Adhyaya 9
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 937 Verses

Adhyaya 9

Marutta’s Sacrifice and Agni’s Embassy (मरुत्त-यज्ञे दूतत्वम्)

Upa-parva: Marutta–Saṃvarta–Bṛhaspati Saṃvāda (Episode within Āśvamedhika-parva)

Indra opens with welfare-questions to Bṛhaspati, who replies that his discomfort is not physical lack but political-ritual anxiety: he has heard that King Marutta will perform a grand sacrifice with exceptional gifts, and that Saṃvarta will officiate. Indra questions why Saṃvarta matters to one who is divine preceptor; Bṛhaspati explains the distress caused by a rival’s rising prosperity and influence. Indra dispatches Agni (Jātavedas/Havyavāha) as an envoy to deliver Bṛhaspati to Marutta, promising the king elevated rewards. Agni reaches Marutta, is received with formal hospitality, and conveys Indra’s message: accept Bṛhaspati as priest to gain exalted worlds and fame. Marutta refuses, stating Saṃvarta is already his chosen officiant and implying impropriety in substituting priests. Saṃvarta threatens Agni with a destructive gaze if he returns with the same demand. Agni, alarmed, reports back; Indra insists on his own supremacy, while Agni counters with precedent: brahma-tejas can restrain even Indra, recalling earlier episodes where Indra was checked by ascetic power, thus concluding that approaching Saṃvarta is unwise.

Chapter Arc: देवसभा के शांत वैभव में एक असामान्य दृश्य—देवगुरु बृहस्पति सुख-शय्या पर भी भीतर से अस्थिर हैं, और इन्द्र उनकी चिन्ता का कारण जानने को व्याकुल हो उठते हैं। → इन्द्र बृहस्पति से पूछते हैं कि यह दुःख मानसिक है या देहज, और प्रतिज्ञा करते हैं कि जो भी कारण होगा उसे वे नष्ट कर देंगे। बृहस्पति संकेत करते हैं कि कुछ भय ऐसे हैं जिन्हें केवल शस्त्र-बल से नहीं जीता जा सकता। संवाद में देव-लोक, मनुष्य-लोक और प्रजापति के महान लोकों तक की मर्यादा का उल्लेख आता है—मानो समस्या का विस्तार त्रैलोक्य को छू रहा हो। → अग्नि का कथन और इन्द्र का आत्म-स्वीकार—संवर्त (तीक्ष्ण-रोष, ब्रह्मचर्य-तेज से युक्त) के पास दूत बनकर जाने में अग्नि भी भयभीत हैं; और इन्द्र स्वीकारते हैं कि वे क्षीण-शक्ति पर वज्र नहीं चलाते, न ही अनुचित पराक्रम को सुख मानते। फिर उस घोर असुर ‘मर्द’ का वर्णन आता है—रजत-स्तम्भ-सी दाढ़ें, शूल उठाए जिघांसु वेग—जिसे देखकर स्वयं इन्द्र ने भय से हाथ जोड़कर शरण ली। → बृहस्पति निर्णायक वाक्य कहते हैं—क्षात्रबल से ब्रह्मबल श्रेष्ठ है; ब्रह्मतेज से बढ़कर कुछ नहीं। इसलिए वे इन्द्र को यह बोध कराते हैं कि संवर्त जैसे ब्रह्मतेजस्वी के विरुद्ध युद्ध-उन्माद उचित नहीं; समाधान शस्त्र नहीं, विनय, मर्यादा और ब्रह्म-तेज की स्वीकृति है। → संवर्त के रोष और ब्रह्मतेज की छाया अभी टली नहीं—देवता आगे किस प्रकार संवाद/समाधान का मार्ग चुनेंगे, यह प्रश्न खुला रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं) ऑपनआक्रा छा अकाल नवमो<्ध्याय: बृहस्पतिका इन्द्रसे अपनी चिन्ताका कारण बताना, इन्द्रकी आज्ञासे अग्निदेवका मरुत्तके पास उनका संदेश लेकर जाना और संवर्तके भयसे पुन: लौटकर इन्द्रसे ब्रह्म बलकी श्रेष्ठठा बताना इन्द्र रवाच कच्चित्सुखं स्वपिषि त्वं बृहस्पते कच्चिन्मनोज्ञा: परिचारकास्ते | कच्चिद्देवानां सुखकामो<सि विप्र कच्चिद्देवास्त्वां परिपालयन्ति,इन्द्रने कहा--बृहस्पते! आप सुखसे सोते हैं न? आपको मनके अनुकूल सेवक प्राप्त हैं न? विप्रवर! आप देवताओंके सुखकी कामना तो रखते हैं न? क्‍या देवता आपका पूर्णरूपसे पालन करते हैं?

ইন্দ্র বলিলেন—হে বৃহস্পতে! তুমি কি সুখে নিদ্রা কর? তোমার কি মনোরম পরিচারকগণ আছে? হে বিপ্রশ্রেষ্ঠ! তুমি কি দেবগণের কল্যাণ কামনা কর? আর দেবগণ কি তোমাকে সম্পূর্ণরূপে রক্ষা ও প্রতিপালন করে?

Verse 2

ब॒हस्पतिरु्वाच सुखं शये शयने देवराज तथा मनोज्ञा: परिचारका मे । तथा देवानां सुखकामो<स्मि नित्यं देवाश्न मां सुभृशं॑ पालयन्ति,बृहस्पतिजी बोले--देवराज! मैं सुखसे शय्यापर सोता हूँ, मुझे मेरे मनके अनुकूल सेवक प्राप्त हुए हैं। मैं सदा देवताओंके सुखकी कामना करता हूँ और देवतालोग भी मेरा भलीभाँति पालन करते हैं

বৃহস্পতী বললেন— হে দেবরাজ! আমি শয্যায় স্বস্তিতে শুই; আমার মনের অনুকূল পরিচারকেরা আমার সেবা করে। আমি সর্বদা দেবতাদের কল্যাণ ও সুখের চিন্তায় নিবিষ্ট, আর দেবতারাও পাল্টা আমাকে অত্যন্ত যত্নে রক্ষা ও পালন করে।

Verse 3

इन्द्र बवाच कुतो दुःखं मानसं देहजं वा पाण्ड्विंवर्णश्व॒ कुतस्त्वमद्य । आचक्ष्व मे ब्राह्मण यावदेतान्‌ निहन्मि सर्वास्तव दुःखकर्तुन्‌,इन्द्रने कहा--विप्रवर! आपको यह मानसिक अथवा शरीरिक दु:ख कैसे प्राप्त हुआ? आप आज उदास और पीले क्‍यों हो रहे हैं? आप बताइये तो सही, जिन्होंने आपको दुःख दिया है, उन सबको मैं अभी नष्ट किये देता हूँ

ইন্দ্র বললেন— হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ! এ দুঃখ তোমার মনে, না দেহে— কোথা থেকে এলো? আর আজ তুমি কেন ফ্যাকাসে ও বিষণ্ণ? আমাকে বলো; যারা তোমাকে কষ্ট দিয়েছে, তাদের সকলকে আমি এখনই বিনাশ করব।

Verse 4

ब॒हस्पतिर्वाच मरुत्तमाहुर्मघवन्‌ यक्ष्यमाणं महायज्ञेनोत्तमदक्षिणेन । संवर्तो याजयतीति मे श्रुतं तदिच्छामि न स तं याजयेत,बृहस्पतिजी बोले--मघवन्‌! लोग कहते हैं कि महाराज मरुत्त उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त एक महान्‌ यज्ञ करने जा रहे हैं तथा यह भी मेरे सुननेमें आया है कि संवर्त ही आचार्य होकर वह यज्ञ करायेंगे। परंतु मेरी इच्छा है कि वे उस यज्ञको न कराने पावें

বৃহস্পতী বললেন— হে মঘবন! শোনা যায়, রাজা মরুত্ত শ্রেষ্ঠ দক্ষিণাসহ এক মহাযজ্ঞ করতে উদ্যত। আরও শুনেছি, সংবর্তই আচার্য হয়ে সেই যজ্ঞ সম্পাদন করাবে। কিন্তু আমার ইচ্ছা— সে যেন সেই যজ্ঞ করাতে না পারে।

Verse 5

इन्द्र वाच सर्वान्‌ कामाननुयातो<सि वित्र यस्त्वं देवानां मन्त्रवित्सुपुरोधा: । उभौ च ते जरामृत्यू व्यतीतौ कि संवर्तस्तव कर्ताद्य विप्र,इन्द्रने कहा--ब्रह्मन! सम्पूर्ण मनोवांछित भोग आपको प्राप्त हैं; क्योंकि आप देवताओंके मन्त्रज्ञ पुरोहित हैं। आपने जरा और मृत्यु दोनोंको जीत लिया है। फिर संवर्त आपका क्या कर सकते हैं?

ইন্দ্র বললেন— হে বিপ্র! তোমার সব কামনা পূর্ণ হয়েছে, কারণ তুমি দেবতাদের মন্ত্রজ্ঞ শ্রেষ্ঠ পুরোহিত। তুমি জরা ও মৃত্যুকেও অতিক্রম করেছ। তবে আজ সংবর্ত তোমার কীই বা করতে পারে?

Verse 6

बृहस्पतिर्वाच देवै: सह त्वमसुरान्‌ प्रणुद्य जिघांससे चाप्युत सानुबन्धान्‌ | यं यं समृद्ध पश्यसि तत्र तत्र दुःखं सपत्नेषु समृद्धिभाव:,बृहस्पतिजी बोले--देवराज! तुम असुरोंमेंसे जिस-जिसको समृद्धिशाली देखते हो, उसके ऊपर भिन्न-भिन्न स्थानोंमें देवताओंके साथ आक्रमण करके उन सभी असुरोंको मिटा डालना चाहते हो। वास्तवमें शत्रुओंकी समृद्धि दुःखका कारण होती है

বৃহস্পতী বললেন— হে দেবরাজ! তুমি দেবতাদের সঙ্গে অসুরদের তাড়িয়ে দাও এবং তাদের অনুচর-সহচরসহ বিনাশ করতে উদ্যত হও। যাকে যেখানেই সমৃদ্ধ দেখো, সেখানেই তার বিরুদ্ধে অগ্রসর হও। কারণ প্রতিদ্বন্দ্বীদের সমৃদ্ধিই বেদনার কারণ হয়ে ওঠে।

Verse 7

अतोअसि्मि देवेन्द्र विवर्णरूप: सपत्नो मे वर्धते तन्निशम्य । सर्वोपायैर्मघवन्‌ संनियच्छ संवर्त वा पार्थिवं वा मरुत्तम्‌,देवेन्द्र! इसीसे मैं भी उदास हो रहा हूँ। मेरा शत्रु संवर्त बढ़ रहा है, यह सुनकर मेरी चिन्ता बढ़ गयी है। अतः मघवन्‌! तुम सभी सम्भव उपायोंद्वारा संवर्त और राजा मरुत्तको कैद कर लो

সাংবর্ত বলল—হে দেবেন্দ্র, তাই আমি বিবর্ণ ও বিষণ্ণ হয়েছি। শুনেছি আমার প্রতিদ্বন্দ্বী শক্তি বাড়াচ্ছে—এতে আমার উদ্বেগ বেড়েছে। অতএব, হে মঘবন, সর্ব উপায়ে সংবর্তকে অথবা রাজা মরুত্তকে সংযত করো, হে দেবরাজ!

Verse 8

इन्द्र उवाच एहि गच्छ प्रहितो जातवेदो बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । अयं वै त्वां याजयिता बृहस्पति- स्तथामरं चैव करिष्यतीति,तब इन्द्रने अग्निदेवसे कहा--जातवेदा! इधर आओ और मेरा संदेश लेकर मरुत्तके पास जाओ। मरुत्तकी सम्मति लेकर बृहस्पतिजीको उनके पास पहुँचा देना। वहाँ जाकर राजासे कहना कि “ये बृहस्पतिजी ही आपका यज्ञ करायेंगे तथा ये आपको अमर भी कर देंगे!

ইন্দ্র বললেন—হে জাতবেদা (অগ্নি), এসো। আমার প্রেরিত দূত হয়ে মরুত্তের কাছে যাও এবং বৃহস্পতিকে সেখানে পৌঁছে দাও। সেখানে রাজাকে বলো—‘এই বৃহস্পতিই তোমার যজ্ঞের ঋত্বিক হবেন, যজ্ঞ সম্পন্ন করাবেন; এবং এই যজ্ঞের দ্বারা তোমাকে অমরত্ব (অক্ষয় কীর্তি ও স্বর্গলাভ) দান করবেন।’

Verse 9

अग्निरुवाच अहं गच्छामि मघवन्‌ दूतोडद्य बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । वाचं सत्यां पुरुहृतस्य कर्तु बृहस्पतेश्वापचितिं चिकीर्ष: ९ ।। अग्निदेवने कहा--मघवन्‌! मैं बृहस्पतिजीको मरुत्तके पास पहुँचा आनेके लिये आज आपका दूत बनकर जा रहा हूँ। ऐसा करके मैं देवेन्द्रक्री आज्ञाका पालन और बृहस्पतिजीका सम्मान करना चाहता हूँ,इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये नवमो5ध्याय ।। ९ || इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपव॑के अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ

অগ্নি বললেন—হে মঘবন! আজ আমি তোমার দূত হয়ে বৃহস্পতিকে মরুত্তের কাছে পৌঁছে দিতে যাচ্ছি। এভাবে আমি পুরুহূত (ইন্দ্র)-এর বাক্যকে সত্য করতে এবং বৃহস্পতিকে যথোচিত সম্মান জানাতে চাই।

Verse 10

व्यास उवाच ततः प्रायाद्‌ धूमकेतुर्महात्मा वनस्पतीन्‌ वीरुधश्चापमृद्नन्‌ । कामाद्धिमान्ते परिवर्तमान: काष्ठातिगो मातरिश्वेव नर्दन्‌,व्यासजी कहते हैं--यह कहकर धूममय ध्वजावाले महात्मा अग्निदेव वनस्पतियों और लताओंको रौंदते हुए वहाँसे चल दिये। ठीक उसी तरह जैसे शीतकालके अन्तमें स्वच्छन्दतापूर्वक बहनेवाली दिगन्तव्यापिनी वायु विशेष गर्जना करती हुई आगे बढ़ रही हो

ব্যাস বললেন—তখন ধূমধ্বজ মহাত্মা অগ্নিদেব বৃক্ষ ও লতাগুলিকে পদদলিত করতে করতে সেখান থেকে প্রস্থান করলেন। তিনি স্বেচ্ছায় এমনভাবে অগ্রসর হলেন, যেমন শীতের শেষে দিগন্তব্যাপী বায়ু গর্জন করতে করতে বেগে ধাবিত হয়।

Verse 11

मरुत्त उवाच आश्चर्यमद्य पश्यामि रूपिणं वह्निमागतम्‌ । आसन सलिल पाद्यं गां चोपानय वै मुने,मरुत्तने कहा--मुने! बड़े आश्वर्यकी बात है कि आज मैं मूर्तिमान्‌ अग्निदेवको यहाँ आया देख रहा हूँ। आप इनके लिये आसन, पाद्य, अर्घ्य और गौ प्रस्तुत कीजिये

মরুত্ত বললেন—হে মুনি! আজ আমি বিস্ময় দেখছি—মূর্তিমান অগ্নিদেব এখানে এসেছেন। তাঁর জন্য আসন, জল, পাদ্য, অর্ঘ্য এবং একটি গাভীও নিয়ে এসো।

Verse 12

अग्निर्वाच आसन सलिल पाद्यं प्रतिनन्दामि तेडनघ । इन्द्रेण तु समादिदष्टं विद्धि मां दूतमागतम्‌,अग्निने कहा--निष्पाप नरेश! आपके दिये हुए पाद्य, अर्घ्ध और आसन आदिका अभिनन्दन करता हूँ। आपको मालूम होना चाहिये कि इस समय मैं इन्द्रका संदेश लेकर उनका दूत बनकर आपके पास आया हूँ

অগ্নি বললেন—নিষ্পাপ রাজন! আপনার প্রদত্ত আসন, জল ও পাদ্য আমি কৃতজ্ঞচিত্তে গ্রহণ ও সম্মান করছি। জেনে রাখুন, ইন্দ্রের আদেশে আমি তাঁর দূতরূপে আপনার কাছে এসেছি।

Verse 13

मरुत्त उवाच कच्चिच्छीमान्‌ देवराज: सुखी च कच्चिच्चास्मान्‌ प्रीयते धूमकेतो । कच्चिद्दवेवा अस्य वशे यथावत्‌ प्रब्रृहि त्वं मम कार्त्स्न्येन देव,मरुत्तने कहा--अग्निदेव! श्रीमान्‌ देवराज सुखी तो हैं न? धूमकेतो! वे हमलोगोंपर प्रसन्न हैं न? सम्पूर्ण देवता उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं न? देव! ये सारी बातें आप मुझे ठीक-ठीक बताइये

মরুত্ত বললেন—অগ্নিদেব! শ্রীমান দেবরাজ কি সুখে আছেন? হে ধূমকেতু! তিনি কি আমাদের প্রতি প্রসন্ন? আর সকল দেবতা কি যথাযথভাবে তাঁর আদেশাধীন? দেব! এ সব কথা সম্পূর্ণ ও যথার্থভাবে আমাকে বলুন।

Verse 14

अग्निर्वाच शक्रो भृशं सुसुखी पार्थिवेन्द्र प्रीति चेच्छत्यजरां वै त्वया सः । देवाश्व सर्वे वशगास्तस्य राजन्‌ संदेशं त्वं शृणु मे देवराज्ञ:,अग्निदेवने कहा--राजेन्द्र! देवराज इन्द्र बड़े सुखसे हैं और आपके साथ अटूट मैत्री जोड़ना चाहते हैं। सम्पूर्ण देवता भी उनके अधीन ही हैं। अब आप मुझसे देवराज इन्द्रका संदेश सुनिये

অগ্নি বললেন—হে পার্থিবেন্দ্র! শক্র (ইন্দ্র) অত্যন্ত সুখে আছেন এবং আপনার সঙ্গে অজর প্রীতি ও মৈত্রী স্থাপন করতে চান। রাজন, সকল দেবতাই তাঁর অধীন। অতএব দেবরাজের বার্তা আমার মুখে শুনুন।

Verse 15

यदर्थ मां प्राहिणोत्‌ त्वत्सकाशं बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । अयं गुरुर्याजयतां नृप त्वां मर्त्य सन्‍्तममरं त्वां करोतु,उन्होंने जिस कामके लिये मुझे आपके पास भेजा है, उसे सुनिये। वे मेरे द्वारा बृहस्पतिजीको आपके पास भेजना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि बृहस्पतिजी आपके गुरु हैं। अतः ये ही आपका यज्ञ करायेंगे। आप मरणधर्मा मनुष्य हैं। ये आपको अमर बना देंगे

যে উদ্দেশ্যে তিনি আমাকে আপনার কাছে পাঠিয়েছেন, তা শুনুন, মরুত্ত! তিনি আমার মাধ্যমে বৃহস্পতিকে আপনার সন্নিধানে পাঠাতে চান। তিনি বলেছেন—“ইনিই তোমার গুরু; হে রাজা, ইনিই তোমার যজ্ঞ সম্পন্ন করাবেন। তুমি মর্ত্য; তিনি তোমাকে অমরত্বের পদে পৌঁছে দেবেন।”

Verse 16

मरुत्त उवाच संवर्तो्यं याजयिता द्विजो मां बृहस्पतेरञण्जलिरेष तस्य । न चैवासौ याजयित्वा महेन्द्रं मर्त्य सन्‍्तं याजयन्नद्य शोभेत्‌,मरुत्तने कहा--भगवन्‌! मेरा यज्ञ ये विप्रवर संवर्तजी करायेंगे। बृहस्पतिजीके लिये तो मेरी यह अज्चलि जुड़ी हुई है। महेन्द्रका यज्ञ कराकर अब मेरे-जैसे मरणधर्मा मनुष्यका यज्ञ करानेमें उनकी शोभा नहीं है

মরুত্ত বললেন—ভগবন! আমার যজ্ঞ এই দ্বিজশ্রেষ্ঠ সংবর্তই করাবেন। বৃহস্পতির জন্যই আমার এই অঞ্জলি নিবেদিত। মহেন্দ্রের যজ্ঞ সম্পন্ন করিয়ে আজ আমার মতো মর্ত্যের যজ্ঞ করানো তাঁর পক্ষে শোভন নয়।

Verse 17

अग्निर॒वाच ये वै लोका देवलोके महान्तः सम्प्राप्स्यसे तान्‌ देवराजप्रसादात्‌ । त्वां चेदसौ याजयेद्‌ वै बृहस्पति- नून॑ स्वर्ग त्वं जये: कीर्तियुक्त:,अग्निदेवने कहा--राजन्‌! यदि बृहस्पतिजी आपका यज्ञ करायेंगे तो देवराज इन्द्रके प्रसादसे देवलोकके भीतर जितने बड़े-बड़े लोक हैं, वे सभी आपके लिये सुलभ हो जायूँगे। निश्चय ही आप यशस्वी होनेके साथ ही स्वर्गपर भी विजय प्राप्त कर लेंगे। मानवलोक, दिव्यलोक, महान्‌ प्रजापतिलोक और सम्पूर्ण देवराज्यपर भी आपका अधिकार हो जायगा

অগ্নি বললেন—“হে রাজন, দেবরাজ ইন্দ্রের প্রসাদে দেবলোকে যে সকল মহৎ লোক আছে, সেগুলি সকলই তুমি লাভ করবে। আর যদি স্বয়ং বৃহস্পতি তোমার যজ্ঞে ঋত্বিক হন, তবে নিশ্চিতই—খ্যাতিতে ভূষিত হয়ে—তুমি স্বর্গও জয় করবে।”

Verse 18

तथा लोका मानुषा ये च दिव्या: प्रजापतेश्वापि ये वै महान्त: । ते ते जिता देवराज्यं च कृत्स्नं बृहस्पतिर्याजयेच्चेन्नरेन्द्र,अग्निदेवने कहा--राजन्‌! यदि बृहस्पतिजी आपका यज्ञ करायेंगे तो देवराज इन्द्रके प्रसादसे देवलोकके भीतर जितने बड़े-बड़े लोक हैं, वे सभी आपके लिये सुलभ हो जायूँगे। निश्चय ही आप यशस्वी होनेके साथ ही स्वर्गपर भी विजय प्राप्त कर लेंगे। मानवलोक, दिव्यलोक, महान्‌ प्रजापतिलोक और सम्पूर्ण देवराज्यपर भी आपका अधिकार हो जायगा

“তেমনি মানবলোক ও দিব্যলোক, আর প্রজাপতির অধীন সেই মহৎ মহৎ লোকসমূহও—সবই তোমার দ্বারা জয়ী হবে; এবং সমগ্র দেবরাজ্যেও তোমার অধিকার হবে, হে নরেন্দ্র, যদি স্বয়ং বৃহস্পতি তোমার যজ্ঞে ঋত্বিক হন। সেই দীক্ষায় তোমার খ্যাতি বৃদ্ধি পাবে, আর উচ্চলোকের পথে তোমার অধিকার নিশ্চিত হবে।”

Verse 19

संवर्त उवाच मा स्मैव त्वं पुनरागा: कथंचिद्‌ बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । मा त्वां थक्ष्ये चक्षुषा दारुणेन संक्रुद्धो<हं पावक त्वं निबोध,संवर्तने कहा--अग्ने! तुम मेरी इस बातको अच्छी तरह समझ लो कि अबसे फिर कभी बृहस्पतिको मरुत्तके पास पहुँचानेके लिये तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिये। नहीं तो क्रोधमें भरकर मैं अपनी दारुण दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर डालूँगा

সংবর্ত বললেন—“হে অগ্নি! ভালো করে জেনে রাখো—কোনো অজুহাতেই আর এখানে এসো না, মারুত্তের কাছে বৃহস্পতিকে পৌঁছে দিতে। যদি তুমি আসো, তবে ক্রোধে আমি আমার ভয়ংকর দৃষ্টিতে তোমাকে ভস্ম করে দেব।”

Verse 20

व्यास उवाच ततो देवानगमद्‌ू धूमकेतु- दहिाद्‌ भीतो व्यथितोडश्वृत्थपर्णवत्‌ । त॑ं वै दृष्टवा प्राह शक्रो महात्मा बृहस्पते: संनिधौ हव्यवाहम्‌,व्यासजी कहते हैं--संवर्तकी बात सुनकर अग्निदेव भस्म होनेके भयसे व्यथित हो पीपलके पत्तेकी तरह काँपते हुए तुरंत देवताओंके पास लौट गये। उन्हें आया देख महामना इन्द्रने बृहस्पतिजीके सामने ही पूछा--'अग्निदेव! तुम तो मेरे भेजनेसे बृहस्पतिजीको राजा मरुत्तके पास पहुँचानेका संदेश लेकर गये थे। बताओ, यज्ञकी तैयारी करनेवाले राजा मरुत्त क्या कहते हैं? वे मेरी बात मानते हैं या नहीं?”

ব্যাস বললেন—তখন ধূমকেতু নামে অগ্নি, ভস্ম হয়ে যাওয়ার ভয়ে সন্ত্রস্ত ও ব্যাকুল হয়ে, অশ্বত্থ পাতার মতো কাঁপতে কাঁপতে তৎক্ষণাৎ দেবতাদের কাছে ফিরে গেল। তাকে ফিরে আসতে দেখে মহাত্মা শক্র (ইন্দ্র) বৃহস্পতির সামনেই হব্যবাহ (অগ্নি)-কে জিজ্ঞাসা করলেন—“অগ্নিদেব! আমার আদেশে তুমি রাজা মারুত্তের কাছে বৃহস্পতিকে আনবার বার্তা নিয়ে গিয়েছিলে। বলো—যজ্ঞের প্রস্তুতিতে রত সেই রাজা কী বলে? সে কি আমার বাক্য গ্রহণ করে, না করে না?”

Verse 21

यस्त्वं गत: प्रहितो जातवेदो बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । तत्‌ किं प्राह स नृपो यक्ष्यमाण: कच्चिद्‌ वच: प्रतिगृह्लाति तच्च,व्यासजी कहते हैं--संवर्तकी बात सुनकर अग्निदेव भस्म होनेके भयसे व्यथित हो पीपलके पत्तेकी तरह काँपते हुए तुरंत देवताओंके पास लौट गये। उन्हें आया देख महामना इन्द्रने बृहस्पतिजीके सामने ही पूछा--'अग्निदेव! तुम तो मेरे भेजनेसे बृहस्पतिजीको राजा मरुत्तके पास पहुँचानेका संदेश लेकर गये थे। बताओ, यज्ञकी तैयारी करनेवाले राजा मरुत्त क्या कहते हैं? वे मेरी बात मानते हैं या नहीं?”

“হে জাতবেদ (অগ্নি)! তুমি প্রেরিত হয়েছিলে মারুত্তের কাছে বৃহস্পতিকে পৌঁছে দিতে। যজ্ঞ করতে উদ্যত সেই নৃপতি কী বলল? সে কি সেই বার্তা গ্রহণ করে?”

Verse 22

अग्निर॒वाच न ते वाचं रोचयते मरुत्तो बृहस्पतेरज्चलिं प्राहिणोत्‌ सः । संवर्तो मां याजयितेत्युवाच पुनः पुनः स मया याच्यमान:,अग्निने कहा--देवराज! राजा मरुत्तको आपकी बात पंसद नहीं आयी। बृहस्पतिजीको तो उन्होंने हाथ जोड़कर प्रणाम कहलाया है। मेरे बारंबार अनुरोध करनेपर भी उन्होंने यही उत्तर दिया है कि 'संवर्तजी ही मेरा यज्ञ करायेंगे”

অগ্নি বললেন—“দেবরাজ! রাজা মরুত্ত আপনার প্রস্তাবে সম্মতি দেননি। তিনি বৃহস্পতিকে অঞ্জলি বেঁধে প্রণাম-বার্তা পাঠিয়েছেন। আমি বারবার অনুরোধ করলেও তিনি একই কথা বললেন—‘আমার যজ্ঞ কেবল সংবর্তই সম্পাদন করবেন।’”

Verse 23

उवाचेदं मानुषा ये च दिव्या: प्रजापतेयें च लोका महान्त: । तांश्लेल्लभेयं संविदं तेन कृत्वा तथापि नेच्छेयमिति प्रतीत:,उन्होंने यह भी कहा है कि “जो मनुष्यलोक, दिव्यलोक और प्रजापतिके महान्‌ लोक हैं, उन्हें भी यदि इन्द्रके साथ समझौता करके ही पा सकता हूँ तो भी मैं बृहस्पतिजीको अपने यज्ञका पुरोहित बनाना नहीं चाहता हूँ। यह मैं दृढ़ निश्चयके साथ कह रहा हूँ!

তিনি আরও বললেন—“মানুষলোক, দিব্যলোক এবং প্রজাপতির মহান লোকসমূহ—যদি ইন্দ্রের সঙ্গে সন্ধি করেই লাভ করা যায়, তবুও আমি আমার যজ্ঞের পুরোহিত হিসেবে বৃহস্পতিকে গ্রহণ করব না। এ আমার স্থির ও অটল সংকল্প।”

Verse 24

इन्द्र रवाच पुनर्गत्वा पार्थिवं त्वं समेत्य वाक्यं मदीयं प्रापय स्वार्थयुक्तम्‌ । पुनर्यद्‌ युक्तो न करिष्यते वच- स्त्वत्तो वज्ज सम्प्रहर्तास्मि तस्मै,इन्द्रने कहा--अग्निदेव! एक बार फिर जाकर राजा मरुत्तसे मिलो और मेरा अर्थयुक्त संदेश उनके पास पहुँचा दो। यदि तुम्हारे द्वारा दुबारा कहनेपर भी मेरी बात नहीं मानेंगे तो मैं उनके ऊपर वज्रका प्रहार करूँगा

ইন্দ্র বললেন—“অগ্নিদেব! আবার যাও, রাজা মরুত্তের সঙ্গে সাক্ষাৎ করো এবং আমার উদ্দেশ্যপূর্ণ বার্তা তাকে পৌঁছে দাও। তোমার পুনরুক্তির পরও যদি সে আমার কথা না মানে, তবে আমি তাকে বজ্রাঘাতে দণ্ডিত করব।”

Verse 25

अग्निरुवाच गन्धर्वराड्‌ यत्वयं तत्र दूतो बिभेम्यहं वासव तत्र गन्तुम्‌ । संरब्धो मामब्रवीत्‌ तीक्षणरोष: संवर्तो वाक्‍्यं चरितब्रह्म॒चर्य:,अग्निने कहा--देवेन्द्र! ये गन्धर्वराज वहाँ दूत बनकर जायाँ। मैं दुबारा वहाँ जानेसे डरता हूँ; क्योंकि ब्रह्मचारी संवर्तने तीव्र रोषमें भरकर मुझसे कहा था कि “अग्ने! यदि फिर इस प्रकार किसी तरह बृहस्पतिको मरुत्तके पास पहुँचानेके लिये आओगे तो मैं कुपित हो दारुण दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर डालूँगा।” इन्द्र! उनकी इस बातको अच्छी तरह समझ लीजिये

অগ্নি বললেন—“হে বাসব (ইন্দ্র)! যদি গন্ধর্বরাজ সেখানে দূত হয়ে যান, তবে যাক; আমি আবার সেখানে যেতে ভয় পাই। কারণ ব্রহ্মচারী সংবর্ত একবার তীব্র ক্রোধে আমাকে বলেছিল—‘অগ্নি! যদি তুমি আবার কোনোভাবে বৃহস্পতিকে মরুত্তের কাছে পৌঁছে দিতে আসো, তবে আমি ক্রুদ্ধ হয়ে আমার ভয়ংকর দৃষ্টিতে তোমাকে ভস্ম করে দেব।’ হে শক্র, তার সতর্কবাণী ভালো করে বুঝে নাও।”

Verse 26

यद्यागच्छे: पुनरेवं कथंचिद्‌ बृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते । दहेयं त्वां चक्षुषा दारुणेन संक़्रुद्ध इत्येतदवैहि शक्र,अग्निने कहा--देवेन्द्र! ये गन्धर्वराज वहाँ दूत बनकर जायाँ। मैं दुबारा वहाँ जानेसे डरता हूँ; क्योंकि ब्रह्मचारी संवर्तने तीव्र रोषमें भरकर मुझसे कहा था कि “अग्ने! यदि फिर इस प्रकार किसी तरह बृहस्पतिको मरुत्तके पास पहुँचानेके लिये आओगे तो मैं कुपित हो दारुण दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर डालूँगा।” इन्द्र! उनकी इस बातको अच्छी तरह समझ लीजिये

সে বলেছিল—“তুমি যদি আবার কোনোভাবে বৃহস্পতিকে মরুত্তের কাছে পৌঁছে দিতে আসো, তবে আমি ক্রুদ্ধ হয়ে আমার ভয়ংকর দৃষ্টিতে তোমাকে দগ্ধ করে দেব।” হে শক্র, এ কথা ভালো করে জেনে রাখো।

Verse 27

शक्र उवाच त्वमेवान्यान्‌ दहसे जातवेदो न हि त्वदन्यो विद्यते भस्मकर्ता | त्वत्संस्पर्शात्‌ सर्वलोको बिभेति अश्रद्धेयं वदसे हव्यवाह,इन्द्रने कहा--हव्यवाहन! अग्निदेव! तुम तो ऐसी बात कह रहे हो, जिसपर विश्वास नहीं होता; क्योंकि तुम्हीं दूसरोंको भस्म करते हो। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई भस्म करनेवाला नहीं है। तुम्हारे स्पर्शसे सभी लोग डरते हैं

শক্র বললেন— হে জাতবেদ! তুমিই সকলকে দগ্ধ করো; তোমাকে ছাড়া আর কোনো ভস্মকারক নেই। তোমার স্পর্শমাত্রেই সমগ্র লোক ভয়ে কাঁপে। অতএব, হে হব্যবাহ, তুমি যা বলছ তা অবিশ্বাস্য বলেই মনে হয়।

Verse 28

अग्निर्वाच दिवं देवेन्द्र पृथिवीं च सर्वा संवेष्टयेस्त्वं स्‍्वबलेनैव शक्र । एवंविधस्येह सतस्तवासौ कथं वृत्रस्त्रिदिवं प्राग्‌ जहार,अग्निदेवने कहा--देवेन्द्र! आप भी तो अपने बलसे सारी पृथ्वी और स्वर्गलोकको आवेष्टित किये हुए हैं। ऐसे होनेपर भी आपके इस स्वर्गको पूर्वकालमें वृत्रासुरने कैसे हर लिया?

অগ্নি বললেন— হে দেবেন্দ্র, হে শক্র! তোমার নিজ শক্তিতেই তুমি সমগ্র পৃথিবী ও স্বর্গকে পরিবেষ্টন করে আছ। তবু এমন সামর্থ্য থাকা সত্ত্বেও, প্রাচীনকালে বৃত্র কীভাবে তোমার ত্রিদিব অধিকার করেছিল?

Verse 29

इन्द्र वाच न गण्डिकाकारयोगं करे<णुं न चारिसोम॑ प्रपिबामि वल्ले न क्षीणशक्तौ प्रहरामि वजन को मे5सुखाय प्रहरेत मर्त्य:,इन्द्रने कहा--अग्निदेव! मैं पर्वतको भी मक्खीके समान छोटा कर सकता हूँ तो भी शत्रुका दिया हुआ सोमरस नहीं पीता हूँ और जिसकी शक्ति क्षीण हो गयी है, ऐसे शत्रुपर वज्रका प्रहार नहीं करता। फिर भी कौन ऐसा मनुष्य है जो मुझे कष्ट पहुँचानेके लिये मुझपर प्रहार कर सके?

ইন্দ্র বললেন— হে অগ্নিদেব! আমি পর্বতকেও মাছির মতো ক্ষুদ্র করতে পারি, তবু শত্রুর দেওয়া সোম পান করি না; আর যার শক্তি ক্ষয় হয়েছে, তার উপর বজ্রাঘাত করি না। তবে কোন মর্ত্য আমাকে দুঃখ দিতে আঘাত করতে পারে?

Verse 30

प्रत्राजयेयं कालकेयान्‌ पृथिव्या- मपाकर्षन्‌ दानवानन्तरिक्षात्‌ दिव: प्रह्लादमवसानमानयं को मे5सुखाय प्रहरेत मानव:,मैं चाहूँ तो कालकेय-जैसे दानवोंको आकाशसे खींचकर पृथ्वीपर गिरा सकता हूँ। इसी प्रकार स्वर्गसे प्रह्नादके प्रभुत्वका भी अन्त कर सकता हूँ, फिर मनुष्योंमें कौन ऐसा है जो वष्ट देनेके लिये मुझपर प्रहार कर सके?

আমি ইচ্ছা করলে কালকেয় প্রভৃতি দানবদের আকাশ থেকে টেনে এনে পৃথিবীতে নিক্ষেপ করতে পারি; তেমনি স্বর্গে প্রহ্লাদের আধিপত্যেরও অবসান ঘটাতে পারি। তবে কোন মানুষ আমাকে দুঃখ দিতে আঘাত করতে পারে?

Verse 31

अग्निर्वाच यत्र शर्यातिं च्यवनो याजयिष्यन्‌ सहाश्रिभ्यां सोममगृह्नादेक: । त॑ त्वं क्रुद्धः प्रत्यषेधी: पुरस्ता- च्छर्यातियज्ञं समर त॑ महेन्द्र,अग्निदेवने कहा--महेन्द्र! राजा शर्यातिके उस यज्ञका तो स्मरण कीजिये, जहाँ महर्षि च्यवन उनका यज्ञ करानेवाले थे। आप क्रोधमें भरकर उन्हें मना करते ही रह गये और उन्होंने अकेले अपने ही प्रभावसे सम्पूर्ण देवताओंसहित अश्विनीकुमारोंके साथ सोमरसका पान किया

অগ্নি বললেন— হে মহেন্দ্র! রাজা শর্যাতির সেই যজ্ঞ স্মরণ করো, যেখানে ঋষি চ্যবন যজ্ঞ পরিচালনা করছিলেন। তুমি ক্রোধে আগে থেকেই বাধা দিতে চেয়েছিলে, কিন্তু তিনি একাই নিজের তপোবলে সোম অর্জন করে অশ্বিনীকুমারসহ দেবগণকে তা পান করিয়েছিলেন।

Verse 32

वजन गृहीत्वा च पुरन्दर त्वं सम्प्राहार्षीक्ष्यवनस्यातिघोरम्‌ । स ते विप्र: सह वज्ेण बाहु- मपागृह्नात्‌ तपसा जातमन्यु:,पुरंदर! उस समय आप अत्यन्त भयंकर वज्र लेकर महर्षि च्यवनके ऊपर प्रहार करना ही चाहते थे; किंतु उन ब्रह्मर्षिने कुपित होकर अपने तपोबलसे आपकी बाँहको वज्जसहित जकड़ दिया

হে পুরন্দর! একদা তুমি ভয়ংকর বজ্র ধারণ করে মহর্ষি চ্যবনের উপর আঘাত হানতে উদ্যত হয়েছিলে; কিন্তু ক্রুদ্ধ সেই ব্রহ্মর্ষি তপোবলে বজ্রসহ তোমার বাহু অবরুদ্ধ করলেন।

Verse 33

ततो रोषात्‌ सर्वतो घोररूप॑ सपत्नं ते जनयामास भूख: । मर्द नामासूुरं विश्वरूपं य॑ त्वं दृष्टवा चक्षुषी संन्यमील:,तदनन्तर उन्होंने पुनः रोषपूर्वक आपके लिये सब ओरसे भयानक रूपवाले एक शत्रुको उत्पन्न किया। जो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त मद नामक असुर था और जिसे देखते ही आपने अपनी आँखें बंद कर ली थीं

তারপর ক্রোধে পৃথিবী তোমার জন্য চারদিক থেকে ভয়ংকর রূপবিশিষ্ট এক শত্রু উৎপন্ন করল—মর্দ নামে সেই অসুর, যার রূপ সমগ্র বিশ্বে ব্যাপ্ত ছিল; তাকে দেখামাত্রই তুমি চোখ বুজে ফেললে।

Verse 34

हनुरेका जगतीस्था तथैका दिव॑ गता महतो दानवस्य । सहस॑ दन्‍्तानां शतयोजनानां सुतीक्ष्णानां घोररूपं बभूव,उस विशालकाय दानवकी एक ठोढ़ी पृथ्वीपर टिकी हुई थी और दूसरा ऊपरका ओठ स्वर्गसे जा लगा था। उसके सैकड़ों योजन लंबे सहस्रों तीखे दाँत थे, जिससे उसका रूप बड़ा भयंकर प्रतीत होता था

সেই মহাদানবের এক চোয়াল পৃথিবীতে স্থিত ছিল, আর অন্যটি স্বর্গ পর্যন্ত পৌঁছেছিল। তার ছিল সহস্র সহস্র অতিশয় তীক্ষ্ণ দাঁত—প্রতিটি শত যোজন দীর্ঘ; তাই তার রূপ ভয়ংকর হয়ে উঠেছিল।

Verse 35

वृत्ता: स्थूला रजतस्तम्भवर्णा देष्टाश्बतस्रो द्वे शते योजनानाम्‌ | स त्वां दन्तान्‌ विदशन्नभ्यधाव- ज्जिघांसया शूलमुद्यम्य घोरम्‌,उसकी चार दाढ़ें गोलाकार, मोटी और चाँदीके खम्भोंके समान चमकीली थीं। उनकी लंबाई दो-दो सौ योजनकी थी। वह दानव भयंकर त्रिशूल लेकर आपको मार डालनेकी इच्छासे दाँत पीसता हुआ दौड़ा था

তার চারটি দংশনদাঁত ছিল গোলাকার, স্থূল এবং রৌপ্যস্তম্ভের মতো দীপ্তিমান—প্রতিটি দুইশো যোজন দীর্ঘ। সে দানব দাঁত কিড়মিড় করতে করতে, ভয়ংকর ত্রিশূল তুলে, তোমাকে বধ করার অভিপ্রায়ে তোমার দিকে ধেয়ে এল।

Verse 36

अपश्यस्त्वं तं तदा घोररूपं सर्वे वै त्वां ददृशुर्दर्शनीयम्‌ । यस्माद्‌ भीत: प्राञ्जलिस्त्वं महर्षि- मागच्छेथा: शरणं दानवघ्न,दानवदलन देवराज! आपने उस समय उस घोररूपधारी दानवको देखा था और अन्य सब लोगोंने आपकी ओर भी दृष्टिपात किया था। उस अवसरपर भयके कारण आपकी जो दशा हुई थी, वह देखने ही योग्य थी। आप उस दानवसे भयभीत हो हाथ जोड़कर महर्षि च्यवनकी शरणमें गये थे

দানবদলন দেবরাজ! তখন তুমি সেই ঘোররূপধারী দানবকে দেখেছিলে, আর সকলেই তোমার দিকেও তাকিয়েছিল—ভয়ে তোমার যে অবস্থা হয়েছিল, তা সত্যিই দেখার মতো ছিল। সেই দানবকে ভয় পেয়ে তুমি করজোড়ে মহর্ষি চ্যবনের শরণ নিয়েছিলে।

Verse 37

क्षात्राद्‌ बलाद्‌ ब्रह्मबलं गरीयो न ब्रह्मतः किंचिदन्यद्‌ गरीय: । सोऊहं जानन्‌ ब्रह्मतेजो यथाव- न्न संवर्त जेतुमिच्छामि शक्र,अत: देवेन्द्र! क्षात्रबलकी अपेक्षा ब्राह्मणबल श्रेष्ठतम है। ब्राह्मणसे बढ़कर दूसरी कोई शक्ति नहीं है। मैं ब्रह्मतेजको अच्छी तरह जानता हूँ; अतः संवर्तको जीतनेकी मुझे इच्छातक नहीं होती है

শক্র (ইন্দ্র) বললেন—ক্ষাত্রবল অপেক্ষা ব্রহ্মবলই অধিক গুরু; ব্রাহ্মণশক্তির ঊর্ধ্বে আর কোনো শক্তি নেই। ব্রহ্মতেজের প্রকৃত মহিমা আমি যথার্থই জানি; অতএব সংবর্তকে জয় করার ইচ্ছাও আমার মনে জাগে না।

Frequently Asked Questions

Whether divine authority may justifiably intervene to control a king’s choice of officiating priest—i.e., the boundary between legitimate counsel and coercive manipulation in ritual governance.

Power is plural: kṣatra-force and divine might do not automatically override brahma-tejas; prudent policy recognizes institutional limits and the consequences of violating priestly-ascetic authority.

No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the meta-commentary is implicit in the narrative logic that ritual legitimacy and brahmatejas function as higher constraints within the epic’s moral-political order.