
Brāhmaṇa-vandana: Criteria for Veneration, Disciplined Speech, and Protective Kingship (अनुशासनपर्व, अध्याय ८)
Upa-parva: Brāhmaṇa-pūjā and Dvija-sevā (Reverence toward Brāhmaṇas) — Discourse Unit
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma who deserves worship, salutations, and personal reverence, and what kinds of persons Bhīṣma himself esteems. Bhīṣma replies that he admires dvijas for whom brahman (sacred knowledge) is the highest wealth, whose spiritual confidence is grounded in tapas and svādhyāya, and who sustain inherited responsibilities without collapse. He praises those trained in learning, self-controlled, gentle-spoken, and competent in correct syllables and recitation; their properly articulated speech is described as auspicious and beneficial both socially and in posthumous consequence. He also values discerning listeners who are respected in assemblies, and donors who provide well-prepared, pure food to brāhmaṇas; among many kinds of heroism, generosity without envy is singled out as distinctive. Bhīṣma intensifies the normative hierarchy by stating brāhmaṇas are dearer to him than even Yudhiṣṭhira, asserting he bears no known offense against them in deed, mind, or speech, and that being called ‘brahmaṇya’ is his highest purity. The chapter then frames the kṣatriya’s relation to brāhmaṇas through analogies: as women rely on husbands, so kṣatriyas rely on dvijas; a younger brāhmaṇa can be ‘father’ in status; brāhmaṇas should be protected like sons, served like teachers, and attended like fire. Finally, it advises sustained caution toward the power of tejas and tapas, urging the ruler to guard brāhmaṇas and regularly ensure their welfare and livelihood.
Chapter Arc: युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं—‘भारत! किनकी पूजा करूँ, किनको नमस्कार करूँ, और आप स्वयं किनका स्मरण किए बिना नहीं रह पाते, चाहे कैसी भी आपत्ति आ जाए?’ → भीष्म ब्राह्मणों की महिमा का विस्तार करते हैं—जिनका ‘ब्रह्म’ (वेद/ब्रह्मज्ञान) ही परम धन है, जिनका स्वर्ग तप और स्वाध्याय से सिद्ध है; वे सभाओं में हंसों के समूह-से मधुर, विनीत, संयमी और दिव्य-ध्वनि वाले वचन बोलते हैं। फिर वे उन श्रोताओं की भी प्रशंसा करते हैं जो नित्य ऐसे महात्माओं की वाणी सुनते और उसे जीवन में उतारते हैं। → धर्म-क्रम का निर्णायक विधान आता है—‘क्षत्रिय सौ वर्ष का हो और श्रेष्ठ ब्राह्मण दस वर्ष का; तब भी वे पिता-पुत्र के समान माने जाएँ, और गुरु ब्राह्मण ही है।’ इससे सामाजिक शक्ति नहीं, धर्म-ज्ञान की प्रधानता स्थापित होती है। → भीष्म राजधर्म का व्यावहारिक आदेश देते हैं—जैसे ग्वाला दण्ड लेकर गौओं की रक्षा करता है, वैसे ही क्षत्रिय को ब्राह्मणों और ब्रह्म (वेद/धर्म) की रक्षा करनी चाहिए; राजा उन्हें पिता की तरह सुरक्षित रखे, उनके घर-जीवन की कुशलता पूछे, और शुद्ध भाव से उनकी तृप्ति हेतु सत्कार-दान करे।
Verse 1
ऑपन-माज बछ। डे अष्टमो< ध्याय: श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी महिमा युधिछिर उवाच के पूज्या: के नमस्कार्या: कान् नमस्यसि भारत । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व येभ्य: स्पृहयसे नूप,युधिष्ठिरने पूछा--भरतनन्दन! इस जगत्में कौन-कौन पुरुष पूजन और नमस्कारके योग्य हैं? आप किनको प्रणाम करते हैं? तथा नरेश्वर! आप किनको चाहते हैं? यह सब मुझे बताइये
যুধিষ্ঠির বললেন—হে ভারত! কারা সত্যই পূজ্য, কারাই বা নমস্কারযোগ্য? আপনি কাদের প্রণাম করেন? হে নৃপ, যাদের প্রতি আপনার শ্রদ্ধা ও সম্মান নিবেদন করার আকাঙ্ক্ষা—সে সবই আমাকে বিস্তারিত বলুন।
Verse 2
उत्तमापद्गतस्यापि यत्र ते वर्तते मन: । मनुष्यलोके सर्वस्मिन् यदमुत्रेह चाप्युत,बड़ी-से-बड़ी आपत्तिमें पड़नेपर भी आपका मन किनका स्मरण किये बिना नहीं रहता? तथा इस समस्त मानवलोक और परलोकमें हितकारक क्या है? ये सब बातें बतानेकी कृपा करें
যুধিষ্ঠির বললেন—অতিভয়ংকর বিপদে পড়লেও আপনার মন কার স্মরণ না করে থাকতে পারে না? আর এই সমগ্র মানবলোকে এবং পরলোকে—সত্যিকার কল্যাণকর কী? দয়া করে এ সবই বলুন।
Verse 3
भीष्म उवाच स्पृहयामि द्विजातिभ्यो येषां ब्रह्म परं धनम् । येषां स्वप्रत्यय: स्वर्गस्तप: स्वाध्यायसाधनम्,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! जिनका ब्रह्म (वेद) ही परम धन है, आत्मज्ञान ही स्वर्ग है तथा वेदोंका स्वाध्याय करना ही श्रेष्ठ तप है, उन ब्राह्मणोंको मैं चाहता हूँ
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! আমি সেই দ্বিজদেরই কামনা করি, যাদের কাছে ব্রহ্ম (বেদ)ই পরম ধন; যাদের কাছে আত্মপ্রত্যয়ই স্বর্গ; আর যাদের শ্রেষ্ঠ তপস্যা বেদের স্বাধ্যায়।
Verse 4
येषां बालाश्न वृद्धाश्व पितृपैतामहीं धुरम् । उद्धहन्ति न सीदन्ति तेभ्यो वै स्पृहयाम्यहम्,जिनके कुलमें बच्चेसे लेकर बूढ़ेतक बाप-दादोंकी परम्परासे चले आनेवाले धार्मिक कार्यका भार सँभालते हैं; परंतु उसके लिये मनमें कभी खेदका अनुभव नहीं करते है; ऐसे ही लोगोंको मैं चाहता हूँ
ভীষ্ম বললেন—যাদের বংশে শিশু থেকে বৃদ্ধ পর্যন্ত পিতা-পিতামহদের থেকে প্রাপ্ত ধর্মের ভার বহন করে, তবু তাতে নত হয় না, বিষণ্ণও হয় না—সেই স্থিরধর্মীদেরই আমি কামনা করি।
Verse 5
विद्यास्वभिविनीतानां दान्तानां मृदुभाषिणाम् | श्रुतवृत्तोपपन्नानां सदाक्षरविदां सताम्,जो विनीत भावसे विद्याध्ययन करते हैं, इन्द्रियोंको संयममें रखते हैं और मीठे वचन बोलते हैं, जो शास्त्रज्ञान और सदाचार दोनोंसे सम्पन्न हैं, अविनाशी परमात्माको जाननेवाले सत्पुरुष हैं, तात युधिष्ठिर! सभाओंमें बोलते समय हंससमूहोंकी भाँति जिनके मुखसे मेघके समान गम्भीर स्वरसे मनोहर मंगलमयी एवं अच्छे ढंगसे कही गयी बातें सुनायी देती हैं, उन ब्राह्मणोंको ही मैं चाहता हूँ। यदि राजा उन महात्माओंकी बातें सुननेकी इच्छा रखे तो वे उसे इहलोक और परलोकमें भी सुख पहुँचानेवाली होती हैं
ভীষ্ম বললেন—হে তাত যুধিষ্ঠির! আমি সেই ব্রাহ্মণদেরই শ্রদ্ধা করি, যারা বিদ্যায় বিনীত, ইন্দ্রিয়সংযমী, মধুরভাষী, শাস্ত্রজ্ঞান ও সদাচারে সমৃদ্ধ, এবং অবিনশ্বর পরমাত্মায় স্থিত সদ্পুরুষ। সভায় তারা যখন কথা বলেন, তখন হংসদলের ন্যায় মেঘগম্ভীর ধ্বনিতে তাদের বাক্য মঙ্গলময়, মনোহর ও সুসংস্কৃত হয়ে শ্রোতাদের আনন্দিত করে। কোনো রাজা যদি সেই মহাত্মাদের উপদেশ শুনতে চান, তবে তা ইহলোক ও পরলোক—উভয়েই সুখ ও কল্যাণ দান করে।
Verse 6
संसत्सु वदतां तात हंसानामिव संघश: । मड्ुल्यरूपा रुचिरा दिव्यजीमूतनि:स्वना:,जो विनीत भावसे विद्याध्ययन करते हैं, इन्द्रियोंको संयममें रखते हैं और मीठे वचन बोलते हैं, जो शास्त्रज्ञान और सदाचार दोनोंसे सम्पन्न हैं, अविनाशी परमात्माको जाननेवाले सत्पुरुष हैं, तात युधिष्ठिर! सभाओंमें बोलते समय हंससमूहोंकी भाँति जिनके मुखसे मेघके समान गम्भीर स्वरसे मनोहर मंगलमयी एवं अच्छे ढंगसे कही गयी बातें सुनायी देती हैं, उन ब्राह्मणोंको ही मैं चाहता हूँ। यदि राजा उन महात्माओंकी बातें सुननेकी इच्छा रखे तो वे उसे इहलोक और परलोकमें भी सुख पहुँचानेवाली होती हैं
ভীষ্ম বললেন—হে তাত যুধিষ্ঠির! তারা যখন সভায় কথা বলে, তখন হংসদলের ডাকের মতো তাদের বাক্য ধ্বনিত হয়—সুন্দর, মঙ্গলময়, মনোরম, এবং দিব্য বর্ষামেঘের মতো গম্ভীর অনুরণনে ভরা। এমন ব্রাহ্মণ—আচরণে বিনীত, স্বাধ্যায়ে নিবিষ্ট, ইন্দ্রিয়সংযমী, মধুরভাষী, শাস্ত্রজ্ঞান ও সদাচারে যুক্ত, এবং অবিনশ্বর পরমাত্মার জ্ঞাতা—আমার প্রিয়। রাজা যদি সেই মহাত্মাদের কথা শুনতে চান, তবে তাদের উপদেশ ইহলোক ও পরলোক—উভয়েই হিত ও সুখ আনে।
Verse 7
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कर्मफलका उपाख्यानविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ,सम्यगुच्चरिता वाच: श्रूयन्ते हि युधिष्ठिर । शुश्रूषमाणे नृपतौ प्रेत्य चेह सुखावहा: जो विनीत भावसे विद्याध्ययन करते हैं, इन्द्रियोंको संयममें रखते हैं और मीठे वचन बोलते हैं, जो शास्त्रज्ञान और सदाचार दोनोंसे सम्पन्न हैं, अविनाशी परमात्माको जाननेवाले सत्पुरुष हैं, तात युधिष्ठिर! सभाओंमें बोलते समय हंससमूहोंकी भाँति जिनके मुखसे मेघके समान गम्भीर स्वरसे मनोहर मंगलमयी एवं अच्छे ढंगसे कही गयी बातें सुनायी देती हैं, उन ब्राह्मणोंको ही मैं चाहता हूँ। यदि राजा उन महात्माओंकी बातें सुननेकी इच्छा रखे तो वे उसे इहलोक और परलोकमें भी सुख पहुँचानेवाली होती हैं
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! সঠিকভাবে উচ্চারিত বাক্য অবশ্যই শোনা হয় এবং মূল্য পায়। রাজা যখন শুনতে আগ্রহী হন, তখন এমন সুসংস্কৃত ভাষণ ইহলোকেও এবং মৃত্যুর পরেও সুখদায়ক হয়। অতএব আমি সেই ব্রাহ্মণদেরই শ্রদ্ধা করি, যারা বিনয়ে স্বাধ্যায় করে, ইন্দ্রিয়সংযমী, মধুরভাষী, শাস্ত্রজ্ঞান ও সদাচারে সমৃদ্ধ, এবং অবিনশ্বর পরমাত্মার জ্ঞাতা—যাদের বাক্য মেঘগম্ভীর, অর্থে মঙ্গলময়, এবং সভাকে হংসকলরবের মতো আনন্দিত করে।
Verse 8
ये चापि तेषां श्रोतार: सदा सदसि सम्मता: । विज्ञानगुणसम्पन्नास्ते भ्य श्ष॒ स्पृहयाम्यहम्,जो प्रतिदिन उन महात्माओंकी बातें सुनते हैं, वे श्रोता विज्ञानगुणसे सम्पन्न हो सभाओंमें सम्मानित होते हैं। मैं ऐसे श्रोताओंकी भी चाह रखता हूँ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टमो5ध्याय:
ভীষ্ম বললেন—আর যারা তাদের শ্রোতা—যারা প্রতিদিন সেই মহাত্মাদের বাক্য শোনে—তারাও বিবেক ও গুণে সমৃদ্ধ হয়ে সর্বদা সভায় সম্মানিত হয়। এমন শ্রোতাদের প্রতিও আমার শ্রদ্ধা ও আকাঙ্ক্ষা আছে।
Verse 9
सुसंस्कृतानि प्रयता: शुचीनि गुणवन्ति च | ददत्यन्नानि तृप्त्यर्थ ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! তারা যত্ন ও সংযমসহ সুপ্রস্তুত, শুচি ও গুণসমৃদ্ধ অন্ন ব্রাহ্মণদের তৃপ্তির জন্য দান করে।
Verse 10
शक्यं होवाहवे योद्धं न दातुमनसूयितम्
ভীষ্ম বললেন—যুদ্ধে একজন যোদ্ধা পাওয়া সম্ভব; কিন্তু যে ঈর্ষা ও দোষদৃষ্টি-রহিত, এমন মানুষকে দান করে দেওয়া বা সহজে অর্জন করানো সম্ভব নয়। এই স্বভাব দানে দেওয়া যায় না—এটি নৈতিক গুণ হিসেবে সাধনা করে গড়ে তুলতে হয়।
Verse 11
शूरा वीराश्न शतश: सन्ति लोके युधिष्छिर । येषां संख्यायमानानां दानशूरो विशिष्यते
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির, জগতে শত শত শূর ও বীর আছে। কিন্তু তাদের গণনা ও তুলনা করলে, দানে শূর—উদারতায় সাহসী—ব্যক্তিই সর্বশ্রেষ্ঠ বলে প্রতীয়মান হয়।
Verse 12
युधिष्ठिर! संग्राममें युद्ध करना सहज है। परंतु दोषदृष्टिसे रहित होकर दान देना सहज नहीं है। संसारमें सैकड़ों शूरवीर हैं; परंतु उनकी गणना करते समय जो उनमें दानशूर हो, वही सबसे श्रेष्ठ माना जाता है ।। धन्य: स्यां यद्य॒हं भूय: सौम्य ब्राह्मणको5पि वा | कुले जातो धर्मगतिस्तपोविद्यापरायण:,सौम्य! यदि मैं कुलीन, धर्मात्मा, तपस्वी और विद्वान् अथवा कैसा भी ब्राह्मण होता तो अपनेको धन्य समझता
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! রণক্ষেত্রে যুদ্ধ করা সহজ; কিন্তু দোষদৃষ্টি ও অবজ্ঞা-রহিত মনে দান করা সহজ নয়। জগতে শত শত শূরবীর আছে; কিন্তু তাদের গণনা করলে দানে শূর ব্যক্তিকেই শ্রেষ্ঠ বলা হয়। আর হে সৌম্য! যদি আমি পুনর্জন্ম লাভ করি—ব্রাহ্মণরূপেও হোক—কুলীন, ধর্মপথে স্থিত, তপস্যা ও বিদ্যায় নিবিষ্ট, তবে নিজেকে ধন্য মনে করব।
Verse 13
न मे त्वत्त: प्रियतरो लोके5स्मिन् पाण्डुनन्दन । त्वत्तश्षापि प्रियतरा ब्राह्मणा भरतर्षभ,पाण्डुनन्दन! इस संसारमें मुझे तुमसे अधिक प्रिय कोई नहीं है; परंतु भरतश्रेष्ठ! ब्राह्मणोंको मैं तुमसे भी अधिक प्रिय मानता हूँ
ভীষ্ম বললেন—হে পাণ্ডুনন্দন! এই জগতে তোমার চেয়ে প্রিয় আমার আর কেউ নেই। তবু, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, ব্রাহ্মণগণ তোমার চেয়েও আমার কাছে অধিক প্রিয়।
Verse 14
यथा मम प्रियतमास्त्वत्तो विप्रा: कुरूत्तम | तेन सत्येन गच्छेयं लोकान् यत्र स शान्तनुः,कुरुश्रेष्ठ! “ब्राह्मण मुझे तुम्हारी अपेक्षा भी बहुत अधिक प्रिय हैं--इस सत्यके प्रभावसे मैं उन्हीं पुण्यलोकोंमें जाऊँगा जहाँ मेरे पिता महाराज शान्तनु गये हैं
ভীষ্ম বললেন—হে কুরুশ্রেষ্ঠ! যেমন ব্রাহ্মণগণ আমার কাছে তোমার চেয়েও অধিক প্রিয়, সেই সত্যের শক্তিতে আমি সেই পুণ্যলোকসমূহে গমন করি, যেখানে আমার পিতা শান্তনু গেছেন।
Verse 15
न मे पिता प्रियतरो ब्राह्मणेभ्यस्तथाभवत् । न मे पितु: पिता वापि ये चान्येडपि सुहृज्जना:,मेरे पिता भी मुझे ब्राह्मणोंकी अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं रहे हैं। पितामह और अन्य सुहृदोंको भी मैंने कभी ब्राह्मणोंसे अधिक प्रिय नहीं समझा है
ভীষ্ম বললেন—আমার কাছে ব্রাহ্মণদের চেয়ে প্রিয় কখনও আমার পিতা ছিলেন না; পিতামহও নন, আর অন্য কোনো শুভাকাঙ্ক্ষী আত্মীয়ও নন। আমি সর্বদা ব্যক্তিগত স্নেহের ঊর্ধ্বে ব্রাহ্মণদের প্রতি শ্রদ্ধাকেই স্থান দিয়েছি—এটাই ধর্মকে ধারণ করে।
Verse 16
नहि मे वृजिनं किंचिद् विद्यते ब्राह्मणेष्विह । अणु वा यदि वा स्थूलं विद्यते साधुकर्मसु,मेरे द्वारा ब्राह्मणोंके प्रति किन्हीं श्रेष्ठ कर्मोमें कभी छोटा-मोटा किंचिन्मात्र भी अपराध नहीं हुआ है
ভীষ্ম বললেন—এই জগতে ব্রাহ্মণদের প্রতি আমার কোনো অপরাধের লেশমাত্রও নেই। সৎ ও ধর্মসম্মত কর্মে তাদের বিষয়ে আমার মধ্যে ক্ষুদ্র বা বৃহৎ—কোনো দোষই পাওয়া যাবে না।
Verse 17
कर्मणा मनसा वापि वाचा वापि परंतप । यन्मे कृतं ब्राह्मुणेभ्यस्तेनाद्य न तपाम्यहम्,शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! मैंने मन, वाणी और कर्मसे ब्राह्मणोंका जो थोड़ा- बहुत उपकार किया है, उसीके प्रभावसे आज इस अवस्थामें पड़ जानेपर भी मुझे पीड़ा नहीं होती है
ভীষ্ম বললেন—হে শত্রুদমনকারী! কর্মে, মনে বা বাক্যে ব্রাহ্মণদের জন্য আমি যে সেবা করেছি, সেই পুণ্যের বলেই আজ এই অবস্থায় পড়েও আমি দুঃখের দাহে দগ্ধ হই না।
Verse 18
ब्रह्मण्य इति मामाहुस्तया वाचास्मि तोषित: । एतदेव पवित्रेभ्य: सर्वेभ्य: परमं स्मृतम्,लोग मुझे ब्राह्मणभक्त कहते हैं। उनके इस कथनसे मुझे बड़ा संतोष होता है। ब्राह्मणोंकी सेवा ही सम्पूर्ण पवित्र कर्मोंसे बढ़कर परम पवित्र कार्य है
ভীষ্ম বললেন—লোকেরা আমাকে ‘ব্রহ্মণ্য’ (ব্রাহ্মণভক্ত) বলে; সেই কথায় আমি গভীর তৃপ্তি পাই। সত্যই, সকল পবিত্র কর্মের মধ্যে ব্রাহ্মণসেবাই সর্বোচ্চ পবিত্র বলে স্মৃত।
Verse 19
पश्यामि लोकानमलान् शुचीन् ब्राह्मणयायिन: । तेषु मे तात गन्तव्यमह्वाय च चिराय च,तात! ब्राह्मणकी सेवामें रहनेवाले पुरुषको जिन पवित्र और निर्मल लोकोंकी प्राप्ति होती है, उन्हें मैं यहींसे देखता हूँ। अब शीघ्र मुझे चिरकालके लिये उन्हीं लोकोंमें जाना है
ভীষ্ম বললেন—বৎস! ব্রাহ্মণদের সেবায় ও তাদের পথের অনুসারী যারা, তারা যে নির্মল ও পবিত্র লোক লাভ করে, আমি এখান থেকেই তা দেখছি। অচিরেই আমার ডাক আসবে, এবং দীর্ঘকালের জন্য আমাকে সেই লোকেই যেতে হবে।
Verse 20
यथा भार्त्राश्रियो धर्म: स्त्रीणां लोके युधिष्ठिर । स देव: सा गतिर्नन्या क्षत्रियस्य तथा द्विजा:,युधिष्ठिर! जैसे स्त्रियोंके लिये पतिकी सेवा ही संसारमें सबसे बड़ा धर्म है, पति ही उनका देवता और वही उनकी परम गति है, उनके लिये दूसरी कोई गति नहीं है; उसी प्रकार क्षत्रियके लिये ब्राह्मणकी सेवा ही परम धर्म है। ब्राह्मण ही उनका देवता और परम गति है, दूसरा नहीं
ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির, যেমন এই জগতে নারীর ধর্ম স্বামীর আশ্রয়ে প্রতিষ্ঠিত—স্বামীই তার দেবতা, স্বামীই তার পরম গতি; অন্য কোনো চূড়ান্ত আশ্রয় নেই—তেমনি ক্ষত্রিয়ের জন্য ব্রাহ্মণদের সেবা ও শ্রদ্ধাই পরম ধর্ম। ব্রাহ্মণরাই তার দেবতা ও সর্বোচ্চ আশ্রয়; অন্য কিছু নয়।
Verse 21
क्षत्रिय: शतवर्षी च दशवर्षी द्विजोत्तम: । पितापुत्रौ च विज्ञेयौ तयोरहिं ब्राह्मणो गुरु:,क्षत्रिय सौ वर्षका हो और श्रेष्ठ ब्राह्मण दस वर्षकी अवस्थाका हो तो भी उन दोनोंको परस्पर पुत्र और पिताके समान जानना चाहिये। उनमें ब्राह्मण पिता है और क्षत्रिय पुत्र
ভীষ্ম বললেন—যদি কোনো ক্ষত্রিয়ের বয়স একশো বছরও হয়, আর কোনো উৎকৃষ্ট ব্রাহ্মণের বয়স মাত্র দশ, তবু তাদের সম্পর্ককে পিতা-পুত্ররূপেই বুঝতে হবে। সেই যুগলে ব্রাহ্মণ পিতা ও গুরু, আর ক্ষত্রিয় পুত্রসম।
Verse 22
नारी तु पत्यभावे वै देवरं कुरुते पतिम् । पृथिवी ब्राह्मणालाभे क्षत्रियं कुरुते पतिम्,जैसे नारी पतिके अभावमें देवरको पति बनाती है, उसी प्रकार पृथ्वी ब्राह्मणके न मिलनेपर ही क्षत्रियको अपना अधिपति बनाती है
ভীষ্ম বললেন—যেমন নারী স্বামীর অভাবে দেবরকে স্বামীরূপে গ্রহণ করে, তেমনই পৃথিবী ব্রাহ্মণ না পেলে ক্ষত্রিয়কে নিজের অধিপতি হিসেবে গ্রহণ করে।
Verse 23
(ब्राह्मणानुज्ञया ग्राह्मूं राज्यं च सपुरोहितै: । तद्रक्षणेन स्वर्गोडस्य तत्कोपान्नरको$क्षय: ।।) पुरोहितसहित राजाओंको ब्राह्मणकी आज्ञासे राज्य ग्रहण करना चाहिये। ब्राह्मणकी रक्षासे ही राजाको स्वर्ग मिलता है और उसको रुष्ट कर देनेसे वह अनन्तकालके लिये नरकमें गिर जाता है ।। पुत्रवच्च ततो रक्ष्या उपास्या गुरुवच्च ते । अग्निवच्चोपचर्य वै ब्राह्मणा: कुरुसत्तम,कुरुश्रेष्ठ! ब्राह्मणोंकी पुत्रके समान रक्षा, गुरुकी भाँति उपासना और अग्निकी भाँति उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिये
ভীষ্ম বললেন—রাজাদের উচিত, পুরোহিতসহ, ব্রাহ্মণদের অনুমতি নিয়ে রাজ্য গ্রহণ ও ধারণ করা। ব্রাহ্মণদের রক্ষা করলে রাজা স্বর্গ লাভ করে; কিন্তু তাদের ক্রোধ জাগালে সে অনন্তকালের জন্য নরকে পতিত হয়। অতএব, হে কুরুশ্রেষ্ঠ, ব্রাহ্মণদের পুত্রের মতো রক্ষা করো, গুরুর মতো শ্রদ্ধা করো, এবং পবিত্র অগ্নির মতো সেবা ও পূজা করো।
Verse 24
ऋजून् सतः सत्यशीलान् सर्वभूतहिते रतान् । आशीविषानिव क्रुद्धान् द्विजान् परिचरेत् सदा
ভীষ্ম বললেন—যে দ্বিজরা সরল, সৎ, সত্যনিষ্ঠ এবং সর্বভূতের হিতে রত, তাদের সর্বদা সেবা করা উচিত; কারণ ক্রুদ্ধ হলে তারা বিষধর সাপের মতো ভয়ংকর।
Verse 25
(दूरतो मातृवत् पूज्या विप्रदारा: सुरक्षया ।) सरल, साधु, स्वभावत:ः सत्यवादी तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मणोंकी सदा ही सेवा करनी चाहिये और क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पके समान समझकर उनसे भयभीत रहना चाहिये। ब्राह्मणोंकी जो स्त्रियाँ हों उनकी भी सुरक्षाका ध्यान रखते हुए माताके समान उनका दूरसे ही पूजन करना चाहिये ।। तेजसस्तपसश्चैव नित्यं बिभ्येद् युधिष्ठिर । उभे चैते परित्याज्ये तेजश्रैव तपस्तथा,युधिष्ठिर! ब्राह्मणोंक तेज और तपसे सदा डरना चाहिये तथा उनके सामने अपने तप एवं तेजका अभिमान त्याग देना चाहिये
ভীষ্ম বললেন—“হে যুধিষ্ঠির, ব্রাহ্মণদের পত্নীদের রক্ষা নিশ্চিত করে মাতৃসম জেনে দূর থেকেই শ্রদ্ধাভরে পূজা করা উচিত। ব্রাহ্মণের তেজ ও তপস্যাশক্তির প্রতি সর্বদা ভক্তিভীতিতে থাকা কর্তব্য; আর তাঁদের সম্মুখে নিজের তেজ-তপস্যার অহংকার ত্যাগ করতে হবে। এই পবিত্র শক্তির সামনে শ্রদ্ধা, সংযম ও বিনয়—এগুলিই ধর্ম।”
Verse 26
व्यवसायस्तयो: शीघ्रमुभयोरेव विद्यते । हन्युः क्रुद्धा महाराज ब्राह्मणा ये तपस्विन:,महाराज! ब्राह्मणके तप और क्षत्रियके तेजका फल शीघ्र ही प्रकट होता है तथापि जो तपस्वी ब्राह्मण हैं वे कुपित होनेपर तेजस्वी क्षत्रियको अपने तपके प्रभावसे मार सकते हैं
ভীষ্ম বললেন—“মহারাজ, ব্রাহ্মণের তপস্যা ও ক্ষত্রিয়ের তেজ—উভয়েরই ফল দ্রুত প্রকাশ পায়। কিন্তু জেনে রেখো, তপস্বী ব্রাহ্মণ ক্রুদ্ধ হলে নিজের তপোবলে তেজস্বী ক্ষত্রিয়কেও বিনাশ করতে পারেন।”
Verse 27
भूय: स्यादुभयं दत्तं ब्राह्मणाद् यदकोपनात् । कुर्यादुभयत: शेषं दत्तशेषं न शेषयेत्,क्रोधरहित--क्षमाशील ब्राह्मणको पाकर क्षत्रियकी ओरसे अधिक मात्रामें प्रयुक्त किये गये तप और तेज आगपर रूईके ढेरके समान तत्काल नष्ट हो जाते हैं। यदि दोनों ओरसे एक-दूसरेपर तेज और तपका प्रयोग हो तो उनका सर्वथा नाश नहीं होता; परंतु क्षमाशील ब्राह्मणके द्वारा खण्डित होनेसे बचा हुआ क्षत्रियका तेज किसी तेजस्वी ब्राह्मणपर प्रयुक्त हो तो वह उससे प्रतिहत होकर सर्वथा नष्ट हो जाता है, थोड़ा-सा भी शेष नहीं रह जाता
ভীষ্ম বললেন—“আবার শোনো: ক্রোধশূন্য ব্রাহ্মণ থেকে যে শক্তি নির্গত হয়, তা দ্বিগুণ ফলদায়ী হয়। উভয় পক্ষ থেকে তেজ ও তপস্যা প্রয়োগ হলে কিছু অবশিষ্ট থাকতে পারে; কিন্তু ধৈর্যশীল ব্রাহ্মণ যে ক্ষত্রিয়-তেজকে নিবৃত্ত করেন, তার পরে যা অবশিষ্ট থাকে—তা যদি কোনো সত্য তেজস্বী ব্রাহ্মণের বিরুদ্ধে প্রয়োগ করা হয়, তবে প্রতিহত হয়ে সম্পূর্ণ নিঃশেষ হয়ে যায়; সামান্যও অবশিষ্ট থাকে না।”
Verse 28
दण्डपाणियर्यथा गोषु पालो नित्यं हि रक्षयेत् । ब्राह्मणान् ब्रह्म च तथा क्षत्रिय: परिपालयेत्,जैसे चरवाहा हाथमें डंडा लेकर सदा गौओंकी रखवाली करता है, उसी प्रकार क्षत्रियको उचित है कि वह ब्राह्मणों और वेदोंकी सदा रक्षा करे
ভীষ্ম বললেন—“যেমন হাতে লাঠি নিয়ে গোপাল সদা গরুগুলিকে রক্ষা করে, তেমনই ক্ষত্রিয়ের কর্তব্য—ব্রাহ্মণদের এবং ব্রহ্ম, অর্থাৎ বৈদিক ধর্মব্যবস্থাকে, সর্বদা রক্ষা করা।”
Verse 29
पितेव पुत्रान् रक्षेथा ब्राह्म॒णान् धर्मचेतस: । गृहे चैषामवेक्षेथा: किंस्विदस्तीति जीवनम्,राजाको चाहिये कि वह धर्मात्मा ब्राह्मणोंकी उसी तरह रक्षा करे, जैसे पिता पुत्रोंकी करता है। वह सदा इस बातकी देख-भाल करता रहे कि उनके घरमें जीवन-निर्वाहके लिये क्या है और क्या नहीं है
ভীষ্ম বললেন—“রাজা ধর্মচেতা ব্রাহ্মণদের পুত্রদের মতোই পিতার ন্যায় রক্ষা করবেন। আর তাঁদের গৃহস্থালির দিকেও নজর রাখবেন—জীবিকা নির্বাহের জন্য কী আছে, কী নেই; কোথাও কোনো অভাব আছে কি না।”
Verse 936
ये चापि सतत राजंस्तेभ्यश्व स्पृहयाम्यहम् । राजा युधिष्ठिर! जो पवित्र होकर ब्राह्मणोंको उनकी तृप्तिके लिये शुद्ध और अच्छे ढंगसे तैयार किये हुए पवित्र तथा गुणकारक अन्न परोसते हैं, उनको भी मैं सदा चाहता हूँ
হে রাজন! আমি তাদের প্রতিও সর্বদা আকাঙ্ক্ষা রাখি। হে রাজা যুধিষ্ঠির! যারা নিজে শুচি হয়ে ব্রাহ্মণদের তৃপ্তির জন্য শুদ্ধ, বিধিমতো সুপ্রস্তুত, পবিত্র ও গুণবর্ধক অন্ন পরিবেশন করে—তারাও আমার নিত্য প্রিয়।
Venerability is classified by knowledge-centered life (brahman as wealth), disciplined conduct (tapas and svādhyāya), gentle and correct speech, and sustained responsibility—rather than by mere power or age.
Support learned persons through respectful address, careful speech, and clean giving; treat spiritual authority as something to be protected and served, and institutionalize welfare-checks rather than episodic patronage.
Yes in functional form: properly articulated, auspicious speech and the honoring of learned communities are described as producing well-being ‘here and beyond,’ linking social ethics to long-horizon moral consequence.