Adhyaya 101
Anushasana ParvaAdhyaya 10167 Verses

Adhyaya 101

Āloka-dāna (Dīpa-dāna), Sumanas–Dhūpa–Dīpa Phala: Manu–Suvarṇa and Śukra–Bali Exempla

Upa-parva: Dāna-dharma (Gifts of fragrance, incense, and light) — Āloka-dāna / Dīpa-dāna discourse

The chapter opens with Yudhiṣṭhira asking Bhīṣma to define āloka-dāna (gift of light), its origin, and its fruit. Bhīṣma replies by introducing an ancient narrative: the ascetic Suvarṇa approaches Manu on Meru and asks about worship with flowers (sumanas) and the resulting merit. Manu, in turn, cites an older dialogue between Śukra and Bali that grounds the taxonomy of auspicious and inauspicious substances through the contrast of amṛta and viṣa, linking sensory qualities (especially fragrance) to psychological and moral effects. The discourse classifies flowers and plants by traits (thornless/thorny, color, habitat, cultivated/wild) and aligns offerings with recipients: gods are pleased by fragrance; yakṣa/rākṣasa by sight; nāgas by enjoyment; humans by all three. It then details incense types (resins, sarala, compounded forms) and recipient preferences (e.g., guggulu as especially esteemed). The teaching culminates in dīpa-dāna: light is praised as upward-leading and as a remedy for darkness; giving lamps yields radiance and auspicious status, while stealing lamps leads to deprivation. Practical injunctions include proper lamp materials, recommended locations for lamp-giving, and household bali offerings differentiated by recipient categories. The chapter closes by tracing the transmission lineage of the teaching (Śukra → Bali; Manu → Suvarṇa; Suvarṇa → Nārada; Nārada → Bhīṣma), reinforcing its canonical authority.

Chapter Arc: युधिष्ठिर भीष्म से पूछते हैं—‘आलोकदान’ (दीप/प्रकाश का दान) वास्तव में कैसा है और उसका फल क्या है? दानधर्म के सूक्ष्म भेदों में जिज्ञासा जाग उठती है। → भीष्म उत्तर को केवल उपदेश न रखकर ‘पुरातन इतिहास’ का आश्रय लेते हैं—प्रजापति मनु और ‘सुवर्ण’ नामक तपस्वी ब्राह्मण का संवाद। कथा में दान के विविध रूप (पुष्प, धूप, दीप, उपहार/बलि) और उनके विधि-नियम, सुगन्ध-द्रव्यों के प्रकार, तथा देवताओं के प्रसन्न/अप्रसन्न होने की शक्ति क्रमशः खुलती जाती है। → मुख्य प्रतिपादन तीव्र होता है—देवता मान-सम्मान और तृप्ति से मनुष्यों का कल्याण करते हैं, और अवज्ञा/उपेक्षा से अधमों को ‘दह’ देते हैं; इसी संदर्भ में पुष्पदान के गुण धूप-निवेदन पर भी समान रूप से लागू बताए जाते हैं, तथा विभिन्न भूत-नाग-देव-सम्बन्धी उपहार/बलि के विशिष्ट विधान (जैसे नागों के लिए पद्म-उत्पलयुक्त, गुड़-मिश्रित तिल) स्पष्ट किए जाते हैं। → कथा-परंपरा की शृंखला स्थापित होती है—शुक्राचार्य ने असुरेन्द्र बलि को यह धर्म कहा; मनु ने सुवर्ण को; सुवर्ण ने नारद को; और नारद ने वही गुण-धर्म भीष्म को—अब भीष्म युधिष्ठिर को उसे आचरण में उतारने का आग्रह करते हैं।

Shlokas

Verse 1

बी जम अष्टनवतितमोब् ध्याय: तपस्वी सुवर्ण और मनुका संवाद--पुष्प, धूप, दीप और उपहारके दानका माहात्म्य युधिछिर उवाच आलोकदानं नामैतत्‌ कीदृशं भरतर्षभ । कथमेतत्‌ समुत्पन्नं फलं वा तद्‌ ब्रवीहि मे,युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ) यह जो दीपदान नामक कर्म है, यह कैसे किया जाता है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? अथवा इसका फल क्‍या है? यह मुझे बताइये

যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—হে ভাৰতশ্ৰেষ্ঠ! ‘আলোকদান’ (দীপদান) নামৰ এই কৰ্ম কেনেকুৱা? ই কেনেকৈ সম্পাদন কৰা হয়? ইয়াৰ উৎপত্তি কেনেকৈ? আৰু ইয়াৰ ফল কি? মোক কওক।

Verse 2

भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । मनो: प्रजापतेर्वादं सुवर्णस्य च भारत,भीष्मजीने कहा--भारत! इस विषयमें प्रजापति मनु और सुवर्णके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है

ভীষ্মে ক’লে—হে ভাৰত! এই বিষয়তো এক প্ৰাচীন ইতিবৃত্তৰ উদাহৰণো কোৱা হয়—প্ৰজাপতি মনু আৰু সুৱৰ্ণৰ সংবাদ।

Verse 3

तपस्वी कश्चिदभवत्‌ सुवर्णो नाम भारत । वर्णतो हेमवर्ण: स सुवर्ण इति पप्रथे,भरतनन्दन! सुवर्णनामसे प्रसिद्ध एक तपस्वी ब्राह्मण थे। उनके शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी। इसीलिये वे सुवर्णनामसे विख्यात हुए थे

ভীষ্মে ক’লে— হে ভাৰতবংশধৰ! প্ৰাচীন কালত ‘সুৱৰ্ণ’ নামে এজন তপস্বী আছিল। তেওঁৰ বৰ্ণ সোণৰ দৰে দীপ্তিময় আছিল; সেইবাবে, হে ভৰতনন্দন, তেওঁ ‘সুৱৰ্ণ’ নামেই সৰ্বত্র প্ৰসিদ্ধ হৈছিল।

Verse 4

कुलशीलगुणोपेत: स्वाध्याये च परंगत: । बहून्‌ सुवंशप्रभवान्‌ समतीत: स्वकैर्गुणै:,वे उत्तम कुल, शील और गुणसे सम्पन्न थे। स्वाध्यायमें भी उनकी बड़ी ख्याति थी। वे अपने गुणोंद्वारा उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए बहुत-से श्रेष्ठ पुरुषोंकी अपेक्षा आगे बढ़े हुए थे

তেওঁ উত্তম কুল, শীল আৰু গুণে সমৃদ্ধ আছিল আৰু স্বাধ্যায়ত পৰম পাৰদৰ্শী আছিল। নিজৰ সৎগুণৰ বলতেই তেওঁ খ্যাতিমান বংশত জন্ম লোৱা বহু শ্ৰেষ্ঠ পুৰুষকো অতিক্ৰম কৰিছিল।

Verse 5

स कदाचिन्मनु विप्रो ददर्शोपससर्प च | कुशलप्रश्नमन्योन्यं तौ चोभौ तत्र चक्रतु:,एक दिन जन ब्राह्मणदेवताने प्रजापति मनुको देखा। देखकर वे उनके पास चले गये। फिर तो वे दोनों एक-दूसरेसे कुशल-समाचार पूछने लगे

এদিন সেই ব্ৰাহ্মণে প্ৰজাপতি মনুক দেখি তেওঁৰ ওচৰলৈ গ’ল। তাতে তেওঁলোক দুয়োজনে পৰস্পৰে কুশল-সংবাদ সুধিলে।

Verse 6

ततस्तौ सत्यसंकल्पौ मेरौ काउ्चनपर्वते । रमणीये शिलापृष्ठे सहितौ संन्यषीदताम्‌,तदनन्तर वे दोनों सत्यसंकल्प महात्मा सुवर्णमय पर्वत मेरके एक रमणीय शिलापृष्ठपर एक साथ बैठ गये

তাৰ পাছত সত্যসঙ্কল্প সেই দুয়ো মহাত্মা সোণালী মেৰু পৰ্বতৰ এক মনোৰম শিলাতলত একেলগে বহিল।

Verse 7

तत्र तौ कथयन्तौ स्तां कथा नानाविधाश्रया: । ब्रद्मर्षिदेवदैत्यानां पुराणानां महात्मनाम्‌,वहाँ वे दोनों ब्रह्मर्षियों, देवताओं, दैत्यों तथा प्राचीन महात्माओंके सम्बन्धमें नाना प्रकारकी कथा-वार्ता करने लगे

সেখানে তেওঁলোক দুয়োজনে নানা ধৰণৰ কথা-বতৰা কৰিছিল— ব্ৰহ্মৰ্ষি, দেৱতা, দৈত্য আৰু প্ৰাচীন মহাত্মাসকলৰ পুৰাণকথা সম্বন্ধে।

Verse 8

सुवर्णस्त्वब्रवीद्‌ वाक्‍्यं मनुं स्वायम्भुवं प्रति । हितार्थ सर्वभूतानां प्रश्न॑ मे वक्तुमहसि,उस समय सुवर्णने स्वायम्भुव मनुसे कहा--'प्रजापते! मैं एक प्रश्न करता हूँ, आप समस्त प्राणियोंके हितके लिये मुझे उसका उत्तर दीजिये। फूलोंसे जो देवताओंकी पूजा की जाती है, यह क्या है? इसका प्रचलन कैसे हुआ है? इसका फल क्या है और इसका उपयोग क्या है? यह सब मुझे बताइये”

ভীষ্মে ক’লে— তেতিয়া সুবৰ্ণে স্বয়ম্ভুৱ মনুক ক’লে— “সকলো প্ৰাণীৰ হিতৰ বাবে মোৰ এটা প্ৰশ্নৰ উত্তৰ আপুনি দিব লাগে। ফুলেৰে দেৱতাসকলক যি পূজা কৰা হয়, সেই প্ৰথা কি? ই কেনেকৈ প্ৰচলিত হ’ল? ইয়াৰ ফল কি, আৰু ইয়াৰ যথাৰ্থ উদ্দেশ্য কি? এই সকলো মোক কওক।”

Verse 9

सुमनोभिर्यदिज्यन्ते दैवतानि प्रजेश्वर । किमेतत्‌ कथमुत्पन्नं फलं योगं च शंस मे,उस समय सुवर्णने स्वायम्भुव मनुसे कहा--'प्रजापते! मैं एक प्रश्न करता हूँ, आप समस्त प्राणियोंके हितके लिये मुझे उसका उत्तर दीजिये। फूलोंसे जो देवताओंकी पूजा की जाती है, यह क्या है? इसका प्रचलन कैसे हुआ है? इसका फल क्या है और इसका उपयोग क्या है? यह सब मुझे बताइये”

“প্ৰজেশ্বৰ! সুগন্ধি ফুলেৰে যেতিয়া দেৱতাসকলক পূজা কৰা হয়, তেতিয়া এই প্ৰথাৰ প্ৰকৃত স্বৰূপ কি? ই কেনেকৈ উৎপন্ন হ’ল? ইয়াৰ ফল কি, আৰু ইয়াৰ যথোচিত প্ৰয়োগ কি? মোক স্পষ্টকৈ কওক।”

Verse 10

मनुर॒ुवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । शुक्रस्य च बलेश्रैव संवादं वै महात्मनो:,मनुजीने कहा--मुने! इस विषयमें विज्ञजन शुक्राचार्य और बलि--इन दोनों महात्माओंके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं

মনুৱে ক’লে— “এই বিষয়তো পণ্ডিতসকলে এটা প্ৰাচীন ইতিবৃত্ত উদাহৰণ দিয়ে— মহাত্মা শুক্ৰ আৰু বলিৰ সংলাপ।”

Verse 11

बलेवैंरोचनस्येह त्रैलोक्यमनुशासत: । समीपमाजगामाशु शुक्रो भूगुकुलोद्वह:,पहलेकी बात है, विरोचनकुमार बलि तीनों लोकोंका शासन करते थे। उन दिनों भुगुकुलभूषण शुक्र शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये

ভীষ্মে ক’লে— “বিৰোচনপুত্ৰ বলিয়ে যেতিয়া ত্ৰিলোক শাসন কৰি আছিল, তেতিয়া ভৃগুকুলৰ শ্ৰেষ্ঠ শুক্ৰ তৎক্ষণাৎ তেওঁৰ ওচৰলৈ আহিল।”

Verse 12

तमर्ध्यादिभिरभ्यर्च्य भार्गव॑ं सोडसुराधिप: । निषसादासने पश्चाद्‌ विधिवद्‌ भूरिदक्षिण:,पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले असुरराज बलिने भृगुपुत्र शुक्राचार्यको अर्घ्य आदि देकर उनकी विधिवत्‌ पूजा की और जब वे आसनपर बैठ गये, तब बलि भी अपने सिंहासनपर आसीन हुए

ভীষ্মে ক’লে— “অসুৰাধিপতি, বহুদক্ষিণা দানকাৰী বলিয়ে ভৃগুপুত্ৰ ভার্গৱ (শুক্ৰাচাৰ্য)-ক অৰ্ঘ্য আদি উপচাৰেৰে বিধিপূৰ্বক সন্মান কৰিলে। গুৰু আসনত বহাৰ পাছত বলিয়েও নিয়মানুসাৰে নিজৰ আসনত বহিল।”

Verse 13

कथेयमभवत् तत्र त्वया या परिकीर्तिता । सुमनोधूपदीपानां सम्प्रदाने फलं प्रति,वहाँ उन दोनोंमें यही बातचीत हुई, जिसे तुमने प्रस्तुत किया है। देवताओंको फूल, धूप और दीप देनेसे क्या फल मिलता है, यही उनकी वार्ताका विषय था। उस समय दैत्यराज बलिने कविवर शुक्रके सामने यह उत्तम प्रश्न उपस्थित किया

ভীষ্মে ক’লে—সেই ঠাইত তুমি যি বৰ্ণনা কৰিছা, ঠিক সেই কথোপকথনেই হৈছিল। দেৱতাসকললৈ পুষ্প, ধূপ আৰু দীপ অৰ্পণ কৰিলে যি ফল লাভ হয়, সেয়াই তেওঁলোকৰ আলোচনাৰ বিষয় আছিল। তেতিয়া দৈত্যৰাজ বলিয়ে কবিশ্ৰেষ্ঠ শুক্ৰৰ সন্মুখত এই উত্তম প্ৰশ্ন উত্থাপন কৰিলে।

Verse 14

ततः पप्रच्छ दैत्येन्द्र: कवीन्द्रं प्रश्रमुत्तमम्‌,वहाँ उन दोनोंमें यही बातचीत हुई, जिसे तुमने प्रस्तुत किया है। देवताओंको फूल, धूप और दीप देनेसे क्या फल मिलता है, यही उनकी वार्ताका विषय था। उस समय दैत्यराज बलिने कविवर शुक्रके सामने यह उत्तम प्रश्न उपस्थित किया

তাৰ পাছত দৈত্যেন্দ্ৰ বলিয়ে শ্ৰেষ্ঠ কবি-ঋষিক প্ৰশ্ন কৰিলে।

Verse 15

बलिस्वाच सुमनोधूपदीपानां किं फल ब्रह्मवित्तम । प्रदानस्य द्विजश्रेष्ठ तद्‌ भवान्‌ वक्तुमहति,बलिने पूछा--ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ) द्विजशिरोमणे! फूल, धूप और दीपदान करनेका क्या फल है? यह बतानेकी कृपा करें

বলিয়ে ক’লে—হে ব্ৰহ্মবিদ্যাত শ্ৰেষ্ঠ! হে দ্বিজশ্ৰেষ্ঠ! পুষ্প, ধূপ আৰু দীপ অৰ্পণ/দান কৰিলে কি ফল লাভ হয়? অনুগ্ৰহ কৰি কওক।

Verse 16

शुक्र उवाच तप: पूर्व समुत्पन्नं धर्मस्तस्मादनन्तरम्‌ । एतस्मिन्नन्तरे चैव वीरुदोषध्य एव च,शुक्राचार्यने कहा--राजन्‌! पहले तपस्याकी उत्पत्ति हुई है, तदनन्तर धर्मकी। इसी बीचमें लता और ओषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ है

শুক্ৰে ক’লে—হে ৰাজন! প্ৰথমে তপস্যাৰ উৎপত্তি হৈছিল, তাৰ পিছত ধৰ্মৰ। আৰু এই দুয়োৰ মাজৰ কালত লতা আৰু ঔষধিও প্ৰকাশ পাইছিল।

Verse 17

सोमस्यात्मा च बहुधा सम्भूत: पृथिवीतले । अमृतं च विषं चैव ये चान्ये तृतजातय:,इस भूतलपर अनेक प्रकारकी सोमलता प्रकट हुई। अमृत, विष तथा दूसरी-दूसरी जातिके वृणोंका प्रादुर्भाव हुआ

শুক্ৰে ক’লে—পৃথিৱীতলত সোমৰ সাৰ বহু ৰূপে প্ৰকাশ পাইছিল। তাৰ পৰাই অমৃত আৰু বিষ, আৰু আন আন নানা তৃণজাতিও উৎপন্ন হৈছিল।

Verse 18

अमृतं मनसः प्रीतिं सद्यस्तृप्तिं ददाति च । मनो ग्लपयते तीव्र विष॑ गन्धेन सर्वश:,अमृत वह है, जिसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। जो तत्काल तृप्ति प्रदान करता है और विष वह है जो अपनी गन्धसे चित्तमें सर्वथा तीव्र ग्लानि पैदा करता है

অমৃত মনলৈ প্ৰীতি আনে আৰু তৎক্ষণাৎ তৃপ্তি দান কৰে। কিন্তু বিষে নিজৰ গন্ধমাত্ৰেই মনক সৰ্বতোভাবে তীব্ৰ ক্লেশ আৰু গ্লানিত নিমজ্জিত কৰে।

Verse 19

अमृतं मंगलं विद्धि महद्विषममंगलम्‌ । ओपषघध्यो ह्ामृतं सर्वा विषं तेजोडग्निसम्भवम्‌,अमृतको मंगलकारी जानो और विष महान्‌ अमंगल करनेवाला है। जितनी ओषधियाँ हैं, वे सबन-की-सब अमृत मानी गयी हैं और विष अग्निजनित तेज है

অমৃতক মঙ্গলময় বুলি জানিবা, আৰু বিষক মহা অমঙ্গলকৰ বুলি জানিবা। সকলো ঔষধিক ‘অমৃত’ বুলি কোৱা হৈছে; আৰু বিষ হৈছে অগ্নিজাত তেজ।

Verse 20

मनो ह्वादयते यस्माच्छियं चापि दधाति च । तस्मात्‌ सुमनस: प्रोक्ता नरै: सुकृतकर्मभि:,फूल मनको आह्लाद प्रदान करता है और शोभा एवं सम्पत्तिका आधान करता है, इसलिये पुण्यात्मा मनुष्योंने उसे सुमन कहा है

যিহেতু ই মনক আহ্লাদিত কৰে আৰু শ্ৰী—শোভা আৰু সমৃদ্ধি—দান কৰে, সেয়েহে সুকৃতকৰ্মী লোকসকলে তাক ‘সুমন’ বুলি কৈছে।

Verse 21

देवताभ्य: सुमनसो यो ददाति नर: शुचि: । तस्य तुष्यन्ति वै देवास्तुष्टा: पुष्टिं ददत्यपि,जो मनुष्य पवित्र होकर देवताओंको फूल चढ़ाता है, उसके ऊपर सब देवता संतुष्ट होते और उसके लिये पुष्टि प्रदान करते हैं

যি শুচি মানুহে দেৱতাসকললৈ ফুল অৰ্পণ কৰে, তাতে দেৱতাসকল সন্তুষ্ট হয়; সন্তুষ্ট হৈ তেওঁলোকে তাক পুষ্টি আৰু সমৃদ্ধিও দান কৰে।

Verse 22

यं यमुद्दिश्य दीयेरन्‌ देव॑ सुमनस: प्रभो । मंगलार्थ स तेनास्य प्रीतो भवति दैत्यप,प्रभो! दैत्ययाज! जिस-जिस देवताके उद्देश्यसे फ़ूल दिये जाते हैं, वह उस पुष्पदानसे दातापर बहुत प्रसन्न होता और उसके मंगलके लिये सचेष्ट रहता है

হে প্ৰভু! যি যি দেৱতাক উদ্দেশ কৰি ফুল দিয়া হয়, সেই দেৱতা সেই পুষ্পদানে দাতাৰ প্ৰতি অতি প্ৰসন্ন হয় আৰু তাৰ মঙ্গলৰ বাবে সদা সচেষ্ট থাকে।

Verse 23

ज्ञेयास्तूग्राश्न सौम्याश्न॒ तेजस्विन्यश्न॒ ता: पृथक्‌ । ओषघध्यो बहुवीर्या हि बहुरूपास्तथैव च,उग्रा, सौम्या, तेजस्विनी, बहुवीर्या और बहुरूपा--अनेक प्रकारकी ओषधियाँ होती हैं। उन सबको जानना चाहिये

শুক্ৰই ক’লে—উগ্ৰ ফলদায়িনী, সৌম্য আৰু তেজস্বিনী—এই ভেদে ঔষধিসকলক পৃথককৈ স্পষ্টভাৱে চিনিব লাগে। ঔষধি বহু বীৰ্যসম্পন্ন আৰু বহুৰূপা; সেয়ে সিহঁতক যথাযথভাৱে বুজি ভেদ কৰি জনা উচিত।

Verse 24

यज्ञियानां च वृक्षाणामयज्ञीयान्‌ निबोध मे । आसुराणि च माल्यानि दैवतेभ्यो हितानि च

শুক্ৰই ক’লে—মোৰ পৰা জানিবা কোন কোন গছ যজ্ঞকাৰ্যত উপযুক্ত আৰু কোনবোৰ অনুপযুক্ত। লগতে কোন কোন পুষ্পমালা ‘আসুৰী’ স্বভাৱৰ বুলি গণ্য, আৰু কোনবোৰ দেৱতালৈ অৰ্পণ কৰিবলৈ হিতকৰ আৰু যথোচিত, সেয়াও বুজিবা।

Verse 25

अब यज्ञसम्बन्धी तथा अयज्ञोपयोगी वृक्षोंका वर्णन सुनो। असुरोंके लिये हितकर तथा देवताओंके लिये प्रिय जो पुष्पमालाएँ होती हैं, उनका परिचय सुनो ।। रक्षसामुरगाणां च यक्षाणां च तथा प्रिया: । मनुष्याणां पितृणां च कान्तायास्त्वनुपूर्वश:,राक्षस, नाग, यक्ष, मनुष्य और पितरोंको प्रिय एवं मनोरम लगनेवाली ओषधियोंका भी वर्णन करता हूँ, सुनो

শুক্ৰই ক’লে—এতিয়া যজ্ঞ-সম্পৰ্কীয় আৰু অযজ্ঞোপযোগী গছসমূহৰ বৰ্ণনা শুনা। অসুৰসকলৰ পক্ষে হিতকৰ আৰু দেৱতাসকলৰ প্ৰিয় যি পুষ্পমালা, সিহঁতৰ পৰিচয়ো শুনা। ক্ৰমে মই ৰাক্ষস, নাগ, যক্ষ, মানুহ আৰু পিতৃগণৰ প্ৰিয় আৰু মনোহৰ ঔষধি-উদ্ভিদসমূহৰ কথাও বৰ্ণনা কৰিম—শুনা।

Verse 26

वन्या ग्राम्याश्वेह तथा कृष्टोप्ता: पर्वताश्रया: । अकण्टका: कण्टकिनो गन्धरूपरसान्विता:,फूलोंके बहुत-से वृक्ष गाँवोंमें होते हैं और बहुत-से जंगलोंमें। बहुतेरे वृक्ष जमीनको जोतकर क्‍्यारियोंमें लगाये जाते हैं और बहुत-से पर्वत आदिपर अपने-आप पैदा होते हैं। इन वृक्षोंमें कुछ तो काँटेदार होते हैं और कुछ बिना काँटोंके। इन सबमें रूप, रस और गन्ध विद्यमान रहते हैं

শুক্ৰই ক’লে—কিছুমান গছ বনজ, কিছুমান গ্রাম্য (গাঁৱৰ ওচৰত চাষ কৰা)। কিছুমান মাটি চাষ কৰি ৰোপণ কৰা হয়, আৰু কিছুমান পৰ্বতাঞ্চলত স্বয়ং উদ্ভৱ হয়। ইয়াৰ কিছুমান কাঁটাবিহীন, কিছুমান কাঁটাযুক্ত; তথাপি সকলোতে গন্ধ, ৰূপ আৰু ৰস বিদ্যমান।

Verse 27

द्विविधो हि स्मृतो गन्ध इष्टोडनिष्ट श्व पुष्पज: । इष्टगन्धानि देवानां पुष्पाणीति विभावय,फूलोंकी गन्ध दो प्रकारकी होती है--अच्छी और बुरी। अच्छी गन्धवाले फूल देवताओंको प्रिय होते हैं। इस बातको ध्यानमें रखो

শুক্ৰই ক’লে—পুষ্পজাত গন্ধ দুবিধ বুলি স্মৃত: ইষ্ট (প্ৰিয়) আৰু অনিষ্ট (অপ্ৰিয়)। ভালদৰে বুজি ৰাখা—ইষ্টগন্ধযুক্ত সুগন্ধি পুষ্প দেৱতাসকলৰ প্ৰিয়।

Verse 28

अकण्टकानां वृक्षाणां श्वेतप्रायाश्व॒ वर्णत: । तेषां पुष्पाणि देवानामिष्टानि सततं प्रभो,(पद्म॑ च तुलसी जातिरपि सर्वेषु पूजिता ।) प्रभो! जिन वृक्षोंमें काँटे नहीं होते हैं, उनमें जो अधिकांश श्वेतवर्णवाले हैं, उन्हींके फूल देवताओंको सदैव प्रिय हैं। कमल, तुलसी और चमेली--ये सब फूलोंमें अधिक प्रशंसित हैं

শুক্ৰ ক’লে—প্ৰভু! কাঁটা-নথকা গছসমূহৰ ভিতৰত যিবোৰ অধিকাংশতে শ্বেতবৰ্ণ, সিহঁতৰ ফুল দেৱতাসকলৰ সদায় প্ৰিয়। পদ্ম আৰু তুলসী সকলো অৰ্ঘ্য-অৰ্পণত পূজ্য; আৰু মল্লিকা (জুঁই) ফুলৰ মাজত বিশেষ প্ৰশংসিত।

Verse 29

जलजानि च माल्यानि पद्मादीनि च यानि वै । गन्धर्वनागयक्षेभ्यस्तानि दद्याद्‌ विचक्षण:,जलसे उत्पन्न होनेवाले जो कमल-उत्पल आदि पुष्प हैं, उन्हें विद्वान्‌ पुरुष गन्धर्वों, नागों और यक्षोंको समर्पित करे

শুক্ৰ ক’লে—জলত জন্মা মালা আৰু পদ্ম আদি পুষ্প যিবোৰ আছে, সেয়া বিচক্ষণ পুৰুষে গন্ধৰ্ব, নাগ আৰু যক্ষসকললৈ অৰ্পণ কৰিব।

Verse 30

ओपषध्यो रक्तपुष्पाश्न कटुका: कण्टकान्विता: । शत्रूणामभिचारार्थमाथर्वेषु निदर्शिता:,अथर्ववेदमें बतलाया गया है कि शत्रुओंका अनिष्ट करनेके लिये किये जानेवाले अभिचार कर्ममें लाल फूलोंवाली कड़वी और कण्टकाकीर्ण ओषधियोंका उपयोग करना चाहिये

শুক্ৰ ক’লে—আথৰ্বণ পৰম্পৰাত দেখুওৱা হৈছে যে শত্রুৰ অনিষ্ট সাধনৰ অভিচাৰ কৰ্মত ৰক্তপুষ্পী, তিতা আৰু কাঁটাযুক্ত ঔষধিৰ ব্যৱহাৰ কৰা উচিত।

Verse 31

तीक्ष्णवीर्यस्ति भूतानां दुरालम्भा: सकण्टका: । रक्तभूयिष्ठवर्णाश्न कृष्णाश्वलैवोपहारयेत्‌,जिन फूलोंमें काँटे अधिक हों, जिनका हाथसे स्पर्श करना कठिन जान पड़े, जिनका रंग अधिकतर लाल या काला हो तथा जिनकी गन्धका प्रभाव तीव्र हो, ऐसे फूल भूत- प्रेतोंके काम आते हैं। अतः उनको वैसे ही फूल भेंट करने चाहिये

শুক্ৰ ক’লে—ভূত আদি সত্তাসকলৰ বাবে তীক্ষ্ণ প্ৰভাৱযুক্ত, ধৰা কষ্টকৰ, কাঁটাযুক্ত, আৰু অধিকাংশতে ৰঙা বা ক’লা বৰ্ণৰ ফুল অৰ্পণ কৰা উচিত।

Verse 32

मनोहृदयनन्दिन्यो विशेषमधुराश्च या: । चारुरूपा: सुमनसो मानुषाणां स्मृता विभो,प्रभो! मनुष्योंको तो वे ही फूल प्रिय लगते हैं, जिनका रूप-रंग सुन्दर और रस विशेष मधुर हो, तथा जो देखनेपर हृदयको आनन्ददायी जान पड़ें

শুক্ৰ ক’লে—হে বিভো! মানুহৰ বাবে সেই ফুলেই প্ৰিয় বুলি স্মৃত, যিয়ে মন আৰু হৃদয়ক আনন্দ দিয়ে, যাৰ মাধুৰ্য বিশেষ, আৰু যাৰ ৰূপ-ৰং মনোহৰ।

Verse 33

न तु श्मशानसम्भूता देवतायतनोद्भवा: । संनयेत्‌ पुष्टियुक्तेषु विवाहेषु रह:सु च,श्मशान तथा जीर्ण-शीर्ण देवालयोंमें पैदा हुए फूलोंका पौष्टिक कर्म, विवाह तथा एकान्त विहारमें उपयोग नहीं करना चाहिये

শ্মশানত গজা বা দেৱালয়-প্ৰাঙ্গণত উৎপন্ন ফুল পুষ্টিকৰ্মত, বিবাহত আৰু একান্ত ৰতি-বিহাৰত ব্যৱহাৰ কৰা উচিত নহয়।

Verse 34

गिरिसानुरुहा: सौम्या देवानामुपपादयेत्‌ । प्रोक्षिता< भ्युक्षिता: सौम्या यथायोग्यं यथास्मृति,पर्वतोंके शिखरपर उत्पन्न हुए सुन्दर और सुगन्धित पुष्पोंको धोकर अथवा उनपर जलके छींटे देकर धर्मशास्त्रोंमें बताये अनुसार उन्हें यथायोग्य देवताओंपर चढ़ाना चाहिये

পৰ্বতৰ শিখৰত গজা মনোহৰ আৰু সুগন্ধি ফুল ধুই বা তাত জল ছিটাই, স্মৃতিশাস্ত্ৰত কোৱা বিধি অনুসাৰে যথাযোগ্যভাৱে দেৱতাসকলক অৰ্পণ কৰা উচিত।

Verse 35

गन्धेन देवास्तुष्यन्ति दर्शनाद्‌ यक्षराक्षसा: । नागा: समुपभोगेन त्रिभिरेतैस्तु मानुषा:,देवता फूलोंकी सुगन्धसे, यक्ष और राक्षस उनके दर्शनसे, नागगण उनका भलीभाँति उपभोग करनेसे और मनुष्य उनके दर्शन, गन्ध एवं उपभोग तीनोंसे ही संतुष्ट होते हैं

দেৱতাসকল ফুলৰ সুগন্ধে তুষ্ট হয়, যক্ষ-ৰাক্ষসসকল কেৱল দৰ্শনত; নাগসকল সম্যক উপভোগত; আৰু মানুহ এই তিনিওতে—দৰ্শন, গন্ধ আৰু উপভোগত—সন্তুষ্ট হয়।

Verse 36

सद्यः प्रीणाति देवान्‌ वै ते प्रीता भावयन्त्युत । संकल्पसिद्धा मर्त्यानामीप्सितैश्व मनोरमै:,फूल चढ़ानेसे मनुष्य देवताओंको तत्काल संतुष्ट करता है और संतुष्ट होकर वे सिद्धसंकल्प देवता मनुष्योंको मनोवांछित एवं मनोरम भोग देकर उनकी भलाई करते हैं

পুষ্পাৰ্পণে মানুহে তৎক্ষণাৎ দেৱতাসকলক প্ৰসন্ন কৰে; আৰু তেওঁলোক প্ৰসন্ন হৈ—সঙ্কল্পসিদ্ধ দেৱতাসকল—মানুহৰ অভ্যুদয় সাধন কৰে আৰু ইচ্ছিত, মনোহৰ ভোগ দান কৰে।

Verse 37

प्रीता: प्रीणन्ति सततं मानिता मानयन्ति च । अवज्ञातावधूताश्न निर्दहन्त्यधमान्‌ नरान्‌,देवताओंको यदि सदा संतुष्ट और सम्मानित किया जाता है तो वे भी मनुष्योंको संतोष एवं सम्मान देते हैं तथा यदि उनकी अवज्ञा एवं अवहेलना की गयी तो वे अवज्ञा करनेवाले नीच मनुष्यको अपनी क्रोधाग्निसे भस्म कर डालते हैं

দেৱতাসকল প্ৰসন্ন হ’লে সদায় প্ৰসন্নতা দান কৰে; মান দিলে মানো দিয়ে। কিন্তু যদি অবজ্ঞা আৰু অৱহেলা কৰা হয়, তেন্তে তেওঁলোকে অধম মানুহক নিজৰ ক্ৰোধাগ্নিয়ে দগ্ধ কৰে।

Verse 38

अत ऊर्ध्व॑ प्रवक्ष्यामि धूपदानविधे: फलम्‌ | धूपांश्व विविधान्‌ साधूनसाधूंक्ष निबोध मे,इसके बाद अब मैं धूपदानकी विधिका फल बताऊँगा। धूप भी अच्छे और बुरे कई तरहके होते हैं। उनका वर्णन मुझसे सुनो

এতিয়া আগলৈ মই ধূপদান-বিধিৰ ফল বৰ্ণনা কৰিম। ধূপ বহু প্ৰকাৰ—কিছুমান শুভ আৰু পুণ্যদায়ক, কিছুমান অশুভ; সিহঁতৰ ভেদ মোৰ পৰা শুনা।

Verse 39

निर्यासा: सारिणश्रैव कृत्रिमाश्वैव ते त्रयः । इष्टोडनिष्टो भवेद्‌ गंधस्तन्मे विस्तरश: शूणु,धूपके मुख्यतः तीन भेद हैं--निर्यास, सारी और कृत्रिम। इन धूपोंकी गंध भी अच्छी और बुरी दो प्रकारकी होती है। ये सब बातें मुझसे विस्तारपूर्वक सुनो

ধূপৰ প্রধানত তিন প্ৰকাৰ—নির্যাস, সাৰিণ আৰু কৃত্ৰিম। সিহঁতৰ গন্ধো দুবিধ—ইষ্ট আৰু অনিষ্ট। সেয়ে এই সকলো কথা মোৰ পৰা বিস্তাৰে শুনা।

Verse 40

निर्यासा: सल्‍लकीवर्ज्या देवानां दयिताउस्तु ते । गुग्गुलुः प्रवरस्तेषां सर्वेषामिति निश्चय:,वृक्षोंके रस (गोंद) को निर्यास कहते हैं, सललकीनामक वृक्षके सिवा अन्य वृक्षोंसे प्रकट हुए निर्यासमय धूप देवताओंको बहुत प्रिय होते हैं। उनमें भी गुग्गुल सबसे श्रेष्ठ है। ऐसा मनीषी पुरुषोंका निश्चय है

নির্যাসধূপ—সল্লকী গছৰ পৰা হোৱা ধূপ বাদে—দেৱতাসকলৰ অতি প্ৰিয়। সিহঁতৰ মাজত গুগ্গুলুই শ্ৰেষ্ঠ—এইয়াই জ্ঞানীসকলৰ স্থিৰ সিদ্ধান্ত।

Verse 41

अगुरु: सारिणां श्रेष्ठो यक्षराक्षसभोगिनाम्‌ | दैत्यानां सल्‍लकीयश्व काड्क्षतो यश्व तद्विध:,जिन काष्ठोंको आगमें जलानेपर सुगंध प्रकट होती है, उन्हें सारी धूप कहते हैं। इनमें अगुरुकी प्रधानता है। सारी धूप विशेषतः यक्ष, राक्षस और नागोंको प्रिय होते हैं। दैत्य लोग सलल्‍लकी तथा उसी तरह अन्य वृक्षोंकी गोंदका बना हुआ धूप पसंद करते हैं

সাৰিণ ধূপৰ মাজত অগৰু শ্ৰেষ্ঠ, আৰু ই বিশেষকৈ যক্ষ, ৰাক্ষস আৰু নাগসকলৰ প্ৰিয়। দৈত্যসকলে সল্লকী আৰু তদ্ৰূপ অন্য গছৰ নিৰ্যাসেৰে প্ৰস্তুত ধূপ পছন্দ কৰে।

Verse 42

अथ सर्जरसादीनां गंधै: पार्थिव दारवै: । फाणितासवसंयुक्तर्मनुष्याणां विधीयते,पृथ्वीनाथ! राल आदिके सुगन्धित चूर्ण तथा सुगन्धित काष्ठौषधियोंके चूर्णको घी और शकक्‍्करसे मिश्रित करके जो अष्टगंध आदि धूप तैयार किया जाता है, वही कृत्रिम है। विशेषत: वही मनुष्योंके उपयोगमें आता है

হে পৃথিৱীনাথ! সৰ্জৰস আদি গন্ধ, আৰু পাৰ্থিৱ আৰু দাৰৱ (মাটি আৰু কাঠজন্য) সুগন্ধি দ্ৰব্য ফাণিত আৰু আসৱৰ সৈতে মিহলাই যি মিশ্ৰ ধূপ প্ৰস্তুত কৰা হয়, সেয়াই মানুহৰ বাবে বিধিপূৰ্বক নিৰ্মিত হয়।

Verse 43

देवदानवभूतानां सद्यस्तुष्टिकर: स्मृत: । येडन्ये वैहारिकास्तत्र मानुषाणामिति स्मृता:,वैसा धूप देवताओं, दानवों और भूतोंके लिये भी तत्काल संतोष प्रदान करनेवाला माना गया है। इनके सिवा विहार (भोग-विलास) के उपयोगमें आनेवाले और भी अनेक प्रकारके धूप हैं, जो केवल मनुष्योंके व्यवहारमें आते हैं

শুক্ৰ ক’লে—এই ধূপ দেৱতা, দানৱ আৰু ভূত-প্ৰেত সকলকো তৎক্ষণাৎ তুষ্টি দান কৰে বুলি স্মৃতিত কোৱা হৈছে। ইয়াৰ বাহিৰেও ভোগ-বিলাস আৰু বিনোদনত ব্যৱহৃত ধূপৰ বহু প্ৰকাৰ আছে; সেয়া কেৱল মানুহৰ ব্যৱহাৰৰ অন্তৰ্গত বুলি গণ্য।

Verse 44

य एवोक्ता: सुमनसां प्रदाने गुणहेतव: । धूपेष्वपि परिज्ञेयास्त एव प्रीतिवर्धना:,देवताओंको पुष्पदान करनेसे जो गुण या लाभ बताये गये हैं, वे ही धूप निवेदन करनेसे भी प्राप्त होते हैं। ऐसा जानना चाहिये। धूप भी देवताओंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाले हैं

শুক্ৰ ক’লে—দেৱতালৈ পুষ্পদান কৰিলে যি গুণ আৰু ফল কোৱা হৈছে, ধূপ নিবেদন কৰিলেও সেই একেই ফল লাভ হয়—এ কথা জানিব লাগে। ধূপেও দেৱতাসকলৰ প্ৰীতি বৃদ্ধি কৰে—এইটো জানি থোৱা।

Verse 45

दीपदाने प्रवक्ष्यामि फलयोगमनुत्तमम्‌ । यथा येन यदा चैव प्रदेया यादृशाश्व ते,अब मैं दीप-दानका परम उत्तम फल बताऊँगा। कब किस प्रकार किसके द्वारा किसके दीप दिये जाने चाहिये, यह सब बताता हूँ, सुनो

শুক্ৰ ক’লে—এতিয়া মই দীপদানৰ পৰা উৎপন্ন অনুত্তম ফল-সম্বন্ধ ঘোষণা কৰিম। কেনেকৈ, কোনে, কেতিয়া আৰু কোন বিধিত দীপ অৰ্পণ কৰিব লাগে—সেয়া সকলো শুনা।

Verse 46

ज्योतिस्तेज: प्रकाशं वाप्यूर्ध्वगं चापि वर्ण्यते । प्रदानं तेजसां तस्मात्‌ तेजो वर्धयते नृणाम्‌,दीपक ऊर्ध्वगामी तेज है, वह कान्ति और कीर्तिका विस्तार करनेवाला बताया जाता है। अतः दीप या तेजका दान मनुष्योंके तेजकी वृद्धि करता है

শুক্ৰ ক’লে—জ্যোতিক তেজ, প্ৰকাশ আৰু ঊৰ্ধ্বগামী শক্তি বুলি বৰ্ণনা কৰা হয়। সেয়ে আলোকদায়ী বস্তু দান কৰিলে মানুহৰ তেজ বৃদ্ধি পায়—কান্তি, কীৰ্তি আৰু নৈতিক প্ৰতাপ উন্নত হয়।

Verse 47

अन्धन्तमस्तमिस्रं च दक्षिणायनमेव च । उत्तरायणमेतस्माज्ज्योतिर्दानं प्रशस्थते,अंधकार अंधतामिस््र नामक नरक है। दक्षिणायन भी अंधकारसे ही आच्छन्न रहता है। इसके विपरीत उत्तरायण प्रकाशमय है। इसलिये वह श्रेष्ठ माना गया है। अत: अन्धकारमय नरककी निवृत्तिके लिये दीपदानकी प्रशंसा की गयी है

শুক্ৰ ক’লে—‘অন্ধতামিস্ৰ’ নামৰ নৰক আৰু দক্ষিণায়ন—দুয়োটাই অন্ধকাৰৰ সৈতে সম্পৰ্কিত বুলি কোৱা হয়। ইয়াৰ বিপৰীতে উত্তৰায়ণ আলোকময়; সেয়ে তাক শ্ৰেষ্ঠ বুলি গণ্য কৰা হয়। সেইহেতু অন্ধকাৰময়, নৰকসদৃশ অৱস্থাৰ নিবৃত্তিৰ বাবে জ্যোতি-দান (দীপদান) বিশেষভাৱে প্ৰশংসিত।

Verse 48

यस्मादूर्ध्वगमेतत्‌ तु तमसश्वैव भेषजम्‌ । तस्मादूर्ध्वगतेर्दाता भवेदत्रेति निश्चय:,दीपककी शिखा ऊर्ध्वगामिनी होती है। वह अंधकाररूपी रोगको दूर करनेकी दवा है। इसलिये जो दीपदान करता है, उसे निश्चय ही ऊर्ध्वगतिकी प्राप्ति होती है

যিহেতু দীপশিখা স্বভাৱতে ঊৰ্ধ্বগামী, সেয়েহে ই তমসাৰূপ অন্ধকাৰৰো ঔষধ। সুতৰাং ইয়াত স্থিৰ সিদ্ধান্ত—যি দীপদান কৰে, সি ‘ঊৰ্ধ্বগতি’ৰ দাতা হৈ উচ্চ আৰু মঙ্গলময় অৱস্থালৈ উন্নীত হয়।

Verse 49

देवास्तेजस्विनो हास्मात्‌ प्रभावन्त: प्रकाशका: । तामसा राक्षसाश्रैव तस्माद्‌ दीप: प्रदीयते

শুক্ৰই ক’লে—দেৱতাসকল তেজস্বী; স্বভাৱতে প্ৰভাৱশালী আৰু আলোকপ্ৰদ। ৰাক্ষসসকল তমসাৰূপ। সেয়েহে (অন্ধকাৰ নাশ কৰি পোহৰ আনিবলৈ) দীপদান কৰা হয়।

Verse 50

देवता तेजस्वी, कांतिमान्‌ और प्रकाश फैलानेवाले होते हैं और राक्षस अंधकारप्रिय होते हैं; इसलिये देवताओंकी प्रसन्नताके लिये दीपदान किया जाता है ।। आलोकदानाच्चक्षुष्मान्‌ प्रभायुक्तो भवेन्नर: । तान्‌ दत्त्वा नोपहिंसेत न हरेन्नोपनाशयेत्‌,दीपदान करनेसे मनुष्यके नेत्रोंका तेज बढ़ता है और वह स्वयं भी तेजस्वी होता है। दान करनेके पश्चात्‌ उन दीपकोंको न तो बुझावे, न उठाकर अन्यत्र ले जाय और न नष्ट ही करे

শুক্ৰই ক’লে—দেৱতাসকল তেজস্বী, কান্তিময় আৰু পোহৰ বিস্তাৰ কৰা; ৰাক্ষসসকল অন্ধকাৰপ্ৰিয়। সেয়েহে দেৱতাসকলক প্ৰসন্ন কৰিবলৈ দীপদান কৰা হয়। পোহৰ দান কৰিলে মানুহ দৃষ্টিস্পষ্টতা লাভ কৰে আৰু তেজেৰে যুত হয়। সেই দীপ দান কৰি পাছত সিহঁতক উপদ্ৰৱ নকৰিব—ন নিবুৱাব, ন তুলি অন্য ঠাইলৈ নিব, ন ধ্বংস কৰিব।

Verse 51

दीपहर्ता भवेदन्धस्तमोगतिरसुप्रभ: । दीपप्रद: स्वर्गलोके दीपमालेव राजते,दीपक चुरानेवाला मनुष्य अंधा और श्रीहीन होता है तथा मरनेके बाद नरकमें पड़ता है, किंतु जो दीपदान करता है, वह स्वर्गलोकमें दीपमालाकी भाँति प्रकाशित होता है

শুক্ৰই ক’লে—যি দীপ চুৰি কৰে, সি অন্ধ হয়, তেজ আৰু শ্ৰীৰ পৰা বঞ্চিত হয় আৰু মৃত্যুৰ পাছত তমোগতি (নৰকীয় গতি) লাভ কৰে। কিন্তু যি দীপদান কৰে, সি স্বৰ্গলোকত দীপমালাৰ দৰে দীপ্তিমান হয়।

Verse 52

हविषा प्रथम: कल्पो द्वितीयश्नौषधीरसै: । वसामेदो<5स्थिनियर्सिर्न कार्य: पुष्टिमिच्छता,घीका दीपक जलाकर दान करना प्रथम श्रेणीका दीप-दान है। ओषधियोंके रस अर्थात्‌ तिल-सरसों आदिके तेलसे जलाकर किया हुआ दीपदान दूसरी श्रेणीका है। जो अपने शरीरकी पुष्टि चाहता हो--उसे चर्बी, मेदा और हड्डियोंसे निकाले हुए तेलके द्वारा कदापि दीपक नहीं जलाना चाहिये

শুক্ৰই ক’লে—ঘিঁউৰে দীপ জ্বলাই দান কৰাই দীপদানৰ প্ৰথম (শ্ৰেষ্ঠ) বিধি। ঔষধিৰ ৰস—অৰ্থাৎ তিল, সৰিষা আদি তেলৰে জ্বলাই কৰা দান দ্বিতীয়। কিন্তু যি নিজৰ দেহৰ পুষ্টি কামনা কৰে, সি যেন চৰ্বি, মজ্জা আৰু অস্থিৰ নিৰ্যাসৰ পৰা উলিওৱা তেলৰে কেতিয়াও দীপ নজ্বলাই।

Verse 53

गिरिप्रपाते गहने चैत्यस्थाने चतुष्पथे । (गोब्राह्मणालये दुर्गे दीपो भूतिप्रद: शुचि: ।) दीपदानं भवेन्नित्यं य इच्छेद्‌ भूतिमात्मन:

শুক্ৰই ক’লে—গিৰিপ্ৰপাতৰ ওচৰত, নিৰ্জন আৰু ভয়ংকৰ ঠাইত, চৈত্য/দেৱালয়ত, চতুষ্পথত—আৰু গোশালাত, ব্ৰাহ্মণৰ গৃহত আৰু দুৰ্গত—কল্যাণদায়ক শুচি দীপ জ্বলাই ৰাখিব লাগে। যি নিজৰ সমৃদ্ধি কামনা কৰে, সি নিত্য দীপদান কৰিব।

Verse 54

जो अपने कल्याणकी इच्छा रखता हो, उसे प्रतिदिन पर्वतीय झरनेके पास, वनमें, देवमंदिरमें, चौराहोंपर, गोशालामें, ब्राह्मणके घरमें तथा दुर्गम स्थानमें प्रतिदिन दीप-दान करना चाहिये। उक्त स्थानोंमें दिया हुआ पवित्र दीप ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला होता है ।। कुलोद्योतो विशुद्धात्मा प्रकाशत्वं च गच्छति । ज्योतिषां चैव सालोक्यं दीपदाता नर: सदा,दीप-दान करनेवाला पुरुष अपने कुलको उद्दीप्त करनेवाला, शुद्धचित्त तथा श्रीसम्पन्न होता है और अंतमें वह प्रकाशमय लोकोंमें जाता है

শুক্ৰই কয়—যি নিজৰ কল্যাণ বিচাৰে, সি প্ৰতিদিন গিৰিঝৰণাৰ ওচৰত, বনতে, দেৱালয়ত, চতুষ্পথত, গোশালাত, ব্ৰাহ্মণৰ গৃহত আৰু দুৰ্গম/দূৰস্থ ঠাইত দীপদান কৰিব। এনে ঠাইত দিয়া শুচি দীপ ঐশ্বৰ্য দান কৰে। দীপদাতা পুৰুষ কুলক উজ্জ্বল কৰা, শুদ্ধচিত্ত আৰু শ্ৰীসম্পন্ন হয়; আৰু শেষত জ্যোতিময় লোকসমূহত জ্যোতিসকলৰ সৈতে সালোখ্য লাভ কৰে।

Verse 55

बलिकर्मसु वक्ष्यामि गुणान्‌ कर्मफलोदयान्‌ | देवयक्षोरगनृणां भूतानामथ रक्षसाम्‌,अब मैं देवताओं, यक्षों, नागों, मनुष्यों, भूतों तथा राक्षस्रोंको बलि समर्पण करनेसे जो लाभ होता है, जिन फलोंका उदय होता है, उनका वर्णन करूँगा

শুক্ৰই ক’লে—এতিয়া মই বলিকৰ্মৰ গুণ আৰু কৰ্মফলৰ উদয় বৰ্ণনা কৰিম—দেৱতা, যক্ষ, নাগ, মানুহ, ভূত আৰু ৰাক্ষসসকললৈ বলি অৰ্পণ কৰিলে যি লাভ হয়।

Verse 56

येषां नाग्रभुजो विप्रा देवतातिथिबालका: । राक्षसानेव तान्‌ विद्धि निर्विशड्कानमड़्लान्‌,जो लोग अपने भोजन करनेसे पहले देवताओं, ब्राह्मणों, अतिथियों और बालकोंको भोजन नहीं कराते, उन्हें भयरहित अमंगलकारी राक्षस ही समझो

যিসকলে আহাৰ কৰাৰ আগতে দেৱতা, ব্ৰাহ্মণ, অতিথি আৰু শিশুক অন্ন নিদিয়ে, তেওঁলোকক ৰাক্ষস বুলিয়েই জানিবা—পাপত নিৰ্ভীক আৰু অমঙ্গলৰ কাৰণ।

Verse 57

तस्मादग्रं प्रयच्छेत देवेभ्य: प्रतिपूजितम्‌ । शिरसा प्रयतश्नापि हरेदू बलिमतन्द्रित:,अतः गृहस्थ मनुष्यका यह कर्तव्य है कि वह आलस्य छोड़कर देवताओंकी पूजा करके उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करे और शुद्धचित्त हो सर्वप्रथम उन्हींको आदरपूर्वक अन्नका भाग अर्पण करे

সেয়ে গৃহস্থে আলস্য ত্যাগ কৰি দেৱতাসকলক যথাবিধি পূজা কৰিব, শিৰ নোৱাই প্ৰণাম কৰিব, শুচিচিত্ত হৈ সৰ্বপ্ৰথমে তেওঁলোককেই আদৰপূৰ্বক অন্নৰ ভাগ অৰ্পণ কৰিব; তাৰ পিছত অমনোযোগ নকৰাকৈ বলিভাগো দিব।

Verse 58

गृह्नन्ति देवता नित्यमाशंसन्ति सदा गृहान्‌ । बाह्याश्षागन्तवो येडन्ये यक्षराक्षसपन्नगा:,क्योंकि देवतालोग सदा गृहस्थ मनुष्योंकी दी हुई बलिको स्वीकार करते और उन्हें आशीर्वाद देते हैं। देवता, पितर, यक्ष, राक्षस, सर्प तथा बाहरसे आये हुए अन्य अतिथि आदि गृहस्थके दिये हुए अन्नसे ही जीविका चलाते हैं और प्रसन्न होकर उस गृहस्थको आयु, यश तथा धनके द्वारा संतुष्ट करते हैं

শুক্ৰই ক’লে—গৃহস্থে দিয়া বলি-উপহাৰ দেৱতাসকলে নিত্য গ্ৰহণ কৰে আৰু সদায় তেওঁৰ গৃহক আশীৰ্বাদ কৰে। তদ্ৰূপ বাহিৰৰ পৰা অহা অন্য অতিথি আৰু যক্ষ, ৰাক্ষস, সৰ্প আদি সকলেও গৃহস্থৰ অন্নতেই জীৱিকা চলায়। সেই পোষণ আৰু আতিথ্যত সন্তুষ্ট হৈ তেওঁলোকে গৃহস্থক আয়ু, যশ আৰু ধন দি তৃপ্ত কৰে।

Verse 59

इतो दत्तेन जीवन्ति देवता: पितरस्तथा । ते प्रीता: प्रीणयन्तेनमायुषा यशसा धनै:,क्योंकि देवतालोग सदा गृहस्थ मनुष्योंकी दी हुई बलिको स्वीकार करते और उन्हें आशीर्वाद देते हैं। देवता, पितर, यक्ष, राक्षस, सर्प तथा बाहरसे आये हुए अन्य अतिथि आदि गृहस्थके दिये हुए अन्नसे ही जीविका चलाते हैं और प्रसन्न होकर उस गृहस्थको आयु, यश तथा धनके द्वारा संतुष्ट करते हैं

শুক্ৰই ক’লে—ইহলোকত যি দান দিয়া যায়, সেই দানতেই দেৱতা আৰু পিতৃসকলেও জীৱন ধাৰণ কৰে। সেই দানত প্ৰসন্ন হৈ তেওঁলোকে গৃহস্থক আয়ু, যশ আৰু ধন দি আনন্দিত কৰে।

Verse 60

बलय: सह पुष्पैस्तु देवानामुपहारयेत्‌ । दधिदुग्धमया: पुण्या: सुगंधा: प्रियदर्शना:,देवताओंको जो बलि दी जाय, वह दही-दूधकी बनी हुई, परम पवित्र, सुगंधित, दर्शनीय और फूलोंसे सुशोभित होनी चाहिये

শুক্ৰই ক’লে—দেৱতাসকলৰ বাবে বলি-উপহাৰ পুষ্পসহ অৰ্পণ কৰিব লাগে। সেয়া দই আৰু গাখীৰে তৈয়াৰ—অতি পবিত্ৰ, সুগন্ধি আৰু দৰ্শনসুখকৰ হ’ব লাগে।

Verse 61

कार्या रुधिरमांसाढूया बलयो यक्षरक्षसाम्‌ । सुरासवपुरस्कारा लाजोल्लापिकभूषिता:,आसुर स्वभावके लोग यक्ष और राक्षसोंको र॒ुधिर और मांससे युक्त बलि अर्पित करते हैं। जिसके साथ सुरा और आसव भी रहता है तथा ऊपरसे धानका लावा छींटकर उस बलिको विभूषित किया जाता है

শুক্ৰই ক’লে—যক্ষ আৰু ৰাক্ষসসকলৰ বাবে ৰুধিৰ-মাংসসমৃদ্ধ বলি কৰা হয়; আগতে সুৰা আৰু আসৱ আগবঢ়োৱা থাকে, আৰু ওপৰত লাজ (ভাজা ধান) ছটিয়াই সেয়া ভূষিত কৰা হয়।

Verse 62

नागानां दयिता नित्यं पद्मोत्पलविमिश्रिता: । तिलान्‌ गुडसुसम्पन्नान्‌ भूतानामुपहारयेत्‌,नागोंको पद्म और उत्पलयुक्त बलि प्रिय होती है। गुड़मिश्रित तिल भूतोंको भेंट करे

শুক্ৰই ক’লে—নাগসকলৰ বাবে পদ্ম আৰু উৎপল মিশ্ৰিত বলি সদায় প্ৰিয়। আৰু ভূতসকলৰ বাবে গুড় ভালদৰে মিহলাই তিল উপহাৰ দিব লাগে।

Verse 63

अग्रदाताग्रभोगी स्याद्‌ बलवीर्यसमन्वित: । तस्मादग्रं प्रयच्छेत देवेभ्य: प्रतिपूजितम्‌,जो मनुष्य देवता आदिको पहले बलि प्रदान करके भोजन करता है, वह उत्तम भोगसे सम्पन्न, बलवान्‌ और वीर्यवान्‌ होता है। इसलिये देवताओंको सम्मानपूर्वक अन्न पहले अर्पण करना चाहिये

যি মানুহে দেৱতাসকলক প্ৰথমে বলি অৰ্পণ কৰি তাৰ পিছত আহাৰ কৰে, সি উত্তম ভোগে সমৃদ্ধ, বলবান আৰু বীৰ্যবান হয়। সেয়ে দেৱতাসকলক সন্মানপূৰ্বক পূজা কৰি অন্নৰ প্ৰথম অংশ প্ৰথমে তেওঁলোকক অৰ্পণ কৰা উচিত।

Verse 64

ज्वलन्त्यहरहो वेश्म याश्चास्य गृहदेवता: । ता: पूज्या भूतिकामेन प्रसृताग्रप्रदायिना,गृहस्थके घरकी अधिष्ठातृ देवियाँ उसके घरको सदा प्रकाशित किये रहती हैं, अतः कल्याणकामी मनुष्यको चाहिये कि भोजनका प्रथम भाग देकर सदा ही उनकी पूजा किया करे

গৃহস্থৰ ঘৰৰ অধিষ্ঠাত্ৰী দেৱতাসকলে তাৰ গৃহক প্ৰতিদিন দীপ্ত কৰি ৰাখে। সেয়ে কল্যাণ আৰু সমৃদ্ধি কামনাকাৰী মানুহে আহাৰৰ প্ৰথম অংশ অৰ্পণ কৰি সদায় তেওঁলোকৰ পূজা কৰা উচিত।

Verse 65

इत्येतदसुरेन्द्राय काव्य: प्रोवाच भार्गव: । सुवर्णाय मनु: प्राह सुवर्णो नारदाय च,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार शुक्राचार्यने असुरराज बलिको यह प्रसंग सुनाया और मनुने तपस्वी सुवर्णको इसका उपदेश किया। तत्पश्चात्‌ तपस्वी सुवर्णने नारदजीको और नारदजीने मुझे धूप, दीप आदिके दानके गुण बताये। महातेजस्वी पुत्र! तुम भी इस विधिको जानकर इसीके अनुसार सब काम करो

ভীষ্মে ক’লে—ৰাজন! এইদৰে ভাৰ্গৱ কাব্য (শুক্ৰাচাৰ্য) এ অসুৰেন্দ্ৰ বলিক এই প্ৰসঙ্গ ক’লে। মনুৱে সেই একে উপদেশ তপস্বী সুবৰ্ণক দিলে, আৰু সুবৰ্ণে সেয়া নাৰদক জনালে। এইদৰে পৰম্পৰাৰে ধূপ-দীপ আদি দানৰ মহিমা প্ৰশংসিত হ’ল আৰু বিধিমতে আচৰণ কৰিবলৈ প্ৰেৰণা দিয়া হ’ল।

Verse 66

नारदो5पि मयि प्राह गुणानेतान्‌ महाद्युते । त्वमप्येतद्‌ विदित्वेह सर्वमाचर पुत्रक,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रकार शुक्राचार्यने असुरराज बलिको यह प्रसंग सुनाया और मनुने तपस्वी सुवर्णको इसका उपदेश किया। तत्पश्चात्‌ तपस्वी सुवर्णने नारदजीको और नारदजीने मुझे धूप, दीप आदिके दानके गुण बताये। महातेजस्वी पुत्र! तुम भी इस विधिको जानकर इसीके अनुसार सब काम करो

শুক্ৰে ক’লে—হে মহাদ্যুতে! নাৰদেও মোক এই গুণসমূহ কৈছিল। সেয়ে, বৎস! তুমিও ইয়াত এই উপদেশ বুজি লৈ তোমাৰ সকলো কৰ্ম তাৰেই অনুসাৰে কৰা।

Verse 98

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णमनुसंवादो नामाष्टनवतितमो<ध्याय:

এইদৰে শ্ৰীমহাভাৰতৰ অনুশাসনপৰ্বৰ দানধৰ্মপৰ্বত “সুবৰ্ণ-মনু সংবাদ” নামৰ ঊননব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হ’ল।

Frequently Asked Questions

After giving a lamp (or light-offering), one should not injure it, take it away, or cause its destruction; violating the gift is treated as ethically and karmically adverse.

Light symbolizes uplift from darkness: giving illumination is portrayed as cultivating inner and outer clarity, producing radiance, auspicious standing, and supportive outcomes through karmic correspondence.

Yes: the donor of lamps is described as attaining brightness and honored visibility (including in heavenly settings), while the one who takes lamps is associated with darkness and diminished condition.