Adhyaya 31
Sabha ParvaAdhyaya 3184 Versesपाण्डव-पक्ष के लिए निर्णायक रूप से अनुकूल—दक्षिण में क्रमिक अधीनता और कर-स्वीकृति

Adhyaya 31

Adhyāya 31: Rājasūya-samāgama — The Gathering of Kings and the Ordering of Hospitality

Upa-parva: Rājasūya-ārambha (Preparation and Convocation for the Rājasūya)

Vaiśaṃpāyana reports that Nakula arrives at Hāstinapura and formally addresses Bhīṣma and Dhṛtarāṣṭra, initiating Kuru participation in Dharmarāja Yudhiṣṭhira’s Rājasūya. Hearing of the sacrifice, Brahmin ritualists and multiple rulers proceed with favorable intent, motivated by the prospect of witnessing the sabhā and the consecration. A wide catalogue of attending figures and regions is provided—Kuru elders and allies, prominent warriors, and rulers from diverse janapadas—many arriving with varied and substantial tribute (ratna). Under Yudhiṣṭhira’s directive, accommodations are assigned: multi-courtyard residences landscaped with ponds and trees, enclosed by high white ramparts, ornamented with gold latticework and jeweled flooring, furnished with thrones and easy stairways, and scented with fine aromatics and garlands. After resting, the assembled kings behold Yudhiṣṭhira surrounded by counselors; the सभा appears radiant, crowded with rulers and great-souled Brahmins, likened to a celestial assembly in its ordered brilliance.

Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को सुनाते हैं कि धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा पूजित सहदेव महती सेना के साथ दक्षिण-दिग्विजय के लिए प्रस्थान करता है—राजसूय की छाया उसके रथ के आगे-आगे चलती है। → दक्षिण की भूमि में सहदेव क्रमशः शूरसेन, मत्स्य आदि जनपदों को वश में करता है; फिर महाबली दन्तवक्र जैसे अधिराजाधिप से भी भिड़कर उसे करद बनाता है। मार्ग में चर्मण्वती तट पर वह एक ऐसे नृप का दृश्य देखता है जिसे वासुदेव ने पूर्व वैर के कारण पहले ही ‘शेष’ कर दिया था—यह संकेत देता है कि राजनीति के पीछे देव-इच्छा और पुरानी शत्रुताएँ भी चलती हैं। → जनमेजय का प्रश्न उठता है—यज्ञार्थ प्रयत्नशील सहदेव के युद्ध में ‘भगवान् वद्ठि/अग्नि’ प्रत्यमित्र क्यों बने? इसी जिज्ञासा के उत्तर-प्रसंग में सहदेव को सान्त्वपूर्वक उठने और अपने तथा धर्मसुत के अभिप्राय को स्पष्ट करने वाला उपदेश/संवाद आता है; वहीं सहदेव का पराक्रम चरम पर दिखता है जब वह पौरवेश्वर को बलपूर्वक पकड़ लेता है और कौशिकाचार्य (विश्वामित्र-वंश/कौशिक) की उपस्थिति/प्रयत्न का उल्लेख होता है। → विजयी माद्रीसुत सहदेव दक्षिण दिशा में आगे बढ़ता है—नील आदि राजाओं से पूजा/उपहार स्वीकार कर कर-स्थापन करता है; शूर्पारक, तालाकट, दण्डकारण्य तथा निषाद, पुरुषाद, कर्णप्रावरण जैसे दुर्गम जनों को भी अधीन कर लेता है। अंत में रत्न, चन्दन, अगुरु, दिव्य आभूषण, बहुमूल्य वस्त्र और मणियों सहित अपार संपदा राजसूय हेतु संचित होती है। → दक्षिण की विजय-यात्रा अभी जारी है—अगले चरण में और किन-किन सीमांत राजाओं की परीक्षा होगी, और यज्ञ के मार्ग में कौन-सा अदृश्य विरोध फिर उठेगा?

Shlokas

Verse 1

असनआा न (0) अऔजअान+- एकत्रिशो< ध्याय: सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय वैशम्पायन उवाच तथैव सहदेवो<पि धर्मराजेन पूजित: । महत्या सेनया राजन्‌ प्रययौ दक्षिणां दिशम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! सहदेव भी धर्मराज युधिष्ठिरसे सम्मानित हो दक्षिण दिशापर विजय पानेके लिये विशाल सेनाके साथ प्रस्थित हुए

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন! ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের দ্বারা সম্মানিত সহদেবও দক্ষিণ দিক জয়ের উদ্দেশ্যে মহাসেনা সহ যাত্রা করল।

Verse 2

स शूरसेनान्‌ कार्त्स्न्येन पूर्वमेवाजयत्‌ प्रभु: । मत्स्यराजं च कौरव्यो वशे चक्रे बलादू बली,शक्तिशाली सहदेवने सबसे पहले समस्त शूरसेननिवासियोंको पूर्णरूपसे जीत लिया; फिर मत्स्यराज विराटको अपने अधीन बनाया

পরাক্রমী প্রভু সহদেব প্রথমেই সম্পূর্ণভাবে শূরসেনদের পরাভূত করলেন; তারপর বলবান কৌরব বীর বলপ্রয়োগে মৎস্যরাজ বিরাটকে বশে আনলেন।

Verse 3

अधिराजाधिपं चैव दन्तवक्रं महाबलम्‌ | जिगाय करदं चैव कृत्वा राज्ये न्यवेशयत्‌,राजाओंके अधिपति महाबली दन्तवक्रको भी परास्त किया और उसे कर देनेवाला बनाकर फिर उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया

তিনি রাজাদের অধিপতি মহাবলী দন্তবক্রকেও পরাজিত করলেন; এবং তাকে করদ (খাজনা-দাতা) করে তার নিজ রাজ্যেই পুনঃপ্রতিষ্ঠিত করলেন।

Verse 4

सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम्‌ । तथैवापरमत्स्यांश्ष व्यजयत्‌ स पटच्चरान्‌,इसके बाद राजा सुकुमार तथा सुमित्रको वशमें किया। इसी प्रकार अपर मत्स्यों और लुटेरोंपर भी विजय प्राप्त की। तदनन्तर निषाददेश तथा पर्वतप्रवर गोशृंगको जीतकर बुद्धिमान्‌ सहदेवने राजा श्रेणिमान्‌को वेगपूर्वक परास्त किया

তারপর তিনি রাজা সুকুমারকে বশে আনলেন এবং নরাধিপ সুমিত্রকেও; একইভাবে অবশিষ্ট মৎস্য-প্রধানদের ও লুণ্ঠনকারী দস্যুদলকে পরাভূত করলেন।

Verse 5

निषादभूमिं गोशूडूं पर्वतप्रवरं तथा । तरसैवाजयद्‌ू धीमान्‌ श्रेणिमन्तं च पार्थिवम्‌,इसके बाद राजा सुकुमार तथा सुमित्रको वशमें किया। इसी प्रकार अपर मत्स्यों और लुटेरोंपर भी विजय प्राप्त की। तदनन्तर निषाददेश तथा पर्वतप्रवर गोशृंगको जीतकर बुद्धिमान्‌ सहदेवने राजा श्रेणिमान्‌को वेगपूर्वक परास्त किया

এরপর বুদ্ধিমান সহদেব দ্রুতই নিষাদভূমি, গোশূডূ নামে পরিচিত অঞ্চল এবং শ্রেষ্ঠ পর্বতাঞ্চল জয় করলেন; আর ত্বরিত গতিতে রাজা শ্রেণিমানকেও পরাভূত করলেন।

Verse 6

नरराष्ट्रं च निर्जित्य कुन्तिभोजमुपाद्रवत्‌ । प्रीतिपूर्व च तस्यासौ प्रतिजग्राह शासनम्‌,फिर नरराष्ट्रको जीतकर राजा कुन्तिभोजपर धावा किया। परंतु कुन्तिभोजने प्रसन्नताके साथ ही उसका शासन स्वीकार कर लिया

নরদের রাষ্ট্র জয় করে সে রাজা কুন্তিভোজের দিকে অগ্রসর হল; কিন্তু কুন্তিভোজ সন্তোষ ও সদ্ভাবে তার অধিপত্য স্বীকার করে নিলেন।

Verse 7

ततश्चर्मण्वतीकूले जम्भकस्यात्मजं नृपम्‌ | ददर्श वासुदेवेन शेषितं पूर्ववैरिणा,इसके बाद चर्मण्वतीके तटपर सहदेवने जम्भकके पुत्रको देखा, जिसे पूर्ववैरी वासुदेवने जीवित छोड़ दिया था

তারপর চর্মণ্বতীর তীরে সহদেব জাম্ভকের পুত্র সেই রাজাকে দেখলেন, যাকে পূর্বশত্রু বাসুদেব একদা জীবিত রেখে দিয়েছিলেন।

Verse 8

चक्रे तेन स संग्रामं सहदेवेन भारत । स तमाजोौ विनिर्जित्य दक्षिणाभिमुखो ययौ,भारत! उस जम्भकपुत्रने सहदेवके साथ घोर संग्राम किया; परंतु सहदेव उसे युद्धमें जीतकर दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ गये

হে ভারত! সেই জাম্ভকপুত্র সহদেবের সঙ্গে যুদ্ধ করল; সহদেব তাকে রণে পরাজিত করে দক্ষিণাভিমুখে অগ্রসর হলেন।

Verse 9

सेकानपरसेकांश्व व्यजयत्‌ सुमहाबल: । करं तेभ्य उपादाय रत्नानि विविधानि च

অতিমহাবলী জন সেবক ও অসেবক—উভয়কেই সন্তুষ্ট করলেন; তাদের হাত ধরে সম্মান জানিয়ে নানা প্রকার রত্ন দান করলেন।

Verse 10

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्येन महता55वृतौ । जिगाय समरे वीरावदश्चिनेय: प्रतापवान्‌,अश्विनीकुमारोंके पुत्र प्रतापी सहदेवने वहाँ युद्धमें विशाल सेनासे घिरे हुए अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्दको परास्त किया

অবন্তীর বীর রাজপুত্র বিন্দ ও অনুবিন্দ, যারা বিশাল সেনায় পরিবেষ্টিত ছিল—তাদের প্রতাপশালী দক্ষিণেয় (সহদেব) যুদ্ধে পরাজিত করলেন।

Verse 11

ततो रत्नान्युपादाय पुरं भोजकटं ययौ । तत्र युद्धमभूद्‌ राजन्‌ दिवसद्वयमच्युत,वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर वे भोजकट नगरमें गये। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले राजन! वहाँ दो दिनोंतक युद्ध होता रहा

তারপর তিনি রত্নরাজি উপহার-কররূপে গ্রহণ করে ভোজকট নগরে গেলেন। হে রাজন, যিনি ধর্মমর্যাদা থেকে কখনও বিচ্যুত হন না—সেখানে দুই দিনব্যাপী যুদ্ধ সংঘটিত হল।

Verse 12

स विजित्य दुराधर्ष भीष्मकं माद्रिनन्दन: । कोसलाधिपतिं चैव तथा वेणातटाधिपम्‌,माद्रीनन्दनने उस संग्राममें दुर्ध्ष वीर भीष्मकको परास्त करके कोसलाधिपति, वेणानदीके तटवर्ती प्रदेशोंके स्वामी, कान्तारक तथा पूर्वकोसलके राजाओंको भी समरमें पराजित किया। तत्पश्चात्‌ नाटकेयों और हेरम्बकोंको भी युद्धमें हराया

মাদ্রীনন্দন সেই যুদ্ধে দুর্ধর্ষ বীর ভীষ্মককে জয় করে কোশলের অধিপতিকেও এবং বেণা নদীর তটবর্তী অঞ্চলের শাসককেও পরাভূত করলেন।

Verse 13

कान्तारकांश्व समरे तथा प्राक्कोसलान्‌ नृपान्‌ | नाटकेयांश्व॒ समरे तथा हेरम्बकान्‌ युधि,माद्रीनन्दनने उस संग्राममें दुर्ध्ष वीर भीष्मकको परास्त करके कोसलाधिपति, वेणानदीके तटवर्ती प्रदेशोंके स्वामी, कान्तारक तथा पूर्वकोसलके राजाओंको भी समरमें पराजित किया। तत्पश्चात्‌ नाटकेयों और हेरम्बकोंको भी युद्धमें हराया

তিনি সমরে কান্তারক ও প্রাক্কোশলের রাজাদেরও, আর যুদ্ধক্ষেত্রে নাটকেয় ও হেরম্বকগণকেও পরাভূত করলেন।

Verse 14

मारुधं च विनिर्जित्य रम्यग्राममथो बलात्‌ | नाचीनानर्बुकांश्वैव राज्ञश्नेव महाबल:,महाबली पाण्डुनन्दन सहदेवने मारुध तथा रम्यग्रामको बलपूर्वक परास्त करके नाचीन, अर्बुक तथा समस्त वनेचर राजाओंको जीत लिया। तदनन्तर महाबली माद्रीकुमारने राजा वाताधिपको वशमें किया

মহাবলী তিনি মারুধকে জয় করে, পরে বলপূর্বক রম্যগ্রামকে পরাভূত করলেন; এবং নাচীন ও অর্বুকদের রাজাদেরও বশে আনলেন।

Verse 15

तांस्तानाटविकान्‌ सर्वानजयत्‌ पाण्डुनन्दन: । वाताधिपं च नृपतिं वशे चक्रे महाबल:,महाबली पाण्डुनन्दन सहदेवने मारुध तथा रम्यग्रामको बलपूर्वक परास्त करके नाचीन, अर्बुक तथा समस्त वनेचर राजाओंको जीत लिया। तदनन्तर महाबली माद्रीकुमारने राजा वाताधिपको वशमें किया

পাণ্ডুনন্দন সেই সকল আাটবিক রাজাকে জয় করলেন; আর মহাবলী বায়ুবিষয়ক অধিপতি (বাতাধিপ) নৃপতিকেও বশে আনলেন।

Verse 16

पुलिन्दांश्व॒ रणे जित्वा ययौ दक्षिणत: पुर: । युयुधे पाण्ड्यराजेन दिवसं नकुलानुज:,फिर पुलिन्दोंको संग्राममें हहकर नकुलके छोटे भाई सहदेव दक्षिण दिशामें और आगे बढ़ गये। तत्पश्चात्‌ उन्होंने पाण्ड्य-नरेशके साथ एक दिन युद्ध किया

পুলিন্দদের রণে পরাজিত করে নকুলের অনুজ সহদেব দক্ষিণদিকে আরও অগ্রসর হলেন। তারপর তিনি পাণ্ড্যরাজের সঙ্গে এক দিনব্যাপী যুদ্ধ করলেন।

Verse 17

तं जित्वा स महाबाहु: प्रययौ दक्षिणापथम्‌ | गुहामासादयामास किष्किन्धां लोकविश्रुताम्‌,उन्हें जीतकर महाबाहु सहदेव दक्षिणापथकी ओर गये और लोकविख्यात किष्किन्धा नामक गुफामें जा पहुँचे

তাদের জয় করে মহাবাহু সহদেব দক্ষিণাপথে অগ্রসর হলেন এবং লোকবিখ্যাত কিষ্কিন্ধা নামক গুহায় পৌঁছালেন।

Verse 18

तत्र वानरराजाभ्यां मैन्देन द्विविदेन च । युयुधे दिवसान्‌ सप्त न च तौ विकृतिं गतौ,वहाँ वानरराज मैन्द और द्विविदके साथ उन्होंने सात दिनोंतक युद्ध किया; किंतु उन दोनोंका कुछ बिगाड़ न हो सका

সেখানে তিনি বানররাজ মৈন্দ ও দ্বিবিদের সঙ্গে সাত দিন যুদ্ধ করলেন; কিন্তু তাদের দুজনেরই কোনো ক্ষতি বা বিকার ঘটল না।

Verse 19

ततस्तुष्टौी महात्मानौ सहदेवाय वानरौ । ऊचतुश्चैव संह्ृष्टौ प्रीतिपूर्वमिदं वच:,तब वे दोनों महात्मा वानर अत्यन्त प्रसन्न हो सहदेवसे प्रेमपूर्वक बोले--

তখন সেই দুই মহাত্মা বানর সহদেবের প্রতি অত্যন্ত সন্তুষ্ট হয়ে আনন্দসহকারে স্নেহভরে এই কথা বলল।

Verse 20

गच्छ पाण्डवशार्दूल रत्नान्यादाय सर्वश: । अविध्नमस्तु कार्याय धर्मराजाय धीमते,'पाण्डवप्रवर! तुम सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर जाओ। परम बुद्धिमान्‌ धर्मराजके कार्यमें कोई विघ्न नहीं पड़ना चाहिये"

হে পাণ্ডবশার্দূল! সর্বপ্রকার রত্ন সঙ্গে নিয়ে যাও। পরম বুদ্ধিমান ধর্মরাজের কার্যে কোনো বিঘ্ন না ঘটুক।

Verse 21

ततो रत्नान्युपादाय पुरी माहिष्मतीं ययौ । तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्ध नरर्षभ:,तदनन्तर वे नरश्रेष्ठ वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर माहिष्मतीपुरीको गये और वहाँ राजा नीलके- साथ घोर युद्ध किया

তারপর নরশ্রেষ্ঠ সহদেব কররূপে রত্নসমূহ গ্রহণ করে মাহিষ্মতী নগরীতে গেলেন। সেখানে তিনি রাজা নীলের সঙ্গে ভয়ংকর যুদ্ধ করলেন।

Verse 22

पाण्डव: परवीरघ्न: सहदेव: प्रतापवान्‌ | ततो<स्य सुमहद्‌ युद्धमासीद्‌ भीरुभयंकरम्‌,शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले पाण्डुपुत्र सहदेव बड़े प्रतापी थे। उनसे राजा नीलका जो महान्‌ युद्ध हुआ, वह कायरोंको भयभीत करनेवाला, सेनाओंका विनाशक और प्राणोंको संशयमें डालनेवाला था। भगवान्‌ अग्निदेव राजा नीलकी सहायता कर रहे थे

পাণ্ডব সহদেব ছিলেন মহাপরাক্রমশালী এবং শত্রুবীর-সংহারক। তারপর তাঁর জন্য এক মহাযুদ্ধ উপস্থিত হল—যা ভীরুদের হৃদয়ে আতঙ্ক জাগায়।

Verse 23

सैन्यक्षयकरं चैव प्राणानां संशयावहम्‌ । चक्रे तस्य हि साहाय्यं भगवान्‌ हव्यवाहन:,शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले पाण्डुपुत्र सहदेव बड़े प्रतापी थे। उनसे राजा नीलका जो महान्‌ युद्ध हुआ, वह कायरोंको भयभीत करनेवाला, सेनाओंका विनाशक और प्राणोंको संशयमें डालनेवाला था। भगवान्‌ अग्निदेव राजा नीलकी सहायता कर रहे थे

সেই যুদ্ধ ছিল সেনানাশকারী এবং প্রাণকে সংশয়ে নিক্ষেপকারী। সেই সংঘর্ষে ভগবান হব্যবাহন (অগ্নিদেব) রাজা নীলকে সহায়তা করেছিলেন।

Verse 24

ततो रथा हया नागा: पुरुषा: कवचानि च । प्रदीप्तानि व्यदृश्यन्त सहदेवबले तदा,उस समय सहदेवकी सेनामें रथ, घोड़े, हाथी, मनुष्य और कवच सभी आगसे जलते दिखायी देने लगे

তখন সহদেবের সেনাবাহিনীতে রথ, অশ্ব, গজ, সৈনিক এবং বর্ম—সবই অগ্নিতে প্রজ্বলিত হয়ে দৃশ্যমান হল।

Verse 25

ततः सुसम्भ्रान्तमना बभूव कुरुनन्दन: । नोत्तरं प्रतिवक्तुं च शक्तो5भूज्जनमेजय,जनमेजय! इससे कुरुनन्दन सहदेवके मनमें बड़ी घबराहट हुई। वे इसका प्रतीकार करनेमें असमर्थ हो गये

হে জনমেজয়! তখন কুরু-নন্দন সহদেবের মন অত্যন্ত ব্যাকুল হয়ে উঠল। তিনি কোনো উত্তর বা প্রতিকার করতে সক্ষম হলেন না।

Verse 26

जनमेजय उवाच किमर्थ भगवान्‌ वद्ठिः प्रत्यमित्रो5$भवद्‌ युधि | सहदेवस्य यज्ञार्थ घटमानस्य वै द्विज,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन्‌! सहदेव तो यज्ञके लिये ही चेष्टा कर रहे थे, फिर भगवान्‌ अग्निदेव उस युद्धमें उनके विरोधी कैसे हो गये?

জনমেজয় বললেন—হে ব্রাহ্মণ! সহদেব তো কেবল যজ্ঞের উদ্দেশ্যেই চেষ্টা করছিলেন; তবে কেন এবং কী কারণে ভগবান অগ্নিদেব সেই যুদ্ধে তাঁর প্রতিপক্ষ হয়ে উঠলেন?

Verse 27

वैशम्पायन उवाच तत्र माहिष्मतीवासी भगवान्‌ हव्यवाहन: । श्रूयते हि गृहीतो वै पुरस्तात्‌ पारदारिक:,वैशम्पायनजीने कहा--जनमेजय! सुननेमें आया है कि माहिष्मती नगरीमें निवास करनेवाले भगवान्‌ अग्निदेव किसी समय उस नील राजाकी कन्या सुदर्शनाके प्रति आसक्त हो गये

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! শোনা যায়, মাহিষ্মতীতে নিবাসকারী ভগবান হব্যবাহন (অগ্নিদেব) পূর্বকালে একসময় পরস্ত্রী-আসক্তিতে আবদ্ধ হয়েছিলেন।

Verse 28

नीलस्य राज्ञो दुहिता बभूवातीवशोभना । सानम्निहोत्रमुपातिष्ठद्‌ बोधनाय पितु: सदा,राजा नीलके एक कन्या थी, जो अनुपम सुन्दरी थी। वह सदा अपने पिताके अन्निहोत्रगृहमें अग्निको प्रजवयलित करनेके लिये उपस्थित हुआ करती थी

রাজা নীলের এক কন্যা ছিল, অপরূপা সুন্দরী। সে সর্বদা পিতার অগ্নিহোত্রে উপস্থিত থেকে অগ্নির পরিচর্যা করত এবং তাকে প্রজ্বলিত রাখত।

Verse 29

व्यजनैर्धूयमानो5पि तावत्‌ प्रज्वलते न सः । यावच्चारुपुटौछेन वायुना न विधूयते,पंखेसे हवा करनेपर भी अग्निदेव तबतक प्रज्वलित नहीं होते थे, जबतक कि वह सुन्दरी अपने मनोहर ओषछ्ठसम्पुटसे फूँक मारकर हवा न देती थी

পাখা দিয়ে বাতাস করলেও আগুন ততক্ষণ জ্বলে উঠত না, যতক্ষণ না সেই সুন্দরী তার মনোহর ওষ্ঠযুগল জোড়া করে ফুঁ দিয়ে বাতাস দিত।

Verse 30

ततः स भगवानन्निश्चकमे तां सुदर्शनाम्‌ । नीलस्य राज्ञ: सर्वेषामुपनीतश्चव॒ सो5भवत्‌,तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ अग्नि उस सुदर्शना नामकी राजकन्याको चाहने लगे। इस बातको राजा नील और सभी नागरिक जान गये

তারপর ভগবান অগ্নিদেব সुदর্শনা নামের সেই রাজকন্যার প্রতি আসক্ত হলেন। এ কথা রাজা নীল ও সকল প্রজার কাছেও প্রকাশ হয়ে গেল।

Verse 31

ततो ब्राह्मणरूपेण रममाणो यदृच्छया । चकमे तां वरारोहां कन्यामुत्पललोचनाम्‌ । तं॑ तु राजा यथाशास्त्रमशासदू धार्मिकस्तदा,तदनन्तर एक दिन ब्राह्मणका रूप धारण करके इच्छानुसार घूमते हुए अग्निदेव उस सर्वांगसुन्दरी कमल-नयनी कन्याके पास आये और उसके प्रति कामभाव प्रकट करने लगे। धर्मात्मा राजा नीलने शास्त्रके अनुसार उस ब्राह्मणपर शासन किया इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि सहदेवदक्षिणदिग्विजये एकत्रिंशो5ध्याय:

তখন ব্রাহ্মণের রূপ ধারণ করে ইচ্ছামতো বিচরণ করতে করতে হব্যবাহন অগ্নিদেব পদ্মনয়না, সুললিত অঙ্গ-সৌন্দর্যযুক্ত সেই কন্যার প্রতি আসক্ত হলেন এবং তার প্রতি কামভাব প্রকাশ করতে লাগলেন। তখন ধর্মপরায়ণ রাজা নীল শাস্ত্রবিধি অনুসারে সেই ব্রাহ্মণকে শাসন করে সমাজ-মর্যাদা রক্ষা করলেন।

Verse 32

प्रजज्वाल तत: कोपाद्‌ भगवान्‌ हव्यवाहन: । त॑ दृष्टवा विस्मितो राजा जगाम शिरसावनिम्‌,तब क्रोधसे भगवान्‌ अग्निदेव अपने रूपमें प्रज्वलित हो उठे। उन्हें इस रूपमें देखकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने पृथ्वीपर मस्तक रखकर अग्निदेवको प्रणाम किया

তারপর ক্রোধে ভগবান হব্যবাহন অগ্নিদেব দগ্ধ জ্যোতিতে প্রজ্বলিত হয়ে উঠলেন। তাঁর সেই ভয়ংকর দীপ্তি দেখে রাজা বিস্মিত হয়ে মস্তক ভূমিতে রেখে প্রণাম করলেন।

Verse 33

ततः कालेन तां कन्‍्यां तथैव हि तदा नृपः । प्रददौ विप्ररूपाय वह्लये शिरसा नत:,तत्पश्चात्‌ विवाहके योग्य समय आनेपर राजाने उस कन्याको ब्राह्मणरूपधारी अग्निदेवकी सेवामें अर्पित कर दिया और उनके चरणोंमें सिर रखकर नमस्कार किया। राजा नीलकी सुन्दरी कन्याको पत्नीरूपमें ग्रहण करके भगवान्‌ अग्निने राजापर अपना कृपाप्रसाद प्रकट किया

এরপর যথোচিত সময় এলে রাজা পূর্বনির্ধারিত নিয়মে সেই কন্যাকে ব্রাহ্মণরূপধারী বহ্নি (অগ্নিদেব)-এর সঙ্গে বিবাহে অর্পণ করলেন এবং মস্তক নত করে প্রণাম জানালেন।

Verse 34

प्रतिगृह्म च तां सुभ्रूं नीलराज्ञ: सुतां तदा । चक्रे प्रसादं भगवांस्तस्य राज्ञो विभावसु:,तत्पश्चात्‌ विवाहके योग्य समय आनेपर राजाने उस कन्याको ब्राह्मणरूपधारी अग्निदेवकी सेवामें अर्पित कर दिया और उनके चरणोंमें सिर रखकर नमस्कार किया। राजा नीलकी सुन्दरी कन्याको पत्नीरूपमें ग्रहण करके भगवान्‌ अग्निने राजापर अपना कृपाप्रसाद प्रकट किया

তখন নীলরাজার সুভ্রূ কন্যাকে গ্রহণ করে ভগবান বিভাবসু (অগ্নিদেব) সেই রাজার প্রতি প্রসন্ন হয়ে অনুগ্রহ বর্ষণ করলেন।

Verse 35

वरेणच्छन्दयामास त॑ नृपं स्विष्टकृत्तम: । अभयं च स जग्राह स्वसैन्ये वै महीपति:,वे उनकी अभीष्ट-सिद्धिमें सर्वोत्तम सहायक हो राजासे वर माँगनेका अनुरोध करने लगे। राजाने अपनी सेनाके प्रति अभयदान माँगा

তখন স্বিষ্টকৃত্‌শ্রেষ্ঠ (অগ্নিদেব) সেই নৃপতিকে বর বেছে নিতে বললেন। তখন মহীপতি রাজা নিজের সেনাবাহিনীর জন্য অভয়দান প্রার্থনা করলেন।

Verse 36

ततः प्रभृति ये केचिदज्ञानात्‌ तां पुरी नृपा: । जिगीषन्ति बलाद राजंस्ते दहान्ते सम वह्निना,राजन! तभीसे जो कोई नरेश अज्ञानवश उस पुरीको बलपूर्वक जीतना चाहते, उन्हें अग्निदेव जला देते थे

তখন থেকে, রাজন, যে-সব রাজা অজ্ঞতাবশত সেই নগরীকে বলপ্রয়োগে জয় করতে চেয়েছিল, তারা সেই একই অগ্নিতে দগ্ধ হয়েছিল।

Verse 37

तस्यां पुर्या तदा चैव माहिष्मत्यां कुरूद्वह । बभूवुरनतिग्राह्मा योषितश्छन्दत: किल,कुरुश्रेष्ठ जनममेजय! उस समय माहिष्मतीपुरीमें युवती स्त्रियाँ इच्छानुसार ग्रहण करनेके योग्य नहीं रह गयी थीं (क्योंकि वे स्वतन्त्रतासे ही वरका वरण किया करती थीं)

কুরুশ্রেষ্ঠ! তখন মাহিষ্মতী নগরীতে যুবতী নারীরা যেন সহজে ‘গ্রহণযোগ্য’ ছিল না; কারণ তারা নিজেদের ইচ্ছামতোই স্বয়ং বর বেছে নিত।

Verse 38

एवमनिनिवररं प्रादात्‌ स्त्रीणामप्रतिवारणे । वरिण्यस्तत्र नार्यो हि यथेष्टं विचरन्त्युत,अग्निदेवने स्त्रियोंके लिये यह वर दे दिया था कि अपने प्रतिकूल होनेके कारण ही कोई स्त्रियोंको वरका स्वयं ही वरण करनेसे रोक नहीं सकता। इससे वहाँकी स्त्रियाँ स्वेच्छापूर्वक वरका वरण करनेके लिये विचरण किया करती थीं

এইভাবে (অগ্নিদেব) নারীদের এমন এক অবাধ বর দিলেন যে কেউ তাদের বাধা দিতে পারে না। তাই সেখানকার নারীরা ইচ্ছামতো বিচরণ করত এবং নিজেরাই বর বেছে নিত।

Verse 39

वर्जयन्ति च राजानस्तत्‌ पुरं भरतर्षभ | भयादमग्नेर्महाराज तदाप्रभृति सर्वदा,भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तभीसे सब राजा (जो इस रहस्यसे परिचित थे) अग्निके भयके कारण माहिष्मती-पुरीपर चढ़ाई नहीं करते थे

ভরতশ্রেষ্ঠ! মহারাজ, তখন থেকে অগ্নির ভয়ে রাজারা সর্বদা সেই নগরী এড়িয়ে চলেছে।

Verse 40

सहदेवस्तु धर्मात्मा सैन्यं दृष्टवा भयार्दितम्‌ | परीतमग्निना राजन्‌ नाकम्पत यथाचल: । उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा सो5ब्रवीत्‌ पावकं तत:,राजन! धर्मात्मा सहदेव अग्निसे व्याप्त हुई अपनी सेनाको भयसे पीड़ित देख पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे, भयसे कम्पित नहीं हुए। उन्होंने आचमन करके पवित्र हो अग्निदेवसे इस प्रकार कहा

রাজন! ধর্মাত্মা সহদেব তাঁর সেনাকে ভয়ে কাতর ও অগ্নিবেষ্টিত দেখে-ও পর্বতের মতো অচল রইলেন, কাঁপলেন না। তারপর আচমন করে শুচি হয়ে তিনি পাৱককে এইভাবে বললেন।

Verse 41

सहदेव उवाच त्वदर्थो5्यं समारम्भ: कृष्णवर्त्मन्‌ नमोस्तु ते । मुखं त्वमसि देवानां यज्ञस्त्वमसि पावक,सहदेव बोले--कृष्णवर्त्मन्‌! हमारा यह आयोजन तो आपहीके लिये है, आपको नमस्कार है। पावक! आप देवताओंके मुख हैं, यज्ञस्वरूप हैं

সহদেব বললেন— হে কৃষ্ণবর্ত্মন! এই আয়োজন কেবল আপনারই উদ্দেশ্যে; আপনাকে প্রণাম। হে পাবক! আপনি দেবতাদের মুখ, আপনি নিজেই যজ্ঞস্বরূপ।

Verse 42

पावनात्‌ पावकश्नासि वहनाद्धव्यवाहन: । वेदास्त्वदर्थ जाता वै जातवेदास्ततो हासि,आप सबको पवित्र करनेके कारण पावक हैं और हव्य (हवनीय पदार्थ)-को वहन करनेके कारण हव्यवाहन कहलाते हैं। वेद आपके लिये ही जात अर्थात्‌ प्रकट हुए हैं, इसीलिये आप जाततवेदा हैं

সকলকে পবিত্র করেন বলে আপনি ‘পাবক’, আর হব্য বহন করেন বলে ‘হব্যবাহন’। বেদ আপনারই উদ্দেশ্যে প্রকাশিত; তাই আপনি ‘জাতবেদস্’।

Verse 43

चित्रभानु: सुरेशश्व॒ अनलस्त्वं विभावसो । स्वर्गद्वारस्पृशश्चवासि हुताशो ज्वलनः शिखी,विभावसो! आप ही चित्रभानु, सुरेश और अनल कहलाते हैं। आप सदा स्वर्गद्वारका स्पर्श करते हैं। आप आहुति दिये हुए पदार्थोंको खाते हैं, इसलिये हुताशन हैं। प्रज्वलित होनेसे ज्वलन और शिखा (लपट) धारण करनेसे शिखी हैं

হে বিভাবসু! আপনিই চিত্রভানু, সুরেশ ও অনল নামে খ্যাত। আপনার শিখা সদা স্বর্গদ্বার স্পর্শ করে। আহুতি ভক্ষণ করেন বলে আপনি ‘হুতাশ’; দগ্ধ জ্যোতিতে জ্বলে ওঠেন বলে ‘জ্বলন’; আর শিখা-মুকুট ধারণ করেন বলে ‘শিখী’।

Verse 44

वैश्वानरस्त्वं पिड़ेश: प्लवज्रो भूरितेजस: । कुमारसूस्त्वं भगवान्‌ रुद्रगर्भो हिरण्यकृत्‌,आप ही वैश्वानर, पिंगेश, प्लवंग और भूरितेजस्‌ नाम धारण करते हैं। आपने ही कुमार कार्तिकेयको जन्म दिया है, आप ही एऐश्वर्यसम्पन्न होनेके कारण भगवान हैं। श्रीरुद्रका वीर्य धारण करनेसे आप रुद्रगर्भ कहलाते हैं। सुवर्णके उत्पादक होनेसे आपका नाम हिरण्यकृत्‌ है

আপনিই বৈশ্বানর, পিঙ্গেশ, প্লবঙ্গ ও ভুরিতেজস নামে খ্যাত। আপনিই কুমার (কার্ত্তিকেয়)-এর জনক; ঐশ্বর্যসম্পন্ন বলে আপনি ‘ভগবান’। রুদ্রের শক্তি ধারণ করায় আপনি ‘রুদ্রগর্ভ’, আর স্বর্ণ উৎপন্ন করায় ‘হিরণ্যকৃত্’।

Verse 45

अन्निर्ददातु मे तेजो वायु: प्राणं ददातु मे । पृथिवी बलमादध्याच्छिवं चापो दिशन्तु मे,आप अभ्नि मुझे तेज दें, वायुदेव प्राणशक्ति प्रदान करें, पृथ्वी मुझमें बलका आधान करें और जल मुझे कल्याण प्रदान करें

অগ্নি আমাকে তেজ দান করুন, বায়ু আমাকে প্রাণশক্তি দিন, পৃথিবী আমার মধ্যে বল স্থাপন করুক, আর জল আমাকে মঙ্গল দান করুক।

Verse 46

अपांगर्भ महासत्त्व जातवेद: सुरेश्वर । देवानां मुखमग्ने त्वं सत्येन विपुनीहि माम्‌,जलको प्रकट करनेवाले महान्‌ शक्तिसम्पन्न जातवेदा सुरेश्वर अग्निदेव! आप देवताओंके मुख हैं, अपने सत्यके प्रभावसे आप मुझे पवित्र कीजिये

সহদেব বললেন—হে অগ্নিদেব! আপনি মহাতেজস্বী জাতবেদা, দেবগণের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ঈশ্বর। আপনি দেবতাদের মুখস্বরূপ; আপনার সত্যের প্রভাবে আমাকে পবিত্র করুন।

Verse 47

ऋषिभिर्त्राह्णैश्वैव दैवतैरसुरैरपि । नित्यं सुहुत यज्ञेषु सत्येन विपुनीहि माम्‌,ऋषि, ब्राह्मण, देवता तथा असुर भी सदा यज्ञ करते समय आपमें आहुति डालते हैं, अपने सत्यके प्रभावसे आप मुझे पवित्र करें

সহদেব বললেন—ঋষি, ব্রাহ্মণ, দেবতা এবং অসুরেরাও যজ্ঞে সর্বদা আপনাকে উত্তম আহুতি প্রদান করে। আপনার সত্যের প্রভাবে আমাকে পবিত্র করুন।

Verse 48

धूमकेतु: शिखी च त्वं पापहानिलसम्भव: । सर्वप्राणिषु नित्यस्थ: सत्येन विपुनीहि माम्‌,देव! धूम आपका ध्वज है, आप शिखा धारण करनेवाले हैं, वायुसे आपका प्राकट्य हुआ है। आप समस्त पापोंके नाशक हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंक भीतर आप सदा विराजमान होते हैं। अपने सत्यके प्रभावसे आप मुझे पवित्र कीजिये

সহদেব প্রার্থনা করলেন—হে দেব! ধোঁয়াই আপনার ধ্বজ, আপনি শিখাধারী; বায়ু থেকে আপনার প্রকাশ, আপনি পাপবিনাশক। আপনি সকল প্রাণীর মধ্যে নিত্য বিরাজমান। আপনার সত্যের প্রভাবে আমাকে পবিত্র করুন।

Verse 49

एवं स्तुतो5सि भगवन्‌ प्रीतेन शुचिना मया । तुषिं पुष्टि श्रुतिं चैव प्रीतिं चाग्ने प्रयच्छ मे,भगवन! मैंने पवित्र होकर प्रेमभावसे आपका इस प्रकार स्तवन किया है। अग्निदेव! आप मुझे तुष्टि, पुष्टि, अवण-शक्ति एवं शास्त्रज्ञान और प्रीति प्रदान करें

হে ভগবান! শুদ্ধচিত্তে ও প্রেমভরে আমি এইভাবে আপনার স্তব করেছি। হে অগ্নে! আমাকে তৃপ্তি, পুষ্টি, শ্রুতি (বেদজ্ঞান/সৎশ্রবণের শক্তি) এবং প্রীতি দান করুন।

Verse 50

वैशम्पायन उवाच इत्येवं मन्त्रमाग्नेयं पठन्‌ यो जुहुयाद विभुम्‌ । ऋद्धिमान्‌ सततं दान्त: सर्वपापै: प्रमुच्यते,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! जो द्विज इस प्रकार इन श्लोकरूप आग्नेय मन्त्रोंका पाठ करते हुए (अन्तमें “स्वाहा” बोलकर) भगवान्‌ अग्निदेवको आहुति समर्पित करता है, वह सदा समृद्धिशाली और जितेन्द्रिय होकर सब पापोंसे मुक्त हो जाता है

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! যে দ্বিজ এইভাবে অগ্নিসম্বন্ধীয় মন্ত্র পাঠ করতে করতে শেষে ‘স্বাহা’ উচ্চারণ করে ভগবান অগ্নিদেবকে আহুতি প্রদান করে, সে সর্বদা সমৃদ্ধ ও ইন্দ্রিয়সংযমী হয়ে সকল পাপ থেকে মুক্ত হয়।

Verse 51

एवमुकक्‍त्वा तु माद्रेय: कुशैरास्तीर्य मेदिनीम्‌,भारत! ऐसा कहकर नरश्रेष्ठ माद्रीकुमार सहदेव धरतीपर कुश बिछाकर अपनी भयभीत और उद्विग्न सेनाके अग्रभागमें विधिपूर्वक अग्निके सम्मुख धरना देकर बैठ गये

এই কথা বলে মাদ্রীপুত্র সহদেব ভূমিতে কুশ বিছিয়ে, হে ভারতবংশধর, বিধিপূর্বক পবিত্র অগ্নির সম্মুখে উপবিষ্ট হলেন।

Verse 52

विधिवत पुरुषव्यात्र: पावकं प्रत्युपाविशत्‌ | प्रमुखे तस्य सैन्यस्य भीतोद्विग्नस्य भारत,भारत! ऐसा कहकर नरश्रेष्ठ माद्रीकुमार सहदेव धरतीपर कुश बिछाकर अपनी भयभीत और उद्विग्न सेनाके अग्रभागमें विधिपूर्वक अग्निके सम्मुख धरना देकर बैठ गये

হে ভারত! ভীত ও বিচলিত সেই সেনাবাহিনীর অগ্রভাগে পুরুষব্যাঘ্র সহদেব বিধিপূর্বক অগ্নির দিকে মুখ করে উপবিষ্ট হলেন।

Verse 53

न चैनमत्यगाद्‌ वदल्निवेलामिव महोदधि: । तमुपेत्य शनैर्वद्विरुवाच कुरुनन्दनम्‌,जैसे महासागर अपनी तटभूमिका उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार अग्निदेव सहदेवको लाँधकर उनकी सेनामें नहीं गये। वे कुरुकूलको आनन्दित करनेवाले नरदेव सहदेवके पास धीरे-धीरे आकर उन्हें सान्त्वना देते हुए यह वचन बोले--“कौरव्य! उठो, उठो, मैंने यह तुम्हारी परीक्षा की है। तुम्हारे और धर्मपुत्र युधिष्ठिरके सम्पूर्ण अभिप्रायको मैं जानता हूँ

যেমন মহাসাগর তটরেখা লঙ্ঘন করে না, তেমনি অগ্নিও তাকে অতিক্রম করে এগোল না। তারপর ধীরে ধীরে কাছে এসে কুরুনন্দন সহদেবকে বলল।

Verse 54

सहदेवं नृणां देवं सान्त्वपूर्वमिदं वच: । उत्तिष्ीत्तिष्ठ कौरव्य जिज्ञासेयं कृता मया । वेझि सर्वमभिप्रायं तव धर्मसुतस्य च,जैसे महासागर अपनी तटभूमिका उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार अग्निदेव सहदेवको लाँधकर उनकी सेनामें नहीं गये। वे कुरुकूलको आनन्दित करनेवाले नरदेव सहदेवके पास धीरे-धीरे आकर उन्हें सान्त्वना देते हुए यह वचन बोले--“कौरव्य! उठो, उठो, मैंने यह तुम्हारी परीक्षा की है। तुम्हारे और धर्मपुत्र युधिष्ठिरके सम्पूर्ण अभिप्रायको मैं जानता हूँ

নরশ্রেষ্ঠ সহদেবকে সান্ত্বনা দিয়ে সে বলল—“হে কৌরব্য, ওঠো, ওঠো। এই পরীক্ষা আমি করেছি। তোমার এবং ধর্মসুত যুধিষ্ঠিরের সমস্ত অভিপ্রায় আমি জানি।”

Verse 55

मया तु रक्षितव्येयं पुरी भरतसत्तम । यावद्‌ राज्ञो हि नीलस्य कुले वंशधरा इति,'परंतु भरतसत्तम! राजा नीलके कुलमें जबतक उनकी वंशपरम्परा चलती रहेगी, तबतक मुझे इस माहिष्मतीपुरीकी रक्षा करनी होगी। पाण्डुकुमार! साथ ही मैं तुम्हारा मनोरथ भी पूर्ण करूँगा”

কিন্তু, হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যতদিন রাজা নীলের কুলে বংশধারা থাকবে, ততদিন এই নগরীর রক্ষা আমারই কর্তব্য। হে পাণ্ডুপুত্র! তোমার মনোরথও আমি পূর্ণ করব।

Verse 56

ईप्सितं तु करिष्यामि मनसस्तव पाण्डव,'परंतु भरतसत्तम! राजा नीलके कुलमें जबतक उनकी वंशपरम्परा चलती रहेगी, तबतक मुझे इस माहिष्मतीपुरीकी रक्षा करनी होगी। पाण्डुकुमार! साथ ही मैं तुम्हारा मनोरथ भी पूर्ण करूँगा”

সহদেব বললেন—“হে পাণ্ডব, তোমার মনের অভীষ্ট আমি অবশ্যই সম্পন্ন করব। কিন্তু হে ভরতশ্রেষ্ঠ, যতদিন রাজা নীলের কুলে বংশপরম্পরা অব্যাহত থাকবে, ততদিন এই মাহিষ্মতীপুরীর রক্ষা করা আমার কর্তব্য। হে পাণ্ডুপুত্র, তবু তোমার উদ্দেশ্যও আমি পূর্ণ করব।”

Verse 57

तत उत्थाय ह्ृष्टात्मा प्राज्जलि: शिरसा नतः । पूजयामास माद्रेय: पावकं भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठी जनमेजय! यह सुनकर माद्रीकुमार सहदेव प्रसन्नचित्त हो वहाँसे उठे और हाथ जोड़कर एवं सिर झुकाकर उन्होंने अग्निदेवका पूजन किया

এ কথা শুনে মাদ্রীপুত্র সহদেব হৃষ্টচিত্তে উঠে দাঁড়ালেন। হে ভরতশ্রেষ্ঠ, করজোড়ে ও মস্তক নত করে তিনি পাৱক—অগ্নিদেবের পূজা করলেন।

Verse 58

पावके विनिवृत्ते तु नीलो राजाभ्यगात्‌ तदा । पावकस्याज्ञया चैनमर्चयामास पार्थिव:

অগ্নিদেব অন্তর্ধান করলে রাজা নীল তখন এগিয়ে এলেন। পাৱকের আদেশে সেই পার্থিব রাজা সহদেবকে যথোচিত সম্মান-আরাধনা করলেন।

Verse 59

प्रतिगृह्य च तां पूजां करे च विनिवेश्य च

সেই সম্মান-আরাধনা তিনি শ্রদ্ধার সঙ্গে গ্রহণ করলেন এবং তা নিজের হাতে ধারণ করলেন।

Verse 60

त्रैपुरं स वशे कृत्वा राजानममितौजसम्‌

ত্রৈপুরকে বশে এনে তিনি অপরিমেয় পরাক্রমশালী রাজাকেও দমন করলেন।

Verse 61

निजग्राह महाबाहुस्तरसा पौरवेश्वरम्‌ । आकृतिं कौशिकाचार्य यत्नेन महता तत:

তখন মহাবাহু বীর দ্রুত পौरবেশ্বরকে গ্রাস করলেন। এরপর মহৎ প্রচেষ্টায় তিনি কৌশিকাচার্যের শিষ্য আকৃতিকেও বশে আনলেন।

Verse 62

वशे चक्रे महाबाहु: सुराष्ट्राधिपतिं तदा । फिर त्रिपुरीके राजा अमितौजाकों वशमें करके महाबाहु सहदेवने पौरवेश्वरको वेगपूर्वक बंदी बना लिया। तदनन्तर बड़े भारी प्रयत्नके द्वारा विशाल भुजाओंवाले माद्रीकुमारने सुराष्ट्देशके अधिपति कौशिकाचार्य आकृतिको वशमें किया || ६०-६१ ह ।। सुराष्ट्रविषयस्थश्व प्रेषयामास रुक्मिणे

তখন মহাবাহু সহদেব সুরাষ্ট্রের অধিপতিকে বশে আনলেন। আর সুরাষ্ট্র-দেশে যা ছিল (বার্তা/কর/ব্যবস্থা) তা রুক্মিণের কাছে প্রেরণ করলেন।

Verse 63

राज्ञे भोजकटस्थाय महामात्राय धीमते । भीष्मकाय स धर्मात्मा साक्षादिन्द्रसखाय वै

ভোজকটে অবস্থানকারী সেই রাজা—বুদ্ধিমান মহামাত্র ভীষ্মক, যিনি ইন্দ্রসখা বলে খ্যাত—তার কাছে সেই ধর্মাত্মা (বার্তা) পাঠালেন।

Verse 64

स चास्य प्रतिजग्राह ससुतः शासनं तदा । प्रीतिपूर्व महाराज वासुदेवमवेक्ष्य च

তখন তিনি পুত্রসহ সেই আদেশ গ্রহণ করলেন। হে মহারাজ, বাসুদেবের দিকে দৃষ্টি রেখে তিনি প্রীতিপূর্বক সম্মতি দিলেন।

Verse 65

ततः स रत्नान्यादाय पुन: प्रायाद्‌ युधाम्पति: । महाराज! सुराष्ट्रमें ही ठहरकर धर्मात्मा सहदेवने भोजकटनिवासी रुक्मी तथा विशाल राज्यके अधिपति परम बुद्धिमान साक्षात्‌ इन्द्रसखा भीष्मकके पास दूत भेजा। पुत्रसहित भीष्मकने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी ओर दृष्टि रखकर प्रेमपूर्वक ही सहदेवका शासन स्वीकार कर लिया। तदनन्तर योद्धाओंके अधिपति सहदेव वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर पुनः आगे बढ़ गये || ६२--६४ $ ।। ततः शूर्पारकं चैव तालाकटमथापि च,निषादान्‌ पुरुषादांश्व कर्णप्रावरणानपि । महाबलशाली महातेजस्वी माद्रीकुमारने शूर्पारक और तालाकट नामक देशोंको जीतते हुए दण्डकारण्यको अपने अधीन कर लिया। तत्पश्चात्‌ समुद्रके द्वीपोंमें निवास करनेवाले म्लेच्छजातीय राजाओं, निषादों तथा राक्षसों, कर्णप्रावरणोंकी- भी परास्त किया

এরপর যোদ্ধাদের অধিপতি সহদেব রত্ন গ্রহণ করে পুনরায় অগ্রসর হলেন। তারপর তিনি শূর্পারক ও তালাকট জয় করলেন; এবং নিষাদ, নরভক্ষক ও কর্ণপ্রাবরণদেরও পরাভূত করলেন।

Verse 66

वशे चक्रे महातेजा दण्डकांश्ष॒ महाबल: । सागरद्वीपवासांश्व॒ नृपतीन्‌ म्लेच्छयोनिजान्‌

মহাতেজস্বী মহাবলী (সহদেব) দণ্ডকদেশের শক্তিশালী নৃপতিদের এবং সমুদ্রদ্বীপবাসী ম্লেচ্ছ-যোনিজ রাজাদেরও বশে আনলেন।

Verse 67

ये च कालमुखा नाम नरराक्षसयोनय:,कालमुख नामसे प्रसिद्ध जो मनुष्य और राक्षस दोनोंके संयोगसे उत्पन्न हुए योद्धा थे, उनपर भी विजय प्राप्त की

আর ‘কালমুখ’ নামে প্রসিদ্ধ—মানুষ ও রাক্ষসের সংযোগে জন্ম নেওয়া সেই যোদ্ধাদের উপরও তিনি বিজয় লাভ করলেন।

Verse 68

कृत्स्नं कोलगिरिं चैव सुरभीपत्तनं तथा । द्वीपं ताम्राह्नययं चैव पर्वत रामक॑ तथा,समूचे कोलगिरि, सुरभीपत्तन, ताग्रद्वीप, रामकपर्वत तथा तिमिंगिलनरेशको भी अपने वशमें करके परम बुद्धिमान्‌ सहदेवने एक पैरके पुरुषों, केरलों, वनवासियों, संजयन्ती नगरी तथा पाखण्ड और करहाटक देशोंको दूतोंद्वारा संदेश देकर ही अपने अधीन कर लिया और उन सबसे कर वसूल किया

তিনি সম্পূর্ণ কোলগিরি, সুরভীপত্তন নগর, তাম্রাহ্নয় নামক দ্বীপ এবং রামক নামক পর্বত—সবই নিজের বশে আনলেন।

Verse 69

तिमिड्लिलं च स नृपं वशे कृत्वा महामति: । एकपादांश्व पुरुषान्‌ केरलान्‌ वनवासिन:,समूचे कोलगिरि, सुरभीपत्तन, ताग्रद्वीप, रामकपर्वत तथा तिमिंगिलनरेशको भी अपने वशमें करके परम बुद्धिमान्‌ सहदेवने एक पैरके पुरुषों, केरलों, वनवासियों, संजयन्ती नगरी तथा पाखण्ड और करहाटक देशोंको दूतोंद्वारा संदेश देकर ही अपने अधीन कर लिया और उन सबसे कर वसूल किया

পরম বুদ্ধিমান (সহদেব) ‘তিমিঙ্গিল’ নামক নৃপতিকে বশে এনে একপদ পুরুষ, কেরল ও বনবাসীদেরও অধীন করলেন।

Verse 70

नगरीं संजयन्तीं च पाखण्डं करहाटकम्‌ । दूतैरेव वशे चक्रे करं चैनानदापयत्‌,समूचे कोलगिरि, सुरभीपत्तन, ताग्रद्वीप, रामकपर्वत तथा तिमिंगिलनरेशको भी अपने वशमें करके परम बुद्धिमान्‌ सहदेवने एक पैरके पुरुषों, केरलों, वनवासियों, संजयन्ती नगरी तथा पाखण्ड और करहाटक देशोंको दूतोंद्वारा संदेश देकर ही अपने अधीन कर लिया और उन सबसे कर वसूल किया

তিনি কেবল দূত পাঠিয়েই সংজয়ন্তী নগরী এবং পাখণ্ড ও করহাটক দেশকে বশে আনলেন, আর তাদের থেকে করও আদায় করালেন।

Verse 71

पाण्ड्यांश्व द्रविडांश्वैव सहितांश्षोण्ड्केरलै: | आन्ध्रांस्तालवनांश्वैव कलिज्ञनुष्टकर्णिकान्‌,पाण्ड्य, द्रविड, उण्ड्र, केरल, आन्ध्र, तालवन, कलिंग, उष्टरकर्णिक, रमणीय आटबवीपुरी तथा यवनोंके नगर--इन सबको उन्होंने दूतोंद्वारा ही वशमें कर लिया और सबको कर देनेके लिये विवश किया

Sahadeva said: “The Pāṇḍyas and Draviḍas, together with the Uṇḍras and Keralas; the Āndhras and the Tālavanas; the Kaliṅgas and the Uṣṭakarṇikas—these and other forest-tract towns and even Yavana cities were brought under control by him through envoys alone, and all were compelled to render tribute.” In context, the verse highlights political subjugation achieved without immediate battle, emphasizing the pragmatic use of diplomacy to secure revenue and recognition of sovereignty.

Verse 72

आठवीं च पुरी रम्यां यवनानां पुरं तथा । दूतैरेव वशे चक्रे करं चैनानदापयत्‌,पाण्ड्य, द्रविड, उण्ड्र, केरल, आन्ध्र, तालवन, कलिंग, उष्टरकर्णिक, रमणीय आटबवीपुरी तथा यवनोंके नगर--इन सबको उन्होंने दूतोंद्वारा ही वशमें कर लिया और सबको कर देनेके लिये विवश किया

Sahadeva said: “He brought under control, through envoys alone, the eighth delightful city and likewise the city of the Yavanas; and he compelled them to render tribute.”

Verse 73

(समुद्रतीरमासाद्य न्यविशत्‌ पाण्डुनन्दन: । सहदेवस्ततो राजन्‌ मन्त्रिभि: सह भारत | सम्प्रधार्य महाबाहु: सचिवैरद्धिमत्तरैः ।। वहाँसे समुद्रके तटपर पहुँचकर पाण्डुनन्दन सहदेवने सेनाका पड़ाव डाला। भारत! तदनन्तर महाबाहु सहदेवने अत्यन्त बुद्धिमान्‌ मन्त्रणा देनेमें कुशल सचिवोंके साथ बैठकर बहुत देरतक विचारविमर्श किया। अनुमान्य स तां राजन्‌ सहदेवस्त्वरान्वित: । चिन्तयामास राजेन्द्र भ्रातु: पुत्रं घटोत्कचम्‌ ।। राजेन्द्र जममेजय! उन सबकी सम्मतिको आदर देते हुए माद्रीकुमारने अपने भतीजे राक्षसराज घटोत्कचका तुरंत चिन्तन किया। ततसश्रिन्तितमात्रे तु राक्षस: प्रत्यदृश्यत । अतिदीर्घो महाकाय: सर्वाभरणभूषित: ।। उनके चिन्तन करते ही वह बड़े डील-डौलवाला विशालकाय राक्षस दिखायी दिया। उसने सब प्रकारके आभूषण धारण कर रखे थे। नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाज्चनकुण्डल: । विचित्रहारकेयूर: किडुकिणीमणि भूषित: ।। उसके शरीरका रंग मेघोंकी काली घटाके समान था। उसके कानोंमें तपाये हुए सुवर्णके कुण्डल झिलमिला रहे थे। उसके गलेमें हार और भुजाओंमें केयूरकी विचित्र शोभा हो रही थी। कटिभागमें वह किंकिणीकी मणियोंसे विभूषित था। हेममाली महादंष्ट: किरीटी कुक्षिबन्धन: । ताम्रकेशो हरिश्मश्रुर्भीमाक्ष: कनकाड्रुद: ।। उसके कण्ठमें सुवर्णकी माला, मस्तकपर किरीट और कमरमें करधनीकी शोभा हो रही थी। उसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं, सिरके बाल ताँबेके समान लाल थे, मूँछ-दाढ़ीके बाल हरे दिखायी देते थे एवं आँखें बड़ी भयंकर थीं। उसकी भुजाओंमें सोनेके बाजूबंद चमक रहे थे। रक्तचन्दनदिग्धाडुः सूक्ष्माम्बरधरो बली । जवेन स ययौ तत्र चालयन्निव मेदिनीम्‌ ।। उसने अपने सब अंगोंमें लाल चन्दन लगा रखा था। उसके कपड़े बहुत महीन थे। वह बलवान्‌ राक्षस अपने वेगसे समूची पृथ्वीको हिलाता हुआ-सा वहाँ पहुँचा। ततो दृष्टवा जना राजजन्नायान्तं पर्वतोपमम्‌ | भयद्ि दुद्र॒ुव॒ुः सर्वे सिंहात्‌ क्षुद्रमूगा यथा ।। राजन! उस पर्वताकार घटोत्कचको आता देख वहाँके सब लोग भयके मारे भाग खड़े हुए; मानो किसी सिंहके भयसे जंगलके मृग आदि क्षुद्र पशु भाग रहे हों। आससाद च माद्रेयं पुलस्त्यं रावणो यथा । अभिवाद्य ततो राजन्‌ सहदेवं घटोत्कच: ।। प्रह्व: कृताञज्जलिस्तस्थौ कि कार्यमिति चाब्रवीत्‌ । घटोत्कच माद्रीनन्दन सहदेवके पास आया, मानो रावणने महर्षि पुलस्त्यके पास पदार्पण किया हो। महाराज! तदनन्तर घटोत्कच सहदेवको प्रणाम करके उनके सामने विनीतभावसे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला--'मेरे लिये क्‍या आज्ञा है?' त॑ मेरशिखराकारमागतं पाण्डुनन्दन: ।। सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां मूर्ध््युपाप्राय चासकृत्‌ । पूजयित्वा सहामात्य: प्रीतो वाक्यमुवाच ह ।। घटोत्कच मेरुपर्वतके शिखर-जैसा जान पड़ता था। उसको आया देख पाण्डुनन्दन सहदेवने दोनों भुजाओंमें भरकर उसे हृदयसे लगा लिया और बार-बार उसका मस्तक सूँघा। तत्पश्चात्‌ उसका स्वागत-सत्कार करके मन्त्रियोंसहित सहदेव बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले। सहदेव उवाच गच्छ लड्कां पुरी वत्स करार्थ मम शासनात्‌ | तत्र दृष्टवा महात्मानं राक्षसेन्द्रं विभीषणम्‌ ।। रत्नानि राजसूयार्थ विविधानि बहूनि च । उपादाय च सर्वाणि प्रत्यागच्छ महाबल ।। सहदेवने कहा--वत्स! तुम मेरी आज्ञासे कर लेनेके लिये लंकापुरीमें जाओ और वहाँ राक्षसराज महात्मा विभीषणसे मिलकर राजसूययज्ञके लिये भाँति-भाँतिके बहुत-से रत्न प्राप्त करो। महाबली वीर! उनकी ओरसे भेंटमें मिली हुई सब वस्तुएँ लेकर शीघ्र यहाँ लौट आओ। नो चेदेवं वदे: पुत्र समर्थमिदमुत्तरम्‌ । विष्णोर्भुजबलं वीक्ष्य राजसूयमथारभत्‌ ।। कौन्तेयो: भ्रातृभि: सार्थ सर्व जानीहि साम्प्रतम्‌ स्वस्ति ते5स्तु गमिष्यामि सर्व वैश्रवणानुज ।। इत्युक्त्वा शीघ्रमागच्छ मा भूत्‌ कालस्य पर्यय: । बेटा! यदि विभीषण तुम्हें भेंट न दें, तो उन्हें अपनी शक्तिका परिचय देते हुए इस प्रकार कहना--“कुबेरके छोटे भाई लंकेश्वर! कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भगवान्‌ श्रीकृष्णके बाहुबलको देखकर भाइयोंसहित राजसूययज्ञ आरम्भ किया है। आप इस समय इन बातोंको अच्छी तरह जान लें। आपका कल्याण हो, अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा।” इतना कहकर तुम शीघ्र लौट आना; अधिक विलम्ब मत करना। वैशम्पायन उवाच पाण्डवेनैवमुक्तस्तु मुदा युक्तो घटोत्कच: । तथेत्युक्त्वा महाराज प्रतस्थे दक्षिणां दिशम्‌ ।। ययौ प्रदक्षिणं कृत्वा सहदेवं घटोत्कच: ।) वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज जनमेजय! पाण्डुकुमार सहदेवके ऐसा कहनेपर घटोत्कच बहुत प्रसन्न हुआ और “तथास्तु” कहकर सहदेवकी परिक्रमा करके दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया। ततः कच्छगतो धीमान्‌ दूतं माद्रवतीसुत: । प्रेषयामास हैडिम्बं पौलस्त्याय महात्मने । विभीषणाय धर्मात्मा प्रीतिपूर्वमरिंदम:,इस प्रकार समुद्रके तटपर पहुँचकर बुद्धिमान्‌ शत्रुदमन धर्मात्मा माद्रवतीकुमारने महात्मा पुलस्त्यनन्दन विभीषणके पास प्रेमपूर्वक घटोत्कचको अपना दूत बनाकर भेजा

Vaiśampāyana said: Reaching the seashore, Sahadeva, the son of Pāṇḍu, made camp there, O king, together with his ministers. The mighty-armed prince then sat with his exceptionally wise counselors and deliberated at length. After honoring their counsel, Sahadeva—eager to act—turned his mind to his nephew Ghaṭotkaca, the rākṣasa-king. The moment he was remembered, the rākṣasa appeared: towering, huge-bodied, adorned with every ornament. Dark as a mass of rainclouds, with earrings of heated gold, he shone with varied necklaces and armlets, and with jeweled tinkling ornaments at his waist. Wearing a golden garland, crowned, and girded, with great fangs, coppery hair, greenish beard and moustache, terrifying eyes, and golden armlets, he came with such speed that it seemed as though he shook the earth. Seeing the mountain-like Ghaṭotkaca approaching, the people fled in fear, like small forest creatures scattering at the sight of a lion. He came to Sahadeva as Rāvaṇa once approached the sage Pulastya; having bowed to Sahadeva, he stood with joined palms and asked, “What is to be done?” Sahadeva embraced him with both arms, repeatedly smelled the top of his head in affection, honored him with his attendants, and spoke with delight: “Dear child, go to the city of Laṅkā by my command to collect tribute. There, meet the noble rākṣasa-lord Vibhīṣaṇa and obtain many kinds of jewels for the Rājasūya sacrifice. Bring back all that is given as a gift, O mighty one, and return quickly. If he does not give, then say this, firmly: ‘O younger brother of Vaiśravaṇa (Kubera), lord of Laṅkā—know that Kuntī’s son Yudhiṣṭhira, having witnessed the arm-strength of Viṣṇu (Kṛṣṇa), has begun the Rājasūya together with his brothers. May you be well; I shall now depart.’ Having said this, come back at once; let there be no delay.” Vaiśampāyana said: Thus addressed by Sahadeva, Ghaṭotkaca rejoiced, replied “So be it,” circumambulated Sahadeva, and set out toward the southern direction. Then, having reached the Kaccha region, the wise, righteous, foe-subduing son of Mādrī dispatched the Haiḍimba (Ghaṭotkaca) as his envoy, with goodwill, to the great-souled Vibhīṣaṇa, son of Pulastya.

Verse 74

(लड़कामभिमुखो राजन्‌ समुद्रमवलोकयत्‌ ।। कूर्मग्राहझषाकीर्ण नक्रैर्मीनिस्तथा55कुलम्‌ । शुक्तिव्रातैः समाकीर्ण शड्खानां निचयाकुलम्‌ ।। राजन! लंकाकी ओर जाते हुए घटोत्कचने समुद्रको देखा। वह कछुओं, मगरों, नाकों तथा मत्स्य आदि जल-जन्तुओंसे भरा हुआ था। उसमें ढेर-के-ढेर शंख और सीपियाँ छा रही थीं। स दृष्टवा रामसेतुं च चिन्तयन्‌ रामविक्रमम्‌ । प्रणम्य तमतिक्रम्य याम्यां वेलामलोकयत्‌ ।। भगवान्‌ श्रीरामके द्वारा बनवाये हुए पुलको देखकर घटोत्कचको भगवानके पराक्रमका चिन्तन हो आया और उस सेतुतीर्थकोी प्रणाम करके उसने समुद्रके दक्षिणतटकी ओर दृष्टिपात किया। गत्वा पारं समुद्रस्थ दक्षिणं स घटोत्कच: । ददर्श लड्कां राजेन्द्र नाकपृष्ठोपमां शुभाम्‌ ।। राजेन्द्र! तत्पश्चात्‌ दक्षिणतटपर पहुँचकर घटोत्कचने लंकापुरी देखी, जो स्वर्गके समान सुन्दर थी। प्राकारेणावृतां रम्यां शुभद्वारैश्वन शोभिताम्‌ । प्रासादैर्बहुसाहसैः श्वेतरक्तैश्व॒ संकुलाम्‌ ।। उसके चारों ओर चहारदीवारी बनी थी। सुन्दर फाटक उस रमणीयपुरीकी शोभा बढ़ाते थे। सफेद और लाल रंगके हजारों महलोंसे वह लंकापुरी भरी हुई थी। तापनीयगवाक्षेण मुक्ताजालान्तरेण च । हैमराजतजालेन दान्तजालैश्व शोभिताम्‌ ।। वहाँके गवाक्ष (जँगले) सोनेके बने हुए थे और उनके भीतर मोतियोंकी जाली लगी हुई थी। कितने ही गवाक्ष सोने, चाँदी तथा हाथीदाँतकी जालियोंसे सुशोभित थे। हर्म्यगोपुरसम्बाधां रुक्मतोरणसंकुलाम्‌ । दिव्यदुन्दुभिनिर्हादामुद्यानवनशोभिताम्‌ ।। कितनी ही अट्ठालिकाएँ तथा गोपुर उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे। स्थान-स्थानपर सोनेके फाटक लगे हुए थे। वहाँ दिव्य दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि गूँजती रहती थी। बहुत-से उद्यान और वन उस नगरीकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। पुष्पगन्धैश्व संकीर्णा रमणीयमहापथाम्‌ । नानारल्नैश्व सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम्‌ ।। उसमें चारों ओर फूलोंकी सुगन्ध छा रही थी। वहाँकी लंबी-चौड़ी सड़कें बहुत सुन्दर थीं। भाँति-भाँतिके रत्नोंसे भरी-पुरी लंका इन्द्रकी अमरावतीपुरीको भी लज्जित कर रही थी। विवेश स पुरी लड्कां राक्षसैश्व निषेविताम्‌ । ददर्श राक्षसव्राताउछूलप्राशधरान्‌ बहून्‌ ।। घटोत्कचने राक्षसोंसे सेवित उस लंकापुरीमें प्रवेश किया और देखा, झुंड-के-झुंड राक्षस त्रिशूल और भाले लिये विचर रहे हैं। नानावेषधरान्‌ दक्षान्‌ नारीश्व प्रियदर्शना: । दिव्यमाल्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता: ।। वे सभी युद्धमें कुशल हैं और नाना प्रकारके वेष धारण करते हैं। घटोत्कचने वहाँकी नारियोंको भी देखा। वे सब-की-सब बड़ी सुन्दर थीं। उनके अंगोंमें दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण तथा दिव्य हार शोभा दे रहे थे। मदरक्तान्तनयना: पीनश्रोणिपयोधरा: । भैमसेनिं ततो दृष्टवा हृष्टास्ते विस्मयं गता: ।। उनके नेत्रोंके किनारे मदिराके नशेसे कुछ लाल हो रहे थे। उनके नितम्ब और उरोज उभरे हुए तथा मांसल थे। भीमसेनपुत्र घटोत्कचको वहाँ आया देख लंकानिवासी राक्षसोंको बड़ा हर्ष और विस्मय हुआ। आससाद गृहं राज्ञ इन्द्रस्य सदनोपमम्‌ | स द्वारपालमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ।। इधर घटोत्कच इत्रभवनके समान मनोहर राजमहलके द्वारपर जा पहुँचा और द्वारपालसे इस प्रकार बोला। घटोत्कच उवाच कुरूणामृषभो राजा पाण्डुर्नमाम महाबल: । कनीयांस्तस्य दायाद: सहदेव इति श्रुतः ।। घटोत्कचने कहा--कुरुकुलमें एक श्रेष्ठ राजा हो गये हैं। वे महाबली नरेश “पाण्डु' के नामसे विख्यात थे। उनके सबसे छोटे पुत्रका नाम “सहदेव' है। कृष्णमित्रस्य तु गुरो राजसूयार्थमुद्यत: । तेनाहं प्रेषितो दूत: करार्थ कौरवस्य च ।। वे अपने बड़े भाई युधिष्ठिरका राजसूययज्ञ सम्पन्न करनेके लिये कटिबद्ध हैं। धर्मराज युधिष्ठिरके सहायक भगवान्‌ श्रीकृष्ण हैं। सहदेवने कुरुराज युधिष्ठिरके लिये कर लेनेके निमित्त मुझे दूत बनाकर यहाँ भेजा है। द्रष्टमिच्छामि पौलस्त्य॑ त्वं क्षिप्रं मां निवेदय । मैं पुलस्त्यनन्दन महाराज विभीषणसे मिलना चाहता हूँ। तुम शीघ्र जाकर उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दो। वैशम्पायन उवाच तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा द्वारपालो महीपते । तथेत्युक्त्वा विवेशाथ भवनं स निवेदक: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! घटोत्कचका वह वचन सुनकर वह द्वारपाल “बहुत अच्छा" कहकर सूचना देनेके लिये राजभवनके भीतर गया। साञ्जलि: स समाचष्ट सर्वा दूतगिरं तदा । द्वारपालवच: श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषण: ।। उवाच वाक्यं धर्मात्मा समीपे मे प्रवेश्यताम्‌ । वहाँ उसने हाथ जोड़कर दूतकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं। द्वारपालकी बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषणने उससे कहा--'दूतको मेरे समीप ले आओ'। एवमुक्तस्तु राजेन्द्र धर्मज्ञेन महात्मना । अथ निष्क्रम्य सम्भ्रान्तो द्वा:स्थो हैडिम्बमब्रवीत्‌ ।। राजेन्द्र! धर्मज्ञ महात्मा विभीषणकी ऐसी आज्ञा होनेपर द्वारपाल बड़ी उतावलीके साथ बाहर निकला और घटोत्कचसे बोला--। एहि दूत नृपं द्रष्ट क्षिप्रं प्रविश च स्वयम्‌ । द्वारपालवच: श्रुत्वा प्रविवेश घटोत्कच: ।। “दूत! आओ। महाराजसे मिलनेके लिये राजभवनमें शीघ्र प्रवेश करो।” द्वारपालका कथन सुनकर घटोत्कचने राजभवनमें प्रवेश किया। स प्रविश्य ददर्शाथ राक्षसेन्द्रस्य मन्दिरम्‌ । ततः कैलाससंकाशं तप्तकाञज्चनतोरणम्‌ ।। तदनन्तर उसमें प्रवेश करके उसने राक्षसराज विभीषणका महल देखा, जो अपनी उज्ज्वल आभासे कैलासके समान जान पड़ता था। उसका फाटक तपाकर शुद्ध किये हुए सोनेसे तैयार किया गया था। प्राकारेण परिक्षिप्तं गोपुरैश्चापि शोभितम्‌ । हर्म्यप्रासादसम्बाधं नानारत्नसमन्वितम्‌ ।। चहारदीवारीसे घिरा हुआ वह राजमन्दिर अनेक गोपुरोंसे सुशोभित हो रहा था। उसमें बहुत-सी अट्टालिकाएँ तथा महल बने हुए थे। भाँति-भाँतिके रत्न उस राजभवनकी शोभा बढ़ाते थे। काज्चनैस्तापनीयैश्वलू स्फाटिकै राजतैरपि । वजवैडूर्यगर्भश्न स्तम्भे्दृष्टिमनो हरै: । नानाध्वजपताकाभि: सुवर्णभिश्च चित्रितम्‌ । तपाये हुए सुवर्ण, रजत (चाँदी) तथा स्फटिकमणिके बने हुए खम्भे नेत्र और मनको बरबस अपनी ओर खींच लेते थे। उन खम्भोंमें हीरे और वैदूर्य जड़े हुए थे। सुनहरे रंगकी विविध ध्वजा-पताकाओंसे उस भव्य भवनकी विचित्र शोभा हो रही थी। चित्रमाल्यावृतं रम्यं तप्तकाज्चनवेदिकम्‌ ।। तान्‌ दृष्टवा तत्र सर्वान्‌ स भैमसेनिर्मनोरमान्‌ । प्रविशन्नेव हैडिम्ब: शुश्राव मुरजस्वनम्‌ ।। विचित्र मालाओंसे अलंकृत तथा विशुद्ध स्वर्णमय वेदिकाओंसे विभूषित वह राजभवन बड़ा रमणीय दिखायी दे रहा था। उस महलकी इन सारी मनोरम विशेषताओंको देखकर घटोत्कचने ज्यों ही भीतर प्रवेश किया, त्यों ही उसके कानोंमें मृदंगकी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ी। तन्त्रीगीतसमाकीर्ण समतालमिताक्षरम्‌ । दिव्यदुन्दुभिनि्हादं वादित्रशतसंकुलम्‌ ।। वहाँ वीणाके तार झंकृत हो रहे थे और उसके लयपर गीत गाया जा रहा था, जिसका एक-एक अक्षर समतालके अनुसार उच्चारित हो रहा था। सैकड़ों वाद्योंके साथ दिव्य दुन्दुभियोंका मधुर घोष गूँज रहा था। स श्रुत्वा मधुरं शब्दं प्रीतिमानभवत्‌ तदा । ततो विगाह्द[ हैडिम्बो बहुकक्षां मनोरमाम्‌ ।। स ददर्श महात्मान द्वा:स्थेन भरतर्षभ । त॑ं विभीषणमासीनं काउ्चने परमासने ।। भरतश्रेष्ठ। वह मधुर शब्द सुनकर घटोत्कचके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने अनेक मनोरम कक्षाओंको पार करके द्वारपालके साथ जा सुन्दर स्वर्ण सिंहासनपर बैठे हुए महात्मा विभीषणका दर्शन किया। दिव्ये भास्करसंकाशे मुक्तामणिविभूषिते । दिव्याभरणचित्राडूं दिव्यरूपधरं विभुम्‌ ।। उनका सिंहासन सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था और उसमें मोती तथा मणि आदि रत्न जड़े हुए थे। दिव्य आभूषणोंसे राक्षसराज विभीषणके अंगोंकी विचित्र शोभा हो रही थी। उनका रूप दिव्य था। दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धोक्षितं शुभम्‌ | विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्र भम्‌ ।। वे दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करके दिव्य गन्धसे अभिषिक्त हो बड़े सुन्दर दिखायी दे रहे थे। उनकी अंगकान्ति सूर्य तथा अग्निके समान उद्धासित हो रही थी। उपोपविष्टं सचिवैददेवैरिव शतक्रतुम्‌ ।। यक्षैमहारथैर्दिव्यैर्नारीभि: प्रियदर्शनै: । गीर्भिमड्रलयुक्ताभि: पूज्यमानं यथाविधि ।। जैसे इन्द्रके पास बहुत-से देवता बैठते हैं, उसी प्रकार विभीषणके समीप उनके अनेक सचिव बैठे थे। बहुत-से दिव्य सुन्दर महारथी यक्ष अपनी स्त्रियोंके साथ मंगलयुक्त वाणीद्वारा विभीषणका विधिपूर्वक पूजन कर रहे थे। चामरे व्यजने चाग्रये हेमदण्डे महाधने । गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्थनि ।। दो सुन्दरी नारियाँ सुवर्णमय दण्डसे विभूषित बहुमूल्य चँवर तथा व्यजन लेकर उनके मस्तकपर डुला रही थीं। आर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टं कुबेरवरुणोपमम्‌ । धर्मे चैव स्थित नित्यमद्धुतं राक्षसेश्वरम्‌ ।। राक्षलराज विभीषण कुबेर और वरुणके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न एवं अद्भुत दिखायी देते थे। उनके अंगोंसे दिव्य प्रभा छिटक रही थी। वे सदा धर्ममें स्थित रहते थे। राममिक्ष्वाकुनाथं वै स्मरन्तं मनसा सदा | दृष्टवा घटोत्कचो राजन्‌ ववन्दे तं कृताञ्जलि: ।। वे मन-ही-मन इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते थे। राजन! उन राक्षसराज विभीषणको देख घटोत्कचने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। प्रह्चस्तस्थौ महावीर्य: शक्रं चित्ररथो यथा । त॑ दूतमागतं दृष्टवा राक्षसेन्द्रो विभीषण: ।। पूजयित्वा यथान्यायं सान्त्वपूर्व वचो<ब्रवीत्‌ | और जैसे महापराक्रमी चित्ररथ इन्द्रके सामने नम्र रहते हैं, उसी प्रकार महाबली घटोत्कच भी विनीतभावसे उनके सम्मुख खड़ा हो गया। राक्षसराज विभीषणने उस दूतको आया हुआ देख उसका यथायोग्य सम्मान करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंमें कहा। विभीषण उवाच कस्य वंशे तु संजात: करमिच्छन्‌ महीपति: ।। तस्यानुजान्‌ समस्तांश्व पुरं देशं च तस्य वै । त्वां च कार्य च तत्‌ सर्व श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। विस्तरेण मम ब्रूहि स्वानितान्‌ पृथक्‌ू-पृथक्‌ । विभीषणने पूछा--दूत! जो महाराज मुझसे कर लेना चाहते हैं, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए हैं। उनके समस्त भाइयों तथा ग्राम और देशका परिचय दो। मैं तुम्हारे विषयमें भी जानना चाहता हूँ तथा तुम जिस कार्यके लिये कर लेने आये हो, उस समस्त कार्यके विषयमें भी मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। तुम मेरी पूछी हुई इन सब बातोंको विस्तारपूर्वक पृथक्‌ू-पृथक्‌ बताओ। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु हैडिम्ब: पौलस्त्येन महात्मना ।। कृताञ्जलिरुवाचाथ सान्त्वयन्‌ राक्षसाधिपम्‌ | वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महात्मा विभीषणके इस प्रकार पूछनेपर हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने हाथ जोड़कर राक्षसराजको आश्वासन देते हुए कहा। घटोत्कच उवाच सोमस्य वंशे राजा55सीत्‌ पाण्डु्नाम महाबल: । पाण्डो: पुत्राश्न पज्चासछछक्रतुल्यपराक्रमा: ।। तेषां ज्येष्टस्तु नाम्नाभूद्‌ धर्मपुत्र इति श्रुतः । घटोत्कच बोला--महाराज! चन्द्रवंशमें पाण्डु नामसे प्रसिद्ध एक महाबली राजा हो गये हैं। उनके पाँच पुत्र हैं, जो इन्द्रके समान पराक्रमी हैं। उन पाँचोंमें जो बड़े हैं, वे धर्मपुत्रके नामसे विख्यात हैं। अजातशगक्रुर्धर्मात्मा धर्मो विग्रहवानिव ।। ततो युधिष्छिरो राजा प्राप्प राज्यमकारयत्‌ | गज्जाया दक्षिणे तीरे नगरे नागसाह्वये ।। उनके मनमें किसीके प्रति शत्रुता नहीं है; इसलिये लोग उन्हें अजातशत्रु कहते हैं। उनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है। वे धर्मके मूर्तिमान्‌ स्वरूप जान पड़ते हैं। गंगाके दक्षिणतटपर हस्तिनापुर नामका एक नगर है। राजा युधिष्ठिर वहीं अपना पैतृक राज्य प्राप्त करके उसकी रक्षा करते थे। तद्‌ दत्त्वा धृतराष्ट्राय शक्रप्रस्थं ययौ ततः । भ्रातृभि सह राजेन्द्र शक्रप्रस्थे प्रमोदते ।। राक्षसराज! कुछ कालके पश्चात्‌ उन्होंने हस्तिनापुरका राज्य धृतराष्ट्रको सौंप दिया और स्वयं वे भाइयोंसहित इन्द्रप्रस्थ चले गये। इन दिनों वे वहीं आनन्दपूर्वक रहते हैं। गड़ायमुनयोर्म ध्ये तावुभौ नगरोत्तमौ । नित्यं धर्मे स्थितो राजा शक्रप्रस्थे प्रशासति ।। वे दोनों श्रेष्ठ नगर गंगा-यमुनाके बीचमें बसे हुए हैं। नित्य धर्मपरायण राजा युधिष्ठछिर इन्द्रप्रस्थमें ही रहकर शासन करते हैं। तस्यानुजो महाबाहुः भीमसेनो महाबल: । महातेजा महावीर्य: सिंहतुल्य: स पाण्डव: ।। उनके छोटे भाई पाण्डुकुमार महाबाहु भीमसेन भी बड़े बलवान हैं। वे सिंहके समान महापराक्रमी और अत्यन्त तेजस्वी हैं। दशनागसहस्राणां बले तुल्य: स पाण्डव: | तस्यानुजोअ<र्जुनो नाम महावीर्यपराक्रम: ।। सुकुमारो महासत्त्वो लोके वीर्येण विश्रुत: । उनमें दस हजार हाथियोंका बल है। उनसे छोटे भाईका नाम अर्जुन है, जो महान्‌ बल- पराक्रमसे सम्पन्न, सुकुमार तथा अत्यन्त थैर्यवान्‌ हैं। उनका पराक्रम विश्वमें विख्यात है। कार्तवीर्यसमो वीर्ये सागरप्रतिमो बले ।। जामदग्न्यसमो हास्त्रे संख्ये रामसमोअ<र्जुन: । रूपे शक्रसम: पार्थस्तेजसा भास्करोपम: ।। वे कुन्तीनन्दन अर्जुन कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी, सगरपुत्रोंके समान बलवान, परशुरामजीके समान अस्त्रविद्याके ज्ञाता, श्रीरामचन्द्रजीके समान समरविजयी, इन्द्रके समान रूपवान्‌ तथा भगवान्‌ सूर्यके समान तेजस्वी हैं। देवदानवगन्धर्व: पिशाचोरगराक्षसै: । मानुषैश्व समस्तैश्न अजेय: फाल्गुनो रणे ।। देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और मनुष्य ये सब मिलकर भी युद्धमें अर्जुनको परास्त नहीं कर सकते। तेन तत्‌ खाण्डवं दावं तर्पितं जातवेदसे । तरसा धर्षयित्वा तं शक्रं देवगणै: सह ।। लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तर्पयित्वा हुताशनम्‌ । उन्होंने खाण्डववनको जलाकर अग्निदेवको तृप्त किया है। देवताओंसहित इन्द्रको वेगपूर्वक पराजित करके उन्होंने अग्निदेवको संतुष्ट किया और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं। तेन लब्धा महाराज दुर्लभा देवतैरपि । वासुदेवस्य भगिनी सुभद्रा नाम विश्ुता ।। महाराज! उन्होंने भगवान्‌ श्रीकृष्णकी बहिन सुभद्राको पत्नीरूपमें प्राप्त किया है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ थी। अर्जुनस्यानुजो राजन्‌ नकुलश्रैति विश्लुत: ।। दर्शनीयतमो लोके मूर्तिमानिव मन्मथ: । राजन! अर्जुनके छोटे भाई नकुल नामसे विख्यात हैं, जो इस जगतमें मूर्तिमान्‌ कामदेवके समान दर्शनीय हैं। तस्यानुजो महातेजा: सहदेव इति श्रुतः । तेनाहं प्रेषितो राजन्‌ सहदेवेन मारिष ।। नकुलके छोटे भाई महातेजस्वी सहदेवके नामसे विख्यात हैं। माननीय महाराज! उन्हीं सहदेवने मुझे यहाँ भेजा है। अहं घटोत्कचो नाम भीमसेनसुतो बली । मम माता महाभागा हिडिम्बा नाम राक्षसी ।। मेरा नाम घटोत्कच है। मैं भीमसेनका बलवान पुत्र हूँ। मेरी सौभाग्यशालिनी माताका नाम हिडिम्बा है। वे राक्षसकुलकी कन्या हैं। पार्थानामुपकारार्थ चरामि पृथिवीमिमाम्‌ । आसीतू पृथिव्या: सर्वस्या महीपालो युधिष्ठिर: ।। मैं कुन्तीपुत्रोंका उपकार करनेके लिये ही इस पृथ्वीपर विचरता हूँ। महाराज युधिष्छिर सम्पूर्ण भूमण्डलके शासक हो गये हैं। राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे । संदिदेश च स भ्रातृन्‌ करार्थ सर्वतोदिशम्‌ ।। उन्होंने क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करनेकी तैयारी की है। उन्हीं महाराजने अपने सब भाइयोंको कर वसूल करनेके लिये सब दिशाओंमें भेजा है। वृष्णिवीरेण सहित: संदिदेशानुजान्‌ नृप: । उदीचीमर्जुनस्तूर्ण करार्थ समुपाययौ ।। वृष्णिवीर भगवान्‌ श्रीकृष्णके साथ धर्मराजने जब अपने भाइयोंको दिग्विजयके लिये आदेश दिया, तब महाबली अर्जुन कर वसूल करनेके लिये तुरंत उत्तर दिशाकी ओर चल दिये। गत्वा शतसहस्राणि योजनानि महाबल: । जित्वा सर्वान्‌ नृपान्‌ युद्धे हत्वा च तरसा वशी ।। स्वर्गद्वारमुपागम्य रत्नान्यादाय वै भृशम्‌ । उन्होंने लाख योजनकी यात्रा करके सम्पूर्ण राजाओंको युद्धमें हराया है और सामना करनेके लिये आये हुए विपक्षियोंको वेगपूर्वक मारा है। जितेन्द्रिय अर्जुनने स्वर्गके द्वारतक जाकर प्रचुर रत्न-राशि प्राप्त की है। अश्वांश्व विविधान्‌ दिव्यान्‌ सर्वानादाय फाल्गुन: ।। धनं बहुविध॑ राजन्‌ धर्मपुत्राय वै ददौ । नाना प्रकारके दिव्य अश्व उन्हें भेंटमें मिले हैं। इस प्रकार भाँति-भाँतिके धन लाकर उन्होंने धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी सेवामें समर्पित किये हैं। भीमसेनो हि राजेन्द्र जित्वा प्राचीं दिशं बलातू ।। वशे कृत्वा महीपालान्‌ पाण्डवाय धनं ददौ | राजेन्द्र! युधिष्ठिरके दूसरे भाई भीमसेनने पूर्व दिशामें जाकर उसे बलपूर्वक जीता है और वहाँके राजाओंको अपने वशमें करके पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको बहुत धन अर्पित किया है। दिशं प्रतीचीं नकुल: करार्थ प्रययौ तथा ।। सहदेवो दिशं याम्यां जित्वा सर्वान्‌ महीक्षित: । नकुल कर लेनेके लिये पश्चिम दिशाकी ओर गये हैं और सहदेव सम्पूर्ण राजाओंको जीतते हुए दक्षिण दिशामें बढ़ते चले आये हैं। मां संदिदेश राजेन्द्र करार्थमिह सत्कृत: ।। पार्थानां चरितं तुभ्यं संक्षेपात्‌ समुदाह्तम्‌ । राजेन्द्र! उन्होंने बड़े सत्कारपूर्वक मुझे आपके यहाँ राजकीय कर देनेके लिये संदेश भेजा है। महाराज! पाण्डवोंका यह चरित्र मैंने अत्यन्त संक्षेपमें आपके समक्ष रखा है। तमवेक्ष्य महाराज धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌ ।। पावकं राजसूयं च भगवनन्‍्तं हरिं प्रभुम्‌ । एतानवेक्ष्य धर्मज्ञ कर त्वं दातुमरहसि ।। आप धर्मराज युधिष्ठिरकी ओर देखिये, पवित्र करनेवाले राजसूययज्ञ तथा जगदीश्वर भगवान्‌ श्रीहरिकी ओर भी ध्यान दीजिये। धर्मज्ञ नरेश! इन सबकी ओर दृष्टि रखते हुए आपको मुझे कर देना चाहिये। वैशम्पायन उवाच तेन तद्‌ भाषितं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषण: । प्रीतिमानभवद्‌ राजन्‌ धर्मात्मा सचिवै: सह ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! घटोत्कचकी वह बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण अपने मन्त्रियोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए। स चास्य॒ प्रतिजग्राह शासन प्रीतिपूर्वकम्‌ । तच्च कालकृतं धीमानभ्यमन्यत स प्रभु:,विभीषण ने प्रेमपूर्वक ही उनका शासन स्वीकार कर लिया। शक्तिशाली एवं बुद्धिमान्‌ विभीषणने उसे कालका ही विधान समझा

Vaiśaṃpāyana said: “O King, as he set out facing Laṅkā, Ghaṭotkaca looked upon the ocean. It was crowded with turtles, crocodiles, great aquatic creatures, and swarms of fish.” The scene underscores the vastness of the crossing and the formidable natural world that frames his diplomatic mission—an errand undertaken not for conquest alone, but to gather lawful tribute for Yudhiṣṭhira’s Rājasūya, a rite that demands recognition of rightful sovereignty.

Verse 75

(ततो ददौ विचित्राणि कम्बलानि कुथानि च | दन्तकाञ्चनपर्यड्कान्‌ मणिहेमविचित्रितान्‌ ।। उन्होंने सहदेवके लिये हाथीकी पीठपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल (कालीन) तथा हाथीदाँत और सुवर्णके बने हुए पलंग दिये, जिनमें सोने तथा रत्न जड़े हुए थे। भूषणानि विचित्राणि महाहाणि बहूनि च | प्रवालानि च शुभ्राणि मणींश्व विविधान्‌ बहून्‌ ।। काञ्चनानि च भाण्डानि कलशानि घटानि च | कटाहान्यपि चित्राणि द्रोण्यश्रैव सहसत्रश: ।। इसके सिवा बहुत-से विचित्र और बहुमूल्य आभूषण भी भेंट किये। सुन्दर मूँगे, भाँति- भाँतिके मणिरत्न, सोनेके बर्तन, कलश, घड़े, विचित्र कड़ाहे और हजारों जलपात्र समर्पित किये। राजतानि च भाण्डानि चित्राणि च बहूनि च | शस्त्राणि रुक्मचित्राणि मणिमुक्तिविचित्रितान्‌ ।। इनके सिवा चाँदीके भी बहुत-से ऐसे बर्तन दिये, जिनमें चित्रकारी की गयी थी। कुछ ऐसे शस्त्र भेंट किये, जिनमें सुवर्ण, मणि और मोती जड़े हुए थे। यज्ञस्य तोरणे युक्तान्‌ ददौ तालांश्षतुर्दश । रुक्मपड़कजपुष्पाणि शिबिका मणिभूषिता: ।। यज्ञके फाटकपर लगानेयोग्य चौदह ताड़ प्रदान किये। सुवर्णमय कमलपुष्प और मणिजटित शिबिकाएँ भी दीं। मुकुटानि महाहणि हेमवर्णाश्व॒ कुण्डलान्‌ | हेमपुष्पाण्यनेकानि रुक्ममाल्यानि चापरान्‌ ।। शड्खांश्व॒ चन्द्रसंकाशाञ्छतावर्तान्‌ विचित्रिण: । बहुमूल्य मुकुट, सुनहले कुण्डल, सोनेके बने हुए अनेकानेक पुष्प, सोनेके ही हार तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल एवं विचित्र शतावर्त शंख भेंट किये। चन्दनानि च मुख्यानि रुक्मरत्नान्यनेकश: ।। वासांसि च महाहाणि कम्बलानि बहुन्यपि । अन्यांश्व विविधान्‌ राजन्‌ रत्नानि च बहूनि च ।। स ददौ सहदेवाय तदा राजा विभीषण: ।) श्रेष्ठ चन्दन, अनेक प्रकारके सुवर्ण तथा रत्न, महँगे वस्त्र, बहुत-से कम्बल, अनेक जातिके रत्न तथा और भी भाँति-भाँतिके बहुमूल्य पदार्थ राजा विभीषणने सहदेवको भेंट किये। ततः सम्प्रेषषामास रत्नानि विविधानि च । चन्दनागुरुकाष्ठानि दिव्यान्याभरणानि च

Vaiśaṃpāyana said: Then King Vibhīṣaṇa presented Sahadeva with many wondrous blankets and fine coverings fit to be spread upon an elephant’s back, and with couches fashioned of ivory and gold, inlaid with gems and gold. He also offered numerous exquisite and highly valuable ornaments—bright coral and many kinds of precious stones—together with golden vessels, jars and pots, painted cauldrons, and thousands of water-troughs. He gave many decorated silver vessels as well, and weapons adorned with gold, gems, and pearls. For the sacrificial gateway he bestowed fourteen palm standards; he also gave golden lotus-flowers and palanquins ornamented with jewels. Costly crowns, golden earrings, many golden flowers, and other garlands of gold were offered, along with moon-bright, variegated conch-shells of the śatāvarta kind. He presented choice sandalwood, many varieties of gold and gems, expensive garments, many blankets, and diverse precious items besides. Thus did King Vibhīṣaṇa honor Sahadeva; thereafter he continued to send further assorted jewels, sandalwood and aloe-wood, and divine ornaments. Ethically, the passage frames royal generosity as a public act of honoring merit and alliance: wealth is deployed not for private indulgence but to uphold social bonds, sacrificial propriety, and the dignity of a righteous guest/recipient.

Verse 76

(विभीषणं च राजानमभिवाद्य कृताञ्जलि: ।। प्रदक्षिणं परीत्यैव निर्जगाम घटोत्कच: । तदनन्तर घटोत्कचने हाथ जोड़कर राजा विभीषणको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके वहाँसे प्रस्थान किया। तानि सर्वाणि रत्नानि अष्टाशीतिर्निशाचरा: ।। आज हु: समुदा राजन्‌ हैडिम्बेन तदा सह । राजन! घटोत्कचके साथ अट्बासी निशाचर उन सब रत्नोंको पहुँचानेके लिये प्रसन्नतापूर्वक आये। रत्नान्यादाय सर्वाणि प्रतस्थे स घटोत्कच: ।। ततो रत्नान्युपादाय हैडिम्बो राक्षसै: सह । जगाम तूर्ण लड़काया: सहदेवपदं प्रति ।। आसेदु: पाण्डवं सर्वे लड्घयित्वा महोदधिम्‌ ।। इस प्रकार उन सब रत्नोंको साथ ले घटोत्कचने राक्षसोंके साथ लंकासे सहदेवके पड़ावकी ओर प्रस्थान किया और समुद्र लाँधकर वे सब-के-सब पाण्डुनन्दन सहदेवके निकट आ पहुँचे। सहदेवो ददर्शाथ रत्नाहारान्‌ निशाचरान्‌ । आगतान्‌ भीमसंकाशान्‌ हैडिम्बं च तथा नृप ।। राजन! सहदेवने रत्न लेकर आये हुए भयंकर निशाचरों तथा घटोत्कचको भी देखा। द्रमिला नैऋतान्‌ दृष्ट्वा दुद्रुवुस्ते भयादिता: । भैमसेनिस्ततो गत्वा माद्रेयं प्राउजलि: स्थित: ।। उस समय उन राक्षसोंको देखकर द्राविड़ सैनिक भयभीत हो सब ओर भागने लगे। इतनेमें ही भीमसेनकुमार घटोत्कच माद्रीनन्दन सहदेवके पास आ हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। प्रीतिमानभवद्‌ दृष्टवा रत्नौघं तं च पाण्डव: | त॑ परिष्वज्य पाणिश्यां दृष्टवा तान्‌ प्रीतिमानभूत्‌ ।। विसृज्य द्रमिलान्‌ सर्वान्‌ गमनायोपचक्रमे ।) पाण्डुकुमार सहदेव वह रत्न-राशि देखकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने घटोत्कचको दोनों हाथोंसे पकड़कर गले लगाया और दूसरे राक्षसरोंकी ओर देखकर भी बड़ी प्रसन्नता प्रकट की। इसके बाद समस्त द्राविड़ सैनिकोंको विदा करके सहदेव वहाँसे लौटनेकी तैयारी करने लगे। न्यवर्तत ततो धीमान्‌ सहदेव: प्रतापवान्‌,तैयारी पूरी हो जानेपर प्रतापी और बुद्धिमान्‌ सहदेव इन्द्रप्रसथ्की ओर चल दिये

বৈশম্পায়ন বললেন—ঘটোৎকচ করজোড়ে রাজা বিভীষণকে প্রণাম করে এবং তাঁর প্রদক্ষিণা করে সেখান থেকে প্রস্থান করল। তারপর, হে রাজন, হৈডিম্বের সঙ্গে ছিয়াশি নিশাচর আনন্দচিত্তে সেই সমস্ত রত্ন পৌঁছে দিতে এল। সমগ্র রত্নভাণ্ডার তুলে নিয়ে ঘটোৎকচ রওনা হল; আর হৈডিম্বও রাক্ষসদের সঙ্গে দ্রুত লঙ্কা ছেড়ে সহদেবের শিবিরের দিকে গেল। মহাসাগর লঙ্ঘন করে তারা সকলেই পাণ্ডব সহদেবের সামনে উপস্থিত হল। সহদেব দেখলেন—ভীমসদৃশ ভয়ংকর নিশাচররা রত্নহার ও রত্নরাশি বহন করছে; হৈডিম্বকেও তিনি দেখলেন। রাক্ষসদের দেখে দ্রাবিড় সৈন্যরা ভয়ে ছত্রভঙ্গ হয়ে পালাল; সেই সময় ভীমপুত্র ঘটোৎকচ মাদ্রীনন্দন সহদেবের কাছে এসে করজোড়ে দাঁড়াল। রত্নের স্তূপ ও ঘটোৎকচকে দেখে সহদেব আনন্দে আপ্লুত হলেন; তিনি দুই হাতে তাকে ধরে আলিঙ্গন করলেন এবং অন্য রাক্ষসদের দেখেও সন্তোষ প্রকাশ করলেন। তারপর দ্রাবিড় সৈন্যদের বিদায় দিয়ে সহদেব যাত্রার প্রস্তুতি নিলেন; সব প্রস্তুতি সম্পন্ন হলে বুদ্ধিমান ও পরাক্রমী সহদেব ইন্দ্রপ্রস্থের দিকে প্রত্যাবর্তন করলেন।

Verse 77

एवं निर्जित्य तरसा सान्त्वेन विजयेन च । करदान्‌ पार्थिवान्‌ कृत्वा प्रत्यागच्छदरिंदम:,इस प्रकार बलपूर्वक जीतकर तथा सामनीतिसे समझा-बुझाकर सब राजाओंको अपने अधीन करके उन्हें करद बनाकर शत्रुदमन माद्रीनन्दन इन्द्रप्रस्थमें वापस आ गये

বৈশম্পায়ন বললেন—এইভাবে কাউকে বলপ্রয়োগে এবং কাউকে সাম-নীতিতে ও বিজয়ের প্রতাপে বশ করে, সকল রাজাকে করদ করে শত্রুদমন সহদেব ইন্দ্রপ্রস্থে প্রত্যাবর্তন করলেন।

Verse 78

(रत्नभारमुपादाय ययौ सह निशाचरै: । इन्द्रप्रस्थं विवेशाथ कम्पयन्निव मेदिनीम्‌ ।। रत्नोंका वह भारी भार साथ लिये निशाचरोंके साथ सहदेवने इन्द्रप्रस्थ नगरमें प्रवेश किया। उस समय वे पैरोंकी धमकसे सारी पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से चल रहे थे। दृष्टवा युधिष्ठिरं राजन्‌ सहदेव: कृताञ्जलि: । प्रह्मोडभिवाद्य तस्थौ स पूजितश्वैव तेन वै ।। राजन! युधिष्ठिरको देखते ही सहदेव हाथ जोड़ नम्रतापूर्वक उनके चरणोंमें पड़ गये। फिर विनीतभावसे उनके समीप खड़े हो गये। उस समय युधिष्ठिरने भी उनका बहुत सम्मान किया। लड़्काप्राप्तान्‌ धनौघांश्व दृष्टवा तान्‌ दुर्लभान्‌ बहून्‌ । प्रीतिमानभवद्‌ राजा विस्मयं च ययौ तदा ।। लंकासे प्राप्त हुई अत्यन्त दुर्लभ एवं प्रचुर धनराशियोंको देखकर राजा युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न और विस्मित हुए। कोटीसहस्रमधिकं हिरण्यस्य महात्मने । विचित्रांस्तु मणींश्वैव गोडजाविमहिषांस्तथा ।।) धर्मराजाय तत्‌ सर्व निवेद्य भरतर्षभ । कृतकर्मा सुखं राजन्नुवास जनमेजय,भरतश्रेष्ठ जनमेजय! उस धनराशिमें सहस्र कोटिसे भी अधिक सुवर्ण था। विचित्र मणि एवं रत्न थे। गाय, भैंस, भेड़ और बकरियोंकी संख्या भी अधिक थी। राजन! इन सबको महात्मा धर्मराजकी सेवामें समर्पित करके कृतकृत्य हो सहदेव सुखपूर्वक राजधानीमें रहने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন—রত্নের ভার বহন করে সহদেব নিশাচরদের সঙ্গে যাত্রা করে ইন্দ্রপ্রস্থে প্রবেশ করলেন, যেন পদচারণায় পৃথিবী কেঁপে উঠল। হে রাজন, যুধিষ্ঠিরকে দেখামাত্র সহদেব করজোড়ে আনন্দসহ প্রণাম করে বিনীতভাবে পাশে দাঁড়ালেন; যুধিষ্ঠিরও তাঁকে সম্মান করলেন। লঙ্কা থেকে আগত দুর্লভ ও বিপুল ধনরাশি দেখে রাজা যুধিষ্ঠির আনন্দিত ও বিস্মিত হলেন। ধর্মরাজের জন্য সহস্র কোটি অপেক্ষাও অধিক স্বর্ণ ছিল, বিচিত্র মণি-রত্ন ছিল, আর গরু, মহিষ, ছাগল ও ভেড়ার সংখ্যাও ছিল প্রচুর। সবই ধর্মরাজকে নিবেদন করে কর্তব্য সম্পন্ন করে সহদেব, হে জনমেজয়, রাজধানীতে সুখে বাস করলেন।

Verse 96

ततस्तेनैव सहितो नर्मदामभितो ययौ । वहाँ महाबली माद्रीकुमारने सेक और अपरसेक देशोंपर विजय पायी और उन सबसे नाना प्रकारके रत्न भेंटमें लिये। तत्पश्चात्‌ सेकाधिपतिको साथ ले उन्होंने नर्मदाकी ओर प्रस्थान किया

বৈশম্পায়ন বললেন—এরপর তিনি সেই (মিত্র/রাজা)-কে সঙ্গে নিয়ে নর্মদা-প্রদেশের দিকে অগ্রসর হলেন। সেখানে মাদ্রীপুত্র মহাবলী সহদেব শক ও অপরশক দেশ জয় করে তাদের কাছ থেকে নানা প্রকার রত্ন কররূপে গ্রহণ করলেন। তারপর শকদের অধিপতিকে সঙ্গে নিয়ে তিনি নর্মদার দিকে যাত্রা করলেন।

Verse 503

सहदेव उवाच यज्ञविध्नमिमं कर्तु ना्हस्त्वं हव्यवाहन । सहदेव बोले--हव्यवाहन! आपको यज्ञमें यह विघ्न नहीं डालना चाहिये

সহদেব বললেন—হে হব্যবাহন! যজ্ঞে এই বিঘ্ন সৃষ্টি করা তোমার উচিত নয়।

Verse 583

सत्कारेण नरव्याप्रं सहदेवं युधाम्पतिम्‌ । अग्निके लौट जानेपर उन्हींकी आज्ञासे राजा नील उस समय वहाँ आये और उन्होंने योद्धाओंके अधिपति पुरुषसिंह सहदेवका सत्कारपूर्वक पूजन किया

সহদেবের আদেশে সেই সময় রাজা নীল সেখানে এসে যথোচিত আতিথ্য ও সম্মানসহ পুরুষসিংহ, যোদ্ধাদের অধিপতি সহদেবকে শ্রদ্ধাভরে পূজা করলেন।

Verse 596

माद्रीसुतस्तत: प्रायाद्‌ विजयी दक्षिणां दिशम्‌ | राजा नीलकी वह पूजा ग्रहणकर और उनपर कर लगाकर विजयी माद्रीकुमार सहदेव दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ गये

তারপর বিজয়ী মাদ্রীসুত সহদেব রাজা নীলের পূজা গ্রহণ করে এবং তার রাজ্যে প্রথামাফিক কর আরোপ করে দক্ষিণ দিকের পথে অগ্রসর হলেন।

Verse 666

निषादान्‌ पुरुषादांश्व कर्णप्रावरणानपि । महाबलशाली महातेजस्वी माद्रीकुमारने शूर्पारक और तालाकट नामक देशोंको जीतते हुए दण्डकारण्यको अपने अधीन कर लिया। तत्पश्चात्‌ समुद्रके द्वीपोंमें निवास करनेवाले म्लेच्छजातीय राजाओं, निषादों तथा राक्षसों, कर्णप्रावरणोंकी- भी परास्त किया

মহাবলশালী ও মহাতেজস্বী মাদ্রীকুমার সহদেব নিষাদ, পুরুষাদ এবং কর্ণপ্রাবরণদেরও পরাস্ত করলেন। শূর্পারক ও তালাকট দেশ জয় করে তিনি দণ্ডকারণ্যকে অধীন করলেন। পরে সমুদ্রদ্বীপে বসবাসকারী ম্লেচ্ছজাতীয় রাজাদের সঙ্গে নিষাদ, রাক্ষস ও কর্ণপ্রাবরণদেরও পরাভূত করলেন।

Verse 756

वासांसि च महाहाणि म्णी श्रैव महाधनान्‌ । तथा उन्होंने नाना प्रकारके रत्न, चन्दन, अगुरुके काष्ठ, दिव्य आभूषण, बहुमूल्य वस्त्र और विशेष मूल्यवान्‌ मणि-रत्न भी उसके साथ भिजवाये

তারা তার সঙ্গে অতি মূল্যবান বস্ত্র ও মহাধনসম মণিও পাঠাল। আরও পাঠাল নানা রকম রত্ন, চন্দন, সুগন্ধি অগুরু-কাঠ, দিব্য অলংকার, দামী বস্ত্র এবং বিশেষভাবে অমূল্য মণি-রত্নভাণ্ডার।

Frequently Asked Questions

The chapter implicitly balances inclusive diplomacy and ritual honor with the risks of prestige competition: assembling rivals under one ceremonial roof can strengthen legitimacy while also intensifying comparative status and political sensitivities.

Effective sovereignty is shown as administrative competence: legitimacy is not only claimed through ritual but sustained through disciplined reception, equitable accommodation, and respectful coordination of diverse stakeholders.

No explicit phalaśruti is presented in this chapter; its function is descriptive and institutional, establishing the ritual-public setting and the social mechanics that support Yudhiṣṭhira’s consecration.