यज्ञवाटवैभववर्णनम् / Description of the Splendour of the Sacrificial Enclosure
संचिन्तयामि कौन्तेयं रहो जिष्णुं जनार्दन । अतीव दुःखभागी स सतत पाण्डुनन्दन:,इसका क्या कारण है? बुद्धिमान् जनार्दन! जब मैं एकान्तमें बैठकर अर्जुनके बारेमें विचार करता हूँ, तब यह जानकर मेरा मन खिन्न हो जाता है कि हमलोगोंमें वे ही सदा सबसे अधिक दु:खके भागी रहे हैं। पाण्डुनन्दन अर्जुन सुखसे वंचित क्यों रहते हैं? यह समझमें नहीं आता
sañcintayāmi kaunteyaṁ raho jiṣṇuṁ janārdana | atīva duḥkhabhāgī sa satataṁ pāṇḍunandanaḥ ||
যুধিষ্ঠির বললেন— হে জনার্দন! আমি একান্তে বসে কুন্তীপুত্র, অজেয় বীর জিষ্ণু অর্জুনকে স্মরণ করলে আমার মন গভীর দুঃখে ভরে ওঠে। কারণ আমাদের মধ্যে পাণ্ডুনন্দনই যেন নিরন্তর সর্বাধিক দুঃখের ভাগী। কেন সে বারবার স্বস্তি ও সুখ থেকে বঞ্চিত হয়?
युधिष्ठिर उवाच