
अध्याय १२८: शिव–उमा संवादः — तिलोत्तमा, श्मशान-मेध्यता, तथा चातुर्वर्ण्य-धर्मः (Chapter 128: Śiva–Umā Dialogue—Tilottamā, the Ritual Valence of the Śmaśāna, and the Fourfold Duty-Code)
Upa-parva: Dharma-anuśāsana (Śiva–Umā Saṃvāda and Cāturvarṇya-Dharma Exposition)
Chapter 128 stages a layered discourse. Maheśvara recounts the creation of Tilottamā by Brahmā and describes his yogic manifestation as four-faced (caturmukha), assigning differentiated functions to each face (instruction, intimacy, benevolence, and fierce dissolution) to illustrate divine polyvalence. Umā queries why the bull (vṛṣabha) becomes Śiva’s vehicle; Śiva narrates the Surabhī episode and the causation of his epithet Śrīkaṇṭha, linking mythic etiology to symbolic theology. Umā then questions Śiva’s preference for the śmaśāna despite other splendid abodes; Śiva argues that the cremation-ground is ‘medhya’ (ritually apt) and spiritually potent, inhabited by bhūta-gaṇas with whom he is inseparable. The dialogue pivots to normative ethics: Umā asks for the definition and practicability of dharma; Śiva enumerates core virtues (ahiṃsā, satya, compassion, śama, dāna) and then details cāturvarṇya duties—highlighting ascetic/ritual disciplines for brāhmaṇas, protective governance for kṣatriyas, agrarian-commercial responsibility for vaiśyas, and service with restraint and hospitality for śūdras—framing social order as an ethical economy rather than mere status.
Chapter Arc: शरशय्या पर पड़े भीष्म युधिष्ठिर को नीति का सूक्ष्म रहस्य बताते हैं—हर मनुष्य एक ही उपाय से नहीं जीता जाता; किसी को साम से, किसी को दान से प्रसन्न किया जाता है, अतः प्रकृति पहचानकर उपाय चुनो। → भीष्म ‘सान्त्व’ (साम) के गुण गिनाते हुए एक दृष्टान्त उठाते हैं: एक विद्वान ब्राह्मण एक अत्यन्त भीषण राक्षस के सामने पड़ता है, पर भय से डगमगाए बिना सामनीति का ही आश्रय लेता है। → ब्राह्मण राक्षस के कृश और दुर्बल होने का कारण टटोलते हुए साम के शस्त्र से उसे भीतर तक बेध देता है—‘तेरे मित्र तुझसे विमुख हैं’, ‘कोई शत्रु मित्रमुख बनकर तुझे ठग गया’, ‘तू धन-बुद्धि-श्रुति से हीन होकर केवल तेज पर घमण्ड करता है’, ‘तू परस्पर-विरोधी सुहृदों को साधने में उलझकर सबको अप्रसन्न कर बैठा’—इस प्रकार वह राक्षस के पतन का मूल ‘कुसंग, अविवेक और कूटनीति में अज्ञान’ ठहराता है। → दृष्टान्त के माध्यम से भीष्म युधिष्ठिर को यह निष्कर्ष देते हैं कि साम केवल मधुर वाणी नहीं, बल्कि मनोविज्ञान, समय-ज्ञान और संबंध-धर्म की परीक्षा है; उचित व्यक्ति पर उचित उपाय ही राज्य और लोक-व्यवहार को स्थिर करता है। → भीष्म की नीति-शिक्षा आगे और सूक्ष्म भेदों (किस पर साम, किस पर दान, और कब दण्ड) की ओर बढ़ने का संकेत देती है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ ३ श्लोक मिलाकर कुल २५३ “लोक हैं) शीसस्नश्शास्स | भ्निध्ॉप्राध्य चतुर्विशत्यधिकशततमो< ध्याय: नारदका पुण्डरीकको भगवान् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना (युधिष्टिर उवाच यज्ज्ञेयं परमं कृत्यमनुछेयं महात्मभि: । सारं मे सर्वशास्त्राणां वक्तुमर्हस्यनुग्रहात् ।। युधिष्ठिरने कहा--पितामह! जो सर्वोत्तम कर्तव्य-रूपसे जानने योग्य है, महात्मा पुरुष जिसका अनुष्ठान करना अपना धर्म समझते हैं तथा जो सम्पूर्ण शास्त्रोंका सार है, उस श्रेयका कृपापूर्वक वर्णन कीजिये ।। भीष्म उवाच श्रूयतामिदमत्यन्तं गूढं संसारमोचनम् । श्रोतव्यं च त्वया सम्यग् ज्ञातव्यं च विशाम्पते ।। भीष्मजीने कहा--प्रजानाथ! जो अत्यन्त गूढ़, संसारबन्धनसे मुक्त करनेवाला और तुम्हारे द्वारा श्रवण करने एवं भलीभाँति जाननेके योग्य है, उस परम श्रेयका वर्णन सुनो ।। पुण्डरीकः पुरा विप्र: पुण्यतीर्थे जपान्वित: । नारदं परिपप्रच्छ श्रेयो योगपरं मुनिम् ।। नारदश्षाब्रवीदेनं ब्रह्मणोक्त महात्मना ।। प्राचीन कालकी बात है, पुण्डरीक नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण किसी पुण्यतीर्थमें सदा जप किया करते थे। उन्होंने योगपरायण मुनिवर नारदजीसे श्रेय (कल्याणकारी साधन) के विषयमें पूछा। तब नारदजीने महात्मा ब्रह्माजीके द्वारा बताये हुए श्रेयका उन्हें इस प्रकार उपदेश दिया ।। नारद उवाच शृणुष्वावहितस्तात ज्ञानयोगमनुत्तमम् । अप्रभूत॑ प्रभूतार्थ वेदशास्त्रार्थसारकम् ।। नारदजीने कहा--तात! तुम सावधान होकर परम उत्तम ज्ञानयोगका वर्णन सुनो। यह किसी व्यक्ति-विशेषसे नहीं प्रकट हुआ है--अनादि है, प्रचुर अर्थका साधक है तथा वेदों और शास्त्रोंके अर्थका सारभूत है ।। यः पर: प्रकृतेः प्रोक्त: पुरुष: पजचविंशक: । स एव सर्वभूतात्मा नर इत्यभिधीयते ।। जो चौबीस तत्त्वमयी प्रकृतिसे उसका साक्षिभूत पचीसवाँ तत्त्व पुरुष कहा गया है तथा जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, उसीको नर कहते हैं ।। नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति ततो विदुः । तान्येव चायन॑ तस्य तेन नारायण: स्मृतः ।। नरसे सम्पूर्ण तत्त्व प्रकट हुए हैं, इसलिये उन्हें नार कहते हैं। नार ही भगवानूका अयन --निवासस्थान है, इसलिये वे नारायण कहलाते हैं ।। नारायणाज्जगत् सर्व सर्गकाले प्रजायते । तस्मिन्नेव पुनस्तच्च प्रलये सम्प्रलीयते ।। सृष्टिकालमें यह सारा जगत् नारायणसे ही प्रकट होता है और प्रलयकालमें फिर उन्हींमें इसका लय होता है ।। नारायण: पर ब्रह्म तत्त्व नारायण: पर: । परादपि परश्नासौ तस्मान्नास्ति परात् परम् ।। नारायण ही परब्रह्म हैं, परमपुरुष नारायण ही सम्पूर्ण तत्त्व हैं, वे ही परसे भी परे हैं। उनके सिवा दूसरा कोई परात्पर तत्त्व नहीं है ।। वासुदेव॑ तथा विष्णुमात्मानं च तथा विदु: । संज्ञाभेदै: स एवैक: सर्वशास्त्राभिसंस्कृत: ।। उन्हींको वासुदेव, विष्णु तथा आत्मा कहते हैं। संज्ञाभेदसे एकमात्र नारायण ही सम्पूर्ण शास्त्रोंद्वारा वर्णित होते हैं ।। आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुन: पुनः । इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायण: सदा ।। समस्त शास्त्रोंका आलोडन करके बारंबार विचार करनेपर एकमात्र यही सिद्धान्त स्थिर हुआ है कि सदा भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये ।। तस्मात्त्वं गहनान् सर्वास्त्यक्त्वा शास्त्रार्थविस्तरान् | अनन्यचेता ध्यायस्व नारायणमजं विभुम् ।। अतः तुम शात्त्रार्थके सम्पूर्ण गहन विस्तारका त्याग करके अनन्यचित्त होकर सर्वव्यापी अजन्मा भगवान् नारायणका ध्यान करो ।। मुहूर्तमपि यो ध्यायेन्नारायणमतन्द्रित: । सो<पि सद्गतिमाप्नोति कि पुनस्तत्परायण: ।। जो आलस्य छोड़कर दो घड़ी भी नारायणका ध्यान करता है, वह भी उत्तम गतिको प्राप्त होता है। फिर जो निरन्तर उन्हींके भजन-ध्यानमें तत्पर रहता है, उसकी तो बात ही क्या है।। नमो नारायणायेति यो वेद ब्रह्म शाश्वतम् । अन्तकाले जपन्नेति तद्विष्णो: परमं पदम् ।। जो “७9० नमो नारायणाय” इस अष्टाक्षर मन्त्रको सनातन ब्रह्मरूप जानता है और अन्तकालमें इसका जप करता है, वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त कर लेता है ।। श्रवणान्मननाच्चैव गीतिस्तुत्यर्चनादिभि: । आराध्यं सर्वदा ब्रह्म पुरुषेण हितैषिणा ।। जो मनुष्य अपना हित चाहता हो, वह सदा श्रवण, मनन, गीत, स्तुति और पूजन आदिके द्वारा सर्वदा ब्रह्मस्वरूप नारायणकी आराधना करे ।। लिप्यते न स पापेन नारायणपरायण: । पुनाति सकल॑ लोकं॑ सहस्रांशुरिवोदित: ।। नारायणके भजनमें तत्पर रहनेवाला पुरुष पापसे लिप्त नहीं होता। वह उदित हुए सहस्र किरणोंवाले सूर्यकी भाँति समस्त लोकको पवित्र कर देता है ।। ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो5थ भिक्षुक: । केशवाराधन हित्वा नैव यान्ति परां गतिम् ।। ब्रह्मचारी हो या गृहस्थ, वानप्रस्थ हो या संन्यासी, भगवान् विष्णुकी आराधना छोड़ देनेपर ये कोई भी परम गतिको नहीं प्राप्त होते हैं ।। जन्मान्तरसहस्रेषु दुर्लभा तद्गता मति: । तद्धभक्तवत्सलं देवं समाराधय सुव्रत ।। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पुण्डरीक! सहस्रों जन्म धारण करनेपर भी भगवान् विष्णुमें मन और बुद्धिका लगना अत्यन्त दुर्लभ है। अतः तुम उन भक्तवत्सल नारायणदेवकी भलीभाँति आराधना करो ।। भीष्म उवाच नारदेनैवमुक्तस्तु स विप्रो5भ्यर्चयद्धरिम् । स्वप्नेडपि पुण्डरीकाक्षं शड्खचक्रगदाधरम् ।। किरीटकुण्डलथरं लसच्छीवत्सकौस्तु भम् । त॑ दृष्टवा देवदेवेशं प्राणमत् सम्भ्रमान्वित: ।। भीष्मजी कहते हैं--राजन्! नारदजीके इस प्रकार उपदेश देनेपर विप्रवर पुण्डरीक भगवान् श्रीहरिकी आराधना करने लगे। वे स्वप्रमें भी शंख-चक्र गदाधारी, किरीट और कुण्डलसे सुशोभित, सुन्दर श्रीवत्स-चिह्न एवं कौस्तुभभणि धारण करनेवाले कमलनयन नारायण देवका दर्शन करते थे और उन देवदेवेश्वरको देखते ही बड़े वेगसे उठकर उनके चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करते थे ।। अथ कालेन महता तथा प्रत्यक्षतां गत: । संस्तुतः स्तुतिभिवेंदिर्देवगन्धर्वकिन्नरै: ।। तदनन्तर दीर्घकालके बाद भगवानने उसी रूपमें पुण्डरीकको प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उस समय सम्पूर्ण वेद तथा देवता, गन्धर्व और किन्नर नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते थे ।। अथ तेनैव भगवानात्मलोकमधोक्षज: । गत: सम्पूजित: सर्व: स योगनिलयो हरि: ।। योग ही जिनका निवासस्थान है, वे भगवान् अधोक्षज श्रीहरि सबके द्वारा पूजित हो उस भक्त पुण्डरीकको साथ लेकर ही पुनः अपने धामको चले गये ।। तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र तद्धभक्तस्तत्परायण: । अर्चयित्वा यथायोगं भजस्व पुरुषोत्तमम् ।। राजेन्द्र! इसलिये तुम भी भगवान्के भक्त एवं शरणागत होकर उनकी यथायोग्य पूजा करके उन्हीं पुरुषोत्तमके भजनमें लगे रहो ।। अजरममसरमेकं ध्येयमाद्यन्तशून्यं सगुणमगुणमाद्यं स्थूलमत्यन्तसूक्ष्मम् । निरुपममुपमेयं योगिविज्ञानगम्यं त्रिभुवनगुरुमीशं सम्प्रपद्यस्व विष्णुम् ।।) जो अजर, अमर, एक (अद्वितीय), ध्येय, अनादि, अनन्त, सगुण, निर्गुण, सबके आदि कारण, स्थूल, अत्यन्त सूक्ष्म, उपमारहित, उपमाके योग्य तथा योगियोंके लिये ज्ञान-गम्य हैं, उन त्रिभुवनगुरु भगवान् विष्णुकी शरण लो ।। युधिछिर उवाच साम्नि चापि प्रदाने च ज्याय: कि भवतो मतम् | प्रत्रूहि भरतश्रेष्ठ यदत्र व्यतिरिच्यते,युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ] आपके मतमें साम और दानमें कौन-सा श्रेष्ठ है? इनमें जो उत्कृष्ट हो, उसे बताइये
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! আপোনাৰ মতে সাম (সমঝোতা) আৰু দান—এই দুটাৰ ভিতৰত কোনটো শ্ৰেষ্ঠ? ইয়াত যিটো উৎকৃষ্ট, সেয়া কওক।
Verse 2
भीष्म उवाच साम्ना प्रसाद्यते कश्नचिद् दानेन च तथा पर: । पुरुषप्रकृतिं ज्ञात्वा तयोरेकतरं भजेत्,भीष्मजीने कहा--बेटा! कोई मनुष्य सामसे प्रसन्न होता है और कोई दानसे। अतः पुरुषके स्वभावको समझकर दोनोंमेंसे एकको अपनाना चाहिये
ভীষ্মে ক’লে— কোনো লোক সাম (সান্ত্বনা)ৰে প্ৰসন্ন হয়, আৰু কোনো লোক দানৰে। সেয়ে মানুহৰ স্বভাৱ জানি এই দুয়োটাৰ ভিতৰত যিটো উপযুক্ত, সেইটোৱেই গ্ৰহণ কৰা উচিত।
Verse 3
गुणांस्तु शृूणु मे राजन् सान्त्वस्य भरतर्षभ । दारुणान्यपि भूतानि सान्त्वेनाराधयेद् यथा,राजन! भरतश्रेष्ठ] अब तुम सामके गुणोंको सुनो। सामके द्वारा मनुष्य भयानक-से- भयानक प्राणीको वशमें कर सकता है
ভীষ্মে ক’লে— হে ৰাজন, ভৰতশ্ৰেষ্ঠ! এতিয়া সাম (সান্ত্ব)ৰ গুণ মোৰ পৰা শুনা। সামৰ দ্বাৰা মানুহে অতি ভয়ংকৰ জীৱকোও বশ কৰিব পাৰে।
Verse 4
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । गृहीत्वा रक्षसा मुक्तो द्विजाति: कानने यथा,इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसके अनुसार कोई ब्राह्मण किसी जंगलमें किसी राक्षसके चंगुलमें फँसकर भी सामनीतिके द्वारा उससे मुक्त हो गया था
এই বিষয়তো এটা প্ৰাচীন ইতিহাসৰ দৃষ্টান্তো কোৱা হয়— যেনেকৈ অৰণ্যত ৰাক্ষসে ধৰি লোৱা এজন দ্বিজ (ব্ৰাহ্মণ) সামনীতিয়ে মুক্ত হৈছিল।
Verse 5
वश्िद् वाग्बुद्धिसम्पन्नो ब्राह्मणो विजने वने । गृहीत: कृच्छूमापन्नो रक्षसा भक्षयिष्यता,एक बुद्धिमान् एवं वाचाल ब्राह्मण किसी निर्जन वनमें घूम रहा था। उसी समय किसी राक्षएने आकर उसे खानेकी इच्छासे पकड़ लिया। बेचारा ब्राह्मण बड़े कष्टमें पड़ गया
ভীষ্মে ক’লে— বাক্চাতুৰ্য আৰু বুদ্ধিত সম্পন্ন এজন ব্ৰাহ্মণ নিৰ্জন অৰণ্যত ঘূৰি ফুৰিছিল। তেতিয়া তাক ভক্ষণ কৰিবলৈ ইচ্ছা কৰি এজন ৰাক্ষসে তাক ধৰি পেলালে। ধৰা পৰি সেই ব্ৰাহ্মণ মহাসংকটত পৰিল।
Verse 6
स बुद्धिश्रुतिसम्पन्नस्तं दृष्टवातीव भीषणम् | सामैवास्मिन् प्रयुयुजे न मुमोह न विव्यथे,ब्राह्मणकी बुद्धि तो अच्छी थी ही, वह शास्त्रोंका विद्वान् भी था। इसलिये उस अत्यन्त भयानक राक्षसको देखकर भी वह न तो घबराया और न व्यथित ही हुआ। बल्कि उसके प्रति उसने साम नीतिका ही प्रयोग किया
সেই ব্ৰাহ্মণ বুদ্ধি আৰু শ্রুতি (শাস্ত্ৰজ্ঞান)ত সম্পন্ন আছিল। সেয়ে সেই অতি ভয়ংকৰ ৰাক্ষসক দেখি সি ন মোহিত হ’ল, ন বিচলিত হ’ল। বৰঞ্চ সি তাৰ প্ৰতি সামনীতিয়েই প্ৰয়োগ কৰিলে।
Verse 7
रक्षस्तु वाचं सम्पूज्य प्रश्न॑ पप्रच्छ तं द्विजम् मोक्ष्यसे ब्रूहि मे प्रश्न केनास्मि हरिण: कृश:,राक्षसने ब्राह्मणके शान्तिमय वचनोंकी प्रशंसा करके उनके सामने अपना प्रश्न उपस्थित किया और कहा--'यदि मेरे प्रश्नका उत्तर दे दोगे तो तुम्हें छोड़ दूँगा! बताओ, मैं किस कारणसे अत्यन्त दुर्बल और सफेद (पाण्डु) हो गया हूँ!
ভীষ্ম ক’লে—ৰাক্ষসে ব্ৰাহ্মণৰ শান্তিময় বাক্য সন্মান কৰি সেই দ্বিজক প্ৰশ্ন কৰিলে—“তুমি মোৰ প্ৰশ্নৰ উত্তৰ দিলে মই তোমাক মুক্তি দিম। কোৱা—কোন কাৰণে মই হৰিণৰ দৰে অতিশয় কৃশ আৰু পাণ্ডুৰ (ফেকা/ধৱল) হৈ পৰিলোঁ?”
Verse 8
मुहूर्तमथ संचिन्त्य ब्राह्मणस्तस्य रक्षस: । आभिर्गाथाभिरव्यग्र: प्रश्न प्रतिजगाद ह,यह सुनकर ब्राह्मणने दो घड़ीतक विचार करके शान्तभावसे निम्नांकित गाथाओं (वचनोंद्वारा) उस राक्षसके प्रश्नका उत्तर देना आरम्भ किया
এই কথা শুনি ব্ৰাহ্মণে কিছুক্ষণ চিন্তা কৰিলে; তাৰ পিছত অব্যগ্ৰ আৰু শান্তচিত্তে এই গাথাসমূহৰ দ্বাৰা সেই ৰাক্ষসৰ প্ৰশ্নৰ উত্তৰ দিবলৈ আৰম্ভ কৰিলে।
Verse 9
ब्राह्मण उवाच विदेशस्थो विलोकस्थो विना नूनं सुहृज्जनै: । विषयानतुलान् भुड्क्षे तेनासि हरिण: कृश:,ब्राह्मण बोला--राक्षस! निश्चय ही तुम सुहृद्जनोंसे अलग होकर परदेशमें दूसरे लोगोंके साथ रहते और अनुपम विषयोंका उपभोग करते हो; इसीलिये चिन्ताके कारण तुम दुबले एवं सफेद होते जा रहे हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—“হে ৰাক্ষস! নিশ্চয় তুমি সুহৃদজনৰ পৰা বিচ্ছিন্ন হৈ বিদেশত অচিনাকী লোকৰ মাজত বাস কৰি অতুল বিষয়ভোগ উপভোগ কৰিছা; সেইবাবে অন্তৰ্চিন্তাৰ ভাৰতে তুমি হৰিণৰ দৰে কৃশ আৰু পাণ্ডুৰ হৈ পৰিছা।”
Verse 10
नूनं मित्राणि ते रक्ष: साधूपचरितान्यपि । स्वदोषादपरज्यन्ते तेनासि हरिण: कृशः,सामनीतिकी विजय निशाचर! तुम्हारे मित्र तुम्हारे द्वारा भलीभाँति सम्मानित होनेपर भी अपने स्वभावदोषके कारण तुमसे विमुख रहते हैं; इसीलिये तुम चिन्तावश दुबले होकर सफेद पड़ते जा रहे हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—“হে নিশাচৰ! তুমি তেওঁলোকক সৎকাৰ কৰিলেও, তোমাৰ মিত্ৰসকল নিজৰ স্বভাৱদোষৰ বাবে তোমাৰ পৰা বিমুখ হয়; সেইবাবে তুমি হৰিণৰ দৰে কৃশ আৰু পাণ্ডুৰ হৈ পৰিছা।”
Verse 11
धनैश्वर्याधिका: स्तब्धास्त्वद्गुणै: परमावरा: । अवजानन्ति नून॑ त्वां तेनासि हरिण: कृश:,जो गुणोंमें तुम्हारी अपेक्षा निम्नश्रेणीके हैं, वे जड मनुष्य भी धन और ऐश्वर्यमें अधिक होनेके कारण निश्चय ही सदा तुम्हारी अवहेलना किया करते हैं; इसीलिये तुम दुर्बल और सफेद (पीले) होते जा रहे हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—“গুণত তোমাৰ তুলনাত অতি নীচ লোকসকলেও ধন-ঐশ্বৰ্যত অধিক হোৱাৰ গৰ্বত নিশ্চয় তোমাক অবজ্ঞা কৰে; সেই অবমাননাৰ ভাৰতে তুমি হৰিণৰ দৰে কৃশ আৰু পাণ্ডুৰ হৈ পৰিছা।”
Verse 12
गुणवान् विगुणानन्यान् नूनं पश्यसि सत्कृतान् । प्राज्ञो5प्राज्ञान् विनीतात्मा तेनासि हरिण: कृश:,तुम गुणवान्, विद्वान् एवं विनीत होनेपर भी सम्मान नहीं पाते और गुणहीन तथा मूढ़ व्यक्तियोंको सम्मानित होते देखते हो; इसीलिये तुम्हारे शरीरका रंग फीका पड़ गया है और तुम दुर्बल हो गये हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—“নিশ্চয় তুমি দেখিছা, গুণহীন লোক সন্মান পায়, কিন্তু গুণবান লোক উপেক্ষিত হয়। তুমি জ্ঞানী আৰু সংযত হৈও অজ্ঞানক আদৰ পোৱা দেখিছা; সেই অন্যায়ৰ বোজাত তুমি হৰিণৰ দৰে ফেঁকাই আৰু কৃশ হৈ পৰিছা।”
Verse 13
अवृत्त्या क्लिश्यमानो<पि वृत्त्युपायान् विगर्हयन् | माहात्म्याद् व्यथसे नूनं तेनासि हरिण: कृश:,जीवन-निर्वाहका कोई उपाय न होनेसे तुम क्लेश उठाते होगे, किंतु अपने गौरवके कारण जीविकाके प्रतिग्रह आदि उपायोंकी निन्दा करते हुए उन्हें स्वीकार नहीं करते होगे। यही तुम्हारी उदासी और दुर्बलताका कारण है
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—“জীৱিকাৰ কোনো উপায় নথকাৰ বাবে তুমি ক্লেশ পাইছা; তথাপি জীৱন-নিৰ্বাহৰ উপলব্ধ উপায়সমূহক তুমি নিন্দা কৰিছা। নিজৰ গৌৰৱ আৰু মহত্ত্ববোধে তুমি সেই সহায় গ্ৰহণ নকৰা; সেয়ে তুমি ব্যথিত হৈ হৰিণৰ দৰে কৃশ হৈছা।”
Verse 14
सम्पीड्यात्मानमारर्यत्वात् त्वया कश्चिदुपस्कृत: । जितं त्वां मन्यते साधो तेनासि हरिण: कृश:,साधो! तुम सज्जनताके कारण अपने शरीरको कष्ट देकर भी जब किसीका उपकार करते हो; तब वह तुम्हें अपनी शक्तिसे पराजित समझता है; इसीलिये तुम कृशकाय और सफेद होते जा रहे हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—“সাধু! তোমাৰ আৰ্যত্বৰ বাবে তুমি নিজৰ দেহক কষ্ট দি হলেও যেতিয়া কাৰোবাৰ উপকাৰ কৰ, তেতিয়া সি ভাবে—সি যেন নিজৰ শক্তিৰে তোমাক জয় কৰিলে। সেই কাৰণেই তুমি হৰিণৰ দৰে কৃশ আৰু ফেঁকাই হৈ পৰিছা।”
Verse 15
क्लिश्यमानान् विमार्गेषु कामक्रोधावृतात्मन: । मन्ये त्वं ध्यायसि जनांस्तेनासि हरिण: कृश:,जिनका चित्त काम और क्रोधसे आक्रान्त है, अतएव जो कुमार्गपर चलकर कष्ट भोग रहे हैं। सम्भवत: ऐसे ही लोगोंके लिये तुम सदा चिन्तित रहते हो; इसीलिये दुर्बल होकर सफेद (पीले) पड़ते जा रहे हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—“যিসকলৰ অন্তঃকৰণ কাম আৰু ক্ৰোধে আচ্ছন্ন, আৰু যিসকলে কুপথে গৈ ক্লেশ ভোগ কৰিছে—মই ভাবোঁ তুমি সদায় তেনেকুৱা লোকৰ কথাই ধ্যান কৰিছা। সেই কাৰণেই তুমি হৰিণৰ দৰে কৃশ আৰু ফেঁকাই হৈছা।”
Verse 16
प्रज्ञासम्भावितो नूनमप्रजञ्जैरुपसंहित: । हीयमानो$सि दुर्वत्तैस्तेनासि हरिण: कृश:,यद्यपि तुम अपनी उत्तम बुद्धिके द्वारा सम्मानके योग्य हो तो भी अज्ञानी पुरुष तुम्हारी हँसी उड़ाते हैं और दुराचारी मनुष्य तुम्हारा तिरस्कार करते हैं। इसी चिन्तासे तुम्हारा शरीर सूखकर पीला पड़ता जा रहा है
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—“নিশ্চয় তুমি তোমাৰ প্ৰজ্ঞাৰ বাবে সন্মানৰ যোগ্য; কিন্তু তুমি বিবেচনাহীন লোকৰ মাজত ঘেৰ খাই আছা। দুৰ্বৃত্তসকলৰ তিৰস্কাৰে তুমি সদায় ক্ষীণ হৈছা; সেই চিন্তাৰ ফলতেই তুমি হৰিণৰ দৰে কৃশ আৰু ফেঁকাই হৈ পৰিছা।”
Verse 17
नूनं मित्रमुख: शत्रु: कश्चिदार्यवदाचरन् । वज्चयित्वा गतस्त्वां वै तेनासि हरिण: कृश:,निश्चय ही कोई शत्रु मुँहसे मित्रताकी बातें करता हुआ आया, श्रेष्ठ पुरुषके समान बर्ताव करने लगा और तुम्हें ठगकर चला गया; इसीलिये तुम दुर्बल और सफेद होते जा रहे हो
নিশ্চয় কোনো শত্রু মিত্ৰৰ মুখ ধৰি তোমাৰ ওচৰলৈ আহিছিল—হিতৈষীৰ দৰে কথা কৈ, আৰ্যজনৰ দৰে আচৰণ দেখাই। তোমাক ঠগি সি গুচি গ’ল; সেয়ে তুমি হৰিণৰ দৰে কৃশ আৰু ফেঁকাই পৰিছা।
Verse 18
प्रकाशार्थगतिर्नूनं रहस्यकुशल: कृती । तज्ज्ैर्न पूज्यसे नूनं तेनासि हरिण: कृश:,तुम्हारी अर्थगति--कार्यपद्धति सबको विदित है, तुम रहस्यकी बातें समझानेमें कुशल और दिद्दान् हो तो भी गुणज्ञ पुरुष तुम्हारा आदर नहीं करते हैं; इसीसे तुम सफेद और दुर्बल हो रहे हो
তোমাৰ অৰ্থগতি—কাৰ্যপদ্ধতি—সকলৰে আগত প্ৰকাশ; তুমি গূঢ় বিষয়ত কুশল আৰু প্ৰাজ্ঞ, তথাপি গুণজ্ঞানীসকলে তোমাক সন্মান নকৰে। সেইবাবেই তুমি হৰিণৰ দৰে ফেঁকাই আৰু কৃশ হৈ পৰিছা।
Verse 19
असत्स्वपि निविष्ठेषु ब्रुवतो मुक्तसंशयम् । गुणास्ते न विराजन्ते तेनासि हरिण: कृश:,तुम दुराग्रही दुष्ट पुरुषोंके बीचमें ही संशयरहित होकर उत्तम बात कहते हो, तो भी तुम्हारे गुण वहाँ प्रकाशित नहीं होते; इसीलिये तुम दुर्बल होते और फीके पड़ते जा रहे हो
দুৰ্জনৰ মাজত থাকিও তুমি সন্দেহমুক্ত হৈ উত্তম কথা কোৱা; তথাপি তাত তোমাৰ গুণ প্ৰকাশ নাপায়। সেইবাবে তুমি হৰিণৰ দৰে কৃশ হৈ, দীপ্তি হেৰুৱাইছা।
Verse 20
धनबुद्धिश्रुतैहीन: केवल तेजसान्वित: । महत प्रार्थयसे नूनं तेनासि हरिण: कृश:,अथवा यह भी हो सकता है कि तुम धन, बुद्धि और विद्यासे हीन होकर भी केवल शारीरिक शक्तिसे सम्पन्न होकर ऊँचा पद चाहते रहे हो और इसमें तुम्हें सफलता न मिली हो; इसीलिये तुम पाण्डुवर्णके हो गये हो और तुम्हारा शरीर भी सूखता जा रहा है
ধন, বুদ্ধি আৰু বিদ্যাৰ অভাৱ থাকিও কেৱল দেহতেজেৰে সমৃদ্ধ হৈ তুমি নিশ্চয় কোনো মহান পদ কামনা কৰিছিলা। সেয়া নাপাই তুমি ফেঁকাই পৰিছা আৰু দেহো ক্ষয় পাইছে।
Verse 21
तपः:प्रणिहितात्मानं मन्ये त्वारण्यकाड्क्षिणम् । बान्धवा नाभिनन्दन्ति तेनासि हरिण: कृश:,मुझे यह भी जान पड़ता है कि तुम्हारा मन तपस्यामें लगा है और इसलिये तुम जंगलमें रहना चाहते हो, परंतु तुम्हारे भाई-बन्धु इस बातको पसंद नहीं करते हैं; इसीलिये तुम सफेद और दुर्बल हो गये हो
মই ভাবোঁ তোমাৰ অন্তৰাত্মা তপস্যাত নিবিষ্ট; সেইবাবে তুমি অৰণ্যবাস কামনা কৰিছা। কিন্তু তোমাৰ বান্ধৱসকলে ইয়াক অনুমোদন নকৰে। সেয়েহে তুমি হৰিণৰ দৰে ফেঁকাই আৰু কৃশ হৈ পৰিছা।
Verse 22
(सुदुर्विनीत: पुत्रो वा जामाता वा प्रमार्जक: । दारा वा प्रतिकूलास्ते तेनासि हरिण: कृश: ।। अथवा यह भी सम्भव है कि तुम्हारा पुत्र दुर्विनीत--उद्दण्ड हो, या दामाद घरकी सारी सम्पत्ति झाड़-पोंछकर ले जानेवाला हो या तुम्हारी पत्नी प्रतिकूल स्वभावकी हो; इसीसे तुम कृशकाय और पीले होते जा रहे हो ।। भ्रातरो5तीव विषमा: पिता वा क्षुत्क्षतों मृत: । माता ज्येष्ठो गुरुर्वापि तेनासि हरिण: कृश: ।। तुम्हारे भाई बड़े बेईमान हों अथवा तुम्हारे पिता, माता या ज्येष्ठ भाई एवं गुरुजन भूखसे दुर्बल होकर मर गये हों, इस बातकी भी सम्भावना है। शायद इसीसे तुम्हारे शरीरका रंग सफेद हो गया है और तुम सूखते चले जा रहे हो ।। ब्राह्मणो वा हतो गौर्वा ब्रह्मस्वं वा हृतं पुरा । देवस्वं वाधिकं काले तेनासि हरिण: कृश: ।। अथवा यह भी अनुमान होता है कि पहले तुमने किसी ब्राह्मण या गौकी हत्या की हो, किसी ब्राह्मण या देवताका किसी समय अधिक-से-अधिक धन चुरा लिया हो, इसीलिये तुम कृशकाय और पीले हो रहे हो ।। ह्ृतदारो<थ वृद्धो वा लोके द्विष्टोडथ वा नरै: । अविज्ञानेन वा वृद्धस्तेनासि हरिण: कृश: ।। यह भी सम्भव है कि तुम्हारी स्त्रीका किसीने अपहरण कर लिया हो। अथवा तुम बूढ़े हो चले हो या जगतके मनुष्य तुमसे द्वेष करने लगे हों। अथवा अज्ञानके द्वारा ही तुम बढ़े- चढ़े हो और इसीलिये चिन्ताके कारण तुम्हारा शरीर सफेद तथा दुर्बल हो गया हो ।। वार्थक्यार्थ धन दृष्ट््वा स्वां श्रीर्वापि परै््ठता । वृत्तिर्वा दुर्जनापेक्षा तेनासि हरिण: कृश: ।।) बुढ़ापेके लिये तुम्हारे पास धनका संग्रह देखकर दूसरोंने तुम्हारी उस निजी सम्पत्तिका अपहरण कर लिया हो अथवा जीविकाके लिये दुष्ट पुरुषोंकी अपेक्षा रखनी पड़ती हो, इसकी भी सम्भावना जान पड़ती है। शायद इसी चिन्तासे तुम्हारा शरीर दुबला होता और पीला पड़ता जा रहा हो ।। इष्टभार्यस्य ते नूनं प्रातिवेश्यो महाधन: । युवा सुललित: कामी तेनासि हरिण: कृश:,यह भी सम्भव है कि तुम्हारी स्त्री परम सुन्दरी होनेके कारण तुम्हें बहुत प्रिय हो और तुम्हारे पड़ोसमें ही कोई बहुत सुन्दर, महाधनी और कामी नवयुवक निवास करता हो! इसी चिन्तासे तुम दुबले और पीले पड़ते जा रहे हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে— “সম্ভৱত তোমাৰ পুত্ৰ দুৰ্বিনীত; বা জোঁৱাই ঘৰৰ ধন-সম্পদ ‘ঝাড়ু মাৰি’ সাফ কৰি লৈ যোৱা ধৰণৰ; বা তোমাৰ পত্নী প্ৰতিকূল স্বভাৱৰ—সেই কাৰণেই, হে হৰিণ, তুমি কৃশ আৰু ফেঁকাছা হৈ পৰিছা। অথবা তোমাৰ ভ্ৰাতাসকল অত্যন্ত কুটিল; বা পিতা ভোকত ক্ষীণ হৈ মৃত্যুবৰণ কৰিছে; বা মাতা, জ্যেষ্ঠ ভ্ৰাতা বা গুৰুজনো তেনেদৰে পৰলোকগামী—সেই কাৰণেই তুমি কৃশ আৰু ফেঁকাছা। অথবা একদা তুমি কোনো ব্ৰাহ্মণ বা গাই হত্যা কৰিছা; বা আগতে ব্ৰাহ্মণ-ধন হৰণ কৰিছা; বা কোনো সময়ত দেবস্ব অধিককৈ গ্ৰহণ কৰিছা—সেই কাৰণেই তুমি কৃশ আৰু ফেঁকাছা। অথবা তোমাৰ পত্নী অপহৃত; বা তুমি বাৰ্ধক্যলৈ গৈছা; বা লোকজনে তোমাক ঘৃণা কৰিবলৈ ধৰিছে; বা অজ্ঞানতাই তোমাক ‘বঢ়াই’ তুলিছে—সেই কাৰণেই তুমি কৃশ আৰু ফেঁকাছা। অথবা বাৰ্ধক্যৰ বাবে সঞ্চিত ধন দেখি আন লোকে তোমাৰ নিজৰ শ্ৰী-সম্পদ কেঢ়ি লৈছে; বা জীৱিকাৰ বাবে দুষ্ট লোকৰ ওপৰত নিৰ্ভৰ কৰিবলগীয়া হৈছে—সেই কাৰণেই তুমি কৃশ আৰু ফেঁকাছা। অথবা নিশ্চয়, তোমাৰ প্ৰিয় পত্নীৰ কাৰণে তোমাৰ ওচৰতেই কোনো মহাধনী—যুৱক, সুদৰ্শন আৰু কামুক—বাস কৰে; সেই কাৰণেই, হে হৰিণ, তুমি কৃশ আৰু ফেঁকাছা হৈ পৰিছা।”
Verse 23
नूनमर्थवतां मध्ये तव वाक्यमनुत्तमम् । न भाति काले5भिहितं तेनासि हरिण: कृश:
“নিশ্চয় জ্ঞানীসকলৰ কথাৰ মাজত তোমাৰ বাক্য অনুত্তম; কিন্তু অসময়ত কোৱা বাবে সি দীপ্তি নাপায়—সেই কাৰণেই, হে হৰিণ, তুমি কৃশ হৈ পৰিছা।”
Verse 24
निश्चय ही तुम धनवानोंके बीच परम उत्तम और समयोचित बात कहते होगे, किंतु वह उन्हें पसंद न आती होगी। इसीलिये तुम सफेद और दुर्बल हो रहे हो ।। दृढपूर्व श्रुतं मूर्ख कुपितं हृदयप्रियम् । अनुनेतुं न शकनोषि तेनासि हरिण: कृश:,तुम्हारा कोई पहलेका दृढ़ निश्चयवाला प्रिय व्यक्ति मूर्खताके कारण तुमपर कुपित हो गया होगा और तुम उसे किसी तरह समझा-बुझाकर शान्त नहीं कर पाते होगे। इसीलिये तुम दुर्बल और फीके पड़ते जा रहे हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে— “তোমাৰ কোনো প্ৰিয়জন—যি আগতে দৃঢ় সংকল্পৰ আৰু বহুদিনৰ পৰিচিত—মূৰ্খতাৰ বশে তোমাৰ ওপৰত ক্ৰুদ্ধ হৈছে। তুমি সান্ত্বনা আৰু বিনয়েৰে তাক শান্ত কৰি পুনৰ আপোন কৰিব নোৱাৰা—সেই কাৰণেই, হে হৰিণ, তুমি কৃশ আৰু ফেঁকাছা হৈ পৰিছা।”
Verse 25
नूनमासंजयित्वा त्वां कृत्ये कम्मिंश्विदीप्सिते । कश्चिदर्थयते नित्यं तेनासि हरिण: कृश:,निश्चय ही कोई मनुष्य अपनी इच्छाके अनुसार किसी अभीष्ट कार्यमें नियुक्त करके सदा अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है; इसीलिये तुम श्वेत (पीत) वर्णके और दुबले हो रहे हो
“নিশ্চয় কোনোবাই তোমাক কোনো ইচ্ছিত কামত নিয়োগ কৰি নিতৌ নিজৰ স্বাৰ্থ সিদ্ধ কৰিব খোজে—সেই কাৰণেই, হে হৰিণ, তুমি কৃশ আৰু ফেঁকাছা হৈ পৰিছা।”
Verse 26
नून॑ त्वां सुगुणर्युक्ते पूजयानं सुह्ृद्ध्रुवम् । ममार्थ इति जानीते तेनासि हरिण: कृश:,अवश्य ही तुम सदगुणोंसे युक्त होनेके कारण दूसरे लोगोंद्वारा पूजित होते हो; परंतु तुम्हारा मित्र समझता है कि यह मेरे ही प्रभावसे आदर पा रहा है। इसीलिये तुम चिन्तासे दुर्बल एवं पीले होते जा रहे हो
“নিশ্চয়, সৎগুণেৰে যুক্ত হোৱাৰ বাবে লোকসকলে তোমাক পূজা-সম্মান কৰে; কিন্তু তোমাৰ বন্ধু দৃঢ়ভাৱে ভাবে—‘এই আদৰ মোৰ প্ৰভাৱৰ বাবেই।’ সেই চিন্তাত, হে হৰিণ, তুমি কৃশ আৰু ফেঁকাছা হৈ পৰিছা।”
Verse 27
अन्तर्गतमभिप्रायं नूनं नेच्छसि लज्जया । विवेक्तुं प्राप्तिशैथिल्यात् तेनासि हरिण: कृश:,निश्चय ही तुम लज्जावश किसीपर अपना आन्तरिक अभिप्राय नहीं प्रकट करना चाहते, क्योंकि तुम्हें अपनी अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिके विषयमें संदेह है, इसीलिये चिन्तावश सूखते और पीले पड़ते जा रहे हो
নিশ্চয় লাজৰ বশত তুমি হৃদয়ত লুকাই থকা অভিপ্ৰায় প্ৰকাশ কৰিব নোখোজা। ইষ্ট বস্তু লাভ হ’ব নে নহ’ব—এই সন্দেহে তোমাৰ সংকল্প শিথিল হৈছে; সেয়েহে, হে হৰিণ, তুমি চিন্তাত ক্ষীণ হৈ পৰিছা।
Verse 28
नानाबुद्धिरुचो लोके मनुष्यान् नूनमिच्छसि । ग्रहीतुं स्वगुणै: सर्वास्तेनासि हरिण: कृश:,निश्चय ही संसारमें नाना प्रकारकी बुद्धि और भिन्न-भिन्न रुचि रखनेवाले लोग रहते हैं। उन सबको तुम अपने गुणोंसे वशमें करना चाहते हो। इसीलिये क्षीणकाय और पाण्डुवर्णके हो रहे हो
নিশ্চয় এই জগতত নানা বুদ্ধি আৰু ভিন্ন ভিন্ন ৰুচি থকা মানুহক তুমি নিজৰ গুণেৰে সকলোকে আকর্ষণ কৰি বশ কৰিব খোজা। সেই প্ৰচেষ্টাৰ চাপত, হে হৰিণ, তুমি ক্ষীণ হৈ পৰিছা।
Verse 29
अविद्दान् भीरुरल्पार्थे विद्याविक्रमदानजम् । यशः प्रार्थयसे नूनं तेनासि हरिण: कृश:,अथवा यह भी हो सकता है कि तुम विद्वान् न होकर भी विद्यासे मिलनेवाले यशको पाना चाहते हो। डरपोक और कायर होनेपर भी पराक्रमजनित कीर्ति पानेकी अभिलाषा रखते हो और अपने पास बहुत थोड़ा धन होनेपर भी दानवीर होनेका यश पानेके लिये उत्सुक हो। इसीलिये कृुशकाय और पीले हो रहे हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—নিশ্চয় তুমি প্ৰকৃত বিদ্বান নহয়েও বিদ্যাজনিত যশ বিচাৰিছা। ভীৰু হয়েও বীৰ্যজনিত কীৰ্তি কামনা কৰিছা; আৰু অল্প ধন থাকিলেও মহাদাতা বুলি খ্যাতি পাবলৈ ব্যাকুল। সেয়েহে, হে হৰিণ, ভিতৰৰ সাৰ নথকাকৈ যশৰ লালসাই তোমাক ক্ষীণ আৰু ফ্যাকাশে কৰি তুলিছে।
Verse 30
चिराभिलषितं किंचित्फलमप्राप्तमेव ते । कृतमन्यैरपह्तं तेनासि हरिण: कृश:,तुमने कोई कार्य किया, जिसका चिरकालसे अभिलषित कोई फल तुम्हें प्राप्त होनेवाला था, किंतु तुम्हें तो वह प्राप्त हुआ नहीं और दूसरे लोग उसे हर ले गये। इसीलिये तुम्हारे शरीरकी कान्ति फीकी पड़ गयी है और दिनोंदिन दुबले होते जा रहे हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—যি ফল তুমি দীৰ্ঘদিন ধৰি কামনা কৰিছিলা, সেয়া তোমাৰ প্ৰাপ্য আছিল; কিন্তু তুমি তাক নাপালা। তুমি যি সাধন কৰিছিলা, আন লোকে সেয়া কেঢ়ি নিলে। সেয়েহে, হে হৰিণ, হতাশা আৰু ক্ষতিয়ে তোমাৰ দীপ্তি ম্লান কৰি তোমাক ক্ষীণ কৰি তুলিছে।
Verse 31
नूनमात्मकृतं दोषमपश्यन् किंचिदात्मन: । अकारणेड5भिशप्तोडसि तेनासि हरिण: कृश:,एक बात यह भी ध्यानमें आती है कि तुम्हें तो अपना कोई दोष दिखायी नहीं देता तथापि दूसरे लोग अकारण ही तुम्हें कोसते रहते हैं। शायद इसीलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल होते जा रहे हो
নিশ্চয় তুমি নিজৰ কৰা কোনো দোষ নিজৰ ভিতৰত নেদেখা; তথাপি লোকসকলে অকাৰণে তোমাক অভিশাপ দিয়ে থাকে। সেই কাৰণেই, হে হৰিণ, তুমি দীপ্তিহীন আৰু দুর্বল হৈ পৰিছা।
Verse 32
साधून् गृहस्थान् दृष्टवा च तथा साधून् वनेचरान् । मुक्तांक्षावसथे सक्तांस्तेनासि हरिण: कृश:,तुम विरक्त साधुओंको गृहस्थ, दुर्जनोंको वनवासी तथा संन्यासियोंको मठ-मन्दिरमें आसक्त देखते हो; इसीलिये सफेद और दुर्बल होते जा रहे हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—গৃহস্থসকলৰ মাজতো সাধুজনক, তেনেদৰে বনবাসী সাধুজনকো, আৰু বৈৰাগ্যৰ কথা কৈও ‘মুক্তি’ৰ আশ্ৰমত (মঠ-আশ্ৰমত) আসক্ত হৈ থকা লোকসকলক দেখি—হে হৰিণ, তুমি বিবৰ্ণ আৰু কৃশ হৈ পৰিছা।
Verse 33
सुह्दां दुःखमार्तानां न प्रमोक्ष्यसि चार्तिजम् । अलमर्थगुणैहीनं तेनासि हरिण: कृश:,तुम्हारे स्नेही बन्धु-बान्धव रोग आदिसे पीड़ित होकर महान् दुःख भोगते हैं और तुम उन्हें उस पीड़ाजनित कष्टसे मुक्त नहीं कर पाते हो तथा अपने आपको भी तुम अर्थ-लाभसे हीन पाते हो; शायद इसीलिये तुम सफेद और दुबले-पतले हो गये हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—তোমাৰ সুহৃদ আৰু স্নেহীজন দুঃখত আর্ত; কিন্তু তুমি তেওঁলোকক সেই আর্তিজনিত বেদনাৰ পৰা মুক্ত কৰিব নোৱাৰা। আৰু তুমি নিজকো অৰ্থ-সামৰ্থ্য আৰু লাভ-গুণৰ অভাৱত দেখিছা; সেয়েহে, হে হৰিণ, তুমি বিবৰ্ণ আৰু কৃশ হৈছা।
Verse 34
धर्म्यमर्थ्य च काम्यं च काले चाभिटह्तितं वच: । न प्रतीयन्ति ते नूनं तेनासि हरिण: कृश:,तुम्हारी बातें धर्म, अर्थ और कामके अनुकूल एवं सामयिक होती हैं, तो भी दूसरे लोग उनपर ठीक विश्वास नहीं करते हैं। इसलिये तुम कान्तिहीन एवं कृशकाय हो रहे हो
তোমাৰ বাক্য ধাৰ্মিক, অৰ্থসাধক আৰু কাম্য, লগতে সময়োচিত; তথাপি লোকসকলে তাত সত্য বিশ্বাস স্থাপন নকৰে। সেয়েহে, হে হৰিণ, তুমি কান্তিহীন আৰু কৃশ হৈছা।
Verse 35
दत्तानकुशलैरर्थान् मनीषी संजिजीविषु: । प्राप्प वर्तयसे नूनं तेनासि हरिण: कृश:,मनीषी होनेपर भी तुम जीवन-निर्वाहकी इच्छासे ही अज्ञानी पुरुषोंके दिये हुए धनको लेकर उसीपर गुजारा करते हो; इसीलिये तुम कान्तिहीन और दुर्बल हो
ব্ৰাহ্মণে ক’লে—তুমি মেধাৱী হ’লেও, জীৱনধাৰণৰ ইচ্ছাত, অকুশল আৰু অবিবেচী লোকৰ দিয়া ধন গ্ৰহণ কৰি সেইটোৰ ওপৰতেই নিৰ্ভৰ কৰি চলিছা। সেয়েহে, হে হৰিণ, তুমি কান্তিহীন আৰু দুৰ্বল হৈছা।
Verse 36
पापात् प्रवर्धतो दृष्टया कल्याणानावसीदत: । ध्रुवं गर्हयसे नित्यं तेनासि हरिण: कृश:,पापियोंको आगे बढ़ते और कल्याणकारी कर्मोमें लगे हुए पुण्यात्मा पुरुषोंको दुःख उठाते देखकर अवश्य ही तुम सदा इस परिस्थितिकी निन््दा करते हो; इसीलिये दुर्बल और पाण्डुवर्णके हो गये हो
পাপ বৃদ্ধি পোৱা দেখি, আৰু কল্যাণকৰ কৰ্মত ৰত পুণ্যবান লোকসকলক অৱনত হৈ দুঃখ ভোগ কৰা দেখি, তুমি নিশ্চয়েই এই অৱস্থাক বাৰে বাৰে গৰিহণা দিয়া। সেই নিৰন্তৰ অন্তৰ্দাহৰ ফলতেই, হে হৰিণ, তুমি কৃশ আৰু বিবৰ্ণ হৈছা।
Verse 37
परस्परविरुद्धानां प्रियं नूनं चिकीर्षसि । सुहृदामुपरोधेन तेनासि हरिण: कृश:,एक दूसरेसे विरोध रखनेवाले अपने सुहृदोंको रोककर तुम निश्चय ही उनका प्रिय करना चाहते हो; इसीलिये चिन्ताके कारण श्रीहीन और दुर्बल हो गये हो
নিশ্চয় তুমি পৰস্পৰবিৰোধী লোকসকলক প্ৰিয় কৰিবলৈ বিচাৰিছা। তেওঁলোকৰ বাবে নিজৰ সুহৃদসকলক নিবৃত্ত কৰি তুমি উদ্বেগৰ ভাৰতে হৰিণৰ দৰে কৃশ আৰু দুৰ্বল হৈ পৰিছা।
Verse 38
श्रोत्रियांश्व विकर्मस्थान् प्राज्ञांक्षाप्पजितेन्द्रियान् । मन्येडनुध्यायसि जनांस्तेनासि हरिण: कृश:
মোৰ ধাৰণা, তুমি সেইসকল লোকৰ কথা বাৰে বাৰে ভাবি থাকো—যিসকল বেদজ্ঞ হৈও বিকৰ্মত লিপ্ত; যদিও তেওঁলোক প্ৰাজ্ঞ, সহিষ্ণু আৰু ইন্দ্ৰিয়জয়ী। তেওঁলোকৰ চিন্তাত মন ৰৈ থাকি তুমি হৰিণৰ দৰে কৃশ হৈ পৰিছা।
Verse 123
इस प्रकार श्रीमह्या भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शाण्डिली और सुमनाका संवादविषयक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ অন্তৰ্গত দানধৰ্মপৰ্বত শাণ্ডিলী আৰু সুমনাৰ সংলাপবিষয়ক একশ তেইশতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।
Umā asks how dharma is defined (kiṃ-lakṣaṇa) and how it can be practiced by humans; the response frames dharma as concrete virtues and disciplined, role-appropriate conduct.
Dharma is presented as a practicable set: non-violence, truthful speech, compassion toward all beings, self-restraint, and proportionate charity, with household life treated as a prime site for ethical accumulation.
Yes; Śiva argues that medhyatā (ritual aptness) is not reducible to sensory cleanliness—śmaśāna is portrayed as spiritually potent and worthy of veneration by those seeking purity through doctrinal understanding.