
Aṣṭāvakra’s Visit to Kubera: Hospitality, Temptation, and the Ethics of Restraint (अष्टावक्र-वैश्रवणोपाख्यानम्)
Upa-parva: Aṣṭāvakra–Vaiśravaṇa (Kubera) Upākhyāna
Bhīṣma narrates Aṣṭāvakra’s northward journey to the Himālaya, including bathing at tīrthas and performing morning rites. The sage approaches Kailāsa’s environs, encounters Kubera’s guarded domain, and is ceremonially received: rākṣasas report to Vaiśravaṇa, who arrives, offers formal welcome, and arranges entertainment by apsaras with gandharva music. After an extended period in this refined setting, Aṣṭāvakra departs and reaches a remarkable, gem-like residence where seven captivating maidens appear and invite him inward. Inside, he meets an aged, ornamented woman who engages him in intimate solicitation, arguing from a desire-centered view of female motivation and social behavior. Aṣṭāvakra responds with a dharma-based refusal, explicitly rejecting contact with another’s spouse and affirming his intention to live for dharma and progeny rather than sensory indulgence. The woman advises him to remain until the appropriate time, and as evening approaches, Aṣṭāvakra requests water to perform twilight worship (saṃdhyā), emphasizing disciplined speech and controlled senses.
Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर के समक्ष ऋषि-परंपरा शिव-सहस्रनाम के पाठ की महिमा का उद्घोष करती है—यह केवल स्तुति नहीं, वरदान-मार्ग है, जिसे अनेक तपस्वियों ने अपने जीवन में सत्य पाया है। → एक-एक करके ऋषि अपने अनुभव सुनाते हैं: पुत्र-प्राप्ति हेतु घोर तप और स्तव-पाठ (V2), मनोवांछित कामनाओं की सिद्धि का आश्वासन (V3), काशी में शिवकृपा से अष्टगुण ऐश्वर्य का दान (V37), माता का करुण विलाप और पुत्र को वेद-विद्या से विभूषित करने की आकांक्षा (V53), तथा पाठ के फलस्वरूप स्वर्ग-वास की अतिशय दीर्घता का वर्णन (V83)। इन कथनों से प्रश्न तीक्ष्ण होता है—क्या केवल नाम-स्मरण से इतना महान फल संभव है? → महिमा का शिखर तब आता है जब कहा जाता है कि प्रसन्न रुद्र त्रैलोक्याधिपत्य तक दे सकते हैं (V643), और यहाँ तक कि लक्षणहीन या पापयुक्त मनुष्य भी यदि हृदय से शिव-ध्यान करे तो पाप-विनाश पा लेता है (V676)—भक्ति की सार्वभौमिकता और शिव-कृपा की असीम सीमा एक साथ उद्घाटित होती है। → कथन-श्रृंखला का निष्कर्ष यह बनता है कि शिव-सहस्रनाम का पाठ/ध्यान साधक की पात्रता को शुद्ध करता है, इच्छित सिद्धि देता है, और अंततः दुर्लभ पदों तक उठा सकता है—जैसे विश्वामित्र का क्षत्रिय से ब्राह्मण्य की ओर उठना ‘तत्प्रसादात्’ (V1636) के सूत्र में समाहित है। → युधिष्ठिर के मन में यह जिज्ञासा शेष रहती है कि इस स्तोत्र का विधि-विधान, नियम, और सर्वोत्तम आचरण-मार्ग क्या है—जिससे फल ‘अनुभव-सिद्ध’ हो सके।
Verse 1
ऑपन--#रा< बछ। है २ >> अष्टादशो< ध्याय: शिवसहस्रनामके पाठकी महिमा तथा ऋषियोंका भगवान् शंकरकी कृपासे अभीष्ट सिद्धि होनेके विषयमें अपना- अपना अनुभव सुनाना और श्रीकृष्णके द्वारा भगवान् शिवजीकी महिमाका वर्णन वैशम्पायन उवाच महायोगी ततः प्राह कृष्णद्वैपायनो मुनि: । पठस्व पुत्र भद्रं ते प्रीयतां ते महेश्वर:
বৈশম্পায়ন বললেন— তখন মহাযোগী মুনি কৃষ্ণদ্বৈপায়ন (ব্যাস) বললেন— “পুত্র, তোমার মঙ্গল হোক। তুমিও এই স্তোত্র পাঠ করো, যাতে মহেশ্বর তোমার প্রতি প্রসন্ন হন।”
Verse 2
पुरा पुत्र मया मेरी तप्यता परमं तप: । पुत्रहेतोर्महाराज स्तव एषो<नुकीर्तित:
বৈশম্পায়ন বললেন— হে পুত্র, হে মহারাজ! পূর্বকালে পুত্রলাভের উদ্দেশ্যে আমি মেরুপর্বতে পরম তপস্যা করেছিলাম; সেই সময় আমি এই স্তোত্র বারংবার পাঠ করেছিলাম।
Verse 3
लब्धवानीप्सितान् कामानहं वै पाण्डुनन्दन | तथा त्वमपि शर्वाद्धि सर्वान् कामानवाप्स्यसि
হে পাণ্ডুনন্দন! আমি এই পাঠের দ্বারা আমার অভীষ্ট কামনা লাভ করেছিলাম; তেমনি তুমিও শর্ব (শিব)-এর কাছ থেকে সকল কামনা লাভ করবে।
Verse 4
कपिलभश्न ततः प्राह सांख्यर्षिदेवसम्मत: । मया जन्मान्यनेकानि भकक््त्या चाराधितो भव:
তখন কপিলভশ্ন বললেন—সাংখ্যঋষিদের দ্বারা সম্মানিত ও দেবসমাজে পূজিত—“অসংখ্য জন্ম ধরে আমি ভক্তিভরে আপনার আরাধনা করেছি; এখন প্রসন্ন হয়ে অনুগ্রহ করুন।”
Verse 5
चारुशीर्षस्तत: प्राह शक्रस्य दयित: सखा | आलनम्बायन इत्येवं विश्रुतटः करुणात्मक:,तदनन्तर इन्द्रके प्रिय सखा आलम्बगोत्रीय चारुशीर्षने जो आलम्बायन नामसे ही प्रसिद्ध तथा परम दयालु हैं, इस प्रकार कहा--
এরপর ইন্দ্রের প্রিয় সখা, আলম্ব গোত্রীয় চারুশীর্ষ—যিনি ‘আলনম্বায়ন’ নামে প্রসিদ্ধ এবং স্বভাবতই করুণাময়—এইভাবে বললেন।
Verse 6
मया गोकर्णमासाद्य तपस्तप्त्वा शतं समा: | अयोनिजानां दान्तानां धर्मज्ञानां सुवर्चसाम्
হে পাণ্ডুনন্দন! প্রাচীনকালে আমি গোকর্ণ তীর্থে গিয়ে শতবর্ষ তপস্যা করে শংকরকে প্রসন্ন করেছিলাম; তার ফলে আমার শত পুত্র লাভ হয়—যারা অযোনিজ, ইন্দ্রিয়সংযমী, ধর্মজ্ঞ ও অতিশয় তেজস্বী।
Verse 7
अजराणामदुः:खानां शतवर्षसहस्रिणाम् । लब्धं पुत्रशतं शर्वात् पुरा पाण्डुनूपात्मज
হে পাণ্ডুরাজপুত্র! প্রাচীনকালে আমি শর্ব (শিব)-এর কাছ থেকে শত পুত্র লাভ করেছিলাম—যারা জরা ও দুঃখহীন, এবং প্রত্যেকে লক্ষবর্ষায়ু ছিল।
Verse 8
भगवान् श्रीकृष्ण एवं विभिन्न महर्षियोंका युधिष्ठिरको उपदेश वाल्मीकिश्नाह भगवान् युधिष्ठटिरमिदं वच: । विवादे साग्निमुनिभिर्त्रह्मघ्नो वै भवानिति
বৈশম্পায়ন বললেন— ভগবান শ্রীমান্ বাল্মীকি যুধিষ্ঠিরকে এই বাক্য বললেন— “অগ্নিসম্বদ্ধ ঋষিদের সঙ্গে বিবাদে বলা হয়, তুমি ব্রাহ্মণহন্তা।”
Verse 9
उक्त: क्षणेन चाविष्टस्तेनाधर्मेण भारत । सो5हमीशानमनघममोघं शरणं गत:
বৈশম্পায়ন বললেন— হে ভারত! কথাটি উচ্চারিত হতেই সেই ক্ষণেই অধর্মের প্রেরণা আমাকে গ্রাস করল। তাই আমি নিষ্কলুষ ও অমোঘ ঈশ্বরের শরণ নিলাম।
Verse 10
मुक्तश्नास्मि ततः पापैस्ततो दुःखविनाशन: । आह मां त्रिपुरघ्नो वै यशस्तेडग्रयं भविष्यति
তখন আমি পাপমুক্ত হলাম এবং নির্বিঘ্নে আহার করতে পারলাম; দুঃখের বিনাশ ঘটল। তখন ত্রিপুরঘ্ন (শিব) আমাকে বললেন—“তোমার যশ সর্বশ্রেষ্ঠ হবে।”
Verse 11
इसके बाद धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ जमदग्निनन्दन परशुरामजी ऋषियोंके बीचमें खड़े होकर सूर्यके समान प्रकाशित होते हुए वहाँ कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले--
এরপর ধর্মাত্মাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ জমদগ্নিনন্দন পরশুরাম ঋষিদের মাঝে দাঁড়ালেন। সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান হয়ে তিনি সেখানে কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠিরকে এইভাবে বললেন।
Verse 12
पितृविप्रवधेनाहमार्तो वै पाण्डवाग्रज । शुचिर्भूत्वा महादेवं गतो5स्मि शरणं नूप
বৈশম্পায়ন বললেন— হে পাণ্ডবাগ্রজ, হে নরেশ্বর! পিতৃতুল্য জ্যেষ্ঠদের বধ এবং এক ব্রাহ্মণকে হত্যা করে আমি পিতৃহত্যা ও ব্রহ্মহত্যার পাপে গভীর শোকে আচ্ছন্ন হলাম। তখন শুচি হয়ে আমি মহাদেবের শরণ নিলাম। শরণাগত হয়ে আমি এই নামগুলির দ্বারাই রুদ্রদেবের স্তব করলাম। তাতে ভগবান মহাদেব আমার প্রতি অতিশয় প্রসন্ন হয়ে নিজের পরশু ও দিব্যাস্ত্র দান করে বললেন—“তোমার গায়ে পাপ লাগবে না। যুদ্ধে তুমি অজেয় হবে। মৃত্যু তোমাকে পরাভূত করতে পারবে না, এবং তুমি অজর-অমর হবে।”
Verse 13
नामभिश्षास्तुव॑ं देवं ततस्तुष्टो5भवद् भव: । परशुं च ततो देवो दिव्यान्यस्त्राणि चैव मे
বৈশম্পায়ন বললেন—“এই নামগুলির দ্বারাই সেই দেবের স্তব করলে ভব (শিব) প্রসন্ন হলেন। তারপর দেবতা আমাকে তাঁর পরশু এবং দিব্য অস্ত্রসমূহ দান করে বললেন—‘তোমার উপর পাপ লেগে থাকবে না; যুদ্ধে তুমি অজেয় হবে; মৃত্যু তোমার উপর প্রভুত্ব করতে পারবে না; তুমি অজর-অমর হবে।’”
Verse 14
पापं च ते न भविता अजेयश्व भविष्यसि । न ते प्रभविता मृत्युरजरश्न॒ भविष्यसि
“তোমার উপর পাপ হবে না; তুমি অজেয় হবে। মৃত্যু তোমার উপর প্রভাব ফেলতে পারবে না; তুমি অজর হবে।”
Verse 15
आह मां भगवानेवं शिखण्डी शिवविग्रह: । तदवाप्तं च मे सर्व प्रसादात् तस्य धीमतः
বৈশম্পায়ন বললেন—“এইভাবে কল্যাণময় রূপধারী, জটাধারী ভগবান শিব আমাকে যা বললেন, সেই সবই সেই জ্ঞানী মহেশ্বরের কৃপাপ্রসাদে আমি লাভ করলাম।”
Verse 16
विश्वामित्रस्तदोवाच क्षत्रियो5हं तदाभवम् | ब्राह्मणो5हं भवानीति मया चाराधितो भव:
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন বিশ্বামিত্র বললেন—“তখন আমি ক্ষত্রিয় ছিলাম; এখন আমি ব্রাহ্মণ।” এইভাবে আমার আরাধনায় ভব (শিব) প্রসন্ন হলেন।
Verse 17
इस प्रकार श्रीमह्ााभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महादेवसहस्रनामस्तोत्रविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ,असितो देवलश्वैव प्राह पाण्डुसुतं नृपम्
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে মহাদেব-সহস্রনাম-স্তোত্র বিষয়ক সপ্তদশ অধ্যায় সমাপ্ত হল। তারপর অসিত ও দেবল পাণ্ডুপুত্র নৃপতিকে সম্বোধন করলেন।
Verse 18
शापाच्छक्रस्य कौन्तेय विभो धर्मोडनशत् तदा । तन्मे धर्म यशश्चाग्रयमायुश्चैवाददत् प्रभु:
বৈশম্পায়ন বললেন—হে কুন্তীপুত্র! ইন্দ্রের শাপে সেই মহাবীর তখন ধর্মচ্যুত হয়েছিল; কিন্তু প্রভু আমাকে ধর্ম, শ্রেষ্ঠ যশ এবং দীর্ঘায়ু দান করেছিলেন। (এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ‘মেঘবাহন’ আখ্যানে অধ্যায় সমাপ্ত হল।)
Verse 19
तत्पश्चात् असित देवलने पाण्डुकुमार राजा युधिष्ठिरसे कहा--“कुन्तीनन्दन! प्रभो! इन्द्रके शापसे मेरा धर्म नष्ट हो गया था; किंतु भगवान् शंकरने ही मुझे धर्म, उत्तम यश तथा दीर्घ आयु प्रदान की” ।।
এরপর অসিত-দেবল পাণ্ডুপুত্র রাজা যুধিষ্ঠিরকে বললেন—“হে কুন্তীনন্দন, হে প্রভু! ইন্দ্রের শাপে আমার ধর্ম নষ্ট হয়ে গিয়েছিল; কিন্তু ভগবান শঙ্করই আমাকে ধর্ম, উৎকৃষ্ট যশ এবং দীর্ঘায়ু দান করেছিলেন।” তারপর ইন্দ্রের প্রিয় সখা, বৃহস্পতির ন্যায় দীপ্তিমান গৃত্সমদ নামক ঋষি অজমীঢ়বংশীয় যুধিষ্ঠিরকে উদ্দেশ করে আবার কথা বলতে লাগলেন।
Verse 20
वरिष्ठो नाम भगवांश्षाक्षुषस्प मनो: सुतः । शतक्रतोरचिन्त्यस्य सत्रे वर्षमहस्त्रिके
বৈশম্পায়ন বললেন—চাক্ষুষ মনুর পুত্র, ‘বরিষ্ঠ’ নামে এক পূজ্য মহাত্মা ছিলেন। অচিন্ত্য শক্তিধর শতক্রতু ইন্দ্রের সেই সহস্রবর্ষব্যাপী সত্রযজ্ঞে এই প্রসঙ্গ ঘটেছিল।
Verse 21
वर्तमाने<ब्रवीद् वाक््यं साम्नि ह्युच्चारिते मया । रथन्तरे द्विजश्रेष्ठ न सम्यगिति वर्तते
বৈশম্পায়ন বললেন—আমি যখন সামগান করছিলাম এবং আমার উচ্চারণ সম্পন্ন হয়েছিল, তখন তিনি বললেন—“হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! রথন্তর সামের পাঠ যথাযথভাবে হচ্ছে না।”
Verse 22
समीक्षस्व पुनर्बुद्ध्या पापं त्यक्त्वा द्विजोत्तम । अयज्ञवाहिनं पापमकार्षास्त्वं सुदुर्मते
বৈশম্পায়ন বললেন—“হে দ্বিজোত্তম! পাপবুদ্ধি ত্যাগ করে পুনরায় নির্মল বুদ্ধিতে বিচার করো। হে দুর্মতি! তুমি এমন ঘোর পাপ করেছ, যা যজ্ঞের প্রবাহ ও ধর্মের গতিকে রুদ্ধ করে।”
Verse 23
“विप्रवर! तुम पापपूर्ण आग्रह छोड़कर फिर अपनी बुद्धिसे विचार करो। सुदुर्मते! तुमने ऐसा पाप कर डाला है, जिससे यह यज्ञ ही निष्फल हो गया' ।।
বৈশম্পায়ন বললেন— “হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ! এই পাপময় জেদ ত্যাগ করে নিজের বুদ্ধিতে আবার বিচার করো। হে দুর্মতি! তুমি এমন পাপ করেছ যে এই যজ্ঞই নিষ্ফল হয়ে গেল।” এ কথা বলে মহাক্রোধে জ্যেষ্ঠজন শম্ভুর দিকে চেয়ে আবার বললেন— “বিবেকহীন, দুঃখী ও সদা ভীত হয়ে তুমি বনচারী হবে। এগারো হাজার আটশো বছর জল ও বায়ুবিহীন অবস্থায় থাকবে; অন্য প্রাণীদের দ্বারা পরিত্যক্ত, কেবল রুরু-মৃগ ও সিংহের সঙ্গেই থাকবে; যজ্ঞের অযোগ্য বৃক্ষে ঘন বিশাল অরণ্যে বাস করে—মনশূন্য, শোকাকুল, সর্বদা সন্ত্রস্ত, মহাকষ্টে নিমগ্ন, ক্রূর স্বভাবের পশু হয়ে থাকবে।”
Verse 24
दशवर्षसहस्राणि दशाष्टी च शतानि च । नष्टपानीयपवने मृगैरन्यैश्न वर्जिते
দশ সহস্র বছর, আর তার সঙ্গে আরও দশ ও আট শত—অর্থাৎ দশ হাজার আটশো বছর—সেই অরণ্যে, যেখানে পানীয় জল ও নির্মল বায়ু লুপ্ত, এবং যেখানে অন্য মৃগদের সঙ্গও থাকবে না।
Verse 25
अयज्ञीयद्रुमे देशे रुकुसिंहनिषेविते | भविता त्वं मृग: क्रूरो महादुः:खसमन्वित:
যজ্ঞের অযোগ্য বৃক্ষে ভরা দেশে, যেখানে কেবল রুরু-মৃগ ও সিংহের আনাগোনা, সেখানে তুমি ক্রূর মৃগ হবে এবং মহাদুঃখে জর্জরিত থাকবে।
Verse 26
तस्य वाक्यस्य निधने पार्थ जातो हाहं मृगः । ततो मां शरणं प्राप्तं प्राह योगी महेश्वर:
হে পার্থ! তাঁর বাক্য সম্পূর্ণ হতেই—হায়!—আমি মৃগ হয়ে গেলাম। তারপর শরণ নিতে আমি যোগী মহেশ্বরের কাছে গেলাম; শরণাগত আমাকে দেখে মহেশ্বর বললেন।
Verse 27
अजरश्नामरश्रैव भविता दुःखवर्जित: । साम्यं ममास्तु ते सौख्यं युवयोर्वर्धतां क्रतु:
তুমি জরা ও মৃত্যু থেকে মুক্ত হবে, দুঃখবর্জিত হবে। আমার সমান সুখ তোমার হোক; আর তোমাদের দু’জনের—যজমান ও পুরোহিতের—এই যজ্ঞ সদা বৃদ্ধি ও সমৃদ্ধি লাভ করুক।
Verse 28
अनुग्रहानेवमेष करोति भगवान् विभु: । परं धाता विधाता च सुखदु:खे च सर्वदा
এইভাবেই সর্বব্যাপী, সর্বসমর্থ ভগবান শঙ্কর সকলের প্রতি অনুগ্রহ করেন। তিনিই পরম ধারক ও বিধাতা; সর্বদা সকলের সুখ-দুঃখের বিধানও তিনিই করেন।
Verse 29
अचिन्त्य एष भगवान् कर्मणा मनसा गिरा । न मे तात युधिश्रेष्ठ विद्यया पण्डित: सम:
হে তাত, যুদ্ধে শ্রেষ্ঠ বীর! এই অচিন্ত্য ভগবান শিব মন, বাক্য ও কর্ম দ্বারা আরাধ্য। তাঁর আরাধনার ফলেই আজ বিদ্যায় আমার সমকক্ষ কোনো পণ্ডিত নেই।
Verse 30
वासुदेवस्तदोवाच पुनर्मतिमतां वर: । सुवर्णाक्षो महादेवस्तपसा तोषितो मया
তখন বুদ্ধিমানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ বাসুদেব আবার বললেন—“আমি আমার তপস্যা দ্বারা স্বর্ণসম নয়নবিশিষ্ট মহাদেবকে সন্তুষ্ট করেছি।”
Verse 31
ततो5थ भगवानाह प्रीतो मां वै युधिष्ठिर । अर्थात् प्रियतर: कृष्ण मत्प्रसादाद् भविष्यसि
তখন প্রসন্ন হয়ে ভগবান আমাকে বললেন—“যুধিষ্ঠির! আমার প্রসাদে তুমি কৃষ্ণের কাছে আরও প্রিয় হয়ে উঠবে।”
Verse 32
एवं सहस्नशश्नान्यान् महादेवो वरं ददौ,“इस तरह महादेवजीने मुझे और भी सहस्रों वर दिये। पूर्वकालमें अन्य अवतारोंके समय मणिमन्थ पर्वतपर मैंने लाखों-करोड़ों वर्षोतक भगवान् शंकरकी आराधना की थी
এইভাবে মহাদেব আমাকে বর দিলেন, এবং তদ্রূপ আরও সহস্র সহস্র বরও প্রদান করলেন।
Verse 33
मणिमन्थे<थ शैले वै पुरा सम्पूजितो मया । वर्षायुतसहस्राणां सहस्नं शतमेव च
বৈশম্পায়ন বললেন—পূর্বকালে মণিমন্থ নামক পর্বতে আমি মহাদেবকে সম্পূর্ণ শ্রদ্ধায় পূজা করেছিলাম। সহস্র সহস্র বর্ষ, এমনকি লক্ষ বর্ষ পর্যন্তও আমি সেই উপাসনায় অবিচল ছিলাম।
Verse 34
ततो मां भगवान् प्रीत इदं वचनमत्रवीत् । वरं वृणीष्व भद्रें ते यस्ते मनसि वर्तते
তখন ভগবান প্রসন্ন হয়ে আমাকে বললেন—“তোমার মঙ্গল হোক। তোমার মনে যে বাসনা আছে, সেই বরই চাও।”
Verse 35
ततः प्रणम्य शिरसा इदं वचनमन्रुवम् । यदि प्रीतो महादेवो भक्त्या परमया प्रभु:
তখন আমি শির নত করে প্রণাম জানিয়ে বললাম—“যদি আমার পরম ভক্তিতে প্রভু মহাদেব প্রসন্ন হন, তবে হে ঈশান, আপনার প্রতি আমার ভক্তি যেন নিত্য-নিরন্তর অচল থাকে।” এ কথা বলে ভগবান শিব “এবমস্তু” বলে সেখানেই অন্তর্ধান করলেন।
Verse 36
नित्यकालं तवेशान भक्तिर्भवतु मे स्थिरा । एवमस्त्विति भगवांस्तत्रोक्त्वान्तरधीयत
“হে ঈশান, আপনার প্রতি আমার ভক্তি সর্বদা স্থির থাকুক।” ভগবান “এবমস্তু” বলে সেখানেই অন্তর্ধান করলেন।
Verse 37
जैगीषव्य उवाच ममाष्टगुणमैश्वर्य दत्त भगवता पुरा | यत्नेनान्येन बलिना वाराणस्यां युधिष्ठिर
জৈগীষব্য বললেন—“হে যুধিষ্ঠির, পূর্বকালে বারাণসীতে আমার এক ভিন্ন ও প্রবল তপস্যা-প্রচেষ্টায় প্রসন্ন হয়ে ভগবান শিব আমাকে অণিমা প্রভৃতি অষ্টবিধ ঐশ্বর্য-সিদ্ধি দান করেছিলেন।”
Verse 38
गर्ग उवाच चतुःषष्ट्यड्रमददत् कलाज्ञानं ममाद्भुतम् | सरस्वत्यास्तटे तुष्टो मनोयज्ञेन पाण्डव
গর্গ বললেন—হে পাণ্ডব! সরস্বতীর তীরে আমি মনে-মনে যজ্ঞ করে শর্ব (শিব)-কে প্রসন্ন করেছিলাম। তাতে সন্তুষ্ট হয়ে তিনি আমাকে চৌষট্টি কলার আশ্চর্য জ্ঞান দান করলেন।
Verse 39
तुल्यं मम सहस्र॑ तु सुतानां ब्रह्मवादिनाम् । आयुश्चैव सपुत्रस्य संवत्सरशतायुतम्
গর্গ বললেন—আমার সমান বিদ্যা ও মর্যাদাসম্পন্ন ব্রহ্মবাদী এক সহস্র পুত্র আমার আছে; আর পুত্রসমেত আমার আয়ু শত অযুত বর্ষ নির্ধারিত হয়েছে।
Verse 40
पराशर उवाच प्रसाद्येह पुरा शर्व मनसाचिन्तयं नृप । महातपा महातेजा महायोगी महायशा:
পরাশর বললেন—হে নরেশ্বর! পূর্বকালে এই স্থানেই আমি শর্ব (মহাদেব)-কে প্রসন্ন করে মনে-মনে তাঁর ধ্যান আরম্ভ করেছিলাম—এই কামনায় যে তাঁর কৃপায় আমার এক পুত্র হোক মহাতপস্বী, মহাতেজস্বী, মহাযোগী ও মহাযশস্বী।
Verse 41
वेदव्यास: श्रियावासो ब्राह्मण: करुणान्वित: । अप्यसावीप्सित: पुत्रो मम स्याद् वै महेश्वरात्
পরাশর বললেন—মহেশ্বরের কৃপায় সেই বেদব্যাস—শ্রীর আবাস, করুণাসম্পন্ন ব্রাহ্মণ—আমার অভীষ্ট পুত্র হোক।
Verse 42
इति मत्वा हृदि मतं प्राह मां सुरसत्तम: । मयि सम्भावना यास्या: फलात्कृष्णो भविष्यति
হৃদয়ে স্থির এই অভিপ্রায় জেনে দেবশ্রেষ্ঠ (শিব) আমাকে বললেন—“মুনে! আমার প্রতি তোমার যে শ্রদ্ধা-আকাঙ্ক্ষা, তারই ফলে তোমার ‘কৃষ্ণ’ নামে এক পুত্র হবে।”
Verse 43
प्रीतश्च भगवान् ज्ञानं ददौ मम भवान्तकम् | “तत्पश्चात् वहाँ सांख्यके आचार्य देवसम्मानित कपिलने कहा--“मैंने भी अनेक जन्मोंतक भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी आराधना की थी। इससे प्रसन्न होकर भगवानने मुझे भवभयनाशक ज्ञान प्रदान किया था”
বৈশম্পায়ন বললেন— প্রসন্ন হয়ে ভগবান আমাকে ভবভয়-নাশক জ্ঞান দান করলেন। তারপর দেবসম্মানিত সাংখ্যাচার্য কপিল বললেন— “আমিও বহু জন্ম ধরে ভক্তিভাবে ভগবান শঙ্করের আরাধনা করেছি। তাতে সন্তুষ্ট হয়ে ভগবান আমাকে সংসারভয়-ধ্বংসকারী জ্ঞান প্রদান করেছিলেন। সাবর্ণ মনুর সৃষ্টিচক্রে সে সপ্তর্ষিদের মধ্যে হবে; সে বেদের বক্তা এবং কুরু-বংশের প্রবর্তকও হবে।”
Verse 44
इतिहासस्य कर्ता च पुत्रस्ते जगतो हित: । भविष्यति महेन्द्रस्य दयित: स महामुनि:
পরাশর বললেন— তোমার পুত্র ইতিহাসের রচয়িতা এবং জগতের হিতকারী হবে। সেই মহামুনি মহেন্দ্র (ইন্দ্র)-এরও প্রিয় হবে।
Verse 45
अजरश्नामरश्वैव पराशर सुतस्तव । एवमुक्त्या स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत
পরাশর বললেন— “অজরাশ্ন ও অমরাশ্ব— এ দুজনই তোমার পুত্র, হে পরাশরের পুত্র।” এ কথা বলে সেই পূজ্য মহর্ষি সেখানেই অন্তর্ধান করলেন।
Verse 46
युधिष्ठिर महायोगी वीर्यवानक्षयोडव्यय: । 'सावर्णिक मन्वन्तरके समय जो सृष्टि होगी
মাণ্ডব্য বললেন— হে নরেশ্বর! আমি চোর ছিলাম না, তবু চুরির সন্দেহে আমাকে শূলে বিদ্ধ করা হয়েছিল। সেই স্থান থেকেই আমি মহাদেব শঙ্করের স্তব করলাম। তখন তিনি আমাকে বললেন— “হে শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণ! তুমি শূল থেকে মুক্ত হবে এবং দশ কোটি বছর জীবিত থাকবে। শূল শরীরে বিদ্ধ থাকলেও তোমার কোনো যন্ত্রণা হবে না; তুমি মানসিক দুঃখ ও শারীরিক ব্যাধি থেকে মুক্ত থাকবে।”
Verse 47
तत्रस्थेन स्तुतो देव: प्राह मां वै नरेश्वर । मोक्ष प्राप्स्यसि शूलाच्च जीविष्यसि समार्बुदम्
মাণ্ডব্য বললেন— হে নরেশ্বর! শূলে বিদ্ধ অবস্থায় আমি দেবের স্তব করেছিলাম। তখন সেই দেব আমাকে বললেন— “তুমি শূল থেকে মুক্ত হবে এবং দশ কোটি বছর জীবিত থাকবে।”
Verse 48
रुजा शूलकृता चैव न ते विप्र भविष्यति । आधिभिव्यधिभिश्रैव वर्जितस्त्वं भविष्यसि
মাণ্ডব্য বললেন—“হে বিপ্র! শূলের দ্বারা সৃষ্ট যন্ত্রণা তোমার হবে না; আর তুমি মানসিক ক্লেশ ও শারীরিক ব্যাধি—উভয় থেকেই মুক্ত থাকবে।”
Verse 49
पादाच्चतुर्थात् सम्भूत आत्मा यस्मान्मुने तव । त्वं भविष्यस्यनुपमो जन्म वै सफल॑ कुरु,“मुने! तुम्हारा यह शरीर धर्मके चौथे पाद सत्यसे उत्पन्न हुआ है। अतः तुम अनुपम सत्यवादी होओगे। जाओ, अपना जन्म सफल करो
“হে মুনি! তোমার আত্মা ধর্মের চতুর্থ পাদ—সত্য—থেকে উদ্ভূত; অতএব সত্যনিষ্ঠায় তুমি অতুলনীয় হবে। যাও, তোমার জন্ম সার্থক করো।”
Verse 50
तीर्थाभिषेक॑ सकल त्वमविध्नेन चाप्स्यसि । स्वर्ग चैवाक्षयं विप्र विदधामि तवोर्जितम्
“হে ব্রাহ্মণ! তুমি কোনো বিঘ্ন ছাড়াই সকল তীর্থে স্নানের সৌভাগ্য লাভ করবে; আর আমি তোমাকে অক্ষয়, দীপ্তিমান স্বর্গ দান করি।”
Verse 51
एवमुकक्त्वा तु भगवान् वरेण्यो वृषवाहन: । महेश्वरो महाराज कृत्तिवासा महाद्युति:
এই কথা বলে ভগবান্ শ্রেষ্ঠ, বৃষবাহন—মহেশ্বর, মহারাজ, কৃত্তিবাসা, মহাদ্যুতি—অগ্রসর হলেন।
Verse 52
गालव उवाच विश्वामित्रा भ्यनुज्ञातो हाहं पितरमागत:
গালব বললেন—“রাজন! বিশ্বামিত্রের অনুমতি পেয়ে আমি পিতাকে দর্শন করতে গৃহে এসেছি; কিন্তু হায়, বৎস! অনঘ! তোমার পিতা তোমাকে—এই তরুণ, সংযতেন্দ্রিয়—দেখতে পেলেন না।”
Verse 53
अब्रवीन्मां ततो माता दुःखिता रुदती भृशम् | कौशिकेनाभ्यनुज्ञातं पुत्र वेदविभूषितम्
তখন আমার মাতা গভীর শোকে আচ্ছন্ন হয়ে অঝোরে কাঁদতে কাঁদতে আমাকে বললেন— “বৎস, কৌশিক মুনি তোমাকে অনুমতি দিয়েছেন, আর তুমি বেদবিদ্যায় ভূষিত।”
Verse 54
श्रुत्वा जनन्या वचन निराशो गुरुदर्शने
মায়ের কথা শুনে গুরুদর্শনের আশা হারিয়ে আমি নিরাশ হয়ে পড়লাম।
Verse 55
नियतात्मा महादेवमपश्यं सो<ब्रवीच्च माम् | पिता माता च ते त्वं च पुत्र मृत्युविवर्जिता:
মন সংযত করে সে মহাদেবকে দর্শন করল; তখন তিনি আমাকে বললেন— “আমি তোমার পিতা ও মাতা; আর তুমি আমার পুত্র হবে— মৃত্যুহীন।”
Verse 56
भविष्यथ विश क्षिप्रं द्रष्टासि पितरं क्षये । माताकी बात सुनकर मैं पिताके दर्शनसे निराश हो गया और मनको संयममें रखकर महादेवजीकी आराधना करके उनका दर्शन किया। उस समय वे मुझसे बोले--“वत्स! तुम्हारे पिता
গালব বলল— “শীঘ্র গৃহে প্রবেশ কর; হতাশার অবসানে তুমি পিতাকে দর্শন করবে।” এ কথা শুনে আমি নিরাশা ত্যাগ করলাম, মন সংযত করে মহাদেবের আরাধনা করলাম এবং তাঁর দর্শন পেলাম। তখন ভগবান বললেন— “বৎস! তোমার পিতা, মাতা এবং তুমি— তিনজনেই মৃত্যুহীন হবে। এখন বিলম্ব না করে গৃহে প্রবেশ কর; সেখানে তুমি পিতাকে দেখতে পাবে।” ভগবান শিবের অনুমতি পেয়ে আমি গৃহে ফিরে যজ্ঞ করলাম এবং যজ্ঞশালা থেকে বেরিয়ে আসা পিতাকে দেখলাম— তিনি সমিধা, কুশ এবং গাছ থেকে আপনাআপনি ঝরে পড়া পাকা ফল প্রভৃতি হব্যদ্রব্য বহন করছিলেন।
Verse 57
अपश्य॑ पितरं तात इष्टिं कृत्वा विनि:सृतम् । उपस्पृश्य गृहीत्वेध्मं कुशांश्ष शरणाकुरून्
ইষ্টি সম্পন্ন করে যজ্ঞশালা থেকে বেরিয়ে আসতে আমি পিতাকে দেখলাম। তিনি আচমন করে সমিধা, কুশ এবং অন্যান্য যজ্ঞোপকরণ হাতে নিয়েছিলেন।
Verse 58
तान् विसृज्य च मां प्राह पिता सास्राविलेक्षण: । प्रणमन्तं परिष्वज्य मूर्ध्न्युपाप्राय पाण्डव
তাদের বিদায় দিয়ে আমার পিতা—অশ্রুসজল নয়নে—আমাকে বললেন। আমি প্রণাম করতেই তিনি আমাকে আলিঙ্গন করে, হে পাণ্ডুনন্দন, আমার মস্তকে চুম্বন করলেন।
Verse 59
वैशम्पायन उवाच एतान्यत्यदभुतान्येव कर्माण्यथ महात्मन:
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! ঋষিদের মুখে মহাত্মা মহাদেবের এই পরম আশ্চর্য কীর্তি শুনে ধর্মনিধি পাণ্ডুনন্দন যুধিষ্ঠির বিস্ময়ে অভিভূত হলেন। তারপর জ্ঞানীদের শ্রেষ্ঠ শ্রীকৃষ্ণ যুধিষ্ঠিরকে তেমনই বললেন, যেমন পুরুহূত দেবরাজ ইন্দ্রকে ভগবান বিষ্ণু উপদেশ দেন।
Verse 60
प्रोक्तानि मुनिभि: श्रुत्वा विस्मयामास पाण्डव: । ततः कृष्णो<ब्रवीद् वाक्य पुनर्मतिमतां वर:
মুনিদের বলা উপদেশ শুনে পাণ্ডব বিস্ময়ে অভিভূত হলেন। তখন জ্ঞানীদের শ্রেষ্ঠ কৃষ্ণ পুনরায় তাঁর সঙ্গে কথা বললেন।
Verse 61
वायुदेव उवाच उपमन्युर्मयि प्राह तपन्निव दिवाकर:
বায়ুদেব বললেন—তপস্যায় সূর্যের ন্যায় দীপ্ত উপমনু একবার আমার কাছে বলেছিল: “যারা পাপকর্ম করে মনকে কলুষিত করে—যাদের প্রবৃত্তি তমসিক বা রাজসিক—তারা ভগবান শিবের শরণ নেয় না।”
Verse 62
अशुभै: पापकर्माणो ये नरा: कलुषीकृता: । ईशान न प्रपद्यन्ते तमोराजसवृत्तय:
যে নররা অশুভ আচরণে পাপকর্মে লিপ্ত হয়ে কলুষিত হয়েছে—যাদের প্রবৃত্তি তমসিক বা রাজসিক—তারা ঈশান (ভগবান শিব)-এর শরণ নেয় না।
Verse 63
ईश्वरं सम्प्रपद्यन्ते द्विजा भावितभावना: । सर्वथा वर्तमानो5पि यो भक्त: परमेश्वरे
বায়ু বললেন—যাঁদের অন্তঃকরণ সাধিত ও সংযত, সেই দ্বিজেরা ঈশ্বরের শরণ নেন। আর যে ব্যক্তি যে-কোনো অবস্থায় বাস করুক না কেন, যদি সে পরমেশ্বরের ভক্ত হয়, তবে সে-ই পরম কল্যাণে প্রতিষ্ঠিত।
Verse 64
सदृशो<5रण्यवासीनां मुनीनां भावितात्मनाम् | “जिनका अन्त:ःकरण पवित्र है, वे ही द्विज महादेवजीकी शरण लेते हैं। जो परमेश्वर शिवका भका है, वह सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी पवित्र अन्तःकरणवाले वनवासी मुनियोंके समान है || ६३ $ ।।
সে পবিত্রচিত্ত অরণ্যবাসী মুনিদেরই সদৃশ। সে ব্রহ্মত্ব লাভ করুক, কেশবত্ব লাভ করুক, অথবা দেবগণের সঙ্গে শক্রত্ব—
Verse 65
मनसापि शिवं तात ये प्रपद्यन्ति मानवा:,विधूय सर्वपापानि देवै: सह वसन्ति ते । “तात! जो मनुष्य मनसे भी भगवान् शिवकी शरण लेते हैं, वे सब पापोंका नाश करके देवताओंके साथ निवास करते हैं
বায়ু বললেন—হে তাত! যে মানুষ কেবল মন দিয়েই ভগবান শিবের শরণ নেয়, সে সমস্ত পাপ ঝেড়ে ফেলে দেবতাদের সঙ্গে বাস করে।
Verse 66
भित्त्वा भित्त्वा च कूलानि हुत्वा सर्वमिदं जगत्
বারবার তীরবাঁধ ভেঙে, আর এই সমগ্র জগতকে যেন আহুতি করে গ্রাস করে ফেলা।
Verse 67
यजेद् देवं विरूपाक्षं न स पापेन लिप्यते । “बारंबार तालाबके तटभूमिको खोद-खोदकर उन्हें चौपट कर देनेवाला और इस सारे जगत्को जलती आगमें झोंक देनेवाला पुरुष भी यदि महादेवजीकी आराधना करता है तो वह पापसे लिप्त नहीं होता है ।।
যে ব্যক্তি দেব বিরূপাক্ষ (মহাদেব)-এর পূজা করে, সে পাপে লিপ্ত হয় না। সে সকল শুভলক্ষণহীন হোক, কিংবা সর্বপ্রকার পাতিক্যে আবদ্ধ হোক—মহাদেব-আরাধনায় যুক্ত থাকলে সে কলুষিত হয় না।
Verse 68
कीटपक्षिपतड्ानां तिरश्षामपि केशव
বায়ু বললেন— “হে কেশব! কীট, পক্ষী ও পতঙ্গদের মধ্যেও—এমনকি তির্যক্-যোনির প্রাণীদের মধ্যেও—ধর্মের বিধান কার্যকর থাকে।”
Verse 69
महादेवप्रपन्नानां न भयं विद्यते क्वचित् । “केशव! कीट, पतंग, पक्षी तथा पशु भी यदि महादेवजीकी शरणमें आ जाया तो उन्हें भी कहीं किसीका भय नहीं प्राप्त होता है ।।
বায়ুদেব বললেন— “যারা মহাদেবের শরণ নিয়েছে, তাদের কোথাও ভয় থাকে না। হে কেশব! কীট, পতঙ্গ, পক্ষী ও পশুও যদি মহাদেবের আশ্রয়ে আসে, তবে কারও পক্ষ থেকে তাদের কাছে ভয় পৌঁছায় না। তেমনি এই পৃথিবীতে যারা মহাদেবভক্ত মানব, তারা সংসারবন্ধনে আবদ্ধ হয় না—এ আমার স্থির বিশ্বাস।” এরপর ভগবান শ্রীকৃষ্ণ স্বয়ং ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠিরকে বললেন—
Verse 70
न ते संसारवशगा इति मे निश्चिता मति: । ततः कृष्णो<ब्रवीद् वाक््यं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्
“তারা সংসারের বশবর্তী নয়”—এ আমার স্থির মত। তখন কৃষ্ণ ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠিরকে বললেন।
Verse 71
विष्णुरुवाच आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च द्यौर्भूमिरापो वसवो<थ विश्वे । धातार्यमा शुक्रबृूहस्पती च रुद्रा: ससाध्या वरुणो5थगोप:
বিষ্ণু বললেন— “সূর্য ও চন্দ্র, বায়ু ও অগ্নি; স্বর্গ ও পৃথিবী; জল; বসুগণ ও বিশ্বদেবগণ; ধাতা ও আর্যমান; শুক্র ও বৃহস্পতি; সাধ্যগণসহ রুদ্রগণ; এবং বরুণ ও লোকপাল—এ সকল দেবশক্তিকে মহাদেব থেকেই উদ্ভূত বলে জেনো।”
Verse 72
ब्रह्मा शक्रो मारुतो ब्रह्म सत्यं वेदा यज्ञा दक्षिणा वेदवाहा: । सोमो यष्टा यच्च हव्यं हविश्व रक्षा दीक्षा संयमा ये च केचित्
বায়ুদেব বললেন— “ব্রহ্মা, ইন্দ্র এবং আমি (মারুত/বায়ু); ব্রহ্ম ও সত্য; বেদ, যজ্ঞ ও দক্ষিণা; বেদবাহকগণ; সোম; যজমান; যা হব্য এবং যা হবি; রক্ষা, দীক্ষা এবং যত প্রকার সংযম—এ সবই মহাদেবের আশ্রয়ে প্রতিষ্ঠিত, জেনে রাখো।”
Verse 73
स्वाहा वौषट ब्राह्मणा: सौरभेयी धर्म चाग्रयं कालचक्रं बल॑ च | यशो दमो बुद्धिमतां स्थितिश्न शुभाशुभं ये मुनयश्न सप्त
বায়ু বললেন— যজ্ঞবিধানে ‘স্বাহা’ ও ‘বৌষট্’, ব্রাহ্মণগণ, সৌরভেয়ী গাভী, শ্রেষ্ঠ ধর্ম, কালের চক্র এবং বল আছে। তদ্রূপ যশ, দম, জ্ঞানীদের স্থিতি, শুভ-অশুভ কর্মফল এবং সপ্তর্ষিও আছে। এ সকলকে—এবং পূর্বে উল্লিখিত নানাবিধ দিব্য তত্ত্বকেও—মহাদেব-উদ্ভূত বলে জেনো।
Verse 74
अग्रया बुद्धिर्मनसा दर्शने च स्पर्शक्षाग्रय: कर्मणां या च सिद्धि: । गणा देवानामूष्मपा: सोमपाश्न लेखा: सुयामास्तुषिता ब्रह्मुकाया:
বায়ুদেব বললেন— অন্তঃশক্তিসমূহের মধ্যে বুদ্ধি ও মন, এবং দর্শন ও স্পর্শের শক্তি শ্রেষ্ঠ; আর কর্মের সেই সিদ্ধিও শ্রেষ্ঠ, যার দ্বারা কর্ম অভীষ্ট পরিণতিতে পৌঁছে। দেবগণের মধ্যে ঊষ্মপ, সোমপ, লেখ, সুয়াম, তুষিত এবং ব্রহ্মকায় নামে শ্রেণিও আছে।
Verse 75
आभासुरा गन्धपा धूमपाश्च वाचा विरुद्धाश्ष मनोविरुद्धा: । शुद्धाश्न निर्माणरताश्च देवा: स्पर्शाशना दर्शपा आज्यपाक्ष
বায়ু বললেন— কিছু দীপ্তিমান দেবগণ গন্ধ ও ধোঁয়া ‘পান’ করেন। আবার এমনও কিছু আছেন, যাঁদের অবস্থা সাধারণ বাক্যের বিরুদ্ধ এবং সাধারণ মনেরও বিরুদ্ধ। কিছু শুদ্ধ দেব সৃষ্টিনির্মাণের কাজে রত। কেউ স্পর্শমাত্রে আহার করেন, কেউ দর্শনমাত্রে পানীয় রস পান করেন, আর কেউ ঘৃত পান করেন।
Verse 76
चिन्त्यद्योता ये च देवेषु मुख्या ये चाप्यन्ये देवताश्नाजमीढ । सुपर्णगन्धर्वपिशाचदानवा यक्षास्तथा चारणपन्नगाश्ष
বায়ু বললেন— হে অজমীঢ়! দেবতাদের মধ্যে যাঁরা প্রধান দীপ্তিমান, এবং অন্যান্য দেবতাগণও; তদ্রূপ সুপর্ণ, গন্ধর্ব, পিশাচ, দানব, যক্ষ, চারণ ও নাগ—এ সকলকে মহাদেব-উদ্ভূত বলে জেনো।
Verse 77
स्थूलं सूक्ष्मं मृदु चाप्यसूक्ष्मं दुःखं सुखं दुःखमनन्तरं च । सांख्य॑ योगं तत्पराणां परं च शर्वाज्जातं विद्धि यत् कीर्तितं मे
বায়ু বললেন— স্থূল ও সূক্ষ্ম, কোমল ও অসূক্ষ্ম; দুঃখ ও সুখ, এবং তার পরবর্তী দুঃখও; সাংখ্য ও যোগ, এবং তাতে নিবিষ্টদের পরম লক্ষ্যও—আমি যা কীর্তন করেছি, তা সকলই শর্ব (শিব) থেকে উৎপন্ন বলে জেনো।
Verse 78
तत्सम्भूता भूतकृतो वरेण्या: सर्वे देवा भुवनस्यास्य गोपा: । आविश्येमां धरणीं ये5भ्यरक्षन् पुरातनीं तस्य देवस्य सृष्टिम्
ভূতস্রষ্টার সেই পরম বর থেকে উৎপন্ন, পূজনীয় ও শ্রেষ্ঠ সকল দেবতা এই জগতের প্রহরী হলেন। তাঁরা এই পৃথিবীতে প্রবেশ করে সেই দেবের প্রাচীন সৃষ্টিকে রক্ষা করলেন এবং লোক-ব্যবস্থাকে অক্ষুণ্ণ রাখলেন।
Verse 79
जो इस भूतलमें प्रवेश करके महादेवजीकी पूर्वकृत सृष्टिकी रक्षा करते हैं, जो समस्त जगतके रक्षक, विभिन्न प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले और श्रेष्ठ हैं, वे सम्पूर्ण देवता भगवान् शिवसे ही प्रकट हुए हैं ।।
বায়ু বললেন—যাঁরা এই ভূতলে প্রবেশ করে মহাদেবের পূর্বকৃত সৃষ্টিকে রক্ষা করেন, যাঁরা সমগ্র জগতের রক্ষক, নানাবিধ প্রাণীর স্রষ্টা এবং শ্রেষ্ঠ—সেই সকল দেবতা কেবল ভগবান শিব থেকেই প্রকাশিত। তপস্যার দ্বারা সেই অধিক গভীর ও স্থিত তত্ত্ব অন্বেষণ করতে করতে, প্রাণরক্ষার্থ আমি প্রণাম করি। আমাদের দ্বারা স্তূত, চিরঅব্যয় প্রভু সেই দেব এখানে আমাদের অভীষ্ট বর দান করুন।
Verse 80
ऋषि-मुनि तपस्याद्वारा जिसका अन्वेषण करते हैं, उस सदा स्थिर रहनेवाले अनिर्वचनीय परम सूक्ष्म तत्त्वस्वरूप सदाशिवको मैं जीवन-रक्षाके लिये नमस्कार करता हूँ। जिन अविनाशी प्रभुकी मेरे द्वारा सदा ही स्तुति की गयी है, वे महादेव यहाँ मुझे अभीष्ट वरदान दें ।।
বায়ু বললেন—ঋষি-মুনিরা তপস্যার দ্বারা যাঁর অনুসন্ধান করেন, সেই চিরস্থির, অনির্বচনীয়, পরম সূক্ষ্ম তত্ত্বরূপ সদাশিবকে আমি প্রাণরক্ষার্থ প্রণাম করি। যাঁকে আমি সর্বদা স্তব করেছি, সেই অবিনাশী প্রভু মহাদেব এখানে আমাকে অভীষ্ট বর দিন। যে ব্যক্তি ইন্দ্রিয় সংযম করে পবিত্র হয়ে এই স্তোত্র পাঠ করবে এবং নিয়মসহ এক মাস অবিচ্ছিন্নভাবে সাধনা চালিয়ে যাবে, সে অশ্বমেধ যজ্ঞের সমতুল্য ফল লাভ করবে।
Verse 81
वेदान् कृत्स्नान् ब्राह्मण: प्राप्तुयात् तु जयेन्नूप: पार्थ महीं च कृत्स्नाम् । वैश्यो लाभ प्राप्त॒यान्नैपुणं च शूद्रो गतिं प्रेत्य तथा सुखं च
বায়ু বললেন—কুন্তীনন্দন! এর পাঠে ব্রাহ্মণ সমস্ত বেদের স্বাধ্যায়ের পূর্ণ ফল লাভ করে। ক্ষত্রিয়—হে পার্থ—সমগ্র পৃথিবীতে বিজয় অর্জন করে। বৈশ্য বাণিজ্যে দক্ষতা ও মহালাভ পায়। আর শূদ্র ইহলোকে সুখ এবং মৃত্যুর পরে পরলোকে সদ্গতি লাভ করে।
Verse 82
स्तवराजमिमं कृत्वा रुद्राय दघधिरे मन: । सर्वदोषापहं पुण्यं पवित्रं च यशस्विन:
বায়ু বললেন—যাঁরা রুদ্রের উদ্দেশ্যে এই স্তবরাজ পাঠ করে মনকে তাঁর ধ্যানে স্থির করেন, তাঁরা যশস্বী হন। এই পবিত্র ও পুণ্যদায়ক স্তবরাজ সর্বদোষনাশক এবং পাঠককে শুদ্ধ করে।
Verse 83
यावन्त्यस्य शरीरेषु रोमकूपाणि भारत । तावन्त्यब्दसहस््राणि स्वर्गे वसति मानव:
বায়ুদেব বললেন—হে ভারত! মানুষের দেহে যত রোমকূপ আছে, এই স্তোত্র যে পাঠ করে, সে তত সহস্র বছর স্বর্গে বাস করে।
Verse 131
इसके बाद भगवान् वाल्मीकिने राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा--'भारत! एक समय अन्निहोत्री मुनियोंके साथ मेरा विवाद हो रहा था। उस समय उन्होंने कुपित होकर मुझे शाप दे दिया कि “तुम ब्रह्महत्यारे हो जाओ।” उनके इतना कहते ही मैं क्षणभरमें उस अधर्मसे व्याप्त हो गया। तब मैं पापरहित एवं अमोघ शक्तिवाले भगवान् शंकरकी शरणमें गया। इससे मैं उस पापसे मुक्त हो गया। फिर उन दुःखनाशन त्रिपुरहन्ता रुद्रने मुझसे कहा -- तुम्हें सर्वश्रेष्ठ सुयश प्राप्त होगा” ।। जामदग्न्यश्न कौन्तेयमिदं धर्मभूतां वर: । ऋषिमध्ये स्थित: प्राह ज्वलन्निव दिवाकर:
তখন জামদগ্ন্য (পরশুরাম)—ধর্মরক্ষকদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—ঋষিদের মাঝে দাঁড়িয়ে, সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান হয়ে, কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠিরকে বললেন।
Verse 313
अपराजितश्न युद्धेषु तेजश्ैवानलोपमम् । “युधिष्ठिर! तब भगवान् शिवने मुझसे प्रसन्नता-पूर्वक कहा--'श्रीकृष्ण! तुम मेरी कृपासे प्रिय पदार्थोकी अपेक्षा भी अत्यन्त प्रिय होओगे। युद्धमें तुम्हारी कभी पराजय नहीं होगी तथा तुम्हें अग्निके समान दुस्सह तेजकी प्राप्ति होगी”
“যুদ্ধে তুমি অপরাজিত থাকবে, আর অগ্নির ন্যায় অসহনীয় তেজ লাভ করবে।”
Verse 513
सगणो दैवतश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीयत । महाराज! ऐसा कहकर कृत्तिवासा, महातेजस्वी, वृषभवाहन तथा वरणीय सुरश्रेष्ठ भगवान् महेश्वर अपने गणोंके साथ वहीं अन्तर्धान हो गये
এ কথা বলে দেবশ্রেষ্ঠ মহেশ্বর তাঁর গণসমেত সেখানেই অন্তর্ধান করলেন।
Verse 536
न तात तरुण दान्तं पिता त्वां पश्यतेडनघ । गालवजीने कहा--राजन! विश्वामित्र मुनिकी आज्ञा पाकर मैं अपने पिताजीका दर्शन करनेके लिये घरपर आया। उस समय मेरी माता वैधव्यके दुःखसे दुःखी हो जोर-जोरसे रोती हुई मुझसे बोली--'तात! अनघ! कौशिक मुनिकी आज्ञा लेकर घरपर आये हुए वेदविद्यासे विभूषित तुझ तरुण एवं जितेन्द्रिय पुत्रको तुम्हारे पिता नहीं देख सके'
“বৎস! অনঘ! কৌশিক মুনির আজ্ঞা পেয়ে ফিরে আসা, বেদবিদ্যায় ভূষিত, তরুণ ও জিতেন্দ্রিয় তোমাকে তোমার পিতা দেখতে পারলেন না।”
Verse 583
दिष्ट्या दृष्टोडसि मे पुत्र कृतविद्य इहागत: । पाण्डुनन्दन! उन्हें देखते ही मैं उनके चरणोंमें पड़ गया; फिर पिताजीने भी उन समिधा आदि वस्तुओंको अलग रखकर मुझे हृदयसे लगा लिया और मेरा मस्तक सूँघकर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए मुझसे कहा--“बेटा! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम विद्वान होकर घर आ गये और मैंने तुम्हें भर आँख देख लिया”
গালব বললেন— “সৌভাগ্যবশত, হে পুত্র! বিদ্যা সম্পূর্ণ করে তুমি গৃহে ফিরে এসেছ, আর আমি তোমাকে দেখেছি। হে পাণ্ডুনন্দন! তাঁদের দেখামাত্রই আমি তাঁদের চরণে লুটিয়ে পড়লাম। তখন আমার পিতা সমিধা প্রভৃতি যজ্ঞসামগ্রী এক পাশে রেখে আমাকে হৃদয় দিয়ে আলিঙ্গন করলেন, স্নেহে আমার মস্তক শুঁকে নিলেন, অশ্রুসজল নয়নে বললেন— ‘বৎস! কত বড় সৌভাগ্য যে তুমি বিদ্বান হয়ে ফিরে এলে, আর আমি নিজের চোখে তোমাকে পরিপূর্ণভাবে দেখতে পেলাম।’”
Verse 603
युधिष्टिरं धर्मनिरधि पुरुहृतमिवेश्वर: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मुनियोंके कहे हुए महादेवजीके ये अद्भुत चरित्र सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको बड़ा विस्मय हुआ। फिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने धर्मनिधि युधिष्ठिरसे उसी प्रकार कहा जैसे श्रीविष्णु देवराज इन्द्रसे कोई बात कहा करते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন— “হে জনমেজয়! ঋষিদের মুখে মহাদেবের এই আশ্চর্য কীর্তি শুনে পাণ্ডুনন্দন, ধর্মনিধি যুধিষ্ঠির মহাবিস্ময়ে অভিভূত হলেন। তারপর জ্ঞানীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ শ্রীকৃষ্ণ ধর্মনিধি যুধিষ্ঠিরকে সেইভাবেই সম্বোধন করলেন, যেমন শ্রীবিষ্ণু দেবরাজ ইন্দ্রকে কথা বলেন বলে শোনা যায়।”
Verse 643
त्रैलोक्यस्याधिपत्यं वा तुष्टो रुद्र: प्रयच्छति । “भगवान् रुद्र संतुष्ट हो जायँ तो वे ब्रह्मपद, विष्णुपद, देवताओंसहित देवेन्द्रपद अथवा तीनों लोकोंका आधिपत्य प्रदान कर सकते हैं
বায়ু বললেন— “রুদ্র সন্তুষ্ট হলে তিনি ত্রিলোকের অধিপত্যও দান করতে পারেন। ভগবান রুদ্র প্রসন্ন হলে তিনি ব্রহ্মপদ, বিষ্ণুপদ, দেবসমেত দেবেন্দ্রপদ কিংবা তিন লোকের সার্বভৌমত্ব প্রদান করতে সক্ষম।”
Verse 676
सर्व तुदति तत्पापं भावयज्छिवमात्मना । “समस्त लक्षणोंसे हीन अथवा सब पापोंसे युक्त मनुष्य भी यदि अपने हृदयसे भगवान् शिवका ध्यान करता है तो वह अपने सारे पापोंको नष्ट कर देता है
বায়ু বললেন— “যে পাপ মানুষকে সর্বভাবে দগ্ধ করে, অন্তঃকরণ দিয়ে শিবকে ভাবলে তা নষ্ট হয়। সকল শুভলক্ষণহীন কিংবা বহু পাপে ভারাক্রান্ত মানুষও যদি হৃদয় থেকে ভগবান শিবের ধ্যান করে, তবে সে নিজের সমস্ত পাপ দগ্ধ করে ফেলে।”
Verse 1636
तत्प्रसादान्मया प्राप्तं ब्राह्मुण्यं दुर्लभ महत् | तदनन्तर विश्वामित्रजीने कहा
বিশ্বামিত্র বললেন— “তাঁর কৃপায় আমি মহান ও অতি দুর্লভ ব্রাহ্মণ্য লাভ করেছি। রাজন! যখন আমি ক্ষত্রিয় ছিলাম, তখনই আমার মনে দৃঢ় সংকল্প জাগে— আমি ব্রাহ্মণ হব; সেই উদ্দেশ্যে আমি ভগবান শঙ্করের আরাধনা করি, আর তাঁর অনুগ্রহে এই দুষ্প্রাপ্য ব্রাহ্মণত্ব অর্জন করি।”
The dilemma is whether an ascetic may consent to an invitation framed as sexual/romantic engagement within a wealthy divine setting; Aṣṭāvakra treats it as a dharma-violating proposition when it implicates para-dāra (approaching another’s spouse).
Ethical integrity is demonstrated through consistency of practice—ritual discipline, controlled senses, and principled refusal—showing that dharma is maintained not by isolation from temptation but by regulated response to it.
No explicit phalaśruti appears in the provided excerpt; the chapter functions as exemplum (illustrative narrative) within Bhīṣma’s instruction, embedding its ‘result’ implicitly as moral clarity and purification through restraint and proper observance.