
Chapter Arc: राज्याभिषेक के बाद धर्मराज युधिष्ठिर युद्ध-विधवाओं और अनाथों को अर्थदान देकर सान्त्वना देते हैं—पर मन का बोझ उन्हें बाण-शय्या पर पड़े भीष्म के पास खींच लाता है। → युधिष्ठिर भाइयों सहित भीष्म के निकट पहुँचते हैं; गुरु-शिष्य, पितामह-पौत्र और विजेता-पराजित की सारी गाँठें एक ही शय्या के पास कस जाती हैं—अब राज्य का भार, प्रजा का दुःख और धर्म का मार्ग एक साथ पूछे जाने हैं। → भीष्म युधिष्ठिर के शुद्ध-हृदय और गुरु-वत्सल स्वभाव की प्रशंसा करते हुए उन्हें धर्म में स्थित रहकर प्रजा-पालन, गुरु-सेवा और विशेषतः ब्राह्मणों, आचार्यों व ऋत्विजों के सत्कार का आदेश देते हैं; साथ ही विजय-सूत्र उद्घोषित होता है—“यतः कृष्णस्ततो धर्मो, यतो धर्मस्ततो जयः।” → भीष्म समस्त सुहृदों को आलिंगन कर युधिष्ठिर को पुनः उपदेश देते हैं—राज्य का स्थैर्य दया, दान और धर्म-पालन से है; युधिष्ठिर उनके निर्देश को स्वीकार कर शासन-धर्म के पथ पर दृढ़ होते हैं। → भीष्म का ‘स्वर्गारोहण’ निकट है—उपदेश के बाद भी शय्या पर पड़े पितामह के प्राण-प्रस्थान की घड़ी आसन्न होकर अगले प्रसंग की ओर संकेत करती है।
Verse 1
४। 788 | रु हर े 4667“ गा वि | हट 00 ब््झे शर-शय्यापर पड़े भीष्मकी युधिषछ्विरसे बातचीत (भीष्मस्वर्गारोहणपर्व) सप्तषष्ट्यधिकशततमो< ध्याय: भीष्मके अन्त्येष्टि-संस्कारकी सामग्री लेकर युधिष्ठिर आदिका उनके पास जाना और भीष्मका श्रीकृष्ण आदिसे देहत्यागकी अनुमति लेते हुए धृतराष्ट्र और युधिष्ठिरको कर्तव्यका उपदेश देना वैशम्पायन उवाच ततः कुन्तीसुतो राजा पौरजानपदं जनम् | पूजयित्वा यथान्यायमनुजज्ञे गृहान् प्रति
বৈশম্পায়ন বললেন—তারপর কুন্তীপুত্র রাজা (যুধিষ্ঠির) নগরবাসী ও জনপদবাসীদের যথাবিধি সম্মান করে তাদেরকে নিজ নিজ গৃহে প্রত্যাবর্তনের অনুমতি দিলেন।
Verse 2
सान्त्वयामास नारीक्ष हतवीरा हतेश्वरा: । विपुलैरर्थदानै: स तदा पाण्डुसुतो नूप:
তারপর পাণ্ডুপুত্র নৃপতি সেই নারীদের—যাদের বীর পুত্র নিহত এবং যাদের স্বামীও বিনষ্ট—প্রচুর ধন দান করে সান্ত্বনা দিলেন।
Verse 3
सो$भिषिक्तो महाप्राज्ञ: प्राप्प राज्यं युधिष्ठिर: । अवस्थाप्य नरश्रेष्ठ: सर्वा: स्वप्रकृतीस्तथा
অভিষিক্ত হয়ে মহাপ্রাজ্ঞ যুধিষ্ঠির রাজ্য লাভ করলেন; আর নরশ্রেষ্ঠ তিনি সকল ‘প্রকৃতি’—মন্ত্রী প্রভৃতি রাজকর্মচারীদের—নিজ নিজ পদে প্রতিষ্ঠিত করলেন।
Verse 4
द्विजेभ्यो गुणमुख्येभ्यो नैगमेभ्यश्व सर्वश: । प्रतिगृह्मयाशिषो मुख्यास्तथा धर्मभूतां वर:
ধর্মধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির গুণে প্রধান দ্বিজদের এবং বেদ-পরম্পরায় নিপুণ ব্রাহ্মণদের নিকট থেকে সর্বোত্তম আশীর্বাদ গ্রহণ করলেন।
Verse 5
उषित्वा शर्वरी: श्रीमान् पञ्चाशन्नगरोत्तमे । समयं कौरवाग्रयस्य सस्मार पुरुषर्षभ:
সেই শ্রেষ্ঠ নগরে পঞ্চাশ রজনী বাস করে, শ্রীমান্ পুরুষশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির কৌরবশ্রেষ্ঠ ভীষ্মের নির্দেশিত নির্দিষ্ট সময়ের কথা স্মরণ করলেন।
Verse 6
स निर्ययौ गजपुराद् याजकैः परिवारित: । दृष्टवा निवृत्तमादित्यं प्रवृत्तं चोत्तरायणम्
সূর্য দেবতা দক্ষিণায়ন থেকে নিবৃত্ত হয়ে উত্তরায়ণে প্রবৃত্ত হয়েছেন—এ কথা দেখে, যাজকদের পরিবেষ্টিত হয়ে তিনি হস্তিনাপুর থেকে বেরিয়ে পড়লেন।
Verse 7
घृतं माल्यं च गन्धांश्व॒ क्षौमाणि च युधिष्ठिर: । चन्दनागुरुमुख्यानि तथा कालीयकान्यपि
কুন্তীনন্দন যুধিষ্ঠির ভীষ্মের দাহ-সংস্কারের জন্য আগেই ঘৃত, মাল্য, সুগন্ধি দ্রব্য, সূক্ষ্ম বস্ত্র, চন্দন-অগুরু প্রভৃতি এবং কালীয়ক (কালো চন্দন) প্রেরণ করেছিলেন।
Verse 8
प्रस्थाप्य पूर्व कौन्तेयो भीष्मसंस्करणाय वै | माल्यानि च वराहाणि रत्नानि विविधानि च
কুন্তীনন্দন যুধিষ্ঠির ভীষ্মের সংস্কারের জন্য আগেই উৎকৃষ্ট মালা, শ্রেষ্ঠ উপহার/অর্ঘ্য এবং নানা প্রকার রত্ন প্রেরণ করেছিলেন।
Verse 9
धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य गान्धारीं च यशस्विनीम् । मातरं च पृथां धीमान् भ्रातृश्न पुरुषर्षभान्
বুদ্ধিমান কুরুবংশের আনন্দ যুধিষ্ঠির রাজা ধৃতরাষ্ট্রকে অগ্রে রেখে, যশস্বিনী গান্ধারী, মাতা পৃথা (কুন্তী) এবং পুরুষশ্রেষ্ঠ ভ্রাতৃগণকে সঙ্গে নিয়ে অগ্রসর হলেন; আর তাঁদের পশ্চাতে ভগবান শ্রীকৃষ্ণ, প্রজ্ঞাবান বিদুর, যুযুৎসু ও সাত্যকি চলছিলেন।
Verse 10
जनार्दनेनानुगतो विदुरेण च धीमता । युयुत्सुना च कौरव्यो युयुधानेन वा विभो
বৈশম্পায়ন বললেন—হে পরাক্রমশালী! কৌরববংশীয় রাজা অগ্রসর হলেন; তাঁর পশ্চাতে জনার্দন শ্রীকৃষ্ণ, প্রজ্ঞাবান বিদুর, এবং যুযুৎসু ও যুযুধান (সাত্যকি)ও চললেন।
Verse 11
महता राजभोगेन पारिबर्ेण संवृत: । स्तूयमानो महातेजा भीष्मस्याग्नीननुव्रजन्
বৈশম্পায়ন বললেন—মহান রাজভোগ ও বিশাল রাজসামগ্রীতে পরিবৃত সেই মহাতেজস্বী নৃপের স্তব চলছিল; তিনি ভীষ্মপ্রতিষ্ঠিত ত্রিবিধ অগ্নিকে অগ্রে রেখে নিজে পশ্চাতে পশ্চাতে অগ্রসর হলেন।
Verse 12
निश्चक्राम पुरात् तस्माद् यथा देवपतिस्तथा । आससाद कुरुक्षेत्रे ततः शान्तनवं नृप:,वे देवराज इन्द्रकी भाँति अपनी राजधानीसे बाहर निकले और यथासमय कुरुक्षेत्रमें शान्तनुनन्दन भीष्मजीके पास जा पहुँचे
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন নৃপ সেই নগর থেকে দেবপতি ইন্দ্রের ন্যায় বেরিয়ে পড়লেন; এবং যথাসময়ে কুরুক্ষেত্রে পৌঁছে শান্তনুনন্দন ভীষ্মের নিকট উপস্থিত হলেন।
Verse 13
उपास्यमान व्यासेन पाराशर्येण धीमता । नारदेन च राजर्षे देवलेनासितेन च,राजर्षे! उस समय वहाँ पराशरनन्दन बुद्धिमान व्यास, देवर्षि नारद और असित देवल ऋषि उनके पास बैठे थे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজর্ষি! সেই সময় সেখানে পরাশরনন্দন প্রজ্ঞাবান ব্যাস, দেবর্ষি নারদ এবং ঋষি অসিত দেবল ভীষ্মের নিকটে বসে তাঁর সেবা-উপাসনা করছিলেন।
Verse 14
हतशिष्टैनुपैश्चान्यै्नानादेशसमागतै: । रक्षिभिश्व महात्मानं रक्ष्यमाणं समन्ततः,नाना देशोंसे आये हुए नरेश, जो मरनेसे बच गये थे, रक्षक बनकर चारों ओरसे महात्मा भीष्मकी रक्षा करते थे
বৈশম্পায়ন বললেন—সংহারে বেঁচে যাওয়া এবং নানা দেশ থেকে আগত অন্যান্য নৃপগণ প্রহরীরূপে চারিদিক থেকে মহাত্মা ভীষ্মকে রক্ষা করছিলেন।
Verse 15
शयानं वीरशयने ददर्श नृपतिस्तत: । ततो रथादवातीर्य भ्रातृभि: सह धर्मराट्,धर्मराज राजा युधिष्ठिर दूरसे ही बाणशय्यापर सोये हुए भीष्मजीको देखकर भाइयोंसहित रथसे उतर पड़े
তখন রাজা বীরশয্যায়—শরশয্যায়—শায়িত ভীষ্ম পিতামহকে দেখলেন। তা দেখে ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির ভ্রাতৃগণের সঙ্গে রথ থেকে নেমে, যুদ্ধশেষের সেই মুহূর্তেও গভীর শ্রদ্ধায় পিতামহের নিকট অগ্রসর হলেন।
Verse 16
अभिवाद्याथ कौन्तेय: पितामहमरिंदम । द्वैपायनादीन वि्रांश्न तैश्न प्रत्यभिनन्दित:
তখন শত্রুদমন কুন্তীপুত্র প্রথমে পিতামহকে প্রণাম করলেন। তারপর ব্যাস প্রভৃতি ব্রাহ্মণদেরও শির নত করে বন্দনা করলেন; আর তাঁরা ধর্মসম্মত বাক্যে তাঁকে স্বাগত ও অভিনন্দন জানালেন।
Verse 17
ऋष्विम्भिब्रह्मकल्पैश्व भ्रातृभि: सह धर्मज: । आसाटद्य शरतल्पस्थमृषिभि: परिवारितम्
এরপর ধর্মপুত্র ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির ভ্রাতৃগণের সঙ্গে, ব্রহ্মসম তেজস্বী ঋত্বিক ও ঋষিদের পরিবেষ্টিত হয়ে, শরশয্যায় শায়িত ভরতশ্রেষ্ঠ গঙ্গাপুত্র ভীষ্মের নিকট উপস্থিত হলেন। পুরোহিত, ভ্রাতা ও মুনিদের মাঝে ব্রহ্মার ন্যায় দীপ্ত যুধিষ্ঠির এইভাবে বললেন।
Verse 18
अब्रवीद् भरतश्रेष्ठ धर्मराजो युधिष्ठिर: । भ्रातृभि: सह कौरव्य: शयानं निम्नगासुतम्
তখন ভরতশ্রেষ্ঠ ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির বললেন। তিনি ভ্রাতৃগণের সঙ্গে, পুরোহিত ও ঋষিদের পরিবেষ্টিত হয়ে, শরশয্যায় শায়িত গঙ্গাপুত্র ভীষ্মের নিকট গিয়ে এইভাবে কথা বললেন।
Verse 19
युधिष्ठिरो5हं नृपते नमस्ते जाह्नवीसुत । शृणोषि चेन्महाबाहो ब्रूहि किं करवाणि ते
হে জাহ্নবীসুত, হে নরেশ্বর, হে মহাবাহো! আমি যুধিষ্ঠির; আপনাকে প্রণাম করি। যদি আপনি আমার কথা শুনতে পান, তবে বলুন—আমি আপনার কী সেবা করব?
Verse 20
प्राप्तोडस्मि समये राजन्नग्नीनादाय ते विभो । आचार्य ब्राद्मणांश्वैव ऋत्विजो भ्रातरश्ष मे
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, হে পরাক্রমশালী প্রভু! নির্ধারিত সময়ে আমি উপস্থিত হয়েছি। আপনার পবিত্র অগ্নি, আচার্য, ব্রাহ্মণ ও ঋত্বিজদের সঙ্গে এনেছি; আমার ভ্রাতারাও আমার সঙ্গে আছে।
Verse 21
पुत्रश्न ते महातेजा धृतराष्ट्रो जनेश्वर: । उपस्थित: सहामात्यो वासुदेवश्च वीर्यवान्
বৈশম্পায়ন বললেন—আপনার পুত্র, মহাতেজস্বী জনেশ্বর ধৃতরাষ্ট্র, মন্ত্রীদের সঙ্গে এখানে উপস্থিত; আর বীর্যবান বাসুদেব—শ্রীকৃষ্ণ—ও এসে পৌঁছেছেন।
Verse 22
हतशिष्टाश्व॒ राजान: सर्वे च कुरुजांगला: । तान् पश्य नरशार्दूल समुन्मीलय लोचने,'पुरुषसिंह! युद्धमें मरनेसे बचे हुए समस्त राजा और कुरुजांगल देशकी प्रजा भी उपस्थित है। आप आँखें खोलिये और इन सबको देखिये
বৈশম্পায়ন বললেন—হে নরশার্দূল! সংহারের পর যে সকল রাজা বেঁচে আছেন, এবং কুরুজাঙ্গলের সমগ্র প্রজাও এখানে উপস্থিত। চোখ মেলে এদের সকলকে দেখুন।
Verse 23
यच्चेह किंचित् कर्तव्यं तत्सव॑ प्रापितं मया । यथोक्तं भवता काले सर्वमेव च तत् कृतम्
বৈশম্পায়ন বললেন—এখানে যা কিছু করণীয় ছিল, তার সবই আমি সম্পন্ন করেছি। আপনার নির্দেশ অনুসারে, যথাসময়ে, সবকিছুই করা হয়েছে।
Verse 24
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु गाड़ेय: कुन्तीपुत्रेण धीमता । ददर्श भारतान् सर्वान् स्थितान् सम्परिवार्य ह
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! বুদ্ধিমান কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠির এভাবে বললে গঙ্গানন্দন ভীষ্ম চোখ মেলে, চারদিক থেকে ঘিরে দাঁড়িয়ে থাকা সকল ভারতবংশীয়কে দেখলেন।
Verse 25
ततश्च तं बली भीष्म: प्रगृह्म विपुलं भुजम् उद्यन्मेघस्वरो वाग्मी काले वचनमत्रवीत्,फिर प्रवचनकुशल बलवान भीष्मने युधिष्ठिरकी विशाल भुजा हाथमें लेकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें यह समयोचित वचन कहा--
তখন পরাক্রমী ভীষ্ম যুধিষ্ঠিরের প্রশস্ত বাহু ধারণ করে, উদীয়মান মেঘের মতো গম্ভীর কণ্ঠে, বাক্পটু হয়ে যথাসময়ে উপযুক্ত কথা বললেন—ধর্মানুসারে করণীয়ের নীতি-সীমা স্থির করে।
Verse 26
दिष्ट्या प्राप्तोड्सि कौन्तेय सहामात्यो युधिष्ठिर । परिवृत्तो हि भगवान् सहस्रांशुर्दिवाकर:
কৌন্তেয় যুধিষ্ঠির! সৌভাগ্য যে তুমি মন্ত্রীদের সঙ্গে এখানে উপস্থিত হয়েছ। সহস্ররশ্মিধারী ভগবান দিবাকর সূর্য দক্ষিণায়ন থেকে উত্তরায়নের দিকে ফিরে এসেছেন।
Verse 27
अष्टपज्चाश तं॑ रात्र्य: शयानस्याद्य मे गता: । शरेषु निशिताग्रेषु यथा वर्षशतं तथा
এই তীক্ষ্ণ অগ্রভাগযুক্ত বাণের শয্যায় শুয়ে থাকতে থাকতে আজ আমার আটান্ন রাত্রি অতিবাহিত হয়েছে; তবু এ দিনগুলি আমার কাছে যেন শতবর্ষের সমান দীর্ঘ হয়েছে।
Verse 28
माघो<यं समनुप्राप्तो मास: सौम्यो युधिष्ठिर । त्रिभागशेष: पक्षोडयं शुक्लो भवितुमहति
যুধিষ্ঠির! চন্দ্রগণনা অনুযায়ী কোমল মাঘ মাস এসে গেছে। এটি তার শুক্লপক্ষ; এর এক অংশ অতিবাহিত হয়েছে, আর তিন অংশ এখনও অবশিষ্ট।
Verse 29
एवमुकक्त्वा तु गाड़ेयो धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । धृतराष्ट्रमथामन्त्रय काले वचनमत्रवीत्,धर्मपुत्र युधिष्ठिस्से ऐसा कहकर गंगानन्दन भीष्मने धृतराष्ट्रको पुकारकर उनसे यह समयोचित वचन कहा--
ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠিরকে এ কথা বলে গঙ্গানন্দন ভীষ্ম এরপর ধৃতরাষ্ট্রকে আহ্বান করে উপলক্ষ্যোপযোগী সময়োচিত বচন বললেন।
Verse 30
भीष्म उवाच राजन् विदितधर्मोडसि सुनिर्णीतार्थसंशय: । बहुश्रुता हि ते विप्रा बहव: पर्युपासिता:
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, তুমি ধর্মে সুপরিজ্ঞাত এবং জীবনের পরম লক্ষ্যসম্বন্ধে তোমার সংশয় সম্পূর্ণ নির্ণীত হয়েছে। তোমার মনে আর কোনো অনিশ্চয়তা নেই, কারণ তুমি বহু শাস্ত্রজ্ঞ ব্রাহ্মণদের সেবা করেছ এবং তাঁদের সান্নিধ্য ও উপদেশে উপকৃত হয়েছ।
Verse 31
वेदशास्त्राणि सर्वाणि धर्माश्न मनुजेश्वर । वेदांश्न चतुर: सर्वान् निखिलेनानुबुद्धयसे,मनुजेश्वर! तुम चारों वेदों, सम्पूर्ण शास्त्रों और धर्मोका रहस्य पूर्णरूपसे जानते और समझते हो
ভীষ্ম বললেন—হে মনুষ্যেশ্বর, তুমি চারটি বেদ, সমগ্র শাস্ত্রসমূহ এবং ধর্মের তত্ত্ব—সবই সম্পূর্ণভাবে বুঝে নিয়েছ।
Verse 32
न शोचितव्यं कौरव्य भवितव्यं हि तत् तथा । श्रुत॑ देवरहस्यं ते कृष्णद्वैघधायनादपि
ভীষ্ম বললেন—হে কৌরব্য, শোক করো না। যা ঘটেছে, তা তেমনই ঘটবার ছিল। তুমি কৃষ্ণদ্বৈপায়ন ব্যাসের কাছ থেকেও দেবতাদের গূঢ় রহস্য শুনেছ—তারই অনুবর্তনে এই মহাযুদ্ধের সমস্ত ঘটনা সংঘটিত হয়েছে।
Verse 33
यथा पाण्डो: सुता राज॑स्तथैव तव धर्मत: । तान् पालय स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतान्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, যেমন তারা পাণ্ডুর পুত্র, তেমনি ধর্মের বিচারে তারাও তোমারই। তারা সদা গুরুজনদের সেবায় নিবিষ্ট; অতএব তুমি ধর্মে প্রতিষ্ঠিত থেকে তাদের রক্ষা ও পালন করো, যেমন নিজের পুত্রদের করো।
Verse 34
धर्मराजो हि शुद्धात्मा निदेशे स्थास्यते तव । आनृशंस्यपरं होनं जानामि गुरुवत्सलम्
ভীষ্ম বললেন—ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির অন্তরে অতি শুদ্ধ; তিনি তোমার আদেশের অধীনেই থাকবেন। আমি তাঁকে জানি—তিনি করুণাকে সর্বোচ্চ মানেন, নিষ্ঠুরতাহীন, এবং গুরুজনদের প্রতি গভীর ভক্তিসম্পন্ন।
Verse 35
तव पुत्रा दुरात्मान: क्रोधलो भपरायणा: । ईर्ष्याभि भूता दुर्वत्तास्तानू न शोचितुमहसि
তোমার পুত্রেরা ছিল দুষ্টস্বভাব, ক্রোধ ও লোভে আসক্ত, ঈর্ষায় আচ্ছন্ন এবং দুরাচারী; অতএব তাদের জন্য তোমার শোক করা উচিত নয়।
Verse 36
वैशम्पायन उवाच एतावदुक्त्वा वचन धृतराष्ट्र मनीषिणम् । वासुदेव॑ महाबाहुम भ्यभाषत कौरव:
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! জ্ঞানী ধৃতরাষ্ট্রকে এত কথা বলে কুরুবংশীয় ভীষ্ম তখন মহাবাহু বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ)-কে এইভাবে সম্বোধন করলেন।
Verse 37
भीष्म उवाच भगवन् देवदेवेश सुरासुरनमस्कृत । त्रिविक्रम नमस्तुभ्यं शड्खचक्रगदाधर
ভীষ্ম বললেন—হে ভগবান, দেবদেবেশ! দেবতা ও অসুর যাঁকে প্রণাম করে, হে ত্রিবিক্রম, শঙ্খ-চক্র-গদাধারী নারায়ণ, আপনাকে নমস্কার।
Verse 38
वासुदेवो हिरण्यात्मा पुरुष: सविता विराट । जीवभूतो<नुरूपस्त्वं परमात्मा सनातन:,आप वासुदेव, हिरण्यात्मा, पुरुष, सविता, विराट, अनुरूप, जीवात्मा और सनातन परमात्मा हैं
আপনি বাসুদেব—হিরণ্যাত্মা, পুরুষ, সবিতা ও বিরাট; আপনি জীবরূপে, প্রত্যেক সত্তার স্বভাবানুসারে অন্তরে অধিষ্ঠিত, এবং আপনি সনাতন পরমাত্মা।
Verse 39
त्रायस्व पुण्डरीकाक्ष पुरुषोत्तम नित्यश: । अनुजानीहि मां कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम,कमलनयन श्रीकृष्ण! पुरुषोत्तम! वैकुण्ठ! आप सदा मेरा उद्धार करें। अब मुझे जानेकी आज्ञा दें
হে পদ্মনয়ন! হে পুরুষোত্তম! হে বৈকুণ্ঠ! সর্বদা আমাকে রক্ষা করে উদ্ধার করুন। হে কৃষ্ণ, হে পুরুষোত্তম! এখন আমাকে প্রস্থান করার অনুমতি দিন।
Verse 40
रक्ष्याश्न ते पाण्डवेया भवान् येषां परायणम् | उक्तवानस्मि दुर्बुद्धिं मन््द दुर्योधनं तदा
ভীষ্ম বললেন—যে পাণ্ডবকুমারদের জন্য আপনি পরম আশ্রয়, তাদেরই উচিত সর্বদা আপনার রক্ষা করা। সেই সময় আমি মন্দবুদ্ধি দুর্যোধনকে উপদেশ ও সতর্কবাণী দিয়েছিলাম।
Verse 41
“यत: कृष्णस्ततो धर्मो” यतो धर्मस्ततो जय: । वासुदेवेन तीर्थेन पुत्र संशाम्य पाण्डवै:
ভীষ্ম বললেন—“যেখানে কৃষ্ণ, সেখানেই ধর্ম; আর যেখানে ধর্ম, সেখানেই জয়।” অতএব, হে পুত্র! বাসুদেবের পবিত্র আশ্রয় গ্রহণ করে পাণ্ডবদের শান্ত করো—বৈর শীতল করে ধর্মসম্মত সন্ধি করো।
Verse 42
संधानस्य पर: कालस्तवेति च पुन: पुनः । न च मे तद् वचो मूढ: कृतवान् स सुमन्दधी: । घातयित्वेह पृथिवीं ततः स निधनं गत:
ভীষ্ম বললেন—আমি বারবার তাকে বলেছিলাম—“এখনই তোমার জন্য সন্ধির শ্রেষ্ঠ সময়।” কিন্তু সেই মোহগ্রস্ত, অতিমন্দবুদ্ধি ব্যক্তি আমার কথা মানল না। এই পৃথিবীতে মহাসংহার ঘটিয়ে শেষে সে নিজেই বিনাশে পতিত হল।
Verse 43
प्रभो! आप ही जिनके परम आश्रय हैं
ভীষ্ম বললেন—প্রভো! যাঁদের পরম আশ্রয় আপনি, সেই পাণ্ডবদেরই উচিত সর্বদা আপনার রক্ষা করা। আমি মন্দবুদ্ধি দুর্যোধনকে বলেছিলাম—“যেখানে শ্রীকৃষ্ণ, সেখানেই ধর্ম; আর যেখানে ধর্ম, সেখানেই সেই পক্ষের জয়। অতএব, বৎস দুর্যোধন! ভগবান শ্রীকৃষ্ণের সহায়তায় পাণ্ডবদের সঙ্গে সন্ধি করো; সন্ধির জন্য এ এক অতি উত্তম সুযোগ।” কিন্তু বারবার বললেও সেই মূঢ় মন্দবুদ্ধি আমার কথা মানল না; সে পৃথিবীর বীরদের বিনাশ ঘটিয়ে শেষে নিজেও কালের গ্রাসে গেল। আর আমি আপনাকে চিনি, দেব—আপনি সেই প্রাচীন, ঋষিদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ নারায়ণ, যিনি নরের সঙ্গে দীর্ঘকাল বদরীকাশ্রমে বাস করেছিলেন।
Verse 44
तथा मे नारद: प्राह व्यासश्व॒ सुमहातपा: । नरनारायणावेतौ सम्भूतौ मनुजेष्विति
ভীষ্ম বললেন—দেবর্ষি নারদও আমাকে এ কথাই বলেছিলেন, আর মহাতপস্বী ব্যাসও—“এই দুইজন, কৃষ্ণ ও অর্জুন, প্রকৃতপক্ষে নারায়ণ ও নর; তাঁরা মানবলোকে অবতীর্ণ হয়েছেন।”
Verse 45
स मां त्वमनुजानीहि कृष्ण मोक्ष्ये कलेवरम् | त्वयाहं समनुज्ञातो गच्छेयं परमां गतिम्,श्रीकृष्ण! अब आप आज्ञा दीजिये, मैं इस शरीरका परित्याग करूँगा। आपकी आज्ञा मिलनेपर मुझे परम गतिकी प्राप्ति होगी
ভীষ্ম বললেন—হে কৃষ্ণ, আমাকে অনুমতি দিন; এখন আমি এই দেহ ত্যাগ করব। আপনার অনুমোদন পেলে আমি পরম গতি লাভ করব।
Verse 46
वासुदेव उवाच अनुजानामि भीष्म त्वां वसून् प्राप्तुहि पार्थिव । न ते$स्ति वृजिनं किंचिदिहलोके महाद्युते
বাসুদেব বললেন—হে মহাতেজস্বী ভীষ্ম, হে রাজন, আমি তোমাকে অনুমতি দিচ্ছি; তুমি বসুলোক প্রাপ্ত হও। হে মহাদ্যুতি, এই জগতে তোমার মধ্যে অণুমাত্রও পাপের দাগ নেই।
Verse 47
पितृभक्तो5सि राजर्षे मार्कण्डेय इवापर: । तेन मृत्युस्तव वशे स्थितो भृत्य इवानतः,राजर्ष! आप दूसरे मार्कण्डेयके समान पितृभक्त हैं; इसलिये मृत्यु विनीत दासीके समान आपके वशमें हो गयी है
বাসুদেব বললেন—হে রাজর্ষি, তুমি অপর এক মার্কণ্ডেয়ের মতো পিতৃভক্ত; তাই মৃত্যু নিজেই বিনীত ভৃত্যের ন্যায় তোমার অধীনে অবস্থান করে।
Verse 48
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु गाड़ेय: पाण्डवानिदमब्रवीत् | धृतराष्ट्रमुखां श्वापि सर्वाश्व सुहृदस्तथा
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়, ভগবানের এমন বাক্য শুনে গঙ্গানন্দন ভীষ্ম পাণ্ডবদের এবং ধৃতরাষ্ট্রকে অগ্রে রেখে সকল সুহৃদকে এই কথা বললেন।
Verse 49
प्राणानुत्स्रष्टमिच्छामि तत्रानुज्ञातुमर्ह थ । सत्येषु यतितव्यं व: सत्यं हि परमं बलम्
আমি এখন প্রাণ ত্যাগ করতে চাই; অতএব তোমরা সবাই আমাকে এর অনুমতি দাও। তোমরা সর্বদা সত্যধর্ম পালনে যত্নবান থেকো, কারণ সত্যই পরম বল।
Verse 50
आनुृशंस्यपरैर्भाव्यं सदैव नियतात्मभि: । ब्रह्मण्यैर्धर्मशीलैश्व तपोनित्यैश्ष भारता:
হে ভরতবংশীয়গণ! সংযতচিত্ত ব্যক্তিদের সর্বদা সকলের প্রতি করুণা ও কোমলতায় আচরণ করা উচিত; মন ও ইন্দ্রিয় সংযত রেখে ব্রাহ্মণভক্ত, ধর্মনিষ্ঠ এবং তপস্যায় নিত্যস্থিত হওয়া উচিত।
Verse 51
इत्युक्त्वा सुह्ृद: सर्वान् सम्परिष्वज्य चैव ह । पुनरेवाब्रवीद् धीमान् युधिष्ठिरमिदं वच:
এ কথা বলে প্রাজ্ঞ ভীষ্ম সকল সুহৃদকে আলিঙ্গন করলেন; তারপর আবার যুধিষ্ঠিরকে এই বাক্য বললেন।
Verse 52
ब्राह्मणाश्रैव ते नित्यं प्राज्ञाश्रैव विशेषत: | आचार्या ऋत्विजश्वचैव पूजनीया जनाधिप
হে জনাধিপ! তোমার উচিত সর্বদা ব্রাহ্মণদের—বিশেষত জ্ঞানীদের—পূজা করা; তদ্রূপ আচার্য ও ঋত্বিজগণও সর্বদা পূজনীয়।
Verse 167
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि भीष्मस्वर्गारोहणपर्वणि दानधर्मे सप्तषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত ভীষ্মস্বর্গারোহণপর্বে দানধর্ম-বিষয়ক একশো সাতষট্টিতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।