अक्षदेवन-प्रवर्तनम् | Commencement of the Dice Game
शतान्यनडुहां पज्च द्विजमुख्येषु भारत । न रन्तिदेवो नाभागो यौवनाश्वो मनुर्न च,वे मुझे तथा अन्य राजाओंको अचेत हुए देखकर उस समय जोर-जोरसे हँस रहे थे। भारत! तदनन्तर अर्जुनने प्रसन्न होकर पाँच सौ बैलोंको, जिनके सींगोंमें सोना मँढ़ा हुआ था, मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंमें बाँ- दिया। पिताजी! न रन्तिदेव, न नाभाग, न मान्धाता, न मनु, न वेननन्दन राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष ही वैसे ऐश्वर्यसम्पन्न सम्राट थे, जैसे कि आज राजा युधिष्छिर हैं
śatāny anaḍuhāṃ pañca dvijamukhyeṣu bhārata | na rantidevo nābhāgo yauvanāśvo manur na ca ||
দুর্যোধন বলল—হে ভারত! শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের মধ্যে পাঁচশো বলদ বিতরণ করা হল। রন্তিদেব, নাভাগ, যুবনাশ্ব, এমনকি মনুও—কারও কাছে আজ রাজা যুধিষ্ঠিরের মতো এমন রাজঐশ্বর্য ছিল না।
दुर्योधन उवाच