Adhyaya 12
Anushasana ParvaAdhyaya 1258 Verses

Adhyaya 12

Bhaṅgāśvanopākhyāna — On comparative affection in strī–puruṣa union (भङ्गाश्वनोपाख्यानम्)

Upa-parva: Anuśāsana (Didactic Dialogues) — Itihāsa of Bhaṅgāśvana and Śakra (Indra)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to resolve a doubt: in the physical union of woman and man, whose “touch/affective impact” is greater. Bhīṣma responds by citing an ancient narrative about King Bhaṅgāśvana, a highly dharmic ruler who, being without heirs, performs a sacrifice for sons. Śakra (Indra), portrayed as antagonized by the king’s ritual stance, seeks an opportunity to disrupt him; during a hunting excursion the king becomes disoriented, reaches a beautiful lake, and upon bathing is transformed into a woman. Returning in this altered state, the king confronts social and political complications, installs his sons to rule, and retreats to the forest. In an āśrama context, the transformed king bears another hundred sons. Later, Śakra—disguised as a brāhmaṇa—provokes division between the two sets of sons, leading to conflict and grief. When Śakra reveals himself, he grants a boon: which sons should live, those born when the ruler was male or those born when transformed. The transformed ruler chooses the latter, asserting that a woman’s affection is greater than a man’s; Śakra, pleased, restores life broadly and offers a further choice of gender-state. The ruler elects to remain female, citing greater pleasure and satisfaction in that condition. Bhīṣma closes by deriving the general proposition: in this frame, a woman’s prīti is described as greater.

Chapter Arc: भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि कृतघ्नता की गति और प्रायश्चित्त के विषय में एक प्राचीन इतिहास सुनो—जहाँ स्वयं इन्द्र का वैर और एक राजर्षि का विचित्र रूपान्तरण धर्म-चर्चा को तीखा बना देता है। → अत्यन्त धर्मात्मा, पर अपुत्र, राजर्षि भंगास्वन पुत्रार्थ यज्ञ करते हैं और कालक्रम से उनके दो सौ पुत्रों का विनाश हो जाता है। शोक में डूबी अवस्था में इन्द्र प्रकट होकर कठोर वचन कहता है—पुराने अपमान/दुःख का स्मरण कराकर वैर को जाग्रत करता है और राजा के सामने असाधारण विकल्प रखता है: पुरुषत्व या स्त्रीत्व में से एक चुनो। → इन्द्र के वर-प्रस्ताव के बाद भंगास्वन का स्त्रीरूप में परिणत होना और उसी रूप में नगर में लौटना—जहाँ पुत्र, स्त्रियाँ, सेवक और प्रजा विस्मय से भर उठते हैं—कथा का शिखर है; पहचान, कर्तव्य और सामाजिक दृष्टि एक साथ टकराते हैं। → स्त्रीभूत भंगास्वन अपने जीवन के नाम-गोत्र, दार, मन्त्रियों और राज्य-व्यवस्था के बीच स्वयं को स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं; अंततः इन्द्र के चरणों में शरण लेकर क्षमा-याचना करते हैं और वैर-प्रसंग का शमन/प्रायश्चित्त की दिशा स्पष्ट होती है। → इन्द्र की प्रसन्नता और भंगास्वन के लिए अंतिम व्यवस्था (स्थायी रूप, पुत्रों/राज्य का भविष्य) किस प्रकार निश्चित होती है—यह आगे की कथा-धारा में पूर्ण रूप से खुलती है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं) ऑपन--#रू< बक। है २ >> द्ादशोड् ध्याय: कृतघ्नकी गति और प्रायश्षित्तका वर्णन तथा स्त्री-पुरुषके संयोगमें स्त्रीको ही अधिक सुख होनेके सम्बन्धमें भंगास्वनका उपाख्यान (युधिष्ठिर उदाच प्रायक्षित्तं कृतघ्नानां प्रतिब्रूहि पितामह । बगिलिक [ गुरूंश्वैव येडवमन्यन्ति मोहिता: ।। पूछा--पितामह! जो मोहवश माता-पिता तथा गुरुजनोंका अपमान करते हैं उन कृतघ्नोंके लिये कया प्रायश्चित्त है? यह बताइये ।। ये चाप्यन्ये परे तात कृतघ्ना निरपत्रपा: । तेषां गति महाबाहो श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। तात! महाबाहो! दूसरे भी जो निर्लज्ज एवं कृतघ्न हैं उनकी गति कैसी होती है? यह सब मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ ।। भीष्म उवाच कृतघ्नानां गतिस्तात नरके शाश्वती: समा: । मातापितृगुरूणां च ये न तिष्ठन्ति शासने ।। कृमिकीटपिपीलेषु जायन्ते स्थावरेषु च । दुर्लभो हि पुनस्तेषां मानुष्ये पुनरुद्‌भव: ।। भीष्मजीने कहा--तात! कृतघ्नोंकी एक ही गति है

যুধিষ্ঠির বললেন— “পিতামহ! যারা মোহবশত মাতা-পিতা ও গুরুজনকে অবমাননা করে—সেই অকৃতজ্ঞদের প্রায়শ্চিত্ত কী, আমাকে বলুন। আর হে তাত, আরও যারা নির্লজ্জ ও অকৃতজ্ঞ—হে মহাবাহো, তাদের পরিণতি কী হয়, তা আমি সত্যরূপে শুনতে চাই।”

Verse 2

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । भंगास्वनेन शक्रस्य यथा वैरमभूत्‌ पुरा

ভীষ্ম বললেন— “হে রাজন! এ বিষয়েও লোকেরা এক প্রাচীন ইতিবৃত্তের দৃষ্টান্ত দেয়—কীভাবে পূর্বকালে ভঙ্গাশ্বনের সঙ্গে শক্র (ইন্দ্র)-এর বৈর জন্মেছিল।”

Verse 3

पुरा भंगास्वनो नाम राजर्षिरतिधार्मिक: । अपुत्र: पुरुषव्याघ्र पुत्रार्थ यज्ञमाहरत्‌

ভীষ্ম বললেন— “হে পুরুষব্যাঘ্র! প্রাচীন কালে ভঙ্গাশ্বন নামে এক অতিধার্মিক রাজর্ষি ছিলেন। তিনি পুত্রহীন ছিলেন; তাই পুত্রলাভের উদ্দেশ্যে তিনি যজ্ঞ আরম্ভ করেছিলেন।”

Verse 4

अग्निष्ठृतं स राजर्षिरिन्द्रद्धिष्ट महाबल: । प्रायक्षित्तेषु मर्त्यानां पुत्रकामेषु चेष्यते

ভীষ্ম বললেন— “সেই মহাবলী রাজর্ষি ‘অগ্নিষ্টৃত’ নামে যজ্ঞ করেছিলেন। তাতে ইন্দ্রকে প্রধান স্থান না দেওয়ায় ইন্দ্র সেই যজ্ঞের প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করতেন। কিন্তু মর্ত্যলোকে এই যজ্ঞ প্রায়শ্চিত্তের সময়েও এবং পুত্রকামনায়ও কাম্য বলে গণ্য।”

Verse 5

इन्द्रो ज्ञात्वा तु तं यज्ञ महाभाग: सुरेश्वर: । अन्तरं तस्य राजर्षेरन्विच्छन्नियतात्मन:

ভীষ্ম বললেন— “সেই যজ্ঞের কথা জেনে মহাভাগ দেবেশ্বর ইন্দ্র, আত্মসংযমী সেই রাজর্ষির আচরণে কোনো ত্রুটি—কোনো ফাঁক—খুঁজতে লাগলেন।”

Verse 6

न चैवास्यान्तरं राजन्‌ स ददर्श महात्मन: । कस्यचित्त्वय कालस्य मृगयां गतवान्‌ नृप:

হে রাজন! বহু অনুসন্ধান করেও তারা সেই মহাত্মা নৃপতির কোনো দুর্বলতা বা ফাঁক খুঁজে পেল না। কিছু কাল পরে রাজা শিকারের উদ্দেশ্যে অরণ্যে গেলেন।

Verse 7

इदमन्तरमित्येव शक्रो नृपममोहयत्‌ । एकाशथ्चैन च राजर्षि भ्रान्त इन्द्रेण मोहित:

হে নরেশ্বর! “এটাই প্রতিশোধ নেওয়ার সুযোগ”—এই স্থির সিদ্ধান্ত করে শক্র (ইন্দ্র) রাজাকে মোহগ্রস্ত করলেন। ইন্দ্রের মায়ায় বিভ্রান্ত রাজর্ষি ভঙ্গাশ্বন একমাত্র একটি ঘোড়া নিয়ে দিশাহারা হয়ে এদিক-ওদিক ঘুরতে লাগলেন; দিকজ্ঞানও লুপ্ত হল। ক্ষুধা-তৃষ্ণায় কাতর, পরিশ্রম ও তৃষ্ণার দাহে ব্যাকুল হয়ে তিনি ঘুরে বেড়ালেন।

Verse 8

न दिशो<विन्दत नृप: क्षुत्पिपासार्दितस्तदा । इतश्रैतश्न वै राजन्‌ श्रमतृष्णान्वितो नूप

সেই সময় ক্ষুধা-তৃষ্ণায় কাতর রাজা দিকনির্ণয়ও করতে পারলেন না। হে রাজন! ক্লান্তি ও তৃষ্ণায় ব্যাকুল হয়ে তিনি এদিক-ওদিক ঘুরে বেড়ালেন।

Verse 9

सरो<पश्यत्‌ सुरुचिरं पूर्ण परमवारिणा । सो<5वगाहा सरस्तात पाययामास वाजिनम्‌,तात! घूमते-घूमते उन्होंने उत्तम जलसे भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर देखा। उन्होंने घोड़ेको उस सरोवरमें स्नान कराकर पानी पिलाया

হে তাত! ঘুরতে ঘুরতে তিনি উৎকৃষ্ট জলে পরিপূর্ণ এক অতিশয় সুন্দর সরোবর দেখলেন। সেই সরোবরে নেমে তিনি ঘোড়াটিকে স্নান করালেন এবং জল পান করালেন।

Verse 10

अथ पीतोदकं सोश्व॑ वृक्षे बद्ध्वा नृपोत्तम: । अवगाहा ततः स्नातत्तत्र स्त्रीत्वमवाप्तवान्‌

ঘোড়াটি জল পান করে নিলে, শ্রেষ্ঠ নৃপতি তাকে একটি বৃক্ষে বেঁধে দিলেন। তারপর তিনি নিজে জলে নেমে স্নান করলেন; সেখানেই স্নানমাত্র তিনি নারীত্ব লাভ করলেন।

Verse 11

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपरव्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें लक्ष्मी और रुक्मिणीका संवादविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,आत्मानं स्त्रीकृतं दृष्टवा व्रीडितो नृपसत्तम: । चिन्तानुगतसर्वात्मा व्याकुलेन्द्रियचेतन:

নিজেকে নারীরূপে রূপান্তরিত দেখে রাজশ্রেষ্ঠ লজ্জায় আচ্ছন্ন হলেন। তাঁর সমগ্র অন্তঃকরণ উদ্বেগময় চিন্তায় নিমগ্ন হয়ে পড়ল, আর ইন্দ্রিয় ও চেতনা অস্থির হয়ে উঠল।

Verse 12

अपनेको स्त्रीरूपमें देखकर राजाको बड़ी लज्जा हुई। उनके सारे अन्तःकरणमें भारी चिन्ता व्याप्त हो गयी। उनकी इन्द्रियाँ और चेतना व्याकुल हो उठीं ।।

স্ত্রীরূপে নিজেকে দেখে রাজা গভীর লজ্জায় পড়লেন। তাঁর সমগ্র মনে ভারী উদ্বেগ ছড়িয়ে পড়ল; ইন্দ্রিয় ও চেতনা অস্থির হয়ে উঠল। তিনি ভাবলেন—“এখন আমি কীভাবে ঘোড়ায় উঠব? কীভাবে নগরে যাব? আমি বিধিপূর্বক অগ্নিষ্টুত যজ্ঞ সম্পন্ন করেছি; তার ফলে আমার নিজের দেহজাত একশো মহাবলী পুত্র লাভ হয়েছে—তাদের আমি কী বলব? আমার পত্নীদের মধ্যে, আর নগর ও জনপদের লোকদের মধ্যে আমি কীভাবে উপস্থিত হব?”

Verse 13

जात॑ महाबलानां मे तान्‌ प्रवक्ष्यामि कि त्वहम्‌ दारेषु चात्मकीयेषु पौरजानपदेषु च

“আমার মহাবলী পুত্রেরা জন্মেছে—এখন আমি তাদের কী বলব? আর নিজের অন্তঃপুরের নারীদের মধ্যে, এবং নগর ও জনপদের লোকদের মধ্যে আমি কীভাবে ফিরে যাব?”

Verse 14

मृदुत्वं च तनुत्वं च विक्लवत्वं तथैव च । स्त्रीगुणा ऋषिश्ि: प्रोक्ता धर्मतत्त्वार्थदर्शिभि:,“धर्मके तत्त्वको देखने और जाननेवाले ऋषियोंने मृदुता, कृशता और व्याकुलता--ये सत्रीके गुण बताये हैं

“কোমলতা, সূক্ষ্মতা (কৃশতা) এবং বিচলতা—ধর্মের তত্ত্ব ও অর্থ যাঁরা প্রত্যক্ষ করেন, সেই ঋষিরা এগুলিকে নারীর গুণ বলে বর্ণনা করেছেন।”

Verse 15

व्यायामे कर्कशत्वं च वीर्य च पुरुषे गुणा: । पौरुषं विप्रणष्टं वै स्त्रीत्वं केनापि मे5भवत्‌

“পরিশ্রমে কঠোরতা এবং শক্তি ও বীর্য—এগুলি পুরুষের গুণ। কিন্তু আমার পৌরুষ সত্যই লুপ্ত হয়েছে, আর কোনো অজ্ঞাত কারণে আমার মধ্যে নারীত্ব প্রকাশ পেয়েছে।”

Verse 16

स्त्रीभावात्‌ पुनरश्चं तं कथमारोदुमुत्सहे । महता त्वथ यत्नेन आरुद्माश्वं नराधिप:

সেই নারীত্বভাবের কারণে আমি আবার কী করে সেই অশ্বে আরোহন করতে সাহস করব? তবু মহৎ প্রচেষ্টায় অবশেষে সেই নরাধিপ অশ্বে আরূঢ় হলেন।

Verse 17

पुत्रा दाराश्न भृत्याश्न पौरजानपदाश्न ते

তোমার পুত্রগণ, তোমার পত্নীগণ, তোমার ভৃত্যবর্গ, এবং নগর ও জনপদের প্রজারা—এ সকলই তোমার দায়িত্বের অধীন।

Verse 18

अथोवाच स राजर्षि: स्त्रीभूतो वदतां वर:

তখন সেই রাজর্ষি—নারীরূপ প্রাপ্ত হয়ে, বক্তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—বলেন। সেখানে নারীরূপধারী রাজর্ষি ভঙ্গাস্বন ঘোষণা করলেন—“আমি নিজ সৈন্যবাহিনী পরিবেষ্টিত হয়ে শিকারে বেরিয়েছিলাম; কিন্তু দৈবের প্রেরণায় চিত্ত বিভ্রান্ত হয়ে এক ভয়ংকর অরণ্যে প্রবেশ করলাম।”

Verse 19

मृगयामस्मि निर्यातो बलै: परिवृतो दृढम्‌ । उदशभ्रान्त: प्राविशं घोरामटवीं दैवचोदित:

আমি দৃঢ়ভাবে আমার সৈন্যবাহিনী দ্বারা পরিবেষ্টিত হয়ে শিকারে বেরিয়েছিলাম; কিন্তু দৈবের প্রেরণায় চিত্ত বিভ্রান্ত হয়ে এক ভয়ংকর অরণ্যে প্রবেশ করলাম।

Verse 20

अटबव्यां च सुघोरायां तृष्णातों नष्टचेतन: । सर: सुरुचिरप्रख्यमपश्यं पक्षिभिवृतम्‌,उस घोर वनमें प्याससे पीड़ित एवं अचेत-सा होकर मैंने एक सरोवर देखा, जो पक्षियोंसे घिर हुआ और मनोहर शोभासे सम्पन्न था

সেই অতিশয় ভয়ংকর অরণ্যে তৃষ্ণায় কাতর ও প্রায় চেতনাহীন হয়ে আমি এক সরোবর দেখলাম—মনোরম শোভায় প্রসিদ্ধ—যা পাখিদের দ্বারা পরিবেষ্টিত ছিল।

Verse 21

उस सरोवरमें उतरकर स्नान करते ही दैवने मुझे स्त्री बना दिया। अपनी स्त्रियों और मन्त्रियोंके नाम-गोत्र बताकर उन स्त्रीरूपधारी श्रेष्ठ नरेशने अपने पुत्रोंसे कहा--'पुत्रो! तुमलोग आपसमें प्रेमपूर्वक्क रहकर राज्यका उपभोग करो। अब मैं वनको चला जाऊँगा'

সেই সরোবরে নেমে স্নান করামাত্রই দৈব আমাকে নারীতে পরিণত করল। তখন নারীরূপধারী সেই শ্রেষ্ঠ নৃপতি নিজের পত্নী ও মন্ত্রীদের নাম-গোত্র জানিয়ে পুত্রদের বললেন— “পুত্রগণ! তোমরা পরস্পর স্নেহে একত্রে থেকে রাজ্য ভোগ করো। আমি এখন বনেই গমন করব।”

Verse 22

आह पुत्रांस्ततः सो5थ स्त्रीभूत: पार्थिवोत्तम: । सम्प्रीत्या भुज्यतां राज्यं वनं यास्यामि पुत्रका:

ভীষ্ম বললেন— তখন নারীতে পরিণত সেই শ্রেষ্ঠ নৃপতি পুত্রদের বললেন— “স্নেহে একত্রে থেকে রাজ্য ভোগ করো; আমি বনেই গমন করব, হে পুত্রগণ।”

Verse 23

एवमुक्‍्त्वा पुत्रशतं वनमेव जगाम ह | गत्वा चैवाश्रमं सा तु तापसं प्रत्यपद्यत,अपने सौ पुत्रोंसे ऐसा कहकर राजा वनको चले गये। वह स्त्री किसी आश्रममें जाकर एक तापसके आश्रयमें रहने लगी

এ কথা বলে রাজা তাঁর শত পুত্রকে রেখে বনে চলে গেলেন। আর সেই নারী এক আশ্রমে গিয়ে এক তপস্বীর আশ্রয় গ্রহণ করল।

Verse 24

तापसेनास्य पुत्राणामाश्रमेष्वभवच्छतम्‌ । अथ सा<55दाय तानू्‌ सर्वान्‌ पूर्वपुत्रानभाषत

ভীষ্ম বললেন— সেই তপস্বীর আশ্রমে তার একশো পুত্র জন্মাল। তারপর রানি তাদের সকলকে সঙ্গে নিয়ে পূর্বে জন্মানো পুত্রদের কাছে গিয়ে বলল— “পুত্রগণ! যখন আমি পুরুষরূপে ছিলাম, তখন তোমরা আমার শত পুত্র; আর এখন আমি নারীরূপে এসেছি, এরা আমার শত পুত্র। তোমরা সকলে একত্র হয়ে ভ্রাতৃভাব নিয়ে এই রাজ্য ভোগ ও শাসন করো।”

Verse 25

पुरुषत्वे सुता यूय॑ स्त्रीत्वे चेमे शतं सुता: । एकत्र भूज्यतां राज्यं भ्रातृभावेन पुत्रका:

ভীষ্ম বললেন— “পুরুষরূপে তোমরা আমার পুত্র; আর নারীরূপে এরা আমার শত পুত্র। অতএব, হে পুত্রগণ, ভ্রাতৃভাব নিয়ে একত্রে রাজ্য ভোগ করো।”

Verse 26

सहिता भ्रातरस्ते5थ राज्यं बुभुजिरे तदा । तान्‌ दृष्टवा भ्रातृभावेन भुज्जानान्‌ राज्यमुत्तमम्‌

ভীষ্ম বললেন—তখন সেই ভ্রাতারা একত্র হয়ে রাজ্য ভোগ ও শাসন করতে লাগল। ভ্রাতৃভাব নিয়ে একসঙ্গে বাস করে সেই উৎকৃষ্ট রাজ্য উপভোগ করতে তাদের দেখে দেবরাজ ইন্দ্র ক্রোধে পরিপ্লুত হয়ে মনে মনে ভাবল—‘আমি তো এই রাজর্ষির উপকারই করেছি; তার কোনো অপকার আমি করিনি।’

Verse 27

चिन्तयामास देदवेन्द्रो मन्युनाथ परिप्लुत: । उपकारोअस्य राजर्षे: कृतो नापकृतं मया

ভীষ্ম বললেন—ক্রোধে আচ্ছন্ন দেবেন্দ্র ইন্দ্র ভাবতে লাগলেন—‘আমি এই রাজর্ষির উপকারই করেছি; কোনো অপকার করিনি।’

Verse 28

ततो ब्राह्मणरूपेण देवराज: शतक्रतुः । भेदयामास तान्‌ गत्वा नगरं वै नृपात्मजान्‌,तब देवराज इन्द्रने ब्राह्मणका रूप धारण करके उस नगरमें जाकर उन राजकुमारोंमें फूट डाल दी

তখন দেবরাজ শতক্রতু ইন্দ্র ব্রাহ্মণের রূপ ধারণ করে নগরে গিয়ে সেই রাজপুত্রদের মধ্যে বিভেদ সৃষ্টি করলেন।

Verse 29

भ्रातृणां नास्ति सौक्षात्रं येष्वेकस्य पितु: सुताः । राज्यहेतोर्विवदिता: कश्यपस्य सुरासुरा:

ভীষ্ম বললেন—একই পিতার পুত্র হয়েও ভাইদের মধ্যে প্রায়ই সত্যিকারের ভ্রাতৃস্নেহ থাকে না। কশ্যপের পুত্র দেবতা ও অসুররাও রাজ্যলাভের জন্য পরস্পরের সঙ্গে নিরন্তর বিবাদে লিপ্ত থাকে।

Verse 30

यूयं भड्भास्वनापत्यास्तापसस्येतरे सुता: । कश्यपस्य सुराश्चैव असुराश्च सुतास्तथा

ভীষ্ম বললেন—‘তোমরা ভড্ভাস্বনের পুত্র, আর অন্য ভাইয়েরা এক তপস্বীর পুত্র। এমন ভিন্ন উৎসে তোমাদের মধ্যে পারস্পরিক স্নেহ কীভাবে স্থির থাকবে? কশ্যপেরই পুত্র দেবতা ও অসুর—তবু তাদের মধ্যে প্রেম ও ঐক্য জন্মায় না।’

Verse 31

युष्माकं पैतृकं राज्यं भुज्यते तापसात्मजै: । इन्द्रेण भेदितास्ते तु युद्धेउन्योन्यमपातयन्‌

“তোমাদের পৈতৃক রাজ্য তপস্বীর পুত্রেরা এসে ভোগ করছে।” ইন্দ্রের প্ররোচনায় বিভেদ সৃষ্টি হলে তারা পরস্পরের সঙ্গে যুদ্ধ করে একে অন্যকে নিধন করল।

Verse 32

तच्छुत्वा तापसी चापि संतप्ता प्ररुरोद ह । ब्राह्मणच्छटझनाभ्येत्य तामिन्द्रो5थान्वपृच्छत

এই সংবাদ শুনে তাপসী গভীর শোকে আচ্ছন্ন হয়ে অঝোরে কাঁদতে লাগল। তখন ব্রাহ্মণের ছদ্মবেশে ইন্দ্র তার কাছে এসে জিজ্ঞাসা করলেন।

Verse 33

केन दुःखेन संतप्ता रोदिषि त्वं वरानने । ब्राह्मणं तं ततो दृष्टवा सा स्त्री करुणमब्रवीत्‌,'सुमुखि! तुम किस दुःखसे संतप्त होकर रो रही हो?” उस ब्राह्मणको देखकर वह स्त्री करुणस्वरमें बोली--

“হে সুমুখী, কোন দুঃখে দগ্ধ হয়ে তুমি কাঁদছ?” সেই ব্রাহ্মণকে দেখে নারীটি করুণ কণ্ঠে বলল।

Verse 34

पुत्राणां द्वे शते ब्रह्मन्‌ कालेन विनिपातिते । अहूं राजाभवं विप्र तत्र पूर्व शतं मम

“হে ব্রাহ্মণ, কালের আঘাতে আমার দুই শত পুত্র নিহত হয়েছে। হে বিপ্র, আমি একদা রাজা ছিলাম; সেই পূর্বকালে আমার এক শত পুত্র জন্মেছিল।”

Verse 35

समुत्पन्नं स्वरूपाणां पुत्राणां ब्राह्मणोत्तम | कदाचिन्मृगयां यात उद्भ्रान्तो गहने वने

“হে ব্রাহ্মণোত্তম, আমার পুত্রেরা আমারই রূপসদৃশ ছিল। একবার শিকারে গিয়ে ঘন অরণ্যে আমি বিভ্রান্ত হয়ে পথ হারালাম।”

Verse 36

अवगादश्न सरसि स्त्रीभूतो ब्राह्मणोत्तम । पुत्रान्‌ राज्ये प्रतिष्ठाप्प वनमस्मि ततो गत:

ভীষ্ম বললেন— হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ! এক সরোবরে অবগাহন করে স্নান করতেই আমি পুরুষ থেকে স্ত্রীতে পরিণত হলাম। তারপর পুত্রদের রাজ্যে প্রতিষ্ঠা করে আমি বনে চলে গেলাম।

Verse 37

स्त्रियाश्न मे पुत्रशतं तापसेन महात्मना । आश्रमे जनितं ब्रह्मन्‌ नीतं तन्नगरं मया

ভীষ্ম বললেন— স্ত্রীরূপ ধারণ করার পর সেই মহাত্মা তপস্বী এই আশ্রমে আমার গর্ভে শত পুত্র উৎপন্ন করলেন। হে ব্রাহ্মণ! আমি তাদের সকলকে নগরে নিয়ে গিয়ে রাজ্যে প্রতিষ্ঠিত করালাম।

Verse 38

तेषां च वैरमुत्पन्नं कालयोगेन वै द्विज । एतत्‌ शोचाम्यहं ब्रह्मन्‌ दैवेन समभिप्लुता

ভীষ্ম বললেন— হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! কালের যোগে তাদের মধ্যে বৈর জন্ম নিল। হে ব্রাহ্মণ, দैবের আঘাতে অভিভূত হয়ে আমি এই কারণেই শোকে নিমজ্জিত।

Verse 39

इन्द्रस्तां दु:खितां दृष्टवा अब्रवीत्‌ परुषं वच: । पुरा सुदुःसहं भद्रे मम दुःखं त्वया कृतम्‌,इन्द्रने उसे दु:खी देख कठोर वाणीमें कहा--भद्रे! जब पहले तुम राजा थीं, तब तुमने भी मुझे दुःसह दुःख दिया था

ভীষ্ম বললেন— তাকে দুঃখিত দেখে ইন্দ্র কঠোর বাক্যে বললেন— ‘ভদ্রে! পূর্বে তুমিই আমাকে অসহ্য দুঃখ দিয়েছিলে।’

Verse 40

इन्द्रद्ध्रिन यजता मामनाहूय घिष्ठितम्‌ । इन्द्रोडहमस्मि दुर्बुद्धे वैरं ते पातितं मया

ভীষ্ম বললেন— ইন্দ্র বললেন— ‘ইন্দ্র-সম্বন্ধীয় যজ্ঞ তুমি করেছিলে, কিন্তু আমাকে আহ্বান না করেই তা সম্পন্ন করেছ। দুর্বুদ্ধি! আমিই ইন্দ্র; তোমার বৈরের প্রতিশোধ আমি-ই নিয়েছি।’

Verse 41

इन्द्रं दृष्टवा तु राजर्षि: पादयो: शिरसा गत: । प्रसीद त्रिदशश्रेष्ठ पुत्रकामेन स क्रतुः

ইন্দ্রকে দর্শন করে রাজর্ষি তাঁর চরণে মস্তক নত করলেন। পুত্রলাভের আকাঙ্ক্ষায় সেই যজ্ঞকারী ক্রতু বিনীতভাবে প্রার্থনা করল—“হে ত্রিদশশ্রেষ্ঠ, প্রসন্ন হন।”

Verse 42

प्रणिपातेन तस्येन्द्र: परितुष्टो वरं ददौ

তার এই প্রণিপাতে ইন্দ্র সন্তুষ্ট হয়ে বর দিতে উদ্যত হলেন এবং বললেন—“রাজন! তোমার কোন পুত্রেরা জীবিত হোক—স্ত্রীভাব অবস্থায় তোমার থেকে যাঁরা জন্মেছিল, না কি পুরুষভাব অবস্থায় তোমার থেকে যাঁরা জন্মেছিল?”

Verse 43

पुत्रास्ते कतमे राजन्‌ जीवन्त्वेतत्‌ प्रचक्ष्व मे । स्त्रीभूतस्य हि ये जाता: पुरुषस्याथ येडभवन्‌

“রাজন, আমাকে বলো—তোমার কোন পুত্রেরা জীবিত হোক? যারা তোমার স্ত্রীভাব অবস্থায় জন্মেছিল, না কি যারা তোমার পুরুষভাব অবস্থায় জন্মেছিল?”

Verse 44

तापसी तु ततः शक्रमुवाच प्रयताउ्जलि: । स्त्रीभूतस्य हि ये पुत्रास्ते मे जीवन्तु वासव

তখন সেই তাপসী করজোড়ে শক্র (ইন্দ্র)-কে বলল—“হে বাসব! আমি যখন স্ত্রীভাব ধারণ করেছিলাম, তখন আমার থেকে যে পুত্রেরা জন্মেছিল, তারাই জীবিত হোক।”

Verse 45

इन्द्रस्तु विस्मितो दृष्ट्वा स्त्रियं पप्रच्छ तां पुनः । पुरुषोत्पादिता ये ते कथं द्वेष्या: सुतास्तव

তখন ইন্দ্র বিস্মিত হয়ে সেই নারীকে আবার জিজ্ঞাসা করলেন—“যে পুত্রদের তুমি পুরুষরূপে উৎপন্ন করেছিলে, তারা কীভাবে তোমার ঘৃণার পাত্র হয়ে উঠল?”

Verse 46

स्त्रीभूतस्य हि ये जाता: स्नेहस्तेभ्योडथधिक: कथम्‌ | कारण श्रोतुमिच्छामि तन्मे वक्तुमिहाहसि

ভীষ্ম বললেন— “নারীরূপ ধারণ করে যাদের জন্ম দিয়েছ, তাদের প্রতি তোমার স্নেহ কেন অধিক? আমি তার কারণ শুনতে চাই; এখানে আমাকে তা বলাই তোমার উচিত।”

Verse 47

रूयुवाच स्त्रियास्त्वभ्यधिक: स्नेहो न तथा पुरुषस्य वै | तस्मात्‌ ते शक्र जीवन्तु ये जाता: स्त्रीकृतस्य वै

স্ত্রী বলল— “হে শক্র! স্ত্রীর স্নেহই অধিক; পুরুষের স্নেহ তেমন নয়। অতএব, হে ইন্দ্র, আমি নারীরূপে থাকাকালে যাদের জন্ম দিয়েছি, তারাই জীবিত হোক।”

Verse 48

भीष्म उवाच एवमुक्तस्ततस्त्विन्द्र: प्रीतो वाक्यमुवाच ह । सर्व एवेह जीवन्तु पुत्रास्ते सत्यवादिनि

ভীষ্ম বললেন— সে কথা শুনে ইন্দ্র প্রসন্ন হয়ে বললেন— “হে সত্যবাদিনী! এখানে তোমার সকল পুত্রই জীবিত হোক।”

Verse 49

वरं च वृणु राजेन्द्र यं त्वमिच्छसि सुव्रत । पुरुषत्वमथ स्त्रीत्वं मत्तो यदभिकाडुक्षते

“হে রাজেন্দ্র, হে সুব্রত! তোমার ইচ্ছামতো আর একটি বর বেছে নাও। তুমি কি আবার পুরুষ হতে চাও, না কি নারী হয়েই থাকতে চাও? যা কামনা কর, আমার কাছে তা প্রার্থনা কর।”

Verse 50

रूयुवाच स्त्रीत्वमेव वृणे शक्र पुंस्त्वं नेच्छामि वासव । एवमुक्तस्तु देवेन्द्रस्तां स्त्रियं प्रत्युवाच ह

স্ত্রী বলল— “হে শক্র! আমি নারীত্বই বরণ করি; হে বাসব! আমি আর পুরুষ হতে চাই না।” এ কথা শুনে দেবরাজ ইন্দ্র সেই নারীর প্রতি আবার বললেন।

Verse 51

पुरुषत्वं कथं त्यक्त्वा स्त्रीत्वं चोदयसे विभो | एवमुक्त: प्रत्युवाच स्त्रीभूतो राजसत्तम:

ভীষ্ম বললেন— “হে মহাবলী! পুরুষত্ব ত্যাগ করে তুমি কেন স্ত্রীত্বেরই অনুরোধ করছ?” এভাবে সম্বোধিত হলে স্ত্রীরূপপ্রাপ্ত সেই রাজশ্রেষ্ঠ উত্তর দিলেন।

Verse 52

स्त्रिया: पुरुषसंयोगे प्रीतिरभ्यधिका सदा । एतस्मात्‌ कारणाच्छक्र स्त्रीत्वमेव वृणोम्पहम्‌

“হে শক্র, দেবেন্দ্র! পুরুষের সঙ্গে সংযোগে নারীর আনন্দ সর্বদাই অধিক; এই কারণেই আমি স্ত্রীত্বই বরণ করি।”

Verse 53

रमिताभ्यधिकं स्त्रीत्वे सत्यं वै देवसत्तम । स्त्रीभावेन हि तुष्यामि गम्यतां त्रिदशाधिप

“হে দেবশ্রেষ্ঠ! সত্যই বলছি—স্ত্রীভাবেই আমি অধিক রতি-সুখ অনুভব করেছি; তাই স্ত্রীরূপেই আমি সন্তুষ্ট। হে ত্রিদশাধিপ, আপনি প্রস্থান করুন।”

Verse 54

एवमस्त्विति चोक्‍्त्वा तामापृच्छ त्रिदिवं गत: । एवं स्त्रिया महाराज अधिका प्रीतिरुच्यते

“এবমস্তু—তথাস্তु” বলে ইন্দ্র সেই তপস্বিনীকে বিদায় জানিয়ে ত্রিদিবে (স্বর্গে) গমন করলেন। এইভাবে, হে মহারাজ, বিষয়-ভোগে নারীর প্রীতি পুরুষের তুলনায় অধিক বলা হয়।

Verse 163

पुनरायात्‌ पुरं तात स्त्रीकृतो नृपसत्तम: । “अब स्त्रीभाव आ जानेसे उस अश्वपर कैसे चढ़ सकूँगी?” तात! किसी-किसी तरह महान्‌ प्रयत्न करके वे स्त्रीरूपधारी नरेश घोड़ेपर चढ़कर अपने नगरमें आये

তারপর, হে তাত, স্ত্রীরূপপ্রাপ্ত সেই নৃপশ্রেষ্ঠ পুনরায় নিজের নগরে ফিরে এলেন। তিনি ভাবলেন— “এখন স্ত্রীভাব এসে পড়েছে, আমি কীভাবে সেই ঘোড়ায় উঠব?” তবু মহাপ্রয়াসে, যেভাবেই হোক, স্ত্রীরূপেই ঘোড়ায় চড়ে তিনি রাজধানীতে পৌঁছালেন।

Verse 173

किंच्विदं त्विति विज्ञाय विस्मयं परमं गता: । राजाके पुत्र, स्त्रियाँ, सेवक तथा नगर और जनपदके लोग, “यह क्‍या हुआ?'--ऐसी जिज्ञासा करते हुए बड़े आश्वर्यमें पड़ गये

“এটা তবে কী?”—এ কথা বুঝে তারা পরম বিস্ময়ে আচ্ছন্ন হল। রাজা, তাঁর পুত্রগণ, নারীগণ, পরিচারকবৃন্দ এবং নগর ও জনপদের লোকেরা সকলেই—“কী ঘটল?” বলে জিজ্ঞাসা করতে করতে মহা আশ্চর্যে নিমগ্ন হল।

Verse 231

तत्रावगाढ: स्त्रीभूतो दैवेनाहं कृत: पुरा । नामगोत्राणि चाभाष्य दाराणां मन्त्रिणां तथा

সেখানে আমি সেই অবস্থায় নিমজ্জিত হয়েছিলাম; ভাগ্যবশত বহু আগে আমাকে নারীরূপ ধারণ করতে হয়েছিল। আর আমি স্ত্রীদের এবং তদ্রূপ মন্ত্রীদের নাম ও গোত্র উচ্চারণ করেছিলাম।

Verse 413

इष्टस्त्रिदशशार्टूल तत्र मे क्षन्तुमरहसि । इन्द्रको देखकर वे स्त्रीरूपधारी राजर्षि उनके चरणोंमें सिर रखकर बोले--'सुरश्रेष्ठ आप प्रसन्न हों। मैंने पुत्रकी इच्छासे वह यज्ञ किया था। देवेश्वर! उसके लिये आप मुझे क्षमा करें!

হে ত্রিদশশার্দূল! এই বিষয়ে আমাকে ক্ষমা করুন। পুত্রলাভের কামনায় আমি সেই যজ্ঞ করেছিলাম; হে দেবেশ্বর! অতএব আমাকে ক্ষমা করে প্রসন্ন হোন।

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira asks whose experience is ‘greater’ in strī–puruṣa union—framed as the comparative predominance of touch/affective impact (sparśa) and the resulting prīti.

Through Bhaṅgāśvana’s stated preference after transformation, the exemplum concludes that a woman’s affection (sneha/prīti) is described as greater in this narrative logic, and that experiential testimony is used to settle the question.

No explicit phalaśruti formula appears here; the chapter functions as a precedent-setting exemplum whose ‘result’ is the resolved doubt and the ethical-psychological generalization stated at the close.