Adhyaya 166
Anushasana ParvaAdhyaya 16648 Verses

Adhyaya 166

Chapter Arc: युधिष्ठिर श्रीकृष्ण से पूछते हैं—दुर्वासा के प्रसाद से जो अद्भुत प्रसंग घटा, उसमें भगवान शंकर का माहात्म्य, उनके नाम और उनका महान सौभाग्य क्या है; वे उसे विस्तार से जानना चाहते हैं। → वायुदेव (वक्ता-रूप में) कपर्दी रुद्र को नमस्कार कर उस दिव्य आख्यान का आरम्भ करते हैं: देवगण एक संकट में घिरते हैं, असुर-बल बढ़ता है, और देवताओं की सभा में रुद्र की शरणागति का भाव तीव्र होता जाता है; साथ ही देवताओं के भीतर अहं और ईर्ष्या की रेखाएँ भी उभरती हैं। → इन्द्र ईर्ष्यावश वज्र से प्रहार करना चाहते हैं, पर वह दिव्य बालक/ईश्वर-तत्त्व वज्र को स्तम्भित कर देता है; समस्त देवता और प्रजापति भी उस भुवनेश्वर को पहचान नहीं पाते और विस्मय में डूब जाते हैं—यहीं रुद्र की अचिन्त्य सत्ता का प्रत्यक्ष उद्घाटन होता है। → देवगण रुद्र की सर्वरूपता का स्तवन करते हैं—वह एक भी हैं, दो भी, अनेक भी; शत, सहस्र, शतसहस्र रूपों में व्याप्त हैं। अंततः देवता रुद्र से प्रार्थना करते हैं कि वे दैत्यों का संहार कर लोकों की रक्षा करें और धर्म-व्यवस्था को स्थिर करें। → देवताओं की याचना के बाद रुद्र की प्रत्युत्तर-क्रिया और दैत्यों के विनाश का अगला चरण आगे के प्रसंग की ओर संकेत करता है।

Shlokas

Verse 1

नफमशा+ (0) अमन न षष्टर्याधिकशततमो< ध्याय: श्रीकृष्णद्वारा भगवान्‌ शड्करके माहात्म्यका वर्णन युधिछिर उवाच दुर्वासस: प्रसादात्‌ ते यत्‌ तदा मधुसूदन । अवाप्तमिह विज्ञान तन्मे व्याख्यातुमरहसि,युधिष्ठिरने पूछा--मधुसूदन! उस समय दुर्वासाके प्रसादसे इहलोकमें आपको जो विज्ञान प्राप्त हुआ, उसे विस्तारपूर्वक मुझे बताइये

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— “হে মধুসূদন! সেই সময় দুৰ্ব্বাসাৰ প্ৰসাদত এই লোকতে তুমি যি বিশেষ জ্ঞান লাভ কৰিছিলা, সেয়া মোক বিস্তাৰে ব্যাখ্যা কৰি ক’বা।”

Verse 2

महाभाग्यं च यत्‌ तस्य नामानि च महात्मन: । तत्‌ त्वत्तो ज्ञातुमिच्छामि सर्व मतिमतां वर,बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्प! उन महात्माके महान्‌ सौभाग्यको और उनके नामोंको मैं यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ। वह सब विस्तारपूर्वक बताइये

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে— “বুদ্ধিমানসকলৰ মাজত শ্ৰেষ্ঠ শ্ৰীকৃষ্ণ! সেই মহাত্মাৰ মহাসৌভাগ্যৰ সত্য পৰিমাপ আৰু তেওঁৰ নামসমূহ মই যথাৰ্থভাৱে জানিব বিচাৰোঁ। সেই সকলো মোক বিস্তাৰে ক’বা।”

Verse 3

वायुदेव उवाच हन्त ते कीर्तयिष्यामि नमस्कृत्य कपर्दिने । यदवाप्तं मया राजन्‌ श्रेयो यच्चार्जितं यश:,भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--राजन्‌! मैं जटाजूटधारी भगवान्‌ शंकरको नमस्कार करके प्रसन्नतापूर्वक यह बता रहा हूँ कि मैंने कौन-सा श्रेय प्राप्त किया और किस यशका उपार्जन किया

বায়ুদেৱে ক’লে—হে ৰাজন! জটাধাৰী কপৰ্দিন (শিৱ)ক প্ৰণাম কৰি মই তোমাক ক’ম—মই কোন শ্ৰেয় লাভ কৰিলোঁ আৰু কোন যশ অৰ্জন কৰিলোঁ।

Verse 4

प्रयत: प्रातरुत्थाय यदधीये विशाम्पते । प्राज्जलि: शतरुद्रीयं तन्‍्मे निगदत: शृणु,प्रजानाथ! मैं प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए हाथ जोड़कर जिस शतरुद्रियका जप एवं पाठ करता हूँ, उसे बता रहा हूँ; सुनो

হে প্ৰজানাথ! মই প্ৰতিদিন পুৱাতে উঠি মন-ইন্দ্ৰিয় সংযত কৰি, হাত জোৰ কৰি যি শতৰুদ্ৰীয় জপ-পাঠ আৰু অধ্যয়ন কৰোঁ, সেয়া এতিয়া ক’ম; শুনা।

Verse 5

प्रजापतिस्तत्‌ ससृजे तपसो<न्ते महातपा: । शड्करस्त्वसृजत्‌ तात प्रजा: स्थावरजड़मा:,तात! महातपस्वी प्रजापतिने तपस्याके अन्तमें उस शतरुद्रियकी रचना की और शंकरजीने समस्त चराचर प्राणियोंकी सृष्टि की

তাত! মহাতপস্বী প্ৰজাপতিয়ে তপস্যাৰ অন্তত সেই (শতৰুদ্ৰীয়) ৰচনা কৰিলে; আৰু তাৰ পিছত শংকৰে স্থাৱৰ-জংগম সকলো প্ৰজাৰ সৃষ্টি কৰিলে।

Verse 6

नास्ति किंचित्‌ परं भूतं महादेवाद्‌ विशाम्पते । इह त्रिष्वपि लोकेषु भूतानां प्रभवो हि सः,प्रजानाथ! तीनों लोकोंमें महादेवजीसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ देवता नहीं है; क्योंकि वे समस्त भूतोंकी उत्पत्तिके कारण हैं

হে প্ৰজানাথ! এই ত্ৰিলোকত মহাদেৱতকৈ শ্ৰেষ্ঠ কোনো সত্তা নাই; কিয়নো সকলো ভূতৰ উদ্ভৱৰ মূল কাৰণ তেওঁৱেই।

Verse 7

न चैवोत्सहते स्थातु कश्रिदग्रे महात्मन: । न हि भूतं सम॑ तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते,उन महात्मा शंकरके सामने कोई भी खड़ा होनेका साहस नहीं कर सकता। तीनों लोकोंमें कोई भी प्राणी उनकी समता करनेवाला नहीं है

সেই মহাত্মা শংকৰৰ সন্মুখত থিয় হ’বলৈ কাৰো সাহস নহয়; ত্ৰিলোকত তেওঁৰ সমান কোনো সত্তা নাই।

Verse 8

गन्धेनापि हि संग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रव:ः । विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ते च पतन्ति च,संग्राममें जब वे कुपित होते हैं, उस समय उनकी गन्धसे भी सारे शत्रु अचेत और मृतप्राय होकर थर-थर काँपने एवं गिरने लगते हैं

ৰণক্ষেত্ৰত তেওঁ ক্ৰুদ্ধ হ’লে, তেওঁৰ গন্ধমাত্ৰতেই শত্রুসকল অচেতন হৈ পৰে; মৃতপ্ৰায় হৈ কঁপি কঁপি মাটিত লুটাই পৰে।

Verse 9

घोरं च निनदं तस्य पर्जन्यनिनदोपमम्‌ | श्रुत्वा विशीर्येद्‌ हृदयं देवानामपि संयुगे,संग्राममें मेघगर्जनाके समान गम्भीर उनका घोर सिंहनाद सुनकर देवताओंका भी हृदय विदीर्ण हो सकता है

মেঘগর্জনৰ দৰে গভীৰ সেই ভয়ংকৰ গর্জন যুদ্ধৰ মাজত শুনিলে, দেৱতাসকলৰো হৃদয় বিদীৰ্ণ হ’ব পাৰে।

Verse 10

यांश्व घोरेण रूपेण पश्येत्‌ क्रुद्ध/ पिनाकधृत्‌ | न सुरा नासुरा लोके न गन्धर्वा न पन्नगा:

ক্ৰুদ্ধ পিনাকধাৰী প্ৰভু যাক নিজৰ ঘোৰ ৰূপে চায়, সেই দৰ্শনৰ সন্মুখত জগতত কোনোয়ে থিয় হ’ব নোৱাৰে—না দেৱ, না অসুৰ, না গন্ধৰ্ব, না পন্নগ।

Verse 11

प्रजापति दक्ष जब यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनका यज्ञ आरम्भ होनेपर कुपित हुए भगवान्‌ शंकरने निर्भय होकर उनके यज्ञको अपने बाणोंसे बींध डाला और धनुषसे बाण छोड़कर गम्भीर स्वरमें सिंहनाद किया

প্ৰজাপতি দক্ষ যেতিয়া যজ্ঞ কৰি আছিল, সেই যজ্ঞৰ আৰম্ভণিতেই ক্ৰুদ্ধ ভগৱান শংকৰ নিৰ্ভয়ে থিয় হ’ল। তেওঁ নিজৰ বাণে যজ্ঞক বিদ্ধ কৰিলে; ধনুৰ পৰা শৰ নিক্ষেপ কৰি গম্ভীৰ স্বৰে সিংহনাদ কৰিলে।

Verse 12

विव्याध कुपितो यज्ञ निर्भयस्तु भवस्तदा । धनुषा बाणमुत्यज्य सघोषं विननाद च,प्रजापति दक्ष जब यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनका यज्ञ आरम्भ होनेपर कुपित हुए भगवान्‌ शंकरने निर्भय होकर उनके यज्ञको अपने बाणोंसे बींध डाला और धनुषसे बाण छोड़कर गम्भीर स्वरमें सिंहनाद किया

তেতিয়া ক্ৰুদ্ধ ভগৱান ভব (শংকৰ) নিৰ্ভয়ে যজ্ঞক বিদ্ধ কৰিলে; ধনুৰ পৰা বাণ এৰি তেওঁ ঘোষসহ গম্ভীৰ নিনাদ কৰিলে।

Verse 13

प्रजापतेश्व॒ दक्षस्य यजतो वितते क्रतौ,ते न शर्म कुतः शान्तिं विषादं लेभिरे सुरा: | विद्धे च सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे इससे देवता बेचैन हो गये, फिर उन्हें शान्ति कैसे मिले। जब यज्ञ सहसा बाणोंसे बिंध गया और महेश्वर कुपित हो गये तब बेचारे देवता विषादमें डूब गये

প্ৰজাপতি দক্ষৰ বিস্তৃত যজ্ঞত দেৱতাসকলে ন সুখ পালে, ন শান্তি—তেওঁলোক বিষাদত ডুব গ’ল। যজ্ঞ হঠাৎ বাণবিদ্ধ হ’ল আৰু মহেশ্বৰ ক্ৰুদ্ধ হোৱাত, অসহায় দেৱতাসকল ব্যাকুল হৈ শোকত নিমগ্ন হ’ল।

Verse 14

तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोका: समाकुला: । बभूवुरवशा: पार्थ विषेदुश्च सुरसुरा:,पार्थ! उनके धनुषकी प्रत्यंचाके शब्दसे समस्त लोक व्याकुल और विवश हो उठे और सभी देवता एवं असुर विषादमें मग्न हो गये

হে পাৰ্থ! তেওঁৰ ধনুৰ্জ্যাৰ সেই ঘোৰ ধ্বনিত সকলো লোক ব্যাকুল হৈ উঠিল। সকলোৱে অসহায় হৈ পৰিল, আৰু দেৱ-অসুৰ উভয়েই বিষাদত নিমগ্ন হ’ল।

Verse 15

आपक्षुक्षुभिरे चैव चकम्पे च वसुन्धरा । व्यद्रवन्‌ गिरयश्चापि द्यौ: पफाल च सर्वश:,समुद्र आदिका जल क्षुब्ध हो उठा, पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत पिघलने लगे और आकाश सब ओरसे फटने-सा लगा

সমুদ্ৰ আদি জলৰাশি ভয়ংকৰভাৱে ক্ষুব্ধ হৈ উঠিল; পৃথিৱী কঁপিবলৈ ধৰিলে; পৰ্বতসমূহো যেন গলি ইফালে-সিফালে দৌৰিবলৈ ধৰিলে; আৰু আকাশ সকলো দিশে ফাটি যোৱা যেন লাগিল।

Verse 16

अन्धेन तमसा लोका:ः प्रावृता न चकाशिरे । प्रणष्टा ज्योतिषां भाश्व सह सूर्येण भारत,समस्त लोक घोर अन्धकारसे आवृत होनेके कारण प्रकाशित नहीं होते थे। भारत! ग्रहों और नक्षत्रोंका प्रकाश सूर्यके साथ ही नष्ट (अदृश्य) हो गया

ঘোৰ অন্ধকাৰত সকলো লোক আচ্ছন্ন হ’ল; সেয়ে একোৱে দীপ্তি নাছিল। হে ভাৰত! সূৰ্যৰ সৈতে সৈতে গ্ৰহ-নক্ষত্ৰৰ জ্যোতিও লুপ্ত হৈ গ’ল।

Verse 17

भृशं भीतास्तत: शान्तिं चक्रुः स्वस्त्ययनानि च । ऋषय: सर्वभूतानामात्मनश्न हितैषिण:,सम्पूर्ण भूतोंका और अपना भी हित चाहनेवाले ऋषि अत्यन्त भयभीत हो शान्ति एवं स्वस्तिवाचन आदि कर्म करने लगे

তেতিয়া অত্যন্ত ভীত হৈ, সকলো জীৱৰ লগতে নিজৰো মঙ্গল কামনা কৰা ঋষিসকলে শান্তিকৰ্ম কৰিলে আৰু স্বস্তিবাচন আদি মঙ্গলানুষ্ঠান আৰম্ভ কৰিলে।

Verse 18

ततः सो<भ्यद्रवद्‌ देवान्‌ रुद्रो रौद्रपराक्रम: । भगस्य नयने क्रुद्धः प्रहारेण व्यशातयत्‌,तदनन्तर भयानक पराक्रमी रुद्र देवताओंकी ओर दौड़े। उन्होंने क्रोधपूर्वक प्रहार करके भगदेवताके नेत्र नष्ट कर दिये

তাৰ পিছত ভয়ংকৰ পৰাক্ৰমী ৰুদ্ৰ দেৱতাসকলৰ ফালে ধাৱিত হ’ল। ক্ৰোধত তেওঁ এক প্ৰহাৰে ভগদেৱৰ দুটা চকু নষ্ট কৰি দিলে।

Verse 19

पूषणं चाभिदुद्राव पादेन च रुषान्वित: । पुरोडाशं भक्षयतो दशनान्‌ वै व्यशातयत्‌,फिर उन्होंने रोषमें भरकर पैदल ही पूषादेवताका पीछा किया और पुरोडाश भक्षण करनेवाले उनके दाँतोंको तोड़ डाला

তাৰ পিছত ৰোষে ভৰি তেওঁ পায়ে হেঁটেই পূষাদেৱৰ পিছু ল’লে আৰু পুরোডাশ ভক্ষণ কৰি থকা অৱস্থাত তেওঁৰ দাঁত ভাঙি পেলালে।

Verse 20

ततः प्रणेमुर्देवास्ते वेपमाना: सम शड्करम्‌ | पुनश्च संदधे रुद्रो दीप्तं सुनिशितं शरम्‌,तब सब देवता काँपते हुए वहाँ भगवान्‌ शंकरको प्रणाम करने लगे। इधर रुद्रदेवने पुनः एक प्रज्वलित एवं तीखे बाणका संधान किया

তেতিয়া সেই সকলো দেৱতা কঁপি কঁপি ভগৱান শংকৰক প্ৰণাম কৰিবলৈ ধৰিলে। ইফালে ৰুদ্ৰে পুনৰ এক জ্বলন্ত আৰু অতি তীক্ষ্ণ শৰ ধনুত সংযোজিত কৰিলে।

Verse 21

रुद्रस्य विक्रमं दृष्टवा भीता देवा: सहर्षिभि: । ततः प्रसादयामासु: शर्व ते विबुधोत्तमा:,रुद्रका पराक्रम देखकर ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता थर्या उठे। फिर उन श्रेष्ठ देवताओंने भगवान्‌ शिवको प्रसन्न किया

ৰুদ্ৰৰ পৰাক্ৰম দেখি ঋষিসকলৰ সৈতে দেৱতাসকল ভীত হৈ উঠিল। তেতিয়া সেই শ্ৰেষ্ঠ দেৱসকলে শৰ্ব (শিৱ)-ক প্ৰসন্ন কৰিবলৈ চেষ্টা কৰিলে।

Verse 22

जेपुश्न शतरुद्रीयं देवा: कृत्वाउ्जलिं तदा । संस्तूयमानस्त्रिदशै: प्रससाद महेश्वर:,उस समय देवतालोग हाथ जोड़कर शतरुद्रियका जप करने लगे। देवताओं के द्वारा अपनी स्तुति की जानेपर महेश्वर प्रसन्न हो गये

সেই সময় দেৱতাসকলে অঞ্জলি বদ্ধ কৰি শতৰুদ্ৰীয় জপ কৰিবলৈ ধৰিলে। ত্ৰিদশসকলৰ স্তৱত মহেশ্বৰ প্ৰসন্ন হ’ল।

Verse 23

रुद्रस्य भागं यज्ञे च विशिष्ट ते त्वकल्पयन्‌ | भयेन त्रिदशा राजन्‌ शरणं च प्रपेदिरे,राजन! देवतालोग भयके मारे भगवान्‌ शंकरकी शरणमें गये। उन्होंने यज्ञमें रुद्रके लिये विशिष्ट भागकी कल्पना की (यज्ञावशिष्ट सारी सामग्री रुद्रके अधिकारमें दे दी)

বায়ুৱে ক’লে—হে ৰাজন, ভয়ত দেবতাসকলে শংকৰ ৰুদ্ৰৰ শৰণ ল’লে। তাৰপিছত যজ্ঞত ৰুদ্ৰৰ বাবে এক বিশেষ আৰু শ্ৰেষ্ঠ ভাগ নিৰ্ধাৰণ কৰি, যজ্ঞাৱশিষ্ট সকলো দ্ৰব্য ৰুদ্ৰৰ অধিকাৰত অৰ্পণ কৰিলে।

Verse 24

तेन चैव हि तुष्टेन स यज्ञ: संधितो5भवत्‌ । यद्‌ यच्चापद्वतं तत्र तत्तथैवान्वजीवयत्‌,भगवान्‌ शंकरके संतुष्ट होनेपर वह यज्ञ पुनः पूर्ण हुआ। उसमें जिस-जिस वस्तुको नष्ट किया गया था, उन सबको उन्होंने पुन: पूर्ववत्‌ जीवित कर दिया

শংকৰ সন্তুষ্ট হোৱাতেই সেই যজ্ঞ পুনৰ সংস্থাপিত হৈ সম্পূৰ্ণ হ’ল। তাত যি-যি নষ্ট হৈছিল, সেয়া সকলো তেওঁ যথাপূৰ্ব পুনৰ জীৱিত কৰি তুলিলে।

Verse 25

असुराणां पुराण्यासंस्त्रीणि वीर्यवर्तां दिवि । आयसं राजतं चैव सौवर्णमपि चापरम्‌,पूर्वकालमें बलवान्‌ असुरोंके तीन पुर (विमान) थे; जो आकाशमें विचरते रहते थे। उनमेंसे एक लोहेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा सोनेका बना हुआ था

বায়ুৱে ক’লে—প্ৰাচীন কালত পৰাক্ৰমী অসুৰসকলৰ আকাশত বিচৰণ কৰা তিনিটা পুৰ আছিল—এটা লোহাৰ, এটা ৰূপাৰ, আৰু আনটো সোণাৰ।

Verse 26

नाशकत्‌ तानि मघवा जेतु सर्वायुधैरपि । अथ सर्वेडमरा रुद्रं जग्मु: शरणमर्दिता:,इन्द्र अपने सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करके भी उन पुरोंपर विजय न पा सके। तब पीड़ित हुए समस्त देवता रुद्रदेवकी शरणमें गये

মঘৱা (ইন্দ্ৰ) নিজৰ সকলো অস্ত্ৰ-শস্ত্ৰ প্ৰয়োগ কৰিও সেই পুৰসমূহ জয় কৰিব নোৱাৰিলে। তেতিয়া পীড়িত আৰু ব্যাকুল হৈ সকলো দেৱতা ৰুদ্ৰদেৱৰ শৰণলৈ গ’ল।

Verse 27

तत ऊचुर्महात्मानो देवा: सर्वे समागता: । रुद्र रौद्रा भविष्यन्ति पशव: सर्वकर्मसु

তেতিয়া একেলগে সমবেত হোৱা মহাত্মা দেৱসকলে ক’লে—“হে ৰুদ্ৰ! সকলো কৰ্ম আৰু যজ্ঞবিধিত পশুবোৰ উগ্ৰ হৈ নিয়ন্ত্ৰণহীন হ’ব।”

Verse 28

स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा कृत्वा विष्णुं शरोत्तमम्‌,उनके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ शिवने “तथास्तु” कहकर उनकी बात मान ली और भगवान्‌ विष्णुको उत्तम बाण, अग्निको उस बाणका शल्य, वैवस्वत यमको पंख, समस्त वेदोंको धनुष, गायत्रीको उत्तम प्रत्यंचा और ब्रह्माको सारथि बनाकर सबको यथावत्‌ रूपसे अपने-अपने कार्योंमें नियुक्त करके तीन पर्व और तीन शल्यवाले उस बाणके द्वारा उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला

তেওঁলোকৰ কথা শুনি ভগৱান শিৱে “তথাস্তु” বুলি সন্মতি দিলে। তেওঁ বিষ্ণুক শ্ৰেষ্ঠ বাণ কৰিলে, অগ্নিক সেই বাণৰ শল্য, বৈৱস্বত যমক তাৰ পাখা, সমগ্ৰ বেদক ধনু, গায়ত্ৰীক উত্তম প্ৰত্যঞ্চা আৰু ব্ৰহ্মাক সাৰথি নিযুক্ত কৰিলে। সকলোকে নিজ নিজ কৰ্মত যথাযথভাৱে নিয়োগ কৰি, তিন পৰ্ব আৰু তিন শল্যযুক্ত সেই বাণেৰে তেওঁ তিনিওটা পুৰ বিদীৰ্ণ কৰি ধ্বংস কৰিলে।

Verse 29

शल्यमरग्निं तथा कृत्वा पुड्खं वैवस्वतं यमम्‌ । वेदान्‌ कृत्वा धनु: सर्वान्‌ ज्यां च सावित्रिमुत्तमाम्‌,उनके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ शिवने “तथास्तु” कहकर उनकी बात मान ली और भगवान्‌ विष्णुको उत्तम बाण, अग्निको उस बाणका शल्य, वैवस्वत यमको पंख, समस्त वेदोंको धनुष, गायत्रीको उत्तम प्रत्यंचा और ब्रह्माको सारथि बनाकर सबको यथावत्‌ रूपसे अपने-अपने कार्योंमें नियुक्त करके तीन पर्व और तीन शल्यवाले उस बाणके द्वारा उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला

তেওঁ অগ্নিক বাণৰ শল্য কৰিলে আৰু বৈৱস্বত যমক তাৰ পাখা; সমগ্ৰ বেদক ধনু আৰু পৰম সাৱিত্ৰী (গায়ত্ৰী)ক উত্তম প্ৰত্যঞ্চা কৰিলে।

Verse 30

ब्रहद्माणं सारथिं कृत्वा विनियुज्य च सर्वश:ः । त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तेन तानि बिभेद सः,उनके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ शिवने “तथास्तु” कहकर उनकी बात मान ली और भगवान्‌ विष्णुको उत्तम बाण, अग्निको उस बाणका शल्य, वैवस्वत यमको पंख, समस्त वेदोंको धनुष, गायत्रीको उत्तम प्रत्यंचा और ब्रह्माको सारथि बनाकर सबको यथावत्‌ रूपसे अपने-अपने कार्योंमें नियुक्त करके तीन पर्व और तीन शल्यवाले उस बाणके द्वारा उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला

ব্ৰহ্মাক সাৰথি কৰি আৰু সকলোকে সম্পূৰ্ণৰূপে যথোচিত কৰ্মত নিয়োগ কৰি, তিন পৰ্ব আৰু তিন শল্যযুক্ত সেই বাণেৰে তেওঁ সেই (তিন) পুৰ বিদীৰ্ণ কৰিলে।

Verse 31

शरेणादित्यवर्णेन कालाग्निसमतेजसा । तेडसुरा: सपुरास्तत्र दग्धा रुद्रेण भारत,भारत! वह बाण सूर्यके समान कान्तिमान्‌ और प्रलयाग्निके समान तेजस्वी था। उसके द्वारा रुद्रदेवने उन तीनों पुरोंसहित वहाँके समस्त असुरोंको जलाकर भस्म कर दिया

হে ভাৰত! সেই বাণ সূৰ্যৰ দৰে দীপ্তিমান আৰু প্ৰলয়াগ্নিৰ দৰে তেজস্বী আছিল। ৰুদ্ৰদেৱে সেই বাণেৰে তাত থকা অসুৰসকলক তেওঁলোকৰ পুৰসহ দগ্ধ কৰি ভস্ম কৰিলে।

Verse 32

तं चैवाड्कगतं दृष्टवा बालं पजचशिखं पुन: । उमा जिज्ञासमाना वै को<यमित्यब्रवीत्‌ तदा,फिर वे पाँच शिखावाले बालकके रूपमें प्रकट हुए और उमादेवी उन्हें अंकमें लेकर देवताओंसे पूछने लगीं--“पहचानो, ये कौन हैं?”

পুনৰায় তেওঁক পাঁচ শিখাযুক্ত বালকৰ ৰূপত নিজৰ কোলাত বহি থকা দেখি, সত্য জানিবলৈ আগ্ৰহী উমাই সেই সময়ত দেৱতাসকলক সুধিলে—“এয়া কোন?”

Verse 33

असूयतश्च शक्रस्य वज्ेण प्रहरिष्यत: । स वज्ं स्तम्भयामास त॑ बाहुं परिघोपमम्‌,उस समय इन्द्रको बड़ी ईर्ष्या हुई। वे वज़से उस बालकपर प्रहार करना ही चाहते थे कि उसने परिघके समान मोटी उनकी उस बाँहको वज्रसहित स्तम्भित कर दिया

শক্ৰ (ইন্দ্ৰ) ঈৰ্ষ্যাৰে আচ্ছন্ন হৈ যেতিয়া বজ্ৰেৰে প্ৰহাৰ কৰিবলৈ উদ্যত হৈছিল, তেতিয়া সেই বালকে বজ্ৰধাৰী তেওঁৰ গদাসদৃশ স্থূল আৰু ভয়ংকৰ সেই বাহুটিকেই স্তম্ভিত কৰি দিলে।

Verse 34

न सम्बुबुधिरे चैव देवास्तं भुवनेश्वरम्‌ । सप्रजापतय: सर्वे तस्मिन्‌ मुमुहुरी श्चरे,समस्त देवता और प्रजापति उन भुवनेश्वर महादेवजीको न पहचान सके। सबको उन ईश्वरके विषयमें मोह छा गया

দেৱতাসকলেও সেই ভুবনেশ্বৰক চিনিব নোৱাৰিলে; প্ৰজাপতিসকলসহ সকলোৱে তেওঁৰ বিষয়ে মোহত পৰি বিভ্ৰান্ত হ’ল।

Verse 35

ततो ध्यात्वा च भगवान्‌ ब्रह्मा तममितौजसम्‌ | अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तमुमापतिम्‌,तब भगवान्‌ ब्रह्माने ध्यान करके उन अमित-तेजस्वी उमापतिको पहचान लिया और 'ये ही सबसे श्रेष्ठ देवता हैं' ऐसा जानकर उन्होंने उनकी वन्दना की

তাৰ পাছত ভগবান ব্ৰহ্মাই ধ্যান কৰি সেই অমিত তেজস্বী উমাপতিক চিনিলে; ‘ইয়েই শ্ৰেষ্ঠ’ বুলি জানি তেওঁ তাঁক প্ৰণাম কৰিলে।

Verse 36

ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुरा: । बभूव स तदा बाहुर्बलहन्तुर्यथा पुरा,तत्पश्चात्‌ उन देवताओंने उमादेवी और भगवान्‌ रुद्रको प्रसन्न किया। तब इन्द्रकी वह बाँह पूर्ववत्‌ हो गयी

তাৰ পাছত সেই সুৰসকলে উমা আৰু ৰুদ্ৰক প্ৰসন্ন কৰিলে; তেতিয়া ইন্দ্ৰৰ সেই বাহু পূৰ্বৰ দৰে হৈ উঠিল।

Verse 37

स चापि ब्राह्माणो भूत्वा दुर्वासा नाम वीर्यवान्‌ द्वारवत्यां मम गृहे चिरं कालमुपावसत्‌,वे ही पराक्रमी महादेव दुर्वासा नामक ब्राह्मण बनकर द्वारकापुरीमें मेरे घरके भीतर दीर्घकालतक टिके रहे

আৰু সেই বীৰ্যৱান মহাদেৱে দুৰ্বাসা নাম লৈ ব্ৰাহ্মণৰ ৰূপ ধৰি দ্বাৰাৱতীত মোৰ ঘৰত দীঘলীয়া সময় ধৰি বাস কৰিলে।

Verse 38

विप्रकारान्‌ प्रयुद्धक्ते सम सुबहून्‌ मम वेश्मनि । तानुदारतया चाहं चक्षमे चातिदुःसहान्‌,उन्होंने मेरे महलमें मेरे विरुद्ध बहुत-से अपराध किये। वे सभी अत्यन्त दुःसह थे तो भी मैंने उदारतापूर्वक क्षमा किया

বায়ুৱে ক’লে— মোৰ নিজৰ গৃহতেই বহু ব্ৰাহ্মণে মোৰ বিৰুদ্ধে অপৰাধ কৰিছিল আৰু বৈৰভাৱে আচৰণো কৰিছিল। তেওঁলোকৰ কৰ্ম অতি দুৰসহ আছিল; তথাপি মই উদাৰচিত্তে সহি তেওঁলোকক ক্ষমা কৰিছিলোঁ।

Verse 39

स वै रुद्र: स च शिव: सो<ग्नि: सर्व: स सर्वजित्‌ | स चैवेन्द्रश्न वायुश्न सोडश्चिनौ स च विद्युत:,वे ही रुद्र हैं, वे ही शिव हैं, वे ही अग्नि हैं, वे ही सर्वस्वरूप और सर्वविजयी हैं। वे ही इन्द्र और वायु हैं, वे ही अश्विनीकुमार और विद्युत्‌ हैं

বায়ুৱে ক’লে— তেওঁৱেই ৰুদ্ৰ, তেওঁৱেই শিৱ; তেওঁৱেই অগ্নি, তেওঁৱেই সৰ্বৰূপ আৰু সৰ্বজয়ী। তেওঁৱেই ইন্দ্ৰ, তেওঁৱেই বায়ু; তেওঁৱেই অশ্বিনীদ্বয়, তেওঁৱেই বিদ্যুৎও।

Verse 40

स चन्द्रमा: स चेशान: स सूर्यो वरुणश्न सः । स काल: सोडन्‍्तको मृत्यु: स यमो रात्र्यहानि च,वे ही चन्द्रमा, वे ही ईशान, वे ही सूर्य, वे ही वरुण, वे ही काल, वे ही अन्तक, वे ही मृत्यु, वे ही यम तथा वे ही रात और दिन हैं

বায়ুৱে ক’লে— তেওঁৱেই চন্দ্ৰ, তেওঁৱেই ঈশান; তেওঁৱেই সূৰ্য, তেওঁৱেই বৰুণ। তেওঁৱেই কাল, তেওঁৱেই অন্তক, তেওঁৱেই মৃত্যু; তেওঁৱেই যম, আৰু তেওঁৱেই ৰাতি-দিন।

Verse 41

मासार्धमासा ऋतव: संध्ये संवत्सरश्न सः । स धाता स विधाता च विश्वकर्मा स सर्ववित्‌,मास, पक्ष, ऋतु, संध्या और संवत्सर भी वे ही हैं। वे ही धाता, विधाता, विश्वकर्मा और सर्वज्ञ हैं

বায়ুৱে ক’লে— মাস, পক্ষ, ঋতু, সন্ধিক্ষণ আৰু সংবৎসৰ— এই সকলো তেওঁৱেই। তেওঁৱেই ধাতা, তেওঁৱেই বিধাতা; তেওঁৱেই বিশ্বকর্মা, তেওঁৱেই সৰ্বজ্ঞ।

Verse 42

नक्षत्राणि गृहाश्वैव दिशो5थ प्रदिशस्तथा । विश्वमूर्तिरमेयात्मा भगवान्‌ परमद्युति:,नक्षत्र, गृह, दिशा, विदिशा भी वे ही हैं। वे ही विश्वरूप, अप्रमेयात्मा, षड़्विध ऐश्वर्यसे युक्त एवं परम तेजस्वी हैं

বায়ুৱে ক’লে— নক্ষত্ৰ আৰু গ্ৰহসমূহো তেওঁৱেই; দিশ আৰু বিদিশো তেওঁৱেই। তেওঁ ভগৱান— বিশ্বমূৰ্তি, অপ্ৰমেয় আত্মা, আৰু পৰম তেজস্বী।

Verse 43

एकधा च द्विधा चैव बहुधा च स एव हि । शतधा सहस्रधा चैव तथा शतसहस्रधा,उनके एक, दो, अनेक, सौ, हजार और लाखों रूप हैं

বায়ুৱে ক’লে—সেই একেই প্ৰভু এক ৰূপত, দুই ৰূপত আৰু বহু ৰূপত প্ৰকাশ পায়; তেনেদৰে শত ৰূপত, সহস্ৰ ৰূপত আৰু লক্ষ ৰূপতো।

Verse 44

ईदृश: स महादेवो भूयश्वष भगवानत: । न हि शक्‍्या गुणा वक्तुमपि वर्षशतैरपि,भगवान्‌ महादेव ऐसे प्रभावशाली हैं, बल्कि इससे भी बढ़कर हैं। सैकड़ों वर्षोमें भी उनके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता

বায়ুৱে ক’লে—এনেকুৱাই সেই মহাদেৱ; বৰং ইয়াতকৈও অধিক মহান। শত শত বছৰ ক’লেও তেওঁৰ গুণ সম্পূৰ্ণকৈ বৰ্ণনা কৰিব নোৱাৰি।

Verse 103

कुपिते सुखमेधन्ते तस्मिन्नपि गुहागता: । पिनाकधारी रुद्र कुपित होकर जिन्हें भयंकररूपसे देख लें, उनके भी हृदयके टुकड़े- टुकड़े हो जायँ। संसारमें भगवान्‌ शंकरके कुपित हो जानेपर देवता, असुर, गन्धर्व और नाग यदि भागकर गुफामें छिप जायूँ तो भी सुखसे नहीं रह सकते

পিনাকধাৰী ৰুদ্ৰ ক্ৰুদ্ধ হ’লে, যাৰ ওপৰত তেওঁৰ ভয়ংকৰ দৃষ্টি পৰে, তাৰ হৃদয়ো চূৰ্ণ-বিচূৰ্ণ হৈ যায়। জগতত ভগৱান শংকৰ কুপিত হ’লে দেৱতা, অসুৰ, গন্ধৰ্ব আৰু নাগ দৌৰি গুহাত লুকালেও সুখে থাকিব নোৱাৰে।

Verse 159

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें दुवासाकी भिक्षा नामक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত “দুৰ্বাসাৰ ভিক্ষা” নামৰ একশ ঊনষাটতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।

Verse 160

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ईश्वरप्रशंसा नाम षष्ट्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपववके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ईश्चषरकी प्रशंसा नामक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত “ঈশ্বৰ-প্ৰশংসা” নামৰ একশ ষাঠিতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।

Verse 276

जहि दैत्यान्‌ सह पुरैलोंकांस्त्रायस्व मानद | तदनन्तर वहाँ पधारे हुए सम्पूर्ण महामना देवताओंने रुद्रदेवसे कहा--“भगवन्‌ रुद्र! पशुतुल्य असुर हमारे समस्त कर्मोंके लिये भयंकर हो गये हैं और भविष्यमें भी ये हमें भय देते रहेंगे। अत: मानद! हमारी प्रार्थना है कि आप तीनों पुरोंसहित समस्त दैत्योंका नाश और लोकोंकी रक्षा करें"

বায়ুৱে ক’লে— “মানদ! দৈত্যসকলক তেওঁলোকৰ পুৰসমেত সংহাৰ কৰা; লোকসমূহক ৰক্ষা কৰা।” তাৰ পাছত তাত উপস্থিত সকলো মহামনা দেৱতাই ৰুদ্ৰদেৱক ক’লে— “ভগৱান ৰুদ্ৰ! পশুতুল্য অসুৰসকল আমাৰ সকলো ধৰ্মকৰ্মৰ বাবে ভয়ংকৰ হৈ উঠিছে, আৰু ভৱিষ্যতেও আমাক ভয় দেখুৱাই থাকিব। সেয়ে, মানদ! আমাৰ প্ৰাৰ্থনা— তিনিওটা পুৰসহ সকলো দৈত্যক বিনাশ কৰি লোকসমূহক ৰক্ষা কৰক।”