
उपदेशदोषप्रसङ्गः (Upadeśa-doṣa-prasaṅgaḥ) — The Risk of Misapplied Counsel
Upa-parva: Upadeśa-doṣa (Durūkta-vacana) Episode within Anuśāsana-parva
Chapter 10 records a dharma-query by Yudhiṣṭhira on whether blame attaches to one who advises a lower-status person out of friendship. Bhīṣma replies that giving instruction can entail grave fault for the instructor, then narrates an exemplum from a Himalayan brahmāśrama. A compassionate śūdra, inspired by the ascetics, seeks initiation and a renunciant mode of life; the kulapati denies this eligibility but permits service. The śūdra instead establishes a nearby hut, maintains disciplined observances, worship, and hospitality, and later requests guidance for a pitṛ-kārya (ancestral rite). The ṛṣi provides procedural instructions (posture/orientation, ritual materials, havya–kavya sequence). After long practice and death, karmic reversals occur: the śūdra is reborn as a radiant prince/king, while the ṛṣi is reborn as his purohita. The king repeatedly laughs during rituals; when questioned, he explains past-life memory—his earlier status and the instruction received—asserting that the purohita’s present condition results from the ‘doṣa’ of having taught him. The purohita then undertakes donations, austerities, pilgrimages, and renewed tapas, attaining purification and success. Bhīṣma concludes with a caution: dharma is subtle; sages adopt silence; counsel should be offered only when asked and after careful reflection, oriented toward dharma rather than mixed truth-and-untruth.
Chapter Arc: युधिष्ठिर भीष्म से सूक्ष्म धर्म-गति का प्रश्न करते हैं—क्या मित्रता/सौहार्द के कारण किसी ‘अनधिकारी’ को उपदेश देना हितकर है, या उससे हानि भी हो सकती है? → भीष्म ऋषि-परंपरा में सुनी एक दीर्घ कथा आरम्भ करते हैं: तपोवन का वातावरण, वेदाध्ययन की गूँज, और एक शूद्र तपस्वी का ब्राह्मण-तपस्वी से निकट स्नेह। स्नेहवश ब्राह्मण उसे पितृकार्य/धर्म-विषयक उपदेश देता है; पर ‘अधिकार’ की सीमा और उपदेश के परिणामों का प्रश्न धीरे-धीरे तीखा होता जाता है। → शूद्र तपस्वी अपने गुरु-समान ब्राह्मण से कहता है कि वह हँसी/व्यवहार से अनादर नहीं कर रहा—पर उपदेश का भार और अधिकार-सीमा का सूक्ष्म सत्य सामने आता है: उपदेश देने वाले की करुणा और श्रोता की पात्रता के बीच असंतुलन धर्म-संकट बन जाता है। → कथा का फल स्पष्ट होता है—शूद्र तपस्वी दीर्घ तप के बाद वन में देह त्याग करता है और पुण्य-प्रभाव से महान राजवंश में जन्म पाता है; आगे चलकर वह वेद-अथर्ववेद, कल्प, ज्योतिष और सांख्य में प्रवीण होता है। भीष्म संकेत करते हैं कि उपदेश का फल केवल तत्काल नहीं, दीर्घकालिक संस्कार-परिणामों में भी प्रकट होता है; अतः उपदेश ‘हित’ के साथ ‘अधिकार’ और ‘परिणाम’ देखकर देना चाहिए। → कथा आगे राजदरबार/पुरोहित-राजा संवाद की ओर मुड़ती है—पुरोहित एकान्त में राजा को मनोनुकूल कथाओं से प्रसन्न करता है, जिससे अगले प्रसंग में नीति, प्रभाव और धर्म-निर्णय की नई गाँठ खुलने का संकेत मिलता है।
Verse 1
अपन क्राता बछ। अं काज दशमो< ध्याय: अनधिकारीको उपदेश देनेसे हानिके विषयमें एक शूद्र और तपस्वी ब्राह्मणकी कथा युधिछिर उवाच मित्रसौहार्दयोगेन उपदेशं करोति यः । जात्याधरस्य राजर्षेदोषस्तस्य भवेन्न वा
যুধিষ্ঠির বললেন—হে রাজর্ষি পিতামহ, যদি কেউ বন্ধুত্ব ও সৌহার্দ্যের বশে নিম্ন জাতি বা নিম্ন অবস্থার কোনো ব্যক্তিকে উপদেশ দেয়, তবে কি তাতে তার দোষ হয়, না হয় না? আমি এ কথা যথার্থভাবে জানতে চাই। অনুগ্রহ করে বিস্তারে ব্যাখ্যা করুন; কারণ ধর্মের গতি অতি সূক্ষ্ম, আর সেখানে মানুষ সহজেই মোহে পড়ে।
Verse 2
एतदिच्छामि तत्त्वेन व्याख्यातुं वै पितामह । सूक्ष्मा गतिर्हिं धर्मस्य यत्र मुहान्ति मानवा:
যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ, আমি এই বিষয়টি সত্যতত্ত্ব অনুসারে ব্যাখ্যা শুনতে চাই। ধর্মের গতি অতি সূক্ষ্ম; সেই সূক্ষ্মতায় মানুষ মোহগ্রস্ত হয়ে পড়ে।
Verse 3
भीष्म उवाच अन्न ते वर्तयिष्यामि शृणु राजन् यथाक्रमम् । ऋषीणां वदतां पूर्व श्रुतमासीत् यथा पुरा
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, এখন আমি ক্রমানুসারে এই বিষয়টি বলছি; মনোযোগ দিয়ে শোনো। প্রাচীন কালে ঋষিদের মুখে যেমন শুনেছিলাম, তেমনই তোমাকে বলছি।
Verse 4
उपदेशो न कर्तव्यो जातिहीनस्य कस्यचित् । उपदेशे महान् दोष उपाध्यायस्य भाष्यते,किसी भी नीच जातिके मनुष्यको उपदेश नहीं देना चाहिये। उसे उपदेश देनेपर उपदेशक आचार्यके लिये महान् दोष बताया जाता है
যাকে ‘জাতিহীন’ বলা হয়, তাকে উপদেশ দেওয়া উচিত নয়। এমন উপদেশ দিলে উপদেশদাতা আচার্যের উপর গুরুতর দোষ আরোপিত হয় বলে বলা হয়েছে।
Verse 5
निदर्शनमिदं राजन् शृणु मे भरतर्षभ । दुरुक्तवचने राजन् यथापूर्व युधिष्ठिर,भरतभूषण राजा युधिष्ठिर! इस विषयमें एक दृष्टान्त सुनो, जो दुःखमें पड़े हुए एक नीच जातिके पुरुषको उपदेश देनेसे सम्बन्धित है
ভীষ্ম বললেন—হে রাজন, ভরতকুলশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির, আমার কাছ থেকে এই দৃষ্টান্তটি শোনো। প্রাচীন কালে যেমন বলা হয়েছে, এটি কঠোর ও কটু বাক্যের পরিণাম সম্পর্কিত।
Verse 6
ब्रह्माश्रमपदे वृत्तं पाश्वे हिमवत: शुभे । तत्राश्रमपद पुण्यं नानावृक्षणणायुतम्
এই ঘটনা ঘটেছিল শুভ হিমালয়ের পার্শ্বদেশে, ঋষিদের আশ্রম-প্রদেশে। সেখানে ছিল এক পবিত্র আশ্রমস্থান, নানাবিধ বৃক্ষসমূহে সুশোভিত।
Verse 7
नानागुल्मलताकीर्ण मृगद्धिजनिषेवितम् | सिद्धचारणसंयुक्तं रम्यं पुष्पितकाननम्
সেখানে নানাবিধ ঝোপঝাড় ও লতাগুল্মে স্থানটি আচ্ছন্ন ছিল। হরিণ ও পাখিরা সেই আশ্রমে বিচরণ করত। সিদ্ধ ও চারণগণ সেখানে সদা সংযুক্তভাবে বাস করতেন। মনোরম সেই আশ্রমের চারিপাশের কানন নানা পুষ্পে শোভিত ছিল।
Verse 8
व्रतिभिर्बहुभि: कीर्ण तापसैरुपसेवितम् । ब्राह्मणैश्व महाभागै: सूर्यज्वलनसंनिभै:
বহু ব্রতপরায়ণ তপস্বীতে সেই আশ্রম পরিপূর্ণ ছিল এবং তপস্যায় রত সাধুগণ সর্বদা সেখানে যাতায়াত করতেন। সূর্য ও অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান মহাভাগ ব্রাহ্মণদের দ্বারাও তা ভরে থাকত।
Verse 9
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपववके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सियार और वानरका संवादविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! নিয়ম ও ব্রতে প্রতিষ্ঠিত, তপস্যায় রত, দীক্ষিত, সংযত আহারী ও জিতেন্দ্রিয় মুনিগণে সেই আশ্রম পরিপূর্ণ ছিল।
Verse 10
तपो>5ध्ययनघोषैक्ष नादितं भरतर्षभ । वालखिल्यैश्व बहुभियय॑तिभिश्न निषेवितम्,भरतभूषण! वहाँ सब ओर वेदाध्ययनकी ध्वनि गूँजती रहती है। बहुत-से वालखिल्य एवं संन्यासी उस आश्रमका सेवन करते हैं इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शूद्रमुनिसंवादे दशमो<5ध्याय: ।।
হে ভরতর্ষভ! তপস্যা ও বেদাধ্যয়নের ধ্বনিতে চারিদিক মুখরিত থাকত। হে ভরতকুলভূষণ! বহু ভালখিল্য ঋষি ও অসংখ্য যতি সেই আশ্রমে যাতায়াত ও সেবা করতেন।
Verse 11
तत्र कश्नित् समुत्साहं कृत्वा शूद्रो दयान्वित: । आगतो ह्ाश्रमपदं पूजितश्न तपस्विभि:,उसी आश्रममें कोई दयालु शूद्र बड़ा उत्साह करके आया। वहाँ रहनेवाले तपस्वी ऋषियोंने उसका बड़ा आदर-सत्कार किया
সেখানে এক দয়ালু শূদ্র মহোৎসাহে সেই আশ্রমপদে উপস্থিত হল। আশ্রমবাসী তপস্বী ঋষিগণ তাকে সম্মান ও আতিথ্যে পূজিত করলেন।
Verse 12
तांस्तु दृष्टया मुनिगणान् देवकल्पान् महौजस: । विविधां वहतो दीक्षां सम्प्राहृष्पत भारत,भरतनन्दन! उस आश्रमके महातेजस्वी देवोपम मुनियोंको नाना प्रकारकी दीक्षा धारण किये देख उस शूद्रको बड़ा हर्ष हुआ
দেবতুল্য মহাতেজস্বী মুনিগণকে নানাবিধ দীক্ষা ধারণ করে থাকতে দেখে সেই শূদ্র গভীর আনন্দে আপ্লুত হল, হে ভারত, হে ভরতবংশের আনন্দ।
Verse 13
अथास्य बुद्धिरभवत् तपस्ये भरतर्षभ । ततोअ<ब्रवीत् कुलपति पादौ संगृह्म भारत,भारत! भरतभूषण! उसके मनमें वहाँ तपस्या करनेका विचार उत्पन्न हुआ; अतः उसने कुलपतिके पैर पकड़कर कहा--
তখন, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, তার মনে সেখানেই তপস্যা করার ভাব জাগল; অতএব সে আশ্রমাধ্যক্ষের চরণ ধরে বলল।
Verse 14
भवत्प्रसादादिच्छामि धर्म वक्तुं द्विजर्षभ । तन्मां त्वं भगवन् वक्तुं प्रत्राजयितुमरहसि
হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! আপনার প্রসাদে আমি ধর্মের কথা বলার যোগ্য হতে চাই; অতএব, হে ভগবন, আমাকে বিধিপূর্বক প্রব্রজ্যা (সন্ন্যাস-দীক্ষা) দান করে বলার অধিকার দিন।
Verse 15
वर्णावरो5हं भगवन् शूद्रो जात्यास्मि सत्तम | शुश्रूषां कर्तुमिच्छामि प्रपन्नाय प्रसीद मे
হে ভগবন, হে সৎপুরুষশ্রেষ্ঠ! আমি বর্ণসমূহের মধ্যে সর্বনিম্ন, জন্মগত শূদ্র। আমি এখানেই থেকে সেবা করতে চাই; শরণাগত আমার প্রতি প্রসন্ন হোন।
Verse 16
कुलपतिरुवाच न शक््यमिह शूद्रेण लिड्गमाश्रित्य वर्तितुम् । आस्यतां यदि ते बुद्धि: शुश्रूषानिरतो भव
কুলপতি বললেন—এই আশ্রমে কোনো শূদ্র সন্ন্যাসের চিহ্ন ধারণ করে থাকতে পারে না। যদি তোমার ইচ্ছা এখানে থাকা হয়, তবে সে চিহ্ন ছাড়াই থাকো এবং সেবায় নিবিষ্ট হও। সেবার দ্বারাই তুমি উত্তম লোক লাভ করবে—এতে সন্দেহ নেই।
Verse 17
शुश्रूषया परॉल्लोकानवाप्स्यसि न संशय:
ভীষ্ম বললেন—নিষ্ঠাভরে সেবা করলে তুমি উচ্চতর লোক লাভ করবে; এতে কোনো সন্দেহ নেই। কুলপতি বললেন—এই আশ্রমে কোনো শূদ্র সন্ন্যাসের চিহ্ন ধারণ করে থাকতে পারে না। যদি তোমার এখানে থাকার ইচ্ছা থাকে, তবে যেমন আছ তেমনই থেকে সাধু-মহাত্মাদের সেবা করো। সেবার দ্বারাই তুমি শ্রেষ্ঠ লোক লাভ করবে—এতে সন্দেহ নেই।
Verse 18
भीष्म उवाच एवमुक्तस्तु मुनिना स शूद्रोडचिन्तयन्नूप । कथमत्र मया कार्य श्रद्धा धर्मपरा च मे
ভীষ্ম বললেন—হে নরেশ্বর! মুনি এ কথা বললে সেই শূদ্র ভাবতে লাগল—এ অবস্থায় আমার কী করা উচিত? আমার শ্রদ্ধা তো ধর্মেই স্থির।
Verse 19
विज्ञातमेवं भवतु करिष्ये प्रियमात्मन: । गत्वा55श्रमपदाद् दूरमुटजं कृतवांस्तु सः
“তাই হোক; আমি বুঝেছি। আমি যা আমার প্রিয় তাই করব।” এভাবে স্থির করে সে আশ্রমস্থান থেকে দূরে গিয়ে নিজের জন্য একটি পত্রকুটির নির্মাণ করল।
Verse 20
तत्र वेदीं च भूमिं च देवतायतनानि च । निवेश्य भरतश्रेष्ठ नियमस्थो 5 भवन्मुनि:,भरतश्रेष्ठ! वहाँ यज्ञके लिये वेदी, रहनेके लिये स्थान और देवालय बनाकर मुनिकी भाँति नियमपूर्वक रहने लगा
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেখানে যজ্ঞের জন্য বেদি, বাসের জন্য স্থান এবং দেবতাদের মন্দির স্থাপন করে সে মুনির ন্যায় নিয়মনিষ্ঠ হয়ে বাস করতে লাগল।
Verse 21
अभिषेकांश्व नियमान् देवतायतनेषु च । बलिं च कृत्वा हुत्वा च देवतां चाप्यपूजयत्,वह तीनों समय नहाता, नियमोंका पालन करता, देव-स्थानोंमें पूजा चढ़ाता, अग्निमें आहुति देता और देवताकी पूजा करता था
সে তিন সময় স্নান করত, নিয়ম পালন করত, দেবালয়ে পূজার অর্ঘ্য দিত, বলি নিবেদন করত, অগ্নিতে আহুতি দিত এবং দেবতার যথাবিধি পূজা করত।
Verse 22
संकल्पनियमोपेत: फलाहारो जितेन्द्रिय: । नित्यं संनिहिताभिस्तु ओषधीभि: फलैस्तथा
দৃঢ় সংকল্প ও নিয়মাচারে সমন্বিত, ফলাহারী ও ইন্দ্রিয়জয়ী হয়ে তিনি সর্বদাই ঔষধি ও ফল দ্বারা সমৃদ্ধ থাকতেন।
Verse 23
अतिथीन् पूजयामास यथावत् समुपागतान् । एवं हि सुमहान् कालो व्यत्यक्रामत तस्य वै
যথাবিধি আগত অতিথিদের তিনি যথাযথভাবে পূজা-সৎকার করতেন। এইভাবেই তাঁর বহু দীর্ঘ সময় অতিবাহিত হল।
Verse 24
वह मानसिक संकल्पोंका नियन्त्रण (चित्तवृतियोंका निरोध) करते हुए फल खाकर रहता और इन्द्रियोंको काबूमें रखता था। उसके यहाँ जो अन्न और फल उपस्थित रहता, उन्हींके द्वारा प्रतिदिन आये हुए अतिथियोंका यथोचित सत्कार करता था। इस प्रकार रहते हुए उस शूद्र मुनिको बहुत समय बीत गया ।।
তিনি মনের সংকল্পসমূহ সংযত করে ফলাহার করতেন এবং ইন্দ্রিয়সমূহকে বশে রাখতেন। আশ্রমে যা অন্ন ও ফল থাকত, তাই দিয়েই তিনি প্রতিদিন আগত অতিথিদের যথোচিত সৎকার করতেন। এভাবে সেই শূদ্র মুনির বহু সময় অতিবাহিত হল। তারপর ভ্রমণক্রমে এক মুনি তাঁর আশ্রমে এলেন; সেই তপস্বী যথাবিধি স্বাগত ও পূজা করে ঋষিকে সন্তুষ্ট করলেন।
Verse 25
एक दिन एक मुनि सत्संगकी दृष्टिसे उसके आश्रमपर पधारे। उस शूद्रने विधिवत् स्वागत-सत्कार करके ऋषिका पूजन किया और उन्हें संतुष्ट कर दिया ।।
একদিন সৎসঙ্গের আকাঙ্ক্ষায় এক মুনি তার আশ্রমে এলেন। সেই শূদ্র যথাবিধি স্বাগত-সৎকার করে ঋষিকে পূজা করলেন এবং তাঁকে সন্তুষ্ট করলেন। তারপর অনুকূল বাক্যে কথা বলে তিনি মুনির আগমনের কারণ জিজ্ঞাসা করলেন। তখন সেই পরম তেজস্বী, ধর্মাত্মা ও কঠোর ব্রতধারী ঋষি কেবল তার সঙ্গে সাক্ষাৎ করতে বারবার সেই শূদ্রের আশ্রমে আসতে লাগলেন।
Verse 26
एवं सुबहुशस्तस्य शूद्रस्थ भरतर्षभ । सोडगच्छदाश्रममृषि: शूद्रं द्रष्ट नरर्षभ
এইভাবে, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, সেই ঋষি শূদ্রকে দেখার অভিপ্রায়ে বহুবার তার আশ্রমে গিয়েছিলেন। তারপর অনুকূল বাক্যে তিনি শূদ্রের সেখানে আগমনের বৃত্তান্ত জিজ্ঞাসা করলেন। তখন থেকে সেই পরম তেজস্বী, ধর্মাত্মা ও কঠোর ব্রতধারী ঋষি বারবার তার নিবাসে আসতে লাগলেন।
Verse 27
अथ तं॑ तापसं शूद्र: सो5ब्रवीद् भरतर्षभ । पितृकार्य करिष्यामि तत्र मेडनुग्रह॑ कुरुू,भरतश्रेष्ठ। एक दिन उस शूद्रने उन तपस्वी मुनिसे कहा--'मैं पितरोंका श्राद्ध करूँगा। आप उसमें मुझपर अनुग्रह कीजिये”
তখন সেই শূদ্র তপস্বী মুনিকে বলল—“হে ভরতশ্রেষ্ঠ! আমি পিতৃকার্য (শ্রাদ্ধ) করব; সেই কর্মে আমার প্রতি অনুগ্রহ করুন।”
Verse 28
बाढमित्येव तं विप्र उवाच भरतर्षभ । शुचिर्भूत्वा स शूद्रस्तु तस्यर्षे: पाद्यमानयत्
ব্রাহ্মণ বললেন—“বাঢ়ম্ (অতি উত্তম)”; এই বলে তিনি নিমন্ত্রণ গ্রহণ করলেন। তারপর শূদ্র স্নান করে শুচি হয়ে সেই মহর্ষির পাদ্যার্থে জল এনে দিল।
Verse 29
अथ दर्भाक्ष वन्यांश्षु ओषधीर्भरतर्षभ । पवित्रमासनं चैव बूसीं च समुपानयत्
তারপর, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, সে দর্ভ (কুশ), বনে জন্মানো ঔষধি, পবিত্র আসন এবং ভস্মও এনে উপস্থিত করল।
Verse 30
भरतर्षभ! तदनन्तर वह जंगली कुशा, अन्न आदि ओषधि, पवित्र आसन और कुशकी चटाई ले आया ।।
তারপর সে দক্ষিণদিকে মুখ করে ব্রাহ্মণের জন্য ‘চরম-শৈষিকী’ (বিশেষ প্রকার আসন/বিছানা) পেতে দিল। শাস্ত্রবিরুদ্ধ এই অনুচিত আচরণ দেখে ঋষি সেই শূদ্রকে বললেন—
Verse 31
कुरुष्वैतां पूर्वशीर्षा भवांश्वोदड्मुख: शुचि: । सच तत् कृतवान् शूद्र: सर्व यदृषिरब्रवीत्
“এই কুশ-চাটাইয়ের অগ্রভাগ পূর্বদিকে করো, আর তুমি শুচি হয়ে উত্তরমুখে বসো।” ঋষি যা-যা বললেন, শূদ্র তা-ই যথাযথ করল।
Verse 32
यथोपदिष्ट मेधावी दर्भा्यादि यथातथम् | हव्यकव्यविधिं कृत्स्नमुक्तं तेन तपस्विना,बुद्धिमान् शूद्रने कुश, अर्घ्ध आदि तथा हव्य-कव्यकी विधि--सब कुछ उन तपस्वी मुनिके उपदेशके अनुसार ठीक-ठीक किया
ভীষ্ম বললেন—সেই বুদ্ধিমান ব্যক্তি তপস্বী মুনির উপদেশ অনুসারে দর্ভ-ঘাস প্রভৃতি সমস্ত উপকরণসহ দেবতার জন্য হব্য এবং পিতৃদের জন্য কব্য—উভয় অর্ঘ্য-অর্পণের সম্পূর্ণ বিধি ঠিক যেমন বলা হয়েছিল তেমনই সম্পন্ন করল।
Verse 33
ऋषिणा पितृकार्ये च स च धर्मपथे स्थित: । पितृकार्ये कृते चापि विसृष्ट: स जगाम ह,ऋषिके द्वारा पितृकार्य विधिवत् सम्पन्न हो जानेपर वे ऋषि शूद्रसे विदा लेकर चले गये और वह शाद्र धर्ममार्गमें स्थित हो गया
ভীষ্ম বললেন—ঋষি বিধিপূর্বক পিতৃকার্য সম্পন্ন করলেন, আর সেই ব্যক্তি ধর্মপথে স্থির রইল। পিতৃকর্ম শেষ হলে ঋষি বিদায় নিয়ে প্রস্থান করলেন, এবং সেই শূদ্রও ন্যায়াচরণে অবিচল থাকল।
Verse 34
अथ दीर्घस्य कालस्य स तप्यन् शूद्रतापस: । वने पञठ्चत्वमगमत् सुकृतेन च तेन वै
ভীষ্ম বললেন—দীর্ঘকাল তপস্যা করতে করতে সেই শূদ্র-তাপস অরণ্যে পঞ্চত্ব প্রাপ্ত হল; এবং সেই তপস্যাজাত পুণ্যবলেই সে পরম গতি লাভ করল।
Verse 35
तथैव स ऋषिस्तात कालधर्ममवाप ह
“তেমনি, হে বৎস, সেই ঋষিও যথাকালে কালধর্ম প্রাপ্ত হলেন—অর্থাৎ দেহত্যাগ করলেন।”
Verse 36
पुरोहितकुले विप्र आजातो भरतर्षभ । एवं तौ तत्र सम्भूतावुभौ शूद्रमुनी तदा
ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ, রাজপুরোহিতের কুলে এক ব্রাহ্মণ জন্ম নিল। এইভাবে সেই সময় সেখানে দু’জনেরই আবির্ভাব হল—উভয়েই শূদ্র-উৎপত্তি মুনি বলে পরিচিত ছিলেন।
Verse 37
क्रमेण वर्धितौ चापि विद्यासु कुशलावुभौ
ভীষ্ম বললেন—“ক্রমে ক্রমে তাদের দু’জনকেই লালন-পালন ও ধাপে ধাপে শিক্ষা দেওয়া হল, আর তারা নানা শাস্ত্রবিদ্যায় পারদর্শী হয়ে উঠল।”
Verse 38
तात! इसी प्रकार वे ऋषि भी कालधर्म-मृत्युको प्राप्त हुए। भरतश्रेष्ठ! वे ही ऋषि दूसरे जन्ममें उसी राजवंशके पुरोहितके कुलमें उत्पन्न हुए। इस प्रकार वह शूद्र और वे मुनि दोनों ही वहाँ उत्पन्न हुए, क्रमश: बढ़े और सब प्रकारकी विद्याओंमें निपुण हो गये ।।
ভীষ্ম বললেন—“বৎস! এইভাবেই সেই ঋষিরাও কালের বিধান অনুসারে মৃত্যুকে প্রাপ্ত হলেন। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! সেই ঋষিরাই পরজন্মে সেই রাজবংশের পুরোহিতের কুলে জন্ম নিলেন। এভাবে সেই শূদ্র ও সেই মুনিরা—উভয়েই সেখানে জন্ম নিয়ে, ক্রমে ক্রমে বড় হয়ে, সর্বপ্রকার বিদ্যায় পারদর্শী হলেন। তিনি অথর্ববেদ ও বৈদিক জ্ঞানে সুপ্রতিষ্ঠিত ঋষি হলেন এবং কল্প-প্রয়োগ ও জ্যোতিষশাস্ত্রে সর্বোচ্চ সিদ্ধি লাভ করলেন।”
Verse 39
पितर्युपरते चापि कृतशौचस्तु पार्थिव
ভীষ্ম বললেন—“হে রাজন! পিতা পরলোকগমন করলে প্রথমে শৌচ-শুদ্ধির বিধি সম্পন্ন করা উচিত; তারপরই পরবর্তী কর্তব্যে প্রবৃত্ত হওয়া ধর্মসঙ্গত।”
Verse 40
अभिषिक्त: प्रकृतिभी राजपुत्र: स पार्थिव: । नरेश! पिताके परलोकवासी हो जानेपर शुद्ध होनेके पश्चात् मन्त्री और प्रजा आदिने मिलकर उस राजकुमारको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया ।।
ভীষ্ম বললেন—“হে নরেশ! পিতা পরলোকগমন করার পর শুদ্ধিকাল সম্পন্ন হলে মন্ত্রীগণ ও প্রজাবর্গ একত্রে সেই রাজপুত্রকে রাজপদে অভিষিক্ত করল। আর রাজার অভিষেকের সঙ্গেই সেই ঋষিকেও পুরোহিত-পদে অভিষিক্ত—নিযুক্ত—করা হল। এভাবে ধর্মানুসারে রাজকর্তৃত্ব ও বৈদিক কর্তৃত্বের যথাযথ ব্যবস্থা প্রতিষ্ঠিত হল।”
Verse 41
स तं पुरोधाय सुखमवसद् भरतर्षभ | राज्यं शशास धर्मेण प्रजाश्न॒ परिपालयन्,भरतश्रेष्ठी ऋषिको पुरोहित बनाकर वह राजा सुखपूर्वक रहने और धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए राज्यका शासन करने लगा
ভীষ্ম বললেন—“হে ভরতশ্রেষ্ঠ! তাঁকে পুরোহিত নিযুক্ত করে সেই রাজা সুখে বাস করতে লাগলেন এবং ধর্মানুসারে প্রজাদের রক্ষা ও পালন করতে করতে রাজ্য শাসন করলেন।”
Verse 42
पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकार्येषु चासकृत् । उत्स्मयन् प्राहसच्चापि दृष्टवा राजा पुरोहितम्
পুরোহিত যখন প্রতিদিন পুণ্যাহবাচন করতেন এবং বারবার ধর্মকার্যে নিয়োজিত থাকতেন, তখন রাজা তাঁকে দেখে কখনও মৃদু হাসতেন, আবার কখনও উচ্চস্বরে হেসে উঠতেন।
Verse 43
एवं स बहुशो राजन् पुरोधसमुपाहसत् । लक्षयित्वा पुरोधास्तु बहुशस्तं नराधिपम्
এইভাবে, হে রাজন, সে বারবার রাজপুরোহিতকে উপহাস করত। কিন্তু পুরোহিতও সেই নরাধিপতিকে বারবার লক্ষ্য করে তার আচরণ সতর্কভাবে লক্ষ করলেন।
Verse 44
उत्स्मयन्तं च सततं दृष्टवासौ मन्युमाविशत् | राजन! इस प्रकार अनेक बार राजाने पुरोहितका उपहास किया। पुरोहितने जब अनेक बार और निरन्तर उस राजाको अपने प्रति हँसते और मुसकराते लक्ष्य किया, तब उनके मनमें बड़ा खेद और क्षोभ हुआ ।।
রাজাকে সর্বদা হাসতে ও মুচকি হাসতে দেখে পুরোহিতের মনে ক্রোধ ও ক্ষোভ জাগল। তারপর নির্জনে পুরোহিত রাজাসহ সাক্ষাৎ করলেন।
Verse 45
ततोअब्रवीन्नरेन्द्रे स पुरोधा भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! फिर पुरोहित राजासे इस प्रकार बोले--“महातेजस्वी नरेश! मैं आपका दिया हुआ एक वर प्राप्त करना चाहता हूँ
তখন, হে ভরতশ্রেষ্ঠ, সেই পুরোহিত নরেন্দ্রকে এইভাবে বললেন।
Verse 46
वरमिच्छाम्यहं त्वेक॑ त्वया दत्त महाद्मयुते,भरतश्रेष्ठ! फिर पुरोहित राजासे इस प्रकार बोले--“महातेजस्वी नरेश! मैं आपका दिया हुआ एक वर प्राप्त करना चाहता हूँ
হে মহাতেজস্বী! আমি আপনার কাছ থেকে একটি মাত্র বর চাই—যা আপনি প্রদান করবেন।
Verse 47
राजोवाच वराणां ते शतं दद्यां कि बतैकं द्विजोत्तम । स्नेहाच्च बहुमानाच्च नास्त्यदेयं हि मे तव
রাজা বললেন—দ্বিজশ্রেষ্ঠ! আমি তোমাকে শত বরও দিতে পারি, একটির কথা তো কীই বা। তোমার প্রতি স্নেহ ও বিশেষ সম্মানের কারণে তোমার জন্য আমার কাছে অদেয় কিছুই নেই।
Verse 48
पुरोहित उवाच एकं वै वरमिच्छामि यदि तुष्टो5सि पार्थिव । प्रतिजानीहि तावत् त्वं सत्यं यद् वद नानृतम्
পুরোহিত বললেন—হে পৃথিবীনাথ! আপনি যদি প্রসন্ন হন, তবে আমি একটিই বর চাই। আগে আপনি প্রতিজ্ঞা করুন—আপনি সত্যই বলবেন, মিথ্যা নয়।
Verse 49
भीष्म उवाच बाढमित्येव तं राजा प्रत्युवाच युधिष्ठिर । यदि ज्ञास्यामि वक्ष्यामि अजानन् न तु संवदे
ভীষ্ম বললেন—তখন রাজা যুধিষ্ঠির উত্তর দিলেন—“তথাস্তু। আমি যদি জানি, অবশ্যই বলব; আর যদি না জানি, তবে জানার ভান করে কথা বলব না।”
Verse 50
पुरोहित उवाच पुण्याहवाचने नित्यं धर्मकृत्येषु चासकृत् । शान्तिहोमेषु च सदा कि त्वं हससि वीक्ष्य माम्
পুরোহিত বললেন—মহারাজ! প্রতিদিন পুণ্যাহ-বাচনের সময়, বারবার ধর্মকর্ম সম্পাদনের সময়, এবং সর্বদা শান্তিহোমের উপলক্ষে আপনি আমার দিকে তাকিয়ে কেন হাসেন?
Verse 51
सव्रीड वै भवति हि मनो मे हसता त्वया । कामया शापितो राजन् नान्यथा वक्तुमहसि
আপনার হাসিতে আমার মন লজ্জিত ও সংকুচিত হয়ে যায়। হে রাজন! আমি শপথ দিয়ে জিজ্ঞাসা করছি—আপনি যেমন সত্য জানেন, তেমনই বলুন; অন্য কথা বলে আমাকে ভুলিয়ে দেবেন না।
Verse 52
सुव्यक्त कारणं ह्वात्र न ते हास्यमकारणम् । कौतूहलं मे सुभृशं तत्त्वेन कथयस्व मे
আপনার এই হাসির পিছনে স্পষ্টই কোনো বিশেষ কারণ আছে বলে মনে হয়। আপনার হাসি অকারণ হতে পারে না। তা জানবার জন্য আমার মনে প্রবল কৌতূহল জেগেছে; অতএব আপনি সত্যরূপে সব কথা আমাকে বলুন।
Verse 53
राजोवाच एवमुक्ते त्वया विप्र यदवाच्यं भवेदपि । अवश्यमेव वक्तव्यं शृणुष्वैकमना द्विज
রাজা বললেন—হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠ! তুমি এভাবে জিজ্ঞাসা করায়, যা সাধারণত বলা অনুচিত, তাও এখন অবশ্যই বলা উচিত। অতএব, হে দ্বিজ, একাগ্রচিত্তে শোনো।
Verse 54
पूर्वदेहे यथा वृत्तं तन्निबोध द्विजोत्तम । जातिं स्मराम्यहं ब्रह्मन्नवधानेन मे शृूणु
হে দ্বিজোত্তম! পূর্বজন্মে আমরা যখন দেহ ধারণ করেছিলাম, তখন যা ঘটেছিল তা শোনো। হে ব্রহ্মণ! আমার পূর্বজন্মের কথা স্মরণ আছে; মনোযোগ দিয়ে আমার কথা শোনো।
Verse 55
शूद्रो<हमभवं पूर्व तापसो भृशसंयुतः । ऋषिरुग्रतपास्त्वं च तदाभूद् द्विजसत्तम,विप्रवर! पहले जन्ममें मैं शूद्र था। फिर बड़ा भारी तपस्वी हो गया। उन्हीं दिनों आप उग्र तप करनेवाले श्रेष्ठ महर्षि थे
হে বিপ্রবর! পূর্বজন্মে আমি শূদ্র ছিলাম; পরে কঠোর সংযমে যুক্ত তপস্বী হয়ে উঠি। আর হে দ্বিজসত্তম, সেই সময় আপনি ছিলেন উগ্র তপস্যায় রত শ্রেষ্ঠ ঋষি।
Verse 56
प्रीयता हि तदा ब्रह्मन् ममानुग्रहबुद्धिना । पितृकार्ये त्वया पूर्वमुपदेश: कृतोडनघ
হে নিষ্পাপ ব্রহ্মণ! সেই সময় আপনি আমাকে গভীর স্নেহ করতেন; তাই অনুগ্রহবুদ্ধিতে আপনি পূর্বে পিতৃকার্যে প্রয়োজনীয় বিধি আমাকে উপদেশ দিয়েছিলেন।
Verse 57
बृस््यां दर्भेषु हव्ये च कव्ये च मुनिसत्तम । एतेन कर्मदोषेण पुरोधास्त्वमजायथा:
হে মুনিশ্রেষ্ঠ! আপনি আমাকে আসন ও দর্ভাঘাস যথাবিধি স্থাপন, এবং হব্য (দেবতাদের উদ্দেশে) ও কব্য (পিতৃদের উদ্দেশে) অর্পণের নিয়ম শিখিয়েছিলেন। কিন্তু সেই কর্মবিধিতেই যে দোষ ঘটেছিল, তার ফলেই এই জন্মে আপনাকে পুরোহিতরূপে জন্ম নিতে হয়েছে।
Verse 58
अहं राजा च विप्रेन्द्र पश्य कालस्य पर्ययम् । मत्कृतस्योपदेशस्य त्वयावाप्तमिदं फलम्,विप्रेन्द्र! यह कालका उलट-फेर तो देखिये कि मैं तो शूद्रसे राजा हो गया और मुझे ही उपदेश करनेके कारण आपको यह फल मिला
হে বিপ্রেন্দ্র! কালের এই উলটফের দেখুন—আমি রাজা হয়েছি, আর আমার দেওয়া উপদেশের ফল এইভাবে আপনিই লাভ করেছেন।
Verse 59
एतस्मात् कारणाद् ब्रह्मन् प्रहसे त्वां द्विजोत्तम | नत्वां परिभवन् ब्रह्मन् प्रहसामि गुरुर्भवान्
হে ব্রাহ্মণ, হে দ্বিজোত্তম! এই কারণেই আমি আপনার দিকে তাকিয়ে হাসি; কিন্তু হে ব্রাহ্মণ, আপনাকে অপমান করার জন্য নয়—কারণ আপনি আমার গুরু।
Verse 60
द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मन! इसी कारणसे मैं आपकी ओर देखकर हँसता हूँ। आपका अनादर करनेके लिये मैं आपकी हँसी नहीं उड़ाता हूँ; क्योंकि आप मेरे गुरु हैं ।।
হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, হে ব্রাহ্মণ! এই কারণেই আমি আপনার দিকে তাকিয়ে হাসি; কিন্তু আপনাকে অপমান করার জন্য নয়—কারণ আপনি আমার গুরু। এই উলটফেরে আমার গভীর খেদ হয়, তাতে মন দগ্ধ থাকে। আমি আমার ও আপনার পূর্বজন্মের অবস্থান স্মরণ করি; তাই আপনার দিকে তাকালে অনিচ্ছায় হাসি বেরিয়ে আসে।
Verse 61
एवं तवोग्रं हि तप उपदेशेन नाशितम् । पुरोहितत्वमुत्सृज्य यतस्व त्वं पुनर्भवे
এইভাবে উপদেশ দিতে গিয়ে আপনার তীব্র তপস্যা নষ্ট হয়েছে। অতএব পুরোহিতত্ব ত্যাগ করে পুনর্ভবের জন্য—সংসারবন্ধন অতিক্রমের জন্য—আবার সাধনায় প্রবৃত্ত হোন।
Verse 62
इतस्त्वमधमामन्यां मा योनि प्राप्स्यसे द्विज । गृह्मातां द्रविणं विप्र पूतात्मा भव सत्तम
হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ! যেন এরপর তুমি কোনো নীচ যোনি লাভ না কর। অতএব, হে বিপ্রবর, যতটা উচিত তত ধন গ্রহণ করো এবং অন্তঃকরণকে পবিত্র করার সাধনা করো।
Verse 63
भीष्म उवाच ततो विसृष्टो राज्ञा तु विप्रो दानान्न्यनेकश: । ब्राह्मणेभ्यो ददौ वित्तं भूमिं ग्रामांश्ष॒ सर्वश:
ভীষ্ম বললেন—যুধিষ্ঠির! এরপর রাজা থেকে বিদায় নিয়ে সেই পুরোহিত বহু ব্রাহ্মণকে নানা প্রকার দান দিলেন। তিনি ধন, ভূমি এবং গ্রাম পর্যন্ত সর্বতোভাবে বিতরণ করলেন।
Verse 64
कृच्छाणि चीर्वा च ततो यथोक्तानि द्विजोत्तमै: | तीर्थानि चापि गत्वा वै दानानि विविधानि च
তারপর শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের নির্দেশ অনুযায়ী তিনি যথাযথভাবে বহু কৃচ্ছ্র-ব্রত পালন করলেন। আবার তীর্থে গিয়ে নানা প্রকার দানও করলেন।
Verse 65
दत्वा गाश्जैव विप्रेभ्य: पूतात्माभवदात्मवान् | तमेव चाश्रमं गत्वा चचार विपुलं तप:,ब्राह्मणोंको गोदान करके पवित्रात्मा होकर उन मनस्वी ब्राह्मणने फिर उसी आश्रमपर जाकर बड़ी भारी तपस्या की
ব্রাহ্মণদের গোধন দান করে সেই সংযমী পুরুষ অন্তরে পবিত্র হলেন। তারপর সেই আশ্রমেই ফিরে গিয়ে তিনি মহৎ তপস্যা করলেন।
Verse 66
ततः सिद्धि) परां प्राप्तो ब्राह्मणो राजसत्तम | सम्मतश्नलाभवत् तेषामाश्रमे तन्निवासिनाम्
হে রাজশ্রেষ্ঠ! তারপর সেই ব্রাহ্মণ পরম সিদ্ধি লাভ করলেন এবং সেই আশ্রমে বসবাসকারী সকল সাধকের কাছে সম্মানিত ও প্রিয় হয়ে উঠলেন।
Verse 67
एवं प्राप्तो महत्कृच्छुमृषि: सन्नपसत्तम । ब्राह्मणेन न वक्तव्यं तस्माद् वर्णावरे जने
ভীষ্ম বললেন—এইভাবে সেই ঋষি, সত্যই সদ্গুণসম্পন্ন হয়েও, মহা সংকটে পতিত হলেন। অতএব, হে রাজশিরোমণি, ব্রাহ্মণের উচিত নিম্নবর্ণের ব্যক্তিকে উপদেশ না দেওয়া।
Verse 68
(वर्जयेदुपदेशं च सदैव ब्राह्मणो नूप । उपदेशं हि कुर्वाणो द्विज: कृच्छुमवाप्तुयात् । नरेश्वर! ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी शूद्रको उपदेश न दे; क्योंकि उपदेश करनेवाला ब्राह्मण स्वयं ही संकटमें पड़ जाता है ।।
ভীষ্ম বললেন—হে নরেশ্বর, ব্রাহ্মণের উচিত সর্বদা উপদেশ দান থেকে বিরত থাকা; কারণ উপদেশ দিতে গেলে দ্বিজ বিপদে পড়তে পারে। হে নৃপশ্রেষ্ঠ, দ্বিজের উচিত বাক্য দ্বারা পথনির্দেশ করার ইচ্ছাও না করা; আর এই জগতে নিম্নবর্ণের জনকে তো কোনো কথাই শিক্ষা দেওয়া উচিত নয়। হে রাজন, ব্রাহ্মণ, ক্ষত্রিয় ও বৈশ্য—এই তিন বর্ণই দ্বিজাতি; এদের মধ্যে উপদেশ দিলে ব্রাহ্মণ দোষী হয় না।
Verse 69
तस्मात् सद्धि्न वक्तव्यं कस्यचित् किंचिदग्रत: । सूक्ष्मा गतिर्ि धर्मस्य दुर्ज्ञेया ह्कृतात्मभि:
অতএব সজ্জনদের উচিত কারও সামনে যে-কাউকে তাড়াহুড়ো করে উপদেশ না দেওয়া; কারণ ধর্মের গতি অতি সূক্ষ্ম। যাদের অন্তঃকরণ শুদ্ধ ও সংযত নয়, তাদের পক্ষে ধর্মের প্রকৃত পথ বোঝা অত্যন্ত কঠিন।
Verse 70
तस्मान्मौनेन मुनयो दीक्षां कुर्वन्ति चादृता: । दुरुक्तस्य भयाद् राजन् नाभाषन्ते च किंचन
অতএব, হে রাজন, মুনিরা শ্রদ্ধাভরে মৌন অবলম্বন করেই দীক্ষা গ্রহণ করেন। কটু বা অনুচিত বাক্যের আশঙ্কায় তারা কিছুই বলেন না।
Verse 71
राजन! इसीलिये ऋषि-मुनि मौनभावसे ही आदसरपूर्वक दीक्षा देते हैं। कोई अनुचित बात मुँहसे न निकल जाय, इसीके भयसे वे कोई भाषण नहीं देते हैं ।।
ধার্মিক, গুণসম্পন্ন এবং সত্য ও সরলতায় সমন্বিত ব্যক্তিরাও শাস্ত্রবিরুদ্ধ অনুচিত বাক্য উচ্চারণের ফলে এ জগতে পাপের ভাগী হয়ে পড়ে।
Verse 72
उपदेशो न कर्तव्य: कदाचिदपि कस्यचित् | उपदेशाद्धि तत् पापं ब्राह्मण: समवाप्नुयात्,ब्राह्मणको चाहिये कि वह कभी किसीको उपदेश न करे; क्योंकि उपदेश करनेसे वह शिष्यके पापको स्वयं ग्रहण करता है
ব্রাহ্মণ কখনও কারও কাছে নির্বিচারে উপদেশ দেবেন না; কারণ উপদেশ দিলে শিষ্যের পাপ তিনি নিজেই গ্রহণ করেন।
Verse 73
विमृश्य तस्मात् प्राज्ञेन वक्तव्यं धर्ममिच्छता । सत्यानृतेन हि कृत उपदेशो हिनस्ति हि
অতএব ধর্ম কামনাকারী জ্ঞানী পুরুষের উচিত বহু বিচার করে কথা বলা; কারণ সত্য-মিথ্যা মিশ্রিত বাক্যে দেওয়া উপদেশ ক্ষতিকর হয়।
Verse 74
वक्तव्यमिह पृष्टेन विनिश्ित्य विनिश्चयम् | स चोपदेश: कर्तव्यो येन धर्ममवाप्रुयात्
এখানে কেউ জিজ্ঞাসা করলে বহু বিচার করে শাস্ত্রের স্থির সিদ্ধান্তই বলা উচিত; আর এমন উপদেশই দিতে হবে যাতে ধর্মলাভ হয়।
Verse 75
एतत् ते सर्वमाख्यातमुपदेशकृते मया । महान् क्लेशो हि भवति तस्मान्नोपदिशेदिह
উপদেশ সম্বন্ধে এ সবই আমি তোমাকে বললাম। অযোগ্যকে উপদেশ দিলে মহা ক্লেশ হয়; অতএব এখানে নির্বিচারে কাউকে উপদেশ দিও না।
Verse 343
अजायत महाराजवंशे स च महाद्युति: । तदनन्तर दीर्घकालतक तपस्या करके वह शूद्र तपस्वी वनमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ और उसी पुण्यके प्रभावसे एक महान् राजवंशमें महातेजस्वी बालकके रूपमें उत्पन्न हुआ
তারপর দীর্ঘকাল তপস্যা করে সেই শূদ্র তপস্বী বনে মৃত্যুবরণ করল; আর সেই পুণ্যের প্রভাবে সে এক মহান রাজবংশে অতিশয় তেজস্বী শিশুরূপে জন্ম নিল।
Verse 383
सांख्ये चैव परा प्रीतिस्तस्य चैवं व्यवर्धत । वे ऋषि वेद और अथर्ववेदके परिनिष्छित विद्वान् हो गये। कल्पप्रयोग और ज्योतिषयमें भी पारंगत हुए। सांख्यमें भी उनका परम अनुराग बढ़ने लगा
সাংখ্যেও তার পরম প্রীতি জাগল এবং সেইভাবেই ক্রমে বৃদ্ধি পেল। বেদ, বেদাঙ্গ ও অথর্ববেদের সিদ্ধান্তে তিনি ঋষি সুপণ্ডিত হলেন; কল্পপ্রয়োগ ও জ্যোতিষেও পারদর্শী হলেন; আর সাংখ্যে তাঁর গভীর অনুরাগ দিন দিন বাড়তে লাগল।
Verse 443
कथाभिरनुकूलाभी राजानं चाभ्यरोचयत् । तदनन्तर एक दिन पुरोहितजी राजासे एकान्तमें मिले और मनोनुकूल कथाएँ सुनाकर राजाको प्रसन्न करने लगे
অনুকূল ও মনোরম কথায় সে রাজার অনুগ্রহ অর্জন করল এবং তাঁকে আনন্দিত করল। তারপর একদিন পুরোহিত মহাশয় একান্তে রাজার সঙ্গে মিলিত হয়ে মনোমত কাহিনি শুনিয়ে রাজাকে প্রসন্ন করতে লাগলেন।
Whether offering instruction to a person deemed ‘lower’ in social status—especially in matters of religious discipline and ritual—creates culpability for the instructor, even when the intent is friendly and compassionate.
Instruction is ethically powerful and therefore risky: dharma is context-sensitive, and counsel should be given only with careful discernment, appropriate occasion (often when asked), and a clear orientation toward dharma; otherwise, speech can entangle both parties in suffering and social disorder.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter provides meta-ethical closure: sages prefer silence due to fear of ‘durukta’ (mis-speech), and one should speak after reflection; the implied fruit is avoidance of kleśa (distress) and progress toward purification through disciplined conduct.