Adhyaya 2
Anushasana ParvaAdhyaya 2102 Verses

Adhyaya 2

Chapter 2: Sudarśana Upākhyāna — Atithi-Dharma and the Conquest of Mṛtyu (Gṛhastha-Vrata)

Upa-parva: Ātithi-Dharma and Gṛhastha-Vrata Episode (Sudārśana Upākhyāna)

Yudhiṣṭhira requests further instruction that integrates Dharma with practical welfare, asking specifically how a householder can overcome death through righteous conduct. Bhīṣma responds by introducing an ancient exemplum. A lineage narrative culminates in King Duryodhana of Māhiṣmatī, whose daughter Sudarśanā is sought by Agni (in brāhmaṇa guise); after ritual disruption and disclosure, the marriage is granted, and their son Sudarśana is born. Sudarśana marries Oghavatī and undertakes a vow centered on hospitality: no guest is to be opposed, and satisfaction of the atithi is paramount. Mṛtyu follows Sudarśana, searching for a moral breach. When Sudarśana is away gathering fuel, a brāhmaṇa-guest arrives and requests hospitality that culminates in a demand for Oghavatī’s self-gift; she assents, remembering her husband’s prior command regarding guests. On Sudarśana’s return, the guest explains the situation; Sudarśana affirms atithi-pūjā as the highest gṛhastha-dharma, reiterates his vow that life, spouse, and wealth are for guests, and seals it with a satya-assertion (truth-act). A cosmic affirmation follows; the guest reveals himself as Dharma, declares that Mṛtyu has been subdued by Sudarśana’s steadfastness, and praises Oghavatī’s pativratā integrity. The chapter closes with Bhīṣma’s concluding maxim: for the householder, no deity is higher than the guest, and recitation of Sudarśana’s conduct is presented as merit-yielding (phalāśruti).

Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह से पुनः धर्म-अर्थ से संयुक्त एक विशेष रहस्य पूछते हैं—किस गृहस्थ ने केवल धर्म के आश्रय से मृत्यु को जीत लिया? → भीष्म प्रजापति-मनु-वंश की पृष्ठभूमि रखते हुए ‘अतिथि-सत्कार’ को गृहस्थ-धर्म का मेरुदण्ड बताते हैं और एक ऐसे गृहस्थ की कथा छेड़ते हैं जहाँ अतिथि स्वयं मृत्यु-रूप में परीक्षा लेने आता है। → अतिथि (मृत्यु-स्वरूप) पत्नी को स्पर्श कर भी उसकी पतिव्रता-निष्ठा और अतिथि-सत्कार से बँध जाता है; वह स्वीकार करता है कि तुम्हारी पत्नी के सत्कार-धर्म ने मुझे पराजित कर दिया—मैं इन्हीं अतिथि-सत्कारों से ‘वृता’ (वश) हो गया। → धर्म-पालन का फल तत्काल सामाजिक-राज्य-कल्याण के रूप में दिखता है—राज्य में समय पर वर्षा, समृद्धि, रत्न-धन-धान्य की वृद्धि, और प्रजा में रोग-दैन्य का अभाव; कथा यह स्थापित करती है कि गृहस्थ का अतिथि-धर्म मृत्यु-भय तक को क्षीण कर देता है। → अग्निदेव का आकर्षण और गर्भाधान का संकेत देकर कथा आगे के परिणामों (संतान/वंश-प्रभाव और धर्म-फल की विस्तृत परिणति) की ओर मोड़ देती है।

Shlokas

Verse 1

अत-४#-क+ द्वितीयो<5्ध्याय: प्रजापति मनुके वंशका वर्णन

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! আপনি মহাপ্রাজ্ঞ, সর্বশাস্ত্রে বিশারদ, বুদ্ধিমানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ। এই মহান উপাখ্যান আমি গভীর মনোযোগে শুনেছি।

Verse 2

भूयस्तु श्रोतुमिच्छामि धर्मार्थसहितं नृप । कथ्यमानं त्वया किज्चित्‌ तन्मे व्याख्यातुमहसि

যুধিষ্ঠির বললেন— হে নৃপ! আমি আবারও ধর্ম ও অর্থসমন্বিত আরও কিছু উপদেশ আপনার মুখে শুনতে চাই। আপনি যা বলছেন, তা অনুগ্রহ করে আমাকে বিস্তারে ব্যাখ্যা করুন।

Verse 3

केन मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जित: । इत्येतत्‌ सर्वमाचक्ष्व तत्त्वेनापि च पार्थिव,भूपाल! किस गृहस्थने केवल धर्मका आश्रय लेकर मृत्युपर विजय पायी है? यह सब बातें आप यथार्थरूपसे कहिये

যুধিষ্ঠির বললেন— হে ভূপাল! কোন গৃহস্থ কেবল ধর্মের আশ্রয় নিয়ে মৃত্যুকে জয় করেছিল? হে পার্থিব! সত্যতত্ত্ব অনুসারে এ সবই আমাকে বলুন।

Verse 4

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । यथा मृत्युर्गहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जित:

ভীষ্ম বললেন— রাজন! এখানেও এক প্রাচীন ইতিহাসের দৃষ্টান্ত বলা হয়— কীভাবে এক গৃহস্থ ধর্মের আশ্রয় নিয়ে মৃত্যুকে জয় করেছিল।

Verse 5

मनो: प्रजापते राजन्निक्ष्वाकुरभवत्‌ सुतः । तस्य पुत्रशतं जज्ञे नपते: सूर्यवर्चस:

ভীষ্ম বললেন— হে নরেশ্বর! প্রজাপতি মনুর এক পুত্র জন্মাল, তার নাম ইক্ষ্বাকু। সূর্যের ন্যায় তেজস্বী সেই রাজা ইক্ষ্বাকুর একশো পুত্র জন্মেছিল।

Verse 6

दशमस्तस्य पुत्रस्तु दशाश्वो नाम भारत | माहिष्मत्यामभूद्‌ राजा धर्मात्मा सत्यविक्रम:,भारत! उनमेंसे दसवें पुत्रका नाम दशाश्व था जो माहिष्मतीपुरीमें राज्य करता था। वह बड़ा ही धर्मात्मा और सत्यपराक्रमी था

ভীষ্ম বললেন— হে ভারত! তাঁর দশম পুত্রের নাম ছিল দশাশ্ব। তিনি মাহিষ্মতীতে রাজা হন—ধর্মপরায়ণ এবং সত্যে পরাক্রমশালী।

Verse 7

दशाश्वस्य सुतस्त्वासीदू राजा परमधार्मिक: । सत्ये तपसि दाने च यस्य नित्यं रतं मन:

ভীষ্ম বললেন—তুমি দশাশ্বের পুত্র ছিলে এবং পরম ধার্মিক রাজা হয়েছিলে। তোমার মন সর্বদা সত্য, তপস্যা ও দানে নিবিষ্ট থাকত।

Verse 8

दशाश्वका पुत्र भी बड़ा धर्मात्मा राजा था। उसका मन सदा सत्य, तपस्या और दानमें ही लगा रहता था ।।

ভীষ্ম বললেন—এই পৃথিবীতে মদিরাশ্ব নামে এক রাজা প্রসিদ্ধ ছিলেন। তিনি সর্বদা বেদ ও ধনুর্বেদের সাধনায় নিবিষ্ট থাকতেন।

Verse 9

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गौतमी ब्राह्मणी; व्याध

বৈশম্পায়ন বললেন—মদিরাশ্বের পুত্র ‘দ্যুতিমান্’ নামে প্রসিদ্ধ রাজা হলেন—অতিশয় ভাগ্যবান, মহাতেজস্বী, মহাসত্ত্ববান ও মহাবলী।

Verse 10

पुत्रो द्युतिमतस्त्वासीदू राजा परमधार्मिक: । सर्वलोकेषु विख्यात: सुवीरो नाम नामत:

ভীষ্ম বললেন—দ্যুতিমানের এক পুত্র ছিল, যে পরম ধার্মিক রাজা হয়েছিল। সে সর্বলোকেই প্রসিদ্ধ; নাম ছিল সুভীর।

Verse 11

सुवीरस्य तु पुत्रो$भूत्‌ सर्वसंग्रामदुर्जय:

ভীষ্ম বললেন—সুভীরের এক পুত্র জন্মাল, যে সকল যুদ্ধে অজেয় ছিল।

Verse 12

दुर्जयस्येन्द्रवपुष: पुत्रोडश्चिसदृशद्युति:

ভীষ্ম বললেন—যিনি অজেয় এবং ইন্দ্রসদৃশ রূপধারী ছিলেন, তাঁর দশম এক পুত্রও ছিল, যে তাঁরই সমতুল্য দীপ্তিতে দীপ্যমান।

Verse 13

तस्येन्द्रसमवीर्यस्य संग्रामेष्वनिवर्तिन:

ভীষ্ম বললেন—যাঁর বীর্য ইন্দ্রসম ছিল, তিনি যুদ্ধে কখনও পশ্চাদপসরণ করতেন না।

Verse 14

रत्नैर्थनैश्व पशुभि: सस्यैश्वापि पृथग्विधै:

ভীষ্ম বললেন—রত্নে, ধনে, পশুতে, এবং নানাবিধ শস্যেও…

Verse 15

नगरं विषयश्चास्य प्रतिपूर्णस्तदा भवत्‌ | उनका नगर और राज्य रत्न, धन, पशु तथा भाँति-भाँतिके धान्योंसे उन दिनों भरा-पूरा रहता था ।। न तस्य विषये चाभूत्‌ कृपणो नापि दुर्गतः

ভীষ্ম বললেন—সেই সময়ে তার নগর ও সমগ্র রাজ্য সম্পদে পরিপূর্ণ ছিল। তার অধীনে না ছিল কোনো কৃপণ, না ছিল কোনো দুর্দশাগ্রস্ত বা দরিদ্র।

Verse 16

सुदक्षिणो मधुरवागनसूयुर्जितिन्द्रिय: । धर्मात्मा चानृशंसश्न विक्रान्तो5<थाविकत्थन:

ভীষ্ম বললেন—সেই রাজা ছিলেন অতিশয় দানশীল, মধুরভাষী, দোষান্বেষণহীন, ইন্দ্রিয়জয়ী, ধর্মাত্মা, করুণাশীল ও বীর; আর তিনি কখনও আত্মপ্রশংসায় মত্ত হতেন না।

Verse 17

यज्वा च दान्तो मेधावी ब्रह्माण्य: सत्यसड्र: | न चावमन्ता दाता च वेदवेदाड़्रपारग:

ভীষ্ম বললেন— তিনি যজ্ঞকারী, সংযত ও বুদ্ধিমান ছিলেন; ব্রাহ্মণভক্ত এবং সত্যে অবিচল। তিনি কাউকে অপমান করতেন না, দানে উদার ছিলেন এবং বেদ ও বেদাঙ্গে সম্পূর্ণ পারদর্শী ছিলেন।

Verse 18

त॑ नर्मदा देवनदी पुण्या शीतजला शिवा । चकमे पुरुषव्याप्रं स्वेन भावेन भारत,भारत! एक समय शीतल जलवाली पवित्र एवं कल्याणमयी देवनदी नर्मदा उस पुरुषसिंहको सम्पूर्ण हृदयसे चाहने लगी और उसकी पत्नी बन गयी

ভীষ্ম বললেন— হে ভারত! পুণ্য, শীতলজলধারা ও মঙ্গলময় দেবনদী নর্মদা স্বভাবতই হৃদয়ভরে সেই পুরুষব্যাঘ্রকে কামনা করলেন এবং কালে তাঁকে স্বামী রূপে গ্রহণ করলেন।

Verse 19

तस्यां जज्ञे तदा नद्यां कन्या राजीवलोचना । नाम्ना सुदर्शना राजन्‌ रूपेण च सुदर्शना

ভীষ্ম বললেন— হে রাজন! সেই নদীতেই তখন পদ্মনয়না এক কন্যার জন্ম হল। নাম ছিল সুদর্শনা, আর রূপেও সে সত্যিই ‘সুদর্শনা’—দর্শনীয় ও মঙ্গলময়ী।

Verse 20

राजन! उस नदीके गर्भसे राजाके द्वारा एक कमललोचना कन्या उत्पन्न हुई जो नामसे तो सुदर्शना थी ही, रूपसे भी सुदर्शना (सुन्दर एवं दर्शनीय) थी ।।

ভীষ্ম বললেন— হে রাজন! সেই নদীর গর্ভ থেকে, রাজার নিমিত্তে, পদ্মনয়না এক কন্যা জন্মাল। নাম সুদর্শনা, আর রূপেও সে সুদর্শনা—সুন্দর ও দর্শনীয়। হে যুধিষ্ঠির! নারীদের মধ্যে এমন রূপ আগে কখনও দেখা যায়নি। দুর্যোধনের সেই কন্যা ছিল অপূর্ব বর্ণের, অতুল সৌন্দর্যবতী।

Verse 21

तामग्निश्चकमे साक्षाद्‌ राजकन्यां सुदर्शनाम्‌ । भूत्वा च ब्राह्मणो राजन्‌ वरयामास तं नृपम्‌

ভীষ্ম বললেন— হে রাজন! রাজকন্যা সুদর্শনার প্রতি স্বয়ং অগ্নিদেব আসক্ত হলেন। তারপর ব্রাহ্মণের রূপ ধারণ করে তিনি সেই নৃপতির কাছে গিয়ে বিধিপূর্বক কন্যাটিকে বিবাহার্থে প্রার্থনা করলেন।

Verse 22

दरिद्रश्चनासवर्णश्र॒ ममायमिति पार्थिव: । न दित्सति सुतां तस्मै तां विप्राय सुदर्शनाम्‌

রাজা মনে মনে ভাবল—‘এ ব্যক্তি দরিদ্র, আর আমারই বর্ণেরও নয়’; তাই সে ব্রাহ্মণকে কন্যা সুদর্শনাকে বিবাহে দিতে সে সম্মত হল না।

Verse 23

ततो<सस्‍्य वितते यज्ञे नष्टो5 भूद्धव्यवाहन: । ततः सुदुःखितो राजा वाक्यमाह द्विजांस्तदा

তখন যজ্ঞ যথাবিধি বিস্তৃত ও সম্পন্ন হতে থাকতেই হব্যবাহন অগ্নি অদৃশ্য হয়ে গেলেন। এতে রাজা গভীর দুঃখে নিমগ্ন হয়ে সেই সময় ব্রাহ্মণদের উদ্দেশে বললেন—

Verse 24

दुष्कृतं मम कि नु स्याद्‌ भवतां वा द्विजर्षभा: । येन नाशं जगामाग्नि: कृतं कुपुरुषेष्विव

হে দ্বিজশ্রেষ্ঠগণ! আমার বা আপনাদের কী দুষ্কর্ম হয়েছে, যার ফলে অগ্নি নাশপ্রাপ্ত হলেন—যেন দুষ্ট লোকদের প্রতি করা উপকার বৃথা হয়ে যায়?

Verse 25

न हाल्प॑ दुष्कृतं नो$स्ति येनाग्निनाशमागत: । भवतां चाथवा महां तत्त्वेनेतद्‌ विमृश्यताम्‌

আমাদের দ্বারা কোনো তুচ্ছ অপরাধ হয়নি, যার ফলে অগ্নি অদৃশ্য হলেন। এই দোষ আপনাদের, না আমার—সত্যভাবে বিচার করুন।

Verse 26

तत्र राज्ञो वच:ः श्रुत्वा विप्रास्ते भरतर्षभ । नियता वाग्यताश्वैव पावकं शरणं ययु:,भरतश्रेष्ठ] राजाकी यह बात सुनकर उन ब्राह्मणोंने शौच-संतोष आदि नियमोंके पालनपूर्वक मौन हो भगवान्‌ अग्निदेवकी शरण ली

হে ভরতশ্রেষ্ঠ! রাজার কথা শুনে সেই ব্রাহ্মণেরা নিয়মাচরণে স্থিত থেকে, বাক্‌সংযম করে নীরব হলেন এবং পাৱক অগ্নিদেবের শরণ নিলেন।

Verse 27

तान्‌ दर्शयामास तदा भगवान्‌ हव्यवाहन: । स्वं रूप॑ दीप्तिमत्‌ कृत्वा शरदर्कसमद्युति:

তখন ভগবান হব্যবাহন (অগ্নি) স্বীয় দীপ্তিমান রূপ ধারণ করে শরৎকালের সূর্যের ন্যায় জ্যোতির্ময় হয়ে সেই ব্রাহ্মণদের দর্শন দিলেন।

Verse 28

ततो महात्मा तानाह दहनो ब्राह्मणर्षभान्‌ | वरयाम्यात्मनोअर्थाय दुर्योधनसुतामिति,उस समय महात्मा अग्निने जन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे कहा--“मैं दुर्योधनकी पुत्रीका अपने लिये वरण करता हूँ

তখন মহাত্মা দহন (অগ্নি) সেই শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের বললেন—“আমি আমার উদ্দেশ্যের জন্য দুর্যোধনের কন্যাকে বরণ করি।”

Verse 29

ततस्ते कल्यमुत्थाय तस्मै राज्ञे न्यवेदयन्‌ । ब्राह्मणा विस्मिता: सर्वे यदुक्तं चित्रभानुना,यह सुनकर आश्वर्यचकित हुए सब ब्राह्मणोंने सबेरे उठकर, अग्निदेवने जो कहा था वह सब कुछ राजासे निवेदन किया

এ কথা শুনে সকল ব্রাহ্মণ বিস্মিত হলেন। পরে প্রভাতে উঠে তাঁরা চিত্রভানু (অগ্নিদেব) যা বলেছিলেন, সবই রাজাকে নিবেদন করলেন।

Verse 30

ततः स राजा तत्‌ श्रुत्वा वचन ब्रह्म॒वादिनाम्‌ । अवाप्य परम॑ हर्ष तथेति प्राह बुद्धिमान्‌

ব্রহ্মবাদী ঋষিদের সেই বাক্য শুনে রাজা পরম আনন্দ লাভ করলেন এবং সেই বুদ্ধিমান নৃপতি বললেন—“তথাস্তु”, অর্থাৎ ‘তাই হোক’।

Verse 31

अयाचत च त॑ शुल्क॑ भगवन्तं विभावसुम्‌ । नित्यं सांनिध्यमिह ते चित्रभानो भवेदिति,तदनन्तर उन्होंने कन्‍्याके शुल्करूपसे भगवान्‌ अग्निसे याचना की--'चित्रभानो! इस नगरीमें आपका सदा निवास बना रहे”

তারপর তাঁরা কন্যার শুল্করূপে ভগবান বিভাবসু (অগ্নি)-কে প্রার্থনা করলেন—“হে চিত্রভানু! এই নগরে আপনার নিত্য সান্নিধ্য থাকুক।”

Verse 32

तमाह भगवानग्निरेवमस्त्विति पार्थिवम्‌ । ततः सांनिध्यमद्यापि माहिष्मत्यां विभावसो:,यह सुनकर भगवान्‌ अग्निने राजासे कहा, “एवमस्तु (ऐसा ही होगा)”। तभीसे आजतक माहिष्मती नगरीमें अग्निदेवका निवास बना हुआ है

এ কথা শুনে ভগবান অগ্নি রাজাকে বললেন—“এবমস্তু (তথাস্তु)।” সেই সময় থেকে আজও মাহিষ্মতী নগরীতে বিভাবসু (অগ্নিদেব)-এর সান্নিধ্য প্রসিদ্ধ।

Verse 33

दृष्टं हि सहदेवेन दिश॑ विजयता तदा । ततस्तां समलंकृत्य कन्यामाहृतवाससम्‌

সেই সময় দিগ্বিজয় করতে করতে সহদেব তাকে দেখেছিলেন। তারপর কন্যাটিকে যথাবিধি অলংকৃত করে, তার জন্য বস্ত্র আনানো হল।

Verse 34

ददौ दुर्योधनो राजा पावकाय महात्मने । सहदेवने दक्षिण दिशाकी विजय करते समय वहाँ अग्निदेवको प्रत्यक्ष देखा था। अग्निदेवके वहाँ रहना स्वीकार कर लेनेपर राजा दुर्योधनने अपनी कन्याको सुन्दर वस्त्र पहनाकर नाना प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत करके महात्मा अग्निके हाथमें दे दिया |। ३३ *3॥ प्रतिजग्राह चाग्निस्तु राजकन्यां सुदर्शनाम्‌

রাজা দুর্যোধন মহাত্মা পাবক (অগ্নি)-কে নিজের কন্যা দান করলেন। আর অগ্নি সেই সुदর্শনা রাজকন্যাকে গ্রহণ করলেন।

Verse 35

विधिना वेददृष्टेन वसोर्धारामिवाध्वरे । अग्निने वेदोक्त विधिसे राजकन्या सुदर्शनाको उसी प्रकार ग्रहण किया, जैसे वे यज्ञमें वसुधारा ग्रहण करते हैं ।। ३४ $ ।। तस्या रूपेण शीलेन कुलेन वपुषा श्रिया

অগ্নি বেদবিধি অনুসারে সुदর্শনা রাজকন্যাকে সেইরূপে গ্রহণ করলেন, যেমন যজ্ঞে ‘বসোর্ধারা’ নামক আহুতি গ্রহণ করা হয়। তার রূপ, শীল, কুল, দেহলাবণ্য ও শ্রী—সবই উৎকৃষ্ট ছিল।

Verse 36

तस्या: समभवत्‌ पुत्रो नाम्ना55ग्नेय: सुदर्शन:

তার গর্ভে এক পুত্র জন্মাল—নাম সुदর্শন; সে ‘আগ্নেয়’ নামে প্রসিদ্ধ হল।

Verse 37

सुदर्शनस्तु रूपेण पूर्णेन्दुसद्शोपम: । शिशुरेवाध्यगात्‌ सर्व परं ब्रह्म सनातनम्‌

ভীষ্ম বললেন—সুদর্শন রূপে পূর্ণচন্দ্রের ন্যায় দীপ্তিমান ছিল। সে তখনও শিশু, তবু সর্বজ্ঞ হয়ে উঠল এবং সনাতন পরব্রহ্মকে উপলব্ধি করল।

Verse 38

कुछ कालके पश्चात्‌ उसके गर्भसे अग्निके एक पुत्र हुआ जिसका नाम सुदर्शन रखा गया। वह रूपमें पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर था और उसे बचपनमें ही सर्वस्वरूप सनातन परब्रह्मका ज्ञान हो गया था ।।

ভীষ্ম বললেন—কিছুদিন পরে তার গর্ভ থেকে অগ্নির এক পুত্র জন্মাল; তার নাম রাখা হল সুদর্শন। রূপে সে পূর্ণচন্দ্রের মতো মনোহর, আর শৈশবেই সর্বস্বরূপ সনাতন পরব্রহ্মের জ্ঞান লাভ করেছিল। সেই সময় নৃগের পিতামহ ওঘবান নামে এক রাজা পৃথিবী শাসন করতেন। তাঁর ওঘবতী নামে এক কন্যা এবং ওঘরথ নামে এক পুত্র ছিল।

Verse 39

तामोघवान्‌ ददौ तस्मै स्वयमोघवतीं सुताम्‌ । सुदर्शनाय विदुषे भार्यार्थे देवरूपिणीम्‌,ओघवती देवकन्याके समान सुन्दरी थी। ओघवानने अपनी उस पुत्रीको विद्वान्‌ सुदर्शनको पत्नी बनानेके लिये दे दिया

ভীষ্ম বললেন—ওঘবান নিজের কন্যা ওঘবতীকে, দেবকন্যার ন্যায় রূপসী, বিদ্বান সুদর্শনের পত্নী হিসেবে তাকে দান করলেন।

Verse 40

स गृहस्थाश्रमरतस्तया सह सुदर्शन: । कुरुक्षेत्रेसद्‌ राजन्नोघवत्या समन्वित:,राजन! सुदर्शन उसके साथ गृहस्थ-धर्मका पालन करने लगे। उन्होंने ओधवतीके साथ कुरक्षेत्रमें निवास किया

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, সুদর্শন ওঘবতীর সঙ্গে গৃহস্থাশ্রমে নিবিষ্ট হয়ে কুরুক্ষেত্রে বাস করতে লাগল এবং গৃহস্থধর্ম পালন করল।

Verse 41

गृहस्थश्वावजेष्यामि मृत्युमित्येव स प्रभो । प्रतिज्ञामकरोद्‌ धीमान्‌ दीप्ततेजा विशाम्पते

ভীষ্ম বললেন—হে প্রজাপতি, হে প্রভু! দীপ্ততেজা সেই ধীমান জননায়ক সুদর্শন এই প্রতিজ্ঞা করল—“গৃহস্থধর্মে স্থিত থেকেও আমি মৃত্যুকে জয় করব।”

Verse 42

तामथौघवतीं राजन्‌ स पावकसुतो<ब्रवीत्‌ । अतिथे: प्रतिकूलं ते न कर्तव्यं कथंचन,राजन्‌! अग्निकुमार सुदर्शनने ओघवतीसे कहा--'देवि! तुम्हें अतिथिके प्रतिकूल किसी तरह कोई कार्य नहीं करना चाहिये”

তখন পাৱকপুত্র সুদর্শন ওঘবতীকে বললেন—“দেবি! অতিথির কল্যাণ ও সম্মানের প্রতিকূলে তুমি কোনো অবস্থাতেই কিছু করবে না।”

Verse 43

येन येन च तुष्येत नित्यमेव त्वयातिथि: । अप्यात्मन: प्रदानेन न ते कार्या विचारणा

যে যে বস্তুতে অতিথি সন্তুষ্ট হন, তা সর্বদাই তাঁকে দেবে। অতিথির তুষ্টির জন্য যদি নিজের আত্মসমর্পণও করতে হয়, তবু মনে কোনো দ্বিধা বা সংকোচ রেখো না।

Verse 44

एतद्‌ व्रतं मम सदा हृदि सम्परिवर्तते । गृहस्थानां च सुश्रोणि नातिथेर्विद्यते परम्‌

হে সুশ্রোণি! এই ব্রত আমার হৃদয়ে সদা আবর্তিত হয়—গৃহস্থদের জন্য অতিথি-সেবার চেয়ে উচ্চতর কোনো ধর্ম নেই।

Verse 45

प्रमाणं यदि वामोरु वचस्ते मम शो भने । इदं वचनमव्यग्रा हृदि त्वं धारये: सदा,“वामोरु शोभने! यदि तुम्हें मेरा वचन मान्य हो तो मेरी इस बातको शान्त भावसे सदा अपने हृदयमें धारण किये रहना

হে শোভনে, হে বামোরু! যদি আমার বাক্য তোমার কাছে প্রমাণ হয়, তবে অচঞ্চল ও শান্তচিত্তে এই উপদেশটি সর্বদা হৃদয়ে ধারণ করে রেখো।

Verse 46

निष्क्रान्ते मयि कल्याणि तथा संनिहिते5नघे । नातिथिस्ते5वमन्तव्य: प्रमाणं यद्यहं तव

হে কল্যাণী, হে অনঘে! যদি তুমি আমাকে আদর্শ মানো, তবে আমি গৃহ থেকে বেরিয়ে যাই বা নিকটে উপস্থিত থাকি—কোনো অবস্থাতেই অতিথিকে অবজ্ঞা করবে না।

Verse 47

तमब्रवीदोघवती तथा मुर्धश्नि कृताञ्जलि: । न मे त्वद्गबचनात्‌ किंचिन्न कर्तव्यं कथंचन

এ কথা শুনে ওঘবতী করজোড়ে মস্তকে স্পর্শ করে বলল— “আপনার আদেশ অনুসারে যে কাজ করা উচিত, এমন কোনো কাজই নেই যা আমি কোনো অবস্থাতেই করতে বাধ্য নই—আমি কখনোই তা অমান্য করব না।”

Verse 48

जिगीषमाणस्तु गृहे तदा मृत्यु: सुदर्शनम्‌ । पृष्ठतोडन्वगमद्‌ू राजनू्‌ रन्ध्रान्वेषी तदा सदा

হে রাজন! সেই সময় গার্হস্থ্যধর্মে প্রতিষ্ঠিত সুদর্শনকে পরাজিত করতে ইচ্ছুক মৃত্যু, তার কোনো ত্রুটি খুঁজতে খুঁজতে, সর্বদা তার পেছনে পেছনে লেগে থাকত।

Verse 49

इध्मार्थ तु गते तस्मिन्नग्निपुत्रे सुदर्शने । अतिर्थित्राह्मण: श्रीमांस्तामाहौघवती तदा

একদিন অগ্নিপুত্র সুদর্শন সমিধা আনতে বাইরে গেলে, সেই সময় তাদের গৃহে এক তেজস্বী ব্রাহ্মণ অতিথি এসে উপস্থিত হল; তখন সে ওঘবতীকে বলল—

Verse 50

आतिदथ्यं कृतमिच्छामि त्वयाद्य वरवर्णिनि । प्रमाणं यदि धर्मस्ते गृहस्थाभ्रमसम्मत:

“হে সুশোভনা! যদি তোমার কাছে গৃহস্থদের স্বীকৃত আচারধর্মই মানদণ্ড হয়, তবে আজ আমি তোমার প্রদত্ত আতিথ্য-সত্কার গ্রহণ করতে চাই।”

Verse 51

इत्युक्ता तेन विप्रेण राजपुत्री यशस्विनी । विधिना प्रतिजग्राह वेदोक्तेन विशाम्पते,प्रजानाथ! उस ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर यशस्विनी राजकुमारी ओघवतीने वेदोक्त विधिसे उसका पूजन किया

হে প্রজাপতি! সেই ব্রাহ্মণের এমন কথা শুনে যশস্বিনী রাজকন্যা ওঘবতী বিধিপূর্বক, বেদবিহিত রীতিতে, তার আতিথ্য-সত্কার করল।

Verse 52

आसन चैव पाद्यं च तस्मै दत्त्वा द्विजातये | प्रोवाचौघवती विप्रं केनार्थ: कि ददामि ते

দ্বিজ ব্রাহ্মণকে বসার আসন ও পাদ্য (পা ধোয়ার জল) প্রদান করে ওঘবতী সেই বিপ্রকে বললেন—“বিপ্রবর! আপনার কী প্রয়োজন? আপনার সেবায় আমি কী দান করব?”

Verse 53

तामब्रवीत्‌ ततो विप्रो राजपुत्रीं सुदर्शनाम्‌ । त्वया ममार्थ: कल्याणि निर्विशड्कैतदाचर

তখন ব্রাহ্মণ সেই সুশোভিতা রাজকন্যা ওঘবতীকে বলল—“কল্যাণী! আমার উদ্দেশ্য তোমার উপরেই নির্ভর। অতএব নির্ভয়ে, নিঃসংশয়ে আমার এই প্রিয় কাজটি কর।”

Verse 54

यदि प्रमाणं धर्मस्ते गृहस्थाअ्रमसम्मत: । प्रदानेनात्मनो राज्ञि कर्तुमरहसि मे प्रियम्‌,“रानी! यदि तुम्हें गृहस्थसम्मत धर्म मान्य है तो मुझे अपना शरीर देकर मेरा प्रिय कार्य करना चाहिये”

“হে রানি! যদি গৃহস্থাশ্রম-সম্মত ধর্মকে তুমি প্রমাণ বলে মানো, তবে নিজেকে (নিজ দেহকে) দান করে আমার প্রিয় কাজটি করা তোমার কর্তব্য।”

Verse 55

स तया छन्‍्द्यमानो<न्यैरीप्सितैर्नूपकन्यया । नान्यमात्मप्रदानात्‌ स तस्या वत्रे वरं द्विज:

রাজকন্যা বারবার সেই অতিথিকে অনুরোধ করল—অন্য কোনো কাম্য বস্তু চাইতে; কিন্তু সেই দ্বিজ তার কাছ থেকে আত্ম-প্রদান (নিজ দেহ দান) ছাড়া আর কোনো বর প্রার্থনা করল না।

Verse 56

सा तु राजसुता स्मृत्वा भर्तुर्वचनमादित: । तथेति लज्जमाना सा तमुवाच द्विजर्षभम्‌,तब राजकुमारीने पहले कहे हुए पतिके वचनको याद करके लजाते-लजाते उस द्विजश्रेष्ठठे कहा--“अच्छा, आपकी आज्ञा स्वीकार है”

তখন রাজকন্যা প্রথমে স্বামীর বলা বাক্য স্মরণ করে, লজ্জিত হয়ে সেই দ্বিজশ্রেষ্ঠকে বলল—“তথাস্তु; আপনার আদেশ গ্রহণ করলাম।”

Verse 57

ततो विहस्य विप्रर्षि: सा चैवाथ विवेश ह । संस्मृत्य भर्तुर्वचनं गृहस्थाश्रमकाड्क्षिण:

তখন বিপ্রঋষি হাসলেন, আর সেও ভিতরে প্রবেশ করল। গার্হস্থ্যধর্ম পালনের ইচ্ছাসম্পন্ন স্বামীর বাক্য স্মরণ করে সে ব্রাহ্মণের সম্মুখে ‘হ্যাঁ’ বলল; অতঃপর সেই বিপ্রঋষি ওঘবতীকে সঙ্গে নিয়ে গৃহাভ্যন্তরে প্রবেশ করলেন।

Verse 58

अथेध्यानमुपादाय स पावकिरुपागमत्‌ । मृत्युना रौद्रभावेन नित्यं बन्धुरिवान्वित:

ইতিমধ্যে অগ্নিপুত্র সুদর্শন সমিধা হাতে নিয়ে ফিরে এল। রৌদ্র ও নিষ্ঠুর ভাব নিয়ে মৃত্যু সর্বদা তার পশ্চাতে লেগে থাকত—যেন কোনো স্নেহবান আত্মীয় প্রিয়জনের পেছনে পেছনে চলে।

Verse 59

ततस्त्वाश्रममागम्य स पावकसुतस्तदा । तां व्याजहारौघवतीं क्वासि यातेति चासकृत्‌,आश्रमपर पहुँचकर फिर अग्निपुत्र सुदर्शन अपनी पत्नी ओघवतीको बारंबार पुकारने लगे--'देवि! तुम कहाँ चली गयी?”

তারপর আশ্রমে ফিরে এসে অগ্নিপুত্র সুদর্শন বারবার স্ত্রী ওঘবতীকে ডাকতে লাগল—“দেবী! তুমি কোথায় চলে গেলে?”

Verse 60

तस्मै प्रतिवच: सा तु भरत्रें न प्रददौ तदा । कराभ्यां तेन विप्रेण स्पृष्टा भर्तुव्॒ता सती

কিন্তু তখন সে স্বামীকে কোনো উত্তর দিল না। অতিথিরূপে আগত সেই ব্রাহ্মণ দু’হাতে তাকে স্পর্শ করেছিল; তাই পতিব্রতা সতী নিজেকে কলুষিত মনে করে স্বামীর সামনেও লজ্জিত হয়ে নীরব রইল।

Verse 61

उच्छिष्टास्मीति मन्‍्वाना लज्जिता भर्तुरिव च । तूष्णी भूताभवत्‌ साध्वी न चोवाचाथ किंचन

‘আমি অপবিত্র হয়ে গেছি’—এমন মনে করে, যেন অপরাধ করেছে এমনভাবে স্বামীর সামনে লজ্জিত হয়ে সেই সাধ্বী নীরব হয়ে রইল; আর কিছুই বলল না।

Verse 62

अथ तां पुनरेवेदं प्रोवाच स सुदर्शन: । क्व सा साध्वी क्‍्व सा याता गरीय: किमतो मम

তখন সুদর্শন বারবার ডেকে বললেন—“সেই সাধ্বী কোথায়? আমার পতিব্রতা স্ত্রী কোথায় গেল? আমার সেবার চেয়ে গুরুতর কোন কাজ হঠাৎ তার ওপর এসে পড়ল?”

Verse 63

पतिव्रता सत्यशीला नित्यं चैवार्जवे रता । कथ्थ॑ न प्रत्युदेत्यद्य स्मपमाना यथा पुरा

“সে পতিব্রতা, সত্যনিষ্ঠা, আর সর্বদা সরলতায় রত; আজ সে আগের মতো হাসিমুখে এগিয়ে এসে আমাকে অভ্যর্থনা করছে না কেন? আমার সেবার চেয়ে গুরুতর কোন ধর্ম হঠাৎ তার ওপর এসে পড়ল?”

Verse 64

उटजस्थस्तु तं॑ विप्र: प्रत्युवाच सुदर्शनम्‌ । अतिथ्थिं विद्धि सम्प्राप्तं ब्राह्मणं पावके च माम्‌

এ কথা শুনে কুটিরে বসা ব্রাহ্মণ সুদর্শনকে বললেন—“হে পাৱকপুত্র! জেনে রাখো, আমি ব্রাহ্মণ; অতিথি রূপে তোমার গৃহে উপস্থিত হয়েছি।”

Verse 65

अनया हनन्‍्द्यमानो*हं भार्यया तव सत्तम | तैस्तैरतिथिसत्कारैर््रेद्य॒न्नेषा वृता मया

“হে শ্রেষ্ঠ পুরুষ! তোমার স্ত্রী অতিথি-সত্কারের দ্বারা আমার ইচ্ছা পূর্ণ করার অঙ্গীকার করেছিল; সেই সব আতিথ্য-সেবায় আমি সন্তুষ্ট হলাম, তাই প্রসন্ন হয়ে আমি তাকেই গ্রহণ করলাম।”

Verse 66

अनेन विधिना सेयं मामर्च्छति शुभानना । अनुरूप यदत्रान्यत्‌ तद्‌ भवान्‌ कर्तुमहति

“এই বিধি অনুসারেই এই সুমুখী এখন আমার সেবায় উপস্থিত হয়েছে। এখানে যা কিছু অন্যথা উপযুক্ত বলে মনে হয়, তা করতে তুমি সক্ষম।”

Verse 67

कूटमुद्गरहस्तस्तु मृत्युस्तं वै समन्वगात्‌ । हीनप्रतिज्ञमत्रैनं वधिष्यामीति चिन्तयन्‌

ঠিক সেই সময় হাতে ভারী লৌহদণ্ড নিয়ে মৃত্যু তার পেছনে পেছনে এসে দাঁড়াল। সে মনে মনে ভাবল—“এখন সে প্রতিজ্ঞা থেকে বিচ্যুত হবে; তাই এখানেই তাকে বধ করব।”

Verse 68

सुदर्शनस्तु मनसा कर्मणा चक्षुषा गिरा । त्यक्तेर्ष्यस्त्यक्तमन्युश्व॒ स्मयमानो<5ब्रवीदिदम्‌,परंतु सुदर्शन मन, वाणी, नेत्र और क्रियासे भी ईर्ष्या तथा क्रोधका त्याग कर चुके थे। वे हँसते-हँसते यों बोले--

কিন্তু সুদর্শন মন, কর্ম, দৃষ্টি ও বাক্য—সবেতেই ঈর্ষা ও ক্রোধ ত্যাগ করেছিলেন। তিনি মৃদু হাসি হেসে বললেন—

Verse 69

सुरतं ते<स्तु विप्राग्रय प्रीतिर्हि परमा मम । गृहस्थस्य हि धर्मो5ग्रय: सम्प्राप्तातिथिपूजनम्‌

“হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ! তোমার কামনা পূর্ণ হোক—এতেই আমার পরম আনন্দ; কারণ গৃহস্থের সর্বোচ্চ ধর্ম হলো গৃহে আগত অতিথির পূজা-সৎকার।”

Verse 70

अतिथि: पूजितो यस्य गृहस्थस्य तु गच्छति । नान्यस्तस्मात्‌ परो धर्म इति प्राहुर्मनीषिण:

“যে গৃহস্থের ঘর থেকে অতিথি পূজিত হয়ে বিদায় নেয়, তার জন্য এর চেয়ে উচ্চতর আর কোনো ধর্ম নেই—এমনই বলেন জ্ঞানীরা।”

Verse 71

प्राणा हि मम दाराश्न यच्चान्यद्‌ विद्यते वसु । अतिथिभ्यो मया देयमिति मे व्रतमाहितम्‌

“আমার প্রাণ, আমার স্ত্রী, এবং আমার কাছে যা কিছু ধনসম্পদ আছে—সবই অতিথিদের জন্য অর্পণীয়; এটাই আমার দৃঢ় ব্রত।”

Verse 72

निःसंदिग्धं॑ यथा वाक्यमेतन्मे समुदाह्ृतम्‌ । तेनाहं विप्र सत्येन स्वयमात्मानमालभे

“হে ব্রাহ্মণ! আমি এই বাক্যটি নিঃসন্দেহে উচ্চারণ করেছি। অতএব এই সত্য প্রতিষ্ঠা করতে আমি স্বয়ং নিজের দেহ স্পর্শ করে শপথ গ্রহণ করছি।”

Verse 73

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्न पठचमम्‌ । बुद्धिरात्मा मन: कालो दिशश्वैव गुणा दश

“পৃথিবী, বায়ু, আকাশ, জল এবং পঞ্চম জ্যোতি; তারপর বুদ্ধি, আত্মা, মন, কাল ও দিকসমূহ—এই দশটি ‘সাক্ষী-তত্ত্ব’। দেহধারী প্রাণীদের দেহে সদা অবস্থান করে তারা মানুষের পুণ্য ও পাপ কর্ম পর্যবেক্ষণ করে।”

Verse 74

नित्यमेव हि पश्यन्ति देहिनां देहसंश्रिता: । सुकृतं दुष्कृतं चापि कर्म धर्मभूतां वर

“হে ধর্মাত্মাদের শ্রেষ্ঠ! দেহধারীদের দেহে আশ্রিত এই সাক্ষীরা সর্বদা তাদের কর্ম—পুণ্য ও পাপ—উভয়ই দেখে থাকে।”

Verse 75

यथैषा नानृता वाणी मयाद्य समुदीरिता । तेन सत्येन मां देवा: पालयन्तु दहन्तु वा

“যদি আজ আমার উচ্চারিত এই বাক্য মিথ্যা না হয়, তবে এই সত্যের প্রভাবে দেবতারা আমাকে রক্ষা করুন; আর যদি তা অসত্য হয়, তবে তারা আমাকে দগ্ধ করে ভস্ম করে দিন।”

Verse 76

ततो नाद: समभवद्‌ दिक्षु सर्वासु भारत । असकृत्‌ सत्यमित्येवं नैतन्मिथ्येति सर्वतः

“তখন, হে ভারত! সর্বদিক থেকে এক ধ্বনি উঠল। চারদিক থেকে বারবার ঘোষণা হতে লাগল—‘এটি সত্যই সত্য; এতে মিথ্যার লেশমাত্র নেই।’”

Verse 77

उटजात्‌ तु ततस्तस्मान्निश्लक्राम स वै द्विज: । वपुषा द्यां च भूमिं च व्याप्य वायुरिवोद्यत:

তারপর সেই ব্রাহ্মণ আশ্রম-কুটির থেকে বাইরে বেরিয়ে এলেন। তিনি দেহ বিস্তার করে, গতিশীল বায়ুর ন্যায়, পৃথিবী ও আকাশ—উভয়কে পরিব্যাপ্ত করে স্থিত হলেন।

Verse 78

स्वरेण विप्र: शैक्षेण त्रील्लॉकाननुनादयन्‌ । उवाच चैन धर्मज्ञ पूर्वमामन्त्रय नामत:

শিক্ষা-সম্মত উদাত্তাদি স্বরে তিন লোককে প্রতিধ্বনিত করে সেই বিপ্র প্রথমে ধর্মজ্ঞকে নাম ধরে সম্বোধন করলেন, তারপর এইভাবে বললেন।

Verse 79

धर्मोडहमस्मि भद्ठर ते जिज्ञासार्थ तवानघ । प्राप्त: सत्यं च ते ज्ञात्वा प्रीतिर्मे परमा त्वयि

‘নির্দোষ! তোমার মঙ্গল হোক। আমি ধর্ম; তোমাকে পরীক্ষা করতে এসেছি। তোমার মধ্যে সত্য আছে—এ কথা জেনে তোমার প্রতি আমার পরম প্রীতি জাগল।’

Verse 80

विजिततश्न त्वया मृत्युर्यो5यं त्वामनुगच्छति । रन्ध्रान्वेषी तव सदा त्वया धृत्या वशी कृत:

‘তুমি সেই মৃত্যুকে জয় করেছ, যে সর্বদা তোমার পেছনে লেগে থাকে এবং তোমার মধ্যে ফাঁক-ফোকর খোঁজে। তোমার ধৈর্য দ্বারা তুমি মৃত্যুকেই বশে এনেছ।’

Verse 81

न चास्ति शक्तिस्त्रैलोक्ये कस्यचित्‌ पुरुषोत्तम । पतिव्रतामिमां साध्वीं तवोद्वीक्षितुमप्युत

‘পুরুষোত্তম! তিন লোকের মধ্যে কারও এমন শক্তি নেই যে তোমার এই সাধ্বী পতিব্রতা পত্নীর দিকে কলুষিত দৃষ্টিতে চোখ তুলে তাকাতেও পারে।’

Verse 82

रक्षिता त्वदगुणैरेषा पतिव्रतगुणैस्तथा । अधृष्या यदियं ब्रूयात्‌ तथा तन्नान्यथा भवेत्‌

তোমার গুণে এবং নিজের পতিব্রতা-ধর্মের গুণে এ নিত্য রক্ষিতা। একে কেউ পরাভূত করতে পারে না। এ যে বাক্য মুখে উচ্চারণ করবে, তা সত্যই হবে—অন্যথা হতে পারে না।

Verse 83

एषा हि तपसा स्वेन संयुक्ता ब्रह्म॒वादिनी । पावनार्थ च लोकस्य सरिच्छेष्ठा भविष्यति

নিজ তপোবলে যুক্ত এই ব্রহ্মবাদিনী নারী লোকের পবিত্রীকরণের জন্য নদীগণের মধ্যে শ্রেষ্ঠা হবে।

Verse 84

अर्धेनौधवती नाम त्वामर्धेनानुयास्यति । शरीरेण महाभागा योगो हाुस्या वशे स्थित:

দেহের অর্ধাংশে সে ‘ওঘবতী’ নামে শ্রেষ্ঠা নদী হয়ে লোককে পবিত্র করবে; আর অর্ধাংশে সেই পরম সৌভাগ্যবতী পতিব্রতা সতী তোমার সেবায় থাকবে। যোগ সর্বদা তার অধীন থাকবে।

Verse 85

अनया सह लोकांश्व गन्तासि तपसार्जितान्‌ । यत्र नावृत्तिमभ्येति शाश्वतांस्तानू सनातनान्‌,“तुम भी इसके साथ अपनी तपस्यासे प्राप्त हुए उन सनातन लोकोंमें जाओगे जहाँसे फिर इस संसारमें लौटना नहीं पड़ता

তুমিও এর সঙ্গে তপস্যায় অর্জিত সেই সনাতন, শাশ্বত লোকসমূহে গমন করবে—যেখান থেকে আর এই মর্ত্যলোকে প্রত্যাবর্তন নেই।

Verse 86

अनेन चैव देहेन लोकांस्त्वमभिपत्स्यसे । निर्जितश्च त्वया मृत्युरैश्वर्य च तवोत्तमम्‌,“तुम इसी शरीरसे उन दिव्य लोकोंमें जाओगे; क्योंकि तुमने मृत्युको जीत लिया है और तुम्हें उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त है

তুমি এই দেহ নিয়েই সেই দিব্য লোকসমূহ লাভ করবে; কারণ তুমি মৃত্যুকে জয় করেছ এবং তোমার জন্য শ্রেষ্ঠ ঐশ্বর্য নির্ধারিত।

Verse 87

पज्चभूतान्यतिक्रान्त: स्ववीर्याच्च मनोजव: । गृहस्थधर्मेणानेन कामक्रोधौ च ते जिती

ভীষ্ম বললেন—নিজ বীর্যে তুমি যেন পঞ্চমহাভূতকেও অতিক্রম করেছ এবং মনের ন্যায় দ্রুতগামী হয়েছ। এই গৃহস্থধর্মের আচরণে তুমি কাম ও ক্রোধকে জয় করেছ।

Verse 88

स्‍्नेहो रागश्न तन्द्री च मोहो द्रोहश्च॒ केवल: । तव शुश्रूषया राजन्‌ राजपुत्र्या विनिर्जिता:

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, তোমার সেবায় নিবিষ্ট থাকার শক্তিতে রাজকন্যা স্নেহাসক্তি, রাগ, আলস্য, মোহ এবং এমনকি নির্মম দ্ৰোহ—এই দোষসমূহকে জয় করেছে।

Verse 89

भीष्म उवाच शुक्लानां तु सहस्रेण वाजिनां रथमुत्तमम्‌ । युक्त प्रगृह्दा भगवान्‌ वासवो5प्याजगाम तम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! তারপর ভগবান বাসব (ইন্দ্র) নিজেও শ্বেতবর্ণ এক সহস্র অশ্বযোজিত এক উৎকৃষ্ট রথ নিয়ে তাঁর সঙ্গে সাক্ষাৎ করতে এলেন।

Verse 90

मृत्युरात्मा च लोकाश्न जिता भूतानि पञ्च च । बुद्धि: कालो मनो व्योम कामक्रोधी तथैव च

ভীষ্ম বললেন—অতিথি-সত্কারের পুণ্যবলে সুদর্শন মৃত্যু, আত্মা, লোকসমূহ, পঞ্চমহাভূত, বুদ্ধি, কাল, মন, আকাশ এবং কাম ও ক্রোধ—এসবের উপরও বিজয়ী হল।

Verse 91

तस्माद्‌ गृहाश्रमस्थस्य नान्यद्‌ दैवतमस्ति वै । ऋते5तिर्थिं नरव्यात्र मनसैतद्‌ विचारय

ভীষ্ম বললেন—অতএব, হে নরব্যাঘ্র! মনে দৃঢ়ভাবে বিবেচনা করো—গৃহস্থের জন্য অতিথি ব্যতীত সত্যই আর কোনো দেবতা নেই।

Verse 92

अतिथि: पूजितो यद्धि ध्यायते मनसा शुभम्‌ | न तत्‌ क्रतुशतेनापि तुल्यमाहुर्मनीषिण:

অতিথিকে যথাযথ পূজা-সত্কার করে যদি সে মনে মনে গৃহস্থের মঙ্গল কামনা করে, তবে যে ফল লাভ হয়, তা শত যজ্ঞের সঙ্গেও তুলনীয় নয়—অর্থাৎ শত যজ্ঞেরও অধিক। এটাই মনীষীদের বচন।

Verse 93

पात्र त्वतिथिमासाद्य शीलादढूयं यो न पूजयेत्‌ । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति

যে গৃহস্থ যোগ্য ও সুশীল অতিথিকে পেয়েও যথোচিত সম্মান-সত্কার করে না, সেই অতিথি তার পাপ তাকে দিয়ে, তার পুণ্য নিয়ে চলে যায়।

Verse 94

एतत्‌ ते कथित पुत्र मया55ख्यानमनुत्तमम्‌ । यथा हि विजितो मृत्युर्गृहस्थेन पुराभवत्‌

পুত্র! তোমার প্রশ্ন অনুসারে আমি তোমাকে এই অতুলনীয় উপাখ্যান বললাম—যেমন প্রাচীন কালে এক গৃহস্থ মৃত্যুকে জয় করেছিল।

Verse 95

धन्यं यशस्यमायुष्यमिदमाख्यानमुत्तमम्‌ | बुभूषताभिमन्तव्यं सर्वदुश्चरितापहम्‌

এই উত্তম আখ্যান ধন, যশ ও দীর্ঘায়ু দান করে। এটি সর্বপ্রকার দুষ্কর্ম নাশ করে; অতএব উন্নতি কামনাকারী পুরুষের উচিত সর্বদা এর প্রতি শ্রদ্ধা রাখা।

Verse 96

इदं यः कथयेद्‌ विद्वानहन्यहनि भारत । सुदर्शनस्य चरितं पुण्याँलल्‍लोकानवाप्रुयात्‌,भरतनन्दन! जो विद्दान्‌ सुदर्शनके इस चरित्रका प्रतिदिन वर्णन करता है वह पुण्यलोकोंको प्राप्त होता है-

হে ভারতনন্দন! যে বিদ্বান প্রতিদিন সुदর্শনের এই চরিত বর্ণনা করে, সে পুণ্যলোক লাভ করে।

Verse 103

धर्मात्मा कोषवांश्षापि देवराज इवापर: । द्युतिमानका पुत्र परम धर्मात्मा राजा सुवीर हुआ जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात था। वह धर्मात्मा

ভীষ্ম বললেন— দ্যুতিমানকের পুত্র সুবীর নামে এক রাজা ছিলেন, যিনি সর্বলোকেই প্রসিদ্ধ। তিনি ধর্মাত্মা, ধনভাণ্ডারে সমৃদ্ধ এবং পরাক্রমে যেন দ্বিতীয় ইন্দ্র।

Verse 113

स दुर्जय इति ख्यातः सर्वशस्त्रभृतां वर: । सुवीरका पुत्र दुर्जय नामसे विख्यात हुआ। वह सभी संग्रामोंमें शत्रुओंके लिये दुर्जय तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ था

ভীষ্ম বললেন— সুবীরের পুত্র ‘দুর্জয়’ নামে খ্যাত হল। যুদ্ধে সে শত্রুদের পক্ষে অজেয়, আর সকল অস্ত্রধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ গণ্য ছিল।

Verse 123

दुर्योधनो नाम महान्‌ राजा राजर्षिसत्तम: | इन्द्रके समान शरीरवाले राजा दुर्जयके एक पुत्र हुआ जो अभश्विनीकुमारोंके समान कान्तिमान्‌ था। उसका नाम था दुर्योधन। वह राजर्षियोंमें श्रेष्ठ महान्‌ राजा था

ভীষ্ম বললেন— ইন্দ্রসম দেহধারী রাজা দুর্জয়ের একমাত্র পুত্র জন্মাল, যে অশ্বিনীকুমারদের ন্যায় দীপ্তিমান। তার নাম দুর্যোধন। সে মহান রাজা, রাজর্ষিদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ বলে গণ্য ছিল।

Verse 136

विषये वासवस्तस्य सम्यगेव प्रवर्षति । इन्द्रके समान पराक्रमी और युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले राजा दुर्योधनके राज्यमें इन्द्र सदा ठीक समयपर और उचित मात्रामें ही वर्षा करते थे

ভীষ্ম বললেন— সেই রাজার রাজ্যে বাসব (ইন্দ্র) যথাসময়ে ও যথোচিত পরিমাণে বৃষ্টি বর্ষণ করতেন। ইন্দ্রসম পরাক্রমী দুর্যোধনের রাজ্যে সর্বদা নিয়মমাফিক বর্ষা হতো।

Verse 1536

व्याधितो वा कृशो वापि तस्मिन्‌ नाभून्नर: क्वचित्‌ । उनके राज्यमें कहीं कोई भी कृपण, दुर्गतिग्रस्त, रोगी अथवा दुर्बल मनुष्य नहीं दृष्टिगोचर होता था

ভীষ্ম বললেন— সেই রাজ্যে কোথাও কোনো রোগাক্রান্ত বা ক্ষীণকায় মানুষ ছিল না; কোনো কৃপণ, দরিদ্র বা দুঃখী জনও কোথাও দেখা যেত না।

Verse 3536

अभवत्‌ प्रीतिमानग्निर्गर्भे चास्या मनो दधे | सुदर्शनाके रूप, शील, कुल, शरीरकी आकृति और कान्तिको देखकर अग्निदेव बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसमें गर्भाधान करनेका विचार किया

ভীষ্ম বললেন—অগ্নিদেব পরম প্রীত হয়ে তাঁর গর্ভে সন্তান স্থাপনের সংকল্প করলেন। সুদর্শনার রূপ, শীল, কুল, সুগঠিত দেহ ও দীপ্তি দেখে হুতাশন অত্যন্ত সন্তুষ্ট হলেন এবং গর্ভাধানের সিদ্ধান্ত নিলেন।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether householders will prioritize personal security and social comfort over atithi-dharma when a guest’s request becomes maximally demanding; the narrative frames the decision as a direct measure of vow-integrity and truthfulness.

The chapter teaches that Dharma is operationalized through disciplined household conduct—especially hospitality and truth—where steadfast ethical practice can symbolically “conquer” death by eliminating the moral breach (randhra) that Mṛtyu seeks.

Yes. Bhīṣma states that the account is auspicious, fame- and longevity-supporting, removes misconduct, and that a learned person who regularly narrates Sudarśana’s conduct attains meritorious realms—positioning the episode as both instruction and merit-bearing recitation.