
Bhūriśravas–Sātyaki Saṃvāda and Duel; Arjuna’s Intervention (भूरिश्रवाः–सात्यकि संवादः, युद्धम्, अर्जुन-हस्तक्षेपः)
Upa-parva: Sātyaki–Bhūriśravas Saṃgrāma (Episode: Duel and Intervention)
Saṃjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that Bhūriśravas, seeing the battle-ardent Sātyaki approaching, rushes forward in anger and issues a prolonged challenge, forecasting Sātyaki’s defeat and the demoralization of the Pāṇḍava side. Sātyaki replies with controlled derision, dismissing empty boasting and inviting action. The duel escalates through multiple combat registers: intense arrow-exchanges likened to mutual storm-clouds, progressive damage to mounts and weapons, and a transition to dismounted sword-and-shield combat. The fighters circle in tactical patterns, grapple, and strike with trained holds, producing a loud clash compared to rock and thunderbolt. As Sātyaki’s weapons diminish and fatigue sets in, Bhūriśravas gains dominance and drags him, prompting Kṛṣṇa to call Arjuna’s attention to Sātyaki’s peril and to urge protection of Arjuna’s associate. Arjuna acknowledges competing focus on Jayadratha yet acts on Kṛṣṇa’s instruction: with an arrow, he severs Bhūriśravas’ arm holding the sword. The chapter thus crystallizes a battlefield dharma problem: intervention in a duel under conditions of exhaustion and asymmetry, framed by strategic necessity and alliance-duty.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहता है—राजन्, एकाग्रचित्त होकर सुनो: जिस घड़ी कौरव-सेना का भयंकर निनाद उठा, उसी क्षण शैनेय सात्यकि बिजली की तरह कृतवर्मा पर टूट पड़ा, मानो पाण्डवों की डूबती आशा का दीपक स्वयं रण में उतर आया हो। → दुर्योधन के आदेश से त्रिगर्त और अन्य दल ‘मदर्थे त्यक्तजीविता’ होकर सात्यकि को घेरते हैं। सात्यकि के वज्र-स्पर्शी बाण हाथियों की गजसेना को उथला देते हैं—कोई चक्कर काटता है, कोई लड़खड़ाता है, कोई धराशायी होता है; कौरव योद्धा विमुख होकर इधर-उधर भागते दिखते हैं। पर इसी कोलाहल में जलसंध जैसे महाबली आगे बढ़ते हैं और सात्यकि को रोकने का संकल्प लेते हैं। → जलसंध क्रोध में भरकर शिनि-पौत्र सात्यकि की विशाल छाती पर भारी, भार-सह बाणों से गहरा आघात करता है; फिर भी ‘नाकम्पत महाबाहुः’—सात्यकि विचलित नहीं होता। उसी अडिग क्षण में सात्यकि प्रत्याघात कर जलसंध का वध कर देता है, और रणभूमि पर यह अद्भुत-सा दृश्य बन जाता है कि घायल होकर भी धर्म-रथ का सारथि-योद्धा डगमगाता नहीं। → जलसंध के गिरते ही त्रिगर्तों की गजसेना का संहार पूर्ण होता है; हाथी दल टूटकर भागता है और कौरव पंक्तियाँ बिखरती हैं। कृतवर्मा भी सात्यकि के वेग से दबता है—कौरव पक्ष की ‘आशा’ क्षीण और पाण्डव पक्ष की ‘प्राणवायु’ प्रबल होती है। → पर रण का शोर थमता नहीं—कृतवर्मा और शेष कौरव-वीर पुनः संगठित होने को हैं; सात्यकि आगे किस घेराबंदी में फँसेगा, यह अगले प्रसंग की धार पर छोड़ दिया जाता है।
Verse 1
ऑपन--माज बछ। अप ऋाल पञ्चदशाधिकशततमो< ध्याय: सात्यकिके द्वारा कृतवर्माकी पराजय
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, তুমি যা জিজ্ঞাসা করছ, একাগ্রচিত্তে তা শোনো। মহাত্মা হার্দিক্য (কৃতবর্মা) যখন পাণ্ডবসেনাকে তাড়িয়ে দিলেন, পাণ্ডববাহিনী লজ্জায় নত হল এবং তোমার সৈন্যরা আনন্দে উল্লসিত হল—তখন সেই অগাধ সৈন্য-সমুদ্রে আশ্রয় খুঁজতে থাকা পাণ্ডবদের জন্য সাত্যকি বীর্যে এক দ্বীপের মতো আশ্রয়দাতা হয়ে উঠল। এখন তার পরাক্রম শোনো।
Verse 2
लज्जयावनते चापि प्रहृष्टेश्नापि तावकै: । डीपो य आसीत् पाण्डूनामगाथे गाधमिच्छताम्
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, যখন পাণ্ডবসেনা লজ্জায় নত হল এবং তোমার সৈন্যরা আনন্দে প্রফুল্ল হয়ে উঠল, তখন সেই অগাধ সৈন্য-সমুদ্রে তল খুঁজতে থাকা পাণ্ডবদের জন্য সাত্যকি দ্বীপের মতো আশ্রয় হয়ে দাঁড়াল।
Verse 3
श्रुत्वा स निनदं भीम॑ तावकानां महाहवे । शैनेयस्त्वरितो राजन् कृतवर्माणम भ्ययात्,राजन्! उस महासमरमें आपके सैनिकोंका भयंकर सिंहनाद सुनकर सात्यकिने तुरंत ही कृतवर्मापर आक्रमण किया
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, মহাযুদ্ধে তোমার সৈন্যদের সেই ভয়ংকর গর্জন শুনে শৈনেয় সাত্যকি তৎক্ষণাৎ ত্বরিত হয়ে কৃতবর্মার দিকে ধেয়ে গেল।
Verse 4
उवाच सारथिं तत्र क्रोधामर्षसमन्वित: । हार्दिक्याभिमुखं सूत कुरु मे रथमुत्तमम्,उन्होंने क्रोध और अमर्षमें भरकर वहाँ सारथिसे कहा--“सूत! तुम मेरे उत्तम रथको कृतवर्माके सामने ले चलो
ক্রোধ ও অপমানবোধে দগ্ধ হয়ে সে সেখানে সারথিকে বলল—“হে সূত! আমার উৎকৃষ্ট রথটি হার্দিক্য (কৃতবর্মা)-র সম্মুখে নিয়ে চলো।”
Verse 5
कुरुते कदनं पश्य पाण्डुसैन्ये हामर्षित: । एनं जित्वा पुनः सूत यास्यामि विजयं प्रति,“देखो, वह अमर्षयुक्त होकर पाण्डव-सेनामें संहार मचा रहा है। सारथे! इसे जीतकर मैं पुनः अर्जुनके पास चलूँगा”
“দেখো, অপমানবোধে উন্মত্ত হয়ে সে পাণ্ডবসেনায় সংহার ঘটাচ্ছে। হে সারথি! একে জয় করে আমি আবার বিজয়ের পথে—অর্জুনের দিকে—যাব।”
Verse 6
एवमुक्ते तु वचने सूतस्तस्य महामते । निमेषान्तरमात्रेण कृतवर्माणम भ्ययात्,महामते! सात्यकिके ऐसा कहनेपर सारथि पलक गिरते-गिरते रथ लेकर कृतवमकि पास जा पहुँचा
হে মহামতি! এ কথা বলা মাত্রই তার সারথি চোখের পলকে রথ চালিয়ে কৃতবর্মার কাছে পৌঁছে গেল।
Verse 7
कृतवर्मा तु हार्दिक्य: शैनेयं निशितै: शरै: । अवाकिरत् सुसंक्रुद्धस्ततो5क़्रुद्धयबत् स सात्यकि:
হার্দিক্য কৃতবর্মা প্রবল ক্রোধে শৈনেয় (সাত্যকি)-র উপর তীক্ষ্ণ শরবর্ষণ করল; তাতে সাত্যকির ক্রোধও দাউদাউ করে উঠল।
Verse 8
अथाशु निशितं भल्लं शैनेय: कृतवर्मण: । प्रेषयामास समरे शरांश्व चतुरो5परान्,उन्होंने तुरंत ही कृतवर्मापर समरभूमिमें एक तीखे भल्लका प्रहार किया। फिर चार बाण और मारे
তখন শৈনেয় তৎক্ষণাৎ সমরে কৃতবর্মার দিকে এক ধারালো ভল্ল নিক্ষেপ করল, আর তার পেছনে আরও চারটি শর পাঠাল।
Verse 9
ते तस्य जध्निरे वाहान् भल्लेनास्याच्छिनद् धनु: । पृष्ठरक्ष॑ं तथा सूतमविध्यन्निशितै: शरै:
সেই চারটি বাণে কৃতবর্মার চারটি ঘোড়াই নিহত হল। সাত্যকি ভল্লবাণে তার ধনুক কেটে দিলেন। তারপর তীক্ষ্ণ শর দিয়ে তার পৃষ্ঠরক্ষক ও সারথিকেও বিদ্ধ করে ক্ষতবিক্ষত করলেন।
Verse 10
ततस्तं विरथं कृत्वा सात्यकि: सत्यविक्रम: । सेनामस्यार्दयामास शरै: संनतपर्वभि:,तदनन्तर सत्यपराक्रमी सात्यकिने कृतवर्माको रथहीन करके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसकी सेनाको पीड़ित करना आरम्भ किया
তারপর সত্যবিক্রমী সাত্যকি কৃতবর্মাকে রথহীন করে, বাঁকা গাঁটওয়ালা বাণে তার সেনাদলকে পীড়িত ও চূর্ণ করতে লাগলেন।
Verse 11
अभज्यताथ पृतना शैनेयशरपीडिता । ततः प्रायात् स त्वरित: सात्यकि: सत्यविक्रम:,सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो कृतवर्माकी सेना भाग खड़ी हुई। तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी सात्यकि तुरंत आगे बढ़ गये
শৈনেয়ের বাণে পীড়িত হয়ে কৃতবর্মার সেনা ভেঙে ছত্রভঙ্গ হয়ে পালাতে লাগল। তখন সত্যবিক্রমী সাত্যকি দ্রুত অগ্রসর হলেন।
Verse 12
शृणु राजन् यदकरोत् तव सैन्येषु वीर्यवान् । अतीत्य स महाराज द्रोणानीकमहार्णवम्,महाराज! पराक्रमी सात्यकिने द्रोणाचार्यके सैन्य-समुद्रको लाँधकर आपकी सेनाओंमें जो पराक्रम किया, उसका वर्णन सुनिये
হে রাজন, শোনো—তোমার সৈন্যদের মধ্যে সেই বীর কী কাণ্ড করলেন। হে মহারাজ, দ্রোণের সমুদ্রসম বিশাল ব্যূহ অতিক্রম করে তিনি তোমার সেনার ভিতরে প্রবেশ করে পরাক্রম প্রদর্শন করলেন।
Verse 13
पराजित्य तु संहृष्ट: कृतवर्माणमाहवे । यन्तारमब्रवीच्छूर: शनैर्याहीत्यसम्भ्रमम्,उस महासमरमें कृतवर्माको पराजित करके हर्षमें भरे हुए शूरवीर सात्यकि बिना किसी घबराहटके सारथिसे बोले--'सूत! धीरे-धीरे चलो'
সেই মহাসমরে কৃতবর্মাকে পরাজিত করে আনন্দে উল্লসিত বীর সাত্যকি, বিন্দুমাত্র বিচলিত না হয়ে, সারথিকে বললেন—“সূত, ধীরে ধীরে চলো।”
Verse 14
दृष्टवा तु तव तत् सैन्यं रथाश्वद्धिपसंकुलम् । पदातिजनसम्पूर्णमब्रवीत् सारथिं पुन:,रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंसे भरी हुई आपकी सेनाको देखकर सात्यकिने पुनः सारथिसे कहा--
রথ, অশ্ব ও গজে ঘন, পদাতিকের ভিড়ে পরিপূর্ণ তোমার সেই সেনাদল দেখে সাত্যকি পুনরায় সারথিকে বলল।
Verse 15
यदेतन्मेघसंकाशं द्रोणानीकस्य सव्यतः । सुमहत् कुञ्जरानीकं यस्य रुक्मरथो मुखम्
হে সূত! দ্রোণাচার্যের ব্যূহের বাম প্রান্তে মেঘপুঞ্জের ন্যায় ঘন ও বিশাল যে গজবাহিনী দেখা যাচ্ছে, তার অগ্রভাগে রুক্মরথ দাঁড়িয়ে আছে। সেখানে বহু দুর্নিবার বীর রয়েছে; দুর্যোধনের আদেশে তারা প্রাণের মমতা ত্যাগ করে যুদ্ধের জন্য প্রস্তুত।
Verse 16
एते हि बहव: सूत दुर्निवाराश्च संयुगे । दुर्योधनसमादिष्टा मदर्थे त्यक्तजीविता:
হে সূত! এরা বহু যোদ্ধা, আর যুদ্ধে এদের নিবৃত্ত করা অত্যন্ত কঠিন। দুর্যোধনের আদেশে এরা আমার জন্য প্রাণের মমতা ত্যাগ করেছে।
Verse 17
(न चाजित्वा रणे होतान् शक: प्राप्तुं जयद्रथ: । नापि पार्थों मया सूत शक््य: प्राप्तुं कथंचन ।।
হে সূত! যুদ্ধে আহূত এই যোদ্ধাদের পরাস্ত না করলে না জয়দ্রথকে পাওয়া যাবে, না কোনোভাবে আমি অর্জুনের কাছে পৌঁছতে পারব। এরা একত্রে সুসংঘবদ্ধ হয়ে দাঁড়িয়ে আছে—সমস্ত বিদ্যায় নিপুণ; রাজপুত্র, মহাধনুর্ধর, সকলেই বিক্রান্ত যোদ্ধা। ত্রিগর্তদের সেই উদার রথযোদ্ধারা সোনায় অলংকৃত ধ্বজা বহন করছে।
Verse 18
मामेवाभिमुखावीरा योत्स्यमाना व्यवस्थिता: । अत्र मां प्रापय क्षिप्रमश्वांश्रोदय सारथे
ওই বীরেরা যুদ্ধ করতে উদ্যত হয়ে কেবল আমার দিকেই মুখ করে সারিবদ্ধ দাঁড়িয়ে আছে। হে সারথি, আমাকে সেখানে শীঘ্র পৌঁছে দাও; অশ্বদের দ্রুত চালাও।
Verse 19
ततः प्रायाच्छनै: सूत: सात्वतस्य मते स्थित:
তখন সারথি সাত্বত (শ্রীকৃষ্ণ)-এর অভিপ্রায়ে স্থিত থেকে ধীরে ধীরে রথ অগ্রসর করল।
Verse 20
तमूहु: सारथेरवश्या वल्गमाना हयोत्तमा:
তারা বলল—যে শ্রেষ্ঠ অশ্বগুলি সাধারণত সারথির বশে থাকে, সেগুলি এখন অস্থির হয়ে লাফাতে লাফাতে এগিয়ে ছুটছে।
Verse 21
आपततन्तं रणे तं तु शड्खवर्णहयोत्तमै:
শঙ্খের ন্যায় শুভ্রবর্ণ শ্রেষ্ঠ অশ্বে আরূঢ় হয়ে রণক্ষেত্রে অগ্রসরমান সাত্যকিকে ত্রিগর্তদেশীয় বীরেরা গজসেনাসহ চারিদিক থেকে ঘিরে ফেলল।
Verse 22
परिवद्रुस्तत: शूरा गजानीकेन सर्वतः । किरन्तो विविधांस्तीक्ष्णानू सायकॉल्लघुवेधिन:
তখন বীরেরা গজসেনা নিয়ে চারিদিক থেকে ধেয়ে এসে তাকে ঘিরে ফেলল; দ্রুত লক্ষ্যভেদী তারা নানাবিধ তীক্ষ্ণ শর নিক্ষেপ করে বর্ষণ করতে লাগল।
Verse 23
सात्वतो निशितैर्बाणैर्गजानीकमयोधयत् | पर्वतानिव वर्षेण तपान्ते जलदो महान्,सात्यकिने भी पैने बाणोंद्वारा गजसेनाके साथ युद्ध प्रारम्भ किया, मानो वर्षाकालमें महान् मेघ पर्वतोंपर जलकी धारा बरसा रहा हो
তখন সাত্বত (সাত্যকি) তীক্ষ্ণ শর দ্বারা গজসেনার সঙ্গে যুদ্ধ আরম্ভ করল—যেন গ্রীষ্মান্তে মহামেঘ পর্বতশ্রেণির উপর জলধারা বর্ষণ করছে।
Verse 24
वज्राशनिसमस्पर्शर्वध्यमाना: शरैर्गजा: । प्राद्रवन् रणमुत्सूज्य शिनिवीरसमीरितै:
Sañjaya said: Struck by arrows whose touch was like a thunderbolt, the elephants—being grievously wounded—broke into flight, abandoning the battlefield, driven into panic by the assault of Śinivīra’s warrior.
Verse 25
शिनिवंशके वीर सात्यकिद्वारा चलाये हुए वज् और बिजलीके समान स्पर्शवाले उन बाणोंकी मार खाकर उस सेनाके हाथी युद्धका मैदान छोड़कर भागने लगे ।।
Sañjaya said: Struck by the arrows loosed by the hero Sātyaki of the Śini line—arrows whose touch was like thunderbolt and lightning—the elephants of that host abandoned the battlefield and fled. Their tusks were shattered; streams of blood ran from their limbs; their temples and frontal globes were split; ears, mouths, and trunks were torn and mangled. Their drivers were slain and their banners and pennants fell. Vital spots were pierced, bells were broken, great standards were cut down; riders were killed and the howdahs slipped and dropped. In that condition, O King, the elephants ran off and sought refuge in different directions—showing how, in war, even the mightiest bodies collapse when violence overwhelms restraint and order.
Verse 26
सम्भिन्नमर्मघण्टाश्न विनिकृत्तमहाध्वजा: । हतारोहा दिशो राजन् भेजिरे भ्रष्टकम्बला:
Sanjaya said: O King, those elephants, their vital spots torn open and their bell-armor shattered, with their great standards hewn down, fled in different directions. Their riders had been slain, and their saddle-cloths had slipped away—so, broken and routed, they sought safety by scattering across the field. The scene underscores the pitiless momentum of battle, where even the mightiest mounts become helpless once protection, leadership, and order collapse.
Verse 27
रुवन्तो विविधान् नादान् जलदोपमनिः:स्वना: । नाराचैर्वत्सदन्तैश्व भल्लैरञण्जलिकैस्तथा
Sañjaya said: “Crying out in many different ways, their sounds resembling the rumbling of thunderclouds, they were pierced by Sātyaki’s arrows—nārāca, vatsadanta, bhalla, and añjalika—and thus, wounded and terrified, they raised varied lamentations as they fled.”
Verse 28
क्षुप्रैरर्धचन्द्रैश्न सात्वतेन विदारिता: । क्षरन्तोडसृक् तथा मूत्रं पुरीषं च प्रदुद्रुवु:
Sañjaya said: Torn open by the Sātvata warrior (Sātyaki) with razor-headed and half-moon arrows, they fled in panic—bleeding, and in terror even voiding urine and excrement. The verse underscores the brutal immediacy of battle and the collapse of bodily and mental control under fear.
Verse 29
बभ्रमुश्न स्खलुश्नान्ये पेतुर्मम्लुस्तथापरे । एवं तत् कुञ्जरानीकं युयुधानेन पीडितम्
কিছু হাতি বিভ্রান্ত হয়ে টলতে টলতে হোঁচট খেল; কেউ পড়ে গেল, আর কেউ ডুবে গিয়ে নিস্তেজ হয়ে পড়ল। এইভাবে যুযুধানের আঘাতে সেই সমগ্র গজবাহিনী ভীষণভাবে পীড়িত হল।
Verse 30
तस्मिन् हते गजानीके जलसंधो महाबल:
যখন সেই গজবাহিনী নিহত হল, তখন মহাবলী জলসন্ধ—নিজ বাহিনী ভেঙে পড়তে দেখে—যুদ্ধের কোলাহলের মধ্যে প্রতিক্রিয়ায় উদ্যত হল।
Verse 31
रुक्मवर्मधर: शूरस्तपनीयाड्रद: शुचि:
সেই বীর, নির্মল দীপ্তিসম্পন্ন, স্বর্ণ-কবচ পরিধান করেছিল এবং পরিশুদ্ধ সোনার বাহুবন্ধে শোভিত ছিল। তার বক্ষে ঝলমলে নিষ্ক, আর কণ্ঠে দীপ্তিমান কণ্ঠসূত্র—যুদ্ধের জন্য ঐশ্বর্যে সজ্জিত।
Verse 32
कुण्डली मुकुटी खड्गी रक्तचन्दनरूषित: । शिरसा धारयन् दीप्तां तपनीयमयीं स्रजम्
কর্ণকুণ্ডল ও মুকুটে বিভূষিত, হাতে খড়্গ ধারণ করে, রক্তচন্দনে লেপিত, সে মাথায় শুদ্ধ সোনার নির্মিত দীপ্তিময় মালা বহন করছিল।
Verse 33
चापं च रुक्मविकृतं विधुन्वन् गजमूर्थनि
সোনায় অলংকৃত ও নির্মিত ধনুক ঝাঁকাতে ঝাঁকাতে সে হাতির মস্তকে দাঁড়িয়ে রইল—যুদ্ধের কোলাহলে নির্ভীক সংকল্প প্রকাশ করে।
Verse 34
अशोभत महाराज सविद्युदिव तोयद: । महाराज! हाथीकी पीठपर बैठकर अपने सोनेके बने हुए धनुषको हिलाता हुआ जलसंध बिजलीसहित मेघके समान शोभा पा रहा था ।। ३३ $ || तमापतन्तं सहसा मागधस्य गजोत्तमम्
সঞ্জয় বললেন—হে মহারাজ, তিনি বিদ্যুৎ-সহ মেঘের ন্যায় শোভিত হচ্ছিলেন। তখনই মগধ পক্ষের শ্রেষ্ঠ হাতিটি হঠাৎ ধেয়ে এল।
Verse 35
नागं निवारितं दृष्टवा शैनेयस्य शरोत्तमै:
সঞ্জয় বললেন—শৈনেয়ের শ্রেষ্ঠ শর দ্বারা সেই নাগসদৃশ বীরকে নিবৃত্ত হতে দেখে যুদ্ধের গতি বদলে গেল।
Verse 36
ततः क्रुद्धो महाराज मार्गणैर्भारसाधनै:
সঞ্জয় বললেন—তখন, হে মহারাজ, তিনি ক্রুদ্ধ হয়ে ভারী আঘাতকারী শরসমূহে আক্রমণ করলেন।
Verse 37
ततो5परेण भल््लेन पीतेन निशितेन च
সঞ্জয় বললেন—তারপর তিনি হলুদাভ, অতিশয় তীক্ষ্ণ আরেকটি ভল্ল-শরে আঘাত করলেন।
Verse 38
सात्यकिं छिन्नथन्वानं प्रहसन्निव भारत
সঞ্জয় বললেন—হে ভারত, ধনুক ছিন্ন হলেও সাত্যকি যেন হাসছেন—এমনই মনে হলো।
Verse 39
अविध्यन्मागधो वीर: पज्चभिरनर्निशितै: शरै: | भारत! धनुष काटनेके पश्चात् सात्यकिको उस मागध वीरने हँसते हुए ही पाँच तीखे बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।। ३८ $ ।। स विद्धो बहुभिर्बाणैर्जलसंधेन वीर्यवान्
সঞ্জয় বললেন—মাগধের বীর পাঁচটি অতিশয় তীক্ষ্ণ শর নিক্ষেপ করল। হে ভারত! সাত্যকির ধনু কেটে দিয়ে সেই মাগধ-নায়ক হাসতে হাসতেই পাঁচ ধারালো শরে তাকে বিদ্ধ করল। তারপর বীর্যবান জলসন্ধ বহু বাণে বিদ্ধ হয়েও সমর ত্যাগ করল না।
Verse 40
अचिन्तयन् वै स शरान्नात्यर्थ सम्भ्रमाद् बली
সঞ্জয় বললেন—সেই বলবান যোদ্ধা অতিরিক্ত বিচলিত না হয়ে, বেশি চিন্তা না করে, স্থিরচিত্তে শর নিক্ষেপ করতে লাগল।
Verse 41
धनुरन्यत् समादाय तिष्ठ तिछेत्युवाच ह । बलवान सात्यकिने उसके बाणोंको कुछ भी न गिनते हुए अधिक संभ्रममें न पड़कर दूसरा धनुष हाथमें ले लिया और कहा--'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह” ।।
সঞ্জয় বললেন—বলবান শৈনেয় সাত্যকি আরেকটি ধনু তুলে নিল; তার বাণকে তৃণসম জেনে সে অধিক বিচলিত হল না। তারপর সে বলল—“থাম, থাম!” এতটুকু বলে শৈনেয় জলসন্ধের প্রশস্ত বক্ষে আঘাত করল।
Verse 42
क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन मुष्टिदेशे महद् धनु:
সঞ্জয় বললেন—সে ক্ষুরধার অতিতীক্ষ্ণ শর দিয়ে মহাধনুর মুষ্টিদেশে আঘাত করল।
Verse 43
जलसंधस्तु तत् त्यक्त्वा सशरं वै शरासनम्
সঞ্জয় বললেন—তখন জলসন্ধ তা ত্যাগ করে, শরসহ নিজের ধনু ফেলে দিল।
Verse 44
तोमरं व्यसृजत् तूर्ण सात्यकिं प्रति मारिष । माननीय नरेश! जलसंधने बाणसहित उस धनुषको त्यागकर सात्यकिपर तुरंत ही तोमरका प्रहार किया ।। ४३ $ ।। स निर्भिद्य भुजं सव्यं माधवस्य महारणे
সঞ্জয় বললেন—হে মারিষ! সে তৎক্ষণাৎ সাত্যকির দিকে তোমর নিক্ষেপ করল। সেই মহাযুদ্ধে তা মাধব (কৃষ্ণ)-এর বাম বাহু বিদ্ধ করল।
Verse 45
निर्भिन्ने तु भुजे सव्ये सात्यकि: सत्यविक्रम:
বাম বাহু বিদ্ধ হলেও সত্যবিক্রম সাত্যকি মহাযুদ্ধে একটুও টলেনি; তার ধৈর্য অটুট রইল।
Verse 46
प्रगृह्मा तु ततः खड्गं जलसंधो महाबल:,तब महाबली जलसंधने सौ चन्द्राकार चमकीले चिह्लोंसे युक्त वृषभ-चर्मकी बनी हुई विशाल ढाल और तलवार हाथमें ले ली तथा उस तलवारको घुमाकर सात्यकिपर छोड़ दिया
তখন মহাবলী জলসন্ধ তরবারি তুলে নিল। উজ্জ্বল চন্দ্রাকার চিহ্নযুক্ত বৃহৎ বৃষচর্মের ঢাল ধারণ করে, সে তরবারি ঘুরিয়ে সাত্যকির দিকে নিক্ষেপ করল।
Verse 47
आर्षभं चर्म च महच्छतचन्द्रकसंकुलम् । आविध्य च तत: खड्गं सात्वतायोत्ससर्ज ह
সে বৃষচর্মের সেই বৃহৎ ঢাল তুলে নিল, যা শত চন্দ্রসদৃশ উঁচু অংশে ভরা ছিল; তারপর তরবারি ঘুরিয়ে সাত্বতবীর সাত্যকির দিকে নিক্ষেপ করল।
Verse 48
शैनेयस्य धनुश्छित्त्वा स खड्गो न्न्यपतन्महीम् । अलातचक्रवच्चैव व्यरोचत महीं गत:,वह खड्ग सात्यकिके धनुषको काटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। धरतीपर पहुँचकर वह अलातचक्रके समान प्रकाशित हो रहा था
শৈনেয় (সাত্যকি)-এর ধনুক কেটে সেই তরবারি মাটিতে পড়ে গেল। ভূমিতে পৌঁছে তা ঘূর্ণায়মান অগ্নিশলাকার মতো দীপ্ত হয়ে উঠল।
Verse 49
अथान्यद् धनुरादाय सर्वकायावदारणम् | शालस्कन्धप्रतीकाशमिन्द्राशनिसमस्वनम्
তখন সে আর-একটি ধনুক তুলে নিল—যা প্রতিপক্ষের সমগ্র দেহ বিদীর্ণ করতে সক্ষম; শালবৃক্ষের কাণ্ডের মতো দীপ্ত, আর ইন্দ্রের বজ্রের মতো গর্জনধ্বনিযুক্ত।
Verse 50
ततः साभरणोौ बाहू क्षुराभ्यां माधवोत्तम:
তারপর মাধবদের শ্রেষ্ঠ (কৃষ্ণ) দুইটি তীক্ষ্ণ ক্ষুর হাতে নিয়ে অলংকৃত সেই বাহুদ্বয়ের প্রতি আঘাত করতে উদ্যত হলেন।
Verse 51
तौ बाहू परिघप्रख्यौ पेततुर्गजसत्तमात्
পরিঘের মতো প্রবল সেই দুই বাহু শ্রেষ্ঠ গজের পিঠ থেকে খসে পড়ল।
Verse 52
वसुंधराधराद् भ्रष्टी पज्चशीर्षाविवोरगौ । उसकी वे परिघके समान मोटी भुजाएँ उस गजराजकी पीठसे नीचे गिर पड़ीं, मानो पर्वतसे पाँच-पाँच मस्तकोंवाले दो नाग पृथ्वीपर गिरे हों ।।
পৃথিবীধারী সেই মহাগজের পিঠ থেকে খসে পড়ে, পরিঘের মতো ভারী সেই দুই মোটা বাহু মাটিতে পড়ল—যেন পর্বত থেকে পাঁচ-মাথাওয়ালা দুই নাগ নেমে এলো। তারপর দেখা গেল—সুন্দর দংশনদাঁতযুক্ত, অতিশয় বৃহৎ, মনোহর কুণ্ডলে ভূষিত (ধড়)।
Verse 53
तत्पातितशिरोबाहुकबन्धं॑ भीमदर्शनम्
তখন দেখা গেল সেই ভয়ংকর দৃশ্য—যার মস্তক ও বাহু কেটে ফেলে দেওয়া হয়েছে, এমন ধড়।
Verse 54
द्विरदं जलसंधस्य रुधिरेणा भ्यषिज्चत । मस्तक और भुजाओंके गिर जानेसे अत्यन्त भयंकर दिखायी देनेवाले जलसंधके उस धड़ने अपने खूनसे उस हाथीको नहला दिया ।। ५३ $ ।। जलसंध॑ निहत्याजौ त्वरमाणस्तु सात्वत:
সঞ্জয় বললেন—জলসন্ধের রক্তে সেই হাতিটি সম্পূর্ণ ভিজে গেল। জলসন্ধের মস্তক ও বাহু ছিন্ন হয়ে পড়ে গেলে, তার ধড়—ভয়ংকর দর্শন—নিজ রক্তেই যেন সেই গজকে স্নান করাল। যুদ্ধে জলসন্ধকে বধ করে সাত্বত বীর যুদ্ধকার্যের তাড়নায় দ্রুত অগ্রসর হল।
Verse 55
रुधिरेणावसिक्ताज़ो जलसंधस्य कुड्जर:
সঞ্জয় বললেন—জলসন্ধের সেই কুঞ্জর রক্তে সিক্ত; সর্বাঙ্গে রক্তলেপে সে যেন সম্পূর্ণ রক্ত-অন্ধকারে আচ্ছন্ন হয়ে উঠেছিল।
Verse 56
शरार्दित: सात्वतेन मर्दमान: स्ववाहिनीम्
সঞ্জয় বললেন—সাত্বত বীরের শরবিদ্ধ হয়ে, পিষ্ট ও পরাভূত হতে হতে সে তবু নিজের বাহিনীর মধ্যেই এগিয়ে চলল; ধৈর্য ত্যাগ করল না।
Verse 57
हाहाकारो महानासीत् तव सैन्यस्य मारिष
সঞ্জয় বললেন—হে মারিষ, তোমার সেনায় মহাহাহাকার উঠল।
Verse 58
विमुखाश्नवा भ्यधावन्न्त तव योधा: समन्तत:
সঞ্জয় বললেন—তোমার যোদ্ধারা ভয়ে ও বিষাদে মুখ ফিরিয়ে চারদিকে ছুটে পালাতে লাগল।
Verse 59
एतस्मिन्नन्तरे राजन् द्रोण: शस्त्रभूतां वर:
ঠিক সেই সময়ে, রাজন, জীবন্ত অস্ত্রসম হয়ে ওঠা যোদ্ধাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ দ্রোণ অগ্রসর হলেন।
Verse 60
तमुदीर्ण तथा दृष्टवा शैनेयं नरपुड्रवा:
শৈনেয়কে সেইরূপ উদ্দীপ্ত ও উত্তেজিত দেখে, নরশ্রেষ্ঠ তাঁকে গভীরভাবে লক্ষ করলেন।
Verse 61
द्रोणेनैव सह क्रुद्धा: सात्यकिं समुपाद्रवन् । शिनिपौत्र सात्यकिको बढ़ते देख नरश्रेष्ठ कौरव महारथी द्रोणाचार्यके साथ ही कुपित हो उनपर टूट पड़े ।।
দ্রোণসহ ক্রুদ্ধ কৌরবেরা সাত্যকির উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল। তখন, রাজন, রণে দ্রোণের উপস্থিতিতে কৌরবদের সঙ্গে সাত্বতবীর সাত্যকির দেবাসুর-যুদ্ধসম ভয়ংকর সংঘর্ষ শুরু হল।
Verse 115
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि सात्यकिप्रवेशे जलसंधवधो नाम पजञ्चदशाधिकशततमो< ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে, কৌরবসেনায় সাত্যকির প্রবেশ-প্রসঙ্গে ‘জলসন্ধবধ’ নামে একশো পনেরোতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 186
त्रिगर्ती: सह योत्स्यामि भारद्वाजस्य पश्यत: । “ये समस्त वीर मेरी ही ओर मुँह करके युद्ध करनेके लिये खड़े हैं। सारथे! घोड़ोंको हॉको और मुझे शीघ्र ही इनके पास पहुँचा दो। मैं द्रोणाचार्यके देखते-देखते त्रिगर्तोंके साथ युद्ध करूँगा”
ভারদ্বাজপুত্র দ্রোণের দৃষ্টির সামনেই আমি ত্রিগর্তদের সঙ্গে যুদ্ধ করব। এ সকল যোদ্ধা আমার দিকেই মুখ করে সমরে দাঁড়িয়ে আছে। সারথি, অশ্বদের তাড়াও এবং আমাকে দ্রুত তাদের কাছে নিয়ে চলো; দ্রোণের চোখের সামনেই আমি ত্রিগর্তদের সঙ্গে লড়ব।
Verse 196
रथेनादित्यवर्णेन भास्वरेण पताकिना । तदनन्तर सात्यकिकी सम्मतिके अनुसार सारथि सूर्यके समान तेजस्वी तथा पताकाओंसे विभूषित रथके द्वारा धीरे-धीरे आगे बढ़ा
সঞ্জয় বললেন—তারপর স্থির করা পরিকল্পনা অনুসারে সাত্যকি ধীরে ধীরে অগ্রসর হল। সূর্যবর্ণ, দীপ্তিময় ও পতাকায় শোভিত রথে আরূঢ় হয়ে সে সমরক্ষেত্রে সংযত দৃঢ়তায় এগিয়ে গেল।
Verse 206
वायुवेगसमा: संख्ये कुन्देन्दुरजतप्रभा: । उस रथके उत्तम घोड़े कुन्द
সঞ্জয় বললেন—সমরে সেই রথের উৎকৃষ্ট অশ্বগুলি কুন্দফুল, চন্দ্র ও রৌপ্যের ন্যায় শুভ্র দীপ্তিসম্পন্ন ছিল। তারা সারথির বশে, বায়ুর মতো বেগবান; লাফিয়ে-উঠে যুদ্ধক্ষেত্রে রথের ভার বহন করছিল।
Verse 303
यत्त: सम्प्रापयन्नागं रजताश्वरथं प्रति । उस गजसेनाके नष्ट होनेपर महाबली जलसंध युद्धके लिये उद्यत हो श्वेत घोड़ोंवाले सात्यकिके रथके समीप अपना हाथी ले आया
সঞ্জয় বললেন—তার গজসেনা বিনষ্ট হলে মহাবলী জলসন্ধ যুদ্ধের জন্য উদ্যত হয়ে শ্বেত অশ্বযুত সাত্যকির রথের দিকে নিজের গজকে তাড়িয়ে নিয়ে এল, সরাসরি সংঘর্ষে প্রবৃত্ত হতে।
Verse 326
उरसा धारयन् निष्कं कण्ठसूत्रं च भास्वरम् | शूरवीर एवं पवित्र जलसंधने अपने शरीरमें सोनेका कवच धारण कर रखा था। उसकी दोनों भुजाओंमें सोनेके ही बाजूबंद शोभा पा रहे थे। दोनों कानोंमें कुण्डल और मस्तकपर किरीट चमक रहे थे। उसके हाथमें तलवार थी और सम्पूर्ण शरीरमें रक्त चन्दनका लेप लगा हुआ था। उसने अपने सिरपर सोनेकी बनी हुई चमकीली माला और वक्ष:स्थलपर प्रकाशमान पदक एवं कण्ठहार धारण कर रखे थे
সঞ্জয় বললেন—বক্ষে দীপ্ত স্বর্ণপদক ও উজ্জ্বল কণ্ঠসূত্র ধারণ করে সেই শূর জলসন্ধ পবিত্র জলসঙ্গমে দাঁড়িয়েছিল। তার দেহে স্বর্ণকবচ; উভয় বাহুতে স্বর্ণবাজুবন্ধ শোভা পাচ্ছিল। কানে কুণ্ডল, মস্তকে কিরীট ঝলমল করছিল। হাতে ছিল খড়্গ, আর সর্বাঙ্গে রক্তচন্দনের লেপ। শিরে স্বর্ণমালা এবং বক্ষে দীপ্ত পদক ও হার সে ধারণ করেছিল।
Verse 343
सात्यकिर्वारियामास वेलेव मकरालयम् | सहसा अपनी ओर आते हुए मगधराजके उस गजराजको सात्यकिने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे तटकी भूमि समुद्रको रोक देती है
সঞ্জয় বললেন—সাত্যকি তাকে রোধ করল, যেমন তটভূমি সমুদ্রকে রোধ করে। মগধরাজের সেই গজরাজ হঠাৎ তার দিকে ধেয়ে এলে, সাত্যকি তৎক্ষণাৎ তাকে থামিয়ে দিল।
Verse 353
अक्कुद्धबत रणे राजन् जलसंधो महाबल: । राजन! सात्यकिके उत्तम बाणोंसे उस हाथीको अवरुद्ध हुआ देख महाबली जलसंध रणक्षेत्रमें कुपित हो उठा
সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, রণক্ষেত্রে মহাবলী জলসন্ধ ক্রোধে জ্বলে উঠল। সাত্যকির উৎকৃষ্ট বাণে সেই হাতিটি রুদ্ধ ও ঘেরাও হয়ে গেছে দেখে, সেই পরাক্রান্ত যোদ্ধা যুদ্ধভূমিতে ক্রুদ্ধ হয়ে উঠল।
Verse 373
अस्यतो वृष्णिवीरस्य निचकर्त शरासनम् | तत्पश्चात् दूसरे तीखे, पैने और पानीदार भल्लसे उसने बाण फेंकते हुए वृष्णिवीर सात्यकिके धनुषको काट डाला
সঞ্জয় বললেন—বাণ নিক্ষেপ করতে থাকা বৃষ্ণিবীরের ধনুক কেটে ফেলা হল। তারপর দ্বিতীয় এক ক্ষুরধার, তীক্ষ্ণ ভল্ল-শরে—অবিরাম শর ছুঁড়তে ছুঁড়তেই—আক্রমণকারী বৃষ্ণিশ্রেষ্ঠ সাত্যকির ধনুকও ছিন্ন করল।
Verse 393
नाकम्पत महाबाहुस्तदद्भुतमिवाभवत् | जलसंधके बहुत-से बाणोंद्वारा क्षत-विक्षत होनेपर भी पराक्रमी महाबाहु सात्यकि कम्पित नहीं हुए। यह अद्भुत-सी बात थी
সঞ্জয় বললেন—মহাবাহু সাত্যকি একটুও কাঁপলেন না; তা যেন বিস্ময়কর। জলসন্ধের বহু শরে ক্ষত-বিক্ষত হয়েও পরাক্রান্ত সাত্যকি অচল রইলেন।
Verse 416
विव्याध षष्ट्या सुभृशं शराणां प्रहसन्निव । ऐसा कहकर सात्यकिने हँसते हुए ही साठ बाणोंद्वारा जलसंधकी चौड़ी छातीपर गहरी चोट पहुँचायी
সঞ্জয় বললেন—এ কথা বলে সাত্যকি যেন হাসতে হাসতে ষাটটি বাণে জলসন্ধকে প্রবলভাবে বিদ্ধ করল, তার প্রশস্ত বক্ষে গভীর আঘাত বসাল।
Verse 426
जलसंधस्य चिच्छेद विव्याध च त्रिभि: शरै: | फिर अत्यन्त तीखे क्षुरप्रसे जलसंधके विशाल धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे काट दिया और तीन बाण मारकर उसे घायल भी कर दिया
সঞ্জয় বললেন—সে জলসন্ধের বৃহৎ ধনুকটি মুঠি ধরার স্থানে কেটে দিল, তারপর তিনটি শরে তাকে বিদ্ধ করে আহত করল।
Verse 446
अभ्यगाद् धरणीं घोर: श्वसन्निव महोरग: । फुफकारते हुए महान् सर्पके समान वह भयंकर तोमर उस महासमरमें सात्यकिकी बायीं भुजाको विदीर्ण करता हुआ धरतीमें समा गया
সঞ্জয় বললেন—মহাসর্পের ন্যায় ফোঁসফোঁস করতে করতে সেই ভয়ংকর তোমর মহাসমরে সাত্যকির বাঁ-হাত বিদীর্ণ করে ভূমিতে প্রবেশ করল।
Verse 453
त्रिंशद्धिर्विशिखैस्तीक्षैजलसंधमताडयत् । अपनी बायीं भुजाके घायल होनेपर सत्यपराक्रमी सात्यकिने तीस तीखे बाणोंद्वारा जलसंधको आहत कर दिया
সঞ্জয় বললেন—বাঁ-হাত আহত হলেও সত্যপরাক্রমী সাত্যকি ত্রিশটি তীক্ষ্ণ বাণে জলসন্ধকে আঘাত করল।
Verse 496
विस्फार्य विव्यधे क्रुद्धो जलसंधं शरेण ह | तब सात्यकिने साखूके तनेके समान विशाल
সঞ্জয় বললেন—ক্রুদ্ধ হয়ে সাত্যকি ধনুক টেনে পূর্ণ প্রসারিত করে একটিমাত্র বাণে জলসন্ধকে বিদ্ধ করল।
Verse 503
सात्यकिर्जलसंधस्य चिच्छेद प्रहसन्निव | फिर मधुवंशशिरोमणि सात्यकिने हँसते हुए-से दो छुरोंका प्रहार करके जलसंधकी आभूषणभूषित दोनों भुजाओंको काट दिया
সঞ্জয় বললেন—তারপর মধুবংশশিরোমণি সাত্যকি যেন হাসতে হাসতে দুই ক্ষুরাঘাতে অলংকারভূষিত জলসন্ধের দুই বাহুই কেটে ফেলল।
Verse 523
क्षुरेणास्य तृतीयेन शिरश्रिच्छेद सात्यकि: । तदनन्तर सात्यकिने तीसरे छुरेसे उसके सुन्दर दाँतोंवाले मनोहर कुण्डलमण्डित विशाल मस्तकको काट गिराया
সঞ্জয় বললেন—তারপর সাত্যকি তৃতীয় ক্ষুরে তার সুন্দর দাঁতযুক্ত, মনোহর কুণ্ডলমণ্ডিত বিশাল মস্তক কেটে মাটিতে ফেলে দিল।
Verse 543
विमान पातयामास गजस्कन्धाद् विशाम्पते । प्रजानाथ! युद्धस्थलमें जलसंधको मारकर फुर्ती करनेवाले सात्यकिने हाथीकी पीठसे उसके हौदेको भी गिरा दिया
সঞ্জয় বললেন—হে প্রজানাথ, হে বিশামপতে! রণক্ষেত্রে জলসন্ধককে বধ করে ক্ষিপ্র সাত্যকি হাতির পিঠ থেকে হাওদাটিও ফেলে দিল।
Verse 553
विलम्बमानमवहत् संश्लिष्टं परमासनम् | खूनसे भीगे शरीरवाला जलसंधका वह हाथी अपनी पीठसे सटकर लटकते हुए उस हौदेको ढो रहा था
সঞ্জয় বললেন—রক্তে ভেজা সেই হাতি পিঠের সঙ্গে লেগে থাকা, ঝুলে দুলতে থাকা উঁচু আসনসদৃশ হাওদাটি বহন করছিল।
Verse 563
घोरमार्तस्वरं कृत्वा विदुद्राव महागज: । सात्यकिके बाणोंसे पीड़ित हो वह महान् गजराज घोर चीत्कार करके अपनी ही सेनाको कुचलता हुआ भाग निकला
সঞ্জয় বললেন—সাত্যকির বাণে বিদ্ধ সেই মহাগজ ভয়ংকর আর্তনাদ করে নিজেরই সৈন্যদলকে পিষে পালিয়ে গেল।
Verse 573
जलसंध॑ हतं दृष्टवा वृष्णीनामृषभेण तु । आर्य! वृष्णिप्रवर सात्यकिके द्वारा जलसंधको मारा गया देख आपकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया
সঞ্জয় বললেন—হে আর্য! বৃষ্ণিদের শ্রেষ্ঠ, বৃষ্ণিপ্রবর সাত্যকির হাতে জলসন্ধক নিহত হতে দেখে তোমার সেনায় মহা হাহাকার উঠল।
Verse 583
पलायनकृतोत्साहा निरुत्साहा द्विषज्जये । आपके योद्धा शत्रुओंपर विजय पानेका उत्साह खो बैठे। अब वे भाग निकलनेमें ही उत्साह दिखाने लगे और युद्धसे मुँह मोड़कर चारों ओर भाग गये
সঞ্জয় বললেন—শত্রুজয়ে তোমার যোদ্ধারা উৎসাহ হারাল; পালাতেই তাদের উদ্যম জাগল। যুদ্ধ থেকে মুখ ফিরিয়ে তারা চারদিকে ছত্রভঙ্গ হয়ে দৌড়ে গেল।
Verse 593
अभ्ययाज्जवनैरश्वैर्युयुधानं महारथम् । राजन! इसी समय शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य अपने वेगशाली घोड़ोंद्वारा महारथी युयुधानका सामना करनेके लिये आ पहुँचे
সঞ্জয় বললেন—রাজন! ঠিক সেই মুহূর্তে অস্ত্রধারীদের শ্রেষ্ঠ দ্রোণাচার্য দ্রুতগামী অশ্বসমেত মহারথী যুযুধানের সম্মুখে উপস্থিত হয়ে তাঁকে প্রতিহত করতে অগ্রসর হলেন।
Verse 1194
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें सात्यकिका कौरव-सेनामें प्रवेश तथा कृतवर्गाका पराक्रमविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ
সঞ্জয় বললেন—এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত জয়দ্রথবধপর্বে সাত্যকির কৌরবসেনায় প্রবেশ এবং কৃতবর্মার বীরত্ববর্ণনাসম্বন্ধীয় একশো চৌদ্দতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 2936
शरैरग्न्यर्कसंकाशै: प्रदुद्राव समन्तत: । उनमेंसे कुछ हाथी चक्कर काटने लगे
অগ্নি ও সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান শরে বিদ্ধ হয়ে সেই গজসেনা চারদিকে ছুটে পালাল। তাদের মধ্যে কেউ কেউ ঘুরপাক খেতে লাগল, কেউ টলতে টলতে পড়ে গেল, কেউ ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল, আর কেউ যন্ত্রণায় অত্যন্ত শিথিল হয়ে পড়ল।
Verse 3636
अविध्यत शिने: पौत्रं जलसंधो महोरसि । महाराज! क्रोधमें भरे हुए जलसंधने भार सहन करनेमें समर्थ बाणोंद्वारा शिनिपौत्र सात्यकिकी विशाल छातीपर गहरा आघात किया
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! ক্রোধে উন্মত্ত জলসন্ধ ভারী ও প্রবল বাণে শিনির পৌত্র সাত্যকির প্রশস্ত বক্ষে গভীর আঘাত করল।
Whether a third-party intervention against a combatant who has gained advantage in a duel is justified when the opponent is exhausted and an ally’s survival is at stake, even if strict duel-propriety appears compromised.
The chapter illustrates that dharma in crisis is often adjudicated through competing duties—fairness, protection, and strategic obligation—showing how ethical reasoning in itihāsa is contextual rather than purely rule-absolute.
No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; the meta-significance is conveyed narratively by staging consequences and later evaluative debate around the intervention and its conformity to wartime norms.
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