
यज्ञवाटवैभववर्णनम् / Description of the Splendour of the Sacrificial Enclosure
Upa-parva: Aśvamedha-yajña-vaiśiṣṭya (Description of the Sacrificial Arena and Abundance)
Vaiśaṃpāyana describes how, as the Aśvamedha proceeds, skilled disputants engage in reasoned debate while assembled kings observe the exemplary ritual order. The yajñavāṭa is portrayed through material and procedural markers: golden gateways, jewel-adorned resting and seating arrangements, and an array of vessels—pots, bowls, cauldrons, jars, and auspicious containers—so abundant that nothing appears non-golden. The consecrated wooden yūpas are set up according to śāstric prescription and proper timing, emphasizing correctness (vidhi) and radiance. A comprehensive gathering of beings is noted—land and aquatic animals, cattle and buffaloes, birds, wild creatures, and an encyclopedic taxonomy of life-forms—conveying the rite’s cosmological scope. The arena overflows with food-grain and wealth: mountain-like heaps of provisions, streams of curd, and lake-like expanses of ghee. The scale is such that Jambūdvīpa appears symbolically assembled in one place; numerous groups arrive, receive wealth, and depart. Kings serve eminent Brahmins in vast numbers; attendants offer diverse foods and drinks, and drums resound daily like thunder as the sacrifice continues in ordered continuity under Dharmarāja Yudhiṣṭhira.
Chapter Arc: अश्वमेध-यज्ञ के आरम्भ के पश्चात् कथा का प्रवाह युद्धोत्तर शान्ति से हटकर एक नई बेचैनी पर टिकता है—हृषीकेश कृष्ण के सामने यह प्रश्न उठता है कि सर्वविजयी अर्जुन भीतर से सुखविवर्जित क्यों रहता है। → कृष्ण के प्रति जिज्ञासा गहराती है: सुना गया है कि अनेक देशों में फिर-फिर युद्ध हुए; अर्जुन जहाँ-जहाँ गया, वहाँ धूल-धूसरित घोड़े के पीछे राजाओं की हलचल, जन-समूह की हर्षध्वनि और विजय-यात्रा का कोलाहल उठा। पर इस बाहरी जय के बीच अर्जुन के मन का भार कथा को कसता जाता है। → अर्जुन की वापसी का दृश्य चरम पर पहुँचता है—रेणु-राशि उठती है, जनों की हर्षकारी वाणी गूँजती है, और अर्जुन धर्मराज युधिष्ठिर के चरणों में प्रणाम कर भीमादि भ्राताओं का पूजन करता हुआ केशव (कृष्ण) के समीप बैठता है; विजय-समाचार के साथ ही युधिष्ठिर की आँखों में आनन्दाश्रु छलकते हैं और दूत/वृत्तान्त-निवेदक को बहुधन दान दिया जाता है। → कुरु-सभा में स्वागत-सत्कार के बाद अर्जुन थके हुए पारगामी की भाँति विश्राम पाता है; विजय-यात्रा का औपचारिक समापन और राजसभा की स्वीकृति से अश्वमेध का अभियान स्थिरता की ओर लौटता है। → बभ्रुवाहन का अपनी दोनों माताओं सहित कुरुदेश में आगमन एक नया प्रसंग खोलता है—यह आगमन केवल शुभ-संदेश है या किसी पुराने बन्धन/प्रतिज्ञा का पुनः स्मरण?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्चमेध-यज्ञका आरम्भविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८६ ॥। ऑपन-आक्राा बछ। अर: सप्ताशीतितमोब ध्याय: अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिछ्िरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्राज्भदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन युधिष्ठिर उवाच श्रुतं प्रियमिदं कृष्ण यत् त्वमहसि भाषितुम् । तन्मे5मृतरसं पुण्यं मनो ह्लादयति प्रभो,युधिष्ठिर बोले--प्रभो! श्रीकृष्ण! मैंने यह प्रिय संदेश सुना, जिसे आप ही कहने या सुनानेके योग्य हैं। आपका यह अमृतरससे परिपूर्ण पवित्र वचन मेरे मनको आनन्दमग्न किये देता है
যুধিষ্ঠির বললেন—হে প্রভু কৃষ্ণ, আমি এই প্রিয় বার্তা শুনেছি, যা বলার যোগ্য একমাত্র আপনিই। হে প্রভু, অমৃতরসে পরিপূর্ণ আপনার এই পবিত্র বাক্য আমার মনকে আনন্দিত করে।
Verse 2
बहूनि किल युद्धानि विजयस्य नराधिपै: । पुनरासन् हषीकेश तत्र तत्र च मे श्रुतम्,हृषीकेश! मेरे सुननेमें आया है कि भिन्न-भिन्न देशोंमें वहाँके राजाओंके साथ अर्जुनको कई बार युद्ध करने पड़े हैं
যুধিষ্ঠির বললেন— হে হৃষীকেশ! আমি শুনেছি, বিজয় নিশ্চিত করতে নানা দেশে নানা স্থানের রাজাদের সঙ্গে বারবার বহু যুদ্ধ করতে হয়েছে।
Verse 3
कि निमित्तं स नित्यं हि पार्थ: सुखविवर्जित: । अतीव विजयो धीमन्निति मे दूयते मनः,इसका क्या कारण है? बुद्धिमान् जनार्दन! जब मैं एकान्तमें बैठकर अर्जुनके बारेमें विचार करता हूँ, तब यह जानकर मेरा मन खिन्न हो जाता है कि हमलोगोंमें वे ही सदा सबसे अधिक दु:खके भागी रहे हैं। पाण्डुनन्दन अर्जुन सुखसे वंचित क्यों रहते हैं? यह समझमें नहीं आता
যুধিষ্ঠির বললেন— কী কারণে পার্থ যেন সর্বদাই সুখবঞ্চিত? অতিশয় বিজয়ী হয়েও, হে প্রজ্ঞাবান জনার্দন, এই ভাবনা আমার হৃদয়কে দগ্ধ করে। আমি যখন একান্তে বসে অর্জুনকে স্মরণ করি, তখন বিষণ্ণ হই— আমাদের মধ্যে সে-ই যেন নিরন্তর সর্বাধিক দুঃখের ভাগী। কেন পাণ্ডুনন্দন অর্জুন স্বস্তি ও সন্তোষ থেকে বঞ্চিত?
Verse 4
संचिन्तयामि कौन्तेयं रहो जिष्णुं जनार्दन । अतीव दुःखभागी स सतत पाण्डुनन्दन:,इसका क्या कारण है? बुद्धिमान् जनार्दन! जब मैं एकान्तमें बैठकर अर्जुनके बारेमें विचार करता हूँ, तब यह जानकर मेरा मन खिन्न हो जाता है कि हमलोगोंमें वे ही सदा सबसे अधिक दु:खके भागी रहे हैं। पाण्डुनन्दन अर्जुन सुखसे वंचित क्यों रहते हैं? यह समझमें नहीं आता
যুধিষ্ঠির বললেন— হে জনার্দন! আমি একান্তে বসে কুন্তীপুত্র, অজেয় বীর জিষ্ণু অর্জুনকে স্মরণ করলে আমার মন গভীর দুঃখে ভরে ওঠে। কারণ আমাদের মধ্যে পাণ্ডুনন্দনই যেন নিরন্তর সর্বাধিক দুঃখের ভাগী। কেন সে বারবার স্বস্তি ও সুখ থেকে বঞ্চিত হয়?
Verse 5
कि नु तस्य शरीरेडस्ति सर्वलक्षणपूजिते | अनिष्टं लक्षणं कृष्ण येन दुःखान्युपाश्नुते,श्रीकृष्ण! उनका शरीर तो सभी शुभलक्षणोंसे सम्पन्न है। फिर उसमें अशुभ लक्षण कौन-सा है, जिससे उन्हें अधिक दुःख उठाना पड़ता है?
যুধিষ্ঠির বললেন— হে কৃষ্ণ! তার দেহ তো সকল শুভলক্ষণে ভূষিত ও পূজিত। তবে কোন অশুভ লক্ষণ তার মধ্যে আছে, যার ফলে তাকে এত দুঃখ ভোগ করতে হয়?
Verse 6
अतीवासुखभोगी स सततं कुन्तिनन्दन: । न हि पश्यामि बीभत्सोर्निन्द्य गात्रेषु किंचन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तन्मे व्याख्यातुमरहसि,कुन्तीनन्दन अर्जुन सदा अधिक कष्ट भोगते हैं; परंतु उनके अंगोंमें कहीं कोई निन्दनीय दोष नहीं दिखायी देता है। ऐसी दशामें उन्हें कष्ट भोगनेका कारण क्या है? यह मैं सुनना चाहता हूँ। आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बात बतावें
যুধিষ্ঠির বললেন— কুন্তীনন্দন অর্জুনকে তো সর্বদাই মহাদুঃখ ভোগ করতে হয় বলে মনে হয়; কিন্তু ভীভৎসুর অঙ্গে আমি কোনো নিন্দনীয় দোষ দেখি না। যদি এ কথা আমার শোনার যোগ্য হয়, তবে অনুগ্রহ করে ব্যাখ্যা করুন— কোনো দৃশ্যমান দোষ না থাকলেও কেন তাকে ক্লেশ ভোগ করতে হয়?
Verse 7
इत्युक्त: स हृषीकेशो ध्यात्वा सुमहदुत्तरम् राजानं भोजराजन्यवर्धनो विष्णुरब्रवीत्,युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भोजवंशी क्षत्रियोंकी वृद्धि करनेवाले भगवान् हृषीकेश विष्णुने बहुत देरतक उत्तम रीतिसे चिन्तन करनेके बाद राजा युधिष्ठिरसे यों कहा --
যুধিষ্ঠিরের এই প্রশ্ন শুনে ভোজবংশীয় ক্ষত্রিয়দের বর্ধনকারী ভগবান হৃষীকেশ বিষ্ণু বহুক্ষণ উত্তমভাবে ধ্যান করে রাজা যুধিষ্ঠিরকে এইভাবে বললেন—
Verse 8
न हास्य नृपते किंचित् संश्लिष्टमुपलक्षये । ऋते पुरुषसिंहस्य पिण्डिके5स्याधिके यत:,“नरेश्वर! पुरुषसिंह अर्जुनकी पिण्डलियाँ (फिल्लियाँ) औसतसे कुछ अधिक मोटी हैं। इसके सिवा और कोई अशुभ लक्षण उनके शरीरमें मुझे भी नहीं दिखायी देता है”
হে নরেশ্বর! পুরুষসিংহ অর্জুনের পিণ্ডলী (পাছের পেশি) সাধারণের তুলনায় কিছুটা মোটা—এটুকু ছাড়া তাঁর দেহে অশুভ বা ভয়জনক কোনো লক্ষণ আমি দেখি না।
Verse 9
स ताभ्यां पुरुषव्याप्रो नित्यमध्वसु वर्तते । न चान्यदनुपश्यामि येनासौ दुःखभाजनम्,“उन मोटी फिल्लियोंके कारण ही पुरुषसिंह अर्जुनको सदा रास्ता चलना पड़ता है। और कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता, जिससे उन्हें दुःख झेलना पड़े"
ওই দুই মোটা পিণ্ডলীর কারণেই পুরুষব্যাঘ্র অর্জুনকে সর্বদা পথে পথে চলতে হয়। এ ছাড়া তিনি দুঃখভাজন হবেন—এমন আর কোনো কারণ আমি দেখি না।
Verse 10
इत्युक्त: पुरुषश्रेष्टस्तदा कृष्णेन धीमता । प्रोवाच वृष्णिशार्टूलमेवमेतदिति प्रभो,प्रभो! बुद्धिमान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उन वृष्णिसिंहसे कहा --'भगवन्! आपका कहना ठीक है”
বুদ্ধিমান শ্রীকৃষ্ণ এ কথা বললে, পুরুষশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির সেই বৃষ্ণিশার্দূলকে বললেন—“প্রভু! আপনার কথাই সত্য; ঠিক তাই।”
Verse 11
कृष्णा तु द्रौपदी कृष्णं तिर्यक् सासूयमैक्षत । प्रतिजग्राह तस्यास्तं प्रणयं चापि केशिहा
কিন্তু কৃষ্ণা দ্রৌপদী ঈর্ষা ও অভিমানমিশ্রিত তির্যক দৃষ্টিতে কৃষ্ণের দিকে তাকালেন। কেশিহা কৃষ্ণ তার সেই ভাব—অকথিত অভিযোগ এবং স্নেহ—উভয়ই গ্রহণ করলেন।
Verse 12
तत्र भीमादयस्ते तु कुरवो याजकाश्न ये
সেখানে ভীম প্রভৃতি সেই কুরুগণ উপস্থিত ছিলেন—যাঁরা যজ্ঞকর্মে নিয়োজিত ছিলেন এবং হব্যভাগ গ্রহণ করে পবিত্র ক্রিয়ায় অংশ নিয়েছিলেন।
Verse 13
तेषां कथयतामेव पुरुषो<र्जुनसंकथा:
যুধিষ্ঠির বললেন—“তাঁরা পরস্পরে কথা বলতেই ছিলেন, এমন সময় প্রসঙ্গ গিয়ে পড়ল অর্জুনে; তাঁর কীর্তি ও কাহিনিই তাদের আলাপের বিষয় হয়ে উঠল।”
Verse 14
सो5भिगम्य कुरुश्रेष्ठ नमस्कृत्य च बुद्धिमान्
তখন সেই বুদ্ধিমান ব্যক্তি কুরুশ্রেষ্ঠের নিকট গিয়ে প্রণাম করে বিনয় ও শিষ্টাচারসহ কথা বলল—ধর্মের আদর্শ সেই পূজ্যজনের প্রতি যথোচিত আচরণ করে।
Verse 15
उपायात॑ नरव्याप्र॑ फाल्गुनं प्रत्यवेदयत् । वह बुद्धिमान् दूत कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिके पास जा उन्हें नमस्कार करके बोला --'पुरुषसिंह अर्जुन निकट आ गये हैं' ।। १४ $ ।। तच्छुत्वा नृपतिस्तस्य हर्षबाष्पाकुलेक्षण:
তখন সেই বুদ্ধিমান দূত কুরুশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠিরের কাছে এসে প্রণাম করে বলল—“নরব্যাঘ্র অর্জুন নিকটে এসে পৌঁছেছেন।” এ কথা শুনে রাজার চোখ আনন্দাশ্রুতে ভরে উঠল।
Verse 16
ततो द्वितीये दिवसे महान् शब्दो व्यवर्धत
তারপর দ্বিতীয় দিনে এক মহা কোলাহল উঠল এবং ক্রমে ক্রমে আরও বেড়ে চলল।
Verse 17
ततो रेणु: समुद्भूतो विबभौ तस्य वाजिन:
তখন সেই অশ্বের গমনচাঞ্চল্যে ধূলির মেঘ উঠল এবং চারদিকে ছড়িয়ে পড়ল।
Verse 18
तत्र हर्षकरी वाचो नराणां शुश्रुवे&र्जुन:
সেখানে অর্জুন জনসাধারণের মুখে আনন্দদায়ক কথা শুনলেন।
Verse 19
दिष्ट्यासि पार्थ कुशली धन्यो राजा युधिष्ठिर: । वहाँ अर्जुनने लोगोंके मुँहसे हर्ष बढ़ानेवाली बातें इस प्रकार सुनीं--'पार्थ! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम सकुशल लौट आये। राजा युधिष्ठिर धन्य हैं ।। कोडन्यो हि पृथिवीं कृत्स्नां जित्वा हि युधि पार्थिवान्
‘পার্থ! সৌভাগ্য যে তুমি কুশলে ফিরে এসেছ; রাজা যুধিষ্ঠির ধন্য।’
Verse 20
ये व्यतीता महात्मानो राजान: सगरादय:
যে মহাত্মা রাজাগণ—সগর প্রভৃতি—অতীতে গত হয়ে গেছেন,
Verse 21
नैतदन्ये करिष्यन्ति भविष्या वसुधाधिपा:
ভবিষ্যতের পৃথিবীপতি রাজাগণ এ কর্ম করতে পারবেন না।
Verse 22
इत्येवं वदतां तेषां पुंसां कर्णसुखा गिर:
এভাবে সেই পুরুষেরা কথা বলতে থাকলে তাদের বাক্য কর্ণসুখকর ছিল।
Verse 23
ततो राजा सहामात्य: कृष्णश्न॒ यदुनन्दन:
তখন রাজা মন্ত্রীদের সহিত এবং যদুনন্দন শ্রীকৃষ্ণকে সঙ্গে নিয়ে (অগ্রসর হলেন)।
Verse 24
सो5भिवाद्य पितु: पादौ धर्मराजस्य धीमत:
সে তার পিতা—বুদ্ধিমান ধর্মরাজের—চরণে প্রণাম করল।
Verse 25
तैः समेत्यार्चितस्तांश्ष प्रत्यर्च्याथ यथाविधि
তাদের সঙ্গে মিলিত হয়ে এবং তাদের দ্বারা যথোচিতভাবে সম্মানিত হয়ে, যুধিষ্ঠিরও বিধিমতো তাদের প্রত্যর্চনা করে সম্মান জানালেন।
Verse 26
एतस्मिन्नेव काले तु स राजा बभ्रुवाहन:
ঠিক সেই সময়েই সেই রাজা বভ্রুবাহন (সেখানে উপস্থিত হলেন)।
Verse 27
तत्र वृद्धान् यथावत् स कुरूनन्यांश्व पार्थिवान्,वहाँ पहुँचकर वह महाबाहु नरेश कुरुकुलके वृद्ध पुरुषों तथा अन्य राजाओंको विधिवत् प्रणाम करके स्वयं भी उनके द्वारा सत्कार पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद वह अपनी पितामही कुन्तीके सुन्दर महलमें गया
সেখানে পৌঁছে মহাবাহু নৃপতি কুরুবংশের বৃদ্ধজন ও অন্যান্য রাজাদের যথাবিধি প্রণাম করলেন। তাঁদের সাদর অভ্যর্থনা পেয়ে তিনি অত্যন্ত প্রসন্ন হলেন। তারপর তিনি পিতামহী কুন্তীর মনোরম প্রাসাদে প্রবেশ করলেন।
Verse 28
अभिवाद्य महबाहुस्तैश्वापि प्रतिनन्दित: । प्रविवेश पितामहय॒ा: कुन्त्या भवनमुत्तमम्,वहाँ पहुँचकर वह महाबाहु नरेश कुरुकुलके वृद्ध पुरुषों तथा अन्य राजाओंको विधिवत् प्रणाम करके स्वयं भी उनके द्वारा सत्कार पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद वह अपनी पितामही कुन्तीके सुन्दर महलमें गया
যথাবিধি প্রণাম করে সেই মহাবাহু নৃপতি তাঁদের দ্বারা অভিনন্দিত হলেন। তাঁদের সম্মানে প্রসন্ন হয়ে তিনি পিতামহী কুন্তীর উত্তম ভবনে প্রবেশ করলেন।
Verse 87
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अर्जुनप्रत्यागमने सप्ताशीतितमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের আশ্বমেধিক পর্বের অন্তর্গত অনুগীতা-পর্বে অর্জুন-প্রত্যাগমন-বিষয়ক সাতাশি-তম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 113
सख्यु: सखा हृषीकेश: साक्षादिव धनंजय: । उस समय द्रुपदकुमारी कृष्णाने भगवान् श्रीकृष्णकी ओर तिरछी चितवनसे ईर्ष्यापूर्वक देखा। केशिहन्ता श्रीकृष्णने द्रौपदीके उस प्रेमपूर्ण उपालम्भको सानन्द ग्रहण किया; क्योंकि उसकी दृष्टिमें सखा अर्जुनके मित्र भगवान् हृषीकेश साक्षात् अर्जुनके ही समान थे
যুধিষ্ঠির বললেন— “হৃষীকেশ শ্রীকৃষ্ণ বন্ধুরও বন্ধু; ধনঞ্জয়ের কাছে তিনি যেন স্বয়ং অর্জুনই।” সেই মুহূর্তে দ্রুপদকন্যা কৃষ্ণা ঈর্ষামিশ্রিত তির্যক দৃষ্টিতে ভগবান শ্রীকৃষ্ণের দিকে তাকালেন। কেশিহন্তা শ্রীকৃষ্ণ তাঁর স্নেহময়, প্রেমরঞ্জিত উপালম্ভ আনন্দের সঙ্গে গ্রহণ করলেন; কারণ তাঁর দৃষ্টিতে অর্জুনের সখা হৃষীকেশ যেন প্রত্যক্ষই অর্জুনসম।
Verse 126
रेमु: श्रुत्वा विचित्रां तां धनंजयकथां शुभाम् । उस समय भीमसेन आदि कौरव और यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणलोग अर्जुनके सम्बन्धमें यह शुभ एवं विचित्र बात सुनकर बहुत प्रसन्न हो रहे थे
যুধিষ্ঠির বললেন— ধনঞ্জয়কে নিয়ে সেই মঙ্গলময় ও বিস্ময়কর কাহিনি শুনে তাঁরা সকলেই আনন্দিত হলেন। সেই সময় ভীমসেন প্রমুখ কৌরবগণ এবং যজ্ঞ পরিচালনাকারী ব্রাহ্মণগণ, অর্জুন-সম্পর্কিত এই শুভ ও বিচিত্র সংবাদ শুনে অত্যন্ত প্রসন্ন ছিলেন।
Verse 133
उपायाद् वचनाद् दूतो विजयस्य महात्मन: । उन लोगोंमें अर्जुनके सम्बन्धमें इस तरहकी बातें हो ही रही थीं कि महात्मा अर्जुनका भेजा हुआ दूत वहाँ आ पहुँचा
তাঁরা পরস্পরে অর্জুন সম্বন্ধে এইরূপ কথাবার্তা বলিতেছিলেন, এমন সময় বিজয়খ্যাত মহাত্মা অর্জুনের প্রেরিত দূত সেখানে উপস্থিত হইল।
Verse 163
आगच्छति नरव्याप्रे कौरवाणां धुरंधरे । तदनन्तर दूसरे दिन कौरव-धुरंधर नरव्यात्र अर्जुके आते समय नगरमें महान् कोलाहल बढ़ गया
যুধিষ্ঠির বলিলেন— “হে নরব্যাঘ্র! কৌরবদের ভারবাহক ধুরন্ধর আসিতেছে।” পরদিন তাহার আগমনে নগরে মহা কোলাহল উঠিল।
Verse 173
अभितो वर्तमानस्य यथोच्चै:श्रवसस्तथा । उच्चै:श्रवाके समान वेगवान् और पास ही विद्यमान उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेकी टापसे उड़ी हुई धूल आकाशमें अद्भुत शोभा पा रही थी
যুধিষ্ঠির বলিলেন— “নিকটে বিচরণকারী সেই যজ্ঞ-অশ্ব উচ্চৈঃশ্রবার ন্যায় বেগবান। তাহার খুরে উড়া ধূলি আকাশে আশ্চর্য শোভা লাভ করিতেছিল।”
Verse 193
चारयित्वा हयश्रेष्ठमुपागच्छेदृते3$र्जुनात् । 'अर्जुनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर पुरुष है जो समूची पृथ्वीको जीतकर युद्धमें राजाओंको परास्त करके और अपने श्रेष्ठ अश्वको सर्वत्र घुमाकर उसके साथ सकुशल लौट आ सके
যুধিষ্ঠির বলিলেন— “শ্রেষ্ঠ অশ্বকে বিচরণ করাইয়া, সমগ্র পৃথিবী জয় করিয়া, যুদ্ধে রাজাদের পরাস্ত করিয়া এবং সেই উত্তম অশ্বকে সর্বত্র ঘুরাইয়া তাহার সহিত কুশলে প্রত্যাবর্তন করিতে—অর্জুন ব্যতীত—আর কে পারে?”
Verse 206
तेषामपीदृशं कर्म न कदाचन शुश्रुम । “अतीतकालमें जो सगर आदि महामनस्वी राजा हो गये हैं, उनका भी कभी ऐसा पराक्रम हमारे सुननेमें नहीं आया था
যুধিষ্ঠির বলিলেন— “অতীতকালের সেই রাজাদেরও এমন কর্ম আমরা কখনও শুনি নাই; সগর প্রভৃতি মহামনস্বী নৃপতিদের কাহিনীতেও এমন পরাক্রম শ্রুত হয় নাই।”
Verse 213
यत् त्वं कुरुकुलश्रेष्ठ दुष्करं कृतवानसि । “कुरुकुलश्रेष्ठी आपने जो दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है, उसे भविष्यमें होनेवाले दूसरे भूपाल नहीं कर सकेंगे”
যুধিষ্ঠির বললেন—হে কুরুবংশশ্রেষ্ঠ! তুমি যে দুঃসাধ্য কীর্তি সাধন করেছ, ভবিষ্যতের রাজাগণও তার সমকক্ষ হতে পারবে না।
Verse 226
शृण्वन् विवेश धर्मात्मा फाल्गुनो यज्ञसंस्तरम् । इस प्रकार कहते हुए लोगोंकी श्रवणसुखद बातें सुनते हुए धर्मात्मा अर्जुनने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया
লোকজনের কর্ণসুখকর বাক্য শুনতে শুনতে ধর্মাত্মা ফাল্গুন (অর্জুন) যজ্ঞমণ্ডপে প্রবেশ করলেন।
Verse 236
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य त॑ प्रत्युद्ययतुस्तदा । उस समय मन्त्रियोंसहित राजा युधिष्ठिर तथा यदुनन्दन श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रको आगे करके उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये थे
তখন মন্ত্রীদের সঙ্গে রাজা যুধিষ্ঠির এবং যদুনন্দন শ্রীকৃষ্ণ, ধৃতরাষ্ট্রকে অগ্রে রেখে, তাঁর অভ্যর্থনার জন্য এগিয়ে গেলেন।
Verse 243
भीमादीं श्वापि सम्पूज्य पर्यष्वजत केशवम् । अर्जुनने पिता धृतराष्ट्र और बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके चरणोंमें प्रणाम करके भीमसेन आदिका भी पूजन किया और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया
ভীম প্রমুখ সকলকে যথাযথ সম্মান জানিয়ে তিনি কেশব (শ্রীকৃষ্ণ)-কে বক্ষে আলিঙ্গন করলেন।
Verse 253
विशश्राम महाबाहुस्तीरं लब्ध्वेव पारग: । उन सबने मिलकर अर्जुनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। महाबाहु अर्जुनने भी उनका विधिपूर्वक आदर-सत्कार करके उसी तरह विश्राम किया, जैसे समुद्रके पार जानेकी इच्छावाला पुरुष किनारेपर पहुँचकर विश्राम करता है
সকলেই মিলিত হয়ে অর্জুনকে মহাসম্মানে অভ্যর্থনা করল। মহাবাহু অর্জুনও তাঁদের যথাবিধি সম্মান জানিয়ে তেমনি বিশ্রাম নিলেন—যেমন সমুদ্র পার হতে উদ্যত পথিক তীরে পৌঁছে স্বস্তিতে থামে।
Verse 263
मातृभ्यां सहितो धीमान् कुरूनेव जगाम ह | इसी समय बुद्धिमान् राजा बश्रुवाहन अपनी दोनों माताओंके साथ कुरुदेशमें जा पहुँचा
দুই মাতার সহিত সেই বুদ্ধিমান্ যাত্রা করিল এবং কুরুদেশে গিয়া উপস্থিত হইল। সেই সময় বুদ্ধিমান্ রাজা বভ্রুবাহনও আপন দুই মাতাকে সঙ্গে লইয়া কুরুদের দেশে পৌঁছিল।
Verse 1536
प्रियाख्याननिमित्तं वै ददौ बहुधनं तदा । यह शुभ समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक आये और यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करनेके कारण उस दूतको पुरस्काररूपमें उन्होंने बहुत-सा धन दिया
সেই প্রিয় সংবাদ শুনিয়া রাজা যুধিষ্ঠিরের নয়নে আনন্দাশ্রু ঝরিল; আর সেই শুভ বার্তা নিবেদন করিবার কারণে তিনি দূতকে পুরস্কাররূপে প্রচুর ধন দান করিলেন।
It emphasizes dharmic administration through ritual correctness and public generosity: abundance is presented as structured provisioning governed by śāstric procedure and service to guests and Brahmins.
The enumeration functions as a cosmological register, portraying the sacrifice as symbolically comprehensive—an arena where the social and natural worlds are conceptually gathered under a single ordered rite.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-significance lies in demonstrating how post-war sovereignty is ethically narrated through vidhi (procedure), dāna (distribution), and public witness.