Adhyaya 52
Sabha ParvaAdhyaya 5258 Verses

Adhyaya 52

Adhyāya 52 (Sabhā-parva): Vidura Invites Yudhiṣṭhira to Hastināpura for the Dice Match

Upa-parva: Dyūta-āhvāna (Invitation to the Dice-Game) — Vidura’s Embassy Episode

Vaiśaṃpāyana narrates Vidura’s swift journey, sent by Dhṛtarāṣṭra, to the Pāṇḍavas. Vidura is received with honor by Yudhiṣṭhira, who immediately notices Vidura’s lack of cheer and inquires about the welfare of Dhṛtarāṣṭra, his sons, and the realm. Vidura reports the king’s well-being and delivers the formal invitation: a new assembly comparable to the Pāṇḍavas’ own, a reunion with kin, and a proposed friendly dice-game. Vidura then states the dangerous core of the arrangement—experienced gamblers are already seated—implying manipulation. Yudhiṣṭhira articulates a dharmic objection: gambling breeds quarrel and is disfavored by the wise; he asks who besides Dhṛtarāṣṭra’s sons will play, and Vidura lists prominent participants including Śakuni. Yudhiṣṭhira recognizes the peril of deceptive play yet resolves to go, asserting he will not refuse the king’s directive and that once summoned he does not turn back, treating this as an established vow. Preparations follow: the Pāṇḍavas travel with Draupadī and attendants to Hastināpura, are welcomed by elders and kin, housed with honor, and after the night’s rituals they enter the splendid sabhā in the morning, already crowded with gamblers—closing the chapter at the threshold of the contest.

Chapter Arc: सभा में दुर्योधन अपनी आँखों से देखे राजसूय-यज्ञ के वैभव का वृत्तांत सुनाने उठता है—युधिष्ठिर को राजाओं से भेंट में मिला धन, पशु, रत्न और जन-समुदाय उसके मन में जलन बनकर उबल रहा है। → वह एक-एक कर दूर-दूर के जनपदों और राजाओं के उपहार गिनाता है—घोड़े, हाथी, रथ, दास-दासियाँ, वस्त्र, वैदूर्य-मणि, मोतियों के ढेर, सिंहल के झूल, और अनगिनत कर-राशि। वर्णन के साथ-साथ उसके भीतर का विष भी बढ़ता जाता है: ‘मेरे शत्रुओं के घर’ में यह समृद्धि कैसे? → दुर्योधन यज्ञ-मण्डप की जीवंत तस्वीर खींच देता है—कहीं कच्चा अन्न तौला जा रहा है, कहीं पक रहा है, कहीं परोसा जा रहा है; ब्राह्मणों के ‘पुण्याह’ स्वरों से दिशाएँ गूँज रही हैं; और उसने किसी को भी ऐसा नहीं देखा जो तृप्त होकर, आभूषणों से विभूषित होकर, संतुष्ट न लौटा हो। यही दृश्य उसके हृदय में असह्य दाह बनकर फूटता है—वह कह उठता है कि यह देखकर उसे दुःख से मरने की इच्छा होती है। → वर्णन का अंत युधिष्ठिर की व्यवस्था और दान-धर्म की व्यापकता पर टिकता है—अतिथियों, स्नातकों और सेवकों तक की नियमित सेवा-व्यवस्था; राजाओं द्वारा समर्पित सम्पूर्ण राज्य-धन तक का यज्ञार्थ निवेदन। दुर्योधन का कथन वस्तुतः प्रशंसा नहीं, ईर्ष्या का प्रमाण बनकर सभा में ठहर जाता है। → समृद्धि का यह लेखा-जोखा दुर्योधन के भीतर प्रतिशोध की चिंगारी को हवा देता है—अब प्रश्न यह नहीं कि युधिष्ठिर कितना महान है, बल्कि यह कि दुर्योधन इस वैभव को सहने के लिए कौन-सा कपट रचेगा।

Shlokas

Verse 1

अफड--रू- द्विपञज्चाशत्तमो<ड ध्याय: युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन दुर्योधन उवाच दायं तु विविध तस्मै शृणु मे गदतो5नघ । यज्ञार्थ राजभिर्दत्तं महान्तं धनसंचयम्‌

দুর্যোধন বলল—হে অনঘ, আমার কথা শোনো। আমি তাকে প্রদত্ত নানাবিধ কর-উপহার বর্ণনা করছি—যজ্ঞার্থে রাজাদের দানকৃত, বিপুল ধনসঞ্চয়।

Verse 2

दुर्योधन बोला--अनघ! राजाओंद्वारा युधिष्ठिरके यज्ञके लिये दिये हुए जिस महान्‌ धनका संग्रह वहाँ हुआ था, वह अनेक प्रकारका था। मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनिये ।। मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम्‌ | ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते

দুর্যোধন বলল—হে অনঘ! যুধিষ্ঠিরের যজ্ঞের জন্য রাজারা যে বিপুল ধনসঞ্চয় সেখানে দান করেছিল, তা ছিল নানাবিধ। আমি তার বর্ণনা করছি, শোনো। মেরু ও মন্দর পর্বতের মধ্যবর্তী স্থানে শৈলোদা নামে এক নদী; তার তীরে কীচক বাঁশের মনোরম ছায়ায় কিছু লোক আশ্রয় নেয়।

Verse 3

खसा एकासना हार्हा: प्रदरा दीर्घवेणव: । पारदाश्न कुलिन्दाश्न तड़णा: परतड़णा:

খস, একাসন, হার্হ্য, প্রদর, দীর্ঘবেণু; তদ্রূপ পারদ ও কুলিন্দ; তঙ্গণ ও পরতঙ্গণ—এরা সকলেই (সেই রাজসমাবেশে) অন্তর্ভুক্ত জনপদ।

Verse 4

तद्‌ वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत्‌ पिपीलिकै: । जातरूपं द्रोणमेयमहार्षु: पुज्जशो नृपा:

এটাই ‘পিপীলিক’ নামে খ্যাত—যা পিঁপড়েরা তুলে এনেছে। রাজারা আনন্দসহকারে স্বর্ণ (জাতরূপ) স্তূপে স্তূপে এনেছিল; তার পরিমাপ হত দ্রোণ দ্বারা।

Verse 5

मेरु और मन्दराचलके बीचमें प्रवाहित होनेवाली शैलोदा नदीके दोनों तटोंपर छिठ्रोंमें वायुके भर जानेसे वेणुकी तरह बजनेवाले बाँसोंकी रमणीय छायामें जो लोग बैठते और विश्राम करते हैं, वे खस, एकासन, अह, प्रदर, दीर्घवेणु, पारद, पुलिन्द, तंगण और परतंगण आदि नरेश भेंटमें देनेके लिये पिपीलिकाओं (चींटियों)-द्वारा निकाले हुए पिपीलिक नामवाले सुवर्णके ढेर-के-ढेर उठा लाये थे। उसका माप द्रोणसे किया जाता था ॥। २-- ४।। कृष्णॉल्ललामां श्वमराज्छुक्लां श्षान्याज्छशि प्रभान्‌ । हिमवत्पुष्पजं चैव स्वादु क्षौद्रं तथा बहु

দুর্যোধন বলল—মেরু ও মন্দর পর্বতের মধ্যবর্তী স্থানে প্রবাহিত শৈলোদা নদীর উভয় তীরে, যেখানে বাঁশের ফাঁপা গহ্বরে বায়ু ভরে উঠলে তারা বেণুর মতো সুর তোলে, সেই মনোরম ছায়ায় যারা বসে বিশ্রাম নেয়—সেই খস, একাসন, আহ, প্রদর, দীর্ঘবেণু, পারদ, পুলিন্দ, তঙ্গণ, পরতঙ্গণ প্রভৃতি নৃপতিরা কর-উপহার দিতে ‘পিপীলিক’ নামে পরিচিত স্বর্ণের স্তূপ-স্তূপ বহন করে এনেছিল, যা নাকি পিঁপড়েরা তুলে আনে; তার পরিমাপ হত দ্রোণ দ্বারা। আর তারা কৃষ্ণ-চিহ্নিত, শুভ্র, চন্দ্রপ্রভা-সম উজ্জ্বল বস্তু এবং হিমালয়ের পুষ্পজাত মধুর মধুও প্রচুর এনেছিল।

Verse 6

उत्तरेभ्य: कुरुभ्यश्षाप्पपोढं माल्यमम्बुभि: । उत्तरादपि कैलासादोषधी: सुमहाबला:

দুর্যোধন বলল—উত্তর কুরুদেশ থেকে পবিত্র জলে ধৌত, শাপমুক্ত মালা আসে; আর কৈলাসের উত্তর দিক থেকে আসে অতিশয় শক্তিশালী ঔষধি। সেই দূর উত্তরভূমিতে এমন আশ্চর্য বিষয়ের কথাই শোনা যায়।

Verse 7

पर्वतीया बलिं चान्यमाहृत्य प्रणता: स्थिता: । अजाततशभत्रोर्नुपतेर्द्धारि तिष्ठन्ति वारिता:

পর্বতদেশীয় কর ও অন্যান্য উপহার নিয়ে রাজারা মাথা নত করে দাঁড়িয়ে ছিল; কিন্তু অজাতশত্রু রাজা যুধিষ্ঠিরের দ্বারে, নিবেদন করতে প্রস্তুত হয়েও, তাদের থামিয়ে রাখা হয়েছিল।

Verse 8

इतना ही नहीं, वे सुन्दर काले रंगके चँवर तथा चन्द्रमाके समान श्वेत दूसरे चामर एवं हिमालयके पुष्पोंसे उत्पन्न हुआ स्वादिष्ट मधु भी प्रचुर मात्रामें लाये थे। उत्तरकुरुदेशसे गंगाजल और मालाके योग्य रत्न तथा उत्तर कैलाससे प्राप्त हुई अतीव बलसम्पन्न औषधियाँ एवं अन्य भेंटकी सामग्री साथ लेकर आये हुए पर्वतीय भूपालगण अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरके द्वारपर रोके जाकर विनीतभावसे खड़े थे ।। ये परार्थे हिमवत: सूर्योदयगिरौ नृपा: । कारूषे च समुद्रान्ते लौहित्यमभितश्न ये,पिताजी! मैंने देखा कि जो राजा हिमालयके परार्धभागमें निवास करते हैं, जो उदयगिरिके निवासी हैं, जो समुद्र-तटवर्ती कारूषदेशमें रहते हैं तथा जो लौहित्यपर्वतके दोनों ओर वास करते हैं, फल और मूल ही जिनका भोजन है, वे चर्मवस्त्रधारी क्रूरतापूर्वक शस्त्र चलानेवाले और क्रूरकर्मा किरातनरेश भी वहाँ भेंट लेकर आये थे

এতই নয়—তারা সুন্দর কালো চামর, চাঁদের মতো শুভ্র অন্য চামর, এবং হিমালয়ের ফুল থেকে উৎপন্ন সুস্বাদু মধুও প্রচুর পরিমাণে এনেছিল। উত্তরকুরুদেশ থেকে গঙ্গাজল ও মালার উপযোগী রত্ন, আর উত্তর কৈলাস থেকে প্রাপ্ত অতিশয় শক্তিশালী ঔষধি এবং নানা উপহারসামগ্রী নিয়ে আসা পর্বতদেশীয় রাজারা অজাতশত্রু রাজা যুধিষ্ঠিরের দ্বারে বাধাপ্রাপ্ত হয়ে বিনীতভাবে দাঁড়িয়ে ছিল। আর, পিতা, আমি নিজে দেখেছি—হিমালয়ের দূর প্রান্তে বসবাসকারী, সূর্যোদয়গিরির অধিবাসী, সমুদ্রতটবর্তী কারূষদেশের, এবং লৌহিত্য পর্বতের উভয় পাশে থাকা রাজারা পর্যন্ত সেখানে এসেছিল; এমনকি ফল-মূলভোজী, চর্মবস্ত্রধারী, নিষ্ঠুর অস্ত্রচালনায় পারদর্শী ও কঠোর কর্মে রত কিরাত প্রধানরাও কর-উপহার নিয়ে উপস্থিত ছিল।

Verse 9

फलमूलाशना ये च किराताश्चर्मवासस: । क्रूरशस्त्रा: क्रूरकृतस्तांश्व पश्याम्यहं प्रभो,पिताजी! मैंने देखा कि जो राजा हिमालयके परार्धभागमें निवास करते हैं, जो उदयगिरिके निवासी हैं, जो समुद्र-तटवर्ती कारूषदेशमें रहते हैं तथा जो लौहित्यपर्वतके दोनों ओर वास करते हैं, फल और मूल ही जिनका भोजन है, वे चर्मवस्त्रधारी क्रूरतापूर्वक शस्त्र चलानेवाले और क्रूरकर्मा किरातनरेश भी वहाँ भेंट लेकर आये थे

পিতা, প্রভু! ফল-মূলভোজী, চর্মবস্ত্রধারী, নিষ্ঠুর অস্ত্রধারী ও কঠোর কর্মে রত সেই কিরাতদেরও আমি এখানে দেখছি।

Verse 10

चन्दनागुरुकाष्ठानां भारान्‌ कालीयकस्य च । चर्मरत्नसुवर्णानां गन्धानां चैव राशय:,राजन्‌! चन्दन और अगुरुकाष्ठ तथा कृष्णागुरुकाष्ठके अनेक भार, चर्म, रत्न, सुवर्ण तथा सुगन्धित पदार्थोकी राशि और दस हजार किरातदेशीय दासियाँ, सुन्दर-सुन्दर पदार्थ, दूर देशोंके मृग और पक्षी तथा पर्वतोंसे संगृहीत तेजस्वी सुवर्ण एवं सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर आये हुए राजालोग द्वारपर रोके जानेके कारण खड़े थे

হে রাজন! চন্দন ও আগুরুকাষ্ঠের বহু বোঝা, কালীয়কেরও বোঝা; আর চর্ম, রত্ন, স্বর্ণ ও সুগন্ধি দ্রব্যের স্তূপ—এমন উপহার নিয়ে আসা সেই রাজারা দ্বারে বাধাপ্রাপ্ত হয়ে দাঁড়িয়ে ছিল।

Verse 11

कैरातकीनामयुतं दासीनां च विशाम्पते । आह्त्य रमणीयार्थान्‌ दूरजान्‌ मृगपक्षिण:,राजन्‌! चन्दन और अगुरुकाष्ठ तथा कृष्णागुरुकाष्ठके अनेक भार, चर्म, रत्न, सुवर्ण तथा सुगन्धित पदार्थोकी राशि और दस हजार किरातदेशीय दासियाँ, सुन्दर-सुन्दर पदार्थ, दूर देशोंके मृग और पक्षी तथा पर्वतोंसे संगृहीत तेजस्वी सुवर्ण एवं सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर आये हुए राजालोग द्वारपर रोके जानेके कारण खड़े थे

দুর্যোধন বলল—হে প্রজাপতি রাজন! কিরাতদেশ থেকে দশ হাজার দাসী, মনোরম দ্রব্য এবং দূরদেশ থেকে আনা হরিণ ও পাখি—এসব উপহাররূপে তারা নিয়ে এসেছে।

Verse 12

निचितं पर्वतेभ्यश्व हिरण्यं भूरिवर्चसम्‌ । बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:,राजन्‌! चन्दन और अगुरुकाष्ठ तथा कृष्णागुरुकाष्ठके अनेक भार, चर्म, रत्न, सुवर्ण तथा सुगन्धित पदार्थोकी राशि और दस हजार किरातदेशीय दासियाँ, सुन्दर-सुन्दर पदार्थ, दूर देशोंके मृग और पक्षी तथा पर्वतोंसे संगृहीत तेजस्वी सुवर्ण एवं सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर आये हुए राजालोग द्वारपर रोके जानेके कारण खड़े थे

পর্বত থেকে সংগৃহীত অতিশয় দীপ্তিমান স্বর্ণ এবং সম্পূর্ণ কর-উপহার নিয়ে তারা দ্বারে বাধাপ্রাপ্ত হয়ে দাঁড়িয়ে আছে।

Verse 13

कैराता दरदा दर्वा: शूरा वै यमकास्तथा । औदुम्बरा दुर्विभागा: पारदा बाह्विकैः सह

কৈরাত, দরদ, দর্ৱ—এরা নিঃসন্দেহে বীর—এবং যমক; ঔদুম্বর, দুর্বিভাগ, পারদ—বাহ্বিকদেরসহ (সকলেই উপস্থিত)।

Verse 14

काश्मीराश्च कुमाराश्न घोरका हंसकायना: । शिबित्रिगर्तयौधेया राजन्या भद्रकेकया:

কাশ্মীরি ও কাম্বোজ; ঘোরক ও হংসকায়ন; শিবি, ত্রিগর্ত ও যৌধেয়; রাজন্য, ভদ্রক ও কেকয় (এদেরও দেখা যায়)।

Verse 15

अम्बष्ठा: कौकुरास्तार्क्ष्या वस्त्रपा: पह्ववैः सह । वशातलाश्च मौलेया: सह क्षुद्रकमालवै:

অম্বষ্ঠ, কৌকুর, তার্ক্ষ্য, বস্ত্রপ—পহ্ববদেরসহ; আর বশাতল ও মৌলেয়—ক্ষুদ্রক-মালবদেরসহ (এদেরও দেখা যায়)।

Verse 16

शौण्डिका: कुकुराश्चैव शकाश्नैव विशाम्पते । अज्ज वज्जश्न पुण्ड्राश्न शाणवत्या गयास्तथा

দুর্যোধন বলল—হে প্রজাপতি! শৌণ্ডিক, কুকুর ও শক; তদ্রূপ অজ্জ–বজ্জশ্ন, পুণ্ড্রাশ্ন, শাণবত্য এবং গয়—এ সকল (জনপদ)ও আছে।

Verse 17

सुजातय: श्रेणिमन्त: श्रेयांस: शस्त्रधारिण: । अहार्ष: क्षत्रिया वित्त शतशो5जातशत्रवे

দুর্যোধন বলল—সুজাত, সুসংগঠিত, শ্রেষ্ঠ ও অস্ত্রধারী ক্ষত্রিয়েরা—শত শত করে—অজাতশত্রু (যুধিষ্ঠির)-এর কাছে ধন-কর নিয়ে এসেছিল।

Verse 18

किरात, दरद, दर्व, शूर, यमक, औदुम्बर, दुर्विभाग, पारद, बाह्लिक, काश्मीर, कुमार, घोरक, हंसकायन, शिबि, त्रिगर्त, यौधेय, भद्र, केकय, अम्बष्ठ, कौकुर, तार्क्ष्य, वस्त्रप, पह्चवव, वशातल, मौलेय, क्षुद्रक, मालव, शौण्डिक, कुक्कुर, शक, अंग, वंग, पुण्ड्र, शाणवत्य तथा गय--ये उत्तम कुलनमें उत्पन्न श्रेष्ठ एवं शस्त्रधारी क्षत्रिय राजकुमार सैकड़ोंकी संख्यामें पंक्तिबद्ध खड़े होकर अजातशत्रु युधिष्ठिरको बहुत धन अर्पित कर रहे थे || १३-- १७ || वज्भा: कलिड्डरा मगधास्ताग्रलिप्ता: सपुण्ड्रका: । दौवालिका: सागरका: पत्रोर्णा: शैशवास्तथा,भारत! वंग, कलिंग, मगध, ताग्रलिप्त, पुण्ड्रक, दौवालिक, सागरक, पत्रोर्ण, शैशव तथा कर्णप्रावरण आदि बहुत-से क्षत्रियनरेश वहाँ दरवाजेपर खड़े थे तथा राजाज्ञासे द्वारपालगण उन सबको यह संदेश देते थे कि आपलोग अपने लिये समय निश्चित कर लें। फिर उत्तम भेंट-सामग्री अर्पित करें। इसके बाद आपलोगोंको भीतर जानेका मार्ग मिल सकेगा

দুর্যোধন বলল—হে ভারত! বঙ্গ, কলিঙ্গ, মগধ, তাম্রলিপ্ত ও পুণ্ড্র; সঙ্গে দैবালিক, সাগরক, পত্রোর্ণ ও শৈশব—এ সকলের নৃপতিরা দ্বারে দাঁড়িয়ে ছিল।

Verse 19

कर्णप्रावरणाश्रैव बहवस्तत्र भारत । तत्रस्था द्वारपालैस्ते प्रोच्यन्ते राजशासनात्‌ | कृतकाला: सुबलयस्ततो द्वारमवाप्स्यथ,भारत! वंग, कलिंग, मगध, ताग्रलिप्त, पुण्ड्रक, दौवालिक, सागरक, पत्रोर्ण, शैशव तथा कर्णप्रावरण आदि बहुत-से क्षत्रियनरेश वहाँ दरवाजेपर खड़े थे तथा राजाज्ञासे द्वारपालगण उन सबको यह संदेश देते थे कि आपलोग अपने लिये समय निश्चित कर लें। फिर उत्तम भेंट-सामग्री अर्पित करें। इसके बाद आपलोगोंको भीतर जानेका मार्ग मिल सकेगा

দুর্যোধন বলল—হে ভারত! কর্ণপ্রাবরণ প্রভৃতি বহু নৃপতি সেখানে দ্বারে দাঁড়িয়ে ছিল। রাজার আদেশে দ্বারপালরা তাদের বলত—‘নিজ নিজ সময় স্থির করো; তারপর উপহার প্রস্তুত করে দ্বার দিয়ে প্রবেশ পাবে।’

Verse 20

ईषादन्तान्‌ हेमकक्षान्‌ पद्मवर्णान्‌ कुथावृतान्‌ । शैलाभान्‌ नित्यमत्तांक्षाप्पभित: काम्यकं सर:,तदनन्तर एक-एक क्षमाशील और कुलीन राजाने काम्यक सरोवरके निकट उत्पन्न हुए एक-एक हजार हाथियोंकी भेंट देकर द्वारके भीतर प्रवेश किया। उन हाथियोंके दाँत हलदण्डके समान लंबे थे। उनको बाँधनेकी रस्सी सोनेकी बनी हुई थी। उन हाथियोंका रंग कमलके समान सफेद था। उनकी पीठपर झूल पड़ा हुआ था। वे देखनेमें पर्वताकार और उन्मत्त प्रतीत होते थे

দুর্যোধন বলল—সেই হাতিগুলির দাঁত ছিল হালের দণ্ডের মতো দীর্ঘ; সোনার দড়িতে বাঁধা; পদ্মের মতো উজ্জ্বল বর্ণের এবং উৎকৃষ্ট বস্ত্রে আচ্ছাদিত। তারা পর্বতের ন্যায় দেখাত এবং সদা মদোন্মত্ত বলে প্রতীয়মান হত।

Verse 21

दत्त्वैकैको दश शतान्‌ कुञ्जरान्‌ कवचावृतान्‌ । क्षमावन्त: कुलीनाश्न द्वारेण प्राविशंस्तदा,तदनन्तर एक-एक क्षमाशील और कुलीन राजाने काम्यक सरोवरके निकट उत्पन्न हुए एक-एक हजार हाथियोंकी भेंट देकर द्वारके भीतर प्रवेश किया। उन हाथियोंके दाँत हलदण्डके समान लंबे थे। उनको बाँधनेकी रस्सी सोनेकी बनी हुई थी। उन हाथियोंका रंग कमलके समान सफेद था। उनकी पीठपर झूल पड़ा हुआ था। वे देखनेमें पर्वताकार और उन्मत्त प्रतीत होते थे

তারপর ধৈর্যশীল ও কুলীন রাজারা একে একে দ্বার দিয়ে প্রবেশ করলেন; প্রত্যেকে বর্মাবৃত এক হাজার হাতি উপহার দিলেন।

Verse 22

एते चान्ये च बहवो गणा दिग्भ्य: समागता: । अन्यैश्नोपाह्तान्यत्र रत्नानीह महात्मभि:,ये तथा और भी बहुत-से भूपालगण अनेक दिशाओंसे भेंट लेकर आये थे। दूसरे-दूसरे महामना नरेशोंने भी वहाँ रत्नोंकी भेंट अर्पित की थी

এরা এবং আরও বহু দল নানা দিক থেকে এখানে সমবেত হয়েছে। অন্য মহাত্মা রাজাদের দ্বারাও এখানে রত্নভাণ্ডার উপহাররূপে নিবেদিত হয়েছে।

Verse 23

राजा चित्ररथो नाम गन्धर्वो वासवानुग: । शतानि चत्वार्यददद्धयानां वातरंहसाम्‌,इन्द्रके अनुगामी गन्धर्वराज चित्ररथने चार सौ दिव्य अश्व दिये, जो वायुके समान वेगशाली थे

ইন্দ্রের অনুগামী চিত্ররথ নামে গন্ধর্বরাজ বায়ুর মতো বেগবান চার শত অশ্ব দান করলেন।

Verse 24

तुम्बुरुस्तु प्रमुदितो गन्धर्वो वाजिनां शतम्‌ । आम्रपत्रसवर्णानामददाद्धेममालिनाम्‌,तुम्बुरु नामक गन्धर्वराजने प्रसन्नतापूर्वक सौ घोड़े भेंट किये, जो आमके पत्तेके समान हरे रंगवाले तथा सुवर्णकी मालाओंसे विभूषित थे

তুম্বুরু নামক গন্ধর্ব আনন্দিতচিত্তে একশো ঘোড়া উপহার দিলেন—যাদের বর্ণ আমপাতার মতো সবুজ এবং যারা স্বর্ণমালায় ভূষিত।

Verse 25

कृती राजा च कौरव्य शूकराणां विशाम्पते । अददाद्‌ गजरत्नानां शतानि सुबहून्यथ,महाराज! शूकरदेशके पुण्यात्मा राजाने कई सौ गजरत्न भेंट किये

হে কৌরব্য, প্রজাপতি! শূকরদেশের সক্ষম রাজা বহু—শত শত—গজরত্ন উপহার দিলেন।

Verse 26

विराटेन तु मत्स्येन बल्यर्थ हेममालिनाम्‌ । कुण्जराणां सहस्रे द्वे मत्तानां समुपाहते,मत्स्यदेशके राजा विराटने सुवर्णमालाओंसे विभूषित दो हजार मतवाले हाथी उपहारके रूपमें दिये

মৎস্যদেশের রাজা বিরাট বলি-উপহাররূপে স্বর্ণমালায় ভূষিত দুই সহস্র মত্ত হস্তী নিবেদন করেছিলেন।

Verse 27

पांशुराष्ट्राद वसुदानो राजा षड्विंशतिं गजान्‌ | अश्वानां च सहस्रे द्वेी राजन्‌ काड्चनमालिनाम्‌,राजन! राजा वसुदानने पांशुदेशसे छब्बीस हाथी, वेग और शक्तिसे सम्पन्न दो हजार सुवर्णमालाभूषित जवान घोड़े और सब प्रकारकी दूसरी भेंट-सामग्री भी पाण्डवोंको समर्पित की

রাজন! পাংশুরাষ্ট্র থেকে রাজা বসুদান ছাব্বিশটি হস্তী এবং স্বর্ণমালায় ভূষিত দুই সহস্র অশ্ব নিবেদন করলেন।

Verse 28

जवसत्त्वोपपन्नानां वयस्थानां नराधिप । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवेभ्यो न्यवेदयत्‌,राजन! राजा वसुदानने पांशुदेशसे छब्बीस हाथी, वेग और शक्तिसे सम्पन्न दो हजार सुवर्णमालाभूषित जवान घोड़े और सब प्रकारकी दूसरी भेंट-सामग्री भी पाण्डवोंको समर्पित की

নরাধিপ! সেই অশ্বগুলি ছিল বেগ ও বলসম্পন্ন, যৌবনপ্রাপ্ত; এবং তিনি সম্পূর্ণ বলি-উপহার পাণ্ডবদের কাছে নিবেদন করলেন।

Verse 29

यज्ञसेनेन दासीनां सहस्राणि चतुर्दश । दासानामयुतं चैव सदाराणां विशाम्पते । गजयुक्ता महाराज रथा: षड्विंशतिस्तथा

হে বিশাম্পতে! যজ্ঞসেন চৌদ্দ সহস্র দাসী এবং স্ত্রীসহ দশ সহস্র দাস দান করলেন; আর মহারাজ, গজযুক্ত ছাব্বিশটি রথও।

Verse 30

राज्यं च कृत्स्नं पार्थेभ्यो यज्ञार्थ वै निवेदितम्‌ राजन! राजा द्रुपदने चौदह हजार दासियाँ, दस हजार सपत्नीक दास, हाथी जुते हुए छब्बीस रथ तथा अपना सम्पूर्ण राज्य कुन्तीपुत्रोंको यज्ञके लिये समर्पित किया था ।। वासुदेवो<पि वार्ष्णेयो मानं कुर्वबन्‌ किरीटिन:

আর যজ্ঞার্থে পার্থদের কাছে সমগ্র রাজ্যও নিবেদন করা হয়েছিল। আর বৃষ্ণিবংশীয় বাসুদেবও কিরীটধারী অর্জুনের মর্যাদা বৃদ্ধি করছিলেন।

Verse 31

अददाद्‌ गजमुख्यानां सहस्राणि चतुर्दश । आत्मा हि कृष्ण: पार्थस्य कृष्णस्यात्मा धनंजय:

তিনি চৌদ্দ হাজার শ্রেষ্ঠ হাতি দান করেছিলেন। কারণ কৃষ্ণই পার্থ (অর্জুন)-এর আত্মা, আর ধনঞ্জয় (অর্জুন)ই কৃষ্ণের আত্মা।

Verse 32

वृष्णिकुलभूषण वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने भी अर्जुनका आदर करते हुए चौदह हजार उत्तम हाथी दिये। श्रीकृष्ण अर्जुनके आत्मा हैं और अर्जुन श्रीकृष्णके आत्मा हैं ।। यद्‌ ब्रूयादर्जुन: कृष्णं सर्व कुर्यादसंशयम्‌ । कृष्णो धनंजयस्यार्थे स्वर्गलोकमपि त्यजेत्‌,अर्जुन श्रीकृष्णसे जो कह देंगे, वह सब वे निःसंदेह पूर्ण करेंगे। श्रीकृष्ण अर्जुनके लिये परमधामको भी त्याग सकते हैं

অর্জুন কৃষ্ণকে যা-ই বলুন, কৃষ্ণ নিঃসন্দেহে তা সবই করবেন। ধনঞ্জয়ের কল্যাণার্থে কৃষ্ণ স্বর্গলোক পর্যন্তও ত্যাগ করতে পারেন।

Verse 33

तथैव पार्थ: कृष्णार्थे प्राणानपि परित्यजेत्‌ । सुरभी श्रन्दनरसान्‌ हेमकुम्भसमास्थितान्‌

তেমনি পার্থ (অর্জুন)ও কৃষ্ণের জন্য প্রাণ পর্যন্ত ত্যাগ করতে পারেন। আর সুগন্ধি চন্দনরস প্রভৃতি স্বর্ণকলসে সঞ্চিত আছে।

Verse 34

मणिरत्नानि भास्वन्ति काउ्चनं सूक्ष्मवस्त्रकम्‌

দীপ্তিমান মণিরত্ন, স্বর্ণ, এবং সূক্ষ্ম কোমল বস্ত্র।

Verse 35

समुद्रसारं वैदूर्य मुक्तासड्घांस्तथैव च

সমুদ্রজাত বৈদূর্য (লহসুনিয়া) এবং মুক্তোর গুচ্ছও।

Verse 36

शतशक्ष कुथांस्तत्र सिंहला: समुपाहरन्‌ । सिंहलदेशके क्षत्रियोंने समुद्रका सारभूत वैदूर्य, मोतियोंके ढेर तथा हाथियोंके सैकड़ों झूल अर्पित किये ।। संवृता मणिचीरैस्तु श्यामास्ताम्रान्तलोचना:,उपाजहुर्विशश्वैव शूद्रा: शुश्रूषवस्तथा । वे सिंहलदेशीय वीर मणियुक्त वस्त्रोंसे अपने शरीरोंको ढके हुए थे। उनके शरीरका रंग काला था और उनकी आँखोंके कोने लाल दिखायी देते थे। उन भेंट-सामग्रियोंको लेकर वे सब लोग दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मण, विजित क्षत्रिय, वैश्य तथा सेवाकी इच्छावाले शूट्र प्रसन्नता-पूर्वक वहाँ उपहार अर्पित करते थे

দুর্যোধন বলল—“সিংহল দেশ থেকে তারা শত শত শঙ্খ, কুথা ও নানা উপঢৌকন নিয়ে এল। সিংহলদেশীয় ক্ষত্রিয়রা যেন সমুদ্রের সার থেকে আহৃত বৈদূর্য-মণি, মুক্তার স্তূপ এবং হাতির শত শত ঝুল-সাজ অর্পণ করল। মণিখচিত বস্ত্রে দেহাবৃত, শ্যামবর্ণ এবং চোখের কোণ লালচে—তারা সেই দানসামগ্রীসহ দ্বারে বাধাপ্রাপ্ত হয়ে দাঁড়িয়ে রইল। ব্রাহ্মণ, বিজিত ক্ষত্রিয়, বৈশ্য এবং সেবায় আগ্রহী শূদ্ররাও বাহ্যিক আনন্দ দেখিয়ে সেখানে উপহার নিবেদন করল।”

Verse 37

ता गृहीत्वा नरास्तत्र द्वारि तिष्ठन्ति वारिता: | प्रीत्यर्थ ब्राह्मणाश्रैव क्षत्रियाश्व विनिर्जिता:,उपाजहुर्विशश्वैव शूद्रा: शुश्रूषवस्तथा । वे सिंहलदेशीय वीर मणियुक्त वस्त्रोंसे अपने शरीरोंको ढके हुए थे। उनके शरीरका रंग काला था और उनकी आँखोंके कोने लाल दिखायी देते थे। उन भेंट-सामग्रियोंको लेकर वे सब लोग दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मण, विजित क्षत्रिय, वैश्य तथा सेवाकी इच्छावाले शूट्र प्रसन्नता-पूर्वक वहाँ उपहार अर्पित करते थे

সেই উপহারগুলি হাতে নিয়ে তারা দ্বারেই বাধাপ্রাপ্ত হয়ে দাঁড়িয়ে রইল; ভিতরে প্রবেশের অনুমতি পেল না। অনুগ্রহ লাভের উদ্দেশ্যে ব্রাহ্মণ, বিজিত ক্ষত্রিয়, বৈশ্য এবং সেবায় আগ্রহী শূদ্র—সকলেই বাহ্যিক সদ্ভাব দেখিয়ে সেখানে দান-উপহার নিবেদন করল।

Verse 38

।। प्रीत्या च बहुमानाच्चाप्युपागच्छन्‌ युधिष्ठिरम्‌

প্রকাশ্য স্নেহ ও প্রদর্শিত সম্মান নিয়ে সে যুধিষ্ঠিরের কাছে এগিয়ে গেল।

Verse 39

नानादेशसमुत्थैश्ष नानाजातिभिरेव च

সেখানে নানা দেশ থেকে আগত এবং নানা জাতিভুক্ত লোকজন উপস্থিত ছিল।

Verse 40

उच्चावचानुपग्राहान्‌ राजभि: प्रापितान्‌ बहूनू

রাজাদের মাধ্যমে বড়-ছোট নানা অনুগ্রহ ও সহায়তা বহু প্রাপ্ত হয়েছিল।

Verse 41

शत्रूणां पश्यतो दु:खान्मुमूर्षा मे व्यजायत । भृत्यास्तु ये पाण्डवानां तांस्ते वक्ष्यामि पार्थिव

দুর্যোধন বলল—শত্রুদের দুঃখ দেখিতে দেখিতে আমার অন্তরে মৃত্যুকামনা জাগিল। হে রাজন, এখন আমি পাণ্ডবদের যে ভৃত্যগণ আছে, তাদের কথা তোমাকে বলিব।

Verse 42

येषामामं च पक्‍वं च संविधत्ते युधिष्ठिर: । मेरे शत्रुओंके घरमें राजाओंद्वारा लाये हुए बहुत-से छोटे-बड़े उपहारोंको देखकर दुःखसे मुझे मरनेकी इच्छा होती थी। राजन! पाण्डवोंके वहाँ जिन लोगोंका भरण-पोषण होता है, उनकी संख्या मैं आपको बता रहा हूँ। राजा युधिष्ठिर उन सबके लिये कच्चे-पक्के भोजनकी व्यवस्था करते हैं || ४०-४१ $ ।। अयुतं त्रीणि पद्मानि गजारोहा: ससादिन:

দুর্যোধন বলল—তাদের সকলের জন্য রাজা যুধিষ্ঠির কাঁচা রসদও, রান্না করা আহারও প্রস্তুত করেন। সংখ্যা অপরিমেয়—তিন অযুত ও তিন পদ্ম যোদ্ধা; গজারোহী ও অশ্বারোহীসহ।

Verse 43

प्रमीयमाणमामं च पच्यमानं तथैव च

দুর্যোধন বলল—যা এখনও কাঁচা এবং নষ্ট হয়ে যাচ্ছে, আর যা তেমনি রান্না হচ্ছে—

Verse 44

नाभुक्तवन्तं नापीत॑ं नालड्कृतमसत्कृतम्‌

এখানে কেউ না খেয়ে ছিল না, না পান না করে ছিল; কেউ অলংকারহীন ছিল না, কেউ অসম্মানিতও ছিল না।

Verse 45

अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिन:

স্নাতক গৃহমেধী—এমন আটাশি হাজার (জন) আছে।

Verse 46

सुप्रीता: परितुष्टाश्न ते ह्वाशंसन्त्यरिक्षयम्‌,वे सब ब्राह्मण भोजनसे अत्यन्त तृप्त एवं संतुष्ट हो राजा युधिष्ठिरको उनके (काम- क्रोधादि) शत्रुओंके विनाशके लिये आशीर्वाद देते हैं

ভোজনে পরম তৃপ্ত ও প্রসন্ন সেই ব্রাহ্মণগণ রাজা যুধিষ্ঠিরকে আশীর্বাদ করলেন—যেন তাঁর শত্রুসমূহ, কাম-ক্রোধাদি, বিনষ্ট হয়।

Verse 47

दशान्यानि सहस््राणि यतीनामूर्थ्वरेतसाम्‌ । भुज्जते रुक्मपात्रीभिय्युधिष्ठिरनिवेशने,इसी प्रकार युधिष्ठिरके महलमें दूसरे दस हजार ऊर्ध्वरेता यति भी सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं

এভাবেই যুধিষ্ঠিরের প্রাসাদে আরও দশ হাজার ঊর্ধ্বরেতা যতি স্বর্ণপাত্রে আহার করতেন।

Verse 48

अभुक्तं भुक्तवद्‌ वापि सर्वमाकुब्जवामनम्‌ । अभुज्जाना याज्ञसेनी प्रत्यवैक्षद्‌ विशाम्पते,राजन! उस यज्ञमें द्रौपदी प्रतिदिन स्वयं पहले भोजन न करके इस बातकी देखभाल करती थी कि कुबड़े और बौनोंसे लेकर सब मनुष्योंमें किसने खाया है और किसने अभीतक भोजन नहीं किया है

হে রাজন! সেই যজ্ঞে দ্রৌপদী প্রতিদিন নিজে আগে আহার না করে, কুঁজো ও বামন থেকে শুরু করে সকলের মধ্যে কে খেয়েছে আর কে এখনও খায়নি—তা তদারক করতেন।

Verse 49

द्वौ करौ न प्रयच्छेतां कुन्तीपुत्राय भारत । सम्बन्धिकेन पञ्चाला: सख्येनान्धकवृष्णय:,भारत! कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको दो ही कुलके लोग कर नहीं देते थे। सम्बन्धके कारण पांचाल और मित्रताके कारण अन्धक एवं वृष्णि

হে ভারত! কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠিরকে কেবল দুই পক্ষ কর দিত না—আত্মীয়তার কারণে পাঞ্চালরা, আর মৈত্রীর কারণে অন্ধক ও বৃষ্ণিরা।

Verse 52

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे द्विपञ्चाशत्तमो<5ध्याय: ।। ५२ |। इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বের দ্যূতপর্বে ‘দুর্যোধন-সন্তাপ’ নামক বাহান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 336

मलयाद्‌ दर्दुराच्चैव चन्दनागुरुसंचयान्‌ । इसी प्रकार अर्जुन भी श्रीकृष्णके लिये अपने प्राणोंतकका त्याग कर सकते हैं। मलय तथा दर्दुरपर्वतसे वहाँके राजालोग सोनेके घड़ोंमें रखे हुए सुगन्धित चन्दन-रस तथा चन्दन एवं अगुरुके ढेर भेंटके लिये लेकर आये थे

মলয় ও দর্দুর পর্বত থেকে সেখানকার রাজারা সোনার ঘটিতে ভরা সুগন্ধি চন্দন-রস এবং চন্দন ও আগুরুর স্তূপ উপহাররূপে এনে নিবেদন করল।

Verse 343

चोलपाण्ड्यावपि द्वारं न लेभाते ह्ुपस्थितौ । चोल और पाण्ड्यदेशोंके नरेश चमकीले मणि-रत्न, सुवर्ण तथा महीन वस्त्र लेकर उपस्थित हुए थे; परंतु उन्हें भी भीतर जानेके लिये रास्ता नहीं मिला

চোল ও পাণ্ড্য দেশের রাজারা ঝলমলে মণি-রত্ন, স্বর্ণ এবং সূক্ষ্ম বস্ত্র নিয়ে উপস্থিত ছিল; তবু দ্বারে তাদেরও প্রবেশের পথ মিলল না।

Verse 386

सर्वे म्लेच्छा: सर्ववर्णा आदिमध्यान्तजास्तथा | सभी म्लेच्छ तथा आदि, मध्य और अन्तमें उत्पन्न सभी वर्णके लोग विशेष प्रेम और आदरके साथ युधिष्ठिरके पास भेंट लेकर आये थे

সব ম্লেচ্ছ এবং আদিতে, মধ্যেতে ও অন্তে জন্ম নেওয়া সকল বর্ণের লোকেরা বিশেষ স্নেহ ও সম্মানসহ যুধিষ্ঠিরের কাছে উপহার নিয়ে এসে উপস্থিত হল।

Verse 396

पर्यस्त इव लोको<यं युधिष्ठटिरनिवेशने । अनेक देशोंमें उत्पन्न और विभिन्न जातिके लोगोंके आगमनसे युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें मानो यह सम्पूर्ण लोक ही एकत्र हुआ जान पड़ता था

বহু দেশের জন্ম নেওয়া ও নানা জাতির মানুষের আগমনে যুধিষ্ঠিরের যজ্ঞমণ্ডপে যেন সমগ্র লোকই একত্রিত হয়েছে—এমনই মনে হচ্ছিল।

Verse 423

रथानामर्बुदं चापि पादाता बहवस्तथा । युधिष्ठिरके यहाँ तीन पद्म दस हजार हाथीसवार और घुड़सवार, एक अर्बुद (दस करोड़) रथारोही तथा असंख्य पैदल सैनिक हैं

এখানে রথারোহী এক অর্বুদ, আর তেমনি অসংখ্য পদাতিকও আছে; হাতি ও অশ্বারোহীদের দলও প্রচুর।

Verse 436

विसृज्यमान चान्यत्र पुण्याहस्वन एव च । युधिष्ठिरके यज्ञमें कहीं कच्चा अन्न तौला जा रहा था, कहीं पक रहा था, कहीं परोसा जाता था और वहीं ब्राह्मणोंके पुण्याहवाचनकी ध्वनि सुनायी पड़ती थी

যুধিষ্ঠিরের যজ্ঞ-প্রাঙ্গণে কোথাও কাঁচা অন্ন মাপা হচ্ছিল, কোথাও রান্না হচ্ছিল, কোথাও পরিবেশন করা হচ্ছিল; আর সেই সঙ্গে ব্রাহ্মণদের পুণ্যাহ-পাঠের মঙ্গলধ্বনি অবিরত শোনা যাচ্ছিল।

Verse 443

अपश्यं सर्ववर्णानां युधिष्ठिरनिवेशने । मैंने युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें सभी वर्णके लोगोंमेंसे किसीको ऐसा नहीं देखा, जो खा- पीकर आभूषणोंसे विभूषित और सत्कृत न हुआ हो

যুধিষ্ঠিরের রাজ-নিবাসে আমি সকল বর্ণের লোকদের মধ্যে এমন কাউকে দেখিনি, যে খেয়ে-পেয়ে, অলংকারে বিভূষিত হয়ে এবং সম্মানে অভিষিক্ত না হয়ে ফিরেছে।

Verse 453

त्रिंशद्दासीक एकैको यान्‌ बिभर्ति युधिष्ठिर: । राजा युधिष्ठिर घरमें बसनेवाले जिन अट्ठासी हजार स्नातकोंका भरण-पोषण करते हैं, उनमेंसे प्रत्येककी सेवामें तीस-तीस दास-दासी उपस्थित रहते हैं

রাজা যুধিষ্ঠির যেসব স্নাতককে প্রতিপালন করেন, তাদের প্রত্যেকের সেবায় ত্রিশজন করে দাস-দাসী সদা উপস্থিত থাকে।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira must choose between prudential ethics (avoiding gambling known to cause conflict and exploitation) and perceived rājadharma/social obligation (not refusing a formal royal summons and public challenge).

Procedural legitimacy is not equivalent to moral legitimacy: an action can be socially sanctioned (a courtly dice game) yet ethically corrosive when engineered through deception and power asymmetry.

No explicit phalaśruti appears; however, the chapter includes reflective meta-commentary on daiva’s capacity to eclipse discernment, functioning as a thematic warning about compromised agency under coercive circumstances.