
Chapter 136: Pandava Counter-Encirclement and the Vāyavya-Astra Disruption
Upa-parva: Droṇa-yuddha (Strategic Engagements under Droṇa’s Command)
Saṃjaya reports that Yudhiṣṭhira and Bhīma move to encircle Droṇa’s son (Droṇaputra), prompting Duryodhana to advance with Bharadvāja’s support and intensifying the engagement. Yudhiṣṭhira, in a wrathful strategic posture, directs multiple allied groups toward decisive confrontation, while Bhīma and Arjuna (Kirīṭin) inflict heavy losses on clustered contingents; elephants fall, severed limbs and scattered royal insignia are described in a stylized battlefield register that marks collapsing order. The sonic texture of combat (“tumulaḥ śabdaḥ”) and the imagery of darkness and sleep indicate degraded visibility and coordination. Droṇa, “parama-kruddha,” employs the Vāyavya-astra to disperse attackers, causing the Pāñcālas to retreat in fear even as Bhīma and Arjuna attempt to stabilize the Pandava effort by reorienting against Droṇa with concentrated arrow-showers. Despite resistance by Droṇa and Duryodhana, the Kaurava host repeatedly breaks and flees, with rulers abandoning mounts and withdrawing in panic, illustrating the chapter’s central theme: tactical brilliance and weaponry can temporarily reorder the field, but morale and cohesion remain fragile under sustained pressure.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को बतलाते हैं कि भीमसेन के प्रहार से कर्ण फिर रथहीन होकर अपमानित-सा रणभूमि में खड़ा रह गया—और उसी क्षण उसका पुनः रथारूढ़ होना युद्ध को फिर भड़काता है। → कर्ण दूसरे रथ पर चढ़ते ही भीम को बाण-वृष्टि से ढँक देता है; भीम भी स्वर्ण-परिष्कृत धनुष तानकर अग्नि-सदृश स्थिर खड़ा रहता है। दोनों की प्रतिज्ञा-सी टकराहट के बीच दुर्योधन कर्ण को रथहीन देख अपने भाई दुर्मुख को उसे रथ देने/सहायता करने का आदेश देता है, जिससे युद्ध में नया मोड़ आता है। → दुर्मुख के आगे आने पर भीम का प्रचण्ड प्रतिघात टूट पड़ता है—दुर्मुख का वध होता है और उसी उथल-पुथल में कर्ण भीम के तीक्ष्ण बाणों से व्याकुल होकर भयभीत-सा रण छोड़कर पलायन करता है। → कर्ण का पलायन कौरव-पक्ष की प्रतिष्ठा पर आघात करता है; भीम रणभूमि में अडिग रहकर अपने पराक्रम की छाप छोड़ता है और दुर्मुख के पतन से दुर्योधन के निकटवर्ती बल में कमी आ जाती है। → कर्ण के हटते ही प्रश्न उठता है—क्या वह पुनः लौटकर भीम से निर्णायक प्रतिशोध ले पाएगा, या कौरव-सेना का मनोबल और टूटेगा?
Verse 1
भीस्न्आ तन () अजमना चतुस्त्रिंशर्दाधकशततमो< ध्याय: भीमसेन और कर्णका युद्ध
সঞ্জয় বললেন—কর্ণ সম্পূর্ণরূপে রথহীন হয়ে আবার ভীমসেনের দ্বারা পরাজিত হল। পরে অন্য এক রথে উঠে সে পুনরায় পাণ্ডবকে বিদ্ধ করল।
Verse 2
संजय कहते हैं--राजन्! सब प्रकारसे रथहीन एवं भीमसेनके द्वारा पुनः: पराजित हुए कर्णने दूसरे रथपर बैठकर पाण्डुकुमार भीमसेनको पुनः बींध डाला ।।
সঞ্জয় বললেন—রাজন! রথহীন হয়ে এবং ভীমসেনের দ্বারা পুনরায় পরাজিত হয়ে কর্ণ অন্য রথে আরোহণ করে পাণ্ডুপুত্র ভীমসেনকে আবার বিদ্ধ করল। যেমন দুই মহাগজরাজ দন্তাগ্র দিয়ে পরস্পর মুখোমুখি সংঘর্ষে লিপ্ত হয়, তেমনই কর্ণ ও ভীম পূর্ণ টানা ধনুক থেকে নিক্ষিপ্ত শর দ্বারা একে অপরকে আঘাত করতে লাগল।
Verse 3
अथ कर्ण: शरव्रातैर्भीमसेनं समार्पयत् । ननाद च महानादं पुनर्विव्याध चोरसि,तदनन्तर कर्णने अपने बाणसमूहोंद्वारा भीमसेनको घायल कर दिया। उसने बड़े जोरसे गर्जना की और पुन: भीमसेनकी छातीमें चोट पहुँचायी
তারপর কর্ণ শরসমূহের বর্ষায় ভীমসেনকে বিদ্ধ করল। সে উচ্চনাদে গর্জে উঠে আবার ভীমসেনের বক্ষে পুনরায় আঘাত করল।
Verse 4
तं भीमो दशभिर्बाणै: प्रत्यविध्यदजिद्वागै: । पुनर्विव्याध सप्तत्या शराणां नतपर्वणाम्
তখন ভীম সোজা গতিসম্পন্ন দশটি শর দিয়ে কর্ণকে বিদ্ধ করে প্রতিশোধ নিল। এরপর বাঁকা গাঁটযুক্ত সত্তরটি শর দিয়ে সে আবার কর্ণকে বিদ্ধ করল।
Verse 5
कर्ण तु नवभिर्भीमो भित्त्वा राजन् स्तनान्तरे । ध्वजमेकेन विव्याध सायकेन शितेन ह,राजन्! भीमसेनने कर्णकी छातीमें नौ बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचाकर एक तीखे बाणसे उसकी ध्वजाको भी छेद दिया
রাজন! ভীম নয়টি শর দিয়ে কর্ণের বক্ষদেশে গভীর আঘাত করল, আর তারপর একটি তীক্ষ্ণ শর দিয়ে তার ধ্বজও বিদ্ধ করল।
Verse 6
सायकानां ततः पार्थस्त्रिषष्ट्या प्रत्यविध्यत । तोत्रैरिव महानागं कशाभिरिव वाजिनम्
তারপর পৃথাপুত্র ভীম তেষট্টি শর দিয়ে কর্ণকে আঘাত করল—যেমন মহাগজকে অঙ্কুশে তাড়ানো হয়, বা ঘোড়াকে চাবুকে চালিত করা হয়।
Verse 7
सो5तिविद्धों महाराज पाण्डवेन यशस्विना । सृक्किणी लेलिहन् वीर: क्रोधरक्तान्तलोचन:,महाराज! यशस्वी पाण्डुपुत्रके द्वारा अत्यन्त घायल होकर वीर कर्ण क्रोधसे लाल आँखें करके अपने दोनों जबड़ोंको चाटने लगा
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! যশস্বী পাণ্ডবের দ্বারা অতিশয় বিদ্ধ হয়ে বীর কর্ণ ক্রোধে চোখের কোণ লাল করে ঠোঁট চাটতে লাগল।
Verse 8
तत: शरं महाराज सर्वकायावदारणम् । प्राहिणोद् भीमसेनाय बलायेन्द्र इवाशनिम्
তারপর, মহারাজ! সে ভীমসেনের দিকে এমন এক শর নিক্ষেপ করল যা সমগ্র দেহ বিদীর্ণ করতে সক্ষম—যেন ইন্দ্র বলাসুরের ওপর বজ্র নিক্ষেপ করেছিলেন।
Verse 9
स निर्भिद्य रणे पार्थ सूतपुत्रधनुश्च्युत: । अगच्छद् दारयन् भूमिं चित्रपुडख: शिलीमुख:
রণক্ষেত্রে সূতপুত্রের ধনুক থেকে ছুটে আসা সেই বিচিত্র পালকযুক্ত শিলীমুখ ভীমসেনকে বিদীর্ণ করে, ভূমি চিরে, মাটির ভিতর মিলিয়ে গেল।
Verse 10
ततो भीमो महाबाहु: क्रोधसंरक्तलोचन: । वज्जकल्पां चतुष्किष्कुं गुर्वी रुक्माड़दां गदाम्
তখন মহাবাহু ভীম, ক্রোধে রক্তিম নয়নে, বজ্রসম কঠিন চার হাত লম্বা ও স্বর্ণালঙ্কৃত এক ভারী গদা তুলে নিল।
Verse 11
प्राहिणोत् सूतपुत्राय षडस्रामविचारयन् | तब क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले महाबाहु भीमसेनने चार बित्तेकी बनी हुई वज्जके समान भयंकर तथा सुवर्णमय भुजबंदसे विभूषित छः कोणोंवाली भारी गदा उठाकर उसे बिना विचारे सूतपुत्र कर्णपर चला दिया ।।
তখন ক্রোধে রক্তিম নয়নে মহাবাহু ভীমসেন কোনো বিচার না করেই সূতপুত্র কর্ণের দিকে ছয়-কোণা ভারী গদা নিক্ষেপ করল; আর সেই আঘাতে অধিরথ (কর্ণ) উত্তম অশ্ব ও সুদক্ষ সারথিযুক্ত রথবলকে বিধ্বস্ত করে ফেলল।
Verse 12
ततो भीमो महाबाहु: क्षुराभ्यां भरतर्षभ
তখন মহাবাহু ভীম, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, ক্ষুরধার অস্ত্র তুলে নিলেন—যেন যুদ্ধের বীর্যপরীক্ষায় এক নিষ্ঠুর, নির্ণায়ক বাঁক এসে পড়ল।
Verse 13
हताश्वसूतमुत्सूज्य सरथं पतितध्वजम्
যার অশ্ব ও সারথি নিহত, সেই রথ—পতিত ধ্বজসহ—তিনি পরিত্যাগ করলেন; তা তখন অপমানিত ও নিষ্ফল হয়ে পড়েছিল।
Verse 14
तत्राद्भुतमपश्याम राधेयस्य पराक्रमम्
সেখানে আমরা রাধেয় (কর্ণ)-এর আশ্চর্য পরাক্রম দেখলাম—যুদ্ধের নিষ্ঠুরতার মাঝেও তাঁর বীরত্ব বিস্ময়ের দৃশ্য হয়ে উঠল।
Verse 15
विरथं त॑ नरश्रेष्ठ दृष्टवका55घिरथिमाहवे
রণক্ষেত্রে রথহীন অবস্থায় নরশ্রেষ্ঠ কর্ণকে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখে দুর্যোধন তার ভাই দুর্মুখকে বলল—“দুর্মুখ! রাধানন্দন কর্ণকে ভীমসেন রথচ্যুত করেছে; এই মহারথী নরশ্রেষ্ঠকে রথ দাও।”
Verse 16
दुर्योधनस्ततो राजन्नभ्यभाषत दुर्मुखम् । एष दुर्मुख राधेयो भीमेन विरथीकृत:
তখন, হে রাজন, দুর্যোধন দুর্মুখকে বলল—“দেখো দুর্মুখ! রাধেয় (কর্ণ)কে ভীম রথচ্যুত করেছে।”
Verse 17
ततो दुर्योधनवच: श्रुत्वा भारत दुर्मुख:
তখন, হে ভারত, দুর্যোধনের কথা শুনে দুর্মুখ উত্তর দিল।
Verse 18
त्वरमाणो< भ्ययात् कर्ण भीम॑ चावारयच्छरै: । दुर्मुखं प्रेक्ष्य संग्रामे सूतपुत्रपदानुगम्
তখন ত্বরিত হয়ে কর্ণ অগ্রসর হল এবং শরবৃষ্টিতে ভীমকে রোধ করল। যুদ্ধে সূতপুত্র (কর্ণ)-এর পদাঙ্ক অনুসরণকারী দুর্মুখকে দেখে সে আরও এগিয়ে গেল।
Verse 19
वायुपुत्र: प्रहष्टे> भूत् सक्किणी परिसंलिहन् । भरतनन्दन! दुर्योधनकी यह बात सुनकर दुर्मुख बड़ी उतावलीके साथ कर्णके समीप आ पहुँचा और भीमसेनको अपने बाणोंद्वारा रोका। संग्राममें सूतपुत्रके चरणोंका अनुसरण करनेवाले दुर्मुखको देखकर वायुपुत्र भीमसेन बड़े प्रसन्न हुए। वे अपने दोनों गलफर चाटने लगे |। तत: कर्ण महाराज वारयित्वा शिलीमुखै:
বায়ুপুত্র ভীম অত্যন্ত আনন্দিত হলেন এবং ঠোঁটের দুই কোণ চাটতে লাগলেন। হে ভরতনন্দন! দুর্যোধনের কথা শুনে দুর্মুখ ব্যাকুল হয়ে কর্ণের কাছে এসে পৌঁছাল এবং নিজের বাণে ভীমসেনকে রোধ করল। যুদ্ধে সূতপুত্র (কর্ণ)-এর পদাঙ্ক অনুসরণকারী দুর্মুখকে দেখে বায়ুপুত্র ভীম মহাহর্ষে উল্লসিত হয়ে উঠলেন এবং যুদ্ধলোলুপের মতো ঠোঁটের দুই কোণ চাটতে লাগলেন। তারপর মহারাজ কর্ণ তীক্ষ্ণ শিলীমুখ বাণে (শত্রুকে) সংযত করে যুদ্ধ চালিয়ে গেলেন।
Verse 20
तस्मिन् क्षणे महाराज नवभिर्नतपर्वभि:
সেই মুহূর্তে, হে মহারাজ, (সে/তারা) নয়টি নত-পর্ব বাণে (আঘাতপ্রাপ্ত হল)।
Verse 21
ततस्तमेवाधिरथि: स्यन्दनं दुर्मुखे हते
তারপর, দুর্মুখ নিহত হলে, সেই একই মহারথী রথে আরোহণ করল।
Verse 22
आस्थित: प्रबभौ राजन् दीप्यमान इवांशुमान् । नरेश्वर! दुर्मुखके मारे जानेपर कर्ण उसी रथपर बैठकर देदीप्यमान सूर्यके समान प्रकाशित होने लगा ।।
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, রথে দৃঢ়াসনে বসে কর্ণ দ্যুতিমান সূর্যের মতোই দীপ্ত হয়ে উঠল। কিন্তু দুর্মুখকে ভূমিতে শায়িত, মর্মস্থান বিদীর্ণ, রক্তে সিক্ত দেখে সেই বীর দীর্ঘ ও উষ্ণ নিশ্বাস ফেলতে লাগল এবং কোনো সিদ্ধান্তে স্থির হতে পারল না।
Verse 23
दृष्टवा कर्णोडश्रुपूर्णाक्षो मुहूर्त नाभ्यवर्तत । त॑ गतासुमतिक्रम्य कृत्वा कर्ण: प्रदक्षिणम्
তাকে দেখে কর্ণের চোখ অশ্রুপূর্ণ হয়ে উঠল, আর এক মুহূর্ত সে কিছুই করতে পারল না। তারপর যার প্রাণ চলে গেছে তাকে অতিক্রম করে কর্ণ তার প্রদক্ষিণ করল।
Verse 24
तस्मिंस्तु विवरे राजन् नाराचान् गार्ध्रवासस:
হে রাজন, সেই ফাঁকেই গৃধ্রপক্ষ-পরিহিত যোদ্ধারা নারাচ বাণ নিক্ষেপ করল।
Verse 25
ते तस्य कवचं भित्त्वा स्वर्णचित्रं महौजस:
মহাবলশালী তারা তার স্বর্ণখচিত কবচ বিদীর্ণ করল।
Verse 26
अपिबन सूतपुत्रस्य शोणितं रक्तभोजना:
রক্তভোজী তারা সূতপুত্র কর্ণের রক্ত পান করতে লাগল।
Verse 27
क्रुद्धा इव मनुष्येन्द्र भुजड़ा: कालचोदिता: । नरेन्द्र! वे रक्तका आहार करनेवाले बाण क्रोधभरे कालप्रेरित भुजंगोंके समान सूतपूत्र कर्णका खून पीने लगे ।। प्रसर्पमाणा मेदिन्यां ते व्यरोचन्त मार्गणा:
সঞ্জয় বললেন—হে নরশ্রেষ্ঠ! কালের প্রেরণায় ক্রুদ্ধ সাপের মতো সেই রক্তভোজী শরগুলি যেন সূতপুত্র কর্ণের রক্ত পান করতে লাগল। ভূমিতে ছড়িয়ে পড়তে পড়তে সেই বাণসমূহ ক্রোধ ও নিয়তির তাড়নায় দীপ্ত হয়ে উঠল।
Verse 28
त॑ प्रत्यविध्यद् राधेयो जाम्बूनदविभूषितै:
তখন রাধেয় (কর্ণ) জাম্বূনদ স্বর্ণে বিভূষিত শর দিয়ে পাল্টা আঘাত করল।
Verse 29
ते भीमसेनस्य भुजं सब्यं निर्भिद्य पत्रिण:
সেই পালকযুক্ত শরগুলি ভীমসেনের বাম বাহু বিদ্ধ করল।
Verse 30
ते व्यरोचन्त नाराचा: प्रविशन्तो वसुंधराम्
সেই নারাচ শরগুলি ভূমিতে প্রবেশ করতে করতে দীপ্ত হয়ে উঠল।
Verse 31
स निर्भिन्नो रणे भीमो नाराचैर्मर्मभेदिभि:
রণক্ষেত্রে ভীম মর্মভেদী নারাচ শর দ্বারা বিদ্ধ হল।
Verse 32
स भीमस्त्रिभिरायत्त: सूतपुत्रं पतत्त्रिभि:
সঞ্জয় বললেন—তিন অস্ত্রে আঘাতপ্রাপ্ত ও চাপে পড়েও ভীম, রণধর্মের প্রতিশোধে শক্তির জবাব শক্তি দিয়ে দিতে, সূতপুত্র কর্ণকে তিনটি দ্রুতগামী শরে আক্রমণ করল।
Verse 33
स विह्वलो महाराज कर्णो भीमशराहत:
সঞ্জয় বললেন—হে মহারাজ! ভীমের শরে বিদ্ধ কর্ণ ব্যাকুল ও বিমূঢ় হয়ে পড়ল; যুদ্ধের তীব্রতায় তার স্থৈর্য ভেঙে গেল।
Verse 34
भीमसेनस्तु विस्फार्य चापं हेमपरिष्कृतम्,परंतु अतिरथी भीमसेन अपने सुवर्णभूषित धनुषको ताने हुए प्रज्वलित अग्निके समान युद्धस्थलमें ही खड़े रहे
সঞ্জয় বললেন—ভীমসেন স্বর্ণালংকৃত ধনুক টেনে যুদ্ধক্ষেত্রে অচল হয়ে দাঁড়াল; সে প্রজ্বলিত অগ্নির মতো দীপ্তিমান ছিল।
Verse 35
आहवेडतिरथो<तिष्ठज्ज्वलन्निव हुताशन:,परंतु अतिरथी भीमसेन अपने सुवर्णभूषित धनुषको ताने हुए प्रज्वलित अग्निके समान युद्धस्थलमें ही खड़े रहे
সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধের ঘনঘটায় সেই শ্রেষ্ঠ অতিরথ, ধৈর্যবান বীর, অচল হয়ে দাঁড়িয়ে রইল; সে যজ্ঞাগ্নির মতো জ্বলছিল—ক্রোধে নয়, সংকল্পে সংযত।
Verse 116
गदया भारत: क्रुद्धो वज्ेणेन्द्र इवासुरान् | जैसे कुपित हुए इन्द्रने वज़्से असुरोंका वध किया था
সঞ্জয় বললেন—ক্রুদ্ধ ভরতবংশীয় ভীম গদা হাতে ইন্দ্রের বজ্রের মতোই আঘাত করল, যেমন ইন্দ্র অসুরদের বধ করেন; আর রণে কর্ণের উৎকৃষ্ট, সুসংযত অশ্বগুলিকে নিধন করল।
Verse 126
ध्वजमाधिरथेश्छित्त्वा सूतम भ्यहनच्छरै: । भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् महाबाहु भीमसेनने दो छुरोंसे कर्णकी ध्वजा काटकर अपने बाणोंद्वारा उसके सारथिको भी मार डाला
সঞ্জয় বললেন—আধিরথ কর্ণের ধ্বজা কেটে ভীমসেন তীরবৃষ্টিতে তার সারথিকেও নিধন করল। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যুদ্ধের নির্মম নীতিতে প্রতিপক্ষের বীরত্বের চিহ্ন ও সহায়-শক্তিকে ভেঙে দেওয়াও কৌশলেরই এক ধাপ।
Verse 133
विस्फारयन् धनु: कर्णस्तस्थौ भारत दुर्मना: । भारत! घोड़े और सारथिके मारे जाने तथा ध्वजाके गिर जानेपर कर्ण उस रथको छोड़कर धनुषकी टंकार करता हुआ दुःखी मनसे वहाँ खड़ा हो गया
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত! কর্ণ ধনুকের টংকার তুলতে তুলতে বিষণ্ণচিত্তে সেখানে দাঁড়িয়ে রইল। ঘোড়া ও সারথি নিহত, ধ্বজা পতিত—সে রথ ত্যাগ করল; তবু অস্ত্রের ধ্বনিতে তার সংকল্প আঁকড়ে রইল।
Verse 134
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि कर्णापयाने चतुस्त्रिंशदाधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বে, জয়দ্রথবধপর্বের অন্তর্গত, কর্ণাপয়ান প্রসঙ্গে একশো ছত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 143
विरथो रथिनां श्रेष्ठो वारयामास यद् रिपुम् | वहाँ हमलोगोंने राधानन्दन कर्णका अद्भुत पराक्रम देखा। रथियोंमें श्रेष्ठ उस वीरने रथहीन होनेपर भी अपने शत्रुको आगे नहीं बढ़ने दिया
সঞ্জয় বললেন—রথহীন হয়েও রথীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ সেই বীর শত্রুকে রোধ করল; তাকে অগ্রসর হতে দিল না। সেখানে আমরা রাধানন্দন কর্ণের আশ্চর্য পরাক্রম প্রত্যক্ষ করলাম।
Verse 166
त॑ रथेन नरश्रेष्ठं सम्पादय महारथम् । राजन! नरश्रेष्ठ कर्णको युद्धस्थलमें रथहीन खड़ा देख दुर्योधनने अपने भाई दुर्मुखसे कहा--*दुर्मुख! यह राधानन्दन कर्ण भीमसेनके द्वारा रथसे वंचित कर दिया गया है। इस महारथी नरश्रेष्ठ वीरको रथसे सम्पन्न करो”
সঞ্জয় বললেন—“এই নরশ্রেষ্ঠ মহারথীকে রথ দাও।” রাজন! যুদ্ধক্ষেত্রে নরশ্রেষ্ঠ কর্ণকে রথহীন দাঁড়িয়ে থাকতে দেখে দুর্যোধন তার ভাই দুর্মুখকে বলল—“দুর্মুখ! রাধানন্দন কর্ণকে ভীমসেন রথচ্যুত করেছে। এই বীর মহারথীকে রথে সমৃদ্ধ কর।”
Verse 193
दुर्मुखाय रथं तूर्ण प्रेषयामास पाण्डव: । महाराज! तदनन्तर कर्णको अपने बाणोंद्वारा रोककर पाण्डुकुमार भीम तुरंत ही अपने रथको दुर्मुखके पास ले गये
সঞ্জয় বললেন— পাণ্ডব দ্রুত দুর্মুখের দিকে রথ চালালেন। মহারাজ, তখনই কর্ণ বাণবৃষ্টিতে তাঁকে রোধ করল; তবু পাণ্ডুপুত্র ভীম এক মুহূর্তও দেরি না করে নিজের রথ সোজা দুর্মুখের কাছে নিয়ে গেলেন।
Verse 203
सुमुखीैर्दुर्मुख॑ भीम: शरैर्निन्ये यमक्षयम् | राजन! फिर झुकी हुई गाँठवाले नौ सुमुख बाणोंद्वारा भीमसेनने दुर्मुखको उसी क्षण यमलोक पहुँचा दिया
সঞ্জয় বললেন— রাজন, ভীমসেন ‘সুমুখ’ নামক বাণে দুর্মুখকে বিদ্ধ করে সেই মুহূর্তেই তাকে যমের অক্ষয় ধামে পাঠিয়ে দিলেন।
Verse 233
दीर्घमुष्णं श्वसन् वीरो न किंचित् प्रत्यपद्यत । दुर्मुखका मर्मस्थान विदीर्ण हो गया था। वह खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर पड़ा था। उसे उस दशामें देखकर कर्णके नेत्रोंमें आँसू भर आया। वह दो घड़ीतक विपक्षीका सामना न कर सका। जब उसके प्राणपखेरू उड़ गये
সঞ্জয় বললেন— বীরটি দীর্ঘ, উত্তপ্ত শ্বাস নিতে নিতে কোনো স্থির সিদ্ধান্তে পৌঁছাতে পারল না। দুর্মুখের মর্মস্থান বিদীর্ণ হয়েছিল; সে রক্তে সিক্ত হয়ে মাটিতে পড়ে ছিল। সেই দশা দেখে কর্ণের চোখে অশ্রু ভরে উঠল; দু’দণ্ড সে প্রতিপক্ষের মুখোমুখি হতে পারল না। যখন তার প্রাণ সম্পূর্ণরূপে নিঃশেষ হল, তখন কর্ণ সেই দেহের প্রদক্ষিণ করে এগিয়ে গেল।
Verse 243
प्राहिणोत् सूतपुत्राय भीमसेनश्षतुर्दश । राजन! इसी अवसरमें भीमसेनने सूतपुत्रपर गीधकी पाँखवाले चौदह नाराच चलाये
সঞ্জয় বললেন— রাজন, সেই সময়েই ভীমসেন সূতপুত্র কর্ণের দিকে গৃধ্রপক্ষ-সদৃশ পালকযুক্ত চৌদ্দটি নারাচ নিক্ষেপ করলেন।
Verse 283
चतुर्दशभिरत्युग्रैनराचैरविचारयन् । तब कर्णने कुछ विचार न करके अत्यन्त भयंकर एवं सुवर्णभूषित चौदह नाराचोंसे भीमसेनको भी घायल कर दिया
সঞ্জয় বললেন— কোনো চিন্তা না করেই কর্ণ অত্যন্ত ভয়ংকর চৌদ্দটি নারাচ বাণে ভীমসেনকে আঘাত করে আহত করল।
Verse 293
प्राविशन् मेदिनीं भीमा: क्रीज्च॑ पत्ररथा इव । वे पंखधारी भयानक बाण भीमसेनकी बायीं भुजा छेदकर पृथ्वीमें समा गये, मानो पक्षी क्रौंच पर्वतको जा रहे हों
সঞ্জয় বললেন—ভয়ংকর ডানাওয়ালা সেই বাণগুলি প্রচণ্ড বেগে ভীমসেনের বাম বাহু ছেদন করে পৃথিবীতে প্রবেশ করল, যেন ক্রৌঞ্চ পর্বতের দিকে উড়ে যাওয়া পাখি।
Verse 303
गच्छत्यस्तं दिनकरे दीप्यमाना इवांशव: । वे नाराच इस पृथ्वीमें प्रवेश करते समय वैसी ही शोभा पा रहे थे, जैसे सूर्यके डूबते समय उनकी चमकीली किरणें प्रकाशित होती हैं
সঞ্জয় বললেন—সূর্য অস্ত যেতে থাকলে, সেই নারাচগুলি পৃথিবীতে প্রবেশ করার সময় এমন দীপ্তি ধারণ করল, যেন অস্তকালে সূর্যের উজ্জ্বল কিরণ।
Verse 313
सुस्राव रुधिरं भूरि पर्वतः सलिलं यथा । मर्मभेदी नाराचोंसे रणक्षेत्रमें विदीर्ण हुए भीमसेन उसी प्रकार भूरि-भूरि रक्त बहाने लगे, जैसे पर्वत झरनेका जल गिराता है
সঞ্জয় বললেন—মর্মভেদী নারাচে রণক্ষেত্রে বিদীর্ণ ভীমসেনের দেহ থেকে প্রচুর রক্ত এমনভাবে ঝরতে লাগল, যেমন পর্বত থেকে ঝরনার জল নামে।
Verse 326
सुपर्णवेगैर्विव्याध सारथिं चास्य सप्तभि: । तब भीमसेनने भी प्रयत्नपूर्वक गरुड़के समान वेगशाली तीन बाणोंद्वारा सूतपुत्र कर्णको तथा सात बाणोंसे उसके सारथिको भी घायल कर दिया
সঞ্জয় বললেন—তখন ভীমসেন গরুড়ের বেগসম তীক্ষ্ণ বাণে সূতপুত্র কর্ণকে বিদ্ধ করল, আর সাতটি বাণে তার সারথিকেও আহত করল।
Verse 336
प्राद्रवज्जवनैरश्वे रणं हित्वा महाभयात् । महाराज! भीमके बाणोंसे आहत होकर कर्ण विह्नल हो उठा और महान् भयके कारण युद्ध छोड़कर शीघ्रगामी घोड़ोंकी सहायतासे भाग निकला
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! ভীমের বাণে আঘাত পেয়ে কর্ণ বিচলিত হয়ে উঠল; মহাভয়ে যুদ্ধ ত্যাগ করে দ্রুতগামী অশ্বের ভরসায় সে রণক্ষেত্র থেকে পালিয়ে গেল।
Verse 2536
हेमपुड्खा महाराज व्यशोभन्त दिशो दश । महाराज! वे महातेजस्वी सुनहरी पाँखवाले बाण उसके सुवर्णजटित कवचको छिज्न- भिन्न करके दसों दिशाओंको सुशोभित करने लगे
মহারাজ! সোনালি পালকযুক্ত সেই মহাতেজস্বী বাণগুলি প্রতিপক্ষের স্বর্ণখচিত কবচ ছিন্নভিন্ন করে দশ দিককে শোভিত করতে লাগল।
Verse 2736
अर्धप्रविष्टा: संरब्धा बिलानीव महोरगा: । जैसे क्रोधमें भरे हुए महान् सर्प बिलोंमें प्रवेश करते समय आधे ही घुस पाये हों, उसी प्रकार वे बाण पृथ्वीमें घुसते हुए शोभा पा रहे थे
যেমন ক্রোধে ফুঁসতে থাকা মহাসাপ গর্তে ঢুকতে গিয়ে অর্ধেক ঢুকে মাঝপথে আটকে থাকে, তেমনই সেই বাণগুলি মাটিতে গেঁথে অর্ধপ্রবিষ্ট অবস্থায় শোভা পাচ্ছিল।
The chapter frames a duty-conflict between decisive military action (protecting one’s side through concentrated force and extraordinary weapons) and the ethical cost of tactics that amplify fear and disorder, especially when cohesion breaks and non-elite troops are overwhelmed.
Agency in conflict is limited by systemic factors—visibility, morale, and chain-of-command. Even superior force or specialized astras cannot guarantee stable outcomes when collective psychology and coordination degrade.
No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the chapter’s meta-significance is contextual—documenting how tactical escalation and psychological rupture function as narrative mechanisms driving the war’s irreversible momentum.
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