Adhyaya 69
Anushasana ParvaAdhyaya 6979 Verses

Adhyaya 69

Nṛga-upākhyāna: Brāhmaṇa-sva and the Consequence of Misappropriated Gift-Cattle (कृकलास-रूपे नृगोपाख्यानम्)

Upa-parva: Brāhmaṇa-sva Anuśāsana (Instruction on Brahmin Property and Non-appropriation)

Bhīṣma narrates an exemplum about King Nṛga to illustrate the severity of brāhmaṇa-sva appropriation. In Dvāravatī, water-seekers discover a concealed well in which a massive lizard (kṛkalāsa) is trapped. Unable to extract it, they inform Vāsudeva (Kṛṣṇa), who lifts it out. The being reveals himself as King Nṛga, renowned for extensive gifting, yet fallen into a degraded condition due to an inadvertent wrong: a cow from a brāhmaṇa’s herd strayed into Nṛga’s cattle and was later given away as a gift to another brāhmaṇa. When the original owner reclaimed it, both brāhmaṇas contested ownership and appealed to Nṛga as donor. Nṛga offered large compensations—hundreds and even vast numbers of cows, plus valuables—but the recipient refused, insisting on the original cow. Nṛga then recounts his post-mortem audience with Yama (Dharmarāja), who acknowledges Nṛga’s immense merit yet identifies a residual fault: an untrue pledge of protection, failure in promise, and taking brāhmaṇa property—described as a threefold transgression. Nṛga chooses to undergo the painful consequence first, resulting in his non-human embodiment in the well, while retaining memory. After a thousand years, Kṛṣṇa’s intervention—foretold by Yama—liberates him, and he ascends to higher worlds. Kṛṣṇa concludes with an explicit norm: one who understands should not take brāhmaṇa property; it destroys the taker as the brāhmaṇa’s cow destroyed Nṛga, and association with the virtuous is not fruitless, since it facilitated Nṛga’s release. The chapter closes by warning against wrongdoing toward cows and emphasizing that both giving and harm bear corresponding results.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, दान-धर्म की सूक्ष्मताओं को जानने की उत्कंठा से, भीष्म से पूछते हैं—दह्यमान (कष्टग्रस्त) ब्राह्मण को उपानह (जूते) देने का फल क्या होता है? → भीष्म क्रमशः दानों की शृंखला खोलते हैं—जूता, शकट (गाड़ी), तिल, भूमि, गौ और अन्न—और बताते हैं कि दान केवल वस्तु-प्रदान नहीं, बल्कि जीवन-यात्रा के काँटों, विषमताओं और संकट-पथों को पार कराने वाला धर्म-सेतु है। भूमि-दान में ‘किस भूमि का दान न किया जाए’ जैसी मर्यादाएँ (ऊसर/निर्दग्ध भूमि) जोड़कर वे दान की शुद्धता और विवेक की कसौटी रखते हैं। → गोदान-माहात्म्य का उत्कर्ष आता है—गौ को तपस्वियों से भी श्रेष्ठ कहा जाता है; देव-स्तुति और महेश्वर का तप-सम्बन्धित संकेत (महेश्वर तपस्ताभिः सह) दान को ब्रह्माण्डीय धर्म-व्यवस्था से जोड़ देता है। गौ के बहुविध उपकार (दूध, दही, घी, गोबर, चमड़ा, हड्डी, सींग, बाल) और ब्रह्मलोक/चन्द्र-सहवास जैसी परमगति की प्रतिज्ञा गोदान को अध्याय का शिखर बना देती है। → भीष्म दानों के फल को ‘अक्षय’ और ‘लोक-प्राप्ति’ के रूप में स्थिर करते हैं—अन्नदान (विशेषतः कार्तिक शुक्लपक्ष/कौमुदी) से दुर्ग-संकट-तरण और परलोक में अनन्त्य; भूमि-दान में योग्य भूमि का विधान; और गोदान से दीर्घकालिक पुण्य-सम्पदा। युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर व्यापक दान-धर्म के विधान में परिणत हो जाता है। → इसके बाद ‘गोदान का माहात्म्य’ और अधिक विस्तार से बताने का संकेत देकर भीष्म आगे की कथा-धारा के लिए द्वार खोलते हैं।

Shlokas

Verse 1

षट्षष्टितमो<5 ध्याय: जूता

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! গ্রীষ্মের তাপে যার পা জ্বলছে, এমন ব্রাহ্মণকে যে জুতো দান করে, সে কী ফল লাভ করে—আমাকে বলুন।

Verse 2

भीष्म उवाच उपानहीौ प्रयच्छेद्‌ यो ब्राह्मणे भ्य: समाहित: । मर्दते कण्टकान्‌ सर्वान्‌ विषमान्निस्तरत्यपि

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! যে একাগ্রচিত্তে ব্রাহ্মণদের জুতো দান করে, সে সকল কণ্টক (বাধা) পদদলিত করে এবং বিষম বিপদও অতিক্রম করে।

Verse 3

स शत्रूणामुपरि च संतिष्ठति युधिष्ठिर । यान॑ चाश्वतरीयुक्त तस्य शुभ्र॑ं विशाम्पते

ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! সে শত্রুদের উপর প্রতিষ্ঠিত হয়ে প্রভুত্ব করে; আর হে বিশাম্পতে, পরজন্মে সে খচ্চর-যুক্ত শুভ্র দীপ্ত রথ লাভ করে।

Verse 4

उपतिष्ठति कौन्तेय रौप्पकाउ्चन भूषितम्‌ । शकटं दम्यसंयुक्तं दत्त भवति चैव हि,कुन्तीकुमार! जो नये बैलोंसे युक्त शकट दान करता है, उसे चाँदी और सोनेसे जटित रथ प्राप्त होता है

ভীষ্ম বললেন—হে কুন্তীপুত্র! যে ব্যক্তি নতুন ও সুপ্রশিক্ষিত বলদে যুক্ত একটি গাড়ি দান করে, সে ফলস্বরূপ রৌপ্য ও স্বর্ণে অলংকৃত রথ লাভ করে।

Verse 5

युधिछिर उवाच यत्‌ फलं तिलदाने च भूमिदाने च कीर्तितम्‌ | गोदाने चान्नदाने च भूयस्तद्‌ ब्रूहि कौरव

যুধিষ্ঠির বললেন—হে কৌরব! তিলদান, ভূমিদান, গোদান এবং অন্নদানের যে ফল শাস্ত্রে কীর্তিত হয়েছে, তা আবার বিস্তারে বলুন।

Verse 6

भीष्म उवाच शृणुष्व मम कौन्तेय तिलदानस्य यत्‌ फलम्‌ | निशम्य च यथान्यायं प्रयच्छ कुरुसत्तम,भीष्मजीने कहा--कुन्तीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! तिलदानका जो फल है, वह मुझसे सुनो और सुनकर यथोचित रूपसे उसका दान करो

ভীষ্ম বললেন—হে কুন্তীপুত্র, হে কুরুশ্রেষ্ঠ! তিলদানের যে ফল, তা আমার কাছ থেকে শোনো; শুনে বিধিমতো যথাযথভাবে দান করো।

Verse 7

पितृणां परमं भोज्यं तिला: सृष्टा: स्वयम्भुवा । तिलदानेन वै तस्मात्‌ पितृपक्ष: प्रमोदते

ভীষ্ম বললেন—স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মার সৃষ্ট তিল পিতৃদের পরম ভোজ্য। অতএব তিলদান করলে পিতৃপক্ষে পিতৃগণ অত্যন্ত প্রীত হন।

Verse 8

माघमासे तिलान्‌ यस्तु ब्राह्मणेभ्य: प्रयच्छति । सर्वसत्त्वसमाकीर्ण नरकं स न पश्यति,जो माघ मासमें ब्राह्मणोंको तिल दान करता है, वह समस्त जन्तुओंसे भरे हुए नरकका दर्शन नहीं करता

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি মাঘ মাসে ব্রাহ্মণদের তিল দান করে, সে সর্বপ্রকার জীবজন্তুতে পরিপূর্ণ সেই নরক দর্শন করে না।

Verse 9

सर्वसत्रैश्न यजते यस्तिलैर्यजते पितृन्‌ | न चाकामेन दातव्यं तिलश्राद्धं कदाचन

যে তিল দ্বারা পিতৃদের পূজা করে, সে যেন সমস্ত যজ্ঞই সম্পন্ন করে। কিন্তু তিল-শ্রাদ্ধ কখনও অনিচ্ছায় বা উদাসীন মনে দেওয়া উচিত নয়; সংকল্প ও শ্রদ্ধা সহকারে তা করা কর্তব্য।

Verse 10

महर्षे: कश्यपस्यैते गात्रेभ्य: प्रसृतास्तिला: । ततो दिव्यं गता भावं प्रदानेषु तिला: प्रभो

প্রভো! এই তিল মহর্ষি কশ্যপের অঙ্গ থেকে উদ্ভূত হয়ে বিস্তার লাভ করেছে; তাই দানের ক্ষেত্রে তিলের মধ্যে দিব্যতা প্রতিষ্ঠিত হয়েছে।

Verse 11

पौष्टिका रूपदाश्चैव तथा पापविनाशना: । तस्मात्‌ सर्वप्रदानेभ्यस्तिलदानं विशिष्यते,तिल पौष्टिक पदार्थ है। वे सुन्दर रूप देनेवाले और पापनाशक हैं। इसलिये तिल-दान सब दानोंसे बढ़कर है

তিল পুষ্টিদায়ক, সুন্দর রূপ প্রদানকারী এবং পাপবিনাশক। তাই সকল দানের মধ্যে তিল-দান বিশেষভাবে শ্রেষ্ঠ বলে গণ্য।

Verse 12

आपफस्तम्बश्न मेधावी शड्खश्न लिखितस्तथा । महर्षिगौतमश्नापि तिलदानैर्दिवं गता:,परम बुद्धिमान महर्षि आपस्तम्ब, शंख, लिखित तथा गौतम--ये तिलोंका दान करके दिव्यलोकको प्राप्त हुए हैं

পরম প্রজ্ঞাবান ঋষি আপস্তম্ব, শঙ্খ ও লিখিত, এবং মহর্ষি গৌতমও—তিল-দানের দ্বারা দিব্যলোক লাভ করেছিলেন।

Verse 13

तिलहोमरता विदप्रा: सर्वे संयतमै थुना: । समा गव्येन हविषा प्रवृत्तिषु च संस्थिता:

সকল ব্রাহ্মণই মৈথুন-সংযম পালন করে তিল-হোমে রত থাকতেন। তিলকে গব্য হবি (গোঘৃতাদি) সমতুল্য যজ্ঞোপযোগী মানা হয়; তাই যজ্ঞে তা গ্রহণীয় এবং বহু কর্মে তার প্রয়োজন।

Verse 14

सर्वेषामिति दानानां तिलदानं विशिष्यते । अक्षयं सर्वदानानां तिलदानमिहोच्यते

ভীষ্ম বললেন—সমস্ত দানের মধ্যে তিলদান বিশেষ উৎকৃষ্ট। এখানে তিলদানকে সকল দানের মধ্যে ‘অক্ষয়’ ফলদায়ক বলা হয়েছে।

Verse 15

अतः तिलदान सब दानोंसे बढ़कर है। तिलदान यहाँ सब दानोंमें अक्षय फल देनेवाला बताया जाता है ।।

ভীষ্ম বললেন—অতএব তিলদান সকল দানের চেয়ে শ্রেষ্ঠ; এখানে একে ‘অক্ষয়’ ফলদায়ক বলা হয়েছে। প্রাচীনকালে, হব্য শেষ হয়ে গেলে, পরন্তপ রাজর্ষি কুশিক তিল দিয়ে তিন অগ্নিতে আহুতি প্রদান করে তাদের তৃপ্ত করেছিলেন; সেই পুণ্যে তিনি সর্বোত্তম গতি লাভ করেন।

Verse 16

इति प्रोक्त कुरुश्रेष्ठ तिलदानमनुत्तमम्‌ | विधान येन विधिना तिलानामिह शस्यते,कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार जिस विधिके अनुसार तिलदान करना उत्तम माना गया है, वह सर्वोत्तम तिलदानका विधान यहाँ बताया गया

ভীষ্ম বললেন—হে কুরুশ্রেষ্ঠ! এইভাবে তিলদানকে অনুত্তম বলা হয়েছে। এখন এখানে সেই বিধান—যে পদ্ধতিতে তিলদান প্রশংসিত ও পুণ্যপ্রদ—তা বর্ণনা করছি।

Verse 17

अत ऊर्ध्व॑ निबोधेद॑ं देवानां यट्टमिच्छताम्‌ । समागमे महाराज ब्रह्मणा वै स्वयम्भुवा

ভীষ্ম বললেন—হে মহারাজ! এখন পরবর্তী ঘটনা শোনো—স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মার অধীনে মহাসমাবেশে, যে উদ্দেশ্য লাভ করতে দেবতারা আকাঙ্ক্ষী ছিলেন, সেখানে কী ঘটেছিল।

Verse 18

महाराज! इसके बाद यज्ञकी इच्छावाले देवताओं और स्वयम्भू ब्रह्माजीका समागम होनेपर उनमें परस्पर जो बातचीत हुई थी, उसे बता रहा हूँ, इसपर ध्यान दो ।।

ভীষ্ম বললেন—হে মহারাজ! এরপর যজ্ঞকাম দেবতারা স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মার সঙ্গে সমবেত হলেন; সেখানে যে কথোপকথন হয়েছিল, তা শোনো। যজ্ঞ করতে উদ্যত দেবতারা ব্রহ্মার কাছে গিয়ে ভূমণ্ডলের কোনো অংশে এক শুভ দেশ প্রার্থনা করলেন—‘হে পার্থিব! আমাদের পৃথিবীতে এমন এক পবিত্র, মঙ্গল স্থান দিন, যেখানে আমরা যজ্ঞ করতে পারি।’

Verse 19

देवा ऊचु भगवंस्त्व॑ प्रभुर्भूमे: सर्वस्य त्रिदिवस्य च । यजेमहि महाभाग यज्ञ भवदनुज्ञया

দেবতারা বললেন— “ভগবান! মহাভাগ! আপনি পৃথিবী ও সমগ্র স্বর্গলোকের অধিপতি; অতএব আপনার অনুমতি নিয়ে আমরা পৃথিবীতে যজ্ঞ সম্পাদন করব।”

Verse 20

नाननुज्ञातभूमिहि यज्ञस्य फलमश्षुते । त्वं हि सर्वस्य जगत: स्थावरस्य चरस्य च

ভীষ্ম বললেন— “যজ্ঞের ফল তখনই লাভ হয়, যখন তা যথাবিধি অনুমোদিত ভূমিতে সম্পন্ন হয়; নচেৎ তার পুণ্য সত্যরূপে প্রাপ্ত হয় না। কারণ আপনি এই সমগ্র জগতের—স্থাবর ও জঙ্গম—অধিপতি।”

Verse 21

प्रभुर्भवसि तस्मात्त्वं समनुज्ञातुमरहसि । क्योंकि भूस्वामी जिस भूमिपर यज्ञ करनेकी अनुमति नहीं देता, उस भूमिपर यदि यज्ञ किया जाय तो उसका फल नहीं होता। आप सम्पूर्ण चराचर जगतके स्वामी हैं; अतः पृथ्वीपर यज्ञ करनेके लिये हमें आज्ञा दीजिये ।।

ভীষ্ম বললেন— “আপনি প্রভু; অতএব আপনিই আমাদের অনুমতি দিতে যোগ্য। (কারণ ভূমির অধিকারী অনুমতি না দিলে সেই ভূমিতে করা যজ্ঞ ফল দেয় না।) আপনি সমগ্র চরাচর জগতের অধিপতি; সুতরাং পৃথিবীতে যজ্ঞ করার আদেশ দিন।” ব্রহ্মা বললেন— “হে দেবশ্রেষ্ঠগণ, আমি তোমাদেরকে পৃথিবীর এক অংশ প্রদান করছি।”

Verse 22

देवा ऊचु भगवन्‌ कृतकार्या: सम यक्ष्महे स्वाप्तदक्षिणै:

দেবতারা বললেন— “ভগবান! আমাদের উদ্দেশ্য সিদ্ধ হয়েছে। এখন আমরা বিধি অনুসারে যথোচিত দক্ষিণাসহ আপনার পূজা করব।”

Verse 23

इमं तु देशं मुनय: पर्युपासन्ति नित्यदा । देवताओंने कहा--भगवन्‌! हमारा कार्य हो गया। अब हम पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञपुरुषका यजन करेंगे। यह जो हिमालयके पासका प्रदेश है, इसका ऋषि-मुनि सदासे ही आश्रय लेते हैं (अत: हमारा यज्ञ भी यहीं होगा) ।।

ভীষ্ম বললেন— “এই দেশটি এমন, যেখানে ঋষি-মুনিরা নিত্যই আশ্রয় নিয়ে উপাসনা করেন।” তখন দেবতারা বললেন— “ভগবান! আমাদের কাজ সম্পন্ন হয়েছে। এখন আমরা যথোচিত দক্ষিণাসম্পন্ন যজ্ঞ দ্বারা যজ্ঞপুরুষের আরাধনা করব। হিমালয়ের নিকটবর্তী এই অঞ্চল চিরকাল তপস্বীদের আশ্রয়; অতএব আমাদের যজ্ঞও এখানেই হবে।” তখন সেখানে আগস্ত্য, কণ্ব, ভৃগু, অত্রি ও বৃষাকপি উপস্থিত হলেন।

Verse 24

असितो देवलश्वचैव देवयज्ञमुपागमन्‌ । ततो देवा महात्मान ईजिरे यज्ञमच्युतम्‌

ভীষ্ম বললেন— অসিত ও দেবল দেবযজ্ঞে উপস্থিত হলেন। তখন মহাত্মা দেবগণ অচ্যুতের সেই অব্যর্থ যজ্ঞ সম্পাদন করলেন।

Verse 25

तथा समापयामासुर्यथाकाल सुरपर्षभा: । तदनन्तर अगस्त्य, कण्व, भृगु, अत्रि, वृषाकपि, असित और देवल देवताओंके उस यज्ञमें उपस्थित हुए। तब महामनस्वी देवताओंने यज्ञपुरुष अच्युतका यजन आरम्भ किया और जन श्रेष्ठ देवगणोंने यथासमय उस यज्ञको समाप्त भी कर दिया || २३-२४ $ ।।

ভীষ্ম বললেন— দেবশ্রেষ্ঠগণ যথাকালে সেই যজ্ঞ সমাপ্ত করলেন। তারপর অগস্ত্য, কণ্ব, ভৃগু, অত্রি, বৃষাকপি, অসিত ও দেবল— এই ঋষিগণ দেবতাদের সেই যজ্ঞে উপস্থিত হলেন। তখন মহামনস্বী দেবগণ যজ্ঞপুরুষ অচ্যুতের পূজা আরম্ভ করলেন এবং শ্রেষ্ঠ দেবসমূহ নির্ধারিত কালে যজ্ঞ সম্পূর্ণ করলেন।

Verse 26

प्रादेशमात्र भूमेस्तु यो दद्यादनुपस्कृतम्‌

ভীষ্ম বললেন— যে ব্যক্তি ভূমির কেবল এক প্রাদেশমাত্র অংশও, কোনো সাজসজ্জা বা উপকরণ ছাড়াই, দান করে— তার দান অর্থবহ হয়।

Verse 27

शीतवातातपसहां गृहभूमिं सुसंस्कृताम्‌

ভীষ্ম বললেন— শীত, বায়ু ও রৌদ্র সহ্য করতে সক্ষম, সুসংস্কৃত গৃহভূমি (বাসস্থান) প্রদান করা উচিত।

Verse 28

मुदितो वसति प्राज्ञ: शक्रेण सह पार्थिव

ভীষ্ম বললেন— হে পার্থিব! প্রাজ্ঞ ব্যক্তি আনন্দিত হয়ে শক্র (ইন্দ্র)-এর সঙ্গে বাস করে।

Verse 29

अध्यापककुले जात: श्रोत्रियो नियतेन्द्रिय:

ভীষ্ম বললেন—যে আচার্যের কুলে জন্মেছে, বেদে পারদর্শী এবং ইন্দ্রিয়সংযমী—সে বিনয়, সদাচার ও অন্তঃসংযমে চিহ্নিত।

Verse 30

तथा गवार्थे शरणं शीतवर्षसहं दृढम्‌

ভীষ্ম বললেন—তেমনি গোরক্ষার্থে দৃঢ় আশ্রয় দিতে হবে, যা শীত ও বৃষ্টিকে সহ্য করতে পারে।

Verse 31

क्षेत्रभूमिं ददललोके शुभां श्रियमवाप्लुयात्‌

ভীষ্ম বললেন—যে যোগ্য পাত্রকে উর্বর ক্ষেত্রভূমি দান করে, সে শুভ সমৃদ্ধি ও কল্যাণ লাভ করে।

Verse 32

न चोषरां न निर्दग्धां महीं दद्यात्‌ कथंचन

ভীষ্ম বললেন—কোনো অবস্থাতেই লবণাক্ত-উষর ও অনুর্বর জমি, কিংবা দগ্ধ হয়ে নিষ্ফল হয়ে যাওয়া ভূমি দান করা উচিত নয়।

Verse 33

पारक्ये भूमिदेशे तु पितृणां निर्वपेत्‌ तु यः

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি পরের ভূমিতে বা বিদেশদেশে থেকেও পিতৃগণের উদ্দেশ্যে বিধিপূর্বক নিবেদন (শ্রাদ্ধ-তর্পণ) করে…

Verse 34

तदभूमिं वापि पितृभि: श्राद्धकर्म विहन्यते । जो परायी भूमिमें पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, अथवा जो उस भूमिको पितरोंके लिये दानमें देता है, उसके वे श्राद्धकर्म और दान दोनों ही नष्ट होते (निष्फल हो जाते) हैं ।।

যে পরের জমিতে পিতৃদের উদ্দেশে শ্রাদ্ধ করে, অথবা সেই জমিই পিতৃদের নামে দান করে, তার শ্রাদ্ধকর্ম ও দান—উভয়ই নিষ্ফল হয়। অতএব বিচক্ষণ ব্যক্তি অল্প হলেও ভূমি ক্রয় করে তবেই দান করবে।

Verse 35

अटवीपर्वताश्रैव नद्यस्तीर्थानि यानि च

অরণ্য, পর্বত, নদী এবং যে তীর্থস্থানগুলি আছে—এসব কোনো একক স্বামীর অধীন নয়; এগুলি সকলের সাধারণ। অতএব এমন স্থানে শ্রাদ্ধ করতে ভূমি ক্রয়ের প্রয়োজন নেই। হে প্রজানাথ, এভাবেই ভূমিদানের ফল বর্ণিত হল।

Verse 36

सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तत्र परिग्रह: । इत्येतद्‌ भूमिदानस्य फलमुक्तं विशाम्पते

তাঁরা বলেন, এ সকল স্থানই ব্যক্তিগত স্বামীহীন; কারণ সেখানে কারও ব্যক্তিগত অধিকার স্থাপন সম্ভব নয়। হে বিশামপতে, এইভাবেই ভূমিদানের ফল বলা হয়েছে।

Verse 37

अतः परं तु गोदानं कीर्तयिष्यामि तेडनघ । गावो5धिकास्तपस्वि भ्यो यस्मात्‌ सर्वेभ्य एव च

এবার, হে অনঘ, আমি তোমাকে গোদান বিষয়ে বর্ণনা করব। কারণ গাভীকে তপস্বীদের থেকেও এবং সকলের থেকেও শ্রেষ্ঠ বলা হয়েছে—যেহেতু সে সর্বজনের উপকার করে।

Verse 38

ब्राह्मो लोके वसन्त्येता: सोमेन सह भारत

হে ভারত! এরা (এই নারীগণ) সোমের সঙ্গে ব্রহ্মলোকে বাস করে।

Verse 39

पयसा हविषा दध्ना शकृता चाथ चर्मणा

ভীষ্ম বললেন— “বিধিবদ্ধ কর্ম দুধে, হব্যে, দইয়ে, গোবর দিয়ে এবং চর্ম দিয়েও সম্পন্ন করা যায়।”

Verse 40

नासां शीतातपौ स्यातां सदैता: कर्म कुर्वते,इन्हें सर्दी, गर्मी और वर्षाका भी कष्ट नहीं होता है। ये सदा ही अपना काम किया करती हैं। इसलिये ये ब्राह्मणोंक साथ परमपदस्वरूप ब्रह्मलोकमें चली जाती हैं

ভীষ্ম বললেন— “শীত ও তাপ তাদের কষ্ট দেয় না; তারা সর্বদা নির্ধারিত কর্ম করে চলে। তাই ব্রাহ্মণদের সহিত তারা পরম পদ—ব্রহ্মলোক—প্রাপ্ত হয়।”

Verse 41

न वर्षविषयं वापि दुःखमासां भवत्युत । ब्राह्मणैः सहिता यान्ति तस्मात्‌ पारमकं पदम्‌

ভীষ্ম বললেন— “বর্ষাকালের সঙ্গে যুক্ত দুঃখও তাদের হয় না। তাই ব্রাহ্মণদের সহিত তারা পরম পদে গমন করে।”

Verse 42

एंक गोब्राह्मणं तस्मात्‌ प्रवदन्ति मनीषिण: । रन्तिदेवस्य यज्ञे ता: पशुत्वेनोपकल्पिता:

ভীষ্ম বললেন— “এই কারণেই জ্ঞানীরা গরু ও ব্রাহ্মণকে এক তত্ত্ব বলে ঘোষণা করেন। রন্তিদেবের যজ্ঞে সেই গাভীগণ ‘পশু’ রূপে কেবল বিধিগত ব্যবহারের জন্য নির্ধারিত ছিল।”

Verse 43

अतश्चर्मण्वती राजन्‌ गोचर्मभ्य: प्रवर्तिता । पशुत्वाच्च विनिर्मुक्ता: प्रदानायोपकल्पिता:

ভীষ্ম বললেন— “অতএব, রাজন, গাভীদের চর্ম থেকে চর্মণ্বতী নামে নদী প্রবাহিত হয়েছিল। সেই গাভীগণ পশুত্বের বন্ধন থেকে মুক্ত ছিল; তারা দানের জন্যই নির্ধারিত ছিল।”

Verse 44

ता इमा बिप्रमुख्येभ्यो यो ददाति महीपते । निस्तरेदापदं कृच्छां विषमस्थो5पि पार्थिव

হে মহীপতি! যে ব্যক্তি এই গাভীগুলি শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের দান করে, সে কঠিন বিপদে পতিত হলেও সেই মহাদুর্যোগ অতিক্রম করে মুক্তি লাভ করে।

Verse 45

गवां सहस्रद: प्रेत्य नरकं न प्रपद्यते । सर्वत्र विजयं चापि लभते मनुजाधिप,जो एक सहस््र गोदान कर देता है, वह मरनेके बाद नरकमें नहीं पड़ता। नरेश्वर! उसे सर्वत्र विजय प्राप्त होती है

হে মনুষ্যাধিপ! যে এক সহস্র গাভী দান করে, সে মৃত্যুর পরে নরকে পতিত হয় না; আর সর্বত্রই বিজয় লাভ করে।

Verse 46

अमृतं वै गवां क्षीरमित्याह त्रिदशाधिप: । तस्माद्‌ ददाति यो धेनुममृतं स प्रयच्छति,देवराज इन्द्रने कहा है कि 'गौओंका दूध अमृत है"; जो दूध देनेवाली गौका दान करता है, वह अमृत दान करता है

দেবাধিপ ইন্দ্র বলেছেন—গাভীর দুধই অমৃত। অতএব যে দুধদায়িনী ধেনু দান করে, সে যেন অমৃতই দান করে।

Verse 47

अग्नीनामव्ययं होतद्धौम्यं वेदविदो विदु: । तस्माद्‌ ददाति यो थेनुं स हौम्यं सम्प्रयच्छति

বেদজ্ঞেরা জানেন যে অগ্নিতে ‘হৌম্য’ নামে যে হবি অর্পণ করা হয়, তা অবিনাশী ফল দেয়। অতএব যে ধেনু দান করে, সে যেন সেই হৌম্য হবিই দান করে।

Verse 48

स्वर्गो वै मूर्तिमानेष वृषभं यो गवां पतिम्‌ । विप्रे गुणयुते दद्यात्‌ स वै स्वर्गे महीयते

এই বৃষভ—গাভীদের অধিপতি—স্বর্গেরই মূর্ত রূপ। যে ব্যক্তি গুণসম্পন্ন ব্রাহ্মণকে তাকে দান করে, সে স্বর্গলোকে মহিমান্বিত ও প্রতিষ্ঠিত হয়।

Verse 49

प्राणा वै प्राणिनामेते प्रोच्यन्ते भरतर्षभ । तस्माद्‌ ददाति यो थेनुं प्राणानेष प्रयच्छति

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এই গাভীগণ প্রাণীদের ‘প্রাণ’ বলে কথিত, কারণ তারা পুষ্টি দিয়ে জীবন ধারণ করায়। অতএব যে দুধেল গাভী দান করে, সে যেন প্রাণদানই করে।

Verse 50

गाव: शरण्या भूतानामिति वेदविदो विदु: । तस्माद्‌ ददाति यो थेनुं शरणं सम्प्रयच्छति

ভীষ্ম বললেন—বেদজ্ঞরা বলেন, গাভীগণ সকল প্রাণীর আশ্রয়। অতএব যে দুধেল গাভী দান করে, সে যেন আশ্রয়দানই করে—রক্ষক ও আশ্রয়দাতা হয়।

Verse 51

न वधार्थ प्रदातव्या न कीनाशे न नास्तिके । गोजीविने न दातव्या तथा गौर्भरतर्षभ

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতর্ষভ! হত্যার উদ্দেশ্যে যে গাভী চায়, তাকে কখনও গাভী দেওয়া উচিত নয়; কসাইকে নয়, নাস্তিককে নয়। যে গোর উপর নির্ভর করে জীবিকা চালায়, যে দুধ-দ্রব্য বিক্রি করে, এবং যে পঞ্চযজ্ঞ পালন করে না—তাদেরও গাভী দেওয়া উচিত নয়।

Verse 52

ददत्‌ स तादृशानां वै नरो गां पापकर्मणाम्‌ | अक्षयं नरकं यातीत्येवमाहुर्महर्षय:,ऐसे पापकर्मी मनुष्योंको जो गाय देता है, वह मनुष्य अक्षय नरकमें गिरता है, ऐसा महर्षियोंका कथन है

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি এমন পাপকর্মে রত লোকদের গাভী দান করে, সে অবিনশ্বর নরকে পতিত হয়—এমনই মহর্ষিদের বচন।

Verse 53

न कृशां नापवत्सां वा वन्ध्यां रोगान्वितां तथा । नव्यंगां न परिश्रान्तां दद्याद्‌ गां ब्राह्मणाय वै

ভীষ্ম বললেন—ব্রাহ্মণকে গাভী দান করতে হলে কৃশ, বাছুরহারা, বন্ধ্যা, রোগাক্রান্ত, বিকলাঙ্গ বা অতিশয় ক্লান্ত-বৃদ্ধ গাভী দেওয়া উচিত নয়। ধর্মসম্মানার্থ দান হওয়া চাই উত্তম ও কল্যাণকর, বোঝা নয়।

Verse 54

दशगोसहस््रदो हि शक्रेण सह मोदते । अक्षयॉल्लभते लोकान्‌ नर: शतसहस्रश:

যে ব্যক্তি দশ সহস্র গাভী দান করে, সে শক্র (ইন্দ্র)-এর সান্নিধ্যে আনন্দ ভোগ করে। সে পুরুষ অক্ষয় লোক লাভ করে—শতসহস্র প্রকারে।

Verse 55

दस हजार गोदान करनेवाला मनुष्य इन्द्रके साथ रहकर आनन्द भोगता है और जो लाख गौओंका दान कर देता है, उस मनुष्यको अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ।।

যে ব্যক্তি দশ সহস্র গাভী দান করে, সে ইন্দ্রের সান্নিধ্যে বাস করে আনন্দ ভোগ করে; আর যে এক লক্ষ গাভী দান করে, সে অক্ষয় লোক লাভ করে। এভাবে গোদান ও তিলদান ঘোষিত হল। এখন, হে ভারত, ভূমিদান এবং অন্নদানের কথাও শোন।

Verse 56

भारत! इस प्रकार गोदान, तिलदान और भूमिदानका महत्त्व बतलाया गया। अब पुनः अन्नदानकी महिमा सुनो ।।

হে ভারত! এইভাবে গোদান, তিলদান ও ভূমিদানের মাহাত্ম্য বলা হল। এখন আবার অন্নদানের মহিমা শোন। হে কুন্তীনন্দন! জ্ঞানীরা অন্নদানকে সকল দানের মধ্যে শ্রেষ্ঠ বলেন; কারণ অন্ন দান করেই রাজা রন্তিদেব স্বর্গে গমন করেছিলেন।

Verse 57

भ्रान्ताय क्षुधितायान्न यः प्रयच्छति भूमिप: । स्वायम्भुवं महत्‌ स्थानं स गच्छति नराधिप,नरेश्वर! जो भूमिपाल थके-माँदे और भूखे मनुष्यको अन्न देता है, वह ब्रह्माजीके परमधाममें जाता है

হে নরাধিপ! যে ভূমিপতি ক্লান্ত ও ক্ষুধার্ত মানুষকে অন্ন প্রদান করে, সে স্বয়ম্ভূ (ব্রহ্মা)-র মহান ধামে গমন করে।

Verse 58

न हिरण्यैर्न वासोभिननान्यदानेन भारत । प्राप्रुवन्ति नरा: श्रेयो यथा ह्व[न्नप्रदा: प्रभो

হে ভারতনন্দন, প্রভো! অন্নদানকারীরা যে রূপে কল্যাণ ও পরম শ্রেয় লাভ করে, সে রূপে মানুষ স্বর্ণ, বস্ত্র বা অন্য দানে তেমন শ্রেয় লাভ করে না।

Verse 59

अन्न वै प्रथम द्रव्यमन्नं श्रीक्ष परा मता । अन्नात्‌ प्राण: प्रभवति तेजो वीर्य बल॑ तथा,अन्न प्रथम द्रव्य है। वह उत्तम लक्ष्मीका स्वरूप माना गया है। अन्नसे ही प्राण, तेज, वीर्य और बलकी पुष्टि होती है

ভীষ্ম বললেন—অন্নই সকল দ্রব্যের মধ্যে শ্রেষ্ঠ; অন্নকেই পরম শ্রী (সমৃদ্ধি) রূপে মানা হয়। অন্ন থেকেই প্রাণ, তেজ, বীর্য ও বল উৎপন্ন ও পুষ্ট হয়।

Verse 60

सद्यो ददाति यश्चान्नं सदैकाग्रमना नर: | न स दुर्गाण्यवाप्रोतीत्येवमाह पराशर:,पराशर मुनिका कथन है कि “जो मनुष्य सदा एकाग्रचित्त होकर याचकको तत्काल अन्नका दान करता है, उसपर कभी दुर्गम संकट नहीं पड़ता”

ভীষ্ম বললেন—পরাশর মুনি এ কথা বলেছেন: যে ব্যক্তি সদা একাগ্রচিত্তে প্রার্থনাকারীকে সঙ্গে সঙ্গে অন্ন দান করে, সে কখনও দুরতিক্রম্য বিপদে পতিত হয় না।

Verse 61

अर्चयित्वा यथान्यायं देवेभ्यो5न्न॑ निवेदयेत्‌ यदन्ना हि नरा राजंस्तदन्नास्तस्य देवता:

রাজন! মানুষের উচিত প্রতিদিন শাস্ত্রবিধি অনুসারে দেবতাদের পূজা করে তাঁদের অন্ন নিবেদন করা। হে রাজন, মানুষ যে অন্ন ভোজন করে, তার দেবতারাও সেই অন্নই গ্রহণ করেন।

Verse 62

कौमुदे शुक्लपक्षे तु योऊन्नदानं करोत्युत | स संतरति दुर्गाणि प्रेत्य चानन्त्यमश्लुते,जो कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें अन्नका दान करता है, वह दुर्गम संकटसे पार हो जाता है और मरकर अक्षय सुखका भागी होता है

ভীষ্ম বললেন—কৌমুদী ঋতুর শুক্লপক্ষে যে অন্নদান করে, সে দুরতিক্রম্য বিপদ অতিক্রম করে; এবং মৃত্যুর পরে অনন্ত (অক্ষয়) সুখ লাভ করে।

Verse 63

अभुकक्‍त्वातिथये चाजन्न॑ प्रयच्छेद्‌ य: समाहित: । स वैब्रद्याविदां लोकान्‌ प्राप्तुयाद्‌ भरतर्षभ

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যে ব্যক্তি একাগ্রচিত্তে নিজে না খেয়ে অতিথিকে অন্ন প্রদান করে, সে ব্রহ্মবিদদের লোকসমূহ লাভ করে।

Verse 64

सुकृच्छामापदं प्राप्तश्नान्नद: पुरुषस्तरेत्‌ । पापं तरति चैवेह दुष्कृतं चापकर्षति

অন্নদাতা পুরুষ কঠিনতম বিপদে পতিত হলেও তা অতিক্রম করতে সক্ষম হয়। এই জীবনেই সে পাপ থেকে মুক্ত হয় এবং ভবিষ্যৎ দুষ্কর্মের প্রবৃত্তি ও ফলও দূর করে।

Verse 65

इस प्रकार श्रीमह्ा भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ভীষ্ম বললেন—“এইভাবে আমি অন্নদান, তিলদান, ভূমিদান ও গোদান—এই সকল দানের ফল ঘোষণা করলাম।”

Verse 66

इति श्रीमहा भारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षट्षष्टितमो5ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ছেষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 213

यस्मिन्‌ देशे करिष्यध्वं यज्ञान्‌ काश्यपनन्दना: | ब्रह्माजीने कहा--काश्यपनन्दन सुरश्रेष्ठणण! तुमलोग पृथ्वीके जिस प्रदेशमें यज्ञ करोगे, वही भूभाग मैं तुम्हें दे रहा हूँ

ব্রহ্মা বললেন—“হে কাশ্যপনন্দনগণ! তোমরা পৃথিবীর যে দেশে যজ্ঞ সম্পাদন করবে, সেই ভূভাগই আমি তোমাদের প্রদান করছি।”

Verse 256

षष्ठमंशं क्रतोस्तस्य भूमिदान प्रचक्रिरे । पर्वतराज हिमालयके पास यज्ञ पूरा करके देवताओंने भूमिदान भी किया, जो उस यज्ञके छठे भागके बराबर पुण्यका जनक था

যজ্ঞ সম্পন্ন করে তারা ভূমিদান করল; সেই ভূমিদানকে ঐ যজ্ঞের পুণ্যের ষষ্ঠাংশের সমান ফলদায়ক বলা হয়েছে।

Verse 266

न सीदति स कृच्छेषु न च दुर्गाण्यवाप्रुते । जिसको खोदखादकर खराब न कर दिया गया हो, ऐसे प्रादेशमात्र भूभागका भी जो दान करता है, वह न तो कभी दुर्गम संकटोंमें पड़ता है और न पड़नेपर कभी दुःखी ही होता है

যে খোঁড়াখুঁড়ি করে নষ্ট করা হয়নি—এমন ভূমির সামান্য অংশও দান করে, সে দুঃসময়ে ডুবে যায় না; ভয়ংকর সংকটে পড়ে না—আর পড়লেও দুঃখে ভেঙে পড়ে না।

Verse 273

प्रदाय सुरलोकस्थ: पुण्यान्तेडपि न चाल्यते । जो सर्दी, गर्मी और हवाके वेगको सहन करनेयोग्य सजी-सजायी गृह-भूमि दान करता है, वह देवलोकमें निवास करता है। पुण्यका भोग समाप्त होनेपर भी वहाँसे हटाया नहीं जाता

যে শীত, গ্রীষ্ম ও প্রবল বায়ুর বেগ সহ্য করতে সক্ষম, সুসজ্জিত গৃহভূমি দান করে, সে দেবলোকে বাস করে; আর পুণ্যভোগ শেষ হলেও সেখান থেকে তাকে অপসারিত করা হয় না।

Verse 286

प्रतिश्रयप्रदानाच्च सो$पि स्वर्गे महीयते । पृथ्वीनाथ! जो विद्वान्‌ गृहदान करता है, वह भी उसके पुण्यसे इन्द्रके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता और स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है

আর আশ্রয় দানের ফলে সেও স্বর্গে মহিমান্বিত হয়। হে পৃথিবীনাথ! যে বিদ্বান গৃহদান করে, সে সেই পুণ্যের বলে ইন্দ্রের সঙ্গেই আনন্দসহ স্বর্গলোকে বাস করে এবং সেখানে সম্মানিত হয়।

Verse 296

गृहे यस्य वसेत्‌ तुष्ट: प्रधानं लोकमश्रुते । अध्यापक-वंशमें उत्पन्न श्रोत्रिय एवं जितेन्द्रिय ब्राह्मण जिसके दिये हुए घरमें प्रसन्नतासे रहता है, उसे श्रेष्ठ लोक प्राप्त होते हैं

অধ্যাপক-বংশে জন্ম নেওয়া, শ্রোত্রিয় ও জিতেন্দ্রিয় ব্রাহ্মণ যে ব্যক্তির দানকৃত গৃহে সন্তুষ্টচিত্তে বাস করে, সেই দাতা শ্রেষ্ঠ লোকসমূহ লাভ করে।

Verse 303

आसप्तमं तारयति कुलं भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ) जो गौओंके लिये सर्दी और वर्षासे बचानेवाला सुदृढ़ निवासस्थान बनवाता है, वह अपनी सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যে গাভীদের জন্য শীত ও বর্ষা থেকে রক্ষা করে এমন দৃঢ় আশ্রয় নির্মাণ করায়, সে নিজের বংশকে সপ্তম পুরুষ পর্যন্ত উদ্ধার করে।

Verse 313

रत्नभूमिं प्रदद्यात्‌ तु कुलवंशं प्रवर्धयेत्‌ । खेतके योग्य भूमि दान करनेवाला मनुष्य जगत्‌में शुभ सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो रत्नयुक्त भूमिका दान करता है, वह अपने कुलकी वंश-परम्पराको बढ़ाता है

যে ব্যক্তি চাষের উপযোগী ভূমি দান করে, সে জগতে শুভ সমৃদ্ধি লাভ করে; আর যে রত্নসমৃদ্ধ ভূমি দান করে, সে নিজের কুলের বংশপরম্পরা বৃদ্ধি ও বিস্তার করে।

Verse 326

न श्मशानपरीतां च न च पापनिषेविताम्‌ । जो भूमि ऊसर, जली हुई और श्मशानके निकट हो तथा जहाँ पापी पुरुष निवास करते हों, उसे ब्राह्मणको नहीं देना चाहिये

যে ভূমি উষর বা দগ্ধ, শ্মশানের নিকটে, কিংবা যেখানে পাপী লোকের বসবাস বা আনাগোনা—এমন ভূমি ব্রাহ্মণকে দান করা উচিত নয়।

Verse 346

पिण्ड: पितृभ्यो दत्तो वै तस्यां भवति शाश्वत: । अतः विद्वान्‌ पुरुषको चाहिये कि वह थोड़ी-सी भी भूमि खरीदकर उसका दान करे। खरीदकर अपनी की हुई भूमिमें ही पितरोंको दिया हुआ पिण्ड सदा स्थिर रहनेवाला होता है

পিতৃদের উদ্দেশে প্রদত্ত পিণ্ড নিজের অধিকারভুক্ত ভূমির সঙ্গে যুক্ত হলে চিরস্থায়ী ফল দেয়। অতএব জ্ঞানী ব্যক্তি অল্প হলেও ভূমি ক্রয় করে তা দান করুক; কারণ ক্রয় করে নিজের করা ভূমিতে পিতৃদের অর্পিত পিণ্ড সদা প্রতিষ্ঠিত থাকে।

Verse 373

तस्मान्महेश्वरो देवस्तपस्ताभि: सहास्थित: । अनघ! इसके बाद मैं तुम्हें गोदानका माहात्म्य बताऊँगा। गौएँ समस्त तपस्वियोंसे बढ़कर हैं; इसलिये भगवान्‌ शंकरने गौओंके साथ रहकर तप किया था

অতএব দেব মহেশ্বর সেই গাভীদের সঙ্গে অবস্থান করে তপস্যায় রত ছিলেন। হে অনঘ! এরপর আমি তোমাকে গোদান-এর মাহাত্ম্য বলব। গাভীসমূহ সকল তপস্বীর চেয়েও শ্রেষ্ঠ; সেই কারণেই ভগবান শঙ্করও তাদের সান্নিধ্যে তপস্যা করেছিলেন।

Verse 386

यांतां ब्रह्मर्षय: सिद्धा: प्रार्थयन्ति परां गतिम्‌ । भारत! ये गौएँ चन्द्रमाके साथ उस ब्रह्मलोकमें निवास करती हैं, जो परमगतिरूप है और जिसे सिद्ध ब्रह्मर्षि भी प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं

হে ভারত! যে পরম গতি, যা সিদ্ধ ব্রহ্মর্ষিরাও লাভ করতে আকাঙ্ক্ষা করেন—সেই লক্ষ্যেই সেই গাভীগণ অগ্রসর হয়। তারা চন্দ্রের সঙ্গে সেই ব্রহ্মলোকে বাস করে, যা পরমগতি-স্বরূপ।

Verse 396

अस्थिभिश्नोपकुर्वन्ति शृंगैवलिश्व भारत । भरतनन्दन! ये गौएँ अपने दूध, दही, घी, गोबर, चमड़ा, हड्डी, सींग और बालोंसे भी जगत्‌का उपकार करती रहती हैं

ভীষ্ম বললেন—হে ভারত, হে ভরতনন্দন! গাভীরা তাদের অস্থি ও শৃঙ্গ দিয়েও উপকার করে। দুধ, দই, ঘি, গোবর, চর্ম, অস্থি, শৃঙ্গ ও লোমের দ্বারা তারা নিরন্তর জগতের মঙ্গল সাধন করে।

Frequently Asked Questions

A mistaken transfer of a cow leads to conflicting brāhmaṇa claims; Nṛga must address competing rights while confronting the moral weight of having enabled retention of brāhmaṇa property despite offering compensatory restitution.

That brāhmaṇa property should not be taken by one who knows dharma; misappropriation is portrayed as ruinous, and wrongdoing toward cows is specifically discouraged due to its ethical and karmic gravity.

Yes: it asserts that association with the virtuous is not without result, exemplified by Nṛga’s liberation from a punitive condition through encounter with Vāsudeva and the fulfillment of Dharmarāja’s pronouncement.