Adhyaya 33
Sabha ParvaAdhyaya 3356 Verses

Adhyaya 33

Adhyāya 33: Antarvedī-Samāgama, Arghya-Nirṇaya, and Śiśupāla’s Objection

Upa-parva: Rājasūya–Sabhā-Satkāra (Honor, Precedence, and Arghya in the Assembly)

Vaiśaṃpāyana describes the consecration-day gathering in Yudhiṣṭhira’s inner ritual precinct, where brāhmaṇas, kings, and mahārṣis assemble. Nāradā and other sages sit with rājarṣis; learned disputation and dharma-artha discourse unfold, and the vedī is portrayed as radiant with Veda-knowing elites. The narration notes a controlled ritual environment in the antarvedī. Nārada observes the grandeur and recalls a prior divine context connected to Nārāyaṇa’s descent and the gathering of powers, framing Kṛṣṇa’s presence as exceptional within a human court. Bhīṣma then instructs Yudhiṣṭhira to perform appropriate honoring (arhaṇa) for the arriving kings and lists categories of those worthy of arghya; he recommends offering it to the most eminent among them. Yudhiṣṭhira asks whom to choose. Bhīṣma decisively names Kṛṣṇa as the foremost; Kṛṣṇa is praised as outshining the assembly. With Bhīṣma’s approval, Sahadeva offers the arghya to Kṛṣṇa, who accepts according to śāstric procedure. Śiśupāla, unable to tolerate the honor shown to Vāsudeva, censures Bhīṣma and Yudhiṣṭhira in the assembly and directs a verbal attack at Kṛṣṇa, initiating a public rupture in the ritual-political order.

Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर के न्यायपूर्ण शासन से राज्य में अद्भुत समृद्धि का उदय होता है—मेघ ‘निकामवर्षी’ बनते हैं और जनपद स्फीत हो उठता है। → समृद्धि केवल प्रकृति की कृपा नहीं, राजधर्म की कसौटी बनती है: कर-ग्रहण ‘न्यायपूर्वक’ हो, दान ‘सम्यग्’ हो, और गोरक्षा, कृषि, वाणिज्य—सब ‘सुप्रवृत्त’ रहें। इसी बीच युधिष्ठिर अपने कोष-धान्यागार का परिमाण जानकर एक महान यज्ञ (राजसूय) की तैयारी का संकल्प करते हैं। → युधिष्ठिर देवकीसुत माधव से कहते हैं कि यह समस्त धन विधिवत् श्रेष्ठ ब्राह्मणों और हव्यवाहन (अग्नि) में अर्पित करना चाहते हैं—धन का शिखर अब ‘यज्ञ’ में रूपांतरित होने को तत्पर है। → युधिष्ठिर की बात समाप्त होते ही सहदेव तत्क्षण आवश्यक व्यवस्थाओं का निवेदन/प्रस्ताव रखते हैं; फिर युधिष्ठिर नकुल को हस्तिनापुर भेजते हैं—भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, विदुर, कृप तथा अन्य अनुरक्त कौरव-सम्बन्धियों को आमंत्रित/सूचित करने हेतु। दूर-दूर देशों से वेद-वेदांग पारंगत ब्राह्मणों का आगमन आरम्भ होता है। → राजसूय की विराट तैयारी के साथ यह प्रश्न हवा में रहता है—क्या यह यज्ञ केवल धर्म-प्रतिष्ठा बनेगा, या राजकीय ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा को भी जगा देगा?

Shlokas

Verse 1

नस्ममा न (0) आसजअन+- - इसीको आजकल रोहतक (पंजाब) कहते हैं। (राजसूयपर्व) त्रयस्त्रिंशो 5 ध्याय: युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना वैशम्पायन उवाच (एवं निर्जित्य पृथिवीं भ्रातर: कुरुनन्दन । वर्तमाना: स्वधर्मेण शशासु: पृथिवीमिमाम्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--कुशनन्दन! इस प्रकार सारी पृथ्वीको जीतकर अपने धर्मके अनुसार बर्ताव करते हुए पाँचों भाई पाण्डव इस भूमण्डलका शासन करने लगे। चतुर्भिर्भीमसेनाद्यैर्भ्रातृभि: सहितो नृप: । अनुग॒ृहा प्रजा: सर्वा: सर्ववर्णानगोपयत्‌ ।। भीमसेन आदि चारों भाइयोंके साथ राजा युधिष्छिर सम्पूर्ण प्रजापर अनुग्रह करते हुए सब वर्णके लोगोंको संतुष्ट रखते थे। अविरोधेन सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिर: । प्रीयतां दीयतां सर्व मुक्त्वा कोषं बल॑ं विना ।। साधु धर्मेति पार्थस्य नान्यच्छुयेत भाषितम्‌ । युधिष्ठिर किसीका भी विरोध न करके सबके हितसाधनमें लगे रहते थे। “सबको तृप्त एवं प्रसन्न किया जाय, खजाना खोलकर सबको खुले हाथ दान दिया जाय, किसीपर बलप्रयोग न किया जाय, धर्म! तुम धन्य हो।” इत्यादि बातोंके सिवा युधिष्ठिरके मुखसे और कुछ नहीं सुनायी पड़ता था। एवंवृत्ते जगत्‌ तस्मिन्‌ पितरीवान्वरज्यत ।। न तस्य विद्यते द्वेष्ठा ततो5स्थाजात शत्रुता ।) उनके ऐसे बर्तावके कारण सारा जगत्‌ उनके प्रति वैसा ही अनुराग रखने लगा, जैसे पुत्र पिताके प्रति अनुरक्त होता है। राजा युधिष्ठिरसे द्वेष रखनेवाला कोई नहीं था, इसीलिये वे “अजातशत्रु' कहलाते थे। रक्षणाद्‌ धर्मराजस्य सत्यस्य परिपालनात्‌ | शत्रूणां क्षपणाच्चैव स्वकर्मनिरता: प्रजा:,धर्मराज युधिष्छिर प्रजाकी रक्षा, सत्यका पालन और शत्रुओंका संहार करते थे। उनके इन कार्योसे निश्चिन्त एवं उत्साहित होकर प्रजावर्गके सब लोग अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोके पालनमें संलग्न रहते थे

বৈশম্পায়ন বললেন—হে কুরুনন্দন! এইভাবে সমগ্র পৃথিবী জয় করে, নিজ নিজ ধর্ম অনুসারে আচরণ করতে করতে, সেই ভ্রাতৃগণ এই ভূমণ্ডল শাসন করতে লাগলেন। ভীমসেন প্রভৃতি চার ভ্রাতার সঙ্গে রাজা যুধিষ্ঠির সকল প্রজার প্রতি অনুগ্রহ করে, সকল বর্ণের রক্ষা করতেন। যুধিষ্ঠির কারও সঙ্গে বিরোধ না করে সকলের মঙ্গলসাধনে রত থাকতেন। “সকলকে তৃপ্ত ও প্রসন্ন করা হোক; কোষ খুলে দান করা হোক; বলপ্রয়োগ করা হবে না; ধর্ম ধন্য”—এ ছাড়া পার্থের মুখে অন্য কথা শোনা যেত না। তাঁর এমন আচরণে জগৎ পিতার প্রতি পুত্রের মতোই তাঁর প্রতি অনুরক্ত হল। তাঁর কোনো বিদ্বেষী ছিল না; তাই তিনি ‘অজাতশত্রু’ নামে প্রসিদ্ধ হলেন। ধর্মরাজের রক্ষা, সত্যপালন ও শত্রুনাশের ফলে প্রজারা নিশ্চিন্ত হয়ে নিজ নিজ বর্ণাশ্রমধর্মে নিয়োজিত থাকত।

Verse 2

बलीनां सम्यगादानादू धर्मतश्नानुशासनात्‌ | निकामवर्षी पर्जन्य: स्फीतो जनपदो5भवत्‌,न्यायपूर्वक कर लेने और धर्मपूर्वक शासन करनेसे उनके राज्यमें मेघ इच्छानुसार वर्षा करते थे। इस प्रकार युधिष्ठिरका सम्पूर्ण जनपद धन-धान्यसे सम्पन्न हो गया था

বলবানদের কাছ থেকে ন্যায়সঙ্গত কর আদায় এবং ধর্মানুসারে শাসনের ফলে মেঘ ইচ্ছামতো বর্ষণ করত। এইভাবে যুধিষ্ঠিরের সমগ্র জনপদ ধন-ধান্যে পরিপূর্ণ হয়ে সমৃদ্ধ হয়ে উঠেছিল।

Verse 3

सर्वारम्भा: सुप्रवृत्ता गोरक्षा कर्षणं वणिक्‌ । विशेषात्‌ सर्वमेवैतत्‌ संजज्ञे राजकर्मण:,गोरक्षा, खेती और व्यापार आदि सभी कार्य अच्छे ढंगसे होने लगे। विशेषतः राजाकी सुव्यवस्थासे ही यह सब कुछ उत्तमरूपसे सम्पन्न होता था

গোরক্ষা, কৃষিকর্ম ও বাণিজ্যসহ সকল উদ্যোগই সুন্দরভাবে চলতে লাগল। বিশেষত রাজার সুশৃঙ্খল প্রশাসনের ফলেই এসব কাজ সার্থকভাবে সম্পন্ন হচ্ছিল।

Verse 4

दस्युभ्यो वज्चकेभ्यो वा राजन्‌ प्रति परस्परम्‌ । राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयन्त मृषा गिर:,राजन! औरोंकी तो बात ही क्‍या है, चोरों, ठगों, राजा अथवा राजाके विश्वासपात्र व्यक्तियोंके मुखसे भी वहाँ कोई झूठी बात नहीं सुनी जाती थी। केवल प्रजाके साथ ही नहीं, आपसमें भी वे लोग झूठ-कपटका बर्ताव नहीं करते थे

হে রাজন, সেখানে চোর-ঠক, এমনকি রাজার প্রিয় ও বিশ্বস্ত লোকদের মুখ থেকেও মিথ্যা কথা শোনা যেত না। তারা কেবল প্রজার প্রতিই নয়, নিজেদের মধ্যেও প্রতারণা ও অসত্যের আচরণ করত না।

Verse 5

अवर्ष चातिवर्ष च व्याधिपावकमूर्च्छनम्‌ । सर्वमेतत्‌ तदा नासीद्‌ धर्मनित्ये युधिषछिरे,धर्मपरायण युधिष्ठिरके शासनकालमें अनावृष्टि, अतिवृष्टि, रोग-व्याधि तथा आग लगने आदि उपद्रवोंका नाम भी नहीं था

ধর্মনিষ্ঠ যুধিষ্ঠিরের শাসনকালে না অনাবৃষ্টি ছিল, না অতিবৃষ্টি; না রোগব্যাধির প্রাদুর্ভাব, না অগ্নিদুর্যোগ। তখন এসব বিপদের নামও শোনা যেত না।

Verse 6

प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वभावजम्‌ | अभिहर्तु नृपा जम्मुर्नान्यि: कार्य: कथंचन,राजा लोग उनके यहाँ स्वाभाविक भेंट देने अथवा उनका कोई प्रिय कार्य करनेके लिये ही आते थे, युद्ध आदि दूसरे किसी कामसे नहीं

রাজারা সেখানে আসতেন কেবল স্বভাবত প্রথাসিদ্ধ ভেট-কর অর্পণ করতে এবং কোনো প্রিয় সেবা সম্পাদন করতে; যুদ্ধ বা বলপ্রয়োগের অন্য কোনো উদ্দেশ্যে নয়।

Verse 7

धर्म्यर्धनागमैस्तस्य ववृधे निचयो महान्‌ । कर्तु यस्य न शक्‍्येत क्षयो वर्षशतैरपि,धर्मपूर्वक प्राप्त होनेवाले धनकी आयसे उनका महान्‌ धन-भण्डार इतना बढ़ गया था कि सैकड़ों वर्षोतक खुले हाथ लुटानेपर भी उसे समाप्त नहीं किया जा सकता था

ধর্মসম্মত ও ন্যায়সঙ্গত উপায়ে অর্জিত ধনে তাঁর মহাধনভাণ্ডার এমনই বৃদ্ধি পেল যে শত শত বছর উদারভাবে ব্যয় করলেও তা নিঃশেষ করা যেত না।

Verse 8

स्वकोष्ठस्य परीमाणं कोशस्य च महीपति: । विज्ञाय राजा कौन्तेयो यज्ञायैव मनो दथे,कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरने अपने अन्न-वस्त्रके भंडार तथा खजानेका परिमाण जानकर यज्ञ करनेका ही निश्चय किया

নিজের অন্ন-বস্ত্রের ভাণ্ডার ও ধনকোষের পরিমাণ জেনে কুন্তীপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির মনকে কেবল যজ্ঞকর্মেই স্থির করলেন।

Verse 9

सुहृदश्चैव ये सर्वे पूृथक्‌ च सह चाब्रुवन्‌ | यज्ञकालस्तव विभो क्रियतामत्र साम्प्रतम्‌,उनके जितने हितैषी सुहृद्‌ थे, वे सभी अलग-अलग और एक साथ यही कहने लगे --'प्रभो! यह आपके यज्ञ करनेका उपयुक्त समय आया है; अत: अब उसका आरम्भ कीजिये”

তাঁর সকল হিতৈষী সুহৃদ—কেউ পৃথকভাবে, কেউ একসঙ্গে—বারবার বলতে লাগল, “হে বিভো, আপনার যজ্ঞের উপযুক্ত সময় এসেছে; অতএব এখনই এখানে তা আরম্ভ করুন।”

Verse 10

अथीैवं ब्रुवतामेव तेषाम भ्याययौ हरि: । ऋषि: पुराणो वेदात्मादृश्यश्वैव विजानताम्‌,वे सुहृदू इस तरहकी बातें कर ही रहे थे कि उसी समय भगवान्‌ श्रीहरि आ पहुँचे। वे पुराणपुरुष, नारायण ऋषि, वेदात्मा एवं विज्ञानीजनोंके लिये भी अगम्य परमेश्वर हैं

তাঁরা এভাবে বলতেই ছিলেন, এমন সময়েই হরি সেখানে উপস্থিত হলেন—তিনি পুরাতন ঋষি, বেদের আত্মা; আর জ্ঞানীদের কাছেও তিনি দুর্লভ-দর্শন।

Verse 11

जगतस्तस्थुषां श्रेष्ठ: प्रभवश्वाप्ययश्न ह । भूतभव्यभवन्नाथ: केशव: केशिसूदन:,वे ही स्थावर-जंगम प्राणियोंके उत्तम उत्पत्ति-स्थान और लयके अधिष्ठान हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य--तीनों कालोंके नियन्ता हैं। वे ही केशी दैत्यको मारनेवाले केशव हैं

কেশী-নিধনকারী কেশব—চরাচর জগতের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—সৃষ্টির উৎসও তিনি, লয়ের আশ্রয়ও তিনি। অতীত, বর্তমান ও ভবিষ্যৎ—তিন কালের অধিপতিও তিনি।

Verse 12

प्राकार: सर्ववृष्णीनामापत्स्वभयदो<रिहा । बलाधिकारे निक्षिप्य सम्यगानकदुन्दुभिम्‌,वे सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंके परकोटेकी भाँति संरक्षक, आपत्तिमें अभय देनेवाले तथा उनके शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं। पुरुषसिंह माधव अपने पिता वसुदेवजीको द्वारकाकी सेनाके आधिपत्यपर स्थापित करके धर्मराजके लिये नाना प्रकारके धन-रत्नोंकी भेंट ले विशाल सेनाके साथ वहाँ आये थे

বৈশম্পায়ন বললেন— তিনি সকল বৃষ্ণিবংশীয়ের জন্য যেন দুর্গপ্রাচীর—বিপদে অভয়দাতা এবং শত্রুনাশক। দ্বারকার সেনাবাহিনীর অধিনায়কত্বে আনকদুন্দুভি (বাসুদেব)-কে যথাবিধি প্রতিষ্ঠা করে, পুরুষসিংহ মাধব ধর্মরাজের জন্য নানা প্রকার ধনরত্ন উপহার নিয়ে বিপুল সেনাসহ সেখানে উপস্থিত হলেন।

Verse 13

उच्चावचमुपादाय धर्मराजाय माधव: । धनौघं पुरुषव्याप्रो बलेन महता55वृत:,वे सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंके परकोटेकी भाँति संरक्षक, आपत्तिमें अभय देनेवाले तथा उनके शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं। पुरुषसिंह माधव अपने पिता वसुदेवजीको द्वारकाकी सेनाके आधिपत्यपर स्थापित करके धर्मराजके लिये नाना प्रकारके धन-रत्नोंकी भेंट ले विशाल सेनाके साथ वहाँ आये थे

বৈশম্পায়ন বললেন— মাধব ধর্মরাজের জন্য নানা প্রকার উপহার নিয়ে, ধনের স্রোতসম সম্ভারসহ, পুরুষদের মধ্যে ব্যাঘ্রসম, মহাবল দ্বারা পরিবেষ্টিত হয়ে সেখানে এলেন।

Verse 14

त॑ धनौघमपर्यन्तं रत्नसागरमक्षयम्‌ | नादयन्‌ रथघोषेण प्रविवेश पुरोत्तमम्‌,उस धनराशिकी कहीं सीमा नहीं थी, मानो रत्नोंका अक्षय महासागर हो। उसे लेकर रथोंकी आवाजसे समूची दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वे उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें प्रविष्ट हुए

বৈশম্পায়ন বললেন— সে ধনসম্ভার ছিল সীমাহীন—যেন রত্নের অক্ষয় সাগর। রথের গর্জনে দিক্‌দিগন্ত প্রতিধ্বনিত করতে করতে, তা বহন করে তারা শ্রেষ্ঠ নগর ইন্দ্রপ্রস্থে প্রবেশ করল।

Verse 15

पूर्णमापूरयंस्तेषां द्विषच्छोकावहो 5भवत्‌ | असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वायुना । कृष्णेन समुपेतेन जहृषे भारतं पुरम्‌,पाण्डवोंका धन-भण्डार तो यों ही भरा-पूरा था, भगवानने (उन्हें अक्षय धनकी भेंट देकर) उसे और भी पूर्ण कर दिया। उनका शुभागमन पाण्डवोंके शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाला था। बिना सूर्यका अन्धकारपूर्ण जगत्‌ सूर्योदय होनेसे जिस प्रकार प्रकाशसे भर जाता है, बिना वायुके स्थानमें वायुके चलनेसे जैसे नूतन प्राण-शक्तिका संचार हो उठता है, उसी प्रकार भगवान्‌ श्रीकृष्णके पदार्पण करनेपर समस्त इन्द्रप्रस्थमें हर्षोल्लास छा गया

বৈশম্পায়ন বললেন— তিনি তাদের সমৃদ্ধিকে আরও পূর্ণ করলেন, কিন্তু শত্রুদের জন্য তা হলো শোকের কারণ। যেমন সূর্যোদয়ে সূর্যহীন জগৎ আলোয় ভরে ওঠে, আর যেমন বাতাস বইলে নিস্তব্ধ স্থবিরতা নবপ্রাণে আন্দোলিত হয়, তেমনি কৃষ্ণের আগমনে ভারতদের নগর (ইন্দ্রপ্রস্থ) আনন্দে উল্লসিত হলো।

Verse 16

त॑ मुदाभिसमागम्य सत्कृत्य च यथाविधि । स पृष्टवा कुशलं चैव सुखासीनं युधिष्ठिर:,नरश्रेष्ठ जनमेजय! राजा युधिष्छिर बड़े प्रसन्न होकर उनसे मिले। उनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार करके कुशलमंगल पूछा और जब वे सुखपूर्वक बैठ गये, तब धौम्य, द्वैपायन आदि ऋत्विजों तथा भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव--चारों भाइयोंके साथ निकट जाकर युधिष्ठिरने श्रीकृष्णसे कहा

বৈশম্পায়ন বললেন— হে নরশ্রেষ্ঠ জনমেজয়! রাজা যুধিষ্ঠির আনন্দিত হয়ে এগিয়ে গিয়ে তাঁর সঙ্গে মিলিত হলেন। যথাবিধি অভ্যর্থনা-সৎকার করে কুশলমঙ্গল জিজ্ঞাসা করলেন; আর অতিথি স্বচ্ছন্দে আসনে বসলে, ধৌম্য, দ্বৈপায়ন প্রভৃতি ঋত্বিজ এবং ভীম, অর্জুন, নকুল, সহদেব—ভ্রাতৃগণের সঙ্গে কাছে গিয়ে যুধিষ্ঠির শ্রীকৃষ্ণকে বললেন।

Verse 17

धौम्यद्वैपायनमुखैर्त्विग्भि: पुरुषर्षभ । भीमार्जुनयमैश्वैव सहित: कृष्णमब्रवीत्‌,नरश्रेष्ठ जनमेजय! राजा युधिष्छिर बड़े प्रसन्न होकर उनसे मिले। उनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार करके कुशलमंगल पूछा और जब वे सुखपूर्वक बैठ गये, तब धौम्य, द्वैपायन आदि ऋत्विजों तथा भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव--चारों भाइयोंके साथ निकट जाकर युधिष्ठिरने श्रीकृष्णसे कहा

বৈশম্পায়ন বললেন—হে পুরুষশ্রেষ্ঠ, হে নরশ্রেষ্ঠ জনমেজয়! ধৌম্য ও দ্বৈপায়ন প্রমুখ ঋত্বিকদের সঙ্গে এবং ভীম, অর্জুন ও যমজ (নকুল-সহদেব) সহ রাজা যুধিষ্ঠির কৃষ্ণের নিকট গিয়ে তাঁকে সম্বোধন করলেন। তিনি বিধিপূর্বক অভ্যর্থনা ও আতিথ্য করলেন, কুশল-মঙ্গল জিজ্ঞাসা করলেন; তাঁরা স্বচ্ছন্দে আসীন হলে গুরুজন ও ভ্রাতৃসমক্ষে ধর্মানুসারে কথা বললেন।

Verse 18

युधिछिर उवाच त्वत्कृते पृथिवी सर्वा मद्वशे कृष्ण वर्तते । धनं च बहु वार्ष्णेय त्वत्प्रसादादुपार्जितम्‌,युधिष्ठिरने कहा--श्रीकृष्ण/ आपकी दयासे आपकी सेवाके लिये सारी पृथ्वी इस समय मेरे अधीन हो गयी है। वार्ष्णेय! मुझे धन भी बहुत प्राप्त हो गया है

যুধিষ্ঠির বললেন—হে কৃষ্ণ! তোমারই কারণে সমগ্র পৃথিবী এখন আমার অধীনে, সেবার জন্য প্রস্তুত। হে বার্ষ্ণেয়! তোমার প্রসাদে আমি প্রচুর ধনও অর্জন করেছি।

Verse 19

सो5हमिच्छामि तत्‌ सर्व विधिवद्‌ देवकीसुत । उपय क्तुं द्विजाग्रयेभ्यो हव्यवाहे च माधव,देवकीनन्दन माधव! वह सारा धन मैं विधिपूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा हव्यवाहन अग्निके उपयोगमें लाना चाहता हूँ

অতএব, হে দেবকীপুত্র মাধব! আমি সেই সমস্ত ধন বিধিপূর্বক শ্রেষ্ঠ দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) দানে এবং হব্যবাহন অগ্নিতে অর্পণে নিয়োজিত করতে চাই।

Verse 20

तदहं यटष्टमिच्छामि दाशा्ह सहितस्त्वया । अनुजैश्न महाबाहो तन्मानुज्ञातुमहसि,महाबाहु दाशार्ह! अब मैं आप तथा अपने छोटे भाइयोंके साथ यज्ञ करना चाहता हूँ। इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें

অতএব, হে মহাবাহু দাশার্হ! তোমার সঙ্গে এবং আমার অনুজ ভ্রাতাদের সহিত আমি যজ্ঞ করতে চাই; অনুগ্রহ করে অনুমতি দাও।

Verse 21

तद्‌ दीक्षापय गोविन्द त्वमात्मानं महाभुज । त्वयीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता हाहम्‌,विशाल भुजाओंवाले गोविन्द! आप स्वयं यज्ञकी दीक्षा ग्रहण कीजिये। दाशाहई! आपके यज्ञ करनेपर मैं पापरहित हो जाऊँगा

অতএব, হে মহাভুজ গোবিন্দ! তুমি নিজেই যজ্ঞের দীক্ষা গ্রহণ করো। হে দাশার্হ! তুমি যজ্ঞ সম্পন্ন করলে আমি নিশ্চয়ই পাপমুক্ত হব।

Verse 22

मां वाप्यभ्यनुजानीहि सहैभिरनुजैर्विभो | अनुज्ञातस्त्वया कृष्ण प्राप्त॒यां क्रतुमुत्तमम्‌,प्रभो! अथवा मुझे अपने इन छोटे भाइयोंके साथ दीक्षा ग्रहण करनेकी आज्ञा दीजिये। श्रीकृष्ण! आपकी अनुज्ञा मिलनेपर ही मैं उस उत्तम यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करूँगा

যুধিষ্ঠির বললেন—হে প্রভু, আমার কনিষ্ঠ ভ্রাতাদের সঙ্গে আমাকেও অনুমতি দিন। হে কৃষ্ণ, আপনার অনুমোদন লাভ করলেই আমি সেই শ্রেষ্ঠ যজ্ঞের দীক্ষা গ্রহণ করব; কারণ যথোচিত সম্মতি ও বিধি-ক্রমেই আমার ধর্মকর্মের সূচনা।

Verse 23

वैशम्पायन उवाच त॑ं कृष्ण: प्रत्युवाचेदं बहूकत्वा गुणविस्तरम्‌ । त्वमेव राजशार्दूल सम्राडहों महाक्रतुम्‌ । सम्प्राप्रुहि त्वया प्राप्ते कृतकृत्यास्ततो वयम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने राजसूययज्ञके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करके उनसे इस प्रकार कहा--'राजसिंह! आप सम्राट होने योग्य हैं, अतः आप ही इस महान्‌ यज्ञकी दीक्षा ग्रहण कीजिये। आपके दीक्षा लेनेपर हम सबलोग कृतकृत्य हो जायँगे

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়, তখন ভগবান শ্রীকৃষ্ণ রাজসূয় যজ্ঞের গুণাবলি বিস্তারে বর্ণনা করে বললেন—“হে রাজসিংহ, সম্রাট হওয়ার যোগ্য তুমি-ই; অতএব এই মহাযজ্ঞের দীক্ষা তুমিই গ্রহণ করো। তুমি দীক্ষিত হলে আমরা সকলেই কৃতার্থ হব।”

Verse 24

यजस्वाभीप्सितं यज्ञ मयि श्रेयस्यवस्थिते । नियुद्धक्ष्व त्वं च मां कृत्ये सर्व कर्तास्मि ते वच:,आप अपने इस अभीष्ट यज्ञको प्रारम्भ कीजिये। मैं आपका कल्याण करनेके लिये सदा उद्यत हूँ। मुझे आवश्यक कार्यमें लगाइये, मैं आपकी सब आज्ञाओंका पालन करूँगा”

“তুমি তোমার অভীষ্ট যজ্ঞ আরম্ভ করো; তোমার শ্রেয়ের জন্য আমি সদা প্রস্তুত। যে কর্তব্য প্রয়োজন, তাতে আমাকে নিয়োজিত করো—আমি তোমার সকল আদেশ পালন করব।”

Verse 25

युधिछिर उवाच सफल: कृष्ण संकल्प: सिद्धिश्व नियता मम । यस्य मे त्वं हृषीकेश यथेप्सितमुपस्थित:,युधिष्ठिर बोले--श्रीकृष्ण मेरा संकल्प सफल हो गया, मेरी सिद्धि सुनिश्चित है; क्योंकि हृषीकेश! आप मेरी इच्छाके अनुसार स्वयं ही यहाँ उपस्थित हो गये हैं

যুধিষ্ঠির বললেন—হে কৃষ্ণ, আমার সংকল্প সফল হয়েছে, আর আমার সিদ্ধি নিশ্চিত; কারণ হে হৃষীকেশ, আমার ইচ্ছামতো আপনি স্বয়ং এখানে উপস্থিত হয়েছেন।

Verse 26

वैशम्पायन उवाच अनुज्ञातस्तु कृष्णेन पाण्डवो भ्रातृभि: सह | ईजितुं राजसूयेन साधनान्युपचक्रमे,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान्‌ श्रीकृष्णसे आज्ञा लेकर भाइयोंसहित पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने राजसूययज्ञ करनेके लिये साधन जुटाना आरम्भ किया

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! শ্রীকৃষ্ণের অনুমতি পেয়ে পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠির ভ্রাতাদের সঙ্গে রাজসূয় যজ্ঞ সম্পাদনের জন্য প্রয়োজনীয় উপকরণ সংগ্রহ করতে আরম্ভ করলেন।

Verse 27

ततस्त्वाज्ञापयामास पाण्डवो5रिनिबर्हण: । सहदेवं युधां श्रेष्ठ मन्त्रिणश्वैव सर्वश:,उस समय शशत्रुओंका संहार करनेवाले पाण्डुकुमारने योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेव तथा सम्पूर्ण मन्त्रियोंको आज्ञा दी

তখন শত্রুনাশক পাণ্ডব যোদ্ধাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সহদেবকে এবং সকল মন্ত্রীকেও আদেশ দিলেন।

Verse 28

अस्मिन्‌ क्रतौ यथोक्तानि यज्ञाड़नि द्विजातिभि: । तथोपकरणं सर्व मड़लानि च सर्वश:,“इस यज्ञके लिये ब्राह्मणोंके बताये अनुसार यज्ञके अंगभूत सामान, आवश्यक उपकरण, सब प्रकारकी मांगलिक वस्तुएँ तथा धौम्यजीकी बतायी हुई यज्ञोपयोगी सामग्री >-इन सभी वस्तुओंको क्रमशः जैसे मिलें, वैसे शीघ्र ही अपने सेवक जाकर ले आवें

এই যজ্ঞে দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) নির্দেশ অনুসারে যজ্ঞের অঙ্গভূত সমস্ত সামগ্রী, প্রয়োজনীয় উপকরণ এবং সর্বপ্রকার মঙ্গলদ্রব্যও সম্পূর্ণরূপে সংগ্রহ করা হোক।

Verse 29

अधियज्ञांश्न॒ सम्भारान्‌ धौम्योक्तान्‌ क्षिप्रमेव हि । समानयमन्तु पुरुषा यथायोगं यथाक्रमम्‌,“इस यज्ञके लिये ब्राह्मणोंके बताये अनुसार यज्ञके अंगभूत सामान, आवश्यक उपकरण, सब प्रकारकी मांगलिक वस्तुएँ तथा धौम्यजीकी बतायी हुई यज्ञोपयोगी सामग्री >-इन सभी वस्तुओंको क्रमशः जैसे मिलें, वैसे शीघ्र ही अपने सेवक जाकर ले आवें

ধৌম্যের নির্দেশিত যজ্ঞাঙ্গ-সামগ্রী পুরুষেরা (সেবকরা) অতি শীঘ্রই এনে যথাযথ উপযোগিতা ও যথাক্রমে সাজিয়ে রাখুক।

Verse 30

इन्द्रसेनो विशोकश्न पूरुश्चार्जुनसारथि: । अन्नाद्याहरणे युक्ता: सन्‍्तु मत्प्रियकाम्यया,“इन्द्रसेन, विशोक और अर्जुनका सारथि पूरु, ये मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे अन्न आदिके संग्रहके कामपर जुट जायँ

ইন্দ্রসেন, বিশোক এবং অর্জুনের সারথি পূরু—এরা সকলেই আমাকে প্রীত করতে চেয়ে অন্নাদি সংগ্রহের কাজে নিযুক্ত হোক।

Verse 31

सर्वकामाश्च कार्यन्तां रसगन्धसमन्विता: । मनोरथप्रीतिकरा द्विजानां कुरुसत्तम,“कुरुश्रेष्ठ जिनको खानेकी प्राय: सभी इच्छा करते हैं, वे रस और गन्धसे युक्त भाँति- भाँतिके मिष्टात्न आदि तैयार कराये जाँय, जो ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार प्रीति प्रदान करनेवाले हों”

হে কুরুশ্রেষ্ঠ! রস ও সুগন্ধে সমন্বিত সর্বপ্রকার মনোহর ভোজ্য প্রস্তুত করা হোক, যা দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) ইচ্ছা পূর্ণ করে তাদের তৃপ্তি দেবে।

Verse 32

तद्घाक्यसमकालं च कृतं सर्व न्यवेदयत्‌ । सहदेवो युधां श्रेष्ठो धर्मराजे युधिषछ्ठिरे,धर्मराज युधिष्ठिरकी यह बात समाप्त होते ही योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेवने उनसे निवेदन किया, “यह सब व्यवस्था हो चुकी है”

সেই বাক্যসমাপ্ত হতেই যোদ্ধাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সহদেব ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরকে নিবেদন করল— “সমস্ত ব্যবস্থা যথাবিধি সম্পন্ন হয়েছে।”

Verse 33

ततो द्वैपायनो राजन्नृत्विज: समुपानयत्‌ । वेदानिव महाभागान्‌ साक्षान्मूर्तिमतो द्विजान्‌,राजन! तदनन्तर द्वैपायन व्यासजी बहुत-से ऋत्विजोंको ले आये। वे महाभाग ब्राह्मण मानो साक्षात्‌ मूर्तिमान्‌ वेद ही थे इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि राजसूयदीक्षायां त्रयस्त्रिंशो 5 ध्याय: ।। ३३ ॥।। इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापरवके अन्तर्गत राजयूयपर्वमें रजसूयदीक्षाविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

তারপর, হে রাজন, দ্বৈপায়ন ব্যাস বহু ঋত্বিজকে নিয়ে এলেন— সেই মহাভাগ ব্রাহ্মণেরা যেন দেহধারী, প্রত্যক্ষ মূর্তিমান বেদই।

Verse 34

स्वयं ब्रह्मत्वमकरोत्‌ तस्य सत्यवतीसुतः । धनंजयानामृषभ: सुसामा सामगो5भवत्‌,स्वयं सत्यवतीनन्दन व्यासने उस यज्ञमें ब्रह्माका काम सँभाला। धनंजयगोत्रीय ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ सुसामा सामगान करनेवाले हुए

সেই যজ্ঞে সত্যবতীপুত্র ব্যাস নিজেই ব্রহ্মা-পুরোহিতের দায়িত্ব গ্রহণ করলেন। আর ধনঞ্জয়-বংশের শ্রেষ্ঠ সুসামা সামগানকারী (সামগ) হলেন।

Verse 35

याज्ञवल्क्यो बभूवाथ ब्रह्निष्ठो5 ध्वर्युसत्तम: । पैलो होता वसो: पुत्रो धौम्पेन सहितो5भवत्‌,और ब्रह्मनिष्ठ याज्ञवल्क्य उस यज्ञके श्रेष्ठतम अध्वर्यु थे। वसुपुत्र पैल धौम्य मुनिके साथ होता बने थे

তখন ব্রহ্মনিষ্ঠ যাজ্ঞবল্ক্য সেই যজ্ঞের শ্রেষ্ঠ অধ্বর্যু হলেন। আর বসুপুত্র পৈল মুনি ধৌম্যের সঙ্গে হোতা রূপে নিযুক্ত হলেন।

Verse 36

एतेषां पुत्रवर्गाश्न॒ शिष्पाश्न भरतर्षभ | बशभूवुहोत्रगा: सर्वे वेदवेदाड़पारगा:,भरतश्रेष्ठ! इनके पुत्र और शिष्यवर्गके लोग, जो सब-के-सब वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान थे, 'होत्रग” (सप्तहोता) हुए

হে ভরতশ্রেষ্ঠ, তাঁদের পুত্রগণ ও শিষ্যসমূহ—যাঁরা সকলেই বেদ ও বেদাঙ্গে পারদর্শী—সবাই হোত্রগ (সপ্তহোতা) রূপে নিযুক্ত হলেন।

Verse 37

ते वाचयित्वा पुण्याहमूहयित्वा च तं विधिम्‌ । शास्त्रोक्तं पूजयामासुस्तद्‌ देवयजनं महत्‌,उन सबने पुण्याहवाचन कराकर उस विधिका ऊहन (अर्थात्र 'राजसूयेन यक्ष्ये, स्वाराज्यमवाप्रवानि'--मैं स्वाराज्य प्राप्त करूँ, इस उद्देश्यसे राजसूययज्ञ करूँगा, इत्यादि रूपसे संकल्प) कराकर शास्त्रोक्त विधिसे उस महान्‌ यज्ञस्थानका पूजन कराया

তাঁরা পুণ্যাহ-পাঠ করিয়ে এবং সেই বিধির উদ্দেশ্য-সহ সংকল্প স্থির করিয়ে, শাস্ত্রবিধি অনুসারে দেবযজন-সম্বন্ধীয় সেই মহান যজ্ঞভূমির পূজা করালেন।

Verse 38

तत्र चक्कुरनुज्ञाता: शरणान्युत शिल्पिन: । गन्धवन्ति विशालानि वेश्मानीव दिवौकसाम्‌,उस स्थानपर राजाकी आज्ञासे शिल्पियोंने देवमन्दिरोंक समान विशाल एवं सुगन्धित भवन बनाये

সেখানে রাজার অনুমতিতে শিল্পীরা আশ্রয়স্থান প্রভৃতি নির্মাণ করল—সুগন্ধময়, প্রশস্ত ভবন, যেন দেবলোকের প্রাসাদ।

Verse 39

तत आज्ञापयामास स राजा राजसत्तम: | सहदेवं तदा सद्यो मन्त्रिणं पुरुषर्षभ:,तदनन्तर राजशिरोमणि नरश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्छिरने तुरंत ही मन्त्री सहदेवको आज्ञा दी, 'सब राजाओं तथा ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करनेके लिये तुरंत ही शीघ्रगामी दूत भेजो।' राजाकी यह बात सुनकर सहदेवने दूतोंको भेजा और कहा--

তারপর রাজশ্রেষ্ঠ, পুরুষসিংহ সেই রাজা তৎক্ষণাৎ তাঁর মন্ত্রী সহদেবকে আদেশ দিলেন।

Verse 40

आमन्त्रणार्थ दूतांस्त्वं प्रेषयस्वाशुगान्‌ द्रुतम्‌ । उपश्रुत्य वचो राज्ञ: स दूतान्‌ प्राहिणोत्‌ तदा,तदनन्तर राजशिरोमणि नरश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्छिरने तुरंत ही मन्त्री सहदेवको आज्ञा दी, 'सब राजाओं तथा ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करनेके लिये तुरंत ही शीघ्रगामी दूत भेजो।' राजाकी यह बात सुनकर सहदेवने दूतोंको भेजा और कहा--

“আমন্ত্রণের জন্য দ্রুতগামী দূতদের অবিলম্বে পাঠাও।” রাজার কথা শুনে সহদেব তখনই দূতদের প্রেরণ করলেন।

Verse 41

आमन्त्रयध्वं राष्ट्रेषु ब्राह्मणान्‌ भूमिपानथ । विशश्व मान्यान्‌ शूद्रांक्ष सर्वानानयतेति च,“तुमलोग सभी राज्योंमें घूम-घूमकर वहाँके राजाओं, ब्राह्मणों, वैश्यों तथा सब माननीय शूद्रोंको निमन्त्रित कर दो और बुला ले आओ'

“তোমরা রাজ্যরাজ্যে গিয়ে সেখানকার ভূমিপাল ও ব্রাহ্মণদের আমন্ত্রণ করো; বৈশ্যদেরও, আর যেসব মান্য শূদ্র আছেন—সকলকে ডেকে এখানে নিয়ে এসো।”

Verse 42

वैशम्पायन उवाच समाज्ञप्तास्ततो दूता: पाण्डवेयस्य शासनात्‌ | आमन्त्रयाम्बभूवुश्च आनयंश्वापरान्‌ द्रुतम्‌ । तथा परानपि नरानात्मन: शीघ्रगामिन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरके आदेशसे सहदेवकी आज्ञा पाकर सब शीघ्रगामी दूत गये और उन्होंने ब्राह्मण आदि सब वर्णोंके लोगोंको निमन्त्रित किया तथा बहुतोंको वे अपने साथ ही शीघ्र बुला लाये। वे अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य व्यक्तियोंको भी साथ लाना न भूले

বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর পাণ্ডব যুধিষ্ঠিরের আদেশে, সহদেবের নির্দেশ পেয়ে, দ্রুতগামী দূতেরা বেরিয়ে পড়ল। তারা ব্রাহ্মণ প্রভৃতি সকল বর্ণের লোককে আমন্ত্রণ জানাল এবং অনেককে তৎক্ষণাৎ সঙ্গে নিয়ে এল। নিজেদের সঙ্গে সম্পর্কযুক্ত অন্য লোকদের ডাকতেও তারা অবহেলা করল না।

Verse 43

ततस्ते तु यथाकाल कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरम्‌ । दीक्षयाज्चक्रिरे विप्रा राजसूयाय भारत,भारत! तदनन्तर वहाँ आये हुए सब ब्राह्मणोंने ठीक समयपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राजसूययज्ञकी दीक्षा दी

তারপর, হে ভারত! সেখানে সমবেত ব্রাহ্মণগণ যথাসময়ে কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠিরকে রাজসূয় যজ্ঞের জন্য দীক্ষিত করলেন।

Verse 44

दीक्षित: स तु धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिर: । जगाम यज्ञायतनं वृतो विप्रै: सहस्रश:,यज्ञकी दीक्षा लेकर धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिर सहसौ्रों ब्राह्मणोंसे घिरे हुए यज्ञमण्डपमें गये

যজ্ঞের দীক্ষা গ্রহণ করে ধর্মাত্মা ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির সহস্র সহস্র ব্রাহ্মণে পরিবৃত হয়ে যজ্ঞমণ্ডপে গমন করলেন।

Verse 45

भ्रातृभिज्ञातिभिश्वैव सुहृद्धिः सचिवै: सह । क्षत्रियैश्व मनुष्येन्द्रैननादेशसमागतै:

তিনি ভ্রাতৃগণ, জ্ঞাতিবর্গ, সুহৃদ ও সচিবদের সঙ্গে ছিলেন; আর নানা দেশ থেকে সমাগত ক্ষত্রিয় নরেন্দ্রগণ—মানবসমাজের অধিপতিরাও—সেখানে উপস্থিত ছিলেন।

Verse 46

अमात्यैश्न नरश्रेष्ठो धर्मो विग्रहवानिव । उस समय उनके सगे भाई, जाति-बन्धु, सुहृद, सहायक अनेक देशोंसे आये हुए क्षत्रिय-नरेश तथा मन्त्रिगण भी थे। नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर मूर्तिमान्‌ धर्म ही जान पड़ते थे || ४५ *3॥ आजजम्मुर्ब्राह्मणास्तत्र विषयेभ्यस्ततस्तत:

আর অমাত্যদের (মন্ত্রীদের) পরিবেষ্টিত সেই নরশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির যেন মূর্তিমান ধর্মই প্রতীয়মান হচ্ছিলেন।

Verse 47

तेषामावसथांक्षक्रुर्थर्मराजस्य शासनात्‌,धर्मराजकी आज्ञासे हजारों शिल्पियोंने आत्मीयजनोंके साथ आये हुए उन ब्राह्मणोंके ठहरनेके लिये पृथक्‌-पृथक्‌ घर बनाये थे, जो बहुत-से अन्न और वस्त्रोंसे परिपूर्ण थे और जिनमें सभी ऋतुओंमें सुखपूर्वक रहनेकी सुविधाएँ थीं

ধর্মরাজের আদেশে সহস্র সহস্র শিল্পী, স্বজনসহ আগত সেই ব্রাহ্মণদের বাসের জন্য পৃথক পৃথক গৃহ নির্মাণ করল—যেগুলি অন্ন ও বস্ত্রে পরিপূর্ণ, এবং সর্ব ঋতুতেই সুখে থাকার উপযোগী সকল ব্যবস্থায় সমৃদ্ধ ছিল।

Verse 48

बद्चन्नाच्छादनैर्युक्तानू सगणानां पृथक्‌ पृथक्‌ सर्वर्तुगुणसम्पन्नान्‌ शिल्पिनो5थ सहस्रशः,धर्मराजकी आज्ञासे हजारों शिल्पियोंने आत्मीयजनोंके साथ आये हुए उन ब्राह्मणोंके ठहरनेके लिये पृथक्‌-पृथक्‌ घर बनाये थे, जो बहुत-से अन्न और वस्त्रोंसे परिपूर्ण थे और जिनमें सभी ऋतुओंमें सुखपूर्वक रहनेकी सुविधाएँ थीं

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন ধর্মরাজের আদেশে সহস্র সহস্র শিল্পী, স্বজনসহ আগত সেই ব্রাহ্মণদের জন্য পৃথক পৃথক আবাস নির্মাণ করল। সেই গৃহগুলি অন্ন ও বস্ত্রে সুসমৃদ্ধ ছিল এবং সর্ব ঋতুর উপযোগী আরাম-আয়েশে সজ্জিত ছিল, যাতে অতিথিরা স্বাচ্ছন্দ্য ও মর্যাদায় বাস করতে পারেন।

Verse 49

तेषु ते न्‍्यवसन्‌ राजन ब्राह्मणा नृपसत्कृता: | कथयन्त: कथा बद्दी: पश्यन्तो नटनर्तकान्‌,राजन! उन गृहोंमें वे ब्राह्मणलोग राजासे सत्कार पाकर निवास करने लगे। वहाँ वे नाना प्रकारकी कथाएँ कहते और नट-नर्तकोंके खेल देखते थे

হে রাজন, সেই গৃহগুলিতে রাজকীয় সম্মান লাভ করে ব্রাহ্মণরা বসবাস করতে লাগল। সেখানে তারা বিচিত্র নানা কাহিনি বলত এবং নট-নর্তকদের অভিনয়-নৃত্য দেখত।

Verse 50

भुज्जतां चैव विप्राणां वदतां च महास्वन: । अनिशं श्रूयते तत्र मुदितानां महात्मनाम्‌,वहाँ भोजन करते और बोलते हुए आनन्दमग्न महात्मा ब्राह्मणोंका निरन्तर महान्‌ कोलाहल सुनायी पड़ता था

সেখানে আহার করতে করতে ও কথাবার্তা বলতে বলতে আনন্দিত মহাত্মা ব্রাহ্মণদের অবিরাম উচ্চ কোলাহল শোনা যেত।

Verse 51

दीयतां दीयतामेषां भुज्यतां भुज्यतामिति । एवम्प्रकारा: संजल्पा: श्रूयन्ते स्मात्र नित्यश:,“इनको दीजिये, इन्हें परोसिये, भोजन कीजिये, भोजन कीजिये” इसी प्रकारके शब्द वहाँ प्रतिदिन कानोंमें पड़ते थे

“এদের দাও, দাও; পরিবেশন করো, করো; খাও, খাও”—এইরূপ ডাকডাকানি ও কথাবার্তা সেখানে প্রতিদিনই অবিরাম শোনা যেত।

Verse 52

गवां शतसहस्राणि शयनानां च भारत । रुक्मस्य योषितां चैव धर्मराज: पृथग्‌ ददौ,भारत! धर्मराज युधिष्ठिरने एक लाख गौएँ, उतनी ही शब्याएँ, एक लाख स्वर्णमुद्राएँ तथा उतनी ही अविवाहित युवतियाँ पृथक्‌-पृथक्‌ ब्राह्मणोंको दान की

হে ভারত! ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির পৃথক্ পৃথক্ দানে লক্ষ লক্ষ গাভী, তদ্রূপ শয্যা, স্বর্ণ এবং কন্যা প্রদান করলেন।

Verse 53

प्रावर्ततैवं यज्ञ: स पाण्डवस्य महात्मन: । पृथिव्यामेकवीरस्य शक्रस्येव त्रिविष्टपे,इस प्रकार स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति भूमण्डलमें अद्वितीय वीर महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका वह यज्ञ प्रारम्भ हुआ

এইভাবে পৃথিবীতে অদ্বিতীয় বীর মহাত্মা পাণ্ডব যুধিষ্ঠিরের যজ্ঞ আরম্ভ হল—যেমন ত্রিবিষ্টপে শক্রের (ইন্দ্রের)।

Verse 54

ततो युधिष्छिरो राजा प्रेषयामास पाण्डवम्‌ | नकुलं हास्तिनपुरं भीष्माय पुरुषर्षभ:,तदनन्तर पुरुषोतम राजा युधिष्ठिरने भीष्म, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, विदुर, कृपाचार्य तथा दुर्योधन आदि सब भाइयों एवं अपनेमें अनुराग रखनेवाले अन्य जो लोग वहाँ रहते थे, उन सबको बुलानेके लिये पाण्डुपुत्र नकुलको हस्तिनापुर भेजा

তারপর পুরুষশ্রেষ্ঠ রাজা যুধিষ্ঠির ভীষ্মকে আহ্বান করতে পাণ্ডব নকুলকে হস্তিনাপুরে পাঠালেন।

Verse 55

द्रोणाय धृतराष्ट्राय विदुराय कृपाय च । भ्रातृणां चैव सर्वेषां येडनुरक्ता युधिष्ठिरे,तदनन्तर पुरुषोतम राजा युधिष्ठिरने भीष्म, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, विदुर, कृपाचार्य तथा दुर्योधन आदि सब भाइयों एवं अपनेमें अनुराग रखनेवाले अन्य जो लोग वहाँ रहते थे, उन सबको बुलानेके लिये पाण्डुपुत्र नकुलको हस्तिनापुर भेजा

(বার্তা গেল) দ্রোণ, ধৃতরাষ্ট্র, বিদুর ও কৃপের কাছে; আর যুধিষ্ঠিরে অনুরক্ত সকল ভ্রাতাদের কাছেও।

Verse 463

सर्वविद्यासु निष्णाता वेदवेदाड़पारगा: । तत्पश्चात्‌ वहाँ भिन्न-भिन्न देशोंसे ब्राह्यगलोग आये, जो सम्पूर्ण विद्याओंमें निष्पात तथा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान्‌ थे

তারপর নানা দেশ থেকে ব্রাহ্মণেরা সেখানে এলেন—যাঁরা সর্ববিদ্যায় নিপুণ এবং বেদ ও বেদাঙ্গে পারদর্শী ছিলেন।

Frequently Asked Questions

The tension lies in selecting a single recipient of highest honor in a multi-king assembly: a procedural decision about precedence must balance ritual correctness, political stability, and perceived fairness among rival elites.

Public authority depends on transparent criteria and proper protocol; honoring the most worthy is not mere ceremony but a governance act that signals norms, consolidates consensus, and reduces arbitrariness in statecraft.

No explicit phalaśruti is presented here; the chapter functions as narrative-ethical framing, showing how ritual procedure and speech in assembly can generate downstream conflict within the epic’s broader dharma inquiry.