनं राजान: पर्युपासते

তাঁরা ধৈর্যশীল, অগ্নিসেবায় নিবিষ্ট, ধর্মাত্মা ও যশস্বী; রাজ্যাভিষেকে অভিষিক্ত সেই রাজারা এই রাজাকে ঘিরে শ্রদ্ধায় সেবা করে।

Verse 3

दक्षिणार्थ समानीता राजभि: कांस्यदोहना: । आरण्या बहुसाहस्रा अपश्यंस्तत्र तत्र गा:

দুর্যোধন বলল—“পিতা! দক্ষিণার জন্য রাজারা কাঁসার দুধপাত্রে দোহনযোগ্য গাভী এনেছেন; কিন্তু আমি এখানে-সেখানে অরণ্যে বিচরণকারী বহু সহস্র গাভী দেখতে পাচ্ছি।”

Verse 4

दुर्योधन बोला--पिताजी! जो राजा आर्य, सत्यप्रतिज्ञ, महाव्रती, विद्वान, वक्ता, वेदोक्त यज्ञोंके अन्तमें अवभूथ-स्नान करनेवाले, धैर्यवानू, लज्जाशील, धर्मात्मा, यशस्वी तथा मूर्धाभिषिक्त थे, वे सभी इन धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते थे। राजाओंने दक्षिणामें देनेके लिये जो गौएँ मँगवायी थीं, उन सबको मैंने जहाँ-तहाँ देखा। उनके दुग्धपात्र काँसेके थे। वे सब-की-सब जंगलोंमें खुली चरनेवाली थीं तथा उनकी संख्या कई हजार थी।। आजहुस्तत्र सत्कृत्य स्वयमुद्यम्य भारत | अभिषेकार्थमव्यग्रा भाण्डमुच्चावचं नूपा:,भारत! राजालोग युधिष्ठिरके अभिषेकके लिये स्वयं ही प्रयत्न करके शान्तचित्त हो सत्कारपूर्वक छोटे-बड़े पात्र उठा-उठाकर ले आये थे। बाह्नीकनरेश रथ ले आये, जो सुवर्णसे सजाया गया था। सुदक्षिणने उस रथमें काम्बोजदेशके सफेद घोड़े जोत दिये

দুর্যোধন বলল—“পিতা! যেসব রাজা আচরণে আর্য, প্রতিজ্ঞায় সত্য, ব্রতে মহান, বিদ্বান ও বাক্পটু—যাঁরা বৈদিক যজ্ঞ সম্পন্ন করে শেষে অবভৃথ-স্নান করেছিলেন—যাঁরা ধৈর্যশীল, লজ্জাশীল, ধর্মাত্মা, যশস্বী এবং মূর্ধাভিষিক্ত শাসক—তাঁরা সকলেই ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে প্রণাম-উপাসনা করছিলেন। দক্ষিণা হিসেবে দেওয়ার জন্য রাজারা যে গাভীগুলি এনেছিলেন, আমি সেগুলি এখানে-সেখানে ছড়িয়ে থাকতে দেখেছি; তাদের দুধের পাত্র ছিল কাঁসার, তারা অরণ্যে মুক্তভাবে চরত, আর সংখ্যা ছিল বহু সহস্র। আর আজ, হে ভারত! তারা নিজেরাই শান্তচিত্তে সম্মানসহকারে যুধিষ্ঠিরের অভিষেকের জন্য উদ্যোগী হয়ে নানা রকম বড়-ছোট পাত্র বহন করে এনেছে। বাহ্লীক-রাজ সোনায় অলংকৃত রথ এনেছেন, আর সুদক্ষিণ সেই রথে কাম্বোজদেশীয় শ্বেত অশ্ব জুড়ে দিয়েছেন।”

Verse 5

बाह्लीको रथमाहार्षीज्जाम्बूनदविभूषितम्‌ । सुदक्षिणस्तु युयुजे श्वेतैः काम्बोजजै्हयै:,भारत! राजालोग युधिष्ठिरके अभिषेकके लिये स्वयं ही प्रयत्न करके शान्तचित्त हो सत्कारपूर्वक छोटे-बड़े पात्र उठा-उठाकर ले आये थे। बाह्नीकनरेश रथ ले आये, जो सुवर्णसे सजाया गया था। सुदक्षिणने उस रथमें काम्बोजदेशके सफेद घोड़े जोत दिये

“বাহ্লীক-রাজ জাম্বূনদ সোনায় অলংকৃত রথ আনলেন; আর সুদক্ষিণ তাতে কাম্বোজদেশীয় শ্বেত অশ্ব জুড়ে দিলেন।”

Verse 6

सुनीथ:ः प्रीतिमांश्वैव हानुकर्ष महाबल: । ध्वजं चेदिपतिश्वैवमहार्षीत्‌ स्वयमुद्यतम्‌,महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ) लगा दिया। चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी। दक्षिणदेशके राजाने कवच दिया। मगधनरेशने माला और पगड़ी प्रस्तुत की। महान्‌ धनुर्धर वसुदानने साठ वर्षकी अवस्थाका एक गजराज उपस्थित कर दिया। मत्स्यनरेशने सुवर्णजटित धुरी ला दी। एकलव्यने पैरोंके समीप जूते लाकर रख दिये। अवन्तीनरेशने अभिषेकके लिये अनेक प्रकारका जल एकत्र कर दिया। चेकितानने तृूणीर और काशिराजने धनुष अर्पित किया। शल्यने अच्छी मूठवाली तलवार तथा छींकेपर रखा हुआ सुवर्णभूषित कलश प्रदान किया

“মহাবলী সুনীথ আনন্দিত হয়ে সেই রথে হানুকর্ষ (নীচে লাগানো কাঠের অংশ) বসিয়ে দিলেন; আর চেদিরাজ নিজ হাতে, আগে থেকেই উত্তোলিত ধ্বজ, স্থাপন করলেন।”

Verse 7

दाक्षिणात्य: संनहनं स्रगुष्णीषे च मागध: । वसुदानो महेष्वासो गजेन्द्रं षष्टिहायनम्‌,महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ) लगा दिया। चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी। दक्षिणदेशके राजाने कवच दिया। मगधनरेशने माला और पगड़ी प्रस्तुत की। महान्‌ धनुर्धर वसुदानने साठ वर्षकी अवस्थाका एक गजराज उपस्थित कर दिया। मत्स्यनरेशने सुवर्णजटित धुरी ला दी। एकलव्यने पैरोंके समीप जूते लाकर रख दिये। अवन्तीनरेशने अभिषेकके लिये अनेक प्रकारका जल एकत्र कर दिया। चेकितानने तृूणीर और काशिराजने धनुष अर्पित किया। शल्यने अच्छी मूठवाली तलवार तथा छींकेपर रखा हुआ सुवर्णभूषित कलश प्रदान किया

“দক্ষিণদেশের রাজা সংনহন (সাজ-সরঞ্জাম/বর্মের বন্ধন) দিলেন; মগধ-রাজ মালা ও উষ্ণীষ (পাগড়ি) অর্পণ করলেন। মহাধনুর্ধর বসুদান ষাট বছরের এক গজেন্দ্র উপস্থিত করলেন।”

Verse 8

मत्स्यस्त्वक्षान्‌ हेमनद्धानेकलव्य उपानहौ । आव्न्त्यस्त्वभिषेकार्थमापो बहुविधास्तथा,महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ) लगा दिया। चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी। दक्षिणदेशके राजाने कवच दिया। मगधनरेशने माला और पगड़ी प्रस्तुत की। महान्‌ धनुर्धर वसुदानने साठ वर्षकी अवस्थाका एक गजराज उपस्थित कर दिया। मत्स्यनरेशने सुवर्णजटित धुरी ला दी। एकलव्यने पैरोंके समीप जूते लाकर रख दिये। अवन्तीनरेशने अभिषेकके लिये अनेक प्रकारका जल एकत्र कर दिया। चेकितानने तृूणीर और काशिराजने धनुष अर्पित किया। शल्यने अच्छी मूठवाली तलवार तथा छींकेपर रखा हुआ सुवर्णभूषित कलश प्रदान किया

দুর্যোধন বলল— “মৎস্যরাজ সোনায় বাঁধানো পাশা এনেছে। একলব্য আমার পায়ের কাছে পাদুকা রেখে দিয়েছে। আর অবন্তীর রাজা অভিষেকের জন্য নানা প্রকার জল সংগ্রহ করেছে।”

Verse 9

चेकितान उपासड्ले धनु: काश्य उपाहरत्‌ । असिं च सुत्सरुं शल्य: शैक्यं काउ्चनभूषणम्‌,महाबली सुनीथने बड़ी प्रसन्नताके साथ उसमें अनुकर्ष (रथके नीचे लगनेयोग्य काष्ठ) लगा दिया। चेदिराजने स्वयं उस रथमें ध्वजा फहरा दी। दक्षिणदेशके राजाने कवच दिया। मगधनरेशने माला और पगड़ी प्रस्तुत की। महान्‌ धनुर्धर वसुदानने साठ वर्षकी अवस्थाका एक गजराज उपस्थित कर दिया। मत्स्यनरेशने सुवर्णजटित धुरी ला दी। एकलव्यने पैरोंके समीप जूते लाकर रख दिये। अवन्तीनरेशने अभिषेकके लिये अनेक प्रकारका जल एकत्र कर दिया। चेकितानने तृूणीर और काशिराजने धनुष अर्पित किया। शल्यने अच्छी मूठवाली तलवार तथा छींकेपर रखा हुआ सुवर्णभूषित कलश प्रदान किया

দুর্যোধন বলল— “চেকিতান এগিয়ে এসে একটি ধনুক উপহার দিল; কাশীর রাজাও ধনুক অর্পণ করল। আর শল্য উৎকৃষ্ট মুঠিযুক্ত তলোয়ার এবং থালায় স্থাপিত স্বর্ণালঙ্কৃত কলস প্রদান করল।”

Verse 10

अभ्यषिज्चत्‌ ततो धौम्यो व्यासश्न सुमहातपा: । नारदं च पुरस्कृत्य देवलं चासितं मुनिम्‌,तदनन्तर धौम्य तथा महातपस्वी व्यासने देवर्षि नारद, देवल और असित मुनिको आगे करके युधिष्ठिरका अभिषेक किया

তারপর ধৌম্য ও মহাতপস্বী ব্যাস দেবর্ষি নারদকে অগ্রে রেখে—দেবল ও ঋষি অসিতকে সঙ্গে করে—যুধিষ্ঠিরকে অভিষিক্ত করলেন।

Verse 11

परशुरामजीके साथ वेदके पारंगत दूसरे विद्वान्‌ महर्षियोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा युधिष्ठिरका अभिषेक किया

পরশুরামের সঙ্গে বেদে পারদর্শী অন্যান্য বিদ্বান মহর্ষিরা পরম আনন্দে রাজা যুধিষ্ঠিরকে অভিষিক্ত করলেন।

Verse 12

अभिमजममुर्महात्मानो मन्त्रवद्‌ भूरिदक्षिणम्‌ । महेन्द्रमिव देवेन्द्र दिवि सप्तर्षयो यथा

সেই মহাত্মা ঋষিরা মন্ত্রোচ্চারণসহ, বিপুল দক্ষিণাযুক্ত যজ্ঞের ন্যায়, তাঁর সেবায় রত হলেন—যেমন স্বর্গে সপ্তর্ষি দেবরাজ মহেন্দ্র (ইন্দ্র)-কে পরিবেষ্টন করে থাকেন।

Verse 13

प्रीतिमन्त उपातिष्न्नभिषेकं महर्षय: । जामदग्न्येन सहितास्तथान्ये वेदपारगा:,जैसे स्वर्गमें देवराज इन्द्रके पास सप्तर्षि पधारते हैं, उसी प्रकार पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले महाराज युधिष्ठिरके पास बहुत-से महात्मा मन्त्रोच्चारण करते हुए पधारे थे ।। अधारयच्छत्रमस्य सात्यकि: सत्यविक्रम: । धनंजयश्न व्यजने भीमसेनश्षू पाण्डव:

দুর্যোধন বলল—যেমন স্বর্গে দেবরাজ ইন্দ্রের কাছে সপ্তর্ষিগণ উপস্থিত হন, তেমনই যথোচিত দক্ষিণাদাতা মহারাজ যুধিষ্ঠিরের অভিষেকে জামদগ্ন্য (পরশুরাম) সহ বেদপারগ বহু মহর্ষি মন্ত্রোচ্চারণ করতে করতে এসে উপস্থিত হলেন। সেই অনুষ্ঠানে সত্যবিক্রম সাত্যকি তাঁর মাথার উপর রাজছত্র ধারণ করল, আর ধনঞ্জয় (অর্জুন) ও পাণ্ডব ভীমসেন ব্যজন নাড়িয়ে সেবা করল।

Verse 14

सत्यपराक्रमी सात्यकिने युधिष्ठिरके लिये छत्र धारण किया तथा अर्जुन और भीमसेनने व्यजन डुलाये ।। चामरे चापि शुद्धे द्वे यमौ जगृहतुस्तथा । उपागृह्नाद्‌ यमिन्द्राय पुराकल्पे प्रजापति:

সত্যপরাক্রমী সাত্যকি যুধিষ্ঠিরের জন্য ছত্র ধারণ করল, আর অর্জুন ও ভীমসেন ব্যজন নাড়াল। তদ্রূপ যমজ দুই ভাই (নকুল-সহদেব) দুইটি নির্মল চামরও তুলে নিল। কথিত আছে, প্রাচীন কালে প্রজাপতি নিজে ইন্দ্রের জন্য এমনই ব্যজন ধারণ করেছিলেন।

Verse 15

तमस्मै शड्खमाहार्षीद्‌ वारुणं कलशोदधि: । शैक्यं निष्कसहस्रेण सुकृतं विश्वकर्मणा

তার জন্য সমুদ্র—বরুণের জলরাশির ভাণ্ডার—একটি শঙ্খ এনে দিল। সেই শঙ্খ ছিল অপূর্ব, সুগঠিত; বিশ্বকর্মা নির্মিত, এবং যার মূল্য ছিল এক হাজার নিষ্ক।

Verse 16

तेनाभिषिक्त: कृष्णेन तत्र मे कश्मलो5भवत्‌ | तथा नकुल और सहदेवने दो विशुद्ध चँवर हाथमें ले लिये। पूर्वकालमें प्रजापतिने इन्द्रके लिये जिस शंखको धारण किया था, वही वरुणदेवताका शंख समुद्रने युधिष्ठिरको भेंट किया था। विश्वकर्माने एक हजार स्वर्णमुद्राओंसे जिस शैक्यपात्र (छींकेपर रखे हुए सुवर्णकलश)-का निर्माण किया था, उसमें स्थित समुद्रजलको शंखमें लेकर श्रीकृष्णने युधिष्ठिरका अभिषेक किया। उस समय वहाँ मुझे मूर्च्छा आ गयी थी ।। गच्छन्ति पूर्वादपरं समुद्र चापि दक्षिणम्‌

সেখানে কৃষ্ণ যখন তাকে অভিষিক্ত করলেন, তখন আমার অন্তরে প্রচণ্ড কষ্ট নেমে এল। তারপর নকুল ও সহদেব হাতে নিল দুইটি নির্মল চামর। যে শঙ্খ প্রাচীন কালে প্রজাপতি ইন্দ্রের জন্য ধারণ করেছিলেন—সেই বরুণের শঙ্খই সমুদ্র যুধিষ্ঠিরকে উপহার দিল। বিশ্বকর্মা এক হাজার নিষ্ক ব্যয়ে নির্মিত শৈক্যপাত্রের স্বর্ণকলসে যে সমুদ্রজল ছিল, তা শঙ্খে নিয়ে শ্রীকৃষ্ণ যুধিষ্ঠিরকে অভিষেক করলেন। সেই মুহূর্তে আমি সেখানেই অচেতন হয়ে পড়লাম।

Verse 17

पिताजी! लोग जल लानेके लिये पूर्वसे पश्चिम समुद्रतक जाते हैं, दक्षिण समुद्रकी भी यात्रा करते हैं ।। उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात पतत्त्रिभि: | तत्र सम दध्मु: शतश: शड्खान्‌ मज़्लकारकान्‌,परंतु उत्तर समुद्रतक पक्षियोंके सिवा और कोई नहीं जाता; (किंतु वहाँ भी अर्जुन पहुँच गये।) वहाँ अभिषेकके समय सैकड़ों मंगलकारी शंख एक साथ ही जोर-जोरसे बजने लगे, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ जो तेजोहीन भूपाल थे, वे भयके मारे मूर्च्छित होकर गिर पड़े

পিতা! জল আনতে লোকেরা পূর্ব থেকে পশ্চিম সমুদ্র পর্যন্ত যায়, দক্ষিণ সমুদ্রেও যাত্রা করে; কিন্তু উত্তর সমুদ্রে পাখি ছাড়া আর কেউ যায় না—তবু অর্জুন সেখানে পৌঁছেছিল। সেখানে অভিষেককালে শত শত মঙ্গলশঙ্খ একসঙ্গে প্রবল ধ্বনিতে বাজতে লাগল; তাতে আমার শরীরে রোমাঞ্চ জাগল। আর যেসব রাজা তেজহীন ছিল, তারা ভয়ে অচেতন হয়ে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 18

प्राणदन्त समाध्मातास्ततो रोमाणि मे5हषन्‌ । प्रापतन्‌ भूमिपालाश्न ये तु हीना: स्वतेजसा,परंतु उत्तर समुद्रतक पक्षियोंके सिवा और कोई नहीं जाता; (किंतु वहाँ भी अर्जुन पहुँच गये।) वहाँ अभिषेकके समय सैकड़ों मंगलकारी शंख एक साथ ही जोर-जोरसे बजने लगे, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गये। उस समय वहाँ जो तेजोहीन भूपाल थे, वे भयके मारे मूर्च्छित होकर गिर पड़े

দুর্যোধন বলল—তখন প্রবল বেগে শঙ্খধ্বনি উঠতেই আমার শরীরের লোম খাড়া হয়ে গেল। আর যেসব রাজা নিজের তেজ ও সাহসে হীন ছিল, তারা ভয়ে মূর্ছিত হয়ে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 19

धृष्टद्युम्न: पाण्डवाश्व॒ सात्यकि: केशवोडष्टम: । सत्त्वस्था वीर्यसम्पन्ना हाुन्योन्यप्रियदर्शना:,धष्टद्युम्न, पाँचों पाण्डव, सात्यकि और आठवें श्रीकृष्ण--ये ही धैर्यपूर्वक स्थिर रहे। ये सभी पराक्रमसम्पन्न तथा एक-दूसरेका प्रिय करनेवाले हैं

দুর্যোধন বলল—ধৃষ্টদ্যুম্ন, পাঁচ পাণ্ডব, সাত্যকি এবং অষ্টম কেশব (কৃষ্ণ)—এঁরাই কেবল ধৈর্যে অটল রইল। সকলেই বীর্যে সমৃদ্ধ, এবং পরস্পরের প্রতি স্নেহ ও সদ্ভাব রাখে।

Verse 20

विसंज्ञान्‌ भूमिपान्‌ दृष्टवा मां च ते प्राहसंस्तदा । ततः प्रह्ृष्टो बीभत्सु: प्रादाद्धेमविषाणिनाम्‌,वे मुझे तथा अन्य राजाओंको अचेत हुए देखकर उस समय जोर-जोरसे हँस रहे थे। भारत! तदनन्तर अर्जुनने प्रसन्न होकर पाँच सौ बैलोंको, जिनके सींगोंमें सोना मँढ़ा हुआ था, मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंमें बाँ- दिया। पिताजी! न रन्तिदेव, न नाभाग, न मान्धाता, न मनु, न वेननन्दन राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष ही वैसे ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट थे, जैसे कि आज राजा युधिष्छिर हैं

দুর্যোধন বলল—আমাকে এবং অন্য রাজাদের ভূমিতে অচেতন পড়ে থাকতে দেখে তারা তখন উচ্চস্বরে হাসতে লাগল। তারপর প্রফুল্ল বিভৎসু অর্জুন সোনায় মোড়া শিংযুক্ত পাঁচশো বলদ শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের মধ্যে দান করল।

Verse 21

शतान्यनडुहां पज्च द्विजमुख्येषु भारत । न रन्तिदेवो नाभागो यौवनाश्वो मनुर्न च,वे मुझे तथा अन्य राजाओंको अचेत हुए देखकर उस समय जोर-जोरसे हँस रहे थे। भारत! तदनन्तर अर्जुनने प्रसन्न होकर पाँच सौ बैलोंको, जिनके सींगोंमें सोना मँढ़ा हुआ था, मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंमें बाँ- दिया। पिताजी! न रन्तिदेव, न नाभाग, न मान्धाता, न मनु, न वेननन्दन राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष ही वैसे ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट थे, जैसे कि आज राजा युधिष्छिर हैं

দুর্যোধন বলল—হে ভারত! শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের মধ্যে পাঁচশো বলদ বিতরণ করা হল। রন্তিদেব, নাভাগ, যুবনাশ্ব, এমনকি মনুও—কারও কাছে আজ রাজা যুধিষ্ঠিরের মতো এমন রাজঐশ্বর্য ছিল না।

Verse 22

न च राजा पृथुर्वैन्यो न चाप्पासीद्‌ भगीरथ: । ययातिर्नहुषो वापि यथा राजा युधिष्ठिर:,वे मुझे तथा अन्य राजाओंको अचेत हुए देखकर उस समय जोर-जोरसे हँस रहे थे। भारत! तदनन्तर अर्जुनने प्रसन्न होकर पाँच सौ बैलोंको, जिनके सींगोंमें सोना मँढ़ा हुआ था, मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंमें बाँ- दिया। पिताजी! न रन्तिदेव, न नाभाग, न मान्धाता, न मनु, न वेननन्दन राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष ही वैसे ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट थे, जैसे कि आज राजा युधिष्छिर हैं

দুর্যোধন বলল—ভেনপুত্র রাজা পৃথু, ভগীরথ, এমনকি যযাতি বা নহুষ—কারও কাছেই আজ রাজা যুধিষ্ঠিরের মতো রাজঐশ্বর্য ও দীপ্তি ছিল না।

Verse 23

यथातिमात्र कौन्तेय: श्रिया परमया युतः । राजसूयमवाप्यैवं हरिश्नन्द्र इव प्रभु:,कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर राजसूययज्ञ पूर्ण करके अत्यन्त उच्चकोटिकी राजलक्ष्मीसे सम्पन्न हो गये हैं। ये शक्तिशाली महाराज हरिश्वन्द्रकी भाँति सुशोभित होते हैं

কুন্তীনন্দন যুধিষ্ঠির রাজসূয় যজ্ঞ লাভ করে অতুল উচ্চ রাজলক্ষ্মীতে পরিপূর্ণ হয়েছেন। সেই পরাক্রান্ত প্রভু রাজা হরিশ্চন্দ্রের ন্যায় দীপ্তিমান হয়ে উঠেছেন।

Verse 24

एतां दृष्टवा श्रियं पार्थे हरिश्वन्द्रे यथा विभो । कथं तु जीवितं श्रेयो मम पश्यसि भारत,भारत! हरिश्वन्द्रकी भाँति कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी इस राजलक्ष्मीको देखकर मेरा जीवित रहना आप किस दृष्टिसे अच्छा समझते हैं?

হে ভারত! হরিশ্চন্দ্রের ন্যায় পার্থ (যুধিষ্ঠির)-এর এই রাজশ্রী দেখে তুমি কীভাবে মনে কর যে আমার বেঁচে থাকাই শ্রেয়? এমন সমৃদ্ধির সামনে আমার জীবনই বা কী মূল্যবান?

Verse 25

अन्धेनेव युगं॑ नद्धं विपर्यस्तं नराधिप । कनीयांसो विवर्धन्ते ज्येष्ठा हीयन्त एव च,राजन! यह युग अंधे विधातासे बँधा हुआ है। इसीलिये इसमें सब बातें उलटी हो रही हैं। छोटे बढ़ रहे हैं और बड़े हीन दशामें गिरते जा रहे हैं

হে নরাধিপ! এ যুগ যেন অন্ধ বিধাতার হাতে বাঁধা—তাই সবই উল্টো হয়ে যাচ্ছে। ক্ষুদ্র ও কনিষ্ঠরা বৃদ্ধি পাচ্ছে, আর জ্যেষ্ঠরা ক্রমে ক্ষয়প্রাপ্ত হচ্ছে।

Verse 26

एवं दृष्टवा नाभिविन्दामि शर्म समीक्षमाणो<पि कुरुप्रवीर । तेनाहमेवं कृशतां गतश्न विवर्णतां चैव सशोकतां च,कुरुप्रवीर! ऐसा देखकर अच्छी तरह विचार करनेपर भी मुझे चैन नहीं पड़ता। इसीसे मैं दुर्बल, कान्तिहीन और शोकमग्न हो रहा हूँ

হে কুরুপ্রবীর! এ সব দেখে, ভালো করে বিচার করেও আমি শান্তি পাই না। তাই আমি ক্রমে কৃশ হয়ে পড়ছি; আমার বর্ণ ও দীপ্তি ম্লান হয়েছে, আর আমি শোকে নিমগ্ন।

Verse 53

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे त्रिपठ्चाशत्तमो5ध्याय: ।। ५३ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापरववके अन्तर्गत झ्टूतपर्वमें दुर्योधनयंतापविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের অন্তর্গত দ্যূতপর্বে দুর্যোধনের সন্তাপ-বিষয়ক ত্রিপঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira must choose between his ethical judgment that dyūta is deceptive and socially corrosive, and his vow-bound commitment to not refuse a formal challenge, especially in a public sabhā setting where withdrawal is treated as dishonor.

The chapter illustrates how adharma can operate through socially sanctioned procedures: when institutions prioritize form over fairness, ethical clarity may be expressed yet still fail to prevent harmful outcomes.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary functions narratively through Vaiśaṃpāyana’s court-description, showing that collective witnessing and elite participation confer legitimacy on a process even when its morality is contested.