
अनुशासनपर्व अध्याय ९३ — तपस्, सदोपवास, विघसाशन, अतिथिप्रियता (Austerity, regulated fasting, residual-eating, and hospitality)
Upa-parva: Vratācāra–Tapas–Atithi-dharma (Instruction on vows, austerity, and hospitality)
Yudhiṣṭhira questions Bhīṣma on the dharmic status of eating havis (oblational food) by vow-observing twice-born persons, and on what constitutes genuine tapas when people equate it with upavāsa (fasting). Bhīṣma reframes austerity as disciplined, non-self-harming regulation rather than extreme deprivation over long periods, and enumerates ideals such as continence, continual ritual orientation, purity, truthfulness, restraint, non-meat consumption, generosity, and guest-friendliness. The chapter then provides operational definitions: a ‘sadopavāsī’ is one who does not eat between the morning and evening meals; ‘brahmacarya’ is treated as compatible with household life through regulated sexual conduct; ‘amāṃsāśī’ is defined as avoiding unnecessary meat; purity is linked to giving; and ‘amṛtāśī’ is described as one who eats only after dependents and guests have eaten. ‘Vighasāśī’ is defined as eating what remains after offerings to deities and ancestors and after feeding dependents and guests. The discourse concludes with a merit schema: such disciplined hospitality and residual-eating are associated with superior posthumous destinations and honor in Brahmā’s abode.
Chapter Arc: शरशय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को श्राद्ध-दान के सूक्ष्म नियमों में प्रवेश कराते हैं—दान का फल केवल वस्तु से नहीं, पात्रता, श्रद्धा और विधि से तय होता है। → प्रश्न उठता है: क्या क्षत्रिय दानकर्ता को ब्राह्मणों की परीक्षा करनी चाहिए? भीष्म कहते हैं—सामान्य दान में ब्राह्मणों की ‘परीक्षा’ न करे, पर देवकर्म और पितृकर्म (श्राद्ध) में न्यायपूर्वक परीक्षण आवश्यक है; क्योंकि एक दोषपूर्ण पंक्ति पूरे श्राद्ध को निष्फल कर सकती है। फिर वे अपात्रों की श्रेणियाँ गिनाते हैं—देवलक (सोम-विक्रेता), वाणिज्य-वृत्ति से श्राद्ध-भोज लेने वाले, निन्दक, असूयक, श्रद्धाहीन दाता/ग्राही, तथा मित्र-प्रधान भोज-व्यवस्था—जिनसे पितर तृप्त नहीं होते। → भीष्म का निर्णायक विधान: श्राद्ध में ‘पंक्ति-पावन’ वेदज्ञ, संयमी, व्रतस्थ ब्राह्मणों का चयन ही प्रधान है; जो पतित नहीं और पंक्तिदोषों से रहित है वही पंक्ति को शुद्ध करता है। इसके विपरीत असूया से दिया गया या श्रद्धा-विहीन दान ‘असुरेन्द्र’ के भाग में चला जाता है—यही अध्याय का तीखा नैतिक शिखर है। → भीष्म संतुलन स्थापित करते हैं—देवता अपने दैव तेज से ब्राह्मण-पूजन की प्रेरणा देते हैं, अतः दानकर्ता को आदर-भाव रखना चाहिए; पर श्राद्ध में दूर से ही वेदपारग, आचरण-शुद्ध ब्राह्मणों की पहचान कर, निन्दक/अपात्रों को अलग रखकर, पितरों के लिए फलदायी श्राद्ध करना चाहिए। → श्राद्ध में ‘पंक्ति-दोष’ और ‘पंक्ति-पावन’ की और सूक्ष्म कसौटियाँ आगे के उपदेश में विस्तृत होने का संकेत देती हैं।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें श्राद्धकल्पविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८९ ॥। अपना बछ। अकाल नवतितमो< ध्याय: भ्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्म॒णोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठतका कथन युधिछिर उवाच कीदृशे भ्य: प्रदातव्यं भवेच्छाद्धं पितामह । द्विजेभ्य: कुरुशार्टूल तन्मे व्याख्यातुमरहसि,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! कैसे ब्राह्मणको श्राद्धका दान (अर्थात् निमन्त्रण) देना चाहिये? कुरुश्रेष्ठ आप इसका मेरे लिये स्पष्ट वर्णन करें
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—পিতামহ! কেনে ধৰণৰ ব্ৰাহ্মণক শ্ৰাদ্ধৰ দান (নিমন্ত্ৰণ) দিব লাগে? হে কুৰুশাৰ্দূল! অনুগ্ৰহ কৰি সেয়া মোক স্পষ্টকৈ ব্যাখ্যা কৰক।
Verse 2
भीष्म उवाच ब्राह्मणान् न परीक्षेत क्षत्रियो दानधर्मवित् | दैवे कर्मणि पित्र्ये तु न्यायमाहुः परीक्षणम्,भीष्मजीने कहा--राजन! दान-पधर्मके ज्ञाता क्षत्रियको देवसम्बन्धी कर्म (यज्ञ- यागादि) में ब्राह्मणकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये, किंतु पितृकर्म (श्राद्ध) में उनकी परीक्षा न््यायसंगत मानी गयी है
ভীষ্ম ক’লে—হে ৰাজন! দানধৰ্ম বুজা ক্ষত্ৰিয়ই দেৱ-কৰ্মত (যজ্ঞ-যাগাদি) ব্ৰাহ্মণসকলক পৰীক্ষা কৰা উচিত নহয়; কিন্তু পিতৃ-কৰ্মত (শ্ৰাদ্ধাদি) তেওঁলোকক পৰীক্ষা কৰাটো ন্যায়সঙ্গত বুলি মানা হয়।
Verse 3
देवता: पूजयन्तीह दैवेनैवेह तेजसा । उपेत्य तस्माद् देवेभ्य: सर्वेभ्यो दापयेन्नर:,देवता अपने दैव तेजसे ही इस जगतमें ब्राह्मणोंका पूजन (समादर) करते हैं; अतः देवताओं के उद्देश्यसे सभी ब्राह्मणोंके पास जाकर उन्हें दान देना चाहिये
ভীষ্ম ক’লে—এই জগতত দেৱতাসকলে নিজৰ দৈৱ তেজেৰে ব্ৰাহ্মণসকলক সন্মান কৰে; সেয়ে মানুহে সকলো ব্ৰাহ্মণৰ ওচৰলৈ গৈ, সকলো দেৱতাৰ উদ্দেশ্যে দান দিব লাগে।
Verse 4
श्राद्धे त्वथ महाराज परीक्षेद् ब्राह्मणान् बुध: । कुलशीलवयोरूपैर्विद्ययाभिजनेन च,किंतु महाराज! श्राद्धके समय विद्वान् पुरुष कुल, शील (उत्तम आचरण), अवस्था, रूप, विद्या और पूर्वजोंके निवासस्थान आदिके द्वारा ब्राह्मणकी अवश्य परीक्षा करे
ভীষ্ম ক’লে—হে মহাৰাজ! শ্ৰাদ্ধৰ সময়ত বুদ্ধিমান লোকে ব্ৰাহ্মণসকলক পৰীক্ষা কৰিব লাগে—কুল, শীল, বয়স, ৰূপ, বিদ্যা আৰু অভিজনতা বিবেচনা কৰি।
Verse 5
तेषामन्ये पंक्तिदूषास्तथान्ये पंक्तिपावना: । अपाक्तेयास्तु ये राजन् कीर्तयिष्यामि तान् शृणु,ब्राह्मणोंमें कुछ तो पंक्तिदूषक होते हैं और कुछ पंक्तिपावन। राजन! पहले पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंका वर्णन करूँगा, सुनो
ভীষ্ম ক’লে—তেওঁলোকৰ মাজত কিছুমান পংক্তিদূষক, আৰু কিছুমান পংক্তিপাৱন। হে ৰাজন! যিসকল অপাংক্তেয় (পংক্তিত বহিবলৈ অযোগ্য), তেওঁলোকৰ বৰ্ণনা মই কৰোঁ—শুনা।
Verse 6
कितवो भ्रूणहा यक्ष्मी पशुपालो निराकृति: । ग्रामप्रेष्यो वार्धुषिको गायन: सर्वविक्रयी
ভীষ্ম ক’লে—জুৱাড়ি, ভ্ৰূণহন্তা, ক্ষয়ৰোগী, নীচবৃত্তিৰ পশুপালক, বিকৃত/কুৰুপ দেহধাৰী, গাঁৱৰ দৌৰঝাঁপ কৰা চাকৰ-দূত, সুদখোৰ, পেশাদাৰ গায়ক, আৰু যি সকলো বস্তু বিক্ৰী কৰে—এঁলোক অপাংক্তেয় বুলি গণ্য।
Verse 7
अगारदाही गरद: कुण्डाशी सोमविक्रयी । सामुद्रिको राजभृत्यस्तैलिक: कूटकारक:
ভীষ্মে ক’লে—যি ঘৰত অগ্নিসংযোগ কৰে, যি বিষ প্ৰয়োগ কৰে, যি প্ৰতাৰণামূলক জুৱাৰে জীৱিকা চলে, যি সোম বিক্ৰী কৰে, যি সমুদ্ৰগামী বাণিজ্যৰে জীৱে, ৰজাৰ বেতনভোগী ভৃত্য, তেলি আৰু কূটলেখ/জালসাজ—এইসকল নিন্দনীয় জীৱিকা আৰু অনিষ্টকাৰী লোক বুলি কোৱা হৈছে।
Verse 8
पित्रा विवदमानश्व यस्य चोपपतिर्गृहि । अभिशस्तस्तथा स्तेन: शिल्पं यश्षोपजीवति
ভীষ্মে ক’লে—যি পিতাৰ সৈতে সদায় বিবাদ কৰে, যাৰ ঘৰত অবৈধ উপপতি (পৰ-পুৰুষ) থাকে, যি জনসমক্ষে গম্ভীৰ দোষাৰোপণ/অভিশস্ত, তদ্ৰূপ চোৰ, আৰু যি নীচ শিল্পেৰে জীৱিকা কৰে—এনেকুৱা লোক আচৰণত কলুষিত আৰু সমাজত নিন্দিত; সেয়ে বিশ্বাস আৰু ধৰ্মসঙ্গতিৰ ক্ষেত্ৰত তেওঁলোকক এৰাই চলা উচিত।
Verse 9
पर्वकारश्न सूची च मित्रध्रुक् पारदारिक: । अव्रतानामुपाध्याय: काण्डपृष्ठस्तथैव च
ভীষ্মে ক’লে—যি দলিল-পত্ৰ কূটভাৱে তৈয়াৰ বা বিকৃত কৰে, যি সূচক/চুগলখোৰ, যি মিত্ৰদ্ৰোহী, যি পৰস্ত্ৰীগামী, যি অব্ৰত-অনুশাসনহীন লোকক উপদেশ দিয়া উপাধ্যায়, আৰু যি পিছফালৰ পৰা আঘাত কৰে—এইবোৰ হীন আৰু নিন্দনীয় আচৰণ বুলি চিনিব লাগে।
Verse 10
श्वभिश्व यः परिक्रामेद् य: शुना दष्ट एव च । परिवित्तिश्न यश्चव स्याद् दुश्चर्मा गुरुतल्पग:
ভীষ্মে ক’লে—যি কুকুৰ আৰু ঘোঁৰাৰ সঙ্গ লৈ ঘূৰে, যাক কুকুৰে কামুৰিছে, যি ‘পৰিবিত্তি’ (সমাজে নিন্দিত বৈবাহিক অৱস্থা)ত থাকে, যি দুৰ্গন্ধযুক্ত চর্মৰোগত পীড়িত, আৰু যি গুৰুতল্পগ (গুৰুৰ শয্যা লঙ্ঘনকাৰী)—এনেকুৱা লোকক ইয়াত ঘোৰ অশৌচ আৰু নিন্দনীয় আচৰণৰ বুলি কোৱা হৈছে; আচার-অনুষ্ঠান আৰু সামাজিক মৰ্যাদাৰ ক্ষেত্ৰত তেওঁলোকৰ বিষয়ে কঠোৰ সাৱধানতা ৰাখিব লাগে।
Verse 11
कुशीलवो देवलको नक्षत्रैर्यश्न॒ जीवति । ईदृशैब्राह्मिणैर्भुक्तमपांक्तेयैर्युधिष्ठिर
ভীষ্মে ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ! কুশীলৱ (ভ্ৰাম্যমাণ গায়ক-নট), দেৱলক (পাৰিশ্ৰমিকে মন্দিৰ-সেৱা কৰা), আৰু যি নক্ষত্ৰবিদ্যা/জ্যোতিষেৰে জীৱিকা কৰে—এনেকুৱা ব্ৰাহ্মণসকলক অপাংক্তেয় (পংক্তিভোজত অযোগ্য) বুলি ধৰা হয়; তেওঁলোকৰ সঙ্গত ভোজন কৰিলে সেই ভোজন ধৰ্মতঃ কলুষিত হয়।
Verse 12
रक्षांसि गच्छते हव्यमित्याहुर्ब्रह्मयवादिन: । जुआरी, गर्भहत्यारा, राजयक्ष्माका रोगी, पशुपालन करनेवाला, अपढ़, गाँवभरका हरकारा, सूदखोर, गवैया, सब तरहकी चीज बेचनेवाला, दूसरोंका घर फूँकनेवाला, विष देनेवाला, माताद्वारा पतिके जीते-जी दूसरे पतिसे उत्पन्न किये हुए पुत्रके घर भोजन करनेवाला, सोमरस बेचनेवाला, सामुद्रिक विद्या (हस्तरेखा) से जीविका चलानेवाला, राजाका नौकर, तेल बेचनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, पितासे झगड़ा करनेवाला, जिसके घरमें जार पुरुषका प्रवेश हो वह, कलंकित, चोर, शिल्पजीवी, बहुरूपिया, चुगलखोर, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, व्रतरहित, मनुष्योंका अध्यापक, हथियार बनाकर जीविका चलानेवाला, कुत्ते साथ लेकर घूमनेवाला, जिसे कुत्तेने काटा हो वह, जिसके छोटे भाईका विवाह हो गया हो ऐसा अविवाहित बड़ा भाई, चर्मरोगी, गुरुपत्नीगामी, नटका काम करनेवाला, देवमन्दिरमें पूजासे जीविका चलानेवाला और नक्षत्रोंका फल बताकर जीनेवाला--ये सभी ब्राह्मण पंक्तिसे बाहर रखने योग्य हैं! युधिष्ठिर! ऐसे पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंका खाया हुआ हविष्य राक्षसोंको मिलता है, ऐसा ब्रह्मवादी पुरुषोंका कथन है ।। ६ -११३ || श्राद्ध भुक्त्वा त्वधीयीत वृषलीतल्पगश्न यः
ভীষ্মে ক’লে— ব্ৰহ্মবাদী পণ্ডিতসকলে কয় যে পংক্তিদূষকৰ সৈতে ভোজন কৰা হৱিষ্য ৰাক্ষসলৈ যায়। সেয়ে শ্রাদ্ধভোজনৰ পাছত পুনৰ বেদাধ্যয়নত প্ৰবৃত্ত হ’ব লাগে; কিন্তু যি নীচজাতীয় স্ত্ৰীৰ সঙ্গ কৰে বা শয্যাৰ পবিত্ৰতা ভংগ কৰি ভোজন কৰে, সি অযোগ্য হয়—তাৰ সহভাগে ক্ৰিয়া কলুষিত হয় আৰু ফল পিতৃ-দেৱতাৰ পৰা সৰি অন্যত্ৰ গমন কৰে।
Verse 13
सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम्,सोमरस बेचनेवालेको जो श्राद्धका अन्न दिया जाता है, वह पितरोंके लिये विष्ठाके तुल्य है। श्राद्धमें वैद्यकों जिमाया हुआ अन्न पीब और रक्तके समान पितरोंको अग्राह्म हो जाता है। देवमन्दिरमें पूजा करके जीविका चलानेवालेको दिया हुआ श्राद्धका दान नष्ट हो जाता है--उसका कोई फल नहीं मिलता। सूदखोरको दिया हुआ अन्न अस्थिर होता है। वाणिज्यवृत्ति करनेवालेको श्राद्धमें दिये हुए अन्नका दान न इहलोकमें लाभदायक होता है और न परलोकमें
ভীষ্মে ক’লে— সোম বিক্ৰেতাক শ্রাদ্ধৰ অন্ন দিলে সেয়া পিতৃসকলৰ বাবে বিষ্ঠাসম হয়; আৰু বৈদ্যক ভোজন কৰোৱা অন্ন পূয় আৰু ৰক্তৰ দৰে হৈ পিতৃসকলৰ অগ্ৰাহ্য হয়। যি দেৱালয়ত পূজা কৰি জীৱিকা চলে, তাক দিয়া শ্রাদ্ধ-দান নষ্ট হয়, ফল নেদিয়ে। সুদখোৰক দিয়া অন্ন অস্থিৰ ফলদায়ক; আৰু ব্যৱসায়ীক শ্রাদ্ধত দিয়া বস্তু ন ইহলোকে লাভ দিয়ে, ন পৰলোকে।
Verse 14
नष्ट देवलके दत्तमप्रतिष्ठं च वार्धुषे । यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद् भवेत्,सोमरस बेचनेवालेको जो श्राद्धका अन्न दिया जाता है, वह पितरोंके लिये विष्ठाके तुल्य है। श्राद्धमें वैद्यकों जिमाया हुआ अन्न पीब और रक्तके समान पितरोंको अग्राह्म हो जाता है। देवमन्दिरमें पूजा करके जीविका चलानेवालेको दिया हुआ श्राद्धका दान नष्ट हो जाता है--उसका कोई फल नहीं मिलता। सूदखोरको दिया हुआ अन्न अस्थिर होता है। वाणिज्यवृत्ति करनेवालेको श्राद्धमें दिये हुए अन्नका दान न इहलोकमें लाभदायक होता है और न परलोकमें
ভীষ্মে ক’লে— দেৱালয়-সেৱাৰে জীৱিকা চলোৱা লোকক দিয়া (বিশেষকৈ শ্রাদ্ধ) দান নষ্ট হয়। সুদখোৰক দিয়া দান স্থিৰ ফল নেদিয়ে। আৰু ব্যৱসায়ীক দিয়া বস্তু ন ইহলোকে ফল দিয়ে, ন পৰলোকে।
Verse 15
भस्मनीव हुत॑ हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे । ये तु धर्मव्यपेतेषु चारित्रापगतेषु च । हव्यं कव्यं प्रयच्छन्ति तेषां तत् प्रेत्य नश्यति,एक पतिको छोड़कर दूसरा पति करनेवाली स्त्रीके पुत्रको दिया हुआ श्राद्धमें अन्नका दान राखमें डाले हुए हविष्यके समान व्यर्थ हो जाता है। जो लोग धर्मरहित और चरित्रहीन द्विजको हव्य-कव्यका दान करते हैं, उनका वह दान परलोकमें नष्ट हो जाता है
ভীষ্মে ক’লে— যেনেকৈ ছাইত ঢালি দিয়া হৱিষ্য নিষ্ফল হয়, তেনেকৈ পৌনর্ভব (পুনৰ্বিবাহ/অনিয়মিত বৈবাহিক অৱস্থাৰ সৈতে জড়িত) দ্বিজক দিয়া দান নিষ্ফল। যিসকলে ধৰ্মচ্যুত আৰু সদাচাৰহীন দ্বিজক হব্য-কব্য দান কৰে, তেওঁলোকৰ সেই দান মৃত্যুৰ পাছত নষ্ট হয়।
Verse 16
ज्ञानपूर्व तु ये तेभ्य: प्रयच्छन्त्यल्पबुद्धय: । पुरीषं भुज्जते तेषां पितर: प्रेत्य निश्चय:,जो मूर्ख मनुष्य जान-बूझकर वैसे पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंको श्राद्धमें अन्नका दान करते हैं, उनके पितर परलोकमें निश्चय ही उनकी विष्ठा खाते हैं
ভীষ্মে ক’লে— অল্পবুদ্ধি লোকসকলে জানি-বুজি এনে পংক্তিদূষক ব্ৰাহ্মণক শ্রাদ্ধত অন্নদান কৰিলে, তেওঁলোকৰ পিতৃসকল পৰলোকে নিশ্চিতভাৱে মল ভক্ষণ কৰে।
Verse 17
एतानिमान् विजानीयादपांक्तेयान् द्विजाधमान् । शूद्राणामुपदेशं च ये कुर्वन्त्यल्पचेतस:,इन अधम ब्राह्मणोंको पंक्तिसे बाहर रखने-योग्य जानना चाहिये। जो मूढ़ ब्राह्मण शूद्रोंको वेदका उपदेश करते हैं, वे भी अपांक्तेय (अर्थात् पंक्ति-बाहर) ही हैं
Bhishma said: “These men should be recognized as unfit to sit in the sacred dining line—base among the twice-born. Those of little understanding who give Vedic instruction to Śūdras are likewise to be regarded as apāṅkteya, excluded from the communal rite.”
Verse 18
षष्टिं काण: शतं षण्ढ: श्रित्री यावत्प्रपश्यति । पंक््त्यां समुपविष्टायां तावद् दूषयते नृप,राजन! काना मनुष्य पंक्तिमें बैठे हुए साठ मनुष्योंको दूषित कर देता है। जो नपुंसक है, वह सौ मनुष्योंको अपवित्र बना देता है तथा जो सफेद कोढ़का रोगी है, वह बैठे हुए पंक्तिमें जितने लोगोंको देखता है, उन सबको दूषित कर देता है
Bhīṣma said: “O king, it is taught that when people are seated together in a dining row, a one-eyed man is said to taint sixty; an impotent man, a hundred; and a person afflicted with white leprosy is said to taint as many as he can see. The point is to stress the need for ritual and social safeguards in communal acts, so that what is undertaken as a pure, dharmic observance is not considered compromised.”
Verse 19
यद् वेष्टितशिरा भुंक्ते यद् भुंक्ते दक्षिणामुख: । सोपानत्कश्च यद् भुंक्ते सर्व विद्यात् तदासुरम्,जो सिरपर पगड़ी और टोपी रखकर भोजन करता है, जो दक्षिणकी ओर मुख करके खाता है तथा जूते पहने भोजन करता है, उनका वह सारा भोजन आसुर समझना चाहिये
Bhīṣma said: “Know that food is of an ‘āsuric’ (impure, undisciplined) character when it is eaten with the head wrapped (as with a turban or cap), when it is eaten facing south, or when it is eaten while wearing footwear.” The instruction underscores that even ordinary acts like eating should be governed by reverence, cleanliness, and proper orientation, for conduct shapes one’s inner disposition.
Verse 20
असूयता च यद् दत्तं यच्च श्रद्धाविवर्जितम् | सर्व तदसुरेन्द्राय ब्रह्मा भागमकल्पयत्,जो दोषदृष्टि रखते हुए दान करता है और जो बिना श्राद्धके देता है, उस सारे दानको ब्रह्माजीने असुरराज बलिका भाग निश्चित किया है
Bhīṣma said: Whatever gift is given with fault-finding envy, and whatever is given devoid of faith, all of that Brahmā has assigned as the share of the lord of the Asuras. The teaching is that charity is ethically shaped not only by the act of giving, but by the giver’s inner disposition—faith and goodwill elevate a gift, while envy and lack of reverence divert its merit toward adverse ends.
Verse 21
ध्वानश्न पंक्तिदूषाश्न नावेक्षेरनू कथंचन । तस्मात् परिसृते दद्यात् तिलांश्वान्ववकीरयेत्,कुत्तों और पंकिादूषक ब्राह्मणोंकी किसी तरह दृष्टि न पड़े, इसके लिये सब ओरसे घिरे हुए स्थानमें श्राद्धका दान करे और वहाँ सब ओर तिल छींटे
Bhīṣma said: One should ensure that dogs and Brahmins who spoil the funeral-feast line do not in any way cast their gaze upon the śrāddha. Therefore, the offering should be made in a well-enclosed place, and sesame seeds should be scattered around to ward them off and protect the rite from defilement.
Verse 22
तिलैरविरहितं श्राद्ध कृतं क्रोधवशेन च । यातुधाना: पिशाचाश्न विप्रलुम्पन्ति तद्धवि:,जो श्राद्ध तिलोंसे रहित होता है, अथवा जो क्रोधपूर्वक किया जाता है, उसके हविष्यको यातुधान (राक्षस) और पिशाच लुप्त कर देते हैं
ভীষ্মে ক’লে—তিলবিহীন শ্ৰাদ্ধ, অথবা ক্ৰোধবশে কৰা শ্ৰাদ্ধ—তাৰ হৱিষ্য যাতুধান আৰু পিশাচে কেঢ়ি লৈ নষ্ট কৰে। সেয়ে শ্ৰাদ্ধ যথাযথ দ্ৰব্যসহ, শান্ত আৰু শ্ৰদ্ধাভাৱৰে কৰা উচিত।
Verse 23
अपांक्तो यावतः पांक्तान् भुज्जानाननुपश्यति । तावत्फलाद भ्रंशयति दातारं तस्य बालिशम्,पंक्तिदूषक पुरुष पंक्तिमें भोजन करनेवाले जितने ब्राह्मणोंको देख लेता है, वह मूर्ख दाताको उलने ब्राह्मणोंके दानजनित फलसे वंचित कर देता है
ভীষ্মে ক’লে—অপাংক্ত (পংক্তিত বহিবলৈ অযোগ্য) জনে পংক্তিত ভোজন কৰা যোগ্য ব্ৰাহ্মণক যিমানজন দেখে, সিমানজনৰ দানফলৰ পৰা সি সেই মূঢ় দাতাক বঞ্চিত কৰে।
Verse 24
इमे तु भरतश्रेष्ठ विज्ञेया: पंक्तिपावना: | ये त्वतस्तान् प्रवक्ष्यामि परीक्षस्वेह तान् द्विजान्
ভীষ্মে ক’লে—হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! এঁলোকক পংক্তিপাৱন বুলি জানিব লাগে। এতিয়া মই তেওঁলোকৰ কথা ক’ম; ইয়াত সেই দ্বিজসকলক পৰীক্ষা কৰি চিনি লোৱা।
Verse 25
भरतश्रेष्ठस अब जिनका वर्णन किया जा रहा है, इन सबको पंक्तिपावन जानना चाहिये। इनका वर्णन इसलिये करूँगा कि तुम ब्राह्मणोंकी श्राद्धमें परीक्षा कर सको ।। विद्यावेदब्रतस्नाता ब्राह्मणा: सर्व एव हि । सदाचारपराश्रैव विज्ञेया: सर्वपावना:,विद्या और वेदव्रतमें स्नातक हुए समस्त ब्राह्मण यदि सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हों तो उन्हें सर्वपावन जानना चाहिये
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল ব্ৰাহ্মণ বিদ্যা আৰু বেদব্ৰতত স্নাতক আৰু সদাচাৰত নিবিষ্ট, তেওঁলোকক সৰ্বপাৱন বুলি জানিব লাগে; শ্ৰাদ্ধত যোগ্য ব্ৰাহ্মণ চিনাক্ত কৰিবলৈ মই এই কথা কৈছোঁ।
Verse 26
पाक्तेयांस्तु प्रवक्ष्यामि ज्ञेयास्ते पंक्तिपावना: । त्रिणाचिकेत: पज्चाग्निस्त्रिसुपर्ण: षडंगवित्,अब मैं पांक्तेय ब्राह्मणोंका वर्णन करूँगा। उन्हींको पंक्तिपावन जानना चाहिये। जो त्रिणाचिकेत नामक मन्त्रोंका जप करनेवाला, गार्हपत्य आदि पाँच अग्नियोंका सेवन करनेवाला, त्रिसुपर्ण नामक (त्रिसुपर्णमित्यादि) मन्त्रोंका पाठ करनेवाला है तथा “ब्रह्ममेतु माम'* इत्यादि तैत्तिरीय-प्रसिद्ध शिक्षा आदि छहों अंगोंका ज्ञान रखनेवाला है ये सब पंक्तिपावन हैं
ভীষ্মে ক’লে—এতিয়া মই ‘পাংক্তেয়’ ব্ৰাহ্মণসকলৰ বৰ্ণনা কৰোঁ; তেওঁলোককেই পংক্তিপাৱন বুলি জানিব লাগে—যি ত্ৰিণাচিকেত মন্ত্র জপ কৰে, পঞ্চাগ্নি পালন কৰে, ত্ৰিসূপৰ্ণ সূক্ত পাঠ কৰে, আৰু বেদৰ ষড়ঙ্গৰ জ্ঞানী।
Verse 27
ब्रह्मदेयानुसंतानश्छन्दोगो ज्येष्ठतामग: । मातापित्रोर्यश्व वश्य: श्रत्रियों दशपूरुष:,जो परम्परासे वेद या पराविद्याका ज्ञाता अथवा उपदेशक है, जो वेदके छन्दोग शाखाका दिद्वान् है, जो ज्येष्ठ साममन्त्रका गायक, माता-पिताके वशमें रहनेवाला और दस पीढ़ियोंसे श्रोत्रिय (वेदपाठी) है, वह भी पंक्तिपावन है
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্ৰহ্মদেয়-পরম্পৰাৰে ৰক্ষিত বংশৰ, ছান্দোগ শাখাৰ পণ্ডিত, জ্যেষ্ঠ সামৰ গায়ক, মাতৃ-পিতৃৰ বশ্য, আৰু দহ পুৰুষ ধৰি শ্ৰোত্ৰিয়—সেও পংক্তি-পাৱন।
Verse 28
ऋतुकालाभिगामी च धर्मपत्नीषु यः सदा । वेदविद्याव्रतस्नातो विप्र: पंक्ति पुनात्युत,जो अपनी धर्मपत्नियोंके साथ सदा ऋतुकालमें ही समागम करता है, वेद और विद्याके व्रतमें स्नातक हो चुका है, वह ब्राह्मण-पंक्तिको पवित्र कर देता है
ভীষ্মে ক’লে—যি সদায় কেৱল নিজৰ ধৰ্মপত্নীসকলৰ ওচৰলৈ যায়, তাও ঋতুকালতহে, আৰু যি বেদ-বিদ্যাৰ ব্ৰত সম্পন্ন কৰি স্নাতক হৈছে—সেই বিপ্ৰ পংক্তিক পৱিত্ৰ কৰে।
Verse 29
अथर्वशिरसो ध्येता ब्रह्मचारी यतव्रत: । सत्यवादी धर्मशील: स्वकर्मनिरतश्न॒ सः,जो अथर्ववेदके ज्ञाता, ब्रह्मचारी, नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, सत्यवादी, धर्मशील और अपने कर्तव्य-कर्ममें तत्पर हैं, वे पुरुष पंक्तिपावन हैं
ভীষ্মে ক’লে—যি অথৰ্বশিৰসৰ ধ্যান কৰে, ব্ৰহ্মচাৰী, নিয়মবদ্ধ ব্ৰতপালক, সত্যবাদী, ধৰ্মশীল আৰু নিজৰ স্বকৰ্মত সদা নিৰত—সেই পুৰুষ পংক্তি-পাৱন।
Verse 30
ये च पुण्येषु तीर्थेषु अभिषेककृतश्रमा: । मखेषु च समन्त्रेषु भवन्त्यवभूथप्लुता:
ভীষ্মে ক’লে—আৰু যিসকলে পুণ্য তীৰ্থত অভিষেক-স্নান কৰি শ্ৰম কৰে, আৰু যিসকলে মন্ত্ৰসহ যজ্ঞত অৱভৃথ-স্নানৰ দ্বাৰা শুদ্ধ হয়—তেওঁলোকেও সেই পৱিত্ৰ কৰ্মৰ শুদ্ধিদায়ক ফল লাভ কৰে।
Verse 31
अक्रोधना हाचपला: क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रिया: । सर्वभूतहिता ये च श्राद्धेष्वेतान् निमन्त्रयेत्
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল ক্ৰোধহীন, অচঞ্চল, ক্ষমাশীল, দান্ত, জিতেন্দ্ৰিয় আৰু সৰ্বভূত-হিতৈষী—শ্ৰাদ্ধত তেওঁলোককেই নিমন্ত্ৰণ কৰিব লাগে।
Verse 32
जिन्होंने पुण्य तीर्थोमें गोता लगानेके लिये श्रम--प्रयत्न किया है, वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान करके अवभृथ-स्नान किया है; जो क्रोधरहित, चपलतारहित, क्षमाशील, मनको वशगमें रखनेवाले, जितेन्द्रिय और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितैषी हैं, उन्हीं ब्राह्मणोंको श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये ।। एतेषु दत्तमक्षय्यमेते वै पंक्तिपावना: । इमे परे महाभागा विज्ञेया: पंक्तिपावना:,क्योंकि ये पंक्तिपावन हैं; अतः इन्हें दिया हुआ दान अक्षय होता है। इनके सिवा दूसरे भी महान् भाग्यशाली पंक्तिपावन ब्राह्मण हैं, उन्हें इस प्रकार जानना चाहिये
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে পুণ্য তীৰ্থত স্নান কৰিবলৈ শ্ৰম আৰু প্ৰচেষ্টা কৰিছে, যিসকলে বৈদিক মন্ত্ৰোচ্চাৰণ-পূৰ্বক বহু যজ্ঞ সম্পাদন কৰি অৱভৃথ-স্নানেৰে সমাপ্তি কৰিছে; যিসকল ক্ৰোধ-ৰহিত, চঞ্চলতা-ৰহিত, ক্ষমাশীল, মন-সংযমী, জিতেন্দ্ৰিয় আৰু সকলো প্ৰাণীৰ হিতৈষী—শ্ৰাদ্ধত সেই ব্রাহ্মণসকলকেই নিমন্ত্ৰণ কৰা উচিত। তেনে লোকক দিয়া দান অক্ষয় হয়, কিয়নো তেওঁলোক পংক্তিপাৱন—ভোজন-পংক্তিক পবিত্ৰ কৰে। এইসকলৰ বাহিৰেও আন বহু মহাভাগ্যবান পংক্তিপাৱন ব্রাহ্মণ আছে; তেওঁলোককো এইদৰে যোগ্য বুলি চিনিব লাগে।
Verse 33
यतयो मोक्षधर्मज्ञा योगा: सुचरितव्रता: । (पाज्चरात्रविदो मुख्यास्तथा भागवता: परे | वैखानसा: कुलश्रेष्ठा वैदिकाचारचारिण: ।।) ये चेतिहासं प्रयता: श्रावयन्ति द्विजोत्तमान्,जो मोक्ष-धर्मका ज्ञान रखनेवाले संयमी और उत्तम प्रकारसे व्रतका आचरण करनेवाले योगी हैं, पांचरात्र आगमके जाननेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं, परम भागवत हैं, वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाले, कुलमें श्रेष्ठ और वैदिक आचारका अनुष्ठान करनेवाले हैं। जो मनको संयममें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इतिहास सुनाते हैं, जो महाभाष्य और व्याकरणके विद्वान् हैं तथा जो पुराण और धर्मशास्त्रोंका न्यायपूर्वक अध्ययन करके उनकी आज्ञाके अनुसार विधिवत् आचरण करनेवाले हैं, जिन्होंने नियमित समयतक गुरुकुलमें निवास करके वेदाध्ययन किया है, जो परीक्षाके सहस्रों अवसरोंपर सत्यवादी सिद्ध हुए हैं तथा जो चारों वेदोंके पढ़ने-पढ़ानेमें अग्रगण्य हैं, ऐसे ब्राह्मण पंक्तिको जितनी दूर देखते हैं उतनी दूरमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको पवित्र कर देते हैं
ভীষ্মে ক’লে—মোক্ষধৰ্মজ্ঞানী যতি, সুশৃঙ্খলভাৱে ব্ৰত পালন কৰা যোগী; পাঞ্চৰাত্ৰ পৰম্পৰাৰ অগ্ৰগণ্য জ্ঞাতা আৰু পৰম ভাগৱত; বৈখানস আচারী, কুলশ্ৰেষ্ঠ আৰু বৈদিক আচৰণত স্থিত—আৰু যিসকলে সংযমসহ দ্বিজোত্তমসকলক ইতিহাস শ্ৰৱণ কৰায়—এনে ব্রাহ্মণসকল প্ৰশংসিত।
Verse 34
ये च भाष्यविद: केचिद् ये च व्याकरणे रता: । अधीयते पुराण ये धर्मशास्त्राण्यथापि च,जो मोक्ष-धर्मका ज्ञान रखनेवाले संयमी और उत्तम प्रकारसे व्रतका आचरण करनेवाले योगी हैं, पांचरात्र आगमके जाननेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं, परम भागवत हैं, वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाले, कुलमें श्रेष्ठ और वैदिक आचारका अनुष्ठान करनेवाले हैं। जो मनको संयममें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इतिहास सुनाते हैं, जो महाभाष्य और व्याकरणके विद्वान् हैं तथा जो पुराण और धर्मशास्त्रोंका न्यायपूर्वक अध्ययन करके उनकी आज्ञाके अनुसार विधिवत् आचरण करनेवाले हैं, जिन्होंने नियमित समयतक गुरुकुलमें निवास करके वेदाध्ययन किया है, जो परीक्षाके सहस्रों अवसरोंपर सत्यवादी सिद्ध हुए हैं तथा जो चारों वेदोंके पढ़ने-पढ़ानेमें अग्रगण्य हैं, ऐसे ब्राह्मण पंक्तिको जितनी दूर देखते हैं उतनी दूरमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको पवित्र कर देते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল ভাষ্যবিদ, যিসকল ব্যাকৰণত ৰত, যিসকল পুৰাণ আৰু ধৰ্মশাস্ত্ৰ অধ্যয়ন কৰে—বিদ্যা আৰু সদাচাৰে সমৃদ্ধ তেনে ব্রাহ্মণসকলে কেৱল সন্নিধিমাত্ৰে আনকো পবিত্ৰ কৰে।
Verse 35
अधीत्य च यथान्यायं विधिवत् तस्य कारिण: । उपपन्नो गुरुकुले सत्यवादी सहस्रश:,जो मोक्ष-धर्मका ज्ञान रखनेवाले संयमी और उत्तम प्रकारसे व्रतका आचरण करनेवाले योगी हैं, पांचरात्र आगमके जाननेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं, परम भागवत हैं, वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाले, कुलमें श्रेष्ठ और वैदिक आचारका अनुष्ठान करनेवाले हैं। जो मनको संयममें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इतिहास सुनाते हैं, जो महाभाष्य और व्याकरणके विद्वान् हैं तथा जो पुराण और धर्मशास्त्रोंका न्यायपूर्वक अध्ययन करके उनकी आज्ञाके अनुसार विधिवत् आचरण करनेवाले हैं, जिन्होंने नियमित समयतक गुरुकुलमें निवास करके वेदाध्ययन किया है, जो परीक्षाके सहस्रों अवसरोंपर सत्यवादी सिद्ध हुए हैं तथा जो चारों वेदोंके पढ़ने-पढ़ानेमें अग्रगण्य हैं, ऐसे ब्राह्मण पंक्तिको जितनी दूर देखते हैं उतनी दूरमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको पवित्र कर देते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে নিয়মানুসাৰে বিধিবৎ অধ্যয়ন কৰিছে আৰু সেই শিক্ষাৰ অনুৰূপ আচৰণ কৰে; যিসকলে গুৰুকুলত যথাযথভাৱে গঢ় লৈ উঠিছে; আৰু সহস্ৰ সুযোগত সত্যবাদী বুলি প্ৰমাণিত—শীল আৰু বিদ্যাৰে সমৃদ্ধ তেনে ব্রাহ্মণসকলৰ পবিত্ৰকৰণ-শক্তি থাকে।
Verse 36
अग्रया: सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च । यावदेते प्रपश्यन्ति पंक्त्यास्तावत्पुनन्त्युत,जो मोक्ष-धर्मका ज्ञान रखनेवाले संयमी और उत्तम प्रकारसे व्रतका आचरण करनेवाले योगी हैं, पांचरात्र आगमके जाननेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं, परम भागवत हैं, वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाले, कुलमें श्रेष्ठ और वैदिक आचारका अनुष्ठान करनेवाले हैं। जो मनको संयममें रखकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इतिहास सुनाते हैं, जो महाभाष्य और व्याकरणके विद्वान् हैं तथा जो पुराण और धर्मशास्त्रोंका न्यायपूर्वक अध्ययन करके उनकी आज्ञाके अनुसार विधिवत् आचरण करनेवाले हैं, जिन्होंने नियमित समयतक गुरुकुलमें निवास करके वेदाध्ययन किया है, जो परीक्षाके सहस्रों अवसरोंपर सत्यवादी सिद्ध हुए हैं तथा जो चारों वेदोंके पढ़ने-पढ़ानेमें अग्रगण्य हैं, ऐसे ब्राह्मण पंक्तिको जितनी दूर देखते हैं उतनी दूरमें बैठे हुए ब्राह्मणोंको पवित्र कर देते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যিসকল সকলো বেদত আৰু সকলো প্ৰবচনত অগ্ৰগণ্য, তেনে ব্রাহ্মণসকলে ভোজন-পংক্তিত যিমান দূৰলৈ দৃষ্টি বিস্তাৰ কৰে, সিমান দূৰলৈ বহা সকলোকে পবিত্ৰ কৰে।
Verse 37
ततो हि पावनात्पंक्त्या: पंक्तिपावन उच्यते । क्रोशादर्धतृतीयाच्च पावयेदेक एव हि
সেয়েহে পংক্তিক পাৱন কৰে বুলিয়েই তেওঁ ‘পংক্তিপাৱন’ বুলি কোৱা হয়। সত্যই, এনে এজনেই ক্ৰোশ পৰ্যন্ত, আৰু তাৰ তৃতীয়াংশৰ অর্ধ দূৰ পৰ্যন্তো আনক পাৱন কৰিব পাৰে।
Verse 38
अनृत्विगनुपाध्याय: स चेदग्रासनं व्रजेत्
যাৰ না ঋত্বিক আছে, না উপাধ্যায়; সি যদি তথাপি অগ্ৰাসন (মানাসন) গ্ৰহণ কৰিবলৈ যায়,
Verse 39
ऋतच्विग्भिर भ्यनुज्ञात: पंक््त्या हरति दुष्कृतम् जो ऋत्विक् या अध्यापक न हो, वह भी यदि ऋत्विजोंकी आज्ञा लेकर श्राद्धमें अग्रासन ग्रहण करता है तो पंक्तिके दोषको हर लेता है अर्थात् दूर कर देता है ।। अथ चेद् वेदवित् सर्व: पंक्तिदोषैरविवर्जित:
ঋত্বিকসকলৰ অনুমতি লৈ সি (যি না ঋত্বিক, না অধ্যাপক) যদি শ্রাদ্ধত পংক্তিৰ অগ্ৰাসন গ্ৰহণ কৰে, তেন্তে পংক্তিৰ দোষ দূৰ কৰে। আৰু সি যদি বেদবিত্ হয় আৰু পংক্তিদোষৰ পৰা মুক্ত থাকে,
Verse 40
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन परीक्ष्यामन्त्रयेद् द्विजान्ू
সেয়েহে সকলো প্ৰচেষ্টাৰে পৰীক্ষা কৰি তবেই দ্বিজসকলৰ সৈতে পৰামৰ্শ কৰা উচিত।
Verse 41
स्वकर्मनिरतानन्यान् कुले जातान् बहुश्रुतान् । इसलिये सब प्रकारकी चेष्टाओंसे ब्राह्मणोंकी परीक्षा करके ही उन्हें श्राद्धमें निमन्त्रित करना चाहिये। वे स्वकर्ममें तत्पर रहनेवाले, कुलीन और बहुश्रुत होने चाहिये || ४० $ ।। यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हवींषि च
শ্ৰাদ্ধলৈ সেই ব্ৰাহ্মণসকলকেই নিমন্ত্ৰণ কৰা উচিত, যিসকল স্বকর্মত নিৰত, আচৰণত শুদ্ধ, সৎকুলজাত আৰু বহুশ্ৰুত। যাৰ শ্ৰাদ্ধ আৰু হব্য (হোমাহুতি) মিত্ৰসকলক প্ৰধান কৰি সম্পন্ন হয়,
Verse 42
यश्न श्राद्धे कुरुते संगतानि न देवयानेन पथा स याति | स वै मुक्त: पिप्पलं बन्धनाद् वा स्वर्गाल्लोकाच्च्यवते श्राद्धमित्र:,जो मनुष्य श्राद्धमें भोजन देकर उससे मित्रता जोड़ता है, वह मृत्युके बाद देवमार्गसे नहीं जाने पाता। जैसे पीपलका फल डंठलसे टूटकर नीचे गिर जाता है, वैसे ही श्राद्धको मित्रताका साधन बनानेवाला पुरुष स्वर्गलोकसे भ्रष्ट हो जाता है
ভীষ্মে ক’লে—যি মানুহে শ্ৰাদ্ধত ভোজন দি তাক ব্যক্তিগত মিত্ৰতা আৰু গাঁঠনি গঢ়াৰ উপায় কৰে, সি মৃত্যুৰ পাছত দেবযান পথেদি নাযায়। তেনে ‘শ্ৰাদ্ধ-মিত্ৰ’ স্বৰ্গলোকৰ পৰা পতিত হয়, যেন পিপ্পল (অশ্বত্থ) ফল ডাঁটিৰ পৰা ছুটিলে তললৈ পৰে।
Verse 43
तस्माम्समित्रं श्राद्धकृन्नाद्रियेत दद्याम्मित्रेभ्य: संग्रहार्थ धनानि । यन्मन्यते नैव शत्रुं न मित्र त॑ मध्यस्थं भोजयेद्धव्यकव्ये,इसलिये श्राद्धकर्ताको चाहिये कि वह श्राद्धमें मित्रको निमन्त्रण न दे। मित्रोंको संतुष्ट करनेके लिये धन देना उचित है। श्राद्धमें भोजन तो उसे ही कराना चाहिये जो शत्रु या मित्र न होकर मध्यस्थ हो
ভীষ্মে ক’লে—সেয়ে শ্ৰাদ্ধকাৰীয়ে শ্ৰাদ্ধত বন্ধুক বিশেষ আদৰ দি নিমন্ত্ৰণ নকৰিব। বন্ধুসমূহক সন্তুষ্ট ৰাখিবলৈ সদ্ভাৱ ৰক্ষাৰ্থে ধন দান কৰা উচিত। কিন্তু হব্য-কব্য কৰ্মত যাক ন শত্রু ন মিত্ৰ বুলি নিৰপেক্ষ মধ্যস্থ বুলি মানে, তাকেই ভোজন কৰাব লাগে।
Verse 44
यथोषरे बीजमुप्तं न रोहे- न्न चावप्ता प्राप्तुयाद् बीजभागम् | एवं श्राद्ध भुक्तमनर्हमाणै- न चेह नामुत्र फलं ददाति,जैसे ऊसरमें बोया हुआ बीज न तो जमता है और न बोनेवालेको उसका कोई फल मिलता है, उसी प्रकार अयोग्य ब्राह्मणोंको भोजन कराया हुआ श्राद्धका अन्न न इस लोकमें लाभ पहुँचाता है, न परलोकमें ही कोई फल देता है
ভীষ্মে ক’লে—যেনে উসৰ (লবণীয়া-বাঁঝ) মাটিত বোৱা বীজ ন মোলায়, ন বোৱা জনে তাৰ কোনো ফলাংশ পায়; তেনে অযোগ্য পাত্ৰে ভক্ষণ কৰা শ্ৰাদ্ধান্ন ইহলোকতো লাভ নিদিয়ে, পৰলোকতো ফল নিদিয়ে।
Verse 45
ब्राह्मणो हानधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति । तस्मै श्राद्ध न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते,जैसे घास-फ़्सकी आग शीघ्र ही शान्त हो जाती है, उसी प्रकार स्वाध्यायहीन ब्राह्मण तेजहीन हो जाता है, अतः उसे श्राद्धका दान नहीं देना चाहिये, क्योंकि राखमें कोई भी हवन नहीं करता
ভীষ্মে ক’লে—স্বাধ্যায়হীন ব্ৰাহ্মণ তৃণাগ্নিৰ দৰে সোনকালে নিভি যায়। সেয়ে তাক শ্ৰাদ্ধদান দিব নালাগে; কিয়নো ভস্মত কোনেও হোম নকৰে।
Verse 46
सम्भोजनी नाम पिशाचदक्षिणा सा नैव देवान् न पितृनुपैति । इहैव सा भ्राम्यति हीनपुण्या शालान्तरे गौरिव नष्टवत्सा,जो लोग एक-दूसरेके यहाँ श्राद्धमें भोजन करके परस्पर दक्षिणा देते और लेते हैं, उनकी वह दान-दक्षिणा पिशाच-दक्षिणा कहलाती है। वह न देवताओंको मिलती है, न पितरोंको। जिसका बछड़ा मर गया है ऐसी पुण्यहीना गौ जैसे दुखी होकर गोशालामें ही चक्कर लगाती रहती है, उसी प्रकार आपसमें दी और ली हुई दक्षिणा इसी लोकमें रह जाती है, वह पितरोंतक नहीं पहुँचने पाती
ভীষ্মে ক’লে—যিসকলে পৰস্পৰে একে-অপৰৰ ঘৰত শ্ৰাদ্ধভোজন কৰি পুনৰ দাক্ষিণা দিয়া-লোৱা কৰে, সেই দাক্ষিণা ‘সম্ভোজনী’ নামৰ পিশাচ-দাক্ষিণা। ই দেৱতালৈও নাযায়, পিতৃলোকলৈও নাযায়। পুণ্যহীন হৈ ই এই লোকতেই ঘূৰি ফুৰে—যেনে বাছুৰ হেৰোৱা গাই গোহালিৰ ভিতৰতে ব্যাকুল হৈ চক্কৰ মাৰে।
Verse 47
यथाग्नौ शान्ते घृतमाजुहोति तन्नैव देवान् न पितृनुपैति । तथा दत्तं नर्तने गायने च यां चानृते दक्षिणामावृणोति,जैसे आग बुझ जानेपर जो घृतका हवन किया जाता है, उसे न देवता पाते हैं, न पितर; उसी प्रकार नाचनेवाले, गवैये और झूठ बोलनेवाले अपात्र ब्राह्मणको दिया हुआ दान निष्फल होता है। अपात्र पुरुषको दी हुई दक्षिणा न दाताको तृप्त करती है न दान लेनेवालेको; प्रत्युत दोनोंका ही नाश करती है। यही नहीं, वह विनाशकारिणी निन्दित दक्षिणा दाताके पितरोंको देवयान-मार्गसे नीचे गिरा देती है
ভীষ্মে ক’লে—যেনেকৈ নিভি যোৱা অগ্নিত ঢালি দিয়া ঘৃত ন দেৱতালৈ যায়, ন পিতৃলোকলৈ; তেনেকৈ নৃত্য-গীতৰ উদ্দেশ্যে দিয়া দান আৰু অসত্যবাদীয়ে গ্ৰহণ কৰা দক্ষিণা নিষ্ফল হয়। এনে দান দাতাক তৃপ্ত নকৰে, গ্ৰহীতাৰো সত্য কল্যাণ নকৰে; বৰঞ্চ উভয়ৰেই অনিষ্ট সাধে। তদুপৰি, সেই নিন্দিত, বিনাশকাৰী দক্ষিণাই দাতাৰ পিতৃপুরুষসকলকো দেবযান-পথৰ পৰা পতিত কৰিব পাৰে।
Verse 48
उभौ हिनस्ति न भुनक्ति चैषा या चानृते दक्षिणा दीयते वै । आधघातिनी गर्लहितैषा पतन्ती तेषां प्रेतान्ू पातयेद् देवयानात्,जैसे आग बुझ जानेपर जो घृतका हवन किया जाता है, उसे न देवता पाते हैं, न पितर; उसी प्रकार नाचनेवाले, गवैये और झूठ बोलनेवाले अपात्र ब्राह्मणको दिया हुआ दान निष्फल होता है। अपात्र पुरुषको दी हुई दक्षिणा न दाताको तृप्त करती है न दान लेनेवालेको; प्रत्युत दोनोंका ही नाश करती है। यही नहीं, वह विनाशकारिणी निन्दित दक्षिणा दाताके पितरोंको देवयान-मार्गसे नीचे गिरा देती है
ভীষ্মে ক’লে—অসত্যৰ দ্বাৰা যি দক্ষিণা দিয়া হয়, সি উভয়কেই হানি কৰে; দাতা তাৰ ফল ভোগ নকৰে, গ্ৰহীতাও তাক শুভৰূপে ভোগ কৰিব নোৱাৰে। সেই গৰ্হিত দক্ষিণা ঘাতক হৈ পাপত পতিত হয় আৰু দাতাৰ প্ৰেত-পিতৃসকলকো দেবযান-পথৰ পৰা পতিত কৰে।
Verse 49
ऋषीणां समये नित्यं ये चरन्ति युधिष्ठिर । निश्चिता: सर्वधर्मज्ञास्तान् देवा ब्राह्मणान् विदु:,युधिष्ठि!! जो सदा ऋषियोंके बताये हुए धर्ममार्गपर चलते हैं, जिनकी बुद्धि एक निश्चयपर पहुँची हुई है तथा जो सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता हैं, उन््हींको देवतालोग ब्राह्मण मानते हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ! যিসকলে ঋষিসকলে স্থাপন কৰা নিয়ম-মৰ্যাদা অনুসৰি সদায় চলে, যিসকলৰ বুদ্ধি স্থিৰ আৰু নিশ্চিত, আৰু যিসকলে ধৰ্মৰ সমগ্ৰ জ্ঞান ৰাখে—দেৱতাসকলেও তেওঁলোককেই সত্য ব্রাহ্মণ বুলি জানে।
Verse 50
स्वाध्यायनिष्ठा ऋषयो ज्ञाननिष्ठास्तथैव च | तपोनिष्छाश्ष बोद्धव्या: कर्मनिष्ठाश्न भारत,भारत! ऋषि-मुनियोंमें किन्हींको स्वाध्यायनिष्ठ, किन्हींको ज्ञाननिष्ठ, किन्हींको तपोनिष्ठ और किन्हींको कर्मनिष्ठ जानना चाहिये
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! ঋষিসকলৰ মাজত কিছুমান স্বাধ্যায়-নিষ্ঠ, কিছুমান জ্ঞান-নিষ্ঠ; কিছুমান তপ-নিষ্ঠ আৰু কিছুমান কৰ্ম-নিষ্ঠ—এনে বুজিব লাগে।
Verse 51
कव्यानि ज्ञाननिछेभ्य: प्रतिष्ठाप्पानि भारत । तत्र ये ब्राह्मणान् केचिन्न निन्दन्ति हि ते नरा:,भरतनन्दन! उनमें ज्ञाननिष्ठ महर्षियोंको ही श्राद्धका अन्न जिमाना चाहिये। जो लोग ब्राह्मणोंकी निन््दा नहीं करते, वे ही श्रेष्ठ मनुष्य हैं
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! শ্ৰাদ্ধৰ কব্য (পিতৃনিমিত্ত নিবেদন) জ্ঞান-নিষ্ঠ ব্রাহ্মণসকলৰ আগত বিধিপূৰ্বক স্থাপন কৰিব লাগে। আৰু যিসকলে ব্রাহ্মণসকলক নিন্দা নকৰে, তেওঁলোকেই মানুহৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ।
Verse 52
ये तु निन्दन्ति जल्पेषु न ताउ्छाद्धेषु भोजयेत् । ब्राह्मणा निन्दिता राजन हन्युस्त्रैपुरुषं कुलम्,राजन्! जो बातचीतमें ब्राह्मणोंकी निन््दा करते हैं, उन्हें श्राद्धमें भोजन नहीं कराना चाहिये। नरेश्वर! वानप्रस्थ ऋषियोंका यह वचन सुना जाता है कि “ब्राह्मणोंकी निन्दा होनेपर वे निन््दा करनेवालेकी तीन पीढ़ियोंका नाश कर डालते हैं।” वेदवेत्ता ब्राह्मणोंकी दूरसे ही परीक्षा करनी चाहिये
ভীষ্মে ক’লে—ৰাজন! যিসকলে কথাবতৰাত ব্ৰাহ্মণসকলক নিন্দা কৰে, তেওঁলোকক শ্ৰাদ্ধত ভোজন কৰাব নালাগে। নৰেশ্বৰ! বনবাসী ঋষিসকলৰ এই বচন শুনা যায় যে ব্ৰাহ্মণসকলৰ নিন্দা হ’লে তেওঁলোকে নিন্দাকাৰীৰ বংশৰ তিন পুৰুষলৈকে বিনাশ ঘটাব পাৰে।
Verse 53
वैखानसानां वचनमृषीणां श्रूयते नूप । दूरादेव परीक्षेत ब्राह्मणान् वेदपारगान्,राजन्! जो बातचीतमें ब्राह्मणोंकी निन््दा करते हैं, उन्हें श्राद्धमें भोजन नहीं कराना चाहिये। नरेश्वर! वानप्रस्थ ऋषियोंका यह वचन सुना जाता है कि “ब्राह्मणोंकी निन्दा होनेपर वे निन््दा करनेवालेकी तीन पीढ़ियोंका नाश कर डालते हैं।” वेदवेत्ता ब्राह्मणोंकी दूरसे ही परीक्षा करनी चाहिये
ভীষ্মে ক’লে—হে নৃপ! বৈখানস ঋষিসকলৰ এই বচন শুনা যায়—বেদপাৰঙ্গত ব্ৰাহ্মণসকলক দূৰৈৰ পৰাই পৰীক্ষা কৰা উচিত।
Verse 54
प्रियो वा यदि वा द्वेष्यस्तेषां तु श्राद्धमावपेत् । य: सहस्रं सहस्राणां भोजयेदनृतान् नर: । एकस्तान्मन्त्रवित् प्रीत: सर्वानहति भारत
ভীষ্মে ক’লে—তেওঁ প্ৰিয় হওক বা অপ্ৰিয়, তথাপি তেওঁলোকৰ নিমিত্তে শ্ৰাদ্ধ অৰ্পণ কৰা উচিত। কিন্তু যি মানুহে হাজাৰে হাজাৰে অপাত্ৰ লোকক ভোজন কৰায়, হে ভাৰত! সন্তুষ্ট এজন মন্ত্রবিদেই তেওঁলোক সকলোকে অতিক্ৰম কৰে।
Verse 90
भारत! वेदज्ञ पुरुष अपना प्रिय हो या अप्रिय--इसका विचार न करके उसे श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये। जो दस लाख अपात्र ब्राह्मगको भोजन कराता है, उसके यहाँ उन सबके बदले एक ही सदा संतुष्ट रहनेवाला वेदज्ञ ब्राह्मण भोजन करनेका अधिकारी है, अर्थात् लाखों मूर्खोकी अपेक्षा एक सत्पात्र ब्राह्मणको भोजन कराना उत्तम है ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे नवतितमो<ध्याय: ।। ९० || इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वनें श्राद्धक्ल्पविषयक नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! শ্ৰাদ্ধত ভোজন কৰাওঁতে বেদজ্ঞ পুৰুষজন প্ৰিয় নে অপ্ৰিয়—এই বিচাৰ নকৰি তেওঁক ভোজন কৰাব লাগে। যি দহ লক্ষ অপাত্ৰক ভোজন কৰায়, তেওঁৰ ঘৰত তেওঁলোক সকলোৰে সলনি সদা সন্তুষ্ট, বেদপাৰঙ্গত আৰু সৎপাত্ৰ এজন ব্ৰাহ্মণেই ভোজনৰ যোগ্য; অৰ্থাৎ অসংখ্য অযোগ্যতকৈ এজন যোগ্যক ভোজন কৰোৱাই শ্ৰেষ্ঠ।
Verse 123
पुरीषे तस्य ते मासं पितरस्तस्य शेरते । जो ब्राह्मण श्राद्धका भोजन करके फिर उस दिन वेद पढ़ता है तथा जो वृषली स्त्रीसे समागम करता है, उसके पितर उस दिनसे लेकर एक मासतक उसीकी विष्ठामें शयन करते हैं
ভীষ্মে ক’লে—যি ব্ৰাহ্মণে শ্ৰাদ্ধৰ অন্ন ভোজন কৰি সেই দিনাই পুনৰ বেদপাঠ কৰে, অথবা যি ‘বৃষলী’ স্থিতিৰ স্ত্ৰীৰ সৈতে সহবাস কৰে, তেওঁৰ পিতৃসকল সেই দিনৰ পৰা এক মাহলৈকে তেওঁৰেই বিষ্ঠাত শয়ন কৰে বুলি কোৱা হয়।
Verse 376
ब्रह्म॒देयानुसंतान इति ब्रह्मविदो विदु: । पंक्तिको पवित्र करनेके कारण ही उन्हें पंक्ति-पावन कहा जाता है। ब्रह्मवादी पुरुषोंकी यह मान्यता है कि वेदकी शिक्षा देनेवाले एवं ब्रह्मज्ञानी पुरुषोंके वंशमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण अकेला ही साढ़े तीन कोसतकका स्थान पवित्र कर सकता है
ব্ৰহ্মবিদসকলে এনে বংশধাৰাক ‘ব্ৰহ্মদেয়-অনুসন্তান’ বুলি জানে। ভোজন-পংক্তিক পবিত্ৰ কৰিব পৰা বাবে তেওঁলোক ‘পংক্তি-পাৱন’ নামে খ্যাত। ব্ৰহ্মবাদী মহর্ষিসকলৰ মতে—বেদ-শিক্ষক আৰু ব্ৰহ্মজ্ঞ পুৰুষসকলৰ বংশত জন্ম লোৱা এজন ব্ৰাহ্মণে কেৱল নিজৰ সন্নিধিমাত্ৰে সাড়ে তিন ক্ৰোশ পৰ্যন্ত অঞ্চল পবিত্ৰ কৰিব পাৰে।
Verse 396
न च स्यात् पतितो राजन् पंक्तिपावन एव सः | राजन! यदि कोई वेदज्ञ ब्राह्मण सब प्रकारके पंक्तिदोषोंसे रहित है और पतित नहीं हुआ है तो वह पंक्तिपावन ही है
হে ৰাজন, তেওঁক পতিত বুলি গণ্য কৰা উচিত নহয়; তেওঁ পংক্তি-পাৱনেই। যদি কোনো বেদজ্ঞ ব্ৰাহ্মণ সকলো ধৰণৰ পংক্তিদোষৰ পৰা মুক্ত থাকে আৰু পতিত নহয়, তেন্তে তেওঁক পংক্তি-পাৱন বুলিয়েই মানিব লাগে।
Verse 4163
न प्रीणन्ति पितृन् देवान् स्वर्ग च न स गच्छति । जिसके श्राद्धोंक भोजनमें मित्रोंकी प्रधानता रहती है, उसके वे श्राद्ध एवं हविष्य पितरों और देवताओंको तृप्त नहीं करते हैं तथा वह श्राद्धकर्ता पुरुष स्वर्गमें नहीं जाता है
যাৰ শ্রাদ্ধত ভোজন-ব্যৱস্থাত বন্ধুসমূহকেই প্ৰধান স্থান দিয়া হয়, তাৰ সেই শ্রাদ্ধ আৰু হৱিষ্য পিতৃসকল আৰু দেৱতাসকলক তৃপ্ত নকৰে; আৰু সেই শ্রাদ্ধকৰ্তা পুৰুষ স্বৰ্গলৈ নাযায়।
Tapas is presented as regulated, non-injurious discipline (niyama) integrated with truthfulness, purity, and generosity, rather than prolonged self-harming fasting treated as an end in itself.
A sadopavāsī does not eat between the morning and evening meals; a vighasāśī eats only what remains after honoring deities and ancestors and after feeding dependents and guests.
Yes; the chapter links hospitality-first consumption and disciplined restraint with superior posthumous attainments, describing expansive realms and honor in Brahmā’s abode accompanied by celestial beings.