
Āloka-dāna (Dīpa-dāna), Sumanas–Dhūpa–Dīpa Phala: Manu–Suvarṇa and Śukra–Bali Exempla
Upa-parva: Dāna-dharma (Gifts of fragrance, incense, and light) — Āloka-dāna / Dīpa-dāna discourse
The chapter opens with Yudhiṣṭhira asking Bhīṣma to define āloka-dāna (gift of light), its origin, and its fruit. Bhīṣma replies by introducing an ancient narrative: the ascetic Suvarṇa approaches Manu on Meru and asks about worship with flowers (sumanas) and the resulting merit. Manu, in turn, cites an older dialogue between Śukra and Bali that grounds the taxonomy of auspicious and inauspicious substances through the contrast of amṛta and viṣa, linking sensory qualities (especially fragrance) to psychological and moral effects. The discourse classifies flowers and plants by traits (thornless/thorny, color, habitat, cultivated/wild) and aligns offerings with recipients: gods are pleased by fragrance; yakṣa/rākṣasa by sight; nāgas by enjoyment; humans by all three. It then details incense types (resins, sarala, compounded forms) and recipient preferences (e.g., guggulu as especially esteemed). The teaching culminates in dīpa-dāna: light is praised as upward-leading and as a remedy for darkness; giving lamps yields radiance and auspicious status, while stealing lamps leads to deprivation. Practical injunctions include proper lamp materials, recommended locations for lamp-giving, and household bali offerings differentiated by recipient categories. The chapter closes by tracing the transmission lineage of the teaching (Śukra → Bali; Manu → Suvarṇa; Suvarṇa → Nārada; Nārada → Bhīṣma), reinforcing its canonical authority.
Chapter Arc: युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं—‘आलोकदान’ (दीप/प्रकाश का दान) वास्तव में कैसा है और उसका फल क्या है? दानधर्म के सूक्ष्म भेदों में जिज्ञासा जाग उठती है। → भीष्म उत्तर को केवल उपदेश न रखकर ‘पुरातन इतिहास’ का आश्रय लेते हैं—प्रजापति मनु और ‘सुवर्ण’ नामक तपस्वी ब्राह्मण का संवाद। कथा में दान के विविध रूप (पुष्प, धूप, दीप, उपहार/बलि) और उनके विधि-नियम, सुगन्ध-द्रव्यों के प्रकार, तथा देवताओं के प्रसन्न/अप्रसन्न होने की शक्ति क्रमशः खुलती जाती है। → मुख्य प्रतिपादन तीव्र होता है—देवता मान-सम्मान और तृप्ति से मनुष्यों का कल्याण करते हैं, और अवज्ञा/उपेक्षा से अधमों को ‘दह’ देते हैं; इसी संदर्भ में पुष्पदान के गुण धूप-निवेदन पर भी समान रूप से लागू बताए जाते हैं, तथा विभिन्न भूत-नाग-देव-सम्बन्धी उपहार/बलि के विशिष्ट विधान (जैसे नागों के लिए पद्म-उत्पलयुक्त, गुड़-मिश्रित तिल) स्पष्ट किए जाते हैं। → कथा-परंपरा की शृंखला स्थापित होती है—शुक्राचार्य ने असुरेन्द्र बलि को यह धर्म कहा; मनु ने सुवर्ण को; सुवर्ण ने नारद को; और नारद ने वही गुण-धर्म भीष्म को—अब भीष्म युधिष्ठिर को उसे आचरण में उतारने का आग्रह करते हैं।
Verse 1
बी जम अष्टनवतितमोब् ध्याय: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद--पुष्प
যুধিষ্ঠির বললেন—হে ভারতশ্রেষ্ঠ! ‘আলোকদান’ বা দীপদান নামে যে কর্ম, তা কেমন? কীভাবে তা সম্পাদিত হয়? এর উৎপত্তি কীভাবে? এবং এর ফল কী? আমাকে বলুন।
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । मनो: प्रजापतेर्वादं सुवर्णस्य च भारत,भीष्मजीने कहा--भारत! इस विषयमें प्रजापति मनु और सुवर्णके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है
ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! এ বিষয়েও এক প্রাচীন ইতিবৃত্ত উদাহরণ হিসেবে বলা হয়—প্রজাপতি মনু ও সুবর্ণের সংলাপ।
Verse 3
तपस्वी कश्चिदभवत् सुवर्णो नाम भारत । वर्णतो हेमवर्ण: स सुवर्ण इति पप्रथे
ভীষ্ম বললেন— হে ভারতবংশধর! একদা ‘সুবর্ণ’ নামে এক তপস্বী ছিলেন। তাঁর বর্ণ স্বর্ণের ন্যায় দীপ্ত ছিল; সেইজন্য, হে ভরতনন্দন, তিনি ‘সুবর্ণ’ নামেই সর্বত্র প্রসিদ্ধ হন।
Verse 4
कुलशीलगुणोपेत: स्वाध्याये च परंगत: । बहून् सुवंशप्रभवान् समतीत: स्वकैर्गुणै:
তিনি উত্তম কুল, শীল ও গুণে সমৃদ্ধ ছিলেন এবং স্বাধ্যায়ে পরম পারদর্শী ছিলেন। নিজের সদ্গুণের বলেই তিনি খ্যাতিমান বংশে জন্ম নেওয়া বহু শ্রেষ্ঠ পুরুষকেও অতিক্রম করেছিলেন।
Verse 5
स कदाचिन्मनु विप्रो ददर्शोपससर्प च | कुशलप्रश्नमन्योन्यं तौ चोभौ तत्र चक्रतु:,एक दिन जन ब्राह्मणदेवताने प्रजापति मनुको देखा। देखकर वे उनके पास चले गये। फिर तो वे दोनों एक-दूसरेसे कुशल-समाचार पूछने लगे
একদিন সেই ব্রাহ্মণ প্রজাপতি মনুকে দেখলেন এবং তাঁর নিকট গিয়ে উপস্থিত হলেন। সেখানে তাঁরা দু’জন পরস্পরের কুশল-সংবাদ জিজ্ঞাসা করলেন।
Verse 6
ततस्तौ सत्यसंकल्पौ मेरौ काउ्चनपर्वते । रमणीये शिलापृष्ठे सहितौ संन्यषीदताम्,तदनन्तर वे दोनों सत्यसंकल्प महात्मा सुवर्णमय पर्वत मेरके एक रमणीय शिलापृष्ठपर एक साथ बैठ गये
তারপর সত্যসঙ্কল্প সেই দুই মহাত্মা স্বর্ণময় মেরু পর্বতের এক মনোরম শিলাতলে একসঙ্গে উপবিষ্ট হলেন।
Verse 7
तत्र तौ कथयन्तौ स्तां कथा नानाविधाश्रया: । ब्रद्मर्षिदेवदैत्यानां पुराणानां महात्मनाम्
সেখানে তাঁরা দু’জন নানা আশ্রয়ে নানা প্রকার কথা বলতে লাগলেন— ব্রহ্মর্ষি, দেবতা, দৈত্য এবং প্রাচীন মহাত্মাদের পুরাণকথা।
Verse 8
सुवर्णस्त्वब्रवीद् वाक््यं मनुं स्वायम्भुवं प्रति । हितार्थ सर्वभूतानां प्रश्न॑ मे वक्तुमहसि
ভীষ্ম বললেন— তখন সুবর্ণ স্বয়ম্ভুব মনুকে বলল— “সকল প্রাণীর কল্যাণের জন্য আমার এক প্রশ্নের উত্তর আপনি দিন। ফুল দিয়ে দেবতাদের যে পূজা করা হয়— সেই প্রথা আসলে কী? এর প্রচলন কীভাবে হলো? এর ফল কী, এবং এর যথার্থ উদ্দেশ্যই বা কী? সবই আমাকে বলুন।”
Verse 9
सुमनोभिर्यदिज्यन्ते दैवतानि प्रजेश्वर । किमेतत् कथमुत्पन्नं फलं योगं च शंस मे
“প্রজেশ্বর! সুগন্ধি ফুল দিয়ে যখন দেবতাদের পূজা করা হয়, তখন এই প্রথার প্রকৃত স্বরূপ কী? এটি কীভাবে উৎপন্ন হলো? এর ফল কী, আর এর যথাযথ প্রয়োগ কী? স্পষ্ট করে আমাকে বলুন।”
Verse 10
मनुर॒ुवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शुक्रस्य च बलेश्रैव संवादं वै महात्मनो:
মনু বললেন— “এ বিষয়েও পণ্ডিতেরা এক প্রাচীন ইতিবৃত্ত উদ্ধৃত করেন— মহাত্মা শুক্র এবং বলির সংলাপ।”
Verse 11
बलेवैंरोचनस्येह त्रैलोक्यमनुशासत: । समीपमाजगामाशु शुक्रो भूगुकुलोद्वह:,पहलेकी बात है, विरोचनकुमार बलि तीनों लोकोंका शासन करते थे। उन दिनों भुगुकुलभूषण शुक्र शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये
ভীষ্ম বললেন— “এক সময় বিরোচনের পুত্র বলি তিন লোকের শাসন করছিলেন। তখন ভৃগুবংশের শ্রেষ্ঠ শুক্রাচার্য দ্রুত তাঁর নিকট উপস্থিত হলেন।”
Verse 12
तमर्ध्यादिभिरभ्यर्च्य भार्गव॑ं सोडसुराधिप: । निषसादासने पश्चाद् विधिवद् भूरिदक्षिण:
ভীষ্ম বললেন— “অসুরদের অধিপতি, দানশীল বলি ভৃগুপুত্র ভার্গব (শুক্রাচার্য)-কে অর্ঘ্য প্রভৃতি নিবেদন করে বিধিপূর্বক সম্মান জানালেন। গুরু আসনে বসার পর, বলিও নিয়মমাফিক নিজের আসনে বসলেন।”
Verse 13
कथेयमभवत् तत्र त्वया या परिकीर्तिता । सुमनोधूपदीपानां सम्प्रदाने फलं प्रति
ভীষ্ম বললেন—সেখানে ঠিক সেই কথোপকথনই হয়েছিল, যা তুমি বর্ণনা করেছ। দেবতাদের উদ্দেশে পুষ্প, ধূপ ও দীপ নিবেদন করলে যে ফল লাভ হয়—সেই ছিল তাদের আলোচনার বিষয়। তখন দৈত্যরাজ বলি কবিশ্রেষ্ঠ শুক্রের সামনে এই উৎকৃষ্ট প্রশ্ন উপস্থিত করলেন।
Verse 14
ततः पप्रच्छ दैत्येन्द्र: कवीन्द्रं प्रश्रमुत्तमम्
তারপর দৈত্যেন্দ্র বলি শ্রেষ্ঠ কবি-ঋষিকে প্রশ্ন করলেন।
Verse 15
बलिस्वाच सुमनोधूपदीपानां किं फल ब्रह्मवित्तम । प्रदानस्य द्विजश्रेष्ठ तद् भवान् वक्तुमहति
বলি বললেন—হে ব্রহ্মবিদ্যায় শ্রেষ্ঠ! হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! পুষ্প, ধূপ ও দীপ দান/অর্পণ করলে কী ফল লাভ হয়? আপনি কৃপা করে তা বলুন।
Verse 16
शुक्र उवाच तप: पूर्व समुत्पन्नं धर्मस्तस्मादनन्तरम् । एतस्मिन्नन्तरे चैव वीरुदोषध्य एव च
শুক্র বললেন—হে রাজন! প্রথমে তপস্যার উৎপত্তি হয়েছিল, তার পরে ধর্মের। আর এই দুয়ের মধ্যবর্তী কালে লতা ও ঔষধিও প্রকাশিত হয়েছিল।
Verse 17
सोमस्यात्मा च बहुधा सम्भूत: पृथिवीतले । अमृतं च विषं चैव ये चान्ये तृतजातय:,इस भूतलपर अनेक प्रकारकी सोमलता प्रकट हुई। अमृत, विष तथा दूसरी-दूसरी जातिके वृणोंका प्रादुर्भाव हुआ
শুক্র বললেন—পৃথিবীতলে সোমের আত্মা/সার বহু রূপে প্রকাশিত হয়েছিল। সেখান থেকেই অমৃত ও বিষ, এবং আরও নানা প্রকার তৃণজাতিও উৎপন্ন হয়েছিল।
Verse 18
अमृतं मनसः प्रीतिं सद्यस्तृप्तिं ददाति च । मनो ग्लपयते तीव्र विष॑ गन्धेन सर्वश:
অমৃত মনকে আনন্দিত করে এবং তৎক্ষণাৎ তৃপ্তি দান করে। কিন্তু বিষ তার গন্ধমাত্রেই মনকে সর্বতোভাবে তীব্র বিষাদ ও ক্লেশে নিমজ্জিত করে।
Verse 19
अमृतं मंगलं विद्धि महद्विषममंगलम् । ओपषघध्यो ह्ामृतं सर्वा विषं तेजोडग्निसम्भवम्
অমৃতকে মঙ্গলময় জেনো, আর বিষকে মহা অমঙ্গলকর। সকল ঔষধিকে ‘অমৃত’ বলা হয়েছে; আর বিষ হলো অগ্নিজাত তেজ।
Verse 20
मनो ह्वादयते यस्माच्छियं चापि दधाति च । तस्मात् सुमनस: प्रोक्ता नरै: सुकृतकर्मभि:,फूल मनको आह्लाद प्रदान करता है और शोभा एवं सम्पत्तिका आधान करता है, इसलिये पुण्यात्मा मनुष्योंने उसे सुमन कहा है
যেহেতু তা মনকে আহ্লাদিত করে এবং শ্রী—শোভা ও সমৃদ্ধি—দান করে, তাই সুকর্মশীল মানুষেরা তাকে ‘সুমন’ বলে অভিহিত করেছেন।
Verse 21
देवताभ्य: सुमनसो यो ददाति नर: शुचि: । तस्य तुष्यन्ति वै देवास्तुष्टा: पुष्टिं ददत्यपि,जो मनुष्य पवित्र होकर देवताओंको फूल चढ़ाता है, उसके ऊपर सब देवता संतुष्ट होते और उसके लिये पुष्टि प्रदान करते हैं
যে শুচি মানুষ দেবতাদের উদ্দেশে ফুল অর্পণ করে, তার দ্বারা দেবতারা সন্তুষ্ট হন; সন্তুষ্ট হয়ে তাঁরা তাকে পুষ্টি ও সমৃদ্ধিও দান করেন।
Verse 22
यं यमुद्दिश्य दीयेरन् देव॑ सुमनस: प्रभो । मंगलार्थ स तेनास्य प्रीतो भवति दैत्यप
হে প্রভু! যে যে দেবতাকে উদ্দেশ করে ফুল দান করা হয়, সেই দেবতা সেই পুষ্পদানে দাতার প্রতি অত্যন্ত প্রসন্ন হন এবং তার মঙ্গলের জন্য সদা সচেষ্ট থাকেন।
Verse 23
ज्ञेयास्तूग्राश्न सौम्याश्न॒ तेजस्विन्यश्न॒ ता: पृथक् । ओषघध्यो बहुवीर्या हि बहुरूपास्तथैव च,उग्रा, सौम्या, तेजस्विनी, बहुवीर्या और बहुरूपा--अनेक प्रकारकी ओषधियाँ होती हैं। उन सबको जानना चाहिये
শুক্র বললেন—উগ্র, সৌম্য ও তেজস্বিনী—এই ভেদে ঔষধিগুলিকে পৃথক্ভাবে চিনে নিতে হবে। ঔষধি বহু বীর্যসম্পন্ন ও বহুরূপা; অতএব তাদের যথাযথ জ্ঞান ও পার্থক্য নির্ণয় করা উচিত।
Verse 24
यज्ञियानां च वृक्षाणामयज्ञीयान् निबोध मे । आसुराणि च माल्यानि दैवतेभ्यो हितानि च
শুক্র বললেন—আমার কাছ থেকে জানো কোন কোন বৃক্ষ যজ্ঞকর্মে উপযুক্ত এবং কোনগুলি অনুপযুক্ত। আর বুঝে নাও কোন কোন পুষ্পমালা ‘আসুরিক’ স্বভাবের বলে গণ্য, এবং কোনগুলি দেবতাদের অর্ঘ্যরূপে কল্যাণকর ও যথোচিত।
Verse 25
अब यज्ञसम्बन्धी तथा अयज्ञोपयोगी वृक्षोंका वर्णन सुनो। असुरोंके लिये हितकर तथा देवताओंके लिये प्रिय जो पुष्पमालाएँ होती हैं, उनका परिचय सुनो ।।
শুক্র বললেন—এখন যজ্ঞ-সম্পর্কিত এবং যজ্ঞের বাইরে ব্যবহৃত বৃক্ষসমূহের বর্ণনা শোনো। যে পুষ্পমালাগুলি অসুরদের পক্ষে হিতকর এবং দেবতাদের প্রিয়, তাদের পরিচয়ও শোনো। ক্রমানুসারে আমি রাক্ষস, নাগ, যক্ষ, মানুষ এবং পিতৃগণের প্রিয় ও মনোহর ঔষধি-উদ্ভিদের কথাও বলব—শোনো।
Verse 26
वन्या ग्राम्याश्वेह तथा कृष्टोप्ता: पर्वताश्रया: । अकण्टका: कण्टकिनो गन्धरूपरसान्विता:
শুক্র বললেন—কিছু বৃক্ষ বনজ, কিছু গ্রাম্য (গ্রামের নিকট চাষকৃত)। কিছু জমি চাষ করে রোপিত হয়, আর কিছু পর্বতাঞ্চলে স্বয়ং জন্মায়। এদের মধ্যে কিছু কাঁটাবিহীন, কিছু কাঁটাযুক্ত; তবু সকলের মধ্যেই গন্ধ, রূপ ও রস বিদ্যমান।
Verse 27
द्विविधो हि स्मृतो गन्ध इष्टोडनिष्ट श्व पुष्पज: । इष्टगन्धानि देवानां पुष्पाणीति विभावय
শুক্র বললেন—ফুলজাত গন্ধ দুই প্রকার বলে স্মৃত: ইষ্ট (প্রিয়) ও অনিষ্ট (অপ্রিয়)। ভালো করে জেনে রাখো—ইষ্টগন্ধযুক্ত সুগন্ধি পুষ্প দেবতাদের প্রিয়।
Verse 28
अकण्टकानां वृक्षाणां श्वेतप्रायाश्व॒ वर्णत: । तेषां पुष्पाणि देवानामिष्टानि सततं प्रभो
শুক্র বললেন—প্রভু! কাঁটাবিহীন বৃক্ষগুলির মধ্যে যেগুলি প্রধানত শ্বেতবর্ণ, তাদের ফুল দেবতাদের নিত্য প্রিয়। পদ্ম ও তুলসী সর্বপ্রকার অর্ঘ্য-উপচারে পূজিত; আর মল্লিকা (জুঁই) ফুলের মধ্যে বিশেষ প্রশংসিত।
Verse 29
जलजानि च माल्यानि पद्मादीनि च यानि वै । गन्धर्वनागयक्षेभ्यस्तानि दद्याद् विचक्षण:,जलसे उत्पन्न होनेवाले जो कमल-उत्पल आदि पुष्प हैं, उन्हें विद्वान् पुरुष गन्धर्वों, नागों और यक्षोंको समर्पित करे
শুক্র বললেন—জলজাত যে মালা ও পুষ্প—পদ্ম প্রভৃতি—সেগুলি বিচক্ষণ ব্যক্তি গন্ধর্ব, নাগ ও যক্ষদের উদ্দেশে অর্পণ করবে।
Verse 30
ओपषध्यो रक्तपुष्पाश्न कटुका: कण्टकान्विता: । शत्रूणामभिचारार्थमाथर्वेषु निदर्शिता:
শুক্র বললেন—আথর্বণ পরম্পরায় নির্দেশ আছে যে শত্রুর অনিষ্টসাধনের অভিচার-কর্মে লাল ফুলধারী, তিক্ত স্বাদের ও কাঁটাযুক্ত ঔষধি ব্যবহার করা উচিত।
Verse 31
तीक्ष्णवीर्यस्ति भूतानां दुरालम्भा: सकण्टका: । रक्तभूयिष्ठवर्णाश्न कृष्णाश्वलैवोपहारयेत्
শুক্র বললেন—ভূতপ্রভৃতি সত্তাদের উদ্দেশে তীক্ষ্ণ প্রভাবযুক্ত, ধরতে কষ্টকর, কাঁটাযুক্ত, এবং প্রধানত লাল বা কালো বর্ণের ফুল অর্পণ করা উচিত।
Verse 32
मनोहृदयनन्दिन्यो विशेषमधुराश्च या: । चारुरूपा: सुमनसो मानुषाणां स्मृता विभो
শুক্র বললেন—হে বিভো! মানুষের কাছে সেই ফুলই প্রিয় বলে মানা হয়, যা মন ও হৃদয়কে আনন্দ দেয়, যার মাধুর্য বিশেষ, এবং যার রূপ-রঙ মনোহর।
Verse 33
न तु श्मशानसम्भूता देवतायतनोद्भवा: । संनयेत् पुष्टियुक्तेषु विवाहेषु रह:सु च,श्मशान तथा जीर्ण-शीर्ण देवालयोंमें पैदा हुए फूलोंका पौष्टिक कर्म, विवाह तथा एकान्त विहारमें उपयोग नहीं करना चाहिये
শ্মশানে জন্মানো কিংবা দেবালয়ের প্রাঙ্গণে গজানো ফুল পুষ্টিকর্মে, বিবাহে ও গোপন রতি-বিহারে ব্যবহার করা উচিত নয়।
Verse 34
गिरिसानुरुहा: सौम्या देवानामुपपादयेत् । प्रोक्षिता< भ्युक्षिता: सौम्या यथायोग्यं यथास्मृति
পর্বতশিখরে জন্মানো মনোহর ও সুগন্ধি ফুল ধুয়ে বা জলে ছিটিয়ে, স্মৃতিশাস্ত্রের বিধান অনুযায়ী যথাযথভাবে দেবতাদের অর্পণ করা উচিত।
Verse 35
गन्धेन देवास्तुष्यन्ति दर्शनाद् यक्षराक्षसा: । नागा: समुपभोगेन त्रिभिरेतैस्तु मानुषा:
দেবতারা ফুলের গন্ধে তুষ্ট হন, যক্ষ-রাক্ষসরা কেবল দর্শনে; নাগেরা পূর্ণ উপভোগে; আর মানুষ এই তিনটিতেই—দর্শন, গন্ধ ও উপভোগে—সন্তুষ্ট হয়।
Verse 36
सद्यः प्रीणाति देवान् वै ते प्रीता भावयन्त्युत । संकल्पसिद्धा मर्त्यानामीप्सितैश्व मनोरमै:
পুষ্পার্পণে মানুষ তৎক্ষণাৎ দেবতাদের প্রসন্ন করে; আর তাঁরা প্রসন্ন হয়ে—সঙ্কল্পসিদ্ধ দেবতারা—মানুষের কল্যাণ সাধন করেন এবং ইচ্ছিত ও মনোরম ভোগ দান করেন।
Verse 37
प्रीता: प्रीणन्ति सततं मानिता मानयन्ति च । अवज्ञातावधूताश्न निर्दहन्त्यधमान् नरान्
দেবতারা প্রসন্ন হলে সদা প্রসন্নতা দান করেন; সম্মানিত হলে সম্মান দেন। কিন্তু অবজ্ঞা ও অবহেলা করা হলে, তাঁরা অধম মানুষকে ক্রোধাগ্নিতে দগ্ধ করে দেন।
Verse 38
अत ऊर्ध्व॑ प्रवक्ष्यामि धूपदानविधे: फलम् | धूपांश्व विविधान् साधूनसाधूंक्ष निबोध मे,इसके बाद अब मैं धूपदानकी विधिका फल बताऊँगा। धूप भी अच्छे और बुरे कई तरहके होते हैं। उनका वर्णन मुझसे सुनो
এখন থেকে আমি ধূপদান-বিধির ফল বলছি। ধূপ নানা প্রকার—কিছু শুভ ও কল্যাণকর, কিছু অশুভ; তাদের ভেদ আমার কাছ থেকে শোনো।
Verse 39
निर्यासा: सारिणश्रैव कृत्रिमाश्वैव ते त्रयः । इष्टोडनिष्टो भवेद् गंधस्तन्मे विस्तरश: शूणु
ধূপের প্রধানত তিন প্রকার—নির্যাস, সারিণ এবং কৃত্রিম। এদের গন্ধও দুই রকম—প্রিয় ও অপ্রিয়। অতএব এগুলি আমার কাছ থেকে বিস্তারে শোনো।
Verse 40
निर्यासा: सल्लकीवर्ज्या देवानां दयिताउस्तु ते । गुग्गुलुः प्रवरस्तेषां सर्वेषामिति निश्चय:
নির্যাসজাত ধূপ—সল্লকী বৃক্ষজাতটি বাদে—দেবতাদের অতি প্রিয়। তাদের মধ্যে গুগ্গুলুই সর্বশ্রেষ্ঠ—এটাই জ্ঞানীদের স্থির সিদ্ধান্ত।
Verse 41
अगुरु: सारिणां श्रेष्ठो यक्षराक्षसभोगिनाम् | दैत्यानां सल्लकीयश्व काड्क्षतो यश्व तद्विध:
সারিণ ধূপের মধ্যে অগুরু শ্রেষ্ঠ, এবং তা বিশেষত যক্ষ, রাক্ষস ও নাগদের প্রিয়। দৈত্যরা সল্লকী ও তদ্রূপ অন্যান্য বৃক্ষের নির্যাসজাত ধূপ পছন্দ করে।
Verse 42
अथ सर्जरसादीनां गंधै: पार्थिव दारवै: । फाणितासवसंयुक्तर्मनुष्याणां विधीयते
হে পৃথিবীনাথ! সরজ-রস প্রভৃতির গন্ধ, এবং পার্থিব ও দারব (মাটি ও কাঠজাত) সুগন্ধি দ্রব্য ফাণিত ও আসবের সঙ্গে মিশিয়ে যে প্রস্তুত ধূপ বানানো হয়, সেটিই মানুষের জন্য বিধিপূর্বক প্রস্তুত করা হয়।
Verse 43
देवदानवभूतानां सद्यस्तुष्टिकर: स्मृत: । येडन्ये वैहारिकास्तत्र मानुषाणामिति स्मृता:
শুক্র বললেন—এই ধূপ দেবতা, দানব ও ভূত-প্রেত সকলেরই তৎক্ষণাৎ তুষ্টি দান করে বলে স্মৃতিতে বলা হয়েছে। এ ছাড়াও ভোগ-বিলাস ও বিনোদনে ব্যবহৃত আরও নানা প্রকার ধূপ আছে; সেগুলি কেবল মানুষের ব্যবহারের অন্তর্গত বলে গণ্য।
Verse 44
य एवोक्ता: सुमनसां प्रदाने गुणहेतव: । धूपेष्वपि परिज्ञेयास्त एव प्रीतिवर्धना:
শুক্র বললেন—দেবতাদের ফুল অর্পণে যে গুণ ও ফলের কথা বলা হয়েছে, ধূপ নিবেদনেও সেই একই ফল প্রাপ্ত হয়—এ কথা জেনে রাখা উচিত। ধূপও দেবতাদের প্রীতি বৃদ্ধি করে—এমনই জানো।
Verse 45
दीपदाने प्रवक्ष्यामि फलयोगमनुत्तमम् । यथा येन यदा चैव प्रदेया यादृशाश्व ते,अब मैं दीप-दानका परम उत्तम फल बताऊँगा। कब किस प्रकार किसके द्वारा किसके दीप दिये जाने चाहिये, यह सब बताता हूँ, सुनो
শুক্র বললেন—এখন আমি দীপদান থেকে উৎপন্ন অতুল ফল-সম্বন্ধ ঘোষণা করব। কীভাবে, কার দ্বারা, কোন সময়ে এবং কোন বিধিতে দীপ অর্পণ করা উচিত—সবই শোনো।
Verse 46
ज्योतिस्तेज: प्रकाशं वाप्यूर्ध्वगं चापि वर्ण्यते । प्रदानं तेजसां तस्मात् तेजो वर्धयते नृणाम्
শুক্র বললেন—জ্যোতি ‘তেজ’, ‘প্রকাশ’ এবং ‘ঊর্ধ্বগামী শক্তি’—এভাবে বর্ণিত। অতএব আলোকদায়ী বস্তু দান করলে মানুষের তেজ বৃদ্ধি পায়—তার দীপ্তি, খ্যাতি ও নৈতিক প্রতাপ উন্নত হয়।
Verse 47
अन्धन्तमस्तमिस्रं च दक्षिणायनमेव च । उत्तरायणमेतस्माज्ज्योतिर्दानं प्रशस्थते
শুক্র বললেন—‘অন্ধতামিস্র’ নামে যে নরক আছে এবং দক্ষিণায়ন—উভয়ই অন্ধকারের সঙ্গে যুক্ত বলে কথিত। বিপরীতে উত্তরায়ণ আলোকময়; তাই তা শ্রেষ্ঠ গণ্য। অতএব অন্ধকারময়, নরকসদৃশ অবস্থার নিবৃত্তির জন্য জ্যোতি-দান (দীপদান) বিশেষভাবে প্রশংসিত।
Verse 48
यस्मादूर्ध्वगमेतत् तु तमसश्वैव भेषजम् । तस्मादूर्ध्वगतेर्दाता भवेदत्रेति निश्चय:
কারণ প্রদীপশিখা স্বভাবতই ঊর্ধ্বগামী, তাই তা তমসারূপ অন্ধকারেরও ঔষধ। অতএব এখানে স্থির সিদ্ধান্ত—যে প্রদীপ দান করে, সে ঊর্ধ্বগতির দাতা হয়ে উচ্চ ও মঙ্গলময় অবস্থায় উন্নীত হয়।
Verse 49
देवास्तेजस्विनो हास्मात् प्रभावन्त: प्रकाशका: । तामसा राक्षसाश्रैव तस्माद् दीप: प्रदीयते
শুক্র বললেন—দেবতারা তেজস্বী; স্বভাবতই তারা প্রভাবশালী ও আলোকপ্রদ। রাক্ষসেরা তমসেরই স্বরূপ। তাই (অন্ধকার দূর করে আলো আনতে) প্রদীপ দান করা হয়।
Verse 50
देवता तेजस्वी, कांतिमान् और प्रकाश फैलानेवाले होते हैं और राक्षस अंधकारप्रिय होते हैं; इसलिये देवताओंकी प्रसन्नताके लिये दीपदान किया जाता है ।।
শুক্র বললেন—দেবতারা তেজস্বী, কান্তিময় ও আলোকবিস্তারে প্রবৃত্ত; আর রাক্ষসেরা অন্ধকারপ্রিয়। তাই দেবতাদের প্রসন্নতার জন্য প্রদীপদান করা হয়। আলো দান করলে মানুষ দৃষ্টিশক্তিসম্পন্ন হয় এবং তেজে ভূষিত হয়। সেই প্রদীপ দান করে পরে তাদের অপমান করবে না—না নিভাবে, না তুলে অন্যত্র নিয়ে যাবে, না ধ্বংস করবে।
Verse 51
दीपहर्ता भवेदन्धस्तमोगतिरसुप्रभ: । दीपप्रद: स्वर्गलोके दीपमालेव राजते
শুক্র বললেন—যে প্রদীপ চুরি করে, সে অন্ধ হয়, তেজ ও শ্রীহীন হয় এবং মৃত্যুর পরে তমোগতি (নরকীয় পরিণতি) লাভ করে। কিন্তু যে প্রদীপ দান করে, সে স্বর্গলোকে প্রদীপমালার ন্যায় দীপ্তিমান হয়।
Verse 52
हविषा प्रथम: कल्पो द्वितीयश्नौषधीरसै: । वसामेदो<5स्थिनियर्सिर्न कार्य: पुष्टिमिच्छता
শুক্র বললেন—ঘি দিয়ে প্রদীপ জ্বালিয়ে দান করাই প্রদীপদানের প্রথম (শ্রেষ্ঠ) বিধি। ঔষধিগাছের রস—অর্থাৎ তিল, সরিষা প্রভৃতির তেল দিয়ে জ্বালিয়ে যে দান, তা দ্বিতীয়। কিন্তু যে নিজের দেহের পুষ্টি কামনা করে, সে যেন চর্বি, মজ্জা ও অস্থির নির্যাস থেকে নিষ্কৃত তেল দিয়ে কখনও প্রদীপ না জ্বালায়।
Verse 53
गिरिप्रपाते गहने चैत्यस्थाने चतुष्पथे । (गोब्राह्मणालये दुर्गे दीपो भूतिप्रद: शुचि: ।) दीपदानं भवेन्नित्यं य इच्छेद् भूतिमात्मन:
শুক্র বললেন—পর্বতপ্রপাতের নিকটে, নির্জন ও ভয়ংকর স্থানে, চৈত্য/দেবালয়ে, চতুষ্পথে—এবং গোশালায়, ব্রাহ্মণের গৃহে ও দুর্গে—কল্যাণদায়ক শুচি প্রদীপ স্থাপন করা উচিত। যে নিজের সমৃদ্ধি কামনা করে, সে যেন প্রতিদিন দীপদান করে।
Verse 54
जो अपने कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे प्रतिदिन पर्वतीय झरनेके पास, वनमें, देवमंदिरमें, चौराहोंपर, गोशालामें, ब्राह्मणके घरमें तथा दुर्गम स्थानमें प्रतिदिन दीप-दान करना चाहिये। उक्त स्थानोंमें दिया हुआ पवित्र दीप ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला होता है ।।
শুক্র বলেন—যে নিজের মঙ্গল চায়, সে যেন প্রতিদিন পর্বতঝরনার কাছে, বনে, দেবমন্দিরে, চৌরাস্তা/চতুষ্পথে, গোশালায়, ব্রাহ্মণের গৃহে এবং দুর্গম বা দূরবর্তী স্থানে দীপদান করে। এমন স্থানে দান করা শুচি প্রদীপ ঐশ্বর্য দান করে। দীপদাতা পুরুষ বংশের দীপ্তিকারক, চিত্তে বিশুদ্ধ ও শ্রীসম্পন্ন হয়; এবং শেষে সে জ্যোতির্ময় লোকসমূহে জ্যোতিদের সঙ্গে সালোখ্য লাভ করে।
Verse 55
बलिकर्मसु वक्ष्यामि गुणान् कर्मफलोदयान् | देवयक्षोरगनृणां भूतानामथ रक्षसाम्
শুক্র বললেন—এখন আমি বলিকর্মের গুণ এবং কর্মফলের উদয় বর্ণনা করব—দেবতা, যক্ষ, নাগ, মানুষ, ভূত এবং রাক্ষসদের উদ্দেশে বলি অর্পণ করলে যে লাভ হয়।
Verse 56
येषां नाग्रभुजो विप्रा देवतातिथिबालका: । राक्षसानेव तान् विद्धि निर्विशड्कानमड़्लान्
যারা আহার করার আগে দেবতা, ব্রাহ্মণ, অতিথি ও শিশুদের অন্ন দেয় না, তাদের রাক্ষসই জেনো—পাপে নির্ভীক এবং অমঙ্গলের কারণ।
Verse 57
तस्मादग्रं प्रयच्छेत देवेभ्य: प्रतिपूजितम् । शिरसा प्रयतश्नापि हरेदू बलिमतन्द्रित:
অতএব গৃহস্থের উচিত—আলস্য ত্যাগ করে দেবতাদের যথাবিধি পূজা করা, মস্তক নত করে প্রণাম করা, শুচিচিত্ত হয়ে সর্বপ্রথম তাঁদেরই শ্রদ্ধাপূর্বক অন্নের অংশ অর্পণ করা এবং পরে বলিভাগ প্রদান করা।
Verse 58
गृह्नन्ति देवता नित्यमाशंसन्ति सदा गृहान् । बाह्याश्षागन्तवो येडन्ये यक्षराक्षसपन्नगा:
শুক্র বললেন—গৃহস্থের প্রদত্ত বলি-উপহার দেবতারা নিত্য গ্রহণ করেন এবং সর্বদা তাঁর গৃহকে আশীর্বাদ করেন। তদ্রূপ বাইরে থেকে আগত অন্যান্য অতিথি এবং যক্ষ, রাক্ষস ও সর্প প্রভৃতিও গৃহস্থের অন্নেই জীবিকা নির্বাহ করে। সেই আতিথ্য ও পোষণে সন্তুষ্ট হয়ে তারা গৃহস্থকে আয়ু, যশ ও ধন দান করে পরিতুষ্ট করে।
Verse 59
इतो दत्तेन जीवन्ति देवता: पितरस्तथा । ते प्रीता: प्रीणयन्तेनमायुषा यशसा धनै:
শুক্র বললেন—এই লোকেই যা দান করা হয়, তাতেই দেবতা ও পিতৃগণও জীবন ধারণ করেন। সেই দানে প্রসন্ন হয়ে তাঁরা গৃহস্থকে আয়ু, যশ ও ধন দিয়ে আনন্দিত ও অনুগ্রহিত করেন।
Verse 60
बलय: सह पुष्पैस्तु देवानामुपहारयेत् । दधिदुग्धमया: पुण्या: सुगंधा: प्रियदर्शना:,देवताओंको जो बलि दी जाय, वह दही-दूधकी बनी हुई, परम पवित्र, सुगंधित, दर्शनीय और फूलोंसे सुशोभित होनी चाहिये
শুক্র বললেন—দেবতাদের উদ্দেশে বলি-উপহার ফুলসহ নিবেদন করা উচিত। তা দই ও দুধ দিয়ে প্রস্তুত—অতি পবিত্র, সুগন্ধি এবং দৃষ্টিনন্দন হওয়া চাই।
Verse 61
कार्या रुधिरमांसाढूया बलयो यक्षरक्षसाम् । सुरासवपुरस्कारा लाजोल्लापिकभूषिता:
শুক্র বললেন—যক্ষ ও রাক্ষসদের জন্য রক্ত-মাংসে সমৃদ্ধ বলি করা হয়; তার আগে সুরা ও আসব নিবেদন থাকে, এবং উপর থেকে ধানের লাজা ছিটিয়ে তা অলংকৃত করা হয়।
Verse 62
नागानां दयिता नित्यं पद्मोत्पलविमिश्रिता: । तिलान् गुडसुसम्पन्नान् भूतानामुपहारयेत्,नागोंको पद्म और उत्पलयुक्त बलि प्रिय होती है। गुड़मिश्रित तिल भूतोंको भेंट करे
শুক্র বললেন—নাগদের কাছে পদ্ম ও উৎপলমিশ্রিত বলি সর্বদা প্রিয়। আর ভূতদের জন্য গুড় মেশানো তিল নিবেদন করা উচিত।
Verse 63
अग्रदाताग्रभोगी स्याद् बलवीर्यसमन्वित: । तस्मादग्रं प्रयच्छेत देवेभ्य: प्रतिपूजितम्
যে মানুষ দেবতাদের আগে বলি নিবেদন করে তারপর আহার করে, সে উৎকৃষ্ট ভোগে সমৃদ্ধ, বলবান ও বীর্যবান হয়। অতএব দেবতাদের যথাযোগ্য সম্মান করে অন্নের প্রথম অংশ আগে তাঁদেরই অর্পণ করা উচিত।
Verse 64
ज्वलन्त्यहरहो वेश्म याश्चास्य गृहदेवता: । ता: पूज्या भूतिकामेन प्रसृताग्रप्रदायिना
গৃহস্থের গৃহের অধিষ্ঠাত্রী দেবীগণ প্রতিদিন তার গৃহকে দীপ্ত রাখেন। অতএব কল্যাণ ও সমৃদ্ধি কামনাকারী মানুষের উচিত, আহারের প্রথম অংশ নিবেদন করে সর্বদা তাঁদের পূজা করা।
Verse 65
इत्येतदसुरेन्द्राय काव्य: प्रोवाच भार्गव: । सुवर्णाय मनु: प्राह सुवर्णो नारदाय च
ভীষ্ম বললেন—রাজন! এইরূপে ভার্গব কাব্য, অর্থাৎ শুক্রাচার্য, অসুরেন্দ্র বলিকে এই উপাখ্যান বলেছিলেন। মনু সেই উপদেশ তপস্বী সুবর্ণকে দিলেন, আর সুবর্ণ তা নারদকে জানালেন। এভাবেই পরম্পরায় ধূপ-দীপ প্রভৃতি দানের মহিমা প্রচারিত হলো এবং বিধিমতো আচরণ করার প্রেরণা দেওয়া হলো।
Verse 66
नारदो5पि मयि प्राह गुणानेतान् महाद्युते । त्वमप्येतद् विदित्वेह सर्वमाचर पुत्रक
শুক্র বললেন—হে মহাতেজস্বী! নারদও আমাকে এই গুণসমূহ বলেছিলেন। অতএব, বৎস! তুমি এখানেই এই শিক্ষা জেনে তোমার সকল কর্ম তারই অনুসারে সম্পাদন করো।
Verse 98
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णमनुसंवादो नामाष्टनवतितमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে “সুবর্ণ-মনু সংলাপ” নামক ঊননব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
After giving a lamp (or light-offering), one should not injure it, take it away, or cause its destruction; violating the gift is treated as ethically and karmically adverse.
Light symbolizes uplift from darkness: giving illumination is portrayed as cultivating inner and outer clarity, producing radiance, auspicious standing, and supportive outcomes through karmic correspondence.
Yes: the donor of lamps is described as attaining brightness and honored visibility (including in heavenly settings), while the one who takes lamps is associated with darkness and diminished condition.