
Bhīṣma’s Yogic Departure, Royal Cremation, and Gaṅgā’s Lament (भीष्मस्य योगयुक्त्या देहत्यागः, पितृमेधः, गङ्गाविलापः)
Upa-parva: Bhīṣma-svargārohaṇa (Bhīṣma’s ascent and funerary rites episode)
Vaiśaṃpāyana reports that after addressing the Kurus, Bhīṣma Śāṃtanava becomes silent and enters progressive dhāraṇā, restraining the prāṇas. Observers witness a marked transformation: as he releases the embedded shafts from his body, each wound becomes viśalya (free of pain/affliction), signaling yogic control over bodily conditions. His self, fully restrained across the sense-bases, exits by cleaving through the crown of the head and rises to the heavens like a great meteor, disappearing into the sky. The Pāṇḍavas, Vidura, and Yuyutsu organize the cremation: they gather woods and fragrances, prepare the pyre, adorn Bhīṣma with cloth and garlands, and perform royal honors (umbrella, fans, attendants). Priests conduct pitṛmedha with fire-offerings while Sāmagas chant Sāmans; fragrant woods (including sandal and other aromatics) are used. After cremation, the assembly proceeds to the Bhāgīrathī for udaka offerings. Gaṅgā emerges grieving, recounting Bhīṣma’s virtues, filial steadfastness, and unmatched martial prowess, expressing astonishment at his fall by Śikhaṇḍin’s instrumentality. Kṛṣṇa consoles her with a doctrinal reading: Bhīṣma attained the highest siddhi by choice, is essentially a Vasu under a curse-born human condition, and his end aligns with kṣatra-dharma; thus grief should subside. Pacified by Kṛṣṇa and Vyāsa, Gaṅgā returns to her waters, and the kings, honored and permitted, depart.
Chapter Arc: नारद के वचन से दृश्य देवगिरि पर खुलता है—वर्षाकाल-सा घनघोर अन्धकार, मेघों की निर्मल वर्षा, दिशाएँ बुझी-बुझी; और उसी रहस्यमय वातावरण में ऋषियों की दृष्टि किसी अलौकिक प्रसंग की ओर खिंचती है। → ऋषि-समूह देवगिरि पर जो देखते हैं, वह साधारण नहीं—वे ‘कारण’ पूछते हैं: प्रभो, यह मानव-देह में जन्म, यह अवतार-लीला, और इसके पीछे का रहस्य क्या है? अपनी अल्पबुद्धि, परतन्त्रता और मृत्यु-मार्ग की व्याकुलता स्वीकार कर वे ज्ञानपूर्वक शरणागति करते हैं और कृष्ण से बुद्धि-पुष्टि की याचना करते हैं। → महापुरुष-प्रस्ताव में भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा का उत्कर्ष—मानव-रूप में प्रकट होकर भी सर्वज्ञ, दिवि-भुवि में सर्वविदित; और उसी आलोक में भीष्म का युधिष्ठिर को राज्य-धर्म के लिए दृढ़ आदेश: दान, नीति और शासन का भार अब तुम्हें धर्मपूर्वक उठाना है। → कृष्ण-स्तुति और शरणागति के बाद प्रसंग ‘पुराण-रहस्य’ की ओर स्थिर होता है—शंकर द्वारा हिमालय-शिखर पर मुनियों को कहे गए प्राचीन उपदेश का संकेत देकर कथा-धारा को धर्म-ज्ञान की परम्परा में बाँधा जाता है; उधर युधिष्ठिर, विश्रान्त भीष्म से पुनः प्रश्न कर शासन-धर्म को सुनने हेतु प्रस्तुत होते हैं। → वृषभध्वज शंकर द्वारा हिमवत्पृष्ठ पर मुनियों को कहे गए ‘पुराण’ का रहस्य अब विस्तार से कहा जाएगा—उस उपदेश में महापुरुष-तत्त्व और दान-धर्म का कौन-सा निर्णायक सूत्र छिपा है?
Verse 1
अफ--रू+ >> अष्टचत्वारिशंर्दाधिकशततमो< ध्याय: भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन और भीष्मजीका युधिष्ठिरको राज्य करनेके लिये आदेश देना नारद उवाच अथ व्योम्नि महान् शब्द: सविद्युत्स्तनयित्नुमान् मेघैश्व गगनं नील॑ संरुद्धमभवद् घनै:,नारदजी कहते हैं--तदननन््तर आकाशमें बिजलीकी गड़गड़ाहट और मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके साथ महान् शब्द होने लगा। मेघोंकी घनघोर घटासे घिरकर सारा आकाश नीला हो गया
নাৰদে ক’লে—তাৰ পাছত আকাশত বিদ্যুৎসহ আৰু গম্ভীৰ মেঘগর্জনাসহ এক মহাশব্দ উঠিল। ঘন মেঘপুঞ্জে আচ্ছন্ন হৈ সমগ্ৰ গগন নীলাভ হৈ ঢাক খাই গ’ল।
Verse 2
प्रावषीव च पर्जन्यो ववृषे निर्मल पय: । तमश्वैवाभवद् घोरं दिशश्व॒ न चकाशिरे,वर्षाकालकी भाँति मेघसमूह निर्मल जलकी वर्षा करने लगा। सब ओर घोर अन्धकार छा गया। दिशाएँ नहीं सूझती थीं
নাৰদে ক’লে—বৰ্ষাকালৰ দৰে মেঘে নিৰ্মল জল বৰষিলে; কিন্তু চাৰিওফালে ভয়ংকৰ অন্ধকাৰ নামিল, দিশাবোৰো দীপ্ত নহ’ল—দিশ চিনিব নোৱাৰিলে।
Verse 3
ततो देवगिरौ तस्मिन् रम्ये पुण्ये सनातने । न शर्व भूतसंघं वा ददृशुर्मुन॒यस्तदा,उस समय उस रमणीय, पवित्र एवं सनातन देवगिरिपर ऋषियोंने जब दृष्टिपात किया, तब उन्हें वहाँ न तो भगवान् शंकर दिखायी दिये और न भूतोंके समुदायका ही दर्शन हुआ
তাৰ পাছত সেই মনোৰম, পবিত্ৰ আৰু সনাতন দেৱগিৰিত মুনিসকলে দৃষ্টি দিলে; তেতিয়া তেওঁলোকে ন শৰ্ব (শিৱ)ক দেখিলে, ন তেওঁৰ ভূতগণৰ সমাবেশ।
Verse 4
व्यभ्रं च गगनं सद्यः क्षणेन समपद्यत । तीर्थयात्रां ततो विप्रा जग्मुश्नान्ये यथागतम्,फिर तो तत्काल एक ही क्षणमें सारा आसमान साफ हो गया। कहीं भी बादल नहीं रह गया। तब ब्राह्मणलोग वहाँसे तीर्थयात्राके लिये चल दिये और अन्य लोग भी जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये
তৎক্ষণাৎ এক নিমিষতে আকাশ মেঘশূন্য হৈ পৰিল। তাৰ পাছত ব্ৰাহ্মণসকলে তীৰ্থযাত্ৰাৰ বাবে সেখানৰ পৰা ওলাই গ’ল, আৰু আনসকলে যিদৰে আহিছিল তিদৰে উভতি গ’ল।
Verse 5
तददभुतमचिन्त्यं च दृष्टवा ते विस्मिता5भवन् | शड्करस्योमया सार्ध संवादं त्वत्कथाश्रयम्,यह अद्भुत और अचिन्त्य घटना देखकर सब लोग आश्वर्यचकित हो उठे। पुरुषसिंह देवकीनन्दन! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो आपके सम्बन्धमें संवाद हुआ, उसे सुनकर हम इस निश्चयपर पहुँच गये हैं कि वे ब्रह्मभूत सनातन पुरुष आप ही हैं। जिनके लिये हिमालयके शिखरपर महादेवजीने हमलोगोंको उपदेश दिया था
সেই অদ্ভুত আৰু অচিন্ত্য ঘটনাটো দেখি তেওঁলোক বিস্মিত হৈ পৰিল। আৰু উমাৰ সৈতে শংকৰে তোমাক কেন্দ্ৰ কৰি যি সংলাপ কৰিছিল, সেয়া শুনি আমি দৃঢ় সিদ্ধান্তত উপনীত হ’লোঁ—তুমিয়েই ব্রহ্মস্বৰূপ সনাতন পুৰুষ।
Verse 6
स भवान् पुरुषव्याप्र ब्रह्मभूत:ः सनातन: । यदर्थमनुशिष्टा: स्मो गिरिपृष्ठे महात्मना,यह अद्भुत और अचिन्त्य घटना देखकर सब लोग आश्वर्यचकित हो उठे। पुरुषसिंह देवकीनन्दन! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो आपके सम्बन्धमें संवाद हुआ, उसे सुनकर हम इस निश्चयपर पहुँच गये हैं कि वे ब्रह्मभूत सनातन पुरुष आप ही हैं। जिनके लिये हिमालयके शिखरपर महादेवजीने हमलोगोंको उपदेश दिया था
হে পুৰুষব্যাঘ্ৰ! তুমিয়েই ব্রহ্মভূত সনাতন পুৰুষ; যাৰ নিমিত্তে মহাত্মা (মহাদেৱ) এ গিৰিশিখৰত আমাক উপদেশ দিছিল।
Verse 7
द्वितीयं त्वद्भुतमिदं त्वत्तेज: कृतमद्य वै दृष्टवा च विस्मिता: कृष्ण सा च न: स्मृतिरागता,श्रीकृष्ण! आपके तेजसे दूसरी अद्भुत घटना आज यह घटित हुई है, जिसे देखकर हम चकित हो गये हैं और हमें पूर्वकालकी वह शंकरजीवाली बात पुनः स्मरण हो रही है
নাৰদে ক’লে—হে কৃষ্ণ! আজি তোমাৰ তেজৰ প্ৰভাৱত দ্বিতীয় এক আশ্চৰ্য ঘটনা ঘটিল। সেয়া দেখি আমি বিস্মিত হ’লোঁ, আৰু শংকৰ (শিৱ) সম্পৰ্কীয় সেই পূৰ্বৰ ঘটনাও আমাৰ মনত পুনৰ জাগি উঠিল।
Verse 8
एतत् ते देवदेवस्य माहात्म्यं कथितं प्रभो । कपर्दिनो गिरीशस्य महाबाहो जनार्दन,प्रभो! महाबाहु जनार्दन! यह मैंने आपके समक्ष जटाजूटधारी देवाधिदेव गिरीशके माहात्म्यका वर्णन किया है
নাৰদে ক’লে—প্ৰভো! দেৱদেৱ, জটাধাৰী গিৰীশ (শিৱ)ৰ মাহাত্ম্য মই আপোনাৰ সন্মুখত বৰ্ণনা কৰিলোঁ। মহাবাহু জনাৰ্দন! তেওঁৰ মহিমাৰ এই পবিত্ৰ কাহিনী আপোনাৰ আগত নিবেদন কৰিলোঁ।
Verse 9
इत्युक्त: स तदा कृष्णस्तपोवननिवासिभि: । मानयामास तान् सवनिषीन् देवकिनन्दन:,तपोवन-निवासी मुनियोंके ऐसा कहनेपर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने उस समय उन सबका विशेष सत्कार किया
তপোবনত বাস কৰা ঋষিসকলে এনেদৰে ক’লে, দেৱকীনন্দন শ্ৰীকৃষ্ণে সেই সময়ত সমবেত হৈ বহি থকা তেওঁলোক সকলোকে বিশেষ সন্মানে সৎকাৰ কৰিলে।
Verse 10
अथर्षय: सम्प्रहृष्टा: पुनस्ते कृष्णमब्रुवन् । पुन: पुन: दर्शयास्मान् सदैव मधुसूदन,तदनन्तर वे महर्षि पुनः हर्षमें भरकर श्रीकृष्णसे बोले--“मधुसूदन! आप सदा ही हमें बारंबार दर्शन देते रहें
তাৰ পাছত সেই মহৰ্ষিসকল আনন্দত উল্লসিত হৈ পুনৰ কৃষ্ণক ক’লে—“হে মধুসূদন! আমাক পুনঃ পুনঃ দৰ্শন দিয়া; সদায় তোমাৰ সান্নিধ্য লাভ হওক।”
Verse 11
नहि नः सा रति: स्वर्गे या च त्वद्दर्शने विभो । तदृतं च महाबाहो यदाह भगवान् भव:,'प्रभो! आपके दर्शनमें हमारा जितना अनुराग है, उतना स्वर्गमें भी नहीं है। महाबाहो! भगवान् शिवने जो कहा था, वह सर्वथा सत्य हुआ
হে বিভো! তোমাৰ দৰ্শনত আমাৰ যি ৰতি (আনন্দ-ভক্তি), সেয়া স্বৰ্গতো আমাৰ নাই। হে মহাবাহু! ভগৱান ভব (শিৱ) যি কৈছিল, সেয়া সম্পূৰ্ণ সত্য প্ৰমাণিত হ’ল।
Verse 12
एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यमरिकर्शन । त्वमेव हार्थतत्त्वज्ञ: पृष्टोडस्मान् पृच्छसे यदा,'शत्रुसूदन! यह सारा रहस्य मैंने आपसे कहा है, आप ही अर्थ-तत्त्वके ज्ञाता हैं। हमने आपसे पूछा था, परंतु आप स्वयं ही जब हमसे प्रश्न करने लगे, तब हमलोगोंने आपकी प्रसन्नताके लिये इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है। तीनों लोकोंमें कोई ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो
নাৰদ ক’লে—হে শত্রুসূদন! এই সমগ্ৰ গূঢ় ৰহস্য মই তোমাক ক’লোঁ। তুমি নিজেই অৰ্থ-তত্ত্বৰ জ্ঞাতা। তুমি আমাক সুধিছিলা; কিন্তু যেতিয়া তুমি উল্টাই আমাক প্ৰশ্ন কৰিবলৈ ধৰিলা, তেতিয়া তোমাৰ প্ৰীতিৰ বাবে আমি এই ৰক্ষিত ৰহস্য বৰ্ণনা কৰিলোঁ। ত্ৰিলোকত তোমাৰ অজানা একোৱেই নাই।
Verse 13
तदस्माभिरिदं गुहां त्वत्प्रियार्थमुदाहतम् । न च ते<विदितं किंचित्त्रिषु लोकेषु विद्यते,'शत्रुसूदन! यह सारा रहस्य मैंने आपसे कहा है, आप ही अर्थ-तत्त्वके ज्ञाता हैं। हमने आपसे पूछा था, परंतु आप स्वयं ही जब हमसे प्रश्न करने लगे, तब हमलोगोंने आपकी प्रसन्नताके लिये इस गोपनीय रहस्यका वर्णन किया है। तीनों लोकोंमें कोई ऐसी बात नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो
সেয়ে তোমাৰ প্ৰিয়াৰ্থে আমি এই গূঢ় ৰহস্য ক’লোঁ। হে শত্রুসূদন! ত্ৰিলোকত তোমাৰ অজানা একোৱেই নাই।
Verse 14
जन्म चैव प्रसूतिश्व॒ यच्चान्यत् कारणं विभो । वयं तु बहुचापल्यादशक्ता गुह्मधारणे,'प्रभो! आपका जो यह अवतार अर्थात् मानव-शरीरमें जन्म हुआ है तथा जो इसका गुप्त कारण है, यह सब तथा अन्य बातें आपसे छिपी नहीं हैं। हमलोग तो अपनी अत्यन्त चपलताके कारण इस गूढ़ विषयको अपने मनमें ही छिपाये रखनेमें असमर्थ हो गये हैं
হে প্ৰভু! মানৱদেহত তোমাৰ জন্ম, তাৰ গোপন কাৰণ আৰু আন একোৱেই তোমাৰ পৰা লুকাই নাথাকে। কিন্তু আমি অতিশয় চঞ্চল স্বভাৱৰ বাবে এই গভীৰ বিষয়টো অন্তৰত গোপনে ধৰি ৰাখিবলৈ অক্ষম হৈ পৰিলোঁ।
Verse 15
ततः स्थिते त्वयि विभो लघुत्वात् प्रलपामहे । न हि किंचित् तदाश्चर्य यज्ञ वेज्षि भवानिह
হে বিভু! তুমি ইয়াত উপস্থিত থকাৰ বাবে পৰিচয়ৰ বশে আমি মুকলিকৈ কথা কৈ পেলালোঁ। কিন্তু হে যজ্ঞস্বরূপ! ইয়াত আশ্চৰ্য কি? ইয়াত তুমি সকলো জানো।
Verse 16
साधयाम वयं कृष्ण बुद्धि पुष्टिमवाप्रुहि,“श्रीकृष्ण! अब आप हमें जानेकी आज्ञा दें, जिससे हम अपना कार्य साधन करें। आपको उत्तम बुद्धि और पुष्टि प्राप्त हो
হে শ্ৰীকৃষ্ণ! এতিয়া আমাক যাবলৈ অনুমতি দিয়া, যাতে আমি আমাৰ কাৰ্য সাধন কৰিব পাৰোঁ। তোমাৰ হোক উত্তম বুদ্ধি আৰু পুষ্টি।
Verse 17
पुत्रस्ते सदृशस्तात विशिष्टो वा भविष्यति । महाप्रभावसंयुक्तो दीप्तिकीर्तिकर: प्रभु:,तात! आपको आपके समान अथवा आपसे भी बढ़कर पुत्र प्राप्त हो। वह महान् प्रभावसे युक्त, दीप्तिमान्, कीर्तिका विस्तार करनेवाला और सर्वसमर्थ हो”
হে তাত! তোমাৰ সদৃশ অথবা তোমাতকৈও শ্ৰেষ্ঠ এক পুত্ৰ তোমাৰ হ’ব। তেওঁ মহাপ্ৰভাৱসম্পন্ন, তেজোময়, কীৰ্তি বিস্তাৰকাৰী আৰু সৰ্বকাৰ্যত সমৰ্থ হ’ব।
Verse 18
भीष्म उवाच तत:ः प्रणम्य देवेशं यादवं पुरुषोत्तमम् | प्रदक्षिणमुपावृत्य प्रजग्मुस्ते महर्षय:,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! तदनन्तर वे महर्षि उन यदुकुलरत्न देवेश्वर पुरुषोत्तमको प्रणाम और उनकी परिक्रमा करके चले गये
ভীষ্মে ক’লে—তাৰ পাছত সেই মহর্ষিসকলে যাদৱকুল-ৰত্ন দেৱেশ্বৰ পুৰুষোত্তম শ্ৰীকৃষ্ণক প্ৰণাম কৰি, তেওঁৰ প্ৰদক্ষিণা কৰি তাতৰ পৰা প্ৰস্থান কৰিলে।
Verse 19
सो<यं नारायण: श्रीमान् दीप्त्या परमया युत: । व्रतं यथावत् तच्चीरत्त्वा द्वारकां पुनरागमत्,तत्पश्चात् परम कान्तिसे युक्त ये श्रीमान् नारायण अपने व्रतको यथावत्रूपसे पूर्ण करके पुनः द्वारकापुरीमें चले आये
তাৰ পাছত পৰম তেজেৰে যুক্ত সেই শ্ৰীমান্ নাৰায়ণে নিজৰ ব্ৰত যথাবিধি সম্পূৰ্ণ কৰি পুনৰ দ্বাৰকাপুৰীলৈ উভতি আহিল।
Verse 20
पूर्णे च दशमे मासि पुत्रो5स्य परमादभुत: । रुक्मिण्यां सम्मतो जज्ञे शूरो वंशधर: प्रभो,प्रभो! दसवाँ मास पूर्ण होनेपर इन भगवानके रुक्मिणी देवीके गर्भसे एक परम अद्भुत, मनोरम एवं शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो इनका वंश चलानेवाला है
হে প্ৰভু! দশম মাহ পূৰ্ণ হোৱাত ৰুক্মিণীৰ গৰ্ভৰ পৰা তেওঁৰ এক পৰম অদ্ভুত পুত্ৰ জন্মিল—যি সকলোৰে প্ৰিয় আৰু সম্মত, বীৰ আৰু বংশধাৰক আছিল।
Verse 21
स काम: सर्वभूतानां सर्वभावगतो नृप । असुराणां सुराणां च चरत्यन्तर्गतः सदा,नरेश्वर! जो सम्पूर्ण प्राणियोंके मानसिक संकल्पमें व्याप्त रहनेवाला है और देवताओं तथा असुरोंके भी अन्तःकरणमें सदा विचरता रहता है, वह कामदेव ही भगवान् श्रीकृष्णका वंशधर है
হে নৃপ! যি কাম সকলো প্ৰাণীৰ সকলো ভাবত ব্যাপ্ত, আৰু দেৱতা-অসুৰৰো অন্তঃকৰণত সদা বিচৰণ কৰে—সেই কামদেৱকেই ভগৱান শ্ৰীকৃষ্ণৰ বংশধৰ বুলি কোৱা হৈছে।
Verse 22
सो<यं पुरुषशार्दूलो मेघवर्णश्षतुर्भुज: । संश्रित:पाण्डवान् प्रेम्णा भवन्तश्वैनमाश्रिता:,वे ही ये चार भुजाधारी घनश्याम पुरुषसिंह श्रीकृष्ण प्रेमपूर्वक तुम पाण्डवोंके आश्रित हैं और तुमलोग भी इनके शरणागत हो
ভীষ্মে ক’লে—এই মেঘশ্যাম, চতুৰ্ভুজ পুৰুষসিংহ শ্ৰীকৃষ্ণ প্ৰেমবশে পাণ্ডৱসকলৰ আশ্ৰয় লৈছে; আৰু তোমালোকো তেওঁৰেই শৰণাগত। সেয়েহে কৃষ্ণ আৰু পাণ্ডৱৰ বন্ধন প্ৰেমময় পাৰস্পৰিক আশ্ৰয়।
Verse 23
कीर्तिलिक्ष्मीर्धतिश्वैव स्वर्गमार्गस्तथैव च । यत्रैष संस्थितस्तत्र देवो विष्णुस्त्रिविक्रम:,ये त्रिविक्रम विष्णुदेव जहाँ विद्यमान हैं, वहीं कीर्ति, लक्ष्मी, धृति तथा स्वर्गका मार्ग है
ভীষ্মে ক’লে—য’ত ত্ৰিবিক্ৰম বিষ্ণুদেৱ দৃঢ়ভাৱে অৱস্থিত, তাতেই কীৰ্তি, লক্ষ্মী, ধৃতি আৰু স্বৰ্গমাৰ্গো বিদ্যমান।
Verse 24
सेन्द्रा देवास्त्रयस्त्रिंशदेष नात्र विचारणा । आदिदेवो महादेव: सर्वभूतप्रतिश्रय:,इन्द्र आदि तैंतीस देवता इन्हींके स्वरूप हैं, इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। ये ही सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले आदिदेव महादेव हैं
ভীষ্মে ক’লে—ইন্দ্ৰসহ তেত্ৰিশ দেৱতা নিশ্চিতভাৱে এইজনাৰেই স্বৰূপ; ইয়াত সন্দেহ নাই। তেওঁ আদিদেৱ, মহাদেৱ, সকলো ভূতৰ আশ্ৰয়-আধাৰ।
Verse 25
अनादिनिधनोडव्यक्तो महात्मा मधुसूदन: । अयं जातो महातेजा: सुराणामर्थसिद्धये,इनका न आदि है न अन्त। ये अव्यक्तस्वरूप, महातेजस्वी महात्मा मधुसूदन देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये यदुकुलमें उत्पन्न हुए हैं
ভীষ্মে ক’লে—মহাত্মা মধুসূদন অনাদি-অনন্ত, অব্যক্ত স্বৰূপ। সেই মহাতেজস্বী প্ৰভু দেৱসকলৰ উদ্দেশ্য সিদ্ধ কৰিবলৈ (ধৰ্ম স্থাপনাৰ্থে) অৱতীৰ্ণ হৈছে।
Verse 26
सुदुस्तरार्थतत्त्वस्य वक्ता कर्ता च माधव: । तव पार्थ जय: कृत्स्नस्तव कीर्तिस्तथातुला,ये माधव दुर्बोध तत्त्वके वक्ता और कर्ता हैं। कुन्तीनन्दन! तुम्हारी सम्पूर्ण विजय, अनुपम कीर्ति और अखिल भूमण्डलका राज्य--ये सब भगवान् नारायणका आश्रय लेनेसे ही तुम्हें प्राप्त हुए हैं। ये अचिन्त्यस्वरूप नारायण ही तुम्हारे रक्षक और परमगति हैं
ভীষ্মে ক’লে—দুৰ্গম তত্ত্বৰ অৰ্থৰ বক্তা আৰু কৰ্তা মাধৱেই। হে পাৰ্থ! তোমাৰ সম্পূৰ্ণ জয় আৰু তোমাৰ অতুল কীৰ্তি তেওঁৰ আশ্ৰয়ৰ ফল।
Verse 27
तवेयं पृथिवी देवी कृत्स्ना नारायणाश्रयात् | अयं नाथस्तवाचिन्त्यो यस्य नारायणो गति:,ये माधव दुर्बोध तत्त्वके वक्ता और कर्ता हैं। कुन्तीनन्दन! तुम्हारी सम्पूर्ण विजय, अनुपम कीर्ति और अखिल भूमण्डलका राज्य--ये सब भगवान् नारायणका आश्रय लेनेसे ही तुम्हें प्राप्त हुए हैं। ये अचिन्त्यस्वरूप नारायण ही तुम्हारे रक्षक और परमगति हैं
ভীষ্ম ক’লে—কুন্তীনন্দন! নাৰায়ণৰ আশ্ৰয় লোৱাৰ ফলতেই এই সমগ্ৰ দিব্য পৃথিৱী তোমাৰ অধীন হ’ল। তেওঁ অচিন্ত্য প্ৰভু—তোমাৰ নাথ আৰু ৰক্ষক; যিয়ে তেওঁৰ আশ্ৰয় লয়, তাৰ পৰম গতি আৰু অন্তিম শৰণ নাৰায়ণেই।
Verse 28
स भवांस्त्वमुपाध्वर्यू रणाग्नौ हुतवान् नृपान् । कृष्णख्रुवेण महता युगान्ताग्निसमेन वै,तुमने स्वयं होता बनकर प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी श्रीकृष्णरूपी विशाल खुवाके द्वारा समराग्निकी ज्वालामें सम्पूर्ण रुजाओंकी आहुति दे डाली है
ভীষ্ম ক’লে—তুমি যেন যজ্ঞৰ উপাধ্বৰ্যু হৈ ৰণাগ্নিত ৰজাসকলক আহুতি দিছা। যুগান্তাগ্নিৰ দৰে প্ৰজ্বলিত, শ্ৰীকৃষ্ণৰূপ মহা খুৱেৰে তুমি তেওঁলোকক হৱিৰূপে সেই অগ্নিত ঢালি দিলা।
Verse 29
दुर्योधनश्व शोच्चो5सौ सपुत्र भ्रातृबान्धव: । कृतवान् यो<बुद्धि: क्रोधाद्धरिगाण्डीविविग्रहम्,आज वह दुर्योधन अपने पुत्र, भाई और सम्बन्धियोंसहित शोकका विषय हो गया है; क्योंकि उस मूर्खने क्रोधके आवेशमें आकर श्रीकृष्ण और अर्जुनसे युद्ध ठाना था
ভীষ্ম ক’লে—আজি দুঃশাসন (দুৰ্যোধন) পুত্ৰ, ভ্ৰাতা আৰু স্বজনসহ শোকৰ পাত্ৰ হৈছে; কিয়নো সেই অবুদ্ধিয়ে ক্ৰোধৰ বশত শ্ৰীকৃষ্ণ আৰু গাণ্ডীৱধাৰী অৰ্জুনৰ সৈতে যুদ্ধবৈৰ স্থিৰ কৰিছিল।
Verse 30
दैतेया दानवेन्द्राश्ष महाकाया महाबला: । चक्राग्नौ क्षयमापन्ना दावाग्नौ शलभा इव,कितने ही विशाल शरीरवाले महाबली दैत्य और दानव दावानलमें दग्ध होनेवाले पतंगोंकी तरह श्रीकृष्णकी चक्राग्निमें स्वाहा हो चुके हैं
ভীষ্ম ক’লে—বহু মহাকায়, মহাবল দৈত্য আৰু দানৱেন্দ্ৰ শ্ৰীকৃষ্ণৰ চক্ৰাগ্নিত বনদাহৰ অগ্নিত শলভ জ্বলি যোৱাৰ দৰে বিনষ্ট হৈছে।
Verse 31
प्रतियोद्धुं न शक््यो हि मानुषैरेष संयुगे । विहीनै: पुरुषव्याप्र सत्त्वशक्तिबलादिभि:,पुरुषसिंह! सत्त्व (धैर्य) शक्ति और बल आदिसे स्वभावतः हीन मनुष्य युद्धमें इन श्रीकृष्णका सामना नहीं कर सकते
ভীষ্ম ক’লে—হে পুৰুষব্যাঘ্ৰ! এই যুঁজত সাধাৰণ মানুহ—বিশেষকৈ যিসকল স্বভাৱতঃ ধৈৰ্য, শক্তি, বল আদি গুণত হীন—তেওঁলোকে এই শ্ৰীকৃষ্ণক প্ৰতিযোধ কৰিব নোৱাৰে।
Verse 32
जयो योगी युगान्ताभ: सव्यसाची रणाग्रग: । तेजसा हतवान् सर्व सुयोधनबलं नूप,अर्जुन भी योगशक्तिसे सम्पन्न और युगान्तकालकी अग्निके समान तेजस्वी हैं। ये बायें हाथसे भी बाण चलाते हैं और रणभूमिमें सबसे आगे रहते हैं। नरेश्वर! इन्होंने अपने तेजसे दुर्योधनकी सारी सेनाका संहार कर डाला है
ভীষ্মে ক’লে— অৰ্জুন বিজয়ী। তেওঁ যোগসিদ্ধিত সমৃদ্ধ, যুগান্তৰ অগ্নিৰ দৰে দীপ্ত তেজস্বী। তেওঁ সব্যসাচী—বাওঁ হাতেৰোও বাণ নিক্ষেপ কৰিব পাৰে—আৰু ৰণক্ষেত্ৰত অগ্ৰভাগত থাকে। হে ৰাজন! নিজৰ তেজ আৰু পৰাক্ৰমৰ বলতেই তেওঁ সুয়োধন (দুৰ্যোধন)ৰ সমগ্ৰ সেনাবাহিনী ধ্বংস কৰিছে।
Verse 33
यत् तु गोवृषभांकेन मुनिभ्य: समुदाह्नतम् पुराणं हिमवत्पृष्ठे तन्मे निगदत: शूणु,वृषभध्वज भगवान् शंकरने हिमालयके शिखरपर मुनियोंसे जो पुरातन रहस्य बताया था, वह मेरे मुँहसे सुनो
ভীষ্মে ক’লে— বৃষভধ্বজ ভগৱান শংকৰে হিমালয়ৰ শিখৰত মুনিসকলক যি প্ৰাচীন পবিত্ৰ আখ্য্যান কৈছিল, সেয়া এতিয়া মোৰ মুখৰ পৰা শুনা; যিদৰে উপদেশ দিয়া হৈছিল তেনেদৰেই মই বৰ্ণনা কৰিম।
Verse 34
यावत् तस्य भवेत् पुष्टिस्तेजो दीप्ति: पराक्रम: । प्रभाव: सन्नतिर्जन्म कृष्णे तन्त्रिगुणं विभो,विभो! अर्जुनमें जैसी पुष्टि है, जैसा तेज, दीप्ति, पराक्रम, प्रभाव, विनय और जन्मकी उत्तमता है, वह सब कुछ श्रीकृष्णमें अर्जुनसे तिगुना है
ভীষ্মে ক’লে— হে বিভো! অৰ্জুনত যিমান পুষ্টি, তেজ, দীপ্তি, পৰাক্ৰম, প্ৰভাৱ, বিনয় আৰু জন্মৰ মহত্ত্ব আছে, সেই একেই গুণ শ্ৰীকৃষ্ণত তাৰ ত্ৰিগুণ ৰূপে আছে।
Verse 35
कः शक्नोत्यन्यथाकर्तु तद् यदि स्यात् तथा शृणु । यत्र कृष्णो हि भगवांस्तत्र पुष्टिरनुत्तमा,संसारमें कौन ऐसा है जो मेरे इस कथनको अन्यथा सिद्ध कर सके। श्रीकृष्णका जैसा प्रभाव है, उसे सुनो--जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं, वहाँ सर्वोत्तम पुष्टि विद्यमान है
ভীষ্মে ক’লে— মোৰ এই কথাক অন্যথা কৰি দেখুৱাব পৰা এই জগতত কোন আছে? তথাপি যদি কোনোবাই তেনে ভাবে, তেন্তে শুনা— য’ত ভগৱান শ্ৰীকৃষ্ণ আছেন, তাতেই অনুত্তম পুষ্টি (বল-সমৃদ্ধি) বিদ্যমান।
Verse 36
वयं त्विहाल्पमतय: परतन्त्रा: सुविक्लवा: । ज्ञानपूर्व प्रपन्ना: स्मो मृत्यो: पन्थानमव्ययम्,हम इस जगतमें मन्दबुद्धि, परतन्त्र और व्याकुलचित्त मनुष्य हैं। हमने जान-बूझकर मृत्युके अटल मार्गपर पैर रखा है
ভীষ্মে ক’লে— আমি-তুমি এই জগতত অল্পবুদ্ধি, পৰতন্ত্ৰ আৰু অতি ব্যাকুলচিত্ত মানুহ। তথাপি জেনেশুনেই আমি মৃত্যুৰ অচল, অব্যয় পথত শৰণ লৈছোঁ।
Verse 37
भवांक्षाप्यार्जवपर: पूर्व कृत्वा प्रतिश्रयम् । राजवृत्तं न लभते प्रतिज्ञापालने रत:,युधिष्ठिर! तुम अत्यन्त सरल हो, इसीसे तुमने पहले ही भगवान् वासुदेवकी शरण ली और अपनी प्रतिज्ञाके पालनमें तत्पर रहकर राजोचित बर्तावको तुम ग्रहण नहीं कर रहे हो
ভীষ্মে ক’লে— যুধিষ্ঠিৰ! তুমি অতি সৰল আৰু ধৰ্মনিষ্ঠ; সেইবাবেই আগতেই তুমি ভগৱান বাসুদেৱৰ শৰণ লৈছিলা। এতিয়া প্ৰতিজ্ঞা পালনতেই নিমগ্ন হৈ, ৰাজধৰ্মসঙ্গত নীতি-উপায় আৰু আচৰণ তুমি গ্ৰহণ কৰা নাই।
Verse 38
अप्येवात्मवध॑ लोके राजंस्त्वं बहु मन्यसे । न हि प्रतिज्ञा या दत्ता तां प्रहातुमरिंदम,राजन! तुम इस संसारमें अपनी हत्या कर लेनेको ही अधिक महत्त्व दे रहे हो। शत्रुदमन! जो प्रतिज्ञा तुमने कर ली है, उसे मिटा देना तुम्हारे लिये उचित नहीं है (तुमने शत्रुओंको जीतकर न्यायपूर्वक प्रजापालनका व्रत लिया है। अब शोकवश आत्महत्याका विचार मनमें लाकर तुम उस व्रतसे गिर रहे हो, यह ठीक नहीं है)
ভীষ্মে ক’লে— ৰাজন! এই লোকত আত্মবধকেই নে তুমি অধিক গুৰুত্ব দিছা নেকি? শত্রুদমন! তুমি দিয়া প্ৰতিজ্ঞা ত্যাগ কৰা তোমাৰ বাবে শোভন নহয়। শত্রু জয় কৰি ন্যায়ে প্ৰজাপালন কৰাৰ ব্ৰত তুমি গ্ৰহণ কৰিছা; শোকবশে আত্মহত্যাৰ চিন্তা কৰা মানে সেই ধৰ্মসঙ্কল্পৰ পৰা স্খলিত হোৱা।
Verse 39
कालेनायं जन: सर्वो निहतो रणमूर्धनि । वयं च कालेन हता: कालो हि परमेश्वर:,ये सब राजालोग युद्धके मुहानेपर कालके द्वारा मारे गये हैं, हम भी कालसे ही मारे गये हैं; क्योंकि काल ही परमेश्वर है
ভীষ্মে ক’লে— ৰণমুখত এই সমগ্ৰ জনসমষ্টি কালেৰে দ্বাৰাই নিধন হৈছে। আমিও কালেৰে দ্বাৰাই হতা; কিয়নো কালেই পৰমেশ্বৰ।
Verse 40
न हि कालेन कालज्ञ: स्पृष्ट: शोचितुमर्हसि । कालो लोहितरक्ताक्ष: कृष्णो दण्डी सनातन:,जो कालके स्वरूपको जानता है, वह कालके थपेड़े खाकर भी शोक नहीं करता। श्रीकृष्ण ही लाल नेत्रोंवाले दण्डधारी सनातन काल हैं
ভীষ্মে ক’লে— যি কালের স্বৰূপ জানে, সি কালের আঘাতত স্পৰ্শিত হ’লেও শোক নকৰে। কাল হৈছে ৰক্তলাল নয়নবিশিষ্ট দণ্ডধাৰী সনাতন কৃষ্ণ।
Verse 41
तस्मात् कुन्तीसुत ज्ञातीन् नेह शोचितुमर्हसि । व्यपेतमन्युर्नित्यं त्वं भव कौरवनन्दन,अतः कुन्तीनन्दन! तुम्हें अपने भाई-बन्धुओं और सगे-सम्बन्धियोंके लिये यहाँ शोक नहीं करना चाहिये। कौरव-कुलका आनन्द बढ़ानेवाले युधिष्ठिर! तुम सदा क्रोधहीन एवं शान्त रहो। मैंने इन माधव श्रीकृष्णका माहात्म्य जैसा सुना था, वैसा कह सुनाया। इनकी महिमाको समझनेके लिये इतना ही पर्याप्त है। सज्जनके लिये दिग्दर्शन मात्र उपस्थित होता है
ভীষ্মে ক’লে— সেয়ে, কুন্তীপুত্ৰ! ইয়াত নিজৰ জ্ঞাতি-বন্ধু আৰু আত্মীয়সকলৰ বাবে শোক কৰা তোমাৰ উচিত নহয়। কৌৰৱবংশৰ আনন্দবর্ধন! তুমি সদায় ক্ৰোধমুক্ত হৈ শান্ত থাকিবা।
Verse 42
माधवस्यास्य माहात्म्यं श्रुतं यत् कथितं मया । तदेव तावत् पर्याप्तं सज्जनस्य निदर्शनम्,अतः कुन्तीनन्दन! तुम्हें अपने भाई-बन्धुओं और सगे-सम्बन्धियोंके लिये यहाँ शोक नहीं करना चाहिये। कौरव-कुलका आनन्द बढ़ानेवाले युधिष्ठिर! तुम सदा क्रोधहीन एवं शान्त रहो। मैंने इन माधव श्रीकृष्णका माहात्म्य जैसा सुना था, वैसा कह सुनाया। इनकी महिमाको समझनेके लिये इतना ही पर्याप्त है। सज्जनके लिये दिग्दर्शन मात्र उपस्थित होता है
ভীষ্মে ক’লে—মই যেনেকৈ শুনিছিলোঁ, তেনেকৈ এই মাধৱ (শ্ৰীকৃষ্ণ)ৰ মাহাত্ম্য তোমাক ক’লোঁ। সজ্জনৰ বাবে ইমানেই সংকেত-ৰূপে যথেষ্ট। সেয়ে, কুন্তীনন্দন! ইয়াত তোমাৰ ভ্ৰাতা, বান্ধৱ-বান্ধৱী আৰু স্বজনসকলৰ বাবে শোক কৰা তোমাৰ উচিত নহয়। কুৰুবংশৰ আনন্দবর্ধক যুধিষ্ঠিৰ! সদায় ক্ৰোধহীন হৈ শান্তিত স্থিত থাকক। মাধৱৰ মহিমা বিষয়ে মই যি ক’লোঁ, সেয়া বোধ জাগ্ৰত কৰিবলৈ যথেষ্ট; সৎজনৰ বাবে সামান্য ইঙ্গিতো পথ-নিৰ্দেশ হৈ উঠে।
Verse 43
व्यासस्य वचन श्रुत्वा नारदस्य च धीमत: । स्वयं चैव महाराज कृष्णस्याहतमस्य वै,महाराज! व्यासजी तथा बुद्धिमान् नारदजीके वचन सुनकर मैंने परम पूज्य श्रीकृष्ण तथा महर्षियोंके महान् प्रभावका वर्णन किया है। भारत! गिरिराजनन्दिनी उमा और महेश्वरका जो संवाद हुआ था, उसका भी मैंने उल्लेख किया है
ভীষ্মে ক’লে—ব্যাসদেৱৰ বচন আৰু বুদ্ধিমান নাৰদৰ কথা শুনি, লগতে নিজে শ্ৰীকৃষ্ণৰ অতুল বৈভৱ প্ৰত্যক্ষ কৰি, হে মহাৰাজ, মই ভগৱান আৰু মহর্ষিসকলৰ মহান প্ৰভাৱ বৰ্ণনা কৰিলোঁ। হে ভাৰত! গিৰিৰাজ-কন্যা উমা আৰু মহেশ্বৰাৰ মাজত হোৱা সংলাপটোও মই স্মৰণ কৰিলোঁ।
Verse 44
प्रभावश्चर्षिपूगस्य कथित: सुमहान् मया । महेश्वरस्य संवादं शैलपुत्र्याश्न भारत,महाराज! व्यासजी तथा बुद्धिमान् नारदजीके वचन सुनकर मैंने परम पूज्य श्रीकृष्ण तथा महर्षियोंके महान् प्रभावका वर्णन किया है। भारत! गिरिराजनन्दिनी उमा और महेश्वरका जो संवाद हुआ था, उसका भी मैंने उल्लेख किया है
ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! মই ঋষিসমূহৰ সমষ্টিৰ অতি মহান প্ৰভাৱ বৰ্ণনা কৰিলোঁ। লগতে মহেশ্বৰ আৰু শৈলপুত্ৰী (উমা)ৰ মাজত হোৱা সেই পবিত্ৰ সংলাপটোও ক’লোঁ—যি ধৰ্ম আৰু ভক্তিৰ আদৰ্শ উপদেশ।
Verse 45
धारयिष्यति यश्चैनं महापुरुषसम्भवम् | शृणुयात् कथयेद् वा यः स श्रेयो लभते परम्,जो महापुरुष श्रीकृष्णके इस प्रभावको सुनेगा, कहेगा और याद रखेगा, उसको परम कल्याणकी प्राप्ति होगी
ভীষ্মে ক’লে—যি এই মহাপুৰুষ (শ্ৰীকৃষ্ণ) সম্পৰ্কীয় বৰ্ণন মনত ধাৰণ কৰিব, যি ইয়াক শুনিব বা আনক শুনাব—সেইজন পৰম কল্যাণ লাভ কৰিব।
Verse 46
भवितारश्न तस्याथ सर्वे कामा यथेप्सिता: । प्रेत्य स्वर्ग च लभते नरो नास्त्यत्र संशय:,उसके सारे अभीष्ट मनोरथ पूर्ण होंगे और वह मनुष्य मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोक पाता है, इसमें संशय नहीं है
ভীষ্মে ক’লে—তেতিয়া তেওঁৰ সকলো ন্যায়সঙ্গতভাৱে কাম্য ইচ্ছা পূৰ্ণ হ’ব, আৰু মৃত্যুৰ পাছত সেই মানুহে স্বৰ্গলোক লাভ কৰিব—ইয়াত কোনো সন্দেহ নাই।
Verse 47
न्याय्यं श्रेयोडभिकामेन प्रतिपत्तुं जनार्दन: । एष एवाक्षयो विप्रै: स्तुतो राजन् जनार्दन:,अतः जिसे कल्याणकी इच्छा हो, उस पुरुषको जनार्दनकी शरण लेनी चाहिये। राजन! इन अविनाशी श्रीकृष्णकी ही ब्राह्मणोंने स्तुति की है
ভীষ্মে ক’লে—যি পৰম কল্যাণ কামনা কৰে, তাৰ বাবে জনাৰ্দনৰ শৰণ লোৱাই ন্যায়সঙ্গত আৰু যথোচিত। হে ৰাজন! এই অবিনশ্বৰ জনাৰ্দনকেই ব্ৰাহ্মণসকলে স্তৱ কৰিছে।
Verse 48
महेश्वरमुखोत्सृष्टा ये च धर्मगुणा: स्मृता: । ते त्वया मनसा धार्या: कुरुराज दिवानिशम्,कुरुराज! भगवान् शंकरके मुखसे जो धर्म-सम्बन्धी गुण प्रतिपादित हुए हैं, उन सबको तुम्हें दिन-रात अपने हृदयमें धारण करना चाहिये
ভীষ্মে ক’লে—হে কুৰুৰাজ! মহেশ্বৰ (শংকৰ)ৰ মুখৰ পৰা উদ্ভূত বুলি স্মৃতিত কোৱা ধৰ্মগুণসমূহ তুমি দিন-ৰাতি মনত দৃঢ়ভাৱে ধাৰণ কৰা।
Verse 49
एवं ते वर्तमानस्य सम्यग्दण्डधरस्य च | प्रजापालनदक्षस्य स्वर्गलोको भविष्यति,ऐसा बर्ताव करते हुए यदि तुम न्यायोचित रीतिसे दण्ड धारण करके प्रजापालनमें कुशलतापूर्वक लगे रहोगे तो तुम्हें स्वर्गलोक प्राप्त होगा
ভীষ্মে ক’লে—এইদৰে আচৰণ কৰি যদি তুমি ন্যায়সঙ্গতভাৱে দণ্ড ধাৰণ কৰা আৰু প্ৰজাপালনত দক্ষ হৈ থাক, তেন্তে তোমাৰ বাবে স্বৰ্গলোক প্ৰাপ্ত হ’ব।
Verse 50
धर्मेणापि सदा राजन् प्रजा रक्षितुमरहसि । यस्तस्य विपुलो दण्ड: सम्यग्धर्म: स कीर्त्यते,राजन! तुम धर्मपूर्वक सदा प्रजाकी रक्षा करते रहो। प्रजापालनके लिये जो दण्डका उचित उपयोग किया जाता है, वह धर्म ही कहलाता है
ভীষ্মে ক’লে—হে ৰাজন! তুমি সদায় ধৰ্ম অনুসাৰে প্ৰজাক ৰক্ষা কৰা উচিত। প্ৰজাপালনৰ বাবে দণ্ডৰ যি যথাযথ আৰু সম্যক প্ৰয়োগ, তাকেই সম্যক্ ধৰ্ম বুলি কীৰ্তিত কৰা হয়।
Verse 51
य एष कथितो राजन् मया सज्जनसंनिधौ । शड्करस्योमया सार्ध संवादो धर्मसंहित:,नरेश्वर! भगवान् शंकरका पार्वतीजीके साथ जो धर्मविषयक संवाद हुआ था, उसे इन सत्पुरुषोंके निकट मैंने तुम्हें सुना दिया
ভীষ্মে ক’লে—হে নৰেশ্বৰ! এই সজ্জনসকলৰ সান্নিধ্যত মই তোমাক ভগৱান শংকৰ আৰু উমাৰ মাজত হোৱা ধৰ্মসংহিত সংলাপ বৰ্ণনা কৰি শুনাই দিলোঁ।
Verse 52
श्र॒त्वा वा श्रोतुकामो वाप्यर्चयेद् वृषभभध्वजम् । विशुद्धेनेह भावेन य इच्छेद् भूतिमात्मन:,जो अपना कल्याण चाहता हो, वह पुरुष यह संवाद सुनकर अथवा सुननेकी कामना रखकर विशुद्धभावसे भगवान् शंकरकी पूजा करे
যি নিজৰ কল্যাণ আৰু সমৃদ্ধি কামনা কৰে, সি এই উপদেশ শুনি বা শুনিবলৈ আকাঙ্ক্ষা কৰি, এই লোকতে শুদ্ধ আৰু আন্তৰিক ভাৱে বৃষধ্বজ শিৱক পূজা কৰক।
Verse 53
एष तस्यानवद्यस्य नारदस्य महात्मन: । संदेशो देवपूजार्थ तं तथा कुरु पाण्डव,पाण्डुनन्दन! उन अनिन्द्य महात्मा देवर्षि नारदजीका ही यह संदेश है कि महादेवजीकी पूजा करनी चाहिये। इसलिये तुम भी ऐसा ही करो
হে পাণ্ডৱ! দেৱপূজাৰ অৰ্থে অনৱদ্য মহাত্মা দেৱৰ্ষি নাৰদে দিয়া এই বাৰ্তাই; সেয়ে, পাণ্ডুনন্দন, তুমিও তেনেকৈয়ে কৰা।
Verse 54
एतदत्यदभुतं वृत्तं पुण्ये हि भवति प्रभो । वासुदेवस्य कौन्तेय स्थाणोश्वैव स्वभावजम्,प्रभो! कुन्तीनन्दन! भगवान् श्रीकृष्ण और महादेवजीका यह अद्भुत एवं स्वाभाविक वृत्तान्त पूर्वकालमें पुण्यमय पर्वत हिमालयपर संघटित हुआ था
প্ৰভো! কুন্তীনন্দন! এই অতি আশ্চৰ্য বৃত্তান্ত প্ৰাচীন কালত এক পুণ্যস্থানত সংঘটিত হৈছিল; ই বাসুদেৱ আৰু স্থাণু (মহাদেৱ)-ৰ স্বাভাৱিক মহিমাৰ কথাই কয়।
Verse 55
दशवर्षसहसत्राणि बदर्यामेष शाश्वत: । तपश्चचार विपुलं सह गाण्डीवधन्चना,इन सनातन श्रीकृष्णने गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ (नर-नारायणरूपमें रहकर) बदरिकाश्रममें दस हजार वर्षोतक बड़ी भारी तपस्या की थी
এই শাশ্বত প্ৰভুৱে বদৰীৰ চিৰস্থায়ী আশ্ৰমত গাণ্ডীৱধাৰী অৰ্জুনৰ সৈতে দহ হাজাৰ বছৰ মহাতপস্যা কৰিছিল।
Verse 56
त्रियुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनञज्जयौ । विदितौ नारदादेतौ मम व्यासाच्च पार्थिव,पृथ्वीनाथ! कमलनयन! श्रीकृष्ण और अर्जुन--ये दोनों सत्ययुग आदि तीनों युगोंमें प्रकट होनेके कारण त्रियुग कहलाते हैं। देवर्षि नारद तथा व्यासजीने इन दोनोंके स्वरूपका परिचय दिया था
হে পৃথিৱীনাথ! পদ্মনয়ন বাসুদেৱ আৰু ধনঞ্জয়—এই দুয়ো ‘ত্রিযুগ’ বুলি খ্যাত; ইহঁতৰ স্বৰূপ দেৱৰ্ষি নাৰদ আৰু মোৰ পিতা ব্যাসৰ দ্বাৰা জনা গৈছে।
Verse 57
बाल एव महाबाहुश्चकार कदनं महत् । कंसस्य पुण्डरीकाक्षो ज्ञातित्राणार्थकारणात्,महाबाहु कमलनयन श्रीकृष्णने बचपनमें ही अपने बन्धु-बान्धवोंकी रक्षाके लिये कंसका बड़ा भारी संहार किया था
মহাবাহু পদ্মনয়ন শ্ৰীকৃষ্ণে শৈশৱতেই নিজৰ স্বজনৰ ৰক্ষাৰ্থে কংসক মহাবিনাশে নিপাত কৰিছিল।
Verse 58
कर्मणामस्य कौन्तेय नानन््तं संख्यातुमुत्सहे । शाश्व॒तस्य पुराणस्य पुरुषस्य युधिष्ठिर,कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! इन सनातन पुराणपुरुष श्रीकृष्णके चरित्रोंकी कोई सीमा या संख्या नहीं बतायी जा सकती
কৌন্তেয় যুধিষ্ঠিৰ! সেই শাশ্বত পুৰাণপুৰুষ শ্ৰীকৃষ্ণৰ অনন্ত কৰ্ম গণনা কৰিবলৈ মই সাহস নকৰোঁ; তেওঁৰ লীলাৰ কোনো সীমা নাই।
Verse 59
ध्रुवं श्रेयः परं तात भविष्यति तवोत्तमम् | यस्य ते पुरुषव्याप्र: सखा चायं जनार्दन:,तात! तुम्हारा तो अवश्य ही परम उत्तम कल्याण होगा; क्योंकि ये पुरुषसिंह जनार्दन तुम्हारे मित्र हैं
বৎস! তোমাৰ পৰম উত্তম কল্যাণ নিশ্চয় হ’ব; কিয়নো পুৰুষসিংহ জনাৰ্দন তোমাৰ বন্ধু।
Verse 60
दुर्योधन तु शोचामि प्रेत्य लोके5पि दुर्मतिम् । यत्कृते पृथिवी सर्वा विनष्टा सहयद्विपा,दुर्बुद्धि दुर्योधन यद्यपि परलोकमें चला गया है, तो भी मुझे तो उसीके लिये अधिक शोक हो रहा है; क्योंकि उसीके कारण हाथी, घोड़े आदि वाहनोंसहित सारी पृथ्वीका नाश हुआ है
দুৰ্মতি দুঃযোধনৰ বাবে মই শোক কৰোঁ—সিও পৰলোকলৈ গ’ল যদিও—কাৰণ তাৰেই বাবে হাতী-ঘোঁৰা আদি সহ সমগ্ৰ পৃথিৱী ধ্বংস হ’ল।
Verse 61
दुर्योधनापराधेन कर्णस्य शकुनेस्तथा । दुःशासनचतुर्थानां कुरवो निधनं गता:,दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और शकुनि--इन्हीं चारोंके अपराधसे सारे कौरव मारे गये हैं
দুঃযোধন, দুঃশাসন, কৰ্ণ আৰু শকুনি—এই চাৰিজনৰ অপৰাধৰ ফলতেই সমগ্ৰ কৌৰৱসকল বিনাশপ্ৰাপ্ত হ’ল।
Verse 62
वैशम्पायन उवाच एवं सम्भाषमाणे तु गाड़्ेये पुरुषर्षभे । तूष्णीं बभूव कौरव्यो मध्ये तेषां महात्मनाम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पुरुषप्रवर गंगानन्दन भीष्मजीके ऐसा कहनेपर उन महामनस्वी पुरुषोंके बीचमें बैठे हुए कुरुकुलकुमार युधिष्ठिर चुप हो गये
বৈশম্পায়নে ক’লে—জনমেজয়! পুৰুষশ্ৰেষ্ঠ গঙ্গানন্দন ভীষ্মে এইদৰে কোৱাৰ পাছত, সেই মহাত্মাসকলৰ মাজত বহি থকা কুৰুকুলকুমাৰ যুধিষ্ঠিৰ নীৰৱ হৈ পৰিল।
Verse 63
तच्छुत्वा विस्मयं जम्मुर्धृतराष्ट्रादयो नूपा: । सम्पूज्य मनसा कृष्णं सर्वे प्राजजलयो5भवन्,भीष्मजीकी बात सुनकर धृतराष्ट्र आदि राजाओंको बड़ा विस्मय हुआ और वे सभी मन-ही-मन श्रीकृष्णकी पूजा करते हुए उन्हें हाथ जोड़ने लगे
এই কথা শুনি ধৃতৰাষ্ট্ৰ আদি ৰজাসকল বিস্ময়াভিভূত হ’ল। মনতে শ্ৰীকৃষ্ণক পূজা কৰি সকলোৱে হাত জোৰি থিয় হ’ল।
Verse 64
ऋषयश्नचापि ते सर्वे नारदप्रमुखास्तदा । प्रतिगृह्माभ्यनन्दन्त तद्वाक््यं प्रतिपूज्य च,नारद आदि सम्पूर्ण महर्षि भी भीष्मजीके वचन सुनकर उनकी प्रशंसा करते हुए बहुत प्रसन्न हुए
তেতিয়া নাৰদপ্ৰমুখ সকলো ঋষিয়েও ভীষ্মৰ বচন শ্ৰদ্ধাৰে গ্ৰহণ কৰিলে; সেই বাক্যক সন্মান কৰি প্ৰশংসা কৰোঁতে তেওঁলোক অতিশয় আনন্দিত হ’ল।
Verse 65
इत्येतदखिलं सर्वे: पाण्डवो भ्रातृभि: सह । श्रुतवान् सुमहाश्चर्य पुण्यं भीष्मानुशासनम्,इस प्रकार पाण्डुनन्दन युधिष्ठिने अपने सब भाइयोंके साथ यह भीष्मजीका सारा पवित्र अनुशासन सुना, जो अत्यन्त आश्चर्यजनक था
এইদৰে পাণ্ডৱ যুধিষ্ঠিৰে নিজৰ সকলো ভ্ৰাতাৰ সৈতে ভীষ্মৰ এই সম্পূৰ্ণ পবিত্ৰ অনুশাসন শুনিলে—যি অতিশয় আশ্চৰ্যজনক আছিল।
Verse 66
युधिष्ठिरस्तु गाड़ेय॑ं विश्रान्तं भूरिदक्षिणम् । पुनरेव महाबुद्धि: पर्यपृच्छन््महीपति:,तदनन्तर बड़ी-बड़ी दक्षिणाओंका दान करनेवाले गंगानन्दन भीष्मजी जब विश्राम ले चुके, तब महाबुद्धिमान् राजा युधिष्छिर पुनः प्रश्न करने लगे
তাৰ পাছত, বৃহৎ বৃহৎ দক্ষিণা দান কৰা গঙ্গানন্দন ভীষ্মে বিশ্ৰাম লোৱাৰ পিছত, মহাবুদ্ধিমান ৰজা যুধিষ্ঠিৰে তেওঁক পুনৰ প্ৰশ্ন কৰিলে।
Verse 148
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महापुरुषप्रस्तावे अष्टचत्वारिंशदाधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महापुरुष श्रीकृष्णकी प्रशंशाविषयक एक सौ अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত মহাপুৰুষ শ্ৰীকৃষ্ণৰ প্ৰশংসা-প্ৰসঙ্গৰ একশ আটচল্লিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।
Verse 156
दिवि वा भुवि वा देव सर्व हि विदितं तव । “भगवन्! इसीलिये आपके रहते हुए भी हम अपने ओछेपनके कारण प्रलाप करते हैं ->छोटे मुँह बड़ी बात कर रहे हैं। देव! पृथ्वीपर या स्वर्गमें कोई भी ऐसी आश्वर्यकी बात नहीं है, जिसे आप नहीं जानते हों। आपको सब कुछ ज्ञात है
হে দেৱ! স্বৰ্গত হওক বা পৃথিৱীত—সকলো কথাই আপোনাৰ বিদিত। পৃথিৱীত বা দিব্যলোকসমূহত আপোনাৰ জ্ঞানৰ অতীত কোনো আশ্চৰ্য নাই; আপোনাৰ ওচৰত সকলোই জ্ঞাত।
The dilemma is how to reconcile profound grief with dharmic meaning: Gaṅgā’s lament emphasizes loss and perceived injustice, while Kṛṣṇa reframes the event as voluntary yogic departure and cosmic identity (Vasu), redirecting emotion toward normative acceptance.
The chapter teaches that disciplined inner control (yoga) and correct ritual action can coexist: bodily conditions and death are portrayed as governable within dharma, and communal stability is maintained through rites and doctrinal interpretation.
While not a formal phalaśruti, the narrative implicitly valorizes understanding yogic restraint, righteous death, and funerary dharma as spiritually stabilizing knowledge that transforms grief into a structured, tradition-consistent response.