Adhyaya 43
Anushasana ParvaAdhyaya 4379 Verses

Adhyaya 43

Devaśarmā–Vipula Dialogue on Ahorātra–Ṛtu as Moral Witnesses (अनुशासन पर्व, अध्याय ४३)

Upa-parva: Strī-dharma / Rakṣā-nīti Episode (Devaśarmā–Vipula Upākhyāna)

Bhīṣma recounts an earlier narration attributed to Mārkaṇḍeya: the sage Devaśarmā questions his disciple Vipula about what he observed in a great forest. Vipula asks about a perceived “pair” and certain “men” who seem to know him. Devaśarmā interprets the “pair” as day and night (ahorātra), cyclically turning like a wheel, and identifies the “men playing with dice” as the seasons (ṛtu). The teaching asserts that one should not presume, “No one knows me,” because even actions done in secrecy carry moral visibility and consequence; time and seasons ‘know’ both harmful and beneficial deeds. Devaśarmā then clarifies that Vipula has committed no fault and expresses satisfaction, indicating that an alternative outcome (a curse) would have followed had misconduct been observed. Bhīṣma concludes with generalized counsel on women’s conduct as portrayed in the discourse—presenting both virtuous and non-virtuous possibilities—and stresses that protection is achievable through appropriate method (yukti), citing Vipula’s singular effectiveness in the episode’s frame.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं—मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ, जिसमें एक शिष्य ने योगबल से गुरुपत्नी की रक्षा की; यह कथा स्त्री-स्वभाव, इन्द्र की छल-कला और गुरु-आज्ञा के कठोर धर्म को एक साथ खोलती है। → ब्रह्मा द्वारा स्त्रियों की सृष्टि और उनके स्वभाव-वर्णन से कथा का नैतिक-भूमि तैयार होती है। फिर देवशर्मा मुनि अपनी पत्नी की रक्षा में सतर्क रहते हैं, क्योंकि इन्द्र अनेक रूप धारण कर सकता है और अवसर पाकर पतिव्रता को दूषित करने का प्रयत्न करता है। शिष्य विपुल को गुरु की आज्ञा मिलती है—गुरुपत्नी की रक्षा करो; पर शत्रु साधारण नहीं, देवराज इन्द्र है। → विपुल निर्णय करता है कि बाह्य पहरे से काम नहीं चलेगा—वह योगबल से गुरुपत्नी (रुचि) के शरीर में प्रवेश कर, अपने अंगों से उसके अंगों में समा कर, भीतर से ही रक्षा करेगा। इन्द्र के रूप-परिवर्तन और छल के भय के बीच यह ‘देह-प्रवेश’ ही निर्णायक उपाय बनता है; नेत्र-किरणों के संधान और सूक्ष्म-मार्ग से प्रवेश का वर्णन कथा को चरम पर ले जाता है। → विपुल गुरु-आज्ञा को सर्वोपरि मानकर, आश्चर्य-कार्य करने का संकल्प पूरा करता है—गुरुपत्नी की पवित्रता की रक्षा हेतु वह स्वयं को दाँव पर लगाता है। कथा का निष्कर्ष यह स्थापित करता है कि शिष्य-धर्म और स्त्री-रक्षा का व्रत केवल उपदेश नहीं, तप और योग की चरम परीक्षा है। → इन्द्र किस रूप में आएगा और भीतर-स्थित विपुल उसे कैसे रोकेगा—यह प्रश्न कथा को आगे की घटनाओं के लिए उत्कंठा में छोड़ देता है।

Shlokas

Verse 1

2 7 जा चत्वारिशो< ध्याय: भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना भीष्म उवाच एवमेव महाबाहो नात्र मिथ्यास्ति किंचन । यथा ब्रवीषि कौरव्य नारीं प्रति जनाधिप

ভীষ্ম বললেন—হে মহাবাহু, কুরু-নন্দন! ঠিক তাই; এতে বিন্দুমাত্র মিথ্যা নেই। হে জনাধিপ, নারীদের বিষয়ে তুমি যা বলছ, তা সম্পূর্ণ সত্য।

Verse 2

अन्न ते वर्तयिष्यामि इतिहासं पुरातनम्‌ । यथा रक्षा कृता पूर्व विपुलेन महात्मना

ভীষ্ম বললেন—প্রিয়, আমি তোমাকে এক প্রাচীন ইতিহাস বলব—কীভাবে অতীতে মহাত্মা বিপুল তাঁর গুরুর পত্নীর রক্ষা করেছিলেন।

Verse 3

प्रमदाश्च॒ यथा सृष्टा ब्रह्मणा भरतर्षभ । यदर्थ तच्च ते तात प्रवक्ष्यामि नराधिप,भरतश्रेष्ठ! तात! नरेश्वर! ब्रह्माजीने जिस प्रकार और जिस उद्देश्यसे युवतियोंकी सृष्टि की है, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! প্রিয় বৎস! হে নরাধিপ! ব্রহ্মা যেভাবে এবং যে উদ্দেশ্যে নারীদের সৃষ্টি করেছিলেন, তা আমি তোমাকে ব্যাখ্যা করব।

Verse 4

न हि स्त्रीभ्य: परं पुत्र पापीय: किंचिदस्ति वै | अनि्निहि प्रमदा दीप्तो मायाश्ष मयजा विभो

ভীষ্ম বললেন—বৎস! নারীদের চেয়ে অধিক পাপিষ্ঠ আর কিছুই নেই। যৌবনের মদে উন্মত্ত নারী প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায়; আর হে প্রভু! সে দানব ময়ের নির্মিত মায়া—এক প্রতারণা।

Verse 5

क्षुरधारा विषं सर्पो वल्विरित्येकतः स्त्रिय: । प्रजा इमा महाबाहो धार्मिक्य इति न: श्रुतम्‌

ভীষ্ম বললেন—ক্ষুরের ধার, বিষ, সাপ ও অগ্নি—এ সবের সঙ্গে নারীদের একত্রে তুলনা করা হয়। তবু, হে মহাবাহু! আমরা এও শুনেছি যে এই নারীরাই স্বভাবত ধর্মময়ী।

Verse 6

अथाभ्यगच्छन्‌ देवास्ते पितामहमरिंदम

তখন সেই দেবতারা পিতামহের নিকট গমন করলেন—শত্রুদমনকারী সেই মহাপুরুষের কাছে।

Verse 7

तेषामन्तर्गत॑ ज्ञात्वा देवानां स पितामह:

দেবতাদের অন্তরে যা ছিল তা জেনে পিতামহ সেই অনুযায়ী মনস্থ করলেন।

Verse 8

पूर्वसर्गे तु कौन्तेय साध्व्यो नार्य इहाभवन्‌

ভীষ্ম বললেন—কুন্তীপুত্র! সৃষ্টির আদিতে এখানে যে নারীরা ছিলেন, তাঁরা সাধ্বী ও পতিব্রতা ছিলেন। কিন্তু ‘কৃত্যা’-সদৃশ অনিষ্টকারী স্বভাবের দুষ্টা নারীরা প্রজাপতির এই পরবর্তী সৃষ্টিতেই জন্ম নিল। প্রজাপতি তাঁদের নিজ নিজ ইচ্ছানুসারে কামপ্রবণ স্বভাব দান করলেন।

Verse 9

असाध्व्यस्तु समुत्पन्ना: कृत्या: सर्गात्‌ प्रजापते: । ताभ्य: कामान्‌ यथाकामं प्रादाद्धि स पितामह:

কিন্তু অসাধ্বী—‘কৃত্যা’ স্বভাবের—নারীরা প্রজাপতির পরবর্তী সৃষ্টিকর্ম থেকে উৎপন্ন হল। হে কুন্তীপুত্র, সেই পিতামহ প্রজাপতি তাঁদের ইচ্ছানুসারে কাম-প্রবৃত্তি দান করলেন।

Verse 10

ता: कामलुब्धा: प्रमदा: प्रबाधनते नरान्‌ सदा । क्रोधं कामस्य देवेश: सहायं चासृजत्‌ प्रभु:

কামলোভে আচ্ছন্ন সেই নারীরা সর্বদা পুরুষদের পীড়িত ও অস্থির করে তোলে। আর দেবেশ্বর সেই প্রভু কামনার সহায় হিসেবে ক্রোধকে সৃষ্টি করলেন।

Verse 11

(द्विजानां च गुरूणां च महागुरुनूपादिनाम्‌ । क्षणात्‌ स्त्रीसड्गभकामोत्था यातनाहो निरन्तरा ।।

ধর্মশাস্ত্রে এই বিধান স্থির আছে যে নারীদের জন্য বৈদিক ক্রিয়াকর্মের বিধি নেই। প্রজাপতি নারীদেরকে দুর্বাক্য-স্বভাব এবং রতিও দান করেছেন।

Verse 12

निरिन्द्रिया हुशास्त्राश्न स्त्रियोडनृतमिति श्रुति: । शय्यासनमलंकारमन्नपानमनार्यताम्‌

শ্রুতি বলে—ইন্দ্রিয়সংযমহীনতা, শাস্ত্রের বিকৃতি, ভোগের দৃষ্টিতে নারীর সঙ্গ, এবং অসত্য—এগুলো পতনের কারণ। আর শয্যা-আসনের বিলাস, অলংকারের আসক্তি, এবং অন্ন-পানে অতিমগ্নতা—এসব অনার্যতার দিকে টানে।

Verse 13

नतासां रक्षणं शक्‍्यं कर्तु पुंसां कथंचन

ভীষ্ম বললেন—যারা শরণাগত হয়ে সম্পূর্ণভাবে অন্যের আশ্রয়ে এসেছে, তাদের রক্ষা করা মানুষের পক্ষে কোনোভাবেই নিশ্চিতভাবে সম্ভব নয়; তাই অহংকার নয়, বিনয়, সতর্কতা ও দায়বোধ নিয়ে চলাই কর্তব্য।

Verse 14

वाचा च वधबन्‍न्धैर्वा कक्‍्लेशैर्वा विविधैस्तथा

ভীষ্ম বললেন—কঠোর বাক্যে, কিংবা বেঁধে রেখে হত্যার ভয় দেখিয়ে, অথবা নানা প্রকার ক্লেশ-যন্ত্রণা দিয়েও—অন্যকে পীড়িত করা উচিত নয়।

Verse 15

इदं तु पुरुषव्याप्र पुरस्ताच्छुतवानहम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে পুরুষব্যাপ্র (উদ্যমী পুরুষ), এ কথা আমি পূর্বেই (পরম্পরা থেকে) শুনেছিলাম।

Verse 16

ऋषिरासीन्महा भागो देवशर्मेति विश्रुत:

ভীষ্ম বললেন—দেবশর্মা নামে প্রসিদ্ধ এক মহাভাগ ঋষি ছিলেন।

Verse 17

तस्या रूपेण सम्मत्ता देवगन्धर्वदानवा:

ভীষ্ম বললেন—তার রূপসৌন্দর্যে মোহিত হয়ে দেবতা, গন্ধর্ব ও দানব সকলেই বিমুগ্ধ হয়ে পড়েছিল।

Verse 18

विशेषेण तु राजेन्द्र वत्रहा पाकशासन: । उसका रूप देखकर देवता, गन्धर्व और दानव भी मतवाले हो जाते थे। राजेन्द्र! वृत्रासुरका वध करनेवाले पाकशासन इन्द्र उस स्त्रीपर विशेषरूपसे आसक्त थे ।।

ভীষ্ম বললেন—হে রাজেন্দ্র, বৃত্রবধকারী পাকশাসন ইন্দ্র সেই নারীর প্রতি বিশেষভাবে আসক্ত ছিলেন। তার রূপ দেখলেই দেবতা, গন্ধর্ব ও দানবরাও কাম-মদে উন্মত্ত হয়ে উঠত। অতএব, হে নৃপশ্রেষ্ঠ, বৃত্রাসুরবধে প্রসিদ্ধ শক্র তার প্রতি প্রবল আকর্ষণ বোধ করতেন। আর মহামুনি দেবশর্মা ছিলেন নারীদের চরিত্র-চর্যা-জ্ঞ।

Verse 19

यथाशक्ति यथोत्साहं भार्या तामभ्यरक्षत | महामुनि देवशर्मा नारियोंके चरित्रको जानते थे; अतः वे यथाशक्ति उत्साहपूर्वक उसकी रक्षा करते थे ।। पुरन्दरं च जानीते परस्त्रीकामचारिणम्‌

যথাশক্তি ও যথোৎসাহ তিনি নিজের স্ত্রীর রক্ষা করতেন। মহামুনি দেবশর্মা নারীদের চরিত্র জানতেন; তাই তিনি উদ্যমসহকারে, নিজের সাধ্য অনুযায়ী তার পাহারা দিতেন। তিনি এও জানতেন যে পুরন্দর (ইন্দ্র) পরস্ত্রী-কামনায় বিচরণকারী।

Verse 20

स कदाचिदृषिस्तात यज्ञं कर्तुमनास्तदा

হে বৎস, এক সময় সেই ঋষি তখন যজ্ঞ সম্পাদনের সংকল্প করলেন।

Verse 22

देवशर्मोवाच यज्ञकारो गमिष्यामि रुचिं चेमां सुरेश्वर:

দেবশর্মা বললেন—হে সুরেশ্বর, আমি যজ্ঞে ঋত্বিক্‌ (যজ্ঞকার) হয়ে যাব; আর আমার এই অভিপ্রায়ও সেই কর্তব্যেই স্থির।

Verse 23

अप्रमत्तेन ते भाव्यं सदा प्रति पुरन्दरम्‌

পুরন্দরের (ইন্দ্রের) বিরুদ্ধে তোমাকে সর্বদা সতর্ক ও সংযত থাকতে হবে।

Verse 24

भीष्म उवाच इत्युक्तो विपुलस्तेन तपस्वी नियतेन्द्रिय:

ভীষ্ম বললেন—রাজন! গুরুর এমন কথা শুনে অগ্নি ও সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান, ইন্দ্রিয়সংযমী, সদা কঠোর তপস্যায় রত, ধর্মজ্ঞ ও সত্যবাদী বিপুল “তথাস্তु” বলে গুরুর আদেশ গ্রহণ করল। তারপর, মহারাজ, গুরু যখন প্রস্থান করতে উদ্যত হলেন, তখন সে আবার এইরূপে প্রশ্ন করল।

Verse 25

सदैवोग्रतपा राजन्नग्न्यर्कसदृशद्युति: । धर्मज्ञ: सत्यवादी च तथेति प्रत्यभाषत । पुनश्चेद॑ं महाराज पप्रच्छ प्रस्थितं गुरुम्‌

ভীষ্ম বললেন—রাজন! সদা ঘোর তপস্যায় রত, অগ্নি ও সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান, ধর্মজ্ঞ ও সত্যবাদী বিপুল “তথাস্তু” বলে উত্তর দিল। তারপর, মহারাজ, গুরু প্রস্থান করতে উদ্যত হলে সে আবার প্রশ্ন করল।

Verse 26

विपुल उवाच कानि रूपाणि शक्रस्य भवन्त्यागच्छतो मुने । वपुस्तेजश्न कीदृग्‌ वै तन्मे व्याख्यातुमहसि

বিপুল বলল—মুনে! শক্র (ইন্দ্র) যখন আসেন, তখন তিনি কোন কোন রূপ ধারণ করেন? আর সেই সময় তাঁর দেহ ও তেজ কেমন হয়? অনুগ্রহ করে তা আমাকে স্পষ্ট করে বলুন।

Verse 27

भीष्म उवाच ततः स भगवांस्तस्मै विपुलाय महात्मने । आचचक्षे यथातत्त्वं मायां शक्रस्य भारत

ভীষ্ম বললেন—হে ভারতবংশধর! তখন সেই ভগবান ঋষি মহাত্মা বিপুলকে শক্র (ইন্দ্র)-এর মায়ার প্রকৃত তত্ত্ব যথাযথভাবে ব্যাখ্যা করলেন।

Verse 28

देवशर्मोवाच बहुमाय: स विप्रर्षे भगवान्‌ पाकशासन: । तांस्तान्‌ विकुरुते भावान्‌ बहूनथ मुहुर्मुहु:

দেবশর্মা বললেন—হে ব্রহ্মর্ষি! ভগবান পাকশাসন (ইন্দ্র) বহুবিধ মায়ায় পারদর্শী। তিনি বারংবার নানা অবস্থা ও রূপে নিজেকে পরিবর্তিত করেন।

Verse 29

किरीटी वज्रधृग्‌ धन्वी मुकुटी बद्धकुण्डल:

ভীষ্ম বললেন—বৎস! কখনও তারা মস্তকে কিরীট-মুকুট, কর্ণে কুণ্ডল, আর হাতে বজ্র ও ধনু ধারণ করে মুকুটধারী বীরের মতো প্রকাশ পায়; আবার কখনও এক মুহূর্তেই চাণ্ডালের ন্যায় দৃষ্টিগোচর হয়। পুনরায় কখনও শিখা বা জটা ধারণ করে, চীরবস্ত্র পরিহিত ঋষিরূপে পরিণত হয়।

Verse 30

भवत्यथ मुहूर्तेन चाण्डालसमदर्शन: । शिखी जटी चीरवासा: पुनर्भवति पुत्रक

আর তখন, বৎস, সে এক মুহূর্তেই চাণ্ডালের ন্যায় দৃষ্টিগোচর হয়; আবার, বৎস, শিখাধারী, জটাধারী ও চীরবস্ত্রপরিহিত হয়ে ওঠে।

Verse 31

बृहत्‌ शरीरश्न पुनश्वलीरवासा: पुन: कृश: । गौरं श्यामं च कृष्णं च वर्ण विकुरुते पुन:

কখনও সে বৃহৎ ও বলিষ্ঠ দেহ ধারণ করে, আবার কখনও কৃশ হয়ে ছেঁড়া কাপড়ে জড়ানো দেখা যায়। সে বারবার বর্ণ পরিবর্তন করে—কখনও গৌর, কখনও শ্যাম, কখনও কৃষ্ণ।

Verse 32

विरूपो रूपवांश्वैव युवा वृद्धस्तथैव च । ब्राह्मण: क्षत्रियश्चैव वैश्य: शूद्रस्तथैव च

এক মুহূর্তে তারা কুৎসিত, আর পরক্ষণেই রূপবান হয়ে ওঠে। কখনও যুবক, কখনও বৃদ্ধ। কখনও ব্রাহ্মণরূপে আসে, কখনও ক্ষত্রিয়, বৈশ্য ও শূদ্রের রূপ ধারণ করে।

Verse 33

प्रतिलोमो5नुलोमश्न भवत्यथ शतक्रतुः । शुकवायसरूपी च हंसकोकिलरूपवान्‌,वे इन्द्र कभी अनुलोम संकरका रूप धारण करते हैं तो कभी विलोम संकरका। वे तोते, कौए, हंस और कोयलके रूपमें भी दिखायी देते हैं

শতক্রতু ইন্দ্র কখনও প্রতিলোম, কখনও অনুলোম সংকররূপ ধারণ করেন। তিনি শুক (টিয়া) ও বায়স (কাক) রূপেও, এবং হংস ও কোকিল রূপেও দৃষ্ট হন।

Verse 34

सिंहव्याप्रगजानां च रूपं धारयते पुन: । दैवं दैत्यमथो राज्ञां वपुर्धारयतेडपि च,सिंह, व्याप्र और हाथीके भी रूप बारंबार धारण करते हैं। देवताओं, दैत्यों तथा राजाओंके शरीर भी धारण कर लेते हैं

তিনি বারংবার সিংহ, ব্যাঘ্র ও গজের রূপ ধারণ করেন। দেবতা, দৈত্য এবং রাজাদের দেহও ধারণ করতে পারেন।

Verse 35

अकृशो वायुभग्नाड्: शकुनिर्विकृतस्तथा । चतुष्पाद्‌ बहुरूपश्च पुनर्भवति बालिश:

সে কখনও স্থূল-সবল, কখনও বাতরোগে ভগ্নদেহ, কখনও পাখি, আবার কখনও বিকৃতবেশে প্রকাশ পায়। পুনরায় কখনও চতুষ্পদ পশু, কখনও বহুরূপী, আবার কখনও মূঢ় বালিশ হয়ে জন্মায়।

Verse 36

मक्षिकामशकादीनां वपुर्धारयतेडपि च । न शक्‍्यमस्य ग्रहणं कर्तु विपुल केनचित्‌

তিনি মাছি, মশা প্রভৃতির দেহও ধারণ করেন। হে বিপুল! কোনো জনই তাঁকে ধরতে বা বশ করতে পারে না।

Verse 37

अपि विश्वकृता तात येन सृष्टमिदं जगत्‌ । पुनरन्तर्हित: शक्रो दृश्यते ज्ञानचक्षुषा

হে তাত! যিনি এই জগত সৃষ্টি করেছেন সেই বিশ্বকর্তার কাছেও—অন্তর্হিত হলে—শক্র ইন্দ্র কেবল জ্ঞানচক্ষু দ্বারাই দৃশ্য হন।

Verse 38

वायुभूतश्न स पुनर्देवराजो भवत्युत । एवं रूपाणि सततं कुरुते पाकशासन:,फिर वे वायुरूप होकर तुरंत ही देवराजके रूपमें प्रकट हो जाते हैं। इस तरह पाकशासन इन्द्र सदा नये-नये रूप धारण करता और बदलता रहता है

তিনি বায়ুরূপ ধারণ করে আবার তৎক্ষণাৎ দেবরাজরূপে প্রকাশিত হন। এভাবেই পাকশাসন ইন্দ্র সর্বদা নিত্যনতুন রূপ ধারণ করেন।

Verse 39

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स््रियोंके स्‍्वभावका वर्णनविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,तस्माद्‌ विपुल यत्नेन रक्षेमां तनुमध्यमाम्‌ | यथा रुचिं नावलिहेद्‌ देवेन्द्रो भूगुसत्तम

অতএব, হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ! মহা যত্নে এই তনুমধ্যমা নারীর রক্ষা করো, যাতে দেবেন্দ্র ইন্দ্র স্বেচ্ছামতো তার নিকটে আসতে না পারে।

Verse 40

क्रतावुपहिते न्यस्तं हवि: श्वेव दुरात्मवान्‌ भगुश्रेष्ठ विपुल! इसलिये तुम यत्नपूर्वक इस तनुमध्यमा रुचिकी रक्षा करना जिससे दुरात्मा देवराज इन्द्र यज्ञमें रखे हुए हविष्यको चाटनेकी इच्छावाले कुत्तेकी भाँति मेरी पत्नी रुचिका स्पर्श न कर सके ।।

হে ভৃগুশ্রেষ্ঠ বিপুল! যজ্ঞে স্থাপিত হব্যকে যেমন দুষ্ট কুকুর চাটতে ধেয়ে আসে, তেমনি দুষ্টচিত্তও তা স্পর্শ করতে উদ্যত হয়। অতএব তুমি যত্নসহকারে এই তনুমধ্যমা রুচিকাকে রক্ষা করো, যাতে দুষ্টমন ইন্দ্র—যজ্ঞে রাখা হব্য চাটতে উদ্‌গ্রীব কুকুরের ন্যায়—আমার পত্নী রুচিকাকে স্পর্শ করতে না পারে। এ কথা বলে মুনি তখন যজ্ঞকার্যে প্রবৃত্ত হলেন।

Verse 41

विपुलस्तु वच: श्रुत्वा गुरोश्विन्तामुपेयिवान्‌

গুরুর বিস্তৃত বাক্য শুনে বিপুল গভীর চিন্তায় নিমগ্ন হল এবং ধর্মানুসারে কী করা উচিত তা ভাবতে লাগল।

Verse 42

कि नु शक्‍्यं मया कर्तु गुरुदाराभिरक्षणे

গুরুপত্নীর রক্ষার বিষয়ে আমি কীই বা করতে পারি? কীভাবে আমি তাকে নিরাপদ রাখতে সক্ষম হব?

Verse 43

मायावी हि सुरेन्द्रो सौ दुर्धर्षश्षापि वीर्यवान्‌ । उन्होंने मन-ही-मन सोचा, “मैं गुरुपत्नीकी रक्षाके लिये क्या कर सकता हूँ, क्योंकि वह देवराज इन्द्र मायावी होनेके साथ ही बड़ा दुर्धर्ष और पराक्रमी है ।।

সে মনে মনে ভাবল—দেবেন্দ্র ইন্দ্র মায়াবী, অতি দুর্ধর্ষ এবং পরাক্রমশালী। পাকশাসন ইন্দ্রের থেকে তো আশ্রমে আশ্রয় নিয়েও রক্ষা পাওয়া সম্ভব নয়।

Verse 44

वायुरूपेण वा शक्रो गुरुपत्नीं प्रधर्षयेत्‌

ভীষ্ম বললেন—শক্র (ইন্দ্র) যদি বায়ুরূপ ধারণ করেও গুরুপত্নীকে লঙ্ঘন করে, তবু তা মহাপাপ, গুরুতর অপরাধই হবে।

Verse 45

अथवा पौरुषेणेयं न शक्‍्या रक्षितुं मया

ভীষ্ম বললেন—অথবা কেবল মানব-পরাক্রমে আমি একে রক্ষা করতে পারব না; কারণ ঐশ্বর্যবান, বহুরূপধারী পাকশাসন ইন্দ্রকে অতিশয় শক্তিমান বলে শোনা যায়। অতএব যোগবলের আশ্রয় নিয়ে ইন্দ্রের বিরুদ্ধেও আমি একে রক্ষা করব।

Verse 46

बहुरूपो हि भगवान्‌ श्रूयते पाकशासन: । सो<हं योगबलादेनां रक्षिष्ये पाकशासनात्‌

ভীষ্ম বললেন—ভগবান পাকশাসন (ইন্দ্র) যে বহুরূপধারী, তা সুপ্রসিদ্ধ। অতএব যোগবলের দ্বারা আমি তাকে পাকশাসনের হাত থেকে রক্ষা করব।

Verse 47

गात्राणि गात्रैरस्याहं सम्प्रवेक्ष्ये हि रक्षितुम्‌ यद्युच्छिष्टामिमां पत्नीमद्य पश्यति मे गुरु:

ভীষ্ম বললেন—রক্ষা করতে আমি তার অঙ্গের বিরুদ্ধে আমার অঙ্গই প্রতিরোধরূপে দাঁড় করাব। কেননা আজ যদি আমার গুরু এই পত্নীকে ‘উচ্ছিষ্ট’—অপমানিত ও পরিত্যক্ত—রূপে দেখেন, তবে সে কলঙ্ক আমি কীভাবে সহ্য করব?

Verse 48

नचेयं रक्षितुं शक्या यथान्या प्रमदा नृभि:

ভীষ্ম বললেন—এই নারীকে অন্য নারীদের মতো করে পুরুষেরা তেমনভাবে রক্ষা করতে পারে না।

Verse 49

मायावी हि सुरेन्द्रोडसावहो प्राप्तोडस्मि संशयम्‌ । “दूसरी युवतियोंकी तरह इस गुरुपत्नीकी भी मनुष्योंद्वारा रक्षा नहीं की जा सकती; क्योंकि देवराज इन्द्र बड़े मायावी हैं। अहो! मैं बड़ी संशयजनित अवस्थामें पड़ गया ।।

Verse 50

योगेनाथ प्रवेशो हि गुरुपत्न्या: कलेवरे

Bhishma said: “Therefore, by the power of yoga, I must enter the body of the preceptor’s wife. As a drop of water resting on a lotus leaf remains unstained, so too will I dwell within her without attachment.”

Verse 51

एवमेव शरीरे<5स्या निवत्स्यामि समाहित: । असक्तः पद्मपत्रस्थो जलबिन्दुर्यथथाचल:

Bhīṣma said: “Even so, I shall dwell within her body, collected in yoga. Remaining unattached—like a drop of water resting upon a lotus leaf without clinging—I will abide there without being tainted.”

Verse 52

निर्मुक्तस्य रजोरूपान्नापराधो भवेन्मम | यथा हि शून्यां पथिक: सभामध्यावसेत्‌ पथि

Bhishma said: “Since I am freed from the forms of rajas (passion and agitation), no fault can accrue to me. Just as a traveler on the road may, without attachment, rest in an empty lodging, so too—remaining vigilant—I shall enter and abide in the body of the teacher’s wife, in such a way that my presence there is possible.”

Verse 53

तथाद्यावासयिष्यामि गुरुपत्न्या: कलेवरम्‌ । एवमेव शरीरे<5स्या निवत्स्यामि समाहित:

Bhishma said: “So today I shall cause myself to dwell within the body of the guru’s wife. In that very body I shall remain, collected and vigilant.” The statement frames his act as a disciplined, intentional entry undertaken with self-control, invoking the ethical tension between extraordinary means and the sanctity owed to a teacher’s household.

Verse 54

इत्येवं धर्ममालोक्य वेदवेदांश्व सर्वश: । तपश्च विपुलं दृष्टवा गुरोरात्मन एव च

ভীষ্ম বললেন—হে পৃথিবীনাথ! এইভাবে ধর্মকে পর্যবেক্ষণ করে, সমগ্র বেদ ও বেদাঙ্গসমূহ সর্বতোভাবে বিচার করে, এবং গুরু ও নিজের উভয়েরই বিপুল তপস্যাকে মনে রেখে, ভৃগুবংশীয় বিপুল গুরুপত্নীর রক্ষার্থে মনে মনে পূর্বোক্ত উপায়ই স্থির করলেন। এখন তিনি যে মহৎ প্রচেষ্টা করলেন, তা আমি বলছি—শোনো।

Verse 55

इति निश्चित्य मनसा रक्षां प्रति स भार्गव: । अन्वतिष्ठत्‌ परं यत्नं यथा तच्छृणु पार्थिव

ভীষ্ম বললেন—এইভাবে রক্ষার বিষয়ে মনে স্থির সিদ্ধান্ত করে, সেই ভার্গব সর্বোচ্চ প্রচেষ্টা গ্রহণ করলেন। তিনি যেমন করলেন—হে রাজন—শোনো।

Verse 56

स्वयं गच्छन्ति देवत्वं ततो देवानियाद्‌ भयम्‌ । छुरेकी धार

ভীষ্ম বললেন—প্রাচীন কালে প্রজারা এতই ধর্মপরায়ণ ছিল যে তারা আপনাআপনি দেবত্ব লাভ করত; এতে দেবতারা মহাভয়ে পড়ল। তখন মহাতপস্বী বিপুল গুরুপত্নীর পাশে বসে, নিকটে বসা নির্দোষাঙ্গিনী রুচিকে নানা প্রকার কাহিনি ও কথোপকথনে মগ্ন করে প্রলোভিত করতে লাগলেন।

Verse 57

नेत्राभ्यां नेत्रयोरस्या रश्मिं संयोज्य रश्मिभि: । विवेश विपुल: कायमाकाशं पवनो यथा

ভীষ্ম বললেন—বিপুল নিজের চোখের রশ্মিকে তার দুই চোখের রশ্মির সঙ্গে যুক্ত করে, যেমন বায়ু আকাশে প্রবেশ করে, তেমনি তার দেহে প্রবেশ করলেন।

Verse 58

'फिर अपने दोनों नेत्रोंको उन्होंने उसके नेत्रोंकी ओर लगाया और अपने नेत्रोंकी किरणोंको उसके नेत्रोंकी किरणोंके साथ जोड़ दिया। फिर उसी मार्गसे आकाशमें प्रविष्ट होनेवाली वायुकी भाँति रुचिके शरीरमें प्रवेश किया” ।।

ভীষ্ম বললেন—লক্ষণে লক্ষণ মিলিয়ে এবং মুখে মুখ মিলিয়ে, কোনো বাহ্যিক চেষ্টাবিহীন স্থির হয়ে রইলেন। সেই মুহূর্তে অন্তর্হিত মুনি বিপুল ছায়ার মতোই প্রতীয়মান হলেন।

Verse 59

ततो विष्टभ्य विपुलो गुरुपत्न्या: कलेवरम्‌ | उवास रक्षणे युक्तो न च सा तमबुद्ध्यत

তখন বিপুল গুরুপত্নীর দেহকে ধারণ করে স্থির করলেন এবং রক্ষায় নিয়োজিত হয়ে সেখানেই অবস্থান করলেন; কিন্তু তিনি তাঁকে (রক্ষক হিসেবে) চিনতে পারলেন না।

Verse 60

“विपुल गुरुपत्नीके शरीरको स्तम्भित करके उसकी रक्षामें संलग्न हो वहीं निवास करने लगे। परंतु रुचिको अपने शरीरमें उनके आनेका पता न चला ।।

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, যতক্ষণ না সেই মহাত্মা গুরু যজ্ঞ সম্পন্ন করে নিজ গৃহে প্রত্যাবর্তন করলেন, ততক্ষণ বিপুল তেমনি সতর্ক প্রহরায় গুরুপত্নীকে রক্ষা করে সেখানেই অবস্থান করলেন।

Verse 66

निवेद्य मानसं चापि तृष्णीमासन्नधोमुखा: । शत्रुदमन! तब वे देवता ब्रह्माजीके पास गये और उनसे अपने मनकी बात निवेदन करके मुँह नीचे किये चुपचाप बैठ गये

ভীষ্ম বললেন—মনের কথা নিবেদন করে তারা নীরব হল, মুখ নত করে বসে রইল। তারপর সেই দেবতারা ব্রহ্মার কাছে গেল; অন্তরের উদ্বেগ জানিয়ে তারা বিনীতভাবে অধোমুখে নীরবে বসে রইল।

Verse 76

मानवानां प्रमोहार्थ कृत्या नार्योडसृजत्‌ प्रभु: । उन देवताओंके मनकी बात जानकर भगवान्‌ ब्रह्माने मनुष्योंको मोहमें डालनेके लिये कृत्यारूप नारियोंकी सृष्टि की

ভীষ্ম বললেন—দেবতাদের মনের কথা জেনে প্রভু ব্রহ্মা মানুষকে মোহগ্রস্ত করার উদ্দেশ্যে কৃত্যারূপ নারীদের সৃষ্টি করলেন।

Verse 106

असज्जन्त प्रजा: सर्वा: कामक्रोधवशं गता: । वे मतवाली युवतियाँ कामलोलुप होकर पुरुषोंको सदा बाधा देती रहती हैं। देवेश्वर भगवान्‌ ब्रह्माने कामकी सहायताके लिये क्रोधको उत्पन्न किया। इन्हीं काम और क्रोधके वशीभूत होकर स्त्री और पुरुषरूप सारी प्रजा परस्पर आसक्त होती है

ভীষ্ম বললেন—সমস্ত প্রজা কাম ও ক্রোধের বশে পড়ে আসক্ত হয়ে যায়। কামকে সহায় করতে দেবেশ্বর ব্রহ্মা ক্রোধকে সৃষ্টি করেছিলেন; আর কাম-ক্রোধের অধীন হয়ে স্ত্রী-পুরুষরূপ সমগ্র প্রজা পরস্পরের প্রতি আসক্তিতে আবদ্ধ হয়।

Verse 126

दुर्वग्भावं रतिं चैव ददौ स्त्रीभ्य: प्रजापति: । स्त्रियोंके लिये किन्‍्हीं वैदिक कर्मोंके करनेका विधान नहीं है। यही धर्मशास्त्रकी व्यवस्था है। स्त्रियाँ इन्द्रियशून्य हैं अर्थात्‌ वे अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेमें असमर्थ हैं। शास्त्रज्ञाससे रहित हैं और असत्यकी मूर्ति हैं। ऐसा उनके विषयमें श्रुतिका कथन है। प्रजापतिने स्त्रियोंको शय्या

ভীষ্ম বললেন—প্রজাপতি নারীদের মধ্যে কঠোর বাক্যভাব ও রতি দান করেছিলেন। নারীদের জন্য বৈদিক কর্ম পালনের বিধান নেই—এটাই ধর্মশাস্ত্রের ব্যবস্থা। তারা ইন্দ্রিয়সংযমে অক্ষম, শাস্ত্রজিজ্ঞাসাহীন এবং অসত্যের প্রতিমা—এমনই শ্রুতিবচন বলে উল্লেখ করা হয়। আবার বলা হয়েছে, প্রজাপতি নারীদের শয্যা, আসন, অলংকার, অন্ন, পান, অশিষ্টতা, দুর্বচন, প্রিয়তা ও রতি প্রদান করেছেন।

Verse 136

अपि विश्वकृता तात कुतस्तु पुरुषैरिह । तात! लोकस्रष्टा ब्रह्मा-जैसा पुरुष भी स्त्रियोंकी किसी प्रकार रक्षा नहीं कर सकता, फिर साधारण पुरुषोंकी तो बात ही क्या

ভীষ্ম বললেন—বৎস! যদি বিশ্বস্রষ্টা ব্রহ্মার মতো পুরুষও সর্বতোভাবে নারীদের রক্ষা করতে না পারেন, তবে এই জগতে সাধারণ পুরুষেরা আর কীই বা করতে পারে?

Verse 143

न शक्या रक्षितुं नार्यस्ता हि नित्यमसंयता: । वाणीके द्वारा एवं वध और बन्धनके द्वारा रोककर अथवा नाना प्रकारके क्लेश देकर भी स्त्रियोंकी रक्षा नहीं की जा सकती; क्योंकि वे सदा असंयमशील होती हैं

ভীষ্ম বললেন—নারীদের রক্ষা করা যায় না, কারণ তারা নিত্যই অসংযত বলে বলা হয়েছে। কথা দিয়ে নিবৃত্ত করে, দণ্ডের ভয় দেখিয়ে, হত্যা বা বন্ধন দ্বারা, কিংবা নানা প্রকার ক্লেশ দিয়ে—কোনোভাবেই তাদের আচরণকে সত্যিকার অর্থে নিরাপদ করা যায় না।

Verse 153

यथा रक्षा कृता पूर्व विपुलेन गुरुस्त्रिया: । पुरुषसिंह! पूर्वकालमें मैंने यह सुना था कि प्राचीनकालमें महात्मा विपुलने अपनी गुरुपत्नीकी रक्षा की थी। कैसे की? यह मैं तुम्हें बता रहा हूँ

ভীষ্ম বললেন—হে পুরুষসিংহ! আমি প্রাচীন কালের কথা শুনেছি—মহাত্মা বিপুল একদা তাঁর গুরুর পত্নীকে রক্ষা করেছিলেন। কীভাবে তিনি সেই রক্ষা করেছিলেন—এখন আমি তোমাকে বলছি।

Verse 166

तस्य भार्या रुचिनाम रूपेणासदृशी भुवि । पहलेकी बात है, देवशर्मा नामके एक महा-भाग्यशाली ऋषि थे। उनके रुचि नामवाली एक स्त्री थी जो इस पृथ्वीपर अद्वितीय सुन्दरी थी

ভীষ্ম বললেন—তার স্ত্রী রুচি নামে পরিচিতা; রূপে সে পৃথিবীতে অতুলনীয়া ছিল। পূর্বে দেবশর্মা নামে এক মহাভাগ্যবান মুনি ছিলেন; তাঁর রুচি নাম্নী পত্নী এই ধরাধামে অনন্যা সুন্দরী ছিলেন।

Verse 196

तस्माद्‌ बलेन भार्याया रक्षणं स चकार ह । वे यह भी जानते थे कि इन्द्र बड़ा ही पर-स्त्रीलम्पट है, इसलिये वे अपनी स्त्रीकी उनसे यत्नपूर्वक रक्षा करते थे

অতএব সে সর্বশক্তি দিয়ে স্ত্রীর রক্ষার ভার গ্রহণ করল। ইন্দ্র যে পরস্ত্রীলোলুপ—এ কথা জেনে সে অত্যন্ত যত্ন ও সতর্কতায় সর্বদা তাকে রক্ষা করত।

Verse 206

भार्यासंरक्षणं कार्य कथं स्यादित्यचिन्तयत्‌ । तात! एक समय ऋषिने यज्ञ करनेका विचार किया। उस समय वे यह सोचने लगे कि 'यदि मैं यज्ञमें लग जाऊँ तो मेरी स्त्रीकी रक्षा कैसे होगी'

সে ভাবতে লাগল—‘স্ত্রীর রক্ষা করা কর্তব্য; তা কীভাবে নিশ্চিত হবে?’ এক সময় সেই ঋষি যজ্ঞ করার সংকল্প করলেন। তখন তিনি মনে মনে চিন্তা করলেন—‘আমি যদি যজ্ঞকর্মে সম্পূর্ণ নিমগ্ন হই, তবে আমার স্ত্রীর রক্ষা কীভাবে হবে?’

Verse 216

आहृय दयितं शिष्यं विपुलं प्राह भार्गवम्‌ । फिर उन महा तपस्वीने मन-ही-मन उसकी रक्षाका उपाय सोचकर अपने प्रिय शिष्य भगुवंशी विपुलको बुलाकर कहा--

তখন সেই মহাতপস্বী মনে মনে রক্ষার উপায় ভেবে প্রিয় শিষ্য ভৃগুবংশীয় বিপুলকে ডেকে বললেন।

Verse 223

यतः प्रार्थयते नित्यं तां रक्षस्व यथाबलम्‌ । देवशर्मा बोले--वत्स! मैं यज्ञ करनेके लिये जाऊँगा। तुम मेरी इस पत्नी रुचिकी यत्नपूर्वक रक्षा करना; क्‍योंकि देवराज इन्द्र सदा इसे प्राप्त करनेकी चेष्टामें लगा रहता है

‘যেহেতু সে নিত্যই তাকে প্রার্থনা করে, তাই তুমি যথাশক্তি তার রক্ষা করো।’ দেবশর্মা বললেন—‘বৎস! আমি যজ্ঞ করতে যাচ্ছি। তুমি আমার স্ত্রী রুচিকীকে অত্যন্ত যত্নে রক্ষা করবে; কারণ দেবরাজ ইন্দ্র সর্বদা তাকে লাভ করতে উদ্যত থাকে।’

Verse 231

रक्षाविधानं मनसा स संचिन्त्य महातपा:

সেই মহাতপস্বী মনে মনে রক্ষার যথাযথ বিধান ভেবে নিলেন। তারপর তিনি ধৈর্য ও যত্নসহকারে অগ্রসর হলেন—যেন বোঝা যায়, রক্ষা আবেগে নয়, চিন্তা, সংযম ও ধর্মবুদ্ধিতে পরিচালিত হওয়া উচিত।

Verse 236

स हि रूपाणि कुरुते विविधानि भृगूत्तम । भुगुश्रेष्ठ! तुम्हें इन्द्रकी ओरसे सदा सावधान रहना चाहिये; क्योंकि वह अनेक प्रकारके रूप धारण करता है

ভৃগুশ্রেষ্ঠ! সে সত্যই নানা প্রকার রূপ ধারণ করে। অতএব ইন্দ্রের প্রতি সর্বদা সতর্ক থেকো; কারণ সে বিভিন্ন ছদ্মবেশ নিতে পারদর্শী।

Verse 403

देवशर्मा महाभागस्ततो भरतसत्तम | भरतश्रेष्ठ] ऐसा कहकर महाभाग देवशर्मा मुनि यज्ञ करनेके लिये चले गये

তারপর, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, মহাভাগ মুনি দেবশর্মা এ কথা বলে যজ্ঞ সম্পাদনের জন্য প্রস্থান করলেন।

Verse 413

रक्षां च परमां चक्रे देवराजान्महाबलात्‌ | गुरुकी बात सुनकर विपुल बड़ी चिन्तामें पड़ गये और महाबली देवराजसे उस स्त्रीकी बड़ी तत्परताके साथ रक्षा करने लगे

তখন মহাবলী দেবরাজ সর্বোচ্চ রক্ষাব্যবস্থা স্থাপন করলেন। গুরুর কথা শুনে তিনি গভীর চিন্তায় পড়ে সেই নারীর রক্ষায় অত্যন্ত তৎপর হলেন।

Verse 436

उटजं वा तथा हास्य नानाविधसरूपता । “कुटी या आश्रमके दरवाजोंको बंद करके भी पाकशासन इन्द्रका आना नहीं रोका जा सकता; क्योंकि वे कई प्रकारके रूप धारण करते हैं

কুটির হোক বা অন্য কোনো বাসস্থান—আশ্রমের দরজা বন্ধ করলেও বজ্রধারী দেবাধিপতি ইন্দ্রের আগমন রোধ করা যায় না; কারণ সে নানা রূপ ধারণ করতে পারে।

Verse 443

तस्मादिमां सम्प्रविश्य रुचिं स्थास्येडहमद्य वै । सम्भव है, इन्द्र वायुका रूप धारण करके आये और गुरुपत्नीको दूषित कर डाले; इसलिये आज मैं रुचिके शरीरमें प्रवेश करके रहूँगा

অতএব আজ আমি এই রুচির দেহে প্রবেশ করে এখানেই থাকব। সম্ভব যে ইন্দ্র ও বায়ু কোনো ছদ্মরূপ ধারণ করে এসে গুরুপত্নীকে কলুষিত করতে পারে; তাই আমি ভিতরে থেকেই রক্ষা করব।

Verse 473

शप्स्यत्यसंशयं कोपाद्‌ दिव्यज्ञानो महातपा: । “मैं गुरुपत्नीकी रक्षा करनेके लिये अपने सम्पूर्ण अंगोंसे इसके सम्पूर्ण अंगोंमें समा जाऊँगा। यदि आज मेरे गुरुजी अपनी इस पत्नीको किसी पर-पुरुषद्वारा दूषित हुई देख लेंगे तो कुपित होकर मुझे निस्संदेह शाप दे देंगे; क्योंकि वे महा तपस्वी गुरु दिव्यज्ञानसे सम्पन्न हैं

ভীষ্ম বললেন—“ক্রোধে সেই মহাতপস্বী, দিব্যজ্ঞানসম্পন্ন গুরু নিঃসন্দেহে আমাকে শাপ দেবেন। গুরুপত্নীর রক্ষার্থে আমি স্থির করেছি—আমার সমগ্র সত্তা দিয়ে তাঁর সমগ্র অঙ্গে লীন হয়ে থাকব, যাতে অন্য কোনো পুরুষ তাঁকে কলুষিত করতে না পারে। আজ যদি আমার পূজ্য গুরু তাঁর পত্নীকে পরপুরুষের দ্বারা অপবিত্র হতে দেখেন, তবে ক্রুদ্ধ হয়ে নিশ্চিতই আমাকে শাপ দেবেন; কারণ তিনি মহাতপস্বী এবং দিব্যজ্ঞানে সমৃদ্ধ।”

Verse 496

यदि त्वेतदहं कुर्यामाश्चर्य स्यात्‌ कृतं मया । “यहाँ गुरुने जो आज्ञा दी है, उसका पालन मुझे अवश्य करना चाहिये। यदि मैं ऐसा कर सका तो मेरे द्वारा यह एक आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न होगा

ভীষ্ম বললেন—“আমি যদি এটি করতে পারি, তবে তা আমার দ্বারা সম্পন্ন এক আশ্চর্য কর্ম হবে। আজ এখানে গুরু যে আদেশ দিয়েছেন, তা অবশ্যই পালনীয়; যদি আমি তা সম্পন্ন করতে পারি, তবে সেটিই আমার পক্ষে এক অতুলনীয় কীর্তি হবে।”

Frequently Asked Questions

Whether a person can rely on privacy to evade moral consequence; the chapter answers negatively, asserting that cyclical time and order function as enduring witnesses to conduct.

Do not assume anonymity in wrongdoing; practice restraint and transparent duty, and apply prudent method (yukti) to prevent ethical lapses and social harm.

Yes: the narration is presented as a remembered account (attributed to Mārkaṇḍeya), and Bhīṣma generalizes it into a broader normative claim about continuous moral visibility and the necessity of prudent conduct.