Adhyaya 76
Anushasana ParvaAdhyaya 7655 Verses

Adhyaya 76

गोप्रदानगुणाः तथा कपिलागोविधानम् (Merits of Cow-Gift and the Origin-Account of Kapilā Cows)

Upa-parva: Dāna-dharma (Gopradāna Anuśāsana) — Discourse on Cow-Gift Merits

Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira again questions Bhīṣma for a fuller exposition of go-dāna’s merits, expressing that the discourse is ‘nectar-like’ and never satiating to hear. Bhīṣma delineates normative criteria: gifting a gentle, virtuous, young cow, covered/adorned and suitable for use, to a brāhmaṇa is said to release the donor from sins. Conversely, gifting cows that are non-productive (milk lost), debilitated, diseased, angry, or otherwise burdensome is framed as leading to adverse outcomes and as imposing hardship upon the recipient. The chapter then addresses why kapilā (tawny) cows are especially praised: Bhīṣma narrates a cosmogonic etiological account tied to Prajāpati, Surabhi, Soma, and Rudra, explaining the emergence and sanctified status of rohīṇīs/kapilās and their association with sacrificial prosperity. A concluding phalaśruti presents the recitation/understanding of this origin-account as auspicious and merit-bearing. The chapter closes with Yudhiṣṭhira acting on the instruction by donating well-equipped cows (with golden/copper milking vessels) and large numbers as yajña-related dakṣiṇā, oriented toward merit and fame.

Chapter Arc: इन्द्र (शक्र) के प्रश्न के उत्तर में पितामह भीष्म/ब्रह्माजी गो-दान के विषय को उठाते हैं—‘गोप्रदान’ का ऐसा कौन-सा रहस्य है जो लोकों तक का द्वार खोल देता है? → पितामह इन्द्र को बताते हैं कि अनेक प्रकार के लोक हैं जिन्हें इन्द्र भी नहीं देख पाते; पर शुभ कर्म, उत्तम व्रत, और निर्मल मन वाले ऋषि-ब्राह्मण उन्हें प्रत्यक्ष देखते हैं—कभी समाधि में, कभी देह-त्याग के बाद। फिर वे गो-दान के नियम, पात्रता, और भिन्न वर्णों (ब्राह्मण/क्षत्रिय) के लिए फल-भेद का क्रमशः विस्तार करते हैं, जिससे दान का ‘विधि’ पक्ष निर्णायक बन जाता है। → गो-दान की महिमा का शिखर तब आता है जब पितामह स्पष्ट करते हैं कि विधिपूर्वक ‘दोग्ध्री धेनु’ (दूध देने वाली गाय) का दान करने से द्विज को ‘महत् फल’ और ‘शाश्वत’ फल प्राप्त होता है; और यदि क्षत्रिय भी निर्दिष्ट गुणों/व्रतों से युक्त हो तो उसे भी ब्राह्मण-तुल्य फल मिलता है—गो-दान को वर्ण-सीमा से ऊपर उठाकर ‘गुण-धर्म’ के अधीन कर दिया जाता है। → अध्याय का निष्कर्ष यह है कि गो-दान केवल वस्तु-दान नहीं, बल्कि संयम (एक समय भोजन), श्रद्धा, नम्रता (गौ-नमस्कार), और विधि-पालन से संयुक्त साधना है; ऐसा करने वाला दाता गौ-दान के अनुपात में स्थायी पुण्य और उच्च लोक-प्राप्ति का अधिकारी होता है।

Shlokas

Verse 1

पर बछ। है २ >> त्रिसप्ततितमो<ध्याय: ब्रह्माजीका इन्द्रसे गोलोक और गोदानकी महिमा बताना पितामह उवाच यो<यं प्रश्नस्त्वया पृष्टो गोप्रदानादिकारित: । नास्ति प्रष्टास्ति लोके5स्मिंस्त्वत्तो5न्यो हि शतक्रतो

পিতামহ বললেন—হে দেবেন্দ্র (শতক্রতু)! গোপ্রদান ও অনুরূপ দানের বিষয়ে তুমি যে প্রশ্ন করেছ, এই জগতে তোমাকে ছাড়া এমন প্রশ্নকারী আর কেউ নেই।

Verse 2

सन्ति नानाविधा लोका यांस्त्वं शक्र न पश्यसि । पश्यामि यानहं लोकानेकपत्न्यक्ष या: स्त्रिय:

ভীষ্ম বললেন—হে শক্র! নানাবিধ লোক আছে, যেগুলি তুমি দেখতে পাও না। আমি সেই লোকগুলি দেখতে পাই; আর একনিষ্ঠ পতিব্রতা নারীরাও সেগুলি দেখতে পারে, হে শক্র।

Verse 3

कर्मभिश्चापि सुशुभै: सुव्रता ऋषयस्तथा । सशरीरा हि तान्‌ यान्ति ब्राह्मणा: शुभबुद्धय:,उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषि तथा शुभ बुद्धिवाले ब्राह्मण अपने शुभकर्मोंके प्रभावसे वहाँ सशरीर चले जाते हैं

নিজেদের অতি শুভ কর্মের প্রভাবে এবং উত্তম ব্রত পালনের শক্তিতে, সুব্রতধারী ঋষিগণ ও শুভবুদ্ধিসম্পন্ন ব্রাহ্মণগণ সেই লোকসমূহে দেহসহই গমন করেন।

Verse 4

शरीरन्यासमोक्षेण मनसा निर्मलेन च । स्वप्नभूतांश्व ताललोकान्‌ पश्यन्तीहापि सुव्रता:

দেহ-ত্যাগজনিত মুক্তি দ্বারা এবং নির্মল মনের দ্বারা, সুব্রতধারী সাধকেরা স্বপ্নসদৃশ সেই লোকসমূহকে এখানেই থেকেও দর্শন করেন।

Verse 5

ते तु लोका: सहस्राक्ष शृणु यादृग्गुणान्विता: । न तत्र क्रमते कालो न जरा न च पावकः

হে সহস্রাক্ষ! শোনো, সেই লোকসমূহ কী কী গুণে সমন্বিত। সেখানে কাল অগ্রসর হয়ে কারও উপর আধিপত্য করে না; না জরা, না ক্ষয়, আর অগ্নিরও কোনো প্রভাব নেই।

Verse 6

तथा नास्त्यशुभ॑ किंचिन्न व्याधिस्तत्र न कलम: । यद्‌ यच्च गावो मनसा तस्मिन्‌ वाउछन्ति वासव

আর সেখানে সামান্যও অশুভ নেই; সেই লোকেতে না রোগ আছে, না কলুষ। হে বাসব! সেখানে গাভীগণ মনে যে-যে বস্তু কামনা করে, তাই-ই তারা লাভ করে।

Verse 7

तत्‌ सर्व प्राप्तुवन्ति सम मम प्रत्यक्षदर्शनात्‌ । कामगा: कामचारिण्य: कामात्‌ कामांश्व भुज्जते

তারা সেই সবই সমভাবে লাভ করে—এ কথা আমি নিজের প্রত্যক্ষ দর্শন থেকে বলছি। তারা ইচ্ছামতো গমন করে, ইচ্ছামতো আচরণ করে; কামনা থেকেই কাম্য ভোগ লাভ করে এবং তা ভোগ করে।

Verse 8

वाप्य: सरांसि सरितो विविधानि वनानि च | गृहाणि पर्वताश्नैव यावद्द्वव्यं च किंचन,बावड़ी, तालाब, नदियाँ, नाना प्रकारके वन, गृह और पर्वत आदि सभी वस्तुएँ वहाँ उपलब्ध हैं

ভীষ্ম বললেন—সেখানে কূপ-সোপান, সরোবর, নদী এবং নানাবিধ বন আছে; গৃহ ও পর্বতও আছে—অর্থাৎ যে-কোনো দ্রব্য-সম্পদ যা কিছু বিদ্যমান, সবই সেখানে প্রাচুর্যে মেলে।

Verse 9

मनोज्ञं सर्वभूतेभ्य: सर्वतन्त्रं प्रदृश्यत । ईदृशाद्‌ विपुलाल्लोकान्नास्ति लोकस्तथाविध:

ভীষ্ম বললেন—গোলোক সকল প্রাণীর কাছে মনোহর বলে প্রতীয়মান হয়। সেখানে সর্ববস্তুর উপর সকলের সমান অধিকারসহ এক সর্বজনীন বিধান দেখা যায়। এমন বিশাল ও উৎকৃষ্ট লোকের তুল্য আর কোনো লোক নেই।

Verse 10

तत्र सर्वसहा: क्षान्ता वत्सला गुरुवर्तिन: । अहंकारैरविरहिता यान्ति शक्र नरोत्तमा:

ভীষ্ম বললেন—হে শক্র (ইন্দ্র)! যারা সর্বসহিষ্ণু, ক্ষমাশীল, স্নেহশীল, গুরুজনের আজ্ঞাপালক এবং অহংকারশূন্য—এমন শ্রেষ্ঠ মানুষরাই সেই লোক লাভ করে।

Verse 11

यः सर्वमांसानि न भक्षयीत पुमान्‌ सदा भावितो धर्मयुक्त: । मातापित्रोररचिता सत्ययुक्तः शुश्रूषिता ब्राह्मणानामनिन्द्य:

ভীষ্ম (পিতামহ) বললেন—যে পুরুষ সকল প্রকার মাংস ভক্ষণ ত্যাগ করে, সদা পবিত্র ধ্যান-চিন্তনে নিমগ্ন থেকে ধর্মে প্রতিষ্ঠিত থাকে; যে মাতা-পিতার পূজা করে, সত্যে অবিচল থাকে এবং ব্রাহ্মণদের সেবা করে—এমন অনিন্দ্য ব্যক্তি এই গুণসমূহে সমন্বিত হয়ে সনাতন, অবিনশ্বর গোকুললোক (গোলোক) লাভ করে।

Verse 12

अक्रोधनो गोषु तथा द्विजेषु धर्मे रतो गुरुशुश्रूषकश्न । यावज्जीवं सत्यवृत्ते रतश्न दाने रतो य: क्षमी चापराधे

ভীষ্ম বললেন—যে গাভী ও দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) প্রতি ক্রোধহীন, ধর্মে রত থেকে গুরুজনের সেবা করে; যে আজীবন সত্যাচরণে আসক্ত, দানে প্রবৃত্ত এবং অপরাধ হলেও ক্ষমাশীল—এমন ব্যক্তি এই গুণসমূহে সমন্বিত হয়ে সনাতন, অবিনশ্বর গোলোক লাভ করে।

Verse 13

मृदुर्दान्तो देवपरायण श्नव सर्वातिथिश्वापि तथा दयावान्‌ | ईदृग्गुणो मानवस्तं प्रयाति लोकं गवां शाश्वृतं चाव्ययं च

ভীষ্ম বললেন—হে দেবপরায়ণ, শোনো। যে স্বভাবে মৃদু, ইন্দ্রিয়সংযমী, দেবপূজায় নিবিষ্ট, সকল অতিথির সৎকারকারী এবং দয়ালু—এমন গুণসম্পন্ন মানুষ গাভীদের সেই শাশ্বত ও অবিনশ্বর লোক, অর্থাৎ গোলোক, লাভ করে।

Verse 14

न पारदारी पश्यति लोकमेतं न वै गुरुध्नो न मृषा सम्प्रलापी । सदा प्रवादी ब्राह्मणेष्वात्तवैरो दोषैरेतैर्यश्व युक्तो दुरात्मा

পিতামহ বললেন—যে পরস্ত্রীগামী, সে সেই লোক দর্শন করে না; না গুরুহন্তা, না মিথ্যা ও ছলনাময় বাক্যকারী। যে সদা নিন্দায় রত, ব্রাহ্মণদের প্রতি বৈর ধারণ করেছে এবং এই দোষে আবদ্ধ দুষ্টচিত্ত—সে পুণ্যবানদের নিবাস সেই ধাম লাভ করে না।

Verse 15

न मित्रधुडनैकृतिक: कृतघ्नः शठो<नृजुर्धर्मविद्वेषकश्न । न ब्रह्महा मनसापि प्रपश्येद्‌ गवां लोकं पुण्यकृतां निवासम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে বন্ধু-দ্রোহী, নীতিহীন, কৃতঘ্ন, শঠ, কুটিল ও ধর্মদ্বেষী—এবং যে ব্রাহ্মণহন্তাও—সে পুণ্যকর্মীদের নিবাস গাভীদের লোক (গোলোক) মনেও দর্শন করতে পারে না।

Verse 16

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं निपुणेन सुरेश्वर । गोप्रदानरतानां तु फलं शृणु शतक्रतो

হে সুরেশ্বর, হে শতক্রতু! এ সব আমি তোমাকে নিপুণভাবে বললাম। এখন গোধানে রতদের যে ফল লাভ হয়, তা শোনো।

Verse 17

दायाद्यलब्धैरर्थ्यों गा: क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । धर्मार्जितान्‌ धनै: क्रीतान्‌ स लोकानाप्लुते5क्षयान्‌

যে ব্যক্তি পৈতৃক সম্পদ থেকে প্রাপ্ত ধনে গাভী ক্রয় করে দান করে, সে ধর্মপূর্বক অর্জিত সেই ধনের দ্বারা অক্ষয় লোকসমূহ লাভ করে।

Verse 18

यो वै द्यूते धनं जित्वा गा: क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । स दिव्यमयुतं शक्र वर्षाणां फलमश्लुते

হে শক্র (ইন্দ্র)! যে ব্যক্তি জুয়ায় ধন জিতে তা দিয়ে গাভী ক্রয় করে দান করে, সে দশ হাজার দিব্য বর্ষ পর্যন্ত সেই পুণ্যফল ভোগ করে।

Verse 19

दायाद्याद्‌ या: सम वै गावो न्यायपूर्वैरुपार्जिता: । प्रदद्यात्‌ ता: प्रदातृणां सम्भवन्त्यपि च श्रुवा:

যে ব্যক্তি পৈতৃক অংশ প্রভৃতি থেকে ন্যায়পূর্বক প্রাপ্ত গাভীগুলি দান করে, শ্রুতি-পরম্পরা অনুসারে সেই দাতার জন্য ঐ গাভীগুলিই অক্ষয় পুণ্যফলের কারণ হয়।

Verse 20

प्रतिगृहा तु यो दद्याद्‌ गा: संशुद्धेन चेतसा । तस्यापीहाक्षयाल्लोंकान्‌ ध्रुवान्‌ विद्धि शचीपते

হে শচীপতে! যে ব্যক্তি দানে গাভী গ্রহণ করে, পরে শুদ্ধচিত্তে সেই গাভীগুলিই আবার দান করে, সে-ও পরলোকে অক্ষয় ও অচল লোক লাভ করে—এ কথা নিশ্চিত জেনো।

Verse 21

जन्मप्रभृति सत्यं च यो ब्रूयान्नियतेन्द्रिय: । गुरुद्धविजसह: क्षान्तस्तस्य गोभि: समा गति:

যে জন্ম থেকে সত্য বলে, ইন্দ্রিয়সংযমী, গুরুজন ও ব্রাহ্মণের কঠোর বাক্যও সহ্য করে এবং ক্ষমাশীল থাকে—তার গতি গাভীদের সমান; অর্থাৎ সে গোলোক প্রাপ্ত হয়।

Verse 22

न जातु ब्राह्मणो वाच्यो यदवाच्यं शचीपते । मनसा गोधु न द्रुह्ेद्‌ गोवृत्तिगोंडनुकल्पक:

হে শচীপতে, শক্র! ব্রাহ্মণকে কখনও অবাচ্য কথা বলা উচিত নয়; আর গাভীদের প্রতি মনে পর্যন্ত বিদ্বেষ রাখা উচিত নয়। যে ব্রাহ্মণ গাভীর ন্যায় সরল ও অহিংস জীবিকা অবলম্বন করে, গাভীদের জন্য ঘাস-খড় প্রভৃতির ব্যবস্থা করে এবং সত্য ও ধর্মে নিবিষ্ট থাকে—তার ফল শোনো: সে যদি একটিমাত্র গাভীও দান করে, তবে সে সহস্র গোদানের সমান পুণ্য লাভ করে।

Verse 23

सत्ये धर्मे च निरतस्तस्य शक्र फलं शृणु । गोसहस्रेण समिता तस्य थेनुर्भवत्युत

পিতামহ বললেন—হে শক্র! যে সত্য ও ধর্মে নিবিষ্ট, তার প্রাপ্য ফল শোনো। এমন ব্যক্তির দান করা একটিমাত্র গাভীও পুণ্যে সহস্র গাভী-দানের সমান হয়ে ওঠে। হে শচীপতি শক্র! ব্রাহ্মণের প্রতি কখনও কঠোর বাক্য বলা উচিত নয়, আর গাভীদের প্রতি মনে-মনেও বিদ্বেষ ভাবনা রাখা উচিত নয়। যে গাভীর ন্যায় কোমল, অহিংস ও পরোপকারী জীবিকা অবলম্বন করে, গাভীদের জন্য ঘাস-খড় ইত্যাদির ব্যবস্থা করে এবং সত্য-ধর্মে অবিচল থাকে—তার এক গাভী-দানও সহস্র গাভী-দানের তুল্য ফল দেয়।

Verse 24

क्षत्रियस्य गुणैरेतैरपि तुल्यफलं शृणु । तस्यापि द्विजतुल्या गौर्भवतीति विनिश्चय:

ভীষ্ম বললেন—এই একই গুণে যুক্ত ক্ষত্রিয়েরও সমান ফল শোনো। ধর্মাত্মাদের স্থির সিদ্ধান্ত এই যে, তার দান করা গাভীও ব্রাহ্মণের দানকৃত গাভীর তুল্যই পুণ্যফল প্রদান করে।

Verse 25

वैश्यस्यैते यदि गुणास्तस्य पठचशतं भवेत्‌ । शूद्रस्यापि विनीतस्य चतुर्भागफलं स्मृतम्‌

ভীষ্ম বললেন—যদি বৈশ্যের মধ্যেও এই গুণগুলি থাকে, তবে তার ফল গণ্য হয় পাঁচশো (গাভী-দানের) সমান—যদিও বাহ্যত দান একটিমাত্র গাভী। আর বিনীত, সংযত শূদ্রের জন্য স্মৃতিতে চতুর্থাংশ ফল বলা হয়েছে—দুইশো পঞ্চাশ গাভী-দানের তুল্য।

Verse 26

एतच्चैनं यो<नुतिछेत युक्तः सत्ये रतो गुरुशुश्रूषया च । दक्ष: क्षान्तो देवतार्थी प्रशान्तः शुचिर्बुद्धो धर्मशीलोडनहंवाक्‌ू

ভীষ্ম বললেন—যে সংযমী হয়ে এই আচরণ পালন করে, সত্যে আনন্দ পায় এবং গুরুশুশ্রূষায় নিবিষ্ট থাকে; যে দক্ষ, ক্ষমাশীল, দেবপূজায় অনুরক্ত, অন্তরে প্রশান্ত, শুচি, বুদ্ধিমান, ধর্মশীল এবং অহংকারমিশ্রিত বাক্য থেকে মুক্ত—সেই-ই এখানে উপদেশিত আচরণকে সত্যই ধারণ করে।

Verse 27

नित्यं दद्यादेकभक्त: सदा च सत्ये स्थितो गुरुशुश्रूषिता च

ভীষ্ম বললেন—হে ইন্দ্র! যে সর্বদা একবার আহার করে, প্রতিদিন গাভী দান করে, সত্যে স্থিত থাকে এবং গুরুশুশ্রূষায় নিয়োজিত থাকে—তার প্রাপ্য ফলের বিবরণ শোনো। যে বেদ অধ্যয়ন করে, যার হৃদয়ে গাভীদের প্রতি ভক্তি, যে গোদান করে আনন্দিত হয় এবং জন্ম থেকেই গাভীদের প্রণাম করে এসেছে—তার জন্য এই মহৎ ফল অবশ্যম্ভাবী।

Verse 28

वेदाध्यायी गोषु यो भक्तिमांश्व नित्यं दत्त्वा योडभिनन्देत गाश्न । आजातितो यश्षु गवां नमेत इदं फलं शक्र निबोध तस्य

ভীষ্ম বললেন—হে শক্র, হে ইন্দ্র! যে ব্যক্তি বেদ অধ্যয়ন করে, গাভীর প্রতি ভক্তিসম্পন্ন, নিয়মিত গাভী দান করে দানে আনন্দ পায়, এবং জন্ম থেকেই গাভীকে প্রণাম করে—তার প্রাপ্য ফল জেনে নাও। দান-নিয়ম, শ্রদ্ধা ও বেদাধ্যয়নে প্রতিষ্ঠিত এমন জীবনের যে পুরস্কার, তা এখন শোনো।

Verse 29

यत्‌ स्यादिष्ट्वा राजसूये फल तु यत्‌ स्यादिष्ट्वा बहुना काउचनेन । एतत्‌ तुल्यं फलमप्याहुरग्रयं सर्वे सन्तस्त्वृषयो ये च सिद्धा:

পিতামহ বললেন—রাজসূয় যজ্ঞ সম্পাদনে যে ফল লাভ হয়, এবং প্রচুর স্বর্ণদক্ষিণাসহ যজ্ঞ করলে যে ফল মেলে—এই ব্যক্তিও তার সমান, বরং শ্রেষ্ঠ ফল লাভ করে। এ কথা সত্যজ্ঞ সকল সাধু, ঋষি ও সিদ্ধগণ ঘোষণা করেন।

Verse 30

योअग्रं भक्त किंचिदप्राश्य दद्याद्‌ गोभ्यो नित्यं गोव्रती सत्यवादी । शान्तो5लुब्धो गोसहस्रस्य पुण्यं संवत्सरेणाप्लुयात्‌ सत्यशील:

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি গৌব্রত পালন করে, সত্যভাষী, শান্ত ও নির্লোভ হয়ে, নিজের আহার গ্রহণের আগে প্রতিদিন সামান্য অংশ গাভীদের অর্পণ করে—সে সত্যনিষ্ঠ মানুষ এক বছরের মধ্যে সহস্র গাভী দানের পুণ্য লাভ করে।

Verse 31

यदेकभक्तमश्रीयाद्‌ दद्यादेकं गवां च यत्‌ । दशवर्षाण्यनन्तानि गोव्रती गो&$नुकम्पक:

ভীষ্ম বললেন—যদি কোনো ব্যক্তি একবার আহার করার নিয়ম গ্রহণ করে এবং সেই এক আহার থেকেই এক অংশ গাভীদের দেয়—গৌব্রতধারী ও গবাদিপশুর প্রতি করুণাশীল হয়ে দশ বছর এভাবে সেবায় নিবিষ্ট থাকলে সে অনন্ত সুখ লাভ করে।

Verse 32

एकेनैव च भक्तेन य: क्रीत्वा गां प्रयच्छति । यावन्ति तस्या रोमाणि सम्भवन्ति शतक्रतो

ভীষ্ম বললেন—হে শতক্রতু! যে ব্যক্তি একটিমাত্র আন্তরিক ভক্তি নিয়ে একটি গাভী ক্রয় করে দান করে, সেই গাভীর দেহে যত লোম আছে, তত সংখ্যক শুভ ফল তার জন্য উৎপন্ন হয়।

Verse 33

ब्राह्मणस्य फल हीदं क्षत्रियस्य तु वै शूणु

ভীষ্ম বললেন—এটি ব্রাহ্মণের জন্য নির্দিষ্ট ফল; এখন ক্ষত্রিয়ের ফল শোনো। যে ক্ষত্রিয় একইভাবে পাঁচ বছর গোর আরাধনা ও সেবা করে, সে সেই একই ফল লাভ করে। বৈশ্য অর্ধেক সময়ে, আর শূদ্র বৈশ্যেরও অর্ধেক সময়ে সেই ফল পায়—এমনই বলা হয়েছে।

Verse 34

पज्चवार्षिकमेवं तु क्षत्रियस्य फल स्मृतम्‌ । ततोडर्धेन तु वैश्यस्य शूद्रो वैश्यार्धत: स्मृत:

ভীষ্ম বললেন—এইভাবে ক্ষত্রিয়ের জন্য এ ব্রতের ফল পাঁচ বছরের সাধনায় প্রাপ্ত বলে স্মৃতিতে বলা হয়েছে। তার অর্ধেক সময়ে বৈশ্য, আর বৈশ্যেরও অর্ধেক সময়ে শূদ্র—সেই একই ফল লাভ করে—এমনই বলা হয়েছে।

Verse 35

यश्चात्मविक्रयं कृत्वा गा: क्रीत्वा सम्प्रयच्छति । यावत्‌ संदर्शयेद्‌ गां वै स तावत्‌ फलमश्लुते

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি নিজেকে বিক্রি করেও গরু কিনে দান করে, সে যতদিন বিশ্বব্রহ্মাণ্ডে গোজাতির অস্তিত্ব প্রত্যক্ষ করে, ততদিন সেই দানের অক্ষয় ফল ভোগ করে।

Verse 36

रोग्णि रोग्णि महाभाग लोकाश्षास्या5क्षया:स्मृता: । संग्रामेष्वर्जयित्वा तु यो वै गा: सम्प्रयच्छति । आत्मविक्रयतुल्यास्ता: शाश्वता विद्धि कौशिक

ভীষ্ম বললেন—হে মহাভাগ! গোর প্রতিটি লোমে শাশ্বত ও অক্ষয় লোকসমূহের অবস্থান স্মৃতিতে বলা হয়েছে। যে ব্যক্তি যুদ্ধে গরু জয় করে পরে তা দান করে, সেই গরুগুলি তার জন্য আত্মবিক্রয়ে অর্জিত গরুর সমান হয়ে চিরস্থায়ী, অক্ষয় ফল দেয়—হে কৌশিক, এ কথা জেনে রাখো।

Verse 37

अभावे यो गवां दद्यात्‌ तिलधेनुं यतव्रत: । दुर्गात्‌ स तारितो थेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोदते

ভীষ্ম বললেন—যে সংযমী ও ব্রতনিষ্ঠ ব্যক্তি, গরুর অভাবে তিলধেনু দান করে, সে সেই ধেনুর পুণ্যপ্রভাবে দুর্গম বিপদ থেকে উদ্ধার পায় এবং দুধধারা প্রবাহিত নদীর তীরে আনন্দ করে।

Verse 38

न त्वेवासां दानमात्र प्रशस्तं पात्र कालो गोविशेषो विधिकश्ष । कालज्ञानं विप्र गवान्तरं हि दुःखं ज्ञातुं पावकादित्यभूतम्‌

পিতামহ বললেন—শুধু গরু দান করলেই তা প্রশংসনীয় হয় না। এমন দানে যোগ্য পাত্র, উপযুক্ত কাল, উৎকৃষ্ট গরু, বিধি এবং কালের যথার্থ বিচার আবশ্যক। হে ব্রাহ্মণ, গরুগুলির মধ্যে যে পারস্পরিক তারতম্য আছে, এবং অগ্নি ও সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান পাত্রকে চিনে নেওয়া—এ সত্যই অত্যন্ত কঠিন।

Verse 39

स्वाध्यायाब्यं शुद्धयोनिं प्रशान्तं वैतानस्थं पापभीरुं बहुज्ञम्‌ | गोषु क्षान्तं नातितीक्ष्णं शरण्यं वृत्तिग्लानं तादृशं पात्रमाहु:

ভীষ্ম বললেন—যে ব্রাহ্মণ বেদস্বাধ্যায়ে সমৃদ্ধ, শুদ্ধ বংশে জন্ম, স্বভাবত শান্ত, বৈদিক যজ্ঞ-পরম্পরায় নিবিষ্ট, পাপভীরু ও বহুশ্রুত; গরুর প্রতি ক্ষমাশীল ও কোমল, স্বভাবে অতিশয় কঠোর নয়, তাদের আশ্রয় ও রক্ষা দিতে সক্ষম, এবং জীবিকার বন্ধন থেকে ক্লান্ত/বিমুখ—তাকেই গো-দানের যোগ্য পাত্র বলা হয়।

Verse 40

वृत्तिग्लाने सीदति चातिमात्रं कृष्यर्थ वा होम्यहेतो: प्रसूते: । गुर्वर्थ वा बालसंवृद्धये वा धेनुं दद्याद्‌ देशकालेडविशिष्टे

ভীষ্ম বললেন—যার জীবিকা ক্ষীণ হয়ে গেছে এবং যে অত্যন্ত দুঃখে পতিত, এমন ব্রাহ্মণকে সাধারণ দেশ-কালেও দুধেল গরু দান করা উচিত। তদ্রূপ কৃষিকাজে, হোমের উপকরণে, প্রসূতা নারীর পোষণে, গুরুদক্ষিণায় অথবা শিশুপালনে প্রয়োজন হলে—সাধারণ দেশ-কালেও দুধেল গরু দান করা বিধেয়।

Verse 41

अन्तर्ज्ाता: सक्रयज्ञानलब्धा: प्राणै: क्रीतास्तेजसा यौतकाश्न । कृच्छोत्सृष्टा: पोषणाभ्यागताश्न द्वारैरेतैगोविशेषा: प्रशस्ता:

ভীষ্ম বললেন—যে গরুগুলি নিজের গৃহে জন্মেছে, ক্রয় করে আনা হয়েছে, যজ্ঞ বা বিদ্যার ফলস্বরূপ লাভ হয়েছে, প্রাণের বিনিময়ে অর্জিত হয়েছে, যুদ্ধে বীরত্বে জয় করে পাওয়া হয়েছে, যৌতুক হিসেবে এসেছে, পালন-পোষণ কষ্টকর মনে করে মালিক ত্যাগ করেছে, অথবা আশ্রয় ও আহারের জন্য নিজে এসে শরণ নিয়েছে—এমন বিশেষ গরুগুলিই এইসব কারণের দ্বারা দানের জন্য প্রশংসিত।

Verse 42

बलान्विता: शीलवयोपपन्ना: सर्वा: प्रशंसन्ते सुगन्धवत्य: । यथा हि गंगा सरितां वरिष्ठा तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा

ভীষ্ম বললেন—বলসম্পন্ন, সদাচারযুক্ত এবং যৌবনের পূর্ণতায় স্থিত এই সকল গরুই সুগন্ধময় ও উৎকৃষ্ট বলে প্রশংসিত। যেমন নদীগণের মধ্যে গঙ্গা শ্রেষ্ঠ, তেমনই অর্জুনী গরুগণের মধ্যে কপিলা শ্রেষ্ঠ।

Verse 43

हृष्ट-पुष्ट, सीधी-सादी, जवान और उत्तम गन्धवाली सभी गौएँ प्रशंसनीय मानी गयी हैं। जैसे गंगा सब नदियोंमें श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कपिला गौ सब गौआओंमें उत्तम है ।।

ভীষ্ম বললেন— দাতা তিন রাত্রি উপবাস করবে, কেবল জল অবলম্বন করে ভূমিতে শয়ন করবে। ঘাস-খড়ে গাভীগুলিকে সম্পূর্ণ তৃপ্ত করে এবং ব্রাহ্মণদের ভোজন ও যথোচিত সম্মানে সন্তুষ্ট করে, তারপর সেই গাভীগুলি দান করবে। গাভীগুলি হবে সুশীল ও সবল, সঙ্গে থাকবে দুধপানকারী পুষ্ট বাছুর। গোদান করার পর দাতা তিন দিন কেবল গোরস—দুগ্ধজাত আহারেই জীবনধারণ করবে।

Verse 44

दत्त्वा धेनुं सुव्रतां साधुदोहां कल्याणवत्सामपलायिनीं च । यावन्ति रोमाणि भवन्ति तस्या- स्तावन्ति वर्षाणि भवन्त्यमुत्र

ভীষ্ম বললেন— যে ব্যক্তি সুশীলা, সহজে ও ভালোভাবে দোহনযোগ্য, সুন্দর বাছুরযুক্ত এবং বাঁধন ছিঁড়ে পালায় না—এমন সুব্রতা গাভী দান করে, সে গাভীর দেহে যত লোম আছে তত বছর পরলোকে সুখ ভোগ করে।

Verse 45

तथानड्वाहं ब्राह्मणाय प्रदाय धुर्य युवानं बलिनं विनीतम्‌ । हलस्य वोढारमनन्तवीर्य॑ प्राप्रोति लोकान्‌ दशधेनुदस्य

ভীষ্ম বললেন— যে ব্যক্তি ব্রাহ্মণকে ভারবহনযোগ্য, যুবক, বলবান, বিনীত ও প্রশিক্ষিত, হাল টানার শক্তিশালী ষাঁড় দান করে, সে দশটি দুধেল গাভী দানকারীর সমান পুণ্যলোক লাভ করে।

Verse 46

कान्तारे ब्राह्मणान्‌ गाश्न यः परित्राति कौशिक । क्षणेन विप्रमुच्येत तस्य पुण्यफलं शृणु

ভীষ্ম বললেন— হে সহস্রাক্ষ (ইন্দ্র)! যে ব্যক্তি দুর্গম অরণ্যে বিপন্ন ব্রাহ্মণ ও গাভীদের রক্ষা করে, সে এক মুহূর্তেই সকল পাপ থেকে মুক্ত হয়; তার পুণ্যফলও শোনো।

Verse 47

अश्वमेधक्रतोस्तुल्यं फलं भवति शाश्वतम्‌ । मृत्युकाले सहस्राक्ष यां वृत्तिमनुकाड्क्षते

হে সহস্রাক্ষ! সে অশ্বমেধ যজ্ঞের সমান অক্ষয় ফল লাভ করে। আর মৃত্যুকালে যে অবস্থার আকাঙ্ক্ষা করে, সেই অবস্থাই সে প্রাপ্ত হয়।

Verse 48

लोकान्‌ बहुविधान्‌ दिव्यान्‌ यच्चास्य हृदि वर्तते । तत्‌ सर्व समवाप्रोति कर्मणैतेन मानव:

এই সৎকর্মের প্রভাবে মানুষ নানাবিধ দিব্য লোক লাভ করে; আর তার হৃদয়ে যে-যে কামনা বাস করে, সেগুলিও সে সম্পূর্ণরূপে অর্জন করে।

Verse 49

गोभिश्व समनुज्ञात: सर्वत्र च महीयते । यस्त्वेतेनैव कल्पेन गां वनेष्वनुगच्छति

গাভীদের অনুমোদন ও অনুগ্রহ লাভ করে সে সর্বত্র সম্মানিত হয়। কিন্তু যে ব্যক্তি এই বিধান অনুসারে বনে বাস করে গাভীদের অনুসরণ করে, আসক্তিহীন, সংযমী ও পবিত্র থেকে তৃণ-পত্র এবং গোবর আহার করে জীবন ধারণ করে—তার মনে যখন আর কোনো কামনা থাকে না, তখন সে দেবতাদের সঙ্গে আমার লোকেতে আনন্দসহকারে বাস করে; অথবা যেখানে তার ইচ্ছা, সেই সেই লোকেই গমন করে।

Verse 50

तृणगोमयपर्णाशी निःस्पूृहो नियत: शुचि: । अकामं तेन वस्तव्यं मुदितेन शतक्रतो

হে শতক্রতু! তৃণ, গোবর ও পত্রভোজী, আসক্তিহীন, সংযমী ও শুচি সেই ব্যক্তি প্রফুল্লচিত্তে নিষ্কামভাবে বাস করুক।

Verse 51

मम लोके सुरै: सार्थ लोके यत्रापि चेच्छति

সে দেবতাদের সঙ্গে আমার লোকেতে বাস করে; অথবা যেখানে-যেখানে তার ইচ্ছা, সেই সেই লোকেই গমন করে।

Verse 72

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानसम्बन्धी बहतत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে পবিত্র মহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে গোদান-সম্পর্কিত বাহাত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 73

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पितामहेन्द्रसंवादे त्रिसप्ततितमो<5ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে পিতামহ (ভীষ্ম) ও ইন্দ্রের সংলাপ—ত্রিসপ্ততিতম (৭৩তম) অধ্যায়—সমাপ্ত হল।

Verse 263

महत्‌ फल प्राप्यते स द्विजाय दत्त्वा दोग्ध्रीं विधिनानेन धेनुम्‌ । जो पुरुष सदा सावधान रहकर इस उपर्युक्त धर्मका पालन करता है तथा जो सत्यवादी

ভীষ্ম বললেন—এই বিধি অনুসারে দুধ-দেওয়া ধেনু কোনো দ্বিজ (ব্রাহ্মণ)-কে দান করলে মহৎ ফল লাভ হয়। যে পুরুষ সর্বদা সতর্ক থেকে এই ধর্ম পালন করে—সত্যভাষী, গুরুসেবায় নিবেদিত, দক্ষ, ক্ষমাশীল, দেবভক্ত, শান্তচিত্ত, শুচি, জ্ঞানবান, ধর্মপরায়ণ ও অহংকারশূন্য—সে যদি উক্ত বিধি মেনে ব্রাহ্মণকে দুধ-দেওয়া গাভী দান করে, তবে সে মহান পুণ্যফল প্রাপ্ত হয়।

Verse 323

तावत्‌ प्रदानात्‌ स गवां फलमाप्रोति शाश्वतम्‌ । शतक्रतो! जो एक समय भोजन करके दूसरे समयके बचाये हुए भोजनसे गाय खरीदकर उसका दान करता है

ভীষ্ম বললেন—হে শতক্রতু (ইন্দ্র)! গাভী দান করলে মানুষ চিরস্থায়ী ফল লাভ করে। যে ব্যক্তি এক সময় আহার করে, পরের সময়ের জন্য সঞ্চিত খাদ্য দিয়ে একটি গাভী কিনে তা দান করে, সে সেই গাভীর দেহে যত লোম আছে, তত গাভী দানের অক্ষয় পুণ্যফল লাভ করে।

Frequently Asked Questions

Whether a gift remains meritorious if it transfers hardship to the recipient; the chapter treats burdensome donations (diseased, non-productive, or coercively obtained cows) as ethically defective despite being labeled ‘charity.’

Give what is fit, useful, and respectfully prepared; merit is linked to the recipient’s benefit and the donor’s responsible intention, not to the donor’s convenience in disposing of unwanted property.

Yes. The chapter states that reciting/knowing the auspicious account of cows’ origin and status is purifying and conducive to well-being and prosperity, functioning as a textual warrant for the discourse’s ritual-ethical authority.