Adhyaya 5
Sabha ParvaAdhyaya 5129 Verses

Adhyaya 5

Nāradasya Rājadharma-praśnāḥ (Nārada’s Examination of Royal Ethics)

Upa-parva: Nārada–Yudhiṣṭhira Rājadharma-saṃvāda (Counsel on Kingship in the Assembly)

The chapter opens with Vaiśaṃpāyana’s court-scene description: the Pāṇḍavas are seated in the assembly when Nārada arrives with Gandharvas and ṛṣis. Yudhiṣṭhira rises, offers salutations, provides an appropriate seat, and performs hospitality. Nārada then conducts an extended, structured interrogation using repeated ‘kaccit’ prompts, testing whether the king’s mind delights in dharma while maintaining artha and regulating kāma; whether he preserves inherited standards of conduct; and whether he applies calibrated policy tools (conciliation, gifts, division, force) appropriately. The audit ranges across secrecy of counsel, selection and integrity of ministers, vigilance and time-discipline, intelligence awareness, fort readiness, troop payment and morale, judicial procedure against theft and corruption, fiscal accounting, agricultural and irrigation infrastructure, protection of women and vulnerable persons, disaster readiness (fire, disease, animals), and honoring of elders, Brahmins, and ritual obligations. A key doctrinal capsule defines ‘fruitfulness’ (saphalatā): Vedas bear fruit through agnihotra, wealth through giving and rightful enjoyment, marriage through affection and progeny, and learning through character and conduct. The chapter concludes with Yudhiṣṭhira’s acceptance of the guidance and Nārada’s commendation of kingship devoted to protection of the four varṇas.

Chapter Arc: इन्द्रसभा की दिव्य आभा के बीच देवर्षि नारद का आगमन होता है—वेद-उपनिषद्, इतिहास-पुराण और न्याय-धर्म के परम ज्ञाता के रूप में उनका तेज स्वयं सभा को अनुशासित कर देता है। → नारद युधिष्ठिर से राज्य-धर्म की कठोर कसौटियों पर ‘कच्चित्…’ प्रश्नों की शृंखला आरम्भ करते हैं—क्या अर्थ धर्मानुकूल अर्जित हो रहा है, क्या मन धर्म में रम रहा है, क्या इन्द्रियाँ वश में हैं, क्या प्रजा सुखी है, क्या अपराधी दण्ड से बच तो नहीं जाते। → सबसे तीखा बिन्दु तब आता है जब नारद आत्म-विजय को राज-विजय से ऊपर रखते हुए पूछते हैं—‘पहले अपने मन-इन्द्रियों को जीतकर ही क्या तुम दूसरों को जीतने की इच्छा रखते हो?’ और साथ ही न्याय-व्यवस्था की परीक्षा लेते हैं—‘द्रव्य-लोभ से चोर छूट तो नहीं जाता?’ → वैशम्पायन के कथनानुसार युधिष्ठिर नारद के चरणों में प्रणाम कर संतोषपूर्वक उनके उपदेश को ग्रहण करते हैं; नारद निष्कर्ष देते हैं कि जो राजा चातुर्वर्ण्य-रक्षा और धर्मानुसार शासन करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर इन्द्रलोक को प्राप्त होता है। → नारद के प्रश्नों की यह कसौटी युधिष्ठिर के राज्य को आदर्श ठहराती है—पर उसी आदर्श के भीतर छिपी आगामी सभा-राजनीति की छाया (द्यूत-प्रसंग की भूमिका) अनकही-सी मंडराती रहती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५३ “लोक मिलाकर कुल ४५३ श्लोक हैं) #द-3८5>> | अर । जम ३. संगीतमें नृत्य, गीत और वाद्यकी समताको लय अथवा साम्य कहते हैं; जैसा कि अमरकोषका वाक्य है--'लयः साम्यम्‌'। २. नृत्य या गीतमें उसके काल और क्रियाका परिमाण, जिसे बीच-बीचमें हाथपर हाथ मारकर सूचित करते जाते हैं, ताल कहलाता है; जैसा कि अमरकोषका वचन है--“'ताल: कालक्रियामानम्‌। (लोकपालसभाख्यानपर्व) पजञ्चमो< ध्याय: नारदजीका युधिछिरकी सभामें आगमन और प्रश्नके रूपमें युधिष्ठटिरको शिक्षा देना वैशम्पायन उवाच अथ तत्रोपविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु । महत्सु चोपविष्टेषु गन्धर्वेषु च भारत,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! एक दिन उस सभामें महात्मा पाण्डव अन्यान्य महापुरुषों तथा गन्धर्वों आदिके साथ बैठे हुए थे

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত (জনমেজয়)! তখন সেই সভায় মহাত্মা পাণ্ডবগণ উপবিষ্ট ছিলেন; এবং আরও বহু মহাপুরুষ ও গন্ধর্বগণও সেখানে বসেছিলেন। সেই রাজসভাতেই পরবর্তীতে উপদেশময় এক প্রসঙ্গের ভূমি প্রস্তুত হল।

Verse 2

वेदोपनिषदां वेत्ता ऋषि: सुरगणार्चित: । इतिहासपुराणज्ञ: पुराकल्पविशेषवित्‌

তিনি ছিলেন এক ঋষি—বেদ ও উপনিষদের পারদর্শী, দেবগণের দ্বারা পূজিত। ইতিহাস ও পুরাণে সুপণ্ডিত, এবং প্রাচীন কল্পসমূহের বিশেষ বিবরণেও তিনি সুদক্ষ ছিলেন।

Verse 3

न्यायविद्‌ धर्मतत्त्वज्ञ: षडज्भविदनुत्तम: । ऐक्यसंयोगनानात्वसमवायविशारद:

তিনি ন্যায়শাস্ত্রে পারদর্শী এবং ধর্মতত্ত্বের মর্মজ্ঞ ছিলেন; ষড়ঙ্গবিদ্যায় অতুলনীয়। একত্ব ও সংযোগ, নানাত্ব এবং সমবায়—এই সম্পর্কসমূহের বিচার-বিশ্লেষণে তিনি অত্যন্ত বিশারদ ছিলেন।

Verse 4

वक्ता प्रगल्भो मेधावी स्मृतिमान्‌ नयवित्‌ कवि: । परापरविभागज्ञ: प्रमाणकृतनिश्चय:

বৈশম্পায়ন বললেন— তিনি ছিলেন বাক্যে প্রগল্ভ, প্রকাশে নির্ভীক, বুদ্ধিমান ও দৃঢ় স্মৃতিশক্তিসম্পন্ন; নীতি ও আচরণে দক্ষ, সত্য কবি; উচ্চ-নীচের যথার্থ ভেদজ্ঞ এবং প্রমাণভিত্তিক সিদ্ধান্তে অচল।

Verse 5

पज्चावयवयुक्तस्य वाक्यस्य गुणदोषवित्‌ । उत्तरोत्तरवक्ता च वदतो5पि बृहस्पते:,इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि नारदप्रश्नमुखेन राजधर्मानुशासने पञ्चमो<5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापवके अन्तर्गत लोकपालयभाख्यानपर्वमें नारदजीके द्वारा प्रश्नके व्याजसे राजधर्मका उपदेशविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ

বৈশম্পায়ন বললেন— তিনি পঞ্চাবয়বযুক্ত সুসংবদ্ধ বাক্যের গুণ-দোষ জানতেন; আর বক্তা যদি স্বয়ং বৃহস্পতিও হন, তবু তিনি ক্রমে ক্রমে আরও যথাযথ ও উৎকৃষ্ট উত্তর দিতে সক্ষম ছিলেন।

Verse 6

धर्मकामार्थमो क्षेषु यथावत्‌ कृतनिश्चय: । तथा भुवनकोशस्य सर्वस्यास्थ महामति:

বৈশম্পায়ন বললেন— ধর্ম, কাম, অর্থ ও মোক্ষ বিষয়ে তিনি যথাযথ ও সুপরিকল্পিত সিদ্ধান্তে পৌঁছেছিলেন; এবং তদ্রূপ সেই মহামতি সমগ্র ভুবনকোষ—জগতের বিন্যাস ও বিস্তার—সম্পর্কেও দৃঢ় জ্ঞান রাখতেন।

Verse 7

प्रत्यक्षदर्शी लोकस्य तिर्यगूर्ध्यमधस्तथा । सांख्ययोगविभागज्ञो निर्विवित्सु: सुरासुरान्‌ू

বৈশম্পায়ন বললেন— তিনি লোককে প্রত্যক্ষ দেখতেন—আড়াআড়ি, ঊর্ধ্বে ও অধঃ, সর্বদিকেই। সাংখ্য ও যোগের ভেদ জেনে তিনি দেব-অসুরের সঙ্গে প্রতিদ্বন্দ্বিতার আকাঙ্ক্ষা থেকে মুক্ত ছিলেন।

Verse 8

संधिविग्रहतत्त्वज्ञस्त्वनुमानवि भागवित्‌ । षाडुण्यविधियुक्तश्न सर्वशास्त्रविशारद:

বৈশম্পায়ন বললেন— তিনি সন্ধি ও বিগ্রহের তত্ত্বজ্ঞ, অনুমানভিত্তিক সিদ্ধান্তের ভেদ নির্ণয়ে দক্ষ ছিলেন; ষাড্গুণ্যনীতিতে প্রশিক্ষিত এবং সর্বশাস্ত্রে পারদর্শী ছিলেন।

Verse 9

युद्धगान्धर्वसेवी च सर्वत्राप्रतिघस्तथा । एतैश्वान्यैश्व बहुभिरययुक्तो गुणगणैर्मुनि:

বৈশম্পায়ন বললেন—তিনি যুদ্ধবিদ্যা ও গন্ধর্ববিদ্যা (সঙ্গীতাদি) অনুশীলনে নিবিষ্ট ছিলেন এবং সর্বত্রই অপ্রতিহত—কোনো বিরোধে কখনও রুদ্ধ হতেন না। হে মুনি, এইরূপ বহু গুণসমষ্টিতে তিনি সমন্বিত ছিলেন।

Verse 10

लोकाननुचरन्‌ सर्वानागमत्‌ तां सभां नृप । नारद: सुमहातेजा ऋषिभि: सहितस्तदा

বৈশম্পায়ন বললেন—হে নৃপ, সর্বলোক পরিভ্রমণ করে অতিমহাতেজস্বী নারদ তখন অন্যান্য ঋষিদের সঙ্গে সেই রাজসভায় উপস্থিত হলেন।

Verse 11

पारिजातेन राजेन्द्र पर्वतेन च धीमता । सुमुखेन च सौम्येन देवर्षिरमितद्युति:

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজেন্দ্র, অমিতদ্যুতিসম্পন্ন দেবর্ষি নারদ পারিজাত, ধীমান্ পর্বত এবং সৌম্য সুমুখের সঙ্গে উপস্থিত হলেন।

Verse 12

सभास्थान्‌ पाण्डवान द्र॒ष्टं प्रीयमाणो मनोजव: । जयाशीलभिंस्तु त॑ं विप्रो धर्मराजानमार्चयत्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—মনোবেগী সেই ব্রাহ্মণ সভায় উপবিষ্ট পাণ্ডবদের দেখে আনন্দিত হলেন এবং জয়সূচক আশীর্বচনে ধর্মরাজকে সম্মান করলেন।

Verse 13

उसी समय वेद और उपनिषदोंके ज्ञाता, ऋषि, देवताओंद्वारा पूजित, इतिहास-पुराणके मर्मज्ञ, पूर्वकल्पकी बातोंके विशेषज्ञ, न्यायके विद्वान, धर्मके तत्त्वको जाननेवाले, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्‍्द और ज्यौतिष--इन छहों अंगोंके पण्डितोंमें शिरोमणि, ऐक्यर, संयोगनानात्व“४ँ और समवाय केः० ज्ञानमें विशारद, प्रगल्भ वक्ता, मेधावी, स्मरणशक्तिसम्पन्न, नीतिज्ञ, त्रिकालदर्शी, अपर ब्रह्म और परब्रह्मको विभागपूर्वक जाननेवाले, प्रमाणोंद्वारा एक निश्चित सिद्धान्तपर पहुँचे हुए, पंचावयवयुक्त- वाक्यके गुण- दोषको जाननेवाले, बृहस्पति-जैसे वक्ताके साथ भी उत्तर-प्रत्युत्तर करनेमें समर्थ, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष--चारों पुरुषार्थोंके सम्बन्धमें यथार्थ निश्चय रखनेवाले तथा इन सम्पूर्ण चौदहों भुवनोंको ऊपर, नीचे और तिरछे सब ओरसे प्रत्यक्ष देखनेवाले, महाबुद्धिमान, सांख्य और योगके विभागपूर्वक ज्ञाता, देवताओं और असुरोंमें भी निर्वेद (वैराग्य) उत्पन्न करनेके इच्छुक, संधि और विग्रहके तत्त्वको समझनेवाले, अपने और शत्रुपक्षके बलाबलका अनुमानसे निश्चय करके शत्रुपक्षके मन्त्रियों आदिको फोड़नेके लिये धन आदि बाँटनेके उपयुक्त अवसरका ज्ञान रखनेवाले, संधि (सुलह), विग्रह (कलह), यान (चढ़ाई करना), आसन (अपने स्थानपर ही चुप्पी मारकर बैठे रहना), द्वैधीभाव (शत्रुओंमें फूट डालना) और समाश्रय (किसी बलवान्‌ राजाका आश्रय ग्रहण करना)--राजनीतिके इन छहों अंगोंके उपयोगके जानकार, समस्त शास्त्रोंके निपुण विद्वान, युद्ध और संगीतकी कलामें कुशल, सर्वत्र क्रोधरहित, इन उपर्युक्त गुणोंके सिवा और भी असंख्य सदगुणोंसे सम्पन्न, मननशील, परम कान्तिमान्‌ महातेजस्वी देवर्षि नारद लोक-लोकान्तरोंमें घूमते- फिरते पारिजात, बुद्धिमान्‌ पर्वत तथा सौम्य, सुमुख आदि अन्य अनेक ऋषियोंके साथ सभामें स्थित पाण्डवोंसे प्रेमपूर्वक मिलनेके लिये मनके समान वेगसे वहाँ आये और उन ब्रह्मर्षिनी जयसूचक आशीर्वादोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरका अत्यन्त सम्मान किया ॥| २-- १२ || तमागतमृषिं दृष्टवा नारदं सर्वधर्मवित्‌ । सहसा पाण्डवश्रेष्ठ: प्रत्युत्थायानुजैः सह,सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता पाण्डवश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने देवर्षि नारदको आया देख भाइयोंसहित सहसा उठकर उन्हें प्रेम, विनय और नम्रतापूर्वक उस समय नमस्कार किया और उन्हें उनके योग्य आसन देकर धर्मज्ञ नरेशने गौ, मधुपर्क तथा अर्घ्य आदि उपचार अर्पण करते हुए रत्नोंसे उनका विधिपूर्वक पूजन किया तथा उनकी सब इच्छाओंकी पूर्ति करके उन्हें संतुष्ट किया

সেই সময় পরম কান্তিমান, মহাতেজস্বী দেবর্ষি নারদ—যিনি বেদ-উপনিষদের জ্ঞানী, দেবতাদের দ্বারা পূজিত, ইতিহাস-পুরাণের মর্মজ্ঞ, ন্যায় ও ধর্মতত্ত্বে পারদর্শী, ষড়ঙ্গবিদ্যায় নিপুণ, বাক্পটু, মেধাবী, স্মৃতিশক্তিসম্পন্ন, ত্রিকালদর্শী, সাংখ্য-যোগের বিভাগজ্ঞ, সন্ধি-বিদ্বেষাদি রাজধর্মে প্রাজ্ঞ, যুদ্ধ ও সঙ্গীতে কুশলী এবং ক্রোধহীন—লোক-লোকান্তর ভ্রমণ করে পারিজাত, ধীমান পর্বত, সৌম্য সুমুখ ও আরও বহু ঋষির সঙ্গে পাণ্ডবদের স্নেহভরে দর্শন করতে মনোবেগে সভায় উপস্থিত হলেন। তিনি জয়সূচক আশীর্বচনে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে বিশেষ সম্মান করলেন। সর্বধর্মবিদ নারদকে আগমন করতে দেখে পাণ্ডবশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির অনুজদের সঙ্গে সঙ্গে তৎক্ষণাৎ উঠে দাঁড়ালেন। প্রেম, বিনয় ও নম্রতায় প্রণাম করে তাঁকে যোগ্য আসনে বসালেন এবং বিধিমতো গাভী, মধুপর্ক, অর্ঘ্য প্রভৃতি আতিথ্য-উপচার নিবেদন করলেন। পরে রত্নাদি দ্বারা যথাবিধি পূজা করে তাঁর অভীষ্ট পূর্ণ করে তাঁকে সন্তুষ্ট করলেন।

Verse 14

अभ्यवादयत प्रीत्या विनयावनतस्तदा । तदर्हमासनं तस्मै सम्प्रदाय यथाविधि,सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता पाण्डवश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने देवर्षि नारदको आया देख भाइयोंसहित सहसा उठकर उन्हें प्रेम, विनय और नम्रतापूर्वक उस समय नमस्कार किया और उन्हें उनके योग्य आसन देकर धर्मज्ञ नरेशने गौ, मधुपर्क तथा अर्घ्य आदि उपचार अर्पण करते हुए रत्नोंसे उनका विधिपूर्वक पूजन किया तथा उनकी सब इच्छाओंकी पूर्ति करके उन्हें संतुष्ट किया

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন বিনয়ে নত হয়ে তিনি স্নেহভরে তাঁকে অভিবাদন করলেন। তাঁর মর্যাদার উপযুক্ত আসন বিধিপূর্বক প্রদান করে, ধর্মরক্ষার্থে যথোচিত আতিথ্য-সম্ভারে দেবর্ষিকে সম্মান ও সেবা করলেন।

Verse 15

गां चैव मधुपर्क च सम्प्रदायार्घ्यमेव च । अर्चयामास रल्नैश्व सर्वकामैश्न धर्मवित्‌,सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता पाण्डवश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने देवर्षि नारदको आया देख भाइयोंसहित सहसा उठकर उन्हें प्रेम, विनय और नम्रतापूर्वक उस समय नमस्कार किया और उन्हें उनके योग्य आसन देकर धर्मज्ञ नरेशने गौ, मधुपर्क तथा अर्घ्य आदि उपचार अर्पण करते हुए रत्नोंसे उनका विधिपूर्वक पूजन किया तथा उनकी सब इच्छाओंकी पूर्ति करके उन्हें संतुष्ट किया

বৈশম্পায়ন বললেন—ধর্মজ্ঞ রাজা যুধিষ্ঠির দেবর্ষি নারদকে আগত দেখে বিধিপূর্বক গাভী, মধুপর্ক ও অর্ঘ্য নিবেদন করলেন। পরে শাস্ত্রবিধি অনুসারে রত্নাদি দান করে এবং তাঁর অভিলাষ পূর্ণ করে মহর্ষিকে সন্তুষ্ট করলেন।

Verse 16

तुतोष च यथावच्च पूजां प्राप्प युधिष्ठिरात्‌ । सोडर्चित: पाण्डवै: सर्वैर्महर्षिवेदपारग: । धर्मकामार्थसंयुक्तं पप्रच्छेदं युधिष्ठिरम्‌,राजा युधिष्ठिससे यथोचित पूजा पाकर नारदजी भी बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकार सम्पूर्ण पाण्डवोंसे पूजित होकर उन वेददवेत्ता महर्षिने युधिष्ठिससे धर्म, काम और अर्थ तीनोंके उपदेशपूर्वक ये बातें पूछीं

বৈশম্পায়ন বললেন—যুধিষ্ঠিরের যথোচিত পূজা পেয়ে বেদপারগ মহর্ষি পরম সন্তুষ্ট হলেন। সকল পাণ্ডবের দ্বারা সমাদৃত হয়ে তিনি ধর্ম, কাম ও অর্থ—এই তিনের সমন্বিত বিষয় নিয়ে যুধিষ্ঠিরকে প্রশ্ন করলেন।

Verse 17

नारद उवाच कच्चिदर्थाक्ष कल्पन्ते धर्मे च रमते मन: । सुखानि चानुभूयन्ते मनश्न न विहन्यते,नारदजी बोले--राजन्‌! क्या तुम्हारा धन तुम्हारे (यज्ञ, दान तथा कुटुम्बरक्षा आदि आवश्यक कार्योंके) निर्वाहके लिये पूरा पड़ जाता है? क्या धर्ममें तुम्हारा मन प्रसन्नतापूर्वक लगता है? क्या तुम्हें इच्छानुसार सुख-भोग प्राप्त होते हैं? (भावच्चिन्तनमें लगे हुए) तुम्हारे मनको (किन्‍्हीं दूसरी वृत्तियोंद्वारा) आघात या विक्षेप तो नहीं पहुँचता है?

নারদ বললেন—হে রাজন, যজ্ঞ, দান ও কুটুম্ব-রক্ষাদি প্রয়োজনীয় কর্মের জন্য তোমার অর্থ কি যথেষ্ট? তোমার মন কি ধর্মে আনন্দ পায়? ইচ্ছামতো সুখ কি লাভ করছ? আর কোনো বিচ্যুতি-কারণে তোমার মন কি ব্যাহত হচ্ছে না তো?

Verse 18

पाण्डवोंद्वारा देवर्षि नारदका पूजन कच्चिदाचरितं पूर्वर्नरदेव पितामहै: । वर्तसे वृत्तिमक्षुद्रां धर्मार्थसहितां त्रिषु,नरदेव! क्या तुम ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र--इन तीनों वर्णोकी प्रजाओंके प्रति अपने पिता-पितामहोंद्वारा व्यवहारमें लायी हुई धर्मार्थयुक्त उत्तम एवं उदार वृत्तिका व्यवहार करते हो?

নারদ বললেন—হে নরদেব, ব্রাহ্মণ, বৈশ্য ও শূদ্র—এই তিন বর্ণের প্রজাদের প্রতি কি তুমি তোমার পিতা-পিতামহদের পূর্বাচরিত ধর্ম-অর্থসম্মত উদার ও উত্তম শাসননীতি অনুসরণ করছ?

Verse 19

कच्चिदर्थेन वा धर्म धर्मेणार्थमथापि वा । उभौ वा प्रीतिसारेण न कामेन प्रबाधसे,तुम धनके लोभमें पड़कर धर्मको, केवल धर्ममें ही संलग्न रहकर धनको अथवा आसक्ति ही जिसका बल है, उस कामभोगके सेवनद्वारा धर्म और अर्थ दोनोंको ही हानि तो नहीं पहुँचाते?

নারদ বললেন—ধনের আসক্তিতে কি তুমি লাভের জন্য ধর্মকে আঘাত করো? অথবা কেবল ধর্মেই লীন হয়ে ন্যায়সঙ্গত অর্থসাধনকে কি অবহেলা করো? কিংবা মোহবলপ্রসূত কামভোগে আসক্ত হয়ে কি ধর্ম ও অর্থ—উভয়কেই ক্ষতিগ্রস্ত করো না তো?

Verse 20

कच्चिदर्थ च धर्म च काम च जयतां वर । विभज्य काले कालज्ञ: सदा वरद सेवसे,विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ एवं वरदायक नरेश! तुम त्रिवर्गसेवनके उपयुक्त समयका ज्ञान रखते हो; अतः कालका विभाग करके नियत और उचित समयपर सदा धर्म, अर्थ एवं कामका सेवन करते हो न?

নারদ বললেন—বিজয়ীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, বরদাতা রাজন! সময়ের মর্ম জেনে কি তুমি কালকে বিভাগ করে যথাযথ ঋতুতে সর্বদা ধর্ম, অর্থ ও কাম—এই ত্রিবর্গকে পালন করো, যাতে একটির দ্বারা অন্যটি ব্যাহত না হয়?

Verse 21

+ कच्चिद्‌ राजगुणै: षड्भि: सप्तोपायांस्तथानघ । बलाबलं तथा सम्यक्‌ चतुर्दश परीक्षसे,निष्पाप युधिष्ठिर! क्या तुम राजोचित छ:* गुणोंके द्वारा सात उपायोंकी, अपने और शत्रुके बलाबलकी तथा देशपाल, दुर्गपाल आदि चौदहः व्यक्तियोंकी भलीभाँति परख करते रहते हो?

নারদ বললেন—নিষ্পাপ যুধিষ্ঠির! রাজোচিত ছয় গুণের দ্বারা কি তুমি সাত উপায়, নিজের ও শত্রুর বল-অবল, এবং দেশপাল, দুর্গপাল প্রভৃতি চৌদ্দ প্রধান কর্মচারীর বিষয়েও যথাযথ ও নিরন্তর পরীক্ষা-নিরীক্ষা করো?

Verse 22

कच्चिदात्मानमन्वीक्ष्य परांश्व जयतां वर | तथा संधाय कर्माणि अष्टौ भारत सेवसे,विजेताओंमें श्रेष्ठ भरतवंशी युधिष्ठिर! क्या तुम अपनी और शत्रुकी शक्तिको अच्छी तरह समझकर यदि शत्रु प्रबल हुआ तो उसके साथ संधि बनाये रखकर अपने धन और कोषकी वृद्धिके लिये आठ* कर्मोका सेवन करते हो?

নারদ বললেন—বিজয়ীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, হে ভারত! নিজের ও শত্রুদের শক্তি ভালোভাবে বিচার করে, শত্রু প্রবল হলে তার সঙ্গে সন্ধি বজায় রেখে, ধন ও কোষবৃদ্ধির জন্য কি তুমি রাষ্ট্রনীতির আট কর্ম যথাযথভাবে পালন করো?

Verse 23

कच्चित्‌ प्रकृतय: सप्त न लुप्ता भरतर्षभ । आद्यास्तथा व्यसनिन: स्वनुरक्ताश्व सर्वश:,भरतश्रेष्ठ! तुम्हारी मन्‍्त्री आदि सातः प्रकृतियाँ कहीं शत्रुओंमें मिल तो नहीं गयी हैं? तुम्हारे राज्यके धनीलोग बुरे व्यसनोंसे बचे रहकर सर्वथा तुमसे प्रेम करते हैं न?

নারদ বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! রাজ্যের সাত প্রকৃতি—মন্ত্রী প্রভৃতি—কি অক্ষুণ্ণ ও নিরাপদ আছে; শত্রুরা কি তাদের ভেঙে দেয়নি বা নিজেদের দিকে টেনে নেয়নি? আর তোমার অগ্রগণ্য জন—মন্ত্রী ও প্রধান প্রজারা—কি কু-আসক্তি থেকে মুক্ত থেকে সর্বতোভাবে তোমার প্রতি অনুরক্ত?

Verse 24

कच्चिन्न कृतकैर्दूतैयें चाप्पपरिशड्किता: । त्वत्तो वा तव चामात्यैभियथ्यते मन्त्रितं तथा,जिनपर तुम्हें संदेह नहीं होता, ऐसे शत्रुके गुप्तचर कृत्रिम मित्र बनकर तुम्हारे मन्त्रियोंद्वारा तुम्हारी गुप्त मन्त्रणाको जानकर उसे प्रकाशित तो नहीं कर देते?

নারদ বললেন—তুমি কি সতর্ক থাকো, যাতে শত্রুর গুপ্তচররা কৃত্রিম বন্ধু সেজে—যাদের প্রতি সন্দেহ জাগে না—তোমার বা তোমার মন্ত্রীদের মাধ্যমে গোপনে পরামর্শিত বিষয়টি যেমন ছিল তেমনই জেনে নিয়ে পরে তা ফাঁস করে না দেয়?

Verse 25

मित्रोदासीनशत्रूणां कच्चिद्‌ वेत्सि चिकीर्षितम्‌ | कच्चित्‌ संधिं यथाकाल विग्रहं चोपसेवसे,क्या तुम मित्र, शत्रु और उदासीन लोगोंके सम्बन्धमें यह ज्ञान रखते हो कि वे कब क्या करना चाहते हैं? उपयुक्त समयका विचार करके ही संधि और विग्रहकी नीतिका सेवन करते हो न?

নারদ বললেন—তুমি কি বন্ধু, নিরপেক্ষ ও শত্রুদের অভিপ্রায়—কখন তারা কী করতে চায়—সময়মতো জানো? আর কি যথোচিত সময় বিচার করে সন্ধি ও বিগ্রহ—উভয় নীতিই প্রয়োজনমতো অবলম্বন করো?

Verse 26

कच्चिद्‌ वृत्तिमुदासीने मध्यमे चानुमन्यसे । कच्चिदात्मसमा वृद्धा: शुद्धा: सम्बोधनक्षमा:,क्या तुम्हें इस बातका अनुमान है कि उदासीन एवं मध्यम व्यक्तियोंके प्रति कैसा बर्ताव करना चाहिये? वीर! तुमने अपने स्वयंके समान विश्वसनीय वृद्ध, शुद्ध हृदयवाले, किसी बातको अच्छी तरह समझानेमें समर्थ, उत्तम कुलमें उत्पन्न और अपने प्रति अत्यन्त अनुराग रखनेवाले पुरुषोंको ही मन्त्री बना रखा है न? क्योंकि भारत! राजाकी विजयप्राप्तिका मूल कारण अच्छी मन्त्रणा (सलाह) और उसकी सुरक्षा ही है, (जो सुयोग्य मन्त्रीके अधीन है)

নারদ বললেন—উদাসীন ও মধ্যপন্থীদের প্রতি কেমন আচরণ করা উচিত, তা কি তুমি যথাযথভাবে নির্ধারণ ও অনুমোদন করো? আর কি তুমি নিজের সমান সততা-সম্পন্ন, বয়োজ্যেষ্ঠ, শুদ্ধচিত্ত ও সুপরামর্শ দিতে সক্ষম ব্যক্তিদেরই মন্ত্রী নিযুক্ত করেছ?

Verse 27

कुलीनाश्षानुरक्ताश्न कृतास्ते वीर मन्त्रिण: | विजयो मन्त्रमूलो हि राज्ञो भवति भारत,क्या तुम्हें इस बातका अनुमान है कि उदासीन एवं मध्यम व्यक्तियोंके प्रति कैसा बर्ताव करना चाहिये? वीर! तुमने अपने स्वयंके समान विश्वसनीय वृद्ध, शुद्ध हृदयवाले, किसी बातको अच्छी तरह समझानेमें समर्थ, उत्तम कुलमें उत्पन्न और अपने प्रति अत्यन्त अनुराग रखनेवाले पुरुषोंको ही मन्त्री बना रखा है न? क्योंकि भारत! राजाकी विजयप्राप्तिका मूल कारण अच्छी मन्त्रणा (सलाह) और उसकी सुरक्षा ही है, (जो सुयोग्य मन्त्रीके अधीन है)

হে বীর, তুমি কি কুলীন ও গভীরভাবে অনুরক্ত ব্যক্তিদের মন্ত্রী করেছ? কারণ, হে ভারত, রাজার বিজয়ের মূল শিকড়ই হলো মন্ত্রণা।

Verse 28

कच्चित्‌ संवृतमन्त्रैस्तैरमात्यै: शास्त्रकोविदै: । राष्ट्र सुरक्षितं तात शत्रुभिर्न विलुप्यते,तात! मन्त्रको गुप्त रखनेवाले उन शास्त्रज्ञ सचिवोंद्वारा तुम्हारा राष्ट्र सुरक्षित तो है न? शत्रुओंद्वारा उसका नाश तो नहीं हो रहा है?

নারদ বললেন—বৎস, গোপন মন্ত্রণা রক্ষা করতে সক্ষম ও শাস্ত্রজ্ঞ সেই মন্ত্রীদের দ্বারা কি তোমার রাষ্ট্র সুরক্ষিত? শত্রুরা কি তা লুণ্ঠন বা ধ্বংস করছে না তো?

Verse 29

कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित्‌ काले विबुद्धयसे । कच्चिच्चापररात्रेषु चिन्तयस्यर्थमर्थवित्‌,तुम असमयमें ही निद्राके वशीभूत तो नहीं होते? समयपर जग जाते हो न? अर्थशास्त्रके जानकार तो तुम हो ही। रात्रिके पिछले भागमें जगकर अपने अर्थ (आवश्यक कर्तव्य एवं हित)-के विषयमें विचार तो करते हो न?-

নারদ বললেন— তুমি কি অসময়ে নিদ্রার বশীভূত হও না তো? যথাসময়ে কি জাগো? রাষ্ট্রনীতি-জ্ঞ হয়ে কি রাত্রির শেষ প্রহরে জেগে প্রকৃত কল্যাণ ও করণীয় কর্তব্য বিষয়ে চিন্তা করো?

Verse 30

कच्चिन्मन्त्रयसे नैक: कच्चिन्न बहुभि: सह । कच्चित्‌ ते मन्सत्रितो मन्त्रो न राष्ट्र परिधावति,(कोई भी गुप्त मन्त्रणा दोसे चार कानोंतक ही गुप्त रहती है, छः कानोंमें जाते ही वह फूट जाती है, अतः मैं पूछता हूँ.) तुम किसी गूढ़ विषयपर अकेले ही तो विचार नहीं करते अथवा बहुत लोगोंके साथ बैठकर तो मन्त्रणा नहीं करते? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम्हारी निश्चित की हुई गुप्त मन्त्रणा फ़ूटकर शत्रुके राज्यतक फैल जाती हो?

নারদ বললেন— তুমি কি একা একা গূঢ় বিষয়ে পরামর্শ করো না? আবার কি অতিরিক্ত বহুজনের সঙ্গে বসেও পরামর্শ করো না? তোমার স্থির করা গোপন মন্ত্রণা কি ফাঁস হয়ে অন্য রাজ্যে ছড়িয়ে পড়ে না তো?

Verse 31

कच्चिदर्थान्‌ विनिश्चित्य लघुमूलान्‌ महोदयान्‌ । क्षिप्रमारभसे कर्तु न विघ्नयसि तादृशान्‌,धनकी वृद्धिके ऐसे उपायोंका निश्चय करके, जिनमें मूलधन तो कम लगाना पड़ता हो, किंतु वृद्धि अधिक होती हो, उनका शीघ्रतापूर्वक आरम्भ कर देते हो न? वैसे कार्योंमें अथवा वैसा कार्य करनेवाले लोगोंके मार्गमें तुम विघ्न तो नहीं डालते?

নারদ বললেন— অল্প মূলধনে মহালাভ হয়—এমন উদ্যোগগুলি বিচার করে স্থির করে কি তুমি দ্রুত আরম্ভ করো? এবং এমন উদ্যোগ বা তা সম্পাদনকারীদের পথে কি তুমি বাধা দাও না তো?

Verse 32

कच्चिन्न सर्वे कर्मान्ता: परोक्षास्ते विशड्किता: । सर्वे वा पुनरुत्सृष्टा: संसृष्टं चात्र कारणम्‌,तुम्हारे राज्यके किसान--मजदूर आदि श्रमजीवी मनुष्य तुमसे अज्ञात तो नहीं हैं? उनके कार्य और गतिविधिपर तुम्हारी दृष्टि है न? वे तुम्हारे अविश्वासके पात्र तो नहीं हैं अथवा तुम उन्हें बार-बार छोड़ते और पुन: कामपर लेते तो नहीं रहते? क्‍योंकि महान्‌ अभ्युदय या उन्नतिमें उन सबका स्नेहपूर्ण सहयोग ही कारण है। (क्योंकि चिरकालसे अनुगृहीत होनेपर ही वे ज्ञात, विश्वासपात्र और स्वामीके प्रति अनुरक्त होते हैं)

নারদ বললেন— তোমার রাজ্যের নানা কাজের সমাপ্তি কি তোমার দৃষ্টির আড়ালে থেকে সন্দেহের পাত্র হয়ে ওঠে না তো? অথবা তুমি কি সকলকে বারবার বরখাস্ত করে আবার নিয়োগ করো? কারণ এখানে মহাসমৃদ্ধির মূল কারণ হলো সুসংবদ্ধ, স্নেহপূর্ণ সহযোগ।

Verse 33

आप्तैरलुब्धै: क्रमिकैस्ते च कच्चिदनुषछिता: । कच्चिद्‌ राजन्‌ कृतान्येव कृतप्रायाणि वा पुन:

নারদ বললেন— হে রাজন, তোমার কাজকর্ম কি বিশ্বস্ত, নির্লোভ ও শৃঙ্খলাবদ্ধ কর্মচারীদের দ্বারা যথাযথভাবে পরিচালিত হচ্ছে? আর হে রাজা, তুমি যে কাজ হাতে নিয়েছ, সেগুলি কি সত্যিই সম্পন্ন হয়েছে—অথবা অন্তত সম্পন্নতার নিকটে পৌঁছেছে?

Verse 34

विदुस्ते वीर कर्माणि नानवाप्तानि कानिचित्‌ । कृषि आदिके कार्य विश्वसनीय, लोभरहित और बड़े-बूढ़ोंके समयसे चले आनेवाले कार्यकर्ताओंद्वारा ही कराते हो न? राजन्‌! वीरशिरोमणे! क्‍या तुम्हारे कार्योंके सिद्ध हो जानेपर या सिद्धिके निकट पहुँच जानेपर ही लोग जान पाते हैं? सिद्ध होनेसे पहले ही तुम्हारे किन्हीं कार्योको लोग जान तो नहीं लेते ।। ३३ डक कच्चित्‌ कारणिका धर्मे सर्वशास्त्रेषु कोविदा: । कारयन्ति कुमारांश्न योधमुख्यांश्ष सर्वश:,तुम्हारे यहाँ जो शिक्षा देनेका काम करते हैं, वे धर्म एवं सम्पूर्ण शास्त्रोंके मर्मज्ञ विद्वान होकर ही राजकुमारों तथा मुख्य-मुख्य योद्धाओंको सब प्रकारकी आवश्यक शिक्षाएँ देते हैं न?

নারদ বললেন—হে রাজন! তোমার রাজ্যে যাঁরা শিক্ষাদান ও প্রশিক্ষণের ভার গ্রহণ করেন, তাঁরা কি ধর্মে প্রতিষ্ঠিত এবং সর্বশাস্ত্রে সুপণ্ডিত? আর তাঁরা কি রাজপুত্রদের ও প্রধান প্রধান যোদ্ধাদের সকল প্রয়োজনীয় বিদ্যা-শৃঙ্খলা সম্পূর্ণরূপে শিক্ষা দেন?

Verse 35

कच्चित्‌ सहसैमूर्खाणामेकं क्रीणासि पण्डितम्‌ | पण्डितो हार्थकृच्छेषु कुर्यान्नि:श्रेयसं परम्‌,तुम हजारों मूर्खोके बदले एक पण्डितको ही तो खरीदते हो न? अर्थात्‌ आदरपूर्वक स्वीकार करते हो न? क्योंकि विद्वान्‌ पुरुष ही अर्थसंकटके समय महान्‌ कल्याण कर सकता है

তুমি কি হাজার মূর্খের বদলে একজন পণ্ডিতকেই গ্রহণ করো? কারণ অর্থসংকটের সময় সেই জ্ঞানী পুরুষই পরম কল্যাণ সাধন করতে পারে।

Verse 36

कच्चिद्‌ दुर्गाणि सर्वाणि धनधान्यायुधोदकै: । यन्त्रैश्न परिपूर्णानि तथा शिल्पिधनुर्धरै:,क्या तुम्हारे सभी दुर्ग (किले) धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, यन्त्र (मशीन), शिल्पी और धनुर्धर सैनिकोंसे भरे-पूरे रहते हैं?

তোমার সব দুর্গ কি ধন-ধান্য, অস্ত্র-শস্ত্র, জল ও প্রতিরক্ষা-যন্ত্রে পরিপূর্ণ, এবং সেখানে কি কারিগর ও ধনুর্ধর সৈন্যও যথেষ্ট আছে?

Verse 37

एकोअप्यमात्यो मेधावी शूरो दान्तो विचक्षण: । राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम्‌,यदि एक भी मन्त्री मेधावी, शौर्यसम्पन्न, संयमी और चतुर हो तो राजा अथवा राजकुमारको विपुल सम्पत्तिकी प्राप्ति करा देता है

একজন মন্ত্রীও যদি মেধাবী, বীর, সংযমী ও বিচক্ষণ হন, তবে তিনি রাজা কিংবা রাজপুত্রকে মহৎ সমৃদ্ধিতে পৌঁছে দিতে পারেন।

Verse 38

कच्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दश पठच च । त्रिभिस्त्रिभिरविज्ञातैर्वेत्सि तीर्थानि चारकै:,क्या तुम शत्रुपक्षेके अठारह5 और अपने पक्षके पंद्रह: तीर्थोंकी तीन-तीन अज्ञात गुप्तचरोंद्वारा देख-भाल या जाँच-पड़ताल करते रहते हो?

শত্রুপক্ষের আঠারোটি এবং স্বপক্ষের পনেরোটি ‘তীর্থ’ (প্রধান কেন্দ্র/ঘাঁটি) কি তুমি তিন-তিনজন অচেনা গুপ্তচরের দ্বারা নিয়মিত পর্যবেক্ষণ করিয়ে থাকো?

Verse 39

कच्चिद्‌ द्विषामविदित: प्रतिपन्नश्न सर्वदा । नित्ययुक्तो रिपून्‌ सर्वान्‌ वीक्षसे रिपुसूदन,शत्रुसूदन! तुम शत्रुओंसे अज्ञात, सतत सावधान और नित्य प्रयत्नशील रहकर अपने सम्पूर्ण शत्रुओंकी गतिविधिपर दृष्टि रखते हो न?

হে রিপুসূদন, শত্রুসূদন! তুমি কি শত্রুদের অগোচরে থেকে সর্বদা সতর্ক ও নিত্যপ্রযত্নশীল হয়ে তোমার সকল শত্রুর গতিবিধির উপর নজর রাখো?

Verse 40

कच्चिद्‌ विनयसम्पन्न: कुलपुत्रो बहुश्रुतः । अनसूयुरनुप्रष्टा सत्कृतस्ते पुरोहित:,क्या तुम्हारे पुरोहित विनयशील, कुलीन, बहुज्ञ, विद्वान, दोषदृष्टिसे रहित तथा शास्त्रचर्चामें कुशल हैं? क्या तुम उनका पूर्ण सत्कार करते हो?

তোমার পুরোহিত কি বিনয়সম্পন্ন, কুলীন, বহুশ্রুত, দোষদৃষ্টিহীন এবং শাস্ত্রবিচারে কুশলী? আর তুমি কি তাঁকে যথোচিত সম্মান-সত্কার করো?

Verse 41

कच्चिदग्निषु ते युक्तो विधिज्ञो मतिमानृजु: । हुतं च होष्यमाणं च काले वेदयते सदा,तुमने अग्निहोत्रके लिये विधिज्ञ, बुद्धिमान्‌ और सरल स्वभावके ब्राह्मणको नियुक्त किया है न? वह सदा किये हुए और किये जानेवाले हवनको तुम्हें ठीक समयपर सूचित कर देता है न?

তুমি কি অগ্নিহোত্রের জন্য বিধিজ্ঞানী, বুদ্ধিমান ও সরলস্বভাব ব্রাহ্মণকে নিয়োগ করেছ? আর সে কি সর্বদা যথাসময়ে সম্পন্ন ও সম্পন্নব্য হোমের কথা তোমাকে জানায়?

Verse 42

कच्चिदज्गभेषु निष्णातो ज्योतिष: प्रतिपादक: । उत्पातेषु च सर्वेषु दैवज्ञ: कुशलस्तव,क्या तुम्हारे यहाँ हस्त-पादादि अंगोंकी परीक्षामें निपुण, ग्रहोंकी वक्र तथा अतिचार आदि गतियों एवं उनके शुभाशुभ परिणाम आदिको बतानेवाला तथा दिव्य, भौम एवं शरीरसम्बन्धी सब प्रकारके उत्पातोंको पहलेसे ही जान लेनेमें कुशल ज्योतिषी है?

তোমার কাছে কি এমন এক দক্ষ দैবজ্ঞ-জ্যোতিষী আছে, যে অঙ্গলক্ষণ পরীক্ষায় নিপুণ, গ্রহগতির ব্যাখ্যা করে শুভাশুভ ফল বলে, এবং দিব্য, ভৌম ও শারীরিক—সব প্রকার উৎপাতে পূর্বেই অবগত হতে সক্ষম?

Verse 43

कच्चिन्मुख्या महत्स्वेव मध्यमेषु च मध्यमा: । जघन्याश्न जघन्येषु भृत्या: कर्मसु योजिता:,तुमने प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंको उनके योग्य महान्‌ कार्योमें, मध्यम श्रेणीके कार्यकर्ताओंको मध्यम कार्योंमें तथा निम्न श्रेणीके सेवकोंको उनकी योग्यताके अनुसार छोटे कामोंमें ही लगा रखा है न?

তুমি কি যোগ্যতা অনুসারে কর্মবণ্টন করেছ—অগ্রগণ্যদের মহান দায়িত্বে, মধ্যমদের মধ্যম কাজে, আর নিম্নস্তরের ভৃত্যদের ক্ষুদ্র কর্তব্যে নিয়োজিত রেখেছ?

Verse 44

अमात्यानुपधातीतान्‌ पितृपैतामहाञ्छुचीन्‌ । श्रेष्ठाउ्छेछ्वेषु कच्चित्‌ त्वं नियोजयसि कर्मसु,क्या तुम निश्छल, बाप-दादोंके क्रमसे चले आये हुए और पवित्र आचार- विचारवाले श्रेष्ठ मन्त्रियोंको सदा श्रेष्ठ कर्मोमें लगाये रखते हो?

নারদ বললেন—হে রাজন, তুমি কি এমন মন্ত্রীদেরই কাজে নিয়োজিত করো, যারা দুর্নীতি ও ষড়যন্ত্রমুক্ত, পিতৃ-পৈতামহিক মর্যাদাসম্পন্ন এবং আচরণে শুচি—যাতে তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠরা সর্বদা শ্রেষ্ঠ ও যথোচিত কর্মে নিযুক্ত থাকে?

Verse 45

कच्चिन्नोग्रेण दण्डेन भृशमुद्धिजसे प्रजा: । राष्ट्र तवानुशासन्ति मन्त्रिणो भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ कठोर दण्डके द्वारा तुम प्रजाजनोंको अत्यन्त उद्धेगमें तो नहीं डाल देते? मन्त्रीलोग तुम्हारे राज्यका न्यायपूर्वक पालन करते हैं न?

নারদ বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ, তুমি কি কঠোর দণ্ড প্রয়োগ করে প্রজাদের অতিশয় উদ্বিগ্ন করে তুলছ না তো? আর তোমার মন্ত্রীরা কি ন্যায় ও শাসনবিধি অনুসারে রাজ্য পরিচালনা করে?

Verse 46

कच्चित्‌ त्वां नावजानन्ति याजका: पतितं यथा । उग्रप्रतिग्रहीतारं कामयानमिव स्त्रिय:,जैसे पवित्र याजक पतित यजमानका और स्त्रियाँ कामचारी पुरुषका तिरस्कार कर देती हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरतापूर्वक अधिक कर लेनेके कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती?

নারদ বললেন—প্রজারা কি তোমাকে অবজ্ঞা করে না তো—যেমন শুচি যাজক পতিত যজমানকে, আর নারীরা কামাতুর পুরুষকে তুচ্ছ করে—কারণ তুমি কি কঠোরভাবে অতিরিক্ত কর/উপহার গ্রহণকারী বলে পরিচিত?

Verse 47

कच्चिद्धष्टश्न श्रश्व मतिमान्‌ धृतिमाञछुचि: । कुलीनश्चानुरक्तश्व दक्ष: सेनापतिस्तथा,क्या तुम्हारा सेनापति हर्ष और उत्साहसे सम्पन्न, शूरवीर, बुद्धिमान, धैर्यवान्‌ू, पवित्र, कुलीन, स्वामिभक्त तथा अपने कार्यमें कुशल है?

নারদ জিজ্ঞাসা করলেন—তোমার সেনাপতি কি নির্ভীক ও বীর, বুদ্ধিমান, ধৈর্যশীল এবং আচরণে শুচি? সে কি কুলীন, প্রভুভক্ত এবং কর্তব্যে দক্ষ?

Verse 48

कच्चिद्‌ बलस्य ते मुख्या: सर्वयुद्धविशारदा: । धृष्टावदाता विक्रान्तास्त्वया सत्कृत्य मानिता:,तुम्हारी सेनाके मुख्य-मुख्य दलपति सब प्रकारके युद्धोंमें चतुर, धृष्ट (निर्भय), निष्कपट और पराक्रमी हैं न? तुम उनका यथोचित सत्कार एवं सम्मान करते हो न?

নারদ বললেন—তোমার সেনাবাহিনীর প্রধান নেতারা কি সর্বপ্রকার যুদ্ধে পারদর্শী, নির্ভীক, সরল ও নিষ্কলুষ, এবং পরাক্রান্ত? আর তুমি কি তাদের যথাযথভাবে সমাদর ও সম্মান করো?

Verse 49

कच्चिद्‌ बलस्य भक्त च वेतनं च यथोचितम्‌ । सम्प्राप्तकाले दातव्यं ददासि न विकर्षसि,अपनी सेनाके लिये यथोचित भोजन और वेतन ठीक समयपर दे देते हो न? जो उन्हें दिया जाना चाहिये, उसमें कमी या विलम्ब तो नहीं कर देते?

নারদ বললেন—তুমি কি তোমার সৈন্যদের যথোচিত আহার ও ন্যায্য বেতন যথাসময়ে প্রদান কর? যা দেওয়া উচিত, তা কি কখনও আটকে রাখ বা বিলম্ব কর না তো?

Verse 50

कालातिक्रमणादेते भक्तवेतनयोर्भूता: । भर्तुः कुप्यन्ति यद्भृत्या: सोडनर्थ: सुमहान्‌ स्मृत:,भोजन और वेतनमें अधिक विलम्ब होनेपर भृत्यगण अपने स्वामीपर कुपित हो जाते हैं और उनका वह कोप महान्‌ अनर्थका कारण बताया गया है

নারদ বললেন—আহার ও বেতন দিতে অতিরিক্ত বিলম্ব হলে ভৃত্যরা প্রভুর প্রতি ক্রুদ্ধ হয়; আর সেই ক্রোধ স্মৃতিতে মহা অনর্থের কারণ বলে কথিত।

Verse 51

कच्चित्‌ सर्वेडनुरक्तास्त्वां कुलपुत्रा: प्रधानत: । कच्चित्‌ प्राणांस्तवार्थेषु संत्यजन्ति सदा युधि,क्या उत्तम कुलमें उत्पन्न मन्‍्त्री आदि सभी प्रधान अधिकारी तुमसे प्रेम रखते हैं? क्या वे युद्धमें तुम्हारे हितके लिये अपने प्राणोंतकका त्याग करनेको सदा तैयार रहते हैं?

নারদ বললেন—উচ্চকুলজাত তোমার সকল প্রধান পুরুষ কি সত্যই তোমার প্রতি অনুরক্ত? আর যুদ্ধে কি তারা তোমার স্বার্থে সর্বদা প্রাণ পর্যন্ত ত্যাগ করতে প্রস্তুত থাকে?

Verse 52

कच्चिनैको बहूनर्थान्‌ सर्वशः साम्परायिकान्‌ । अनुशास्ति यथाकामं कामात्मा शासनातिग:,तुम्हारे कर्मचारियोंमें कोई ऐसा तो नहीं है, जो अपनी इच्छाके अनुसार चलनेवाला और तुम्हारे शासनका उल्लंघन करनेवाला हो तथा युद्धके सारे साधनों एवं कार्योंकोी अकेला ही अपनी रुचिके अनुसार चला रहा हो?

নারদ বললেন—তোমার কর্মচারীদের মধ্যে কি এমন কেউ নেই, যে কামনাবশে ও তোমার শাসন অতিক্রম করে, রাজ্যের বহু বিষয়—যুদ্ধ ও রাষ্ট্ররক্ষাসংক্রান্ত বিষয়সহ—একাই নিজের ইচ্ছামতো পরিচালনা করে?

Verse 53

कच्चित्‌ पुरुषकारेण पुरुष: कर्म शोभयन्‌ । लभते मानमधिकं भूयो वा भक्तवेतनम्‌,(तुम्हारे यहाँ काम करनेवाला) कोई पुरुष अपने पुरुषार्थसे जब किसी कार्यको अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता है, तब वह आपसे अधिक सम्मान अथवा अधिक भत्ता और वेतन पाता है न?

নারদ বললেন—তোমার এখানে কোনো ব্যক্তি কি নিজের উদ্যোগ ও পরিশ্রমে কোনো কাজ সুন্দরভাবে সম্পন্ন করলে, সে কি অধিক সম্মান অথবা অধিক ভাতা ও বেতন লাভ করে?

Verse 54

कच्चिद्‌ विद्याविनीतांश्व नराउज्ञानविशारदान्‌ | यथाहँ गुणतश्वैव दानेनाभ्युपपद्यसे,क्या तुम विद्यासे विनयशील एवं ज्ञाननिपुण मनुष्योंको उनके गुणोंके अनुसार यथायोग्य धन आदि देकर उनका सम्मान करते हो?

নারদ বললেন—তুমি কি বিদ্যায় বিনীত ও জ্ঞাননিপুণ পুরুষদের তাদের গুণ-মর্যাদা অনুযায়ী যথোচিত দান-সম্মান দিয়ে যথাযথভাবে আদৃত কর?

Verse 55

कच्चिद्‌ दारान्मनुष्याणां तवार्थ मृत्युमीयुषाम्‌ । व्यसन चाभ्युपेतानां बिभर्षि भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) जो लोग तुम्हारे हितके लिये सहर्ष मृत्युका वरण कर लेते हैं अथवा भारी संकटमें पड़ जाते हैं, उनके बाल-बच्चोंकी रक्षा तुम करते हो न?

নারদ বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যারা তোমার কল্যাণের জন্য মৃত্যু বরণ করেছে বা মহাবিপদে পতিত হয়েছে, তাদের স্ত্রী ও পরিবারকে কি তুমি যথাযথভাবে রক্ষা ও প্রতিপালন কর?

Verse 56

कच्चिद्‌ भयादुपगतं क्षीणं वा रिपुमागतम्‌ । युद्धे वा विजितं पार्थ पुत्रवत्‌ परिरक्षसि,कुन्तीनन्दन! जो भयसे अथवा अपनी धन-सम्पत्तिका नाश होनेसे तुम्हारी शरणमें आया हो या युद्धमें तुमसे परास्त हो गया हो, ऐसे शत्रुका तुम पुत्रके समान पालन करते हो या नहीं?

নারদ বললেন—হে পার্থ! যে শত্রু ভয়ে আশ্রয় নিতে এসেছে, বা সর্বস্বহারা হয়ে ক্ষীণ হয়েছে, কিংবা যুদ্ধে তোমার কাছে পরাজিত হয়েছে—তাকে কি তুমি পুত্রসম রক্ষা কর?

Verse 57

कच्चित्‌ त्वमेव सर्वस्या: पृथिव्या: पृथिवीपते । समश्नानभिशड्क्यश्न यथा माता यथा पिता,पृथ्वीपते! क्या समस्त भूमण्डलकी प्रजा तुम्हें ही समदर्शी एवं माता- पिताके समान विश्वसनीय मानती है?

নারদ বললেন—হে পৃথিবীপতি! সমগ্র রাজ্যের প্রজারা কি তোমাকেই নিরপেক্ষ ও সম্পূর্ণ বিশ্বাসযোগ্য—মাতা ও পিতার ন্যায়—মনে করে, যাতে তারা ভয় ও সন্দেহহীনভাবে বাস করতে পারে?

Verse 58

कच्चिद्‌ व्यसनिन शत्रुं निशम्य भरतर्षभ । अभियासि जवेनैव समीक्ष्य त्रिविधं बलम्‌,भरतकुलभूषण! क्या तुम अपने शत्रुको (स्त्री-द्यूत आदि) दुर्व्यसनोंमें फँसा हुआ सुनकर उसके त्रिविध बल (मन्त्र, कोष एवं भृत्य-बल अथवा प्रभुशक्ति, मन्त्रशक्ति एवं उत्साहशक्ति)-पर विचार करके यदि वह दुर्बल हो तो उसके ऊपर बड़े वेगसे आक्रमण कर देते हो?

নারদ বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! শত্রু যে নেশা-আসক্তি প্রভৃতি দুর্ব্যসনে পতিত হয়েছে শুনে, তুমি কি তার ত্রিবিধ বল (মন্ত্র, কোষ ও সেনা) বিচার করে, তাকে দুর্বল দেখে দ্রুত আক্রমণ কর?

Verse 59

यात्रामारभसे दिष्ट्या प्राप्तकालमरिंदम । पार्ष्णिमूलं च विज्ञाय व्यवसायं पराजयम्‌ | बलस्य च महाराज दत्त्वा वेतनमग्रत:,शत्रुदमन! क्या तुम पार्ष्णिग्राह आदि बारह- व्यक्तियोंके मण्डल (समुदाय)- को जानकर अपने कर्तव्यका5 निश्चय करके और पराजयमूलक व्यसनोंकाः अपने पक्षमें अभाव तथा शत्रुपक्षमें आधिक्य देखकर उचित अवसर आनेपर दैवका भरोसा करके अपने सैनिकोंको अग्रिम वेतन देकर शत्रुपर चढ़ाई कर देते हो?

নারদ বললেন—হে শত্রুদমন, মঙ্গল যে তুমি যথাসময়ে অভিযান আরম্ভ করছ। পশ্চাৎদিকের বিপদের মূল জেনে, পরাজয়-জনক আসক্তি ত্যাগ করে, বিজয়দায়ী সংকল্প স্থির করে, আর হে মহারাজ, সৈন্যদের অগ্রিম বেতন দিয়ে তুমি শত্রুর বিরুদ্ধে অগ্রসর হচ্ছ।

Verse 60

कच्चिच्च बलमुख्ये भ्य: परराष्टे परंतप । उपच्छन्नानि रत्नानि प्रयच्छसि यथाहत:,परंतप! शत्रुके राज्यमें जो प्रधान-प्रधान योद्धा हैं, उन्हें छिपे-छिपे यथायोग्य रत्न आदि भेंट करते रहते हो या नहीं?

নারদ বললেন—হে পরন্তপ, শত্রুর রাজ্যে যে সেনাবলের প্রধান প্রধান নেতা আছে, তাদের কি তুমি গোপনে, যথাযথভাবে ও পরিমিতভাবে রত্নাদি দান করে থাকো?

Verse 61

कच्चिदात्मानमेवाग्रे विजित्य विजितेन्द्रिय: । परान्‌ जिगीषसे पार्थ प्रमत्तानजितेन्द्रियान्‌,कुन्तीनन्दन! क्‍या तुम पहले अपनी इन्द्रियों और मनको जीतकर ही प्रमादमें पड़े हुए अजितेन्द्रिय शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा करते हो?

নারদ বললেন—হে পার্থ, তুমি কি আগে নিজেকে জয় করে, ইন্দ্রিয়সংযমী হয়ে, তারপরই অসংযত ও প্রমত্ত শত্রুদের জয় করতে ইচ্ছা করো?

Verse 62

कच्चित्‌ ते यास्यतः शत्रून पूर्व यान्ति स्वनुछिता: । साम दानं च भेदश्न दण्डश्व॒ विधिवद्‌ गुणा:,शत्रुओंपर तुम्हारे आक्रमण करनेसे पहले अच्छी तरह प्रयोगमें लाये हुए तुम्हारे साम, दान, भेद और दण्ड--ये चार गुण विधिपूर्वक उन शत्रुओंतक पहुँच जाते हैं न? (क्योंकि शत्रुओंको वशमें करनेके लिये इनका प्रयोग आवश्यक है।)

নারদ বললেন—শত্রুর বিরুদ্ধে যাত্রা করার আগে, তোমার দ্বারা বিধিমতো প্রয়োগিত সাম, দান, ভেদ ও দণ্ড—এই চার উপায় কি আগে থেকেই তাদের কাছে পৌঁছে যায়?

Verse 63

कच्चिन्मूलं दृढं कृत्वा परान्‌ यासि विशाम्पते । तांश्व॒ विक्रमसे जेतुं जित्वा च परिरक्षसि,महाराज! तुम अपने राज्यकी नींवको दृढ़ करके शत्रुओंपर धावा करते हो न? उन शत्रुओंको जीतनेके लिये पूरा पराक्रम प्रकट करते हो न? और उन्हें जीतकर उनकी पूर्णरूपसे रक्षा तो करते रहते हो न?

নারদ বললেন—হে প্রজাপতি, মহারাজ! তুমি কি আগে রাজ্যের ভিত্তি দৃঢ় করে তারপর শত্রুর দিকে অগ্রসর হও? তাদের জয় করতে কি পূর্ণ বিক্রম প্রকাশ করো? আর জয় করার পর কি তাদের সম্পূর্ণ রক্ষা করো?

Verse 64

कच्चिदष्टाड्रसंयुक्ता चतुर्विधबला चमू: । बलमुख्यै: सुनीता ते द्विषतां प्रतिवर्धिनी

নারদ বললেন—তোমার সেনা কি অষ্টাদশ অঙ্গসমন্বিত এবং চতুর্বিধ বলসম্পন্ন? তোমার প্রধান প্রধান সেনাপতিদের দ্বারা কি তা সুপরিচালিত হয়ে শত্রুদের বিরুদ্ধে ক্রমে শক্তিবর্ধিত হচ্ছে?

Verse 65

क्या धनरक्षक, द्रव्यसंग्राहक, चिकित्सक, गुप्तचर, पाचक, सेवक, लेखक और प्रहरी--इन आठ अंगों और हाथी, घोड़े, रथ एवं पैदल--इन चारः॑ प्रकारके बलोंसे युक्त तुम्हारी सेना सुयोग्य सेनापतियोंद्वारा अच्छी तरह संचालित होकर शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ होती है? ।। कच्चिल्लवं च मुष्टिं च परराष्ट्रे परंतप । अविहाय महाराज निहंसि समरे रिपून्‌,शत्रुओंको संतप्त करनेवाले महाराज! तुम शत्रुओंके राज्यमें अनाज काटने और दुर्भिक्षेके समयकी उपेक्षा न करके रणभूमिमें शत्रुओंको मारते हो न?

নারদ বললেন—ধনরক্ষক, দ্রব্যসংগ্রাহক, চিকিৎসক, গুপ্তচর, পাচক, সেবক, লেখক ও প্রহরী—এই আট বিভাগে সুসজ্জিত এবং হাতি-ঘোড়া-রথ-পদাতিক—এই চতুরঙ্গ বলে সমৃদ্ধ তোমার সেনা কি যোগ্য সেনাপতিদের দ্বারা সুপরিচালিত হয়ে শত্রু দমন করতে সক্ষম? আর হে পরন্তপ মহারাজ, শত্রুরাষ্ট্রে শস্যচ্ছেদন ও সঙ্কটকালে সুযোগ গ্রহণ—এ সব উপায় অবহেলা না করে কি তুমি সমরে শত্রুদের নিধন কর?

Verse 66

कच्चित्‌ स्वपरराष्ट्रेषु बहवो5थधिकृतास्तव । अर्थान्‌ समधितिष्ठन्ति रक्षन्ति च परस्परम्‌,क्या अपने और शत्रुके राष्ट्रोमें तुम्हारे बहुत-से अधिकारी स्थान-स्थानमें घूम-फिरकर प्रजाको वशमें करने एवं कर लेने आदि प्रयोजनोंको सिद्ध करते हैं और परस्पर मिलकर राष्ट्र एवं अपने पक्षके लोगोंकी रक्षामें लगे रहते हैं?

নারদ বললেন—তোমার নিজের রাজ্য ও প্রতিদ্বন্দ্বী রাজ্যগুলিতেও কি বহু নিযুক্ত কর্মকর্তা সর্বত্র বিচরণ করে রাজকার্য—প্রজাকে নিয়ন্ত্রণে রাখা, কর আদায় ইত্যাদি—সফল করে, এবং পরস্পর সমন্বয়ে রাজ্য ও তোমার পক্ষের রক্ষায় নিয়োজিত থাকে?

Verse 67

कच्चिदशभ्यवहार्याणि गात्रसंस्पर्शनानि च | प्रेयाणि च महाराज रक्षन्त्यनुमतास्तव,महाराज! तुम्हारे खाद्य पदार्थ, शरीरमें धारण करनेके वस्त्र आदि तथा सूँघनेके उपयोगमें आनेवाले सुगन्धित द्रव्योंकी रक्षा विश्वस्त पुरुष ही करते हैं न?

নারদ বললেন—হে মহারাজ, তোমার আহার-পানীয়, দেহস্পর্শী বস্ত্রাদি এবং প্রিয় সুগন্ধি দ্রব্য—এসব কি কেবল তোমার অনুমোদিত বিশ্বস্ত লোকেরাই রক্ষা করে?

Verse 68

कच्चित्‌ कोषश्न कोष्ठं च वाहनं द्वारमायुधम्‌ । आयश्व कृतकल्याणैस्तव भक्तैरनुछित:,तुम्हारे कल्याणके लिये सदा प्रयत्नशील रहनेवाले, स्वामिभक्त मनुष्योंद्वारा ही तुम्हारे धन-भण्डार, अन्न-भण्डार, वाहन, प्रधान द्वार, अस्त्र-शस्त्र तथा आयके साधनोंकी रक्षा एवं देख-भाल की जाती है न?

নারদ বললেন—তোমার মঙ্গলসাধনে সদা তৎপর, প্রভুভক্ত লোকেরাই কি তোমার কোষাগার, শস্যভাণ্ডার, যানবাহন, প্রধান দ্বার, অস্ত্রশস্ত্র এবং আয়ের উৎসসমূহের অবিরত রক্ষা ও তত্ত্বাবধান করে?

Verse 69

कच्चिदा भ्यन्तरेभ्यश्ष बाहो भ्यश्ष विशाम्पते । रक्षस्यात्मानमेवाग्रे तांश्व॒ स्वेभ्यो मिथश्व॒ तान्‌,प्रजापालक नरेश! क्‍या तुम रसोइये आदि भीतरी सेवकों तथा सेनापति आदि बाह्य सेवकोंद्वारा भी पहले अपनी ही रक्षा करते हो, फिर आत्मीयजनोंद्वारा एवं परस्पर एक-दूसरेसे उन सबकी रक्षापर भी ध्यान देते हो?

নারদ বললেন—হে প্রজাপতি! অন্তঃপুরের সেবক ও বাহিরের কর্মচারীদের দিক থেকে যে বিপদ উঠতে পারে, তার বিরুদ্ধে কি তুমি প্রথমে নিজের নিরাপত্তা নিশ্চিত করো? তারপর কি বিশ্বস্ত আত্মীয়দের দ্বারা এবং পরস্পরের উপর নজরদারির ব্যবস্থা করে সেই সেবকদেরও রক্ষা ও শাসন বজায় রাখো? হে প্রজাপালক রাজা, তোমার গৃহ ও প্রশাসন কি নিরাপদ, শৃঙ্খলাবদ্ধ এবং বিশ্বাসঘাতকতামুক্ত থাকে?

Verse 70

कच्चिन्न पाने द्यूते वा क्रीडासु प्रमदासु च । प्रतिजानन्ति पूर्वाह्नि व्ययं व्यसनजं तव,तुम्हारे सेवक पूर्वाह्नकालमें (जो कि धर्माचरणका समय है) तुमसे मद्यपान, द्यूत, क्रीड़ा और युवती स्त्री आदि दुर्व्यसनोंमें तुम्हारा समय और धनको व्यर्थ नष्ट करनेके लिये प्रस्ताव तो नहीं करते?

নারদ বললেন—পূর্বাহ্নে, যে সময় ধর্মকর্মের জন্য নির্দিষ্ট, তোমার সেবকেরা কি কখনও মদ্যপান, জুয়া, ক্রীড়া-বিনোদন ও নারীর সঙ্গে বিলাসে তোমার সময় ও ধন অপচয় করতে প্ররোচিত করে না তো?

Verse 71

कच्चिदायस्य चार्थेन चतुर्भागेन वा पुनः । पादभागैस्त्रिभिवापि व्यय: संशुद्धयते तव,क्या तुम्हारी आयके एक चौथाई या आधे अथवा तीन चौथाई भागसे तुम्हारा सारा खर्च चल जाता है?

নারদ বললেন—তোমার আয়ের এক-চতুর্থাংশে, কিংবা অর্ধেকে, অথবা তিন-চতুর্থাংশে কি তোমার সমস্ত ব্যয় সুষ্ঠুভাবে মিটে যায়—অপচয় ও ঋণ ছাড়াই?

Verse 72

कच्चिज्ज्ञातीन्‌ गुरून्‌ वृद्धान्‌ वणिज: शिल्पिन: श्रितान्‌ अभीक्षणमनुगृह्नासि धनधान्येन दुर्गतान्‌,तुम अपने आश्रित कुटुम्बके लोगों, गुरुजनों, बड़े-बूढ़ों, व्यापारियों, शिल्पियों तथा दीन-दुखियोंको धन-धान्य देकर उनपर सदा अनुग्रह करते रहते हो न?

নারদ বললেন—তুমি কি তোমার আশ্রিত স্বজন, গুরুজন, বৃদ্ধ, বণিক, শিল্পী এবং বিপন্ন দীনজনদের প্রতি ধন-ধান্য দান করে বারবার অনুগ্রহ প্রদর্শন করো?

Verse 73

कच्चिच्चायव्यये युक्ता: सर्वे गणकलेखका: । अनुतिष्ठ न्ति पूर्वाह्नि नित्यमायं व्ययं तव,तुम्हारी आमदनी और खर्चको लिखने और जोड़नेके काममें लगाये हुए सभी लेखक और गणक प्रतिदिन पूर्वाह्निकालमें तुम्हारे सामने अपना हिसाब पेश करते हैं न?

নারদ বললেন—আয়-ব্যয়ের হিসাব লিখে রাখা ও যোগফল করার কাজে নিযুক্ত তোমার সকল লেখক ও গণক কি প্রতিদিন পূর্বাহ্নে তোমার সামনে নিয়মিতভাবে রাজস্ব ও ব্যয়ের বিবরণ পেশ করে?

Verse 74

कच्चिदर्थेषु सम्प्रौढान्‌ हितकामाननुप्रियान्‌ । नापकर्षसि कर्मभ्य: पूर्वमप्राप्प किल्बिषम्‌,किन्हीं कार्योमें नियुक्त किये हुए प्रौढ़, हितैषी एवं प्रिय कर्मचारियोंको पहले उनके किसी अपराधको जाँच किये बिना तुम कामसे अलग तो नहीं कर देते हो?

নারদ বললেন—রাষ্ট্র ও অর্থকার্যে নিযুক্ত যে প্রৌঢ়, অভিজ্ঞ, হিতৈষী ও তোমার প্রিয় কর্মচারীরা আছে, তাদের দোষ প্রমাণ না করেই কি তুমি কখনও তাদের কর্তব্য থেকে অপসারিত করো না তো?

Verse 75

कच्चिद्‌ विदित्वा पुरुषानुत्तमाधममध्यमान्‌ | त्वं कर्मस्वनुरूपेषु नियोजयसि भारत,भारत! तुम उत्तम, मध्यम और अधम श्रेणीके मनुष्योंको पहचानकर उन्हें उनके अनुरूप कार्योंमें ही लगाते हो न?

নাৰদ বললেন—হে ভারত! উত্তম, মধ্যম ও অধম পুরুষদের চিনে নিয়ে, কি তুমি তাদের স্বভাব ও সামর্থ্য অনুযায়ীই কাজে নিয়োগ করো?

Verse 76

कच्चिन्न लुब्धा श्लौरा वा वैरिणो वा विशाम्पते । अप्राप्तव्यवहारा वा तव कर्मस्वनुछिता:,राजन! तुमने ऐसे लोगोंको तो अपने कामोंपर नहीं लगा रखा है? जो लोभी, चोर, शत्रु अथवा व्यावहारिक अनुभवसे सर्वथा शून्य हों?

নাৰদ বললেন—হে প্রজাপতি! তোমার কাজে কি এমন অনুচিত লোক নিযুক্ত নেই তো—যারা লোভী, ধূর্ত, শত্রু, অথবা যাদের কোনো ব্যবহারিক অভিজ্ঞতাই নেই?

Verse 77

कच्चिन्न चौरैरलुब्धैर्वा कुमारै: स्त्रीबलेन वा । त्वया वा पीड्यते राष्ट्र कच्चित्‌ तुष्टाः कृषीवला:,चोरों, लोभियों, राजकुमारों या राजकुलकी स्त्रियोंद्वारा अथवा स्वयं तुमसे ही तुम्हारे राष्ट्रको पीड़ा तो नहीं पहुँच रही है? क्या तुम्हारे राज्यके किसान संतुष्ट हैं?

নাৰদ জিজ্ঞাসা করলেন—চোর, লোভী, রাজপুত্র, রাজকুলের নারীদের প্রভাব, কিংবা তোমার নিজের কারণেই কি তোমার রাষ্ট্র পীড়িত হচ্ছে না তো? আর তোমার রাজ্যের কৃষকেরা কি সন্তুষ্ট?

Verse 78

कच्चिद्‌ राष्ट्र तडागानि पूर्णानि च बृहन्ति च । भागशो विनिविष्टानि न कृषिर्देवमातृका,क्या तुम्हारे राज्यके सभी भागोंमें जलसे भरे हुए बड़े-बड़े तालाब बनवाये गये हैं? केवल वर्षाके पानीके भरोसे ही तो खेती नहीं होती है?

নাৰদ বললেন—তোমার রাজ্যে কি বৃহৎ বৃহৎ পুকুর ও জলাধার জলপূর্ণ, এবং প্রতিটি অঞ্চলে যথাযথভাবে স্থাপিত? কারণ কৃষি কেবল বৃষ্টিদেবতার ভরসায় চলে না।

Verse 79

कच्चिन्न भक्त बीजं च कर्षकस्यावसीदति । प्रत्येक च शतं वृद्धया ददास्यृणमनुग्रहम्‌,तुम्हारे राज्यके किसानका अन्न या बीज तो नष्ट नहीं होता? क्या तुम प्रत्येक किसानपर अनुग्रह करके उसे एक रुपया सैकड़े ब्याजपर ऋण देते हो?

তোমার রাজ্যে কৃষকের অন্ন ও বীজ কি নষ্ট হয় না? আর কি তুমি রাজানুগ্রহে প্রত্যেক কৃষককে ন্যায্য শর্তে ঋণ দিয়ে তার কৃষিকর্মকে রক্ষা করো?

Verse 80

कच्चित्‌ स्वनुछिता तात वार्ता ते साधुभिर्जनै: । वार्तायां संश्रितस्तात लोको5यं सुखमेधते,तात! तुम्हारे राष्ट्रमें अच्छे पुरुषोंद्वारा वार्ता--कृषि, गोरक्षा तथा व्यापारका काम अच्छी तरह किया जाता है न? क्‍योंकि उपर्युक्त वातवित्तिपर अवलम्बित रहनेवाले लोग ही सुखपूर्वक उन्नति करते हैं

হে তাত! তোমার রাজ্যে সজ্জনদের দ্বারা ‘বার্তা’—কৃষি, গোরক্ষা ও বাণিজ্য—কি যথাযথভাবে সম্পন্ন হচ্ছে? কারণ এই জীবিকাগুলির উপর নির্ভর করেই প্রজারা সুখে উন্নতি লাভ করে।

Verse 81

कच्चिच्छूरा: कृतप्रज्ञा: पजच पज्च स्वनुछिता: । क्षेमं कुर्वन्ति संहत्य राजज्जनपदे तव,राजन! क्‍या तुम्हारे जनपदके प्रत्येक गाँवमें शूरवीर, बुद्धिमान्‌ू और कार्यकुशल पाँच-पाँच पंच मिलकर सुचारुरूपसे जनहितके कार्य करते हुए सबका कल्याण करते हैं?

হে রাজন! তোমার জনপদের প্রতিটি গ্রামে কি পাঁচজন করে শূর, স্থিরবুদ্ধি ও কর্মদক্ষ পঞ্চ একত্র হয়ে জনকল্যাণের কাজ করে সকলের নিরাপত্তা ও মঙ্গল সাধন করে?

Verse 82

कच्चिन्नगरगुप्त्यर्थ ग्रामा नगरवत्‌ कृता: । ग्रामवच्च कृता: प्रान्तास्ते च सर्वे त्वदर्पणा:,क्या नगरोंकी रक्षाके लिये गाँवोंको भी नगरके ही समान बहुत-से शूरवीरोंद्वारा सुरक्षित कर दिया गया है? सीमावर्ती गाँवोंको भी अन्य गाँवोंकी भाँति सभी सुविधाएँ दी गयी हैं? तथा क्या वे सभी प्रान्त, ग्राम और नगर तुम्हें (कर-रूपमें एकत्र किया हुआ) धन समर्पित करते हैं?“

নগররক্ষার জন্য কি গ্রামগুলিও নগরের ন্যায় সুসংগঠিত ও সুরক্ষিত করা হয়েছে? সীমান্তপ্রদেশগুলিও কি অন্তর্দেশীয় গ্রামের মতো যথাযথ ব্যবস্থায় পালিত হচ্ছে? এবং কি সেই সব প্রদেশ, গ্রাম ও নগর নিয়মমাফিক রাজস্ব তোমাকে অর্পণ করে?

Verse 83

कच्चिद्‌ बलेनानुगता: समानि विषमाणि च | पुराणि चौरान्‌ निध्नन्तश्नरन्ति विषये तव,क्या तुम्हारे राज्यमें कुछ रक्षक पुरुष सेना साथ लेकर चोर-डाकुओंका दमन करते हुए सुगम एवं दुर्गम नगरोंमें विचरते रहते हैं?

তোমার রাজ্যে কি রক্ষকরা সৈন্যবলসহ সহজ ও দুর্গম অঞ্চলে সর্বত্র বিচরণ করে, এবং পুরোনো চোর-ডাকাতদের দমন করে—যাতে প্রজারা নির্ভয়ে বাস করতে পারে?

Verse 84

कच्चित्‌ स्त्रिय: सान्त्वयसि कच्चित्‌ ताश्च सुरक्षिता: । कच्चिन्न श्रद्दधास्यासां कच्चिद्‌ गुह्ूं न भाषसे,तुम स्त्रियोंको सान्त्वना देकर संतुष्ट रखते हो न? क्‍या वे तुम्हारे यहाँ पूर्णरूपसे सुरक्षित हैं? तुम उनपर पूरा विश्वास तो नहीं करते? और विश्वास करके उन्हें कोई गुप्त बात तो नहीं बता देते?

নারদ বললেন— তুমি কি নারীদের সান্ত্বনা ও সদ্বাক্যে সন্তুষ্ট রাখো? তারা কি তোমার রাজ্যে সম্পূর্ণ নিরাপদ? আর তুমি কি তাদের উপর সম্পূর্ণ আস্থা স্থাপন করো না এবং কোনো গোপন কথা তাদের কাছে প্রকাশ করো না?

Verse 85

कच्चिदात्ययिकं श्रुत्वा तदर्थमनुचिन्त्य च । प्रियाण्यनुभवउ्छेषे न त्वमन्तःपुरे नृप,राजन! तुम कोई अमंगलसूचक समाचार सुनकर और उसके विषयमें बार- बार विचार करके भी प्रिय भोग-विलासोंका आनन्द लेते हुए अन्तःपुरमें ही सोते तो नहीं रह जाते?

নারদ বললেন— হে রাজন! অমঙ্গলসূচক সংবাদ শুনে এবং তার অর্থ বারবার ভেবে দেখেও কি তুমি প্রিয় ভোগ-বিলাসে মগ্ন হয়ে অন্তঃপুরেই পড়ে থাকো না?

Verse 86

कच्चिद्‌ द्वौ प्रथमौ यामौ रात्रे: सुप्त्वा विशाम्पते । संचिन्तयसि धर्मार्थो याम उत्थाय पकश्षिमे,प्रजानाथ! क्या तुम रात्रिके (पहले पहरके बाद) जो प्रथम दो (दूसरे-तीसरे) याम हैं, उन्हींमें सोकर अन्तिम पहरमें उठकर बैठ जाते और धर्म एवं अर्थका चिन्तन करते हो?

নারদ বললেন— হে প্রজানাথ! তুমি কি রাত্রির প্রথম দুই প্রহরে নিদ্রা নিয়ে, শেষ প্রহরে উঠে বসে ধর্ম ও অর্থের চিন্তা করো?

Verse 87

कच्चिदर्थयसे नित्यं मनुष्यान्‌ समलंकृत: । उत्थाय काले कालनज्ञै: सह पाण्डव मन्त्रिभि:,पाण्डुनन्दन! तुम प्रतिदिन समयपर उठकर स्नान आदिके पश्चात्‌ वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो देश-कालके ज्ञाता मन्त्रियोंके साथ बैठकर (प्रार्थी या दर्शनार्थी) मनुष्योंकी इच्छा पूर्ण करते हो न?

নারদ বললেন— হে পাণ্ডুনন্দন! তুমি কি প্রতিদিন যথাসময়ে উঠে, স্নানাদি করে, বস্ত্র-অলংকারে সজ্জিত হয়ে, দেশ-কালজ্ঞ পাণ্ডব মন্ত্রীদের সঙ্গে বসে নিয়মিতভাবে প্রজাদের দর্শন দাও এবং প্রার্থীদের অভিলাষ পূর্ণ করো?

Verse 88

कच्चिद्‌ रक्ताम्बरधरा: खड्गहस्ता: स्वलंकृता: । उपासते त्वामभितो रक्षणार्थमरिंदम,शत्रुदमन! कया लाल वस्त्र धारण करके अलंकारोंसे अलंकृत हुए योद्धा अपने हाथोंमें तलवार लेकर तुम्हारी रक्षाके लिये सब ओरसे सेवामें उपस्थित रहते हैं?

নারদ বললেন— হে শত্রুদমন! লাল বস্ত্রধারী, অলংকারে সজ্জিত, হাতে খড়্গধারী যোদ্ধারা কি তোমার রক্ষার্থে চারিদিকে প্রহরায় উপস্থিত থাকে?

Verse 89

कच्चिद्‌ दण्ड्येषु यमवत्पूज्येषु च विशाम्पते । परीक्ष्य वर्तसे सम्यगप्रियेषु प्रियेषु च,महाराज! क्‍या तुम दण्डनीय अपराधियोंके प्रति यमराज और पूजनीय पुरुषोंके प्रति धर्मराजका-सा बर्ताव करते हो? प्रिय एवं अप्रिय व्यक्तियोंकी भलीभाँति परीक्षा करके ही व्यवहार करते हो न?

নারদ বললেন—হে প্রজাপতি রাজন! দণ্ডযোগ্যদের প্রতি কি তুমি যমের ন্যায় কঠোর, আর পূজনীয়দের প্রতি ধর্মরাজের ন্যায় সম্মানসূচক আচরণ কর? প্রিয় ও অপ্রিয়—উভয়ের প্রতিই কি যথাযথ পরীক্ষা করে তবেই ন্যায়সঙ্গত ব্যবহার কর?

Verse 90

कच्चिच्छारीरमाबाधमौषधैर्नियमेन वा । मानसं वृद्धसेवाभि: सदा पार्थापकर्षसि,कुन्तीकुमार! क्या तुम ओषधिसेवन या पथ्य-भोजन आदि नियमोंके पालनद्वारा अपने शारीरिक कष्टको तथा वृद्ध पुरुषोंकी सेवारूप सत्संगद्वारा मानसिक संतापको सदा दूर करते रहते हो?

নারদ বললেন—হে কুন্তীপুত্র! ঔষধ সেবন বা নিয়মিত সংযমাচরণের দ্বারা কি তুমি দেহের ব্যাধি দূরে রাখো? আর বয়োজ্যেষ্ঠদের সেবা-রূপ সদ্সঙ্গের দ্বারা কি মনস্তাপ সর্বদা প্রশমিত করো?

Verse 91

कच्चिद्‌ वैद्याश्रविकित्सायामष्टाज्ञायां विशारदा: । सुहृदश्चानुरक्ताश्व शरीरे ते हिता: सदा,तुम्हारे वैद्य अष्टांगचिकित्सामें- कुशल, हितैषी, प्रेमी एवं तुम्हारे शरीरको स्वस्थ रखनेके प्रयत्नमें सदा संलग्न रहनेवाले हैं न?

নারদ বললেন—তোমার চিকিৎসকেরা কি অষ্টাঙ্গ চিকিৎসাবিদ্যায় পারদর্শী, বিশ্বস্ত ও স্নেহশীল সুহৃদ, এবং তোমার দেহকল্যাণে সর্বদা নিবেদিত?

Verse 92

कच्चिन्न लोभान्मोहाद्‌ वा मानादू्‌ वापि विशाम्पते । अर्थिप्रित्यर्थिन: प्राप्तानू न पश्यसि कथंचन,नरेश्वर! कहीं ऐसा तो नहीं होता कि तुम अपने यहाँ आये हुए अर्थी (याचक) और प्रत्यर्थी (राजाकी ओरसे मिली हुई वृत्ति बंद हो जानेसे दुःखी हो पुनः उसीको पानेके लिये प्रार्थी)-की ओर लोभ, मोह अथवा अभिमानवश किसी प्रकार आँख उठाकर देखतेतक नहीं?

নারদ বললেন—হে প্রজাপতি নরেশ্বর! লোভ, মোহ বা অহংকারবশত কি কখনও তোমার কাছে আগত অর্থী (যাচক) ও প্রত্যর্থী (পূর্বে প্রদত্ত জীবিকা বন্ধ হওয়ায় পুনরায় প্রার্থনাকারী)দের দিকে তুমি দৃষ্টিও দাও না?

Verse 93

कच्चिन्न लोभान्मोहाद्‌ वा विश्रम्भात्‌ प्रणयेन वा । अश्रितानां मनुष्याणां वृत्तिं त्वं संरुणत्सि वै,कहीं अपने आश्रितजनोंकी जीविकावृत्तिको तुम लोभ, मोह, आत्मविश्वास अथवा आसत्तिसे बंद तो नहीं कर देते?

নারদ বললেন—লোভ, মোহ, অতিরিক্ত আত্মবিশ্বাস বা অনুচিত স্নেহাসক্তির বশে কি তুমি তোমার আশ্রিত মানুষদের জীবিকা-ব্যবস্থা কখনও রুদ্ধ করে দাও?

Verse 94

कच्चित्‌ पौरा न सहिता ये च ते राष्ट्रवासिन । त्वया सह विरुध्यन्ते परै: क्रीता: कथंचन,तुम्हारे नगर तथा राष्ट्रके निवासी मनुष्य संगठित होकर तुम्हारे साथ विरोध तो नहीं करते? शत्रुओंने उन्हें किसी तरह घूस देकर खरीद तो नहीं लिया है?

নারদ বললেন—নগরবাসী ও রাজ্যবাসীরা কি একত্র হয়ে তোমার বিরোধিতা করছে না তো? শত্রুরা কি কোনোভাবে ঘুষ দিয়ে তাদের কিনে নিয়ে তোমার বিরুদ্ধে দাঁড় করায়নি তো?

Verse 95

कच्चिन्न दुर्बल: शत्रुर्बलेन परिपीडित: । मन्त्रेण बलवान्‌ कश्चिदुभाभ्यां च कथंचन,कोई दुर्बल शत्रु जो तुम्हारे द्वारा पहले बलपूर्वक पीड़ित किया गया (किंतु मारा नहीं गया), अब मन्त्रणाशक्तिसे अथवा मन्त्रणा और सेना दोनों ही शक्तियोंसे किसी तरह बलवान होकर सिर तो नहीं उठा रहा है?

নারদ বললেন—যে শত্রু একদা দুর্বল ছিল এবং যাকে তুমি বলপ্রয়োগে দমন করেছিলে (কিন্তু হত্যা করোনি), সে কি এখন পরামর্শ-চাতুর্যে, অথবা পরামর্শ ও সৈন্যবলের যুগপৎ শক্তিতে, কোনোভাবে বলবান হয়ে আবার মাথা তুলছে না তো?

Verse 96

कच्चित्‌ सर्वेडनुरक्तास्त्वां भूमिपाला: प्रधानत: । कच्चित्‌ प्राणांस्त्वदर्थेषु संत्यजन्ति त्वया55दृता:,क्या सभी मुख्य-मुख्य भूपाल तुमसे प्रेम रखते हैं? कया वे तुम्हारे द्वारा सम्मान पाकर तुम्हारे लिये अपने प्राणोंकी बलि दे सकते हैं?

নারদ বললেন—সব রাজাই কি, বিশেষত প্রধান প্রধান রাজারা, তোমার প্রতি অনুরক্ত? আর তোমার দ্বারা সম্মানিত হয়ে কি তারা তোমার উদ্দেশ্যের জন্য প্রাণ পর্যন্ত ত্যাগ করতে প্রস্তুত?

Verse 97

कच्चित्‌ ते सर्वविद्यासु गुणतोअ्डर्चा प्रवर्तते । ब्राह्मणानां च साधूनां तव नैःश्रेयसी शुभा । दक्षिणास्त्वं ददास्येषां नित्यं स्वर्गापवर्गदा:,क्या तुम्हारे मनमें सभी विद्याओंके प्रति गुणके अनुसार आदरका भाव है? क्या तुम ब्राह्मणों तथा साधु-संतोंकी सेवा-पूजा करते हो? जो तुम्हारे लिये शुभ एवं कल्याणकारिणी है। इन ब्राह्मणोंको तुम सदा दक्षिणा तो देते रहते हो न? क्योंकि वह स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति करानेवाली है

নারদ জিজ্ঞাসা করলেন—তোমার হৃদয়ে কি সকল বিদ্যার প্রতি তাদের গুণানুসারে যথাযথ শ্রদ্ধা বর্তমান? তুমি কি ব্রাহ্মণ ও সাধু-সজ্জনদের সেবা-আরাধনা কর—যা তোমার জন্য মঙ্গল ও পরম কল্যাণকর? আর কি তুমি তাদের নিত্য যথোচিত দক্ষিণা দাও, যা স্বর্গ ও মোক্ষদায়িনী বলে কথিত?

Verse 98

कच्चिद्‌ धर्मे त्रयीमूले पूर्वराचरिते जनै: । यतमानस्तथा कर्तु तस्मिन्‌ कर्मणि वर्तसे,तीनों वेद ही जिसके मूल हैं और पूर्वपुरुषोंने जिसका आचरण किया है, उस धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये तुम अपने पूर्वजोंकी ही भाँति प्रयत्नशील तो रहते हो? धर्मानुकूल कर्ममें ही तुम्हारी प्रवृत्ति तो रहती है?

নারদ বললেন—যে ধর্মের মূল ত্রয়ী (তিন বেদ) এবং যা প্রাচীন জনেরা আচরণ করেছেন, সেই ধর্ম পালন করতে তুমি কি তেমনই যত্নবান? তুমি কি পূর্বপুরুষদের ন্যায় ধর্মানুগত কর্মেই নিয়োজিত থাক?

Verse 99

कच्चित्तव गृहेन्नानि स्वादून्यश्रन्ति वै द्विजा: । गुणवन्ति गुणोपेतास्तवाध्यक्ष॑ं सदक्षिणम्‌,क्या तुम्हारे महलमें तुम्हारी आँखोंके सामने गुणवान्‌ ब्राह्मण स्वादिष्ठ और गुणकारक अन्न भोजन करते हैं? और भोजनके पश्चात्‌ उन्हें दक्षिणा दी जाती है?

নারদ বললেন—তোমার গৃহে কি তোমারই চোখের সামনে গুণবান ব্রাহ্মণেরা সুস্বাদু ও পুষ্টিকর অন্ন ভোজন করেন? আর ভোজনান্তে কি তোমার তত্ত্বাবধানে তাঁদের যথোচিত দক্ষিণা দান করে সম্মান করা হয়?

Verse 100

कच्चित्‌ क्रतूनेकचित्तों वाजपेयांश्व सर्वश: । पुण्डरीकांश्व कार्त्स्येन यतसे कर्तुमात्मवान्‌,अपने मनको वशमें करके एकाग्रचित्त हो वाजपेय और पुण्डरीक आदि सभी यज्ञ-यागोंका तुम पूर्णरूपसे अनुष्ठान करनेका प्रयत्न तो करते हो न?

নারদ বললেন—মনকে সংযত করে একাগ্রচিত্তে তুমি কি বজপেয় ও পুণ্ডরীক প্রভৃতি সকল যজ্ঞকর্ম সম্পূর্ণ বিধিতে সম্পাদন করতে দৃঢ়প্রয়াসী হও?

Verse 101

कच्चिज्ज्ञातीन्‌ गुरून्‌ वृद्धान्‌ दैवतांस्तापसानपि । चैत्यांश्व॒ वृक्षान्‌ कल्याणान्‌ ब्राह्मणांश्न नमस्यसि,जाति-भाई, गुरुजन, वृद्ध पुरुष, देवता, तपस्वी, चैत्यवृक्ष (पीपल) आदि तथा कल्याणकारी ब्राह्मणोंको नमस्कार तो करते हो न?

নারদ বললেন—তুমি কি তোমার স্বজন, গুরুজন ও বৃদ্ধদের, দেবতাদের ও তপস্বীদের, এবং তীর্থস্থান, পবিত্র বৃক্ষ ও কল্যাণদায়ী ব্রাহ্মণদের যথোচিত প্রণাম করো?

Verse 102

कच्चिच्छोको न मन्युर्वा त्वया प्रोत्पाद्यतेडनघ । अपि मड़लहस्तश्न जनः पाश्वे नु तिष्ठति,निष्पाप नरेश! तुम किसीके मनमें शोक या क्रोध तो नहीं पैदा करते? तुम्हारे पास कोई मनुष्य हाथमें मंगलसामग्री लेकर सदा उपस्थित रहता है न?

নারদ বললেন—হে নিষ্পাপ রাজা! তুমি কি কারও হৃদয়ে শোক বা ক্রোধ উৎপন্ন করো না তো? আর তোমার পাশে কি কেউ সর্বদা মঙ্গলদ্রব্য হাতে নিয়ে উপস্থিত থাকে?

Verse 103

कच्चिदेषा च ते बुद्धिर्वत्तिरेषा च तेडनघ । आयुष्या च यशस्या च धर्मकामार्थदर्शिनी,पापरहित युधिष्ठिर![ अबतक जैसा बतलाया गया है, उसके अनुसार ही तुम्हारी बुद्धि और वृत्ति (विचार और आचार) हैं न? ऐसी धर्मानुकूल बुद्धि और वृत्ति आयु तथा यशको बढ़ानेवाली एवं धर्म, अर्थ तथा कामको पूर्ण करनेवाली है

নারদ বললেন—হে পাপহীন! তোমার বুদ্ধি কি এমনই, আর তোমার আচরণও কি তদনুরূপ? কারণ ধর্মানুগ বুদ্ধি ও জীবনাচার আয়ু ও যশ বৃদ্ধি করে এবং ধর্ম, অর্থ ও কাম—এই পুরুষার্থগুলির যথার্থ বোধ এনে তাদের সিদ্ধি সাধন করে।

Verse 104

एतया वर्तमानस्य बुद्धया राष्ट्र न सीदति । विजित्य च महीं राजा सो>त्यन्तसुखमेधते,जो ऐसी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करता है, उसका राष्ट्र कभी संकटमें नहीं पड़ता। वह राजा सारी पृथ्वीको जीतकर बड़े सुखसे दिनोदिन उन्नति करता है

যে শাসক এইরূপ বিচক্ষণ বুদ্ধি অনুসারে আচরণ করে, তার রাষ্ট্র কখনও বিপদে পতিত হয় না। সে রাজা সমগ্র পৃথিবী জয় করে পরম সুখে দিন দিন সমৃদ্ধি লাভ করে।

Verse 105

कच्चिदार्यों विशुद्धात्मा क्षारितश्नौरकर्मणि । अदृष्टशास्त्रकुशलैर्न लोभाद्‌ वध्यते शुचि:,कहीं ऐसा तो नहीं होता कि शास्त्रकुशल विद्वानोंका संग न करनेवाले तुम्हारे मूर्ख मन्त्रियोंने किसी विशुद्ध हृदयवाले श्रेष्ठ एवं पवित्र पुरुषपर चोरीका अपराध लगाकर उसका सारा धन हड़प लिया हो? और फिर अधिक धनके लोभसे वे उसे प्राणदण्ड देते हों?

কোথাও কি এমন ঘটে না যে—শাস্ত্রজ্ঞ পণ্ডিতদের সঙ্গ ত্যাগ করা অজ্ঞ কর্মচারীরা কোনো বিশুদ্ধচিত্ত আর্য পুরুষের ওপর চুরির মিথ্যা অপবাদ চাপিয়ে তার ধন কেড়ে নেয়, আর অধিক ধনের লোভে সেই নির্দোষ, পবিত্র জনকে মৃত্যুদণ্ড দেয়?

Verse 106

दुष्टो गृहीतस्तत्कारी तज्ज्ैर्दृष्ट: सकारण: । कच्चिन्न मुच्यते स्तेनो द्रव्यलोभान्नरर्षभ,नरश्रेष्ठ) कोई ऐसा दुष्ट चोर जो चोरी करते समय गृहरक्षकोंद्वारा देख लिया गया और चोरीके मालसहित पकड़ लिया गया हो, धनके लोभसे छोड़ तो नहीं दिया जाता?

নরশ্রেষ্ঠ! যে দুষ্ট চোর চুরি করতে গিয়ে জ্ঞানীদের দ্বারা কারণসহ প্রত্যক্ষ দেখা হয়েছে এবং চোরাই মালসহ ধরা পড়েছে—ধনের লোভে তাকে কি কখনও ছেড়ে দেওয়া হয়?

Verse 107

उत्पन्नान्‌ कच्चिदाढ्यस्य दरिद्रस्य च भारत | अर्थान्‌ न मिथ्या पश्यन्ति तवामात्या हृता जनै:,भारत! तुम्हारे मन्त्री चुगली करनेवाले लोगोंके बहकावेमें आकर विवेकशून्य हो किसी धनीके या दरिद्रके थोड़े समयमें ही अचानक पैदा हुए अधिक धनको मिथ्यादृष्टिसे तो नहीं देखते? या उनके बढ़े हुए धनको चोरी आदिसे लाया हुआ तो नहीं मान लेते?

হে ভারত! পরনিন্দাকারী লোকদের প্ররোচনায় বিভ্রান্ত হয়ে তোমার মন্ত্রীরা কি কখনও কোনো ধনী বা দরিদ্রের অল্প সময়ে হঠাৎ অর্জিত সম্পদকে মিথ্যা দৃষ্টিতে দেখে—অথবা তার বৃদ্ধি পাওয়া ধনকে চুরি প্রভৃতি দ্বারা আনা বলে ধরে নেয়?

Verse 108

नास्तिक्यमनृतं क्रोध॑ प्रमादं दीर्घसूत्रताम्‌ । अदर्शनं ज्ञानवतामालस्यं पज्चवृत्तिताम्‌ । एकचिन्तनमर्थानामनर्थजैश्व चिन्तनम्‌,युधिछिर! तुम नास्तिकता, झूठ, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियोंका संग न करना, आलस्य, पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति, प्रजाजनोंपर अकेले ही विचार करना, अर्थशास्त्रको न जाननेवाले मू्खोके साथ विचार-विमर्श, निश्चित कार्योंके आरम्भ करनेमें विलम्ब या टालमटोल, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखना, मांगलिक उत्सव आदि न करना तथा एक साथ ही सभी शत्रुओंपर चढ़ाई कर देना--इन राजसम्बन्धी चौदह दोषोंका त्याग तो करते हो न? क्योंकि जिनके राज्यकी जड़ जम गयी है, ऐसे राजा भी इन दोषोंके कारण नष्ट हो जाते हैं

হে যুধিষ্ঠির! রাজ্যধর্ম বিনাশকারী এই দোষগুলি কি তুমি পরিত্যাগ কর—নাস্তিকতা, অসত্য, ক্রোধ, অসাবধানতা, দীর্ঘসূত্রতা, জ্ঞানীদের সান্নিধ্য ত্যাগ, অলসতা, পঞ্চেন্দ্রিয়ের বিষয়াসক্তি, রাষ্ট্রকার্যে একাকী চিন্তা, এবং নীতি-অনিতি না-জানা মূর্খদের সঙ্গে পরামর্শ? এ দোষে সুপ্রতিষ্ঠিত রাজ্যও ধ্বংস হয়।

Verse 109

निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम्‌ | मड़लाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः,युधिछिर! तुम नास्तिकता, झूठ, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियोंका संग न करना, आलस्य, पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति, प्रजाजनोंपर अकेले ही विचार करना, अर्थशास्त्रको न जाननेवाले मू्खोके साथ विचार-विमर्श, निश्चित कार्योंके आरम्भ करनेमें विलम्ब या टालमटोल, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखना, मांगलिक उत्सव आदि न करना तथा एक साथ ही सभी शत्रुओंपर चढ़ाई कर देना--इन राजसम्बन्धी चौदह दोषोंका त्याग तो करते हो न? क्योंकि जिनके राज्यकी जड़ जम गयी है, ऐसे राजा भी इन दोषोंके कारण नष्ट हो जाते हैं

নারদ বললেন—হে যুধিষ্ঠির, তুমি কি রাজধর্মের এই দোষগুলি পরিহার করো—স্থির-নির্ধারিত কাজ আরম্ভ না করা, গোপন মন্ত্রণা রক্ষা না করা, প্রজার মনোবল ও রাজ্যের বৈধতা রক্ষাকারী মঙ্গলোৎসব ও জনসম্মুখ আচার অবহেলা করা, এবং একসঙ্গে সর্বদিকেই প্রতিক্রিয়া/অভিযান শুরু করা? এই দোষে গভীরমূল রাজ্যও নষ্ট হয়; সংকল্প দুর্বল হয়, কৌশল প্রকাশ পায়, জনবিশ্বাস ক্ষয় হয় এবং শক্তি ছড়িয়ে পড়ে।

Verse 110

कच्चित्व॑ं वर्जयस्येतान्‌ राजदोषांश्षतुर्दश । प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूलापि पार्थिवा:,युधिछिर! तुम नास्तिकता, झूठ, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियोंका संग न करना, आलस्य, पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति, प्रजाजनोंपर अकेले ही विचार करना, अर्थशास्त्रको न जाननेवाले मू्खोके साथ विचार-विमर्श, निश्चित कार्योंके आरम्भ करनेमें विलम्ब या टालमटोल, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखना, मांगलिक उत्सव आदि न करना तथा एक साथ ही सभी शत्रुओंपर चढ़ाई कर देना--इन राजसम्बन्धी चौदह दोषोंका त्याग तो करते हो न? क्योंकि जिनके राज्यकी जड़ जम गयी है, ऐसे राजा भी इन दोषोंके कारण नष्ट हो जाते हैं

নারদ বললেন—হে যুধিষ্ঠির, তুমি কি সত্যিই রাজধর্মের সেই চৌদ্দ দোষ পরিহার করো, যেগুলির দ্বারা অধিকাংশ ক্ষেত্রে দৃঢ়মূল রাজাও বিনষ্ট হয়?

Verse 111

कच्चित्‌ ते सफला वेदा: कच्चित्‌ ते सफलं धनम्‌ । कच्चित्‌ ते सफला दारा: कच्चित्‌ ते सफलं श्रुतम्‌,क्या तुम्हारे वेद सफल हैं? कया तुम्हारा धन सफल है? क्या तुम्हारी स्त्री सफल है? और क्या तुम्हारा शास्त्रज्ञान सफल है?

নারদ বললেন—তোমার বেদ কি ফলপ্রসূ হচ্ছে? তোমার ধন কি সার্থক কাজে লাগছে? তোমার দাম্পত্যজীবন কি সফল? আর তোমার শ্রুত—অর্থাৎ শাস্ত্রশ্রবণ ও অধ্যয়ন—কি ফল দিচ্ছে?

Verse 112

युधिछिर उवाच कथं वै सफला वेदा: कथं वै सफलं धनम्‌ | कथं वै सफला दारा: कथं वै सफल श्रुतम्‌,युधिष्ठटिरने पूछा--देवर्षे! वेद कैसे सफल होते हैं, धनकी सफलता कैसे होती है? स्त्रीकी सफलता कैसे मानी गयी है तथा शास्त्रज्ञान कैसे सफल होता है?

যুধিষ্ঠির বললেন—দেবর্ষে! বেদ কীভাবে ফলপ্রসূ হয়? ধন কীভাবে সার্থক হয়? স্ত্রী ও দাম্পত্যজীবনকে কীভাবে ফলবতী বলা হয়? আর শাস্ত্রজ্ঞান—যা শোনা ও অধ্যয়ন করা—কীভাবে সফল হয়?

Verse 113

नारद उवाच अग्निहोत्रफला वेदा दत्तभुक्तफलं धनम्‌ | रतिपुत्रफला दारा: शीलवृत्तफलं श्रुतम्‌,नारदजीने कहा--राजन्‌! वेदोंकी सफलता अग्निहोत्रसे होती है, दान और भोगसे ही धन सफल होता है, स्त्रीका फल है--रति और पुत्रकी प्राप्ति तथा शास्त्रज्ञाकका फल है, शील और सदाचार

নারদ বললেন—হে রাজন! বেদের ফল অগ্নিহোত্র-অনুষ্ঠানে। ধনের ফল দান ও ধর্মসম্মত ভোগে। স্ত্রী ও দাম্পত্যজীবনের ফল রতি ও পুত্রপ্রাপ্তিতে। আর শাস্ত্রজ্ঞান (শ্রুত)-এর ফল শীল ও সদাচারে।

Verse 114

वैशम्पायन उवाच एतदाख्याय स मुनिर्नारदो वै महातपा: । पप्रच्छानन्तरमिदं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! यह कहकर महातपस्वी नारद मुनिने धर्मात्मा युधिष्ठिरसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया

বৈশম্পায়ন বললেন—রাজন! এ কথা বলে মহাতপস্বী নারদ মুনি ধর্মাত্মা যুধিষ্ঠিরকে পুনরায় এইভাবে প্রশ্ন করলেন।

Verse 115

नारद उवाच कच्चिदभ्यागता दूराद्‌ वणिजो लाभकारणात्‌ । यथोक्तमवहार्यन्ते शुल्क शुल्कोपजीविभि:,नारदजीने पूछा--राजन्‌! कर वसूलनेका काम करनेवाले तुम्हारे कर्मचारीलोग दूरसे लाभ उठानेके लिये आये हुए व्यापारियोंसे ठीक-ठीक कर वसूल करते हैं न? (अधिक तो नहीं लेते?)

নারদ বললেন—রাজন! লাভের আশায় কি দূরদেশ থেকে বণিকেরা আসে? আর শুল্ক-কর আদায় করে যাদের জীবিকা, তারা কি বিধিমতোই শুল্ক গ্রহণ করে—অতিরিক্ত কিছু তো নেয় না?

Verse 116

कच्चित्‌ ते पुरुषा राजन पुरे राष्ट्रे च मानिता: । उपानयन्ति पण्यानि उपधाभिरवज्चिता:,महाराज! वे व्यापारीालोग आपके नगर और राष्ट्रमें सम्मानित हो विक्रीके लिये उपयोगी सामान लाते हैं न! उन्हें तुम्हारे कर्मचारी छलसे ठगते तो नहीं?

নারদ বললেন—মহারাজ! আপনার নগর ও রাষ্ট্রে কি প্রজারা—বিশেষত বণিকেরা—সম্মানিত? আর তারা কি বিক্রয়ের উপযোগী দ্রব্য নিয়ে আসে? আপনার কর্মচারীরা কি কোনো ছল-প্রতারণায় তাদের ঠকায় না?

Verse 117

कच्चिच्छृूणोषि वृद्धानां धर्मार्थसहिता गिर: । नित्यमर्थविदां तात यथाधर्मार्थदर्शिनाम्‌,तात! तुम सदा धर्म और अर्थके ज्ञाता एवं अर्थशास्त्रके पूरे पण्डित बड़े-बूढ़े लोगोंकी धर्म और अर्थसे युक्त बातें सुनते रहते हो न?

নারদ বললেন—বৎস! তুমি কি নিয়মিতভাবে বৃদ্ধজনদের সেই বাক্য শোন, যা ধর্ম ও অর্থে প্রতিষ্ঠিত—যাঁরা সমৃদ্ধির তত্ত্ব জানেন এবং ধর্ম-অর্থের যথার্থ দৃষ্টি রাখেন?

Verse 118

कच्चित्‌ ते कृषितन्त्रेषु गोषु पुष्पफलेषु च । धर्मार्थ च द्विजातिभ्यो दीयेते मधुसर्पिषी,क्या तुम्हारे यहाँ खेतीसे उत्पन्न होनेवाले अन्न तथा फल-फूल एवं गौओंसे प्राप्त होनेवाले दूध, घी आदिमेंसे मधु (अन्न) और घृत आदि धर्मके लिये ब्राह्मणोंको दिये जाते हैं?

নারদ বললেন—তোমার দেশে কি কৃষিজ উৎপন্ন, গবাদিপশু থেকে প্রাপ্ত দ্রব্য, আর ফুল-ফল ইত্যাদির যথাযথ ব্যবহার হয়? আর ধর্মের জন্য কি দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) মধু ও ঘৃত প্রভৃতি যথোচিত দান দেওয়া হয়?

Verse 119

द्रव्योपकरणं किंचित्‌ सर्वदा सर्वशिल्पिनाम्‌ । चातुर्मास्यावरं सम्यड नियतं सम्प्रयच्छसि,नरेश्वर! क्या तुम सदा नियमसे सभी शिल्पियोंको व्यवस्थापूर्वक एक साथ इतनी वस्तु-निर्माणकी सामग्री दे देते हो, जो कम-से-कम चौमासे भर चल सके

নারদ বললেন—হে নরেশ্বর! তুমি কি সর্বদা নিয়মমাফিক ও সুশৃঙ্খলভাবে সকল শিল্পীকে উপকরণ ও যন্ত্রপাতির এমন নির্দিষ্ট যোগান দাও, যা অন্তত চাতুর্মাস্যকাল পর্যন্ত যথেষ্ট থাকে, যাতে তাদের কাজ নিরবচ্ছিন্নভাবে চলতে পারে?

Verse 120

कच्चित्‌ कृतं विजानीषे कर्तारें च प्रशंससि । सतां मध्ये महाराज सत्करोषि च पूजयन्‌,महाराज! क्या तुम्हें किसीके किये हुए उपकारका पता चलता है? क्या तुम उस उपकारीकी प्रशंसा करते हो और साधु पुरुषोंसे भरी हुई सभाके बीच उस उपकारीके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उसका आदर-सत्कार करते हो?

নারদ বললেন—হে মহারাজ! কেউ তোমার উপকার করলে তুমি কি তা জানতে পারো? তুমি কি উপকারকারীর প্রশংসা করো এবং সজ্জনদের পরিপূর্ণ সভার মধ্যে কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে তাকে যথোচিত সম্মান ও পূজা প্রদান করো?

Verse 121

कच्चित्‌ सूत्राणि सर्वाणि गृह्नासि भरतर्षभ । हस्तिसूत्रा श्वसूत्राणि रथसूत्राणि वा विभो,भरतश्रेष्ठ! क्‍या तुम संक्षेपसे सिद्धान्तका प्रति-पादन करनेवाले सभी सूत्रग्रन्थ--हस्तिसूत्र, अश्वसूत्र एवं रथसूत्र आदिका संग्रह (पठन एवं अभ्यास) करते रहते हो?

নারদ বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! তুমি কি সংক্ষিপ্ত নীতিসূত্রসমূহ—হস্তিসূত্র, অশ্বসূত্র, রথসূত্র প্রভৃতি—সকলই অধ্যয়ন করে ধারণ করো? হে বিভো, তুমি কি এ সকল বিদ্যার নিয়ত অনুশীলন রাখো?

Verse 122

कच्चिदशभ्यस्यते सम्यग गृहे ते भरतर्षभ । धनुर्वेदस्य सूत्र वै यन्त्रसूत्रं च नागरम्‌,भरतकुलभूषण! क्‍या तुम्हारे घरपर धरनुर्वेदसूत्र, यन्त्रसूत्रन और नागरिक सूत्रका अच्छी तरह अभ्यास किया जाता है?

নারদ বললেন—হে ভরতকুলভূষণ! তোমার গৃহে কি ধনুর্বেদের সূত্র, যন্ত্রসূত্র এবং নাগরিকসূত্র—এই সকল শাস্ত্রের যথাযথ শৃঙ্খলাবদ্ধ অনুশীলন সুষ্ঠুভাবে করা হয়?

Verse 123

कच्चिदस्त्राणि सर्वाणि ब्रह्मुदण्डश्व॒ तेडनघ । विषयोगास्तथा सर्वे विदिता: शत्रुनाशना:,निष्पाप नरेश! तुम्हें सब प्रकारके अस्त्र (जो मन्त्रबलसे प्रयुक्त होते हैं), वेदोक्त दण्ड-विधान तथा शत्रुओंका नाश करनेवाले सब प्रकारके विषप्रयोग ज्ञात हैं न?

নারদ বললেন—হে নিষ্পাপ নরেশ! মন্ত্রবলপ্রয়োগে ব্যবহৃত সকল অস্ত্র, বেদোক্ত দণ্ডবিধান, এবং শত্রুনাশক বিষপ্রয়োগের সমস্ত পদ্ধতি কি তোমার জানা আছে?

Verse 124

कच्चिदग्निभयाच्चैव सर्व व्यालभयात्‌ तथा । रोगरक्षो भयाच्चैव राष्ट्र स्‍वं परिरक्षसि,क्या तुम अग्नि, सर्प, रोग तथा राक्षसोंके भयसे अपने सम्पूर्ण राष्ट्रकी रक्षा करते हो?

নারদ বললেন—তুমি কি অগ্নিভয় থেকে, সকল বিষধর প্রাণীর ভয় থেকে, তদ্রূপ রোগ ও রাক্ষসের ভয় থেকে নিজের রাষ্ট্রকে যথাযথভাবে রক্ষা কর?

Verse 125

कच्चिदन्धांश्व मूकां श्व पड्डून्‌ व्यज्ञानबान्धवान्‌ । पितेव पासि धर्मज्ञ तथा प्रव्रजितानपि,धर्मज्ञ! क्‍या तुम अंधों, गूँगों, पंगुओं, अंगहीनों और बन्धु-बान्धवोंसे रहित अनाथों तथा संन्यासियोंका भी पिताकी भाँति पालन करते हो?

নারদ বললেন—হে ধর্মজ্ঞ! তুমি কি পিতার ন্যায় অন্ধ, মূক, পঙ্গু, বিকলাঙ্গ এবং আত্মীয়হীন অনাথদের—এমনকি প্রব্রজিত সন্ন্যাসীদেরও—পালন ও রক্ষা কর?

Verse 126

षडनर्था महाराज कच्चित्‌ ते पृष्ठतः कृता: । निद्रा55लस्यं भयं क्रोधोमार्दवं दीर्घसूत्रता,महाराज! क्या तुमने निद्रा, आलस्य, भय, क्रोध, कठोरता और दीर्घसूत्रता --इन छ: दोषोंको पीछे कर दिया (त्याग दिया) है?

নারদ বললেন—মহারাজ! তুমি কি সর্বনাশের এই ছয় কারণকে পিছনে ফেলে দিয়েছ—অবিবেচক নিদ্রা, আলস্য, ভয়, ক্রোধ, যেখানে দৃঢ়তা চাই সেখানে কোমলতা, এবং দীর্ঘসূত্রতা?

Verse 127

वैशम्पायन उवाच ततः कुरूणामृषभो महात्मा श्र॒ुत्वा गिरो ब्राह्मणसत्तमस्य । प्रणम्य पादावभिवाद्य तुष्टो राजाब्रवीन्नारदं देवरूपम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন কুরুশ্রেষ্ঠ মহাত্মা রাজা সেই ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠের বাক্য শুনে তাঁর চরণে প্রণাম ও অভিবাদন করলেন; এবং সন্তুষ্ট হয়ে দেবরূপ নারদকে বললেন।

Verse 128

वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! कुरुश्रेष्ठ महात्मा राजा युधिष्ठिरने ब्रह्माके पुत्रोंमें श्रेष्ठ नारदजीका यह वचन सुनकर उनके दोनों चरणोंमें प्रणाम एवं अभिवादन किया और अत्यन्त संतुष्ट हो देवस्वरूप नारदजीसे कहा ।। युधिछिर उवाच एवं करिष्यामि यथा त्वयोक्तं प्रज्ञा हि मे भूय एवाभिवृद्धा । उक्त्वा तथा चैव चकार राजा लेभे महीं सागरमेखलां च,युधिछिर बोले-देवर्षे! आपने जैसा उपदेश दिया है, वैसा ही करूँगा। आपके इस प्रवचनसे मेरी प्रज्ञा और भी बढ़ गयी है। ऐसा कहकर राजा युधिष्ठिरने वैला ही आचरण किया और इसीसे समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य पा लिया

যুধিষ্ঠির বললেন—হে দেবর্ষি! আপনি যেমন বলেছেন, আমি তেমনই করব; আপনার উপদেশে আমার প্রজ্ঞা আরও বৃদ্ধি পেয়েছে। এ কথা বলে রাজা তদনুযায়ী আচরণ করলেন এবং সমুদ্রবেষ্টিত পৃথিবীর রাজ্য লাভ করলেন।

Verse 129

नारद उवाच एवं यो वर्तते राजा चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे । स विहृत्येह सुसुखी शक्रस्यैति सलोकताम्‌,नारदजीने कहा--जो राजा इस प्रकार चारों वर्णों (और वर्णाश्रमधर्म)-की रक्षामें संलग्न रहता है, वह इस लोकमें अत्यन्त सुखपूर्वक विहार करके अन्तमें देवराज इन्द्रके लोकमें जाता है

নারদ বললেন—যে রাজা এইরূপে চাতুর্বর্ণ্য এবং বর্ণাশ্রমধর্মের রক্ষায় অবিচল থাকে, সে এই লোকেই মহাসুখে বিচরণ করে এবং শেষে শক্র (ইন্দ্র)-লোকের সহলোকতা লাভ করে।

Frequently Asked Questions

The central dharma-sankat is governance balance: how a ruler can pursue artha (state prosperity and power) without violating dharma, and how kāma (personal desire) must not distort policy, justice, secrecy, or public welfare.

Kingship is framed as accountable stewardship: victory and stability arise from disciplined counsel, ethical administration, timely obligations, and protection of subjects; ‘knowledge’ and ‘wealth’ are validated by right practice—ritual duty, giving, and character.

A concluding evaluative statement functions as meta-commentary: a ruler who protects the cāturvarṇya order and governs by these norms enjoys well-being here and attains an exalted posthumous state (Śakra’s realm), marking ethical governance as spiritually consequential.