Adhyaya 97
Anushasana ParvaAdhyaya 9756 Verses

Adhyaya 97

Chatra–Upānah Dāna: Origin Narrative (Jamadagni–Reṇukā–Sūrya Saṃvāda)

Upa-parva: Dāna-Dharma and Śrāddha-Upacāra (Chatra–Upānah Episode)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma who instituted, and for what purpose, the gifting of an umbrella and footwear in śrāddha-dharma, noting that these items are also given in other meritorious rites. Bhīṣma agrees to explain the custom’s provenance, merit (puṇya), and claimed inexhaustible result (akṣayyatā) through an itihāsa. The chapter opens the embedded narrative: Jamadagni (a Bhārgava ṛṣi) practices archery; Reṇukā repeatedly retrieves his arrows. During intense midday heat, Reṇukā pauses briefly in tree shade due to bodily distress and fear of her husband’s displeasure. Jamadagni becomes angry at the delay; Reṇukā explains that the sun’s heat obstructed her. Jamadagni then resolves to strike down Sūrya with fiery astral power. Sūrya approaches in a brahmin-like form and argues his indispensability: he draws essences with rays, returns them as rain, enabling food production; from food arise life, rites, gifts, marriages, sacrifices, wealth, and human enterprises. The discourse reframes solar heat as part of a necessary ecological cycle, inviting restraint and a recognition of interdependence—preparing the ground for why protection from heat (umbrella, footwear) becomes meritorious in ritual gifting.

Chapter Arc: ब्रह्मसर-तीर्थ के पवित्र परिसर में अगस्त्य-परंपरा से जुड़ा एक प्रसंग उठता है—कमल (पुष्कर) के कारण हुआ ‘स्तैन्य’ (चोरी) और उसके दूरगामी फल। → कथा स्मरण कराती है कि पूर्वकाल में राजर्षि और द्विजर्षि भी तीर्थ-यात्रा और पुण्य-लाभ की लालसा में एकत्र हुए थे; प्रभास के पश्चिमी तट पर ऋषि-समूह मंत्रणा करता है कि समस्त पृथ्वी के पुण्यतीर्थों का भ्रमण किया जाए। इसी पृष्ठभूमि में ‘पुष्कर-हरण’ जैसा छोटा-सा अपराध भी धर्म-व्यवस्था को हिला देने वाला बनकर उभरता है। → कवि/वक्ता शपथ-विधि के रूप में तीखे शाप-वाक्य उच्चारित करता है—‘जिसने तुम्हारा कमल चुराया हो’ उसके लिए सामाजिक-धार्मिक बहिष्कार, अपमान और पतन के विधान; साथ ही यह भी कि जो इस शास्त्र/विधि का अध्ययन करे, वह ब्रह्मलोक का अधिकारी हो। शपथ की धार अपराध को केवल चोरी नहीं, तीर्थ-देवता/आश्रय-धर्म के विरुद्ध द्रोह बना देती है। → अध्याय शपथ-विधि की मर्यादा स्थापित करता है: तीर्थ-सम्पदा (कमल/पुष्कर) का अपहरण महापातक-तुल्य है; और धर्म-रक्षा हेतु शास्त्राध्ययन, वेदाध्ययन, पुण्यशीलता—इनका फल ब्रह्मलोक-प्राप्ति बताया जाता है।

Shlokas

Verse 1

(दक्षिणात्य अधिक पाठके १३ “लोक मिलाकर कुल १४६६ “लोक हैं) #फमशा रत (0) असऔ आसन > पोष्यवर्ग चतुर्नवतितमो< ध्याय: ब्रह्मसरतीर्थमें अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर ब्रद्मर्षियों और राजर्षियोंकी धर्मोपदेशपूर्ण शपथ तथा धर्मज्ञानके उद्देश्यसे चुराये हुए कमलोंका वापस देना भीष्म उवाच अनत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ | यद्‌ वृत्तं तीर्थयात्रायां शपथ प्रति तच्छूणु

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! এই প্রসঙ্গেই এক প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত বলা হয়। তীর্থযাত্রার সময় শপথকে কেন্দ্র করে যা ঘটেছিল, তা শোনো।

Verse 2

पुष्करार्थ कृतं स्तैन्यं पुरा भरतसत्तम । राजर्षिभिमीहाराज तथैव च द्विजर्षिभि:,भरतवंशशिरोमणे! महाराज! पूर्वकालमें कुछ राजर्षियों और ब्रह्मर्षियोंने भी इसी प्रकार कमलोंके लिये चोरी की थी

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ, মহারাজ! প্রাচীনকালে পদ্মলাভের জন্য রাজর্ষিরাও এবং তদ্রূপ দ্বিজর্ষিরাও চৌর্য করেছিল।

Verse 3

ऋषय: समेता: पश्चिमे वै प्रभासे समागता मन्त्रममन्त्रयन्त । चराम सर्वा पृथिवीं पुण्यतीर्था तन्न: काम॑ हन्त गच्छाम सर्वे

ভীষ্ম বললেন—পশ্চিমদেশে প্রভাস তীর্থে বহু ঋষি একত্র হলেন। সমবেত হয়ে তাঁরা পরামর্শ করলেন—‘চলো, আমরা সকলেই পুণ্যতীর্থে পরিপূর্ণ সমগ্র পৃথিবী পরিভ্রমণ করি; এটাই আমাদের অভিলাষ; এসো, আমরা সবাই যাত্রা করি।’

Verse 4

शुक्रोउज़िराश्वैव कविश्व विद्वां- स्तथा ह्ुगस्त्यो नारदपर्वतौ च | भगुर्वसिष्ठ: कश्यपो गौतमश्न विश्वामित्रो जमदग्निश्व राजन्‌

ভীষ্ম বললেন—রাজন! এই দৃঢ় সংকল্প করে শুক্র, অঙ্গিরা, বিদ্বান কবি, অগস্ত্য, নারদ ও পর্বত, ভৃগু, বসিষ্ঠ, কশ্যপ, গৌতম, বিশ্বামিত্র ও জমদগ্নি—এবং গালব, অষ্টক, ভরদ্বাজ, অরুন্ধতী, বালখিল্যগণ, আর রাজর্ষি শিবি, দিলীপ, নহুষ, অম্বরীষ, রাজা যযাতি, ধুন্ধুমার ও পুরূ—এই সকল রাজর্ষি ও ব্রহ্মর্ষি বজ্রধারী, বৃত্রহন্তা, শতক্রতু ইন্দ্রকে অগ্রে রেখে তীর্থে তীর্থে ভ্রমণ করতে করতে মাঘ পূর্ণিমায় পুণ্যসলিলা কৌশিকী নদীর তীরে উপস্থিত হলেন।

Verse 5

ऋषिस्तथा गालवो<थाष्टकश्न भरद्वाजो5रुन्धती वालखिल्या: । शिबिर्दिलीपो नहुषो<म्बरीषो राजा ययातिर्धुन्धुमारो5थ पूरु:

ভীষ্ম বললেন—আরও ছিলেন ঋষি গালব, অষ্টক, ভরদ্বাজ, অরুন্ধতী ও বালখিল্যগণ; এবং রাজর্ষি শিবি, দিলীপ, নহুষ, অম্বরীষ, রাজা যযাতি, ধুন্ধুমার ও পুরূ। এঁরা সকলেই দৃঢ় সংকল্প করে বজ্রধারী, বৃত্রহন্তা ইন্দ্রকে অগ্রে রেখে তীর্থে তীর্থে ভ্রমণ করতে করতে মাঘ পূর্ণিমায় পুণ্যসলিলা কৌশিকী নদীর তীরে এসে পৌঁছালেন।

Verse 6

जम्मु: पुरस्कृत्य महानुभावं शतक्रतुं वृत्रहण नरेन्द्रा: । तीर्थानि सर्वाणि परि भ्रमन्तो माघ्यां ययु: कौशिकी पुण्यतीर्थाम्‌

ভীষ্ম বললেন—জম্বুকে অগ্রে রেখে, মহাপ্রতাপী শতক্রতু, বৃত্রহন্তা ইন্দ্রকে নেতা করে সেই নরেন্দ্রগণ তীর্থযাত্রায় বেরোলেন। সর্ব তীর্থ পরিভ্রমণ করতে করতে মাঘ মাসের শুভ পূর্ণিমায় তাঁরা পুণ্যতীর্থ, পবিত্র কৌশিকী নদীর তীরে উপস্থিত হলেন।

Verse 7

सर्वेषु तीर्थेष्ववधूतपापा जम्मुस्ततो ब्रह्मसर: सुपुण्यम्‌ । देवस्य तीर्थे जलमग्निकल्पा विगाह्ा ते भुक्तबिसप्रसूना:

ভীষ্ম বললেন—সকল তীর্থে স্নান করে পাপ ধুয়ে ফেলে তাঁরা যমুনা থেকে অগ্রসর হয়ে পরম পুণ্যময় ব্রহ্মসর তীর্থে গেলেন। দেবতার তীর্থের সেই জলে অগ্নিসদৃশ দীপ্ত তপস্বীরা নিমজ্জিত হয়ে পদ্মদণ্ড ও পদ্মফুল আহার করলেন।

Verse 8

केचिद्‌ बिसान्यखनंस्तत्र राज- न्नन्ये मृणालान्यखनंस्तत्र विप्रा: । अथापश्यन्‌ पुष्कर ते ट्वियन्तं हृदादगस्त्येन समुद्धृतं तत्‌

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, সেখানে কেউ পদ্মদণ্ড খুঁড়তে লাগল, আর কিছু ব্রাহ্মণ মৃণাল তুলতে লাগল। তখন সকলেই দেখল—অগস্ত্য যে পরিমাণ পদ্ম হ্রদ থেকে তুলে রেখেছিলেন, তা হঠাৎই অদৃশ্য হয়ে গেল।

Verse 9

तानाह सर्वन्ृषिमुख्यानगस्त्य: केनादत्तं पुष्करं मे सुजातम्‌ । युष्मान्‌ शंके पुष्करं दीयतां मे न वै भवन्तो हर्तुमर्हन्ति पद्मम्‌

ভীষ্ম বললেন—তখন অগস্ত্য সকল প্রধান ঋষিকে বললেন—‘আমার সুজাত, সুন্দর পদ্ম কে নিয়েছে? আমি তোমাদের সকলকে সন্দেহ করি। আমার পদ্ম আমাকে ফিরিয়ে দাও; তোমাদের মতো সাধুজনের পক্ষে পদ্ম চুরি করা শোভন নয়।’

Verse 10

शृणोमि कालो हिंसते धर्मवीर्य सो<थयं प्राप्तो वर्तते धर्मपीडा । पुराधर्मो वर्तते नेह यावत्‌ तावद्‌ गच्छाम: सुरलोकं॑ चिराय

ভীষ্ম বললেন—‘আমি শুনি, কাল ধর্মের শক্তিকেও আঘাত করে নষ্ট করে। সেই কালই এখন উপস্থিত; তাই ধর্ম পীড়িত ও আহত হচ্ছে। এই জগতে প্রাচীন ধর্ম লুপ্ত হওয়ার আগে এবং অধর্ম বিস্তার লাভ করার আগে, চলো আমরা দীর্ঘকালের জন্য দেবলোকের পথে যাই।’

Verse 11

पुरा वेदान्‌ ब्राह्मुणा ग्राममध्ये घुष्टस्वरा वृषलान्‌ श्रावयन्ति | पुरा राजा व्यवहारेण धर्मान्‌ पश्यत्यहं परलोक॑ व्रजामि

ভীষ্ম বললেন—যে সময় গ্রামমধ্যে ব্রাহ্মণেরা উচ্চস্বরে বেদপাঠ করে শূদ্রদের শোনাতে শুরু করবে, আর রাজা কেবল লৌকিক বিচার-ব্যবহার ও মামলা-মোকদ্দমার দৃষ্টিতে ধর্মকে বিচার করবে—সে সময় আসার আগেই আমি পরলোকে গমন করব।

Verse 12

पुरा वरान्‌ प्रत्यवरान्‌ गरीयसो यावन्नरा नावमंस्यन्ति सर्वे तमोत्तरं यावदिदं न वर्तते तावद्‌ व्रजामि परलोकं॑ चिराय

ভীষ্ম বললেন—যতক্ষণ মানুষ শ্রেষ্ঠদের সম্মান করে এবং মহাপুরুষদের নীচের মতো তুচ্ছ করে না, আর যতক্ষণ এই জগৎ অজ্ঞতা-জাত অন্ধকারে আচ্ছন্ন না হয়—ততক্ষণ থাকতেই আমি দীর্ঘকালের জন্য পরলোকে গমন করব।

Verse 13

पुरा प्रपश्यामि परेण मर्त्यान्‌ बलीयसा दुर्बलान्‌ भुज्यमानान्‌ | तस्माद्‌ यास्यामि परलोक॑ चिराय न हात्सहे द्रष्टमिह जीवलोकम्‌

ভীষ্ম বললেন—আমি এখনই দেখতে পাচ্ছি, ভবিষ্যতে বলবান মানুষ দুর্বলদের দমন করে তাদের শোষণ করবে। তাই আমি দীর্ঘকালের জন্য পরলোকে গমন করব; জীবলোকের এই দুরবস্থা এখানে থেকে দেখা আমার সহ্য হয় না।

Verse 14

तमाहुरारता ऋषयो महर्षि न ते वयं पुष्करं चोरयाम: । मिथ्याभिषंगो भवता न कार्य: शपाम तीक्ष्णै: शपथैर्महर्षे

এ কথা শুনে মহর্ষিরা বিচলিত হয়ে সেই মহর্ষিকে বললেন—“হে মহর্ষে, আমরা আপনার পদ্ম চুরি করিনি। আমাদের উপর মিথ্যা অপবাদ আরোপ করবেন না। নিজেদের নির্দোষতা প্রমাণ করতে আমরা কঠোরতম শপথ গ্রহণ করতেও প্রস্তুত।”

Verse 15

ते निश्चितास्तत्र महर्षयस्तु सम्पश्यन्तो धर्ममेतं नरेन्द्रा: । ततो5शपन्त शपथान्‌ पर्ययेण सहैव ते पार्थिव पुत्रपौत्रै:

হে পৃথিবীনাথ! তারপর সেখানে মহর্ষি ও রাজাগণ দৃঢ় সংকল্প করে, এই ধর্মকে সামনে রেখে, পুত্র ও পৌত্রসহ একে একে গম্ভীর শপথ গ্রহণ করলেন।

Verse 16

भूगुरुवाच प्रत्याक्रोशेदिहाक्रुष्टस्ताडित: प्रतिताडयेत्‌ । खादेच्च पृष्ठमांसानि यस्ते हरति पुष्करम्‌

ভৃগু বললেন—এখানে যদি তাকে গালি দেওয়া হয়, সে পাল্টা গালি দিক; যদি তাকে আঘাত করা হয়, সে প্রতিআঘাত করুক। আর যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, সে যেন অন্যের পিঠের মাংস পর্যন্ত খায়—অর্থাৎ এইসব পাপেরই অংশীদার হয়।

Verse 17

वसिष्ठ उवाच अस्वाध्यायपरो लोके श्वानं च परिकर्षतु । पुरे च भिक्षुर्भवतु यस्ते हरति पुष्करम्‌

বসিষ্ঠ বললেন—যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, সে এই লোকেতে স্বাধ্যায় থেকে বিমুখ হোক। সে কুকুর টেনে নিয়ে ঘুরুক, আর নগরে নগরে ভিক্ষুক হয়ে বাঁচুক।

Verse 18

कश्यप उवाच सर्वत्र सर्व पणतु न्यासे लोभं करोतु च । कूटसाक्षित्वमभ्येतु यस्ते हरति पुष्करम्‌

কাশ্যপ বললেন—যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, সে সর্বত্র নানারকম কেনাবেচায় লিপ্ত হোক। সে আমানত গ্রাস করার লোভ করুক এবং মিথ্যা সাক্ষ্য দিক—অর্থাৎ এই পাপগুলির অংশীদার হোক।

Verse 19

गौतम उवाच जीवत्वहंकृतो बुद्ध्या विषमेणासमेन सः । कर्षको मत्सरी चास्तु यस्ते हरति पुष्करम्‌

গৌতম বললেন—যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, সে অহংকারে আচ্ছন্ন বুদ্ধি নিয়ে, বক্র ও অসম আচরণে জীবন যাপন করুক। সে কৃষক হোক এবং ঈর্ষায় পূর্ণ থাকুক।

Verse 20

अंगिरा उवाच अशुचिर्त्रह्मकूटो<स्तु श्वानं च परिकर्षतु । ब्रह्महानिकृतिश्चास्तु यस्ते हरति पुष्करम्‌

অঙ্গিরা বললেন—যে তোমার পদ্ম নিয়ে গেছে, সে অপবিত্র হোক, বেদের নিন্দাকারী হোক, ব্রাহ্মণহত্যার কলঙ্ক বহন করুক এবং কুকুর টেনে নিয়ে ঘুরুক—এমন পাপের ভাগী হোক।

Verse 21

धुन्धुमार उवाच अकृतज्ञस्तु मित्राणां शूद्रायां च प्रजायतु । एक: सम्पन्नमश्चातु यस्ते हरति पुष्करम्‌

ধুন্ধুমার বললেন—যে তোমার পদ্ম হরণ করেছে, সে যেন বন্ধুদের উপকার অস্বীকারকারী হয়; শূদ্রবর্ণের নারীর গর্ভে সন্তান উৎপন্ন করে; আর সমৃদ্ধ হয়েও একাই সুস্বাদু অন্ন ভোজন করে।

Verse 22

प्ूरुर्वाच चिकित्सायां प्रचरतु भार्यया चैव पुष्यतु । श्वशुरात्तस्य वृत्ति: स्थाद्‌ यस्ते हरति पुष्करम्‌

পূরু বললেন—যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, সে যেন চিকিৎসাবৃত্তি অবলম্বন করে; স্ত্রীর উপার্জনে প্রতিপালিত হয়; এবং শ্বশুরবাড়ির আশ্রয়ে তার জীবিকা স্থির থাকে।

Verse 23

दिलीप उवाच उदपानप्लवे ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपति: । तस्य लोकान्‌ स व्रजतु यस्ते हरति पुष्करम्‌

দিলীপ বললেন—যে তোমার পদ্ম হরণ করেছে, সে যেন সেই ব্রাহ্মণের মতো—যে এক সাধারণ কূপে সকলের সঙ্গে জল তোলে এমন গ্রামে বাস করে এবং শূদ্র নারীর সঙ্গে সম্পর্ক রাখে—মৃত্যুর পরে সেই দুঃখময় লোকসমূহে গমন করে।

Verse 24

शुक्र उवाच वृथामांसं समश्नातु दिवा गच्छतु मैथुनम्‌ । प्रेष्यो भवतु राज्ञश्च यस्ते हरति पुष्करम्‌

শুক্র বললেন—যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, সে যেন অকারণে মাংস ভক্ষণ করে; দিনে মৈথুনে প্রবৃত্ত হয়; এবং রাজার দাসসেবক হয়ে থাকে।

Verse 25

जगदग्निरुवाच अनध्यायेष्वधीयीत मित्र श्राद्धे च भोजयेत्‌ । श्राद्धे शूद्रस्य चाश्रीयाद्‌ यस्ते हरति पुष्करम्‌

জমদগ্নি বললেন—যে তোমার পদ্ম নিয়ে গেছে, সে যেন অনধ্যায়কালে অধ্যয়ন করে; শ্রাদ্ধে কেবল ‘মিত্র’কেই ভোজন করায়; এবং শূদ্রের শ্রাদ্ধে নিজেও ভোজন গ্রহণ করে।

Verse 26

शिबिरुवाच अनाहितान्निग्नियतां यज्ञे विध्नं करोतु च । तपस्विभिर्विरुध्येच्च यस्ते हरति पुष्करम्‌

শিবি বললেন—যে তোমার পদ্ম হরণ করেছে, সে অগ্নিহোত্র না করেই বিনষ্ট হোক; যজ্ঞে বিঘ্ন ঘটাক এবং তপস্বীদের সঙ্গে বিরোধ করুক—অর্থাৎ এই সকল পাপফলের অংশী হোক।

Verse 27

ययातिरुवाच अनृतौ च व्रती चैव भार्यायां स प्रजायतु । निराकरोतु वेदांश्व॒ यस्ते हरति पुष्करम्‌

যযাতি বললেন—যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, সে ব্রতধারী হয়েও ঋতুকাল ব্যতীত সময়ে স্ত্রীর সঙ্গে সহবাস করুক এবং বেদকে অস্বীকার করুক—অর্থাৎ এই পাপফলের অংশী হোক।

Verse 28

नहुष उवाच अतिथिर्ग॑हसंस्थो<स्तु कामवृत्तस्तु दीक्षित: । विद्यां प्रयच्छतु भूतो यस्ते हरति पुष्करम्‌

নহুষ বললেন—যে তোমার পদ্ম হরণ করেছে, সে সন্ন্যাসী হয়েও গৃহে বাস করুক; যজ্ঞদীক্ষিত হয়েও কামাচারী হোক; এবং পারিশ্রমিক নিয়ে বিদ্যা শিক্ষা দিক—অর্থাৎ এই সব পাপফলের অংশী হোক।

Verse 29

अम्बरीष उवाच नृशंसस्त्यक्तधर्मो<स्तु स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च निहन्तु ब्राह्मणं चापि यस्ते हरति पुष्करम्‌

অম্বরীষ বললেন—যে তোমার পদ্ম নিয়ে গেছে, সে নিষ্ঠুরস্বভাব হোক; স্ত্রী, স্বজন ও গোর প্রতি ধর্ম পালন না করুক এবং ব্রাহ্মণহত্যার পাপেও অংশী হোক।

Verse 30

नारद उवाच गृहज्ञानी बहि:शास्त्रं पठतां विस्वरं पदम्‌ । गरीयसो<5वजानातु यस्ते हरति पुष्करम्‌

নারদ বললেন—যে তোমার পদ্ম হরণ করেছে, সে দেহরূপ গৃহকেই আত্মা বলে জ্ঞান করুক; সীমা লঙ্ঘন করে শাস্ত্র অধ্যয়ন করুক; স্বরহীনভাবে মন্ত্রপদ উচ্চারণ করুক এবং গুরুজনকে অবজ্ঞা করতেই থাকুক—অর্থাৎ উল্লিখিত পাপফলের অংশী হোক।

Verse 31

नाभाग उवाच अनृतं भाषतु सदा सद्भिश्वैव विरुध्यतु । शुल्केन तु ददत्कन्यां यस्ते हरति पुष्करम्‌

নাভাগ বললেন—যে তোমার পদ্ম হরণ করেছে, সে যেন সর্বদা মিথ্যা বলে, সজ্জনদের সঙ্গে বিরোধে থাকে, এবং মূল্য নিয়ে কন্যা দান করার (যেন কন্যা বিক্রি করার) পাপে পতিত হয়।

Verse 32

कविरुवाच पदभ्यां स गां ताडयतु सूर्य च प्रतिमेहतु । शरणागतं संत्यजतु यस्ते हरति पुष्करम्‌

কবি বললেন—যে তোমার পদ্ম নিয়েছে, সে যেন পায়ে গরুকে লাথি মারে, সূর্যের দিকে মুখ করে মূত্র ত্যাগ করে, এবং শরণাগতকে পরিত্যাগ করে—এই পাপসমূহ তার ভাগ্যে পড়ুক।

Verse 33

विश्वामित्र उवाच करोतु भृतको<वर्षा राज्ञश्नास्तु पुरोहित: । ऋषच्विगस्तु हायाज्यस्य यस्ते हरति पुष्करम्‌

বিশ্বামিত্র বললেন—যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, সে যেন ভৃত্য হয়েও প্রভুর ক্ষেতের বৃষ্টিকে রুদ্ধ করে; সে যেন রাজার পুরোহিত হয়; আর যে যজ্ঞের অযোগ্য, তার জন্য ঋত্বিক হয়ে যজ্ঞ করায়—এবং সেই পাপফলের অংশীদার হয়।

Verse 34

पर्वत उवाच ग्रामे चाधिकृत: सो5स्तु खरयानेन गच्छतु । शुन: कर्षतु वृत्त्यर्थे यस्ते हरति पुष्करम्‌

পর্বত বললেন—যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, সে যেন গ্রামে পদাধিকারী হয়, কিন্তু গাধার গাড়িতে চড়ে ঘোরে; আর জীবিকার জন্য কুকুর দিয়ে হাল চষায়।

Verse 35

पर्वतने कहा--जो आपका कमल ले गया हो, वह गाँवका मुखिया हो जाय, गधेकी सवारीपर चले तथा पेट भरनेके लिये कुत्तोंकी साथ लेकर शिकार खेले ।।

ভরদ্বাজ বললেন—যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, নিষ্ঠুর ও মিথ্যাবাদীদের যত পাপ—সমস্ত পাপের ভার—তা যেন সর্বদা তার ওপরই পতিত হয়।

Verse 36

अद्टक उवाच स राजास्त्वकृतप्रज्ञ: कामवृत्तश्न पापकृत्‌ । अधर्मेणाभिशास्तूर्वी यस्ते हरति पुष्करम्‌

অষ্টক বললেন—যে তোমার পদ্ম হরণ করেছে, সে রাজা হোক অল্পবুদ্ধি, কামবশ ও পাপকারী; অধর্মের দ্বারা এই পৃথিবী শাসন করুক।

Verse 37

गालव उवाच पापिषछेभ्यो हानर्घाह: स नरो<स्तु स्वपापकृत्‌ । दत्त्वा दानं कीर्तयतु यस्ते हरति पुष्करम्‌

গালব বললেন—যে তোমার পদ্ম চুরি করেছে, সে নিজের পাপের ফলে মহাপাপীদের থেকেও অধিক নিন্দিত ও তুচ্ছ হোক; নিজের স্বজনদেরও অনিষ্ট করুক। আর দান করলেও, নিজের মুখেই সেই দানের ঢাক পেটাক।

Verse 38

अरुन्धत्युवाच श्वश्वापवादं मदतु भर्तुर्भवतु दुर्मना: । एका स्वादु समश्नातु या ते हरति पुष्करम्‌

অরুন্ধতী বললেন—যে স্ত্রী তোমার পদ্ম নিয়েছে, সে শাশুড়ির নিন্দা করুক, স্বামীর প্রতি মনে কুটিলতা পোষণ করুক, আর একাই সুস্বাদু আহার করুক—এই পাপগুলির ফলভাগিনী হোক।

Verse 39

वालखिल्या ऊचु: एकपादेन वृत्त्यर्थ ग्रामद्वारे स तिष्ठतु धर्मज्ञस्त्यक्तधर्मास्तु यस्ते हरति पुष्करम्‌

বালখিল্য ঋষিরা বললেন—যে তোমার পদ্ম নিয়ে গেছে, সে জীবিকার জন্য গ্রামের দ্বারে এক পায়ে দাঁড়িয়ে থাকুক; ধর্ম জেনেও ধর্মত্যাগী হোক।

Verse 40

शुनःसख उवाच अग्निहोत्रमनादृत्य स सुखं स्वपतु द्विज: । परिव्राट्‌ कामवृत्तो<स्तु यस्ते हरति पुष्करम्‌

শুনঃসখ বললেন—যে তোমার পদ্ম নিয়ে গেছে, সে দ্বিজ হয়েও প্রাতঃসায়ং অগ্নিহোত্র অবহেলা করে নিশ্চিন্তে ঘুমাক; আর পরিব্রাজকের বেশ ধরেও কামবশে স্বেচ্ছাচারী হোক—উপরোক্ত পাপফলের অংশীদার হোক।

Verse 41

युरभ्युवाच बालजेन निदानेन कांस्यं भवतु दोहनम्‌ । दुह्मोत परवत्सेन या ते हरति पुष्करम्‌

যু বললেন—চুলের দড়ি দিয়ে তার পা বেঁধে দাও; দোহনের পাত্র হোক কাঁসার; আর যে গাভী তোমার পদ্ম নিয়ে গেছে, তাকে অন্য গাভীর বাছুরের দ্বারা দোহন করানো হোক।

Verse 42

भीष्म उवाच ततस्तु तैः शपथै: शप्यमानै- ननिविधैर्बहुभि: कौरवेन्द्र । सहस्राक्षो देवराट्‌ सम्प्रहृष्ट: समीक्ष्य तं कोपनं विप्रमुख्यम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে কৌরবেন্দ্র! লোকেরা যখন নানা প্রকার বহু শপথে নিজেদের আবদ্ধ করল, তখন সহস্রনয়ন দেবরাজ ইন্দ্র অত্যন্ত প্রসন্ন হলেন। ক্রোধোন্মত্ত সেই ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ অগস্ত্যকে দেখে ইন্দ্র তাঁর সম্মুখে প্রকাশিত হলেন।

Verse 43

अथाब्रवीन्मघवा प्रत्ययं स्वं समाभाष्य तमृषिं जातरोषम्‌ | ब्रह्मषिदिंवर्षिनृपर्षिम ध्ये यं त॑ं निबोधेह ममाद्य राजन्‌

তখন মঘবা (ইন্দ্র) ক্রোধে দগ্ধ সেই ঋষিকে সম্বোধন করে নিজের অভিপ্রায় প্রকাশ করলেন। হে রাজন! ব্রহ্মর্ষি, দেবর্ষি ও রাজর্ষিদের মধ্যস্থলে ইন্দ্র যা বলেছিলেন, আজ তা আমার মুখে শোনো।

Verse 44

शक्र उवाच अध्वर्यवे दुहितरं ददातु छन्‍्दोगे वा चरितब्रह्मचर्ये । अथर्वणं वेदमधीत्य वि्र: स्‍्नायीत य: पुष्करमाददाति

শক্র (ইন্দ্র) বললেন—যে পদ্ম নিয়েছে, সে যজুর্বেদী অধ্বর্যুকে, অথবা ব্রহ্মচর্য সম্পন্ন সামবেদী ছান্দোগকে কন্যাদান করুক। নতুবা অথর্ববেদ সম্পূর্ণ অধ্যয়ন করে সে শীঘ্রই স্নাতক হোক।

Verse 45

सर्वान्‌ वेदानधीयीत पुण्यशीलो<स्तु धार्मिक: । ब्रह्मण: सदनं यातु यस्ते हरति पुष्करम्‌

যে তোমার পদ্ম হরণ করে, সে পুণ্যশীল ও ধার্মিক হোক; সে সকল বেদ অধ্যয়ন করুক এবং ব্রহ্মার ধামে গমন করুক।

Verse 46

जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करे। पुण्यात्मा और धार्मिक हो, तथा मृत्युके पश्चात्‌ वह ब्रह्माजीके लोकमें जाय ।।

অগস্ত্য বললেন— হে বলসূদন, তুমি যে শপথ উচ্চারণ করেছ, তা আসলে আশীর্বাদস্বরূপ। অতএব আমার পদ্মফুল তুমি-ই নিয়েছ; দয়া করে তা আমাকে ফিরিয়ে দাও। এটাই সনাতন ধর্ম—সত্যবাদিতা এবং অন্যের সম্পদ যথাযথভাবে প্রত্যর্পণ।

Verse 47

इन्द्र रवाच न मया भगवल्लॉमभाद्धूतं पुष्करमद्य वै । धर्मास्तु श्रोतुकामेन ह्तं न क्रोद्भयुमहसि

ইন্দ্র বললেন— ভগবন, আজ আমি লোমশের কাছ থেকে পুষ্কর (পদ্ম) অপহরণ করিনি। যদি তুমি ধর্ম শুনতে আগ্রহী হও, তবে ক্রোধ বা ভয়ে প্ররোচিত হয়ে তা কেড়ে নেওয়া উচিত নয়।

Verse 48

इन्द्र बोले--भगवन्‌! मैंने लोभवश कमलोंको नहीं लिया था। आपलोगोंके मुखसे धर्मकी बातें सुनना चाहता था

ইন্দ্র বললেন— ভগবন! আমি লোভে পড়ে পদ্মফুল নিইনি। আপনাদের মুখ থেকে ধর্মকথা শুনতে চেয়েই আমি এগুলি তুলে নিয়েছিলাম। আর আজ আপনাদের বাক্য থেকে আমি সেই ঋষিপ্রণীত, সনাতন ধর্ম শুনেছি—যা নিত্য, অব্যয়, নিরাময়; সংসার-সাগর পার করানোর সেতুর মতো। এতে ধর্মশ্রুতির উৎকর্ষ ও মহিমা প্রমাণিত হয়।

Verse 49

तदिदं गृह्ुतां विद्वन्‌ पुष्करं द्विजसत्तम | अतिक्रमं मे भगवन क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित,द्विजश्रेष्ठ! विद्वन! अब आप अपने ये कमल लीजिये। भगवन्‌! अनिन्दनीय महर्षे! मेरा अपराध क्षमा कीजिये

হে বিদ্বান, দ্বিজশ্রেষ্ঠ! এই পুষ্কর (পদ্ম) গ্রহণ করুন। ভগবন, অনিন্দ্য মহর্ষে! আমার অপরাধ ক্ষমা করুন।

Verse 50

इत्युक्त: स महेन्द्रेण तपस्वी कोपनो भूशम्‌ । जग्राह पुष्करं धीमान्‌ प्रसन्नश्चाभवन्मुनि:

মহেন্দ্রের এমন কথায় সেই তপস্বী—যদিও প্রবল ক্রোধী—প্রসন্ন হলেন। জ্ঞানী মুনি অগস্ত্য ইন্দ্রের হাত থেকে পুষ্কর (পদ্ম) গ্রহণ করলেন।

Verse 51

प्रययुस्ते ततो भूयस्तीर्थानि वनगोचरा: । पुण्येषु तीर्थेषु तथा गात्राण्याप्लावयन्त ते

তারপর সেই বনচারী যাত্রীরা আবার তীর্থের পথে রওনা হল। একের পর এক পুণ্যতীর্থে গিয়ে তারা জলে নিমজ্জিত হয়ে স্নান করল এবং তীর্থযাত্রায় নিজেকে শুদ্ধ করল।

Verse 52

आख्यानं य इदं युक्त: पठेत्‌ पर्वणि पर्वणि । न मूर्ख जनयेत्‌ पुत्र॑ न भवेच्च निराकृति:

অগস্ত্য বললেন—যে ব্যক্তি সংযতচিত্তে ও একাগ্রভাবে পর্বে পর্বে এই পবিত্র আখ্যান পাঠ করে, সে কখনও মূর্খ পুত্র জন্ম দেয় না; আর সে নিজেও দেহে ত্রুটিগ্রস্ত বা উদ্দেশ্যে ব্যর্থ হয় না।

Verse 53

न तमापत्‌ स्पृशेत्‌ काचिद्‌ विज्वरो नजरावह: । विरजा: श्रेयसा युक्त: प्रेत्य स्वर्गमवाप्तुयात्‌

অগস্ত্য বললেন—এমন ব্যক্তিকে কোনো বিপদ স্পর্শ করে না; সে দুঃখ-সন্তাপমুক্ত থাকে, আর বার্ধক্যের আক্রমণও তাকে গ্রাস করে না। রাগ-আসক্তিহীন হয়ে কল্যাণে যুক্ত সে মৃত্যুর পরে স্বর্গলোক লাভ করে।

Verse 54

यश्च शास्त्रमधीयीत ऋषिभि: परिपालितम्‌ | स गच्छेद्‌ ब्रह्मणो लोकमव्ययं च नरोत्तम,नरश्रेष्ठल जो ऋषियोंद्वारा सुरक्षित इस शास्त्रका अध्ययन करता है, वह अविनाशी ब्रह्मधामको प्राप्त होता है

অগস্ত্য বললেন—যে নরশ্রেষ্ঠ ঋষিদের দ্বারা সংরক্ষিত এই শাস্ত্র অধ্যয়ন করে, সে অবিনশ্বর ব্রহ্মলোক লাভ করে।

Verse 93

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गृणालकी चोरीका उपाख्यानविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে পবিত্র মহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে গৃণালকী-চৌর্য উপাখ্যানবিষয়ক তিরানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 94

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शपथविधिनाम चतुर्नवतितमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে শপথবিধি-সংক্রান্ত চুরানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Frequently Asked Questions

Jamadagni’s anger at Reṇukā’s delay—caused by extreme solar heat—escalates toward harming Sūrya, creating a conflict between immediate grievance and recognition of a cosmic function essential to life and rites.

Sūrya frames himself as a necessary causal link: rays gather essences, rain returns them, food arises, and from food proceed life and ritual-social institutions; this argues for measured judgment and respect for systemic interdependence.

In the excerpt, Bhīṣma signals that he will explain akṣayyatā (inexhaustible merit) and puṇya associated with the practice, but the explicit phalaśruti formulation is not yet stated in the verses provided.