
Śama-prāptiḥ — Gautamī–Lubdhaka–Pannaga–Mṛtyu–Kāla-saṃvāda (Restraint through the Analysis of Karma and Time)
Upa-parva: Śama–Karma–Kāla Saṃvāda (Didactic Episode on Restraint, Action, and Time)
Yudhiṣṭhira confesses that despite teachings on śama (restraint/peace), he cannot attain inner calm after witnessing Bhīṣma’s arrow-wounded body and recalling the loss of kings and kin. Bhīṣma challenges the assumption of simple personal culpability and introduces an ancient itihāsa: Gautamī finds her son dead from a serpent’s bite; a hunter captures the serpent and urges immediate execution. Gautamī refuses retaliatory killing, arguing that violence cannot restore the child and that ethical weight belongs to one’s own conduct. The serpent claims it acted under compulsion; Mṛtyu states it acts under Kāla; Kāla finally asserts that the operative cause is the child’s own karma, with all other agents functioning as instrumental conditions. Gautamī accepts the karmic explanation, releases the serpent, and the episode is offered to Yudhiṣṭhira as a therapeutic-ethical model: understand suffering within karma and time, relinquish obsessive blame, and cultivate śama. Vaiśaṃpāyana concludes that Yudhiṣṭhira’s agitation subsides and he continues his dharmic inquiry.
Chapter Arc: नारायण-वन्दना के साथ कथा का द्वार खुलता है; शरशय्या पर पड़े भीष्म के पास युधिष्ठिर शान्ति का उपाय पूछते हैं—पर अपने ही कृत्य-शोक से उबर नहीं पाते। → युधिष्ठिर का आत्म-धिक्कार तीव्र होता है: ‘आपने अनेक शान्तियाँ बताईं, पर मेरे लिए कौन-सी?’ भीष्म उनके भीतर उठते अपराधबोध को लक्ष्य कर कर्म-फल की कठोरता और शोक-निवारण का उपाख्यान आरम्भ करते हैं—गौतमी, अर्जुनक, काल, मृत्यु और सर्प का प्रसंग। → उपाख्यान में गौतमी का क्षमा-स्वर और सर्प का स्वीकार—‘मैंने क्रोध या कामना से नहीं, आदेश से डँसा’—कर्म, नियति और उत्तरदायित्व की गाँठ खोल देता है; शोक का केन्द्र व्यक्ति से हटकर धर्म-तत्त्व पर टिकता है। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं: काल-मृत्यु-सर्प जैसे आए वैसे चले गए; अर्जुनक और गौतमी का शोक दूर हुआ। युधिष्ठिर को उपदेश: शोक न करो—सब प्राणी अपने-अपने कर्मानुसार लोक पाते हैं। → युधिष्ठिर का ज्वर उतरता है और वे धर्म-विचार से प्रेरित होकर आगे प्रश्न करते हैं—भीष्म के दीर्घ अनुशासन-उपदेश का क्रम आरम्भ होने को है।
Verse 1
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् | देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।। अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत) का पाठ करना चाहिये ।। युधिछिर उवाच शमो बहुविधाकार: सूक्ष्म उक्त: पितामह । न च मे हृदये शान्तिरस्ति श्रुत्वेदमीदूशम्,युधिष्ठिरने कहा--पितामह! आपने नाना प्रकारसे शान्तिके सूक्ष्म स््वरूपका (शोकसे मुक्त होनेके विविध उपायोंका) वर्णन किया; परंतु आपका यह ऐसा उपदेश सुनकर भी मेरे हृदयमें शान्ति नहीं है इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गौतमीलुब्धकव्यालमृत्युकालसंवादे प्रथमो5ध्याय:
নাৰায়ণক প্ৰণাম কৰি, লগতে নৰশ্ৰেষ্ঠ নৰ (অৰ্জুন)ক, দেৱী সৰস্বতীক আৰু ব্যাসক নমস্কাৰ জনাই, তাৰ পিছত ‘জয়’ (মহাভাৰত) পাঠ কৰা উচিত। যুধিষ্ঠিৰ ক’লে— পিতামহ! আপুনি শম—অন্তঃশান্তি—ৰ সূক্ষ্ম স্বৰূপ নানাভাৱে বৰ্ণনা কৰিলে; তথাপি এনে উপদেশ শুনিও মোৰ হৃদয়ত শান্তি উদয় নহয়।
Verse 2
अस्मिन्नर्थे बहुविधा शान्तिरुक्ता पितामह । स्वकृते का नु शान्ति: स्थाच्छमाद् बहुविधादपि,दादाजी! आपने इस विषयमें शान्तिके बहुत-से उपाय बताये, परंतु इन नाना प्रकारके शान्तिदायक उपायोंको सुनकर भी स्वयं ही किये गये अपराधसे मनको शान्ति कैसे प्राप्त हो सकती है
পিতামহ! এই বিষয়ত আপুনি শান্তিৰ বহু উপায় কৈছে; কিন্তু নিজে কৰা অপৰাধৰ ফলত, শমৰ নানাবিধ উপায় থাকিলেও শান্তি কেনেকৈ লাভ হ’ব?
Verse 3
शराचितशरीर हि तीव्रव्रणमुदीक्ष्य च । शर्म नोपलभे वीर दुष्कृतान्येव चिन्तयन्,वीरवर! बाणोंसे भरे हुए आपके शरीर और इसके गहरे घावको देखकर मैं बार-बार अपने पापोंका ही चिन्तन करता हूँ; अत: मुझे तनिक भी चैन नहीं मिलता है
বীৰশ্ৰেষ্ঠ! শৰবিদ্ধ আপোনাৰ দেহ আৰু তাৰ তীব্ৰ ঘাঁ দেখি মই বাৰে বাৰে মোৰ দুষ্কৃত্যসমূহেই চিন্তা কৰোঁ; সেয়ে মোৰ এক মুহূৰ্তও শান্তি নাই।
Verse 4
रुधिरेणावसिक्ताडुं प्रस्रवन्तं यथाचलम् । त्वां दृष्टवा पुरुषव्याप्र सीदे वर्षास्विवाम्बुजम्,पुरुषसिंह! पर्वतसे गिरनेवाले झरनेकी तरह आपके शरीरसे रक्तकी धारा बह रही है-- आपके सारे अड़ खूनसे लथपथ हो रहे हैं | इस अवस्थामें आपको देखकर मैं वर्षाकालके कमलकी तरह गला (दुःखित होता) जाता हूँ
পুৰুষব্যাঘ্ৰ! আপোনাৰ দেহ ৰক্তে সিক্ত, আৰু পৰ্বতৰ জলপ্ৰপাতৰ দৰে ৰক্তধাৰা বয়। এই অৱস্থাত আপোনাক দেখি মই বৰ্ষাকালৰ পদুমৰ দৰে ম্লান হৈ পৰোঁ।
Verse 5
अतः कष्टतरं कि नु मत्कृते यत् पितामह: । इमामवस्थां गमितः: प्रत्यमित्रै रणाजिरे,मेरे ही कारण समराड्डणमें शत्रुओंने जो पितामहको इस अवस्थामें पहुँचा दिया, इससे बढ़कर कष्टकी बात और क्या हो सकती है?
যুধিষ্ঠিৰে ক’লে—মোৰেই কাৰণে ৰণভূমিত শত্রুৱে পিতামহক এই অৱস্থালৈ আনিলে; ইয়াতকৈ ডাঙৰ দুখ আৰু কি হ’ব পাৰে?
Verse 6
तथा चान्ये नृपतय: सहपुत्रा: सबान्धवा: । मत्कृते निधन प्राप्ता: कि नु कष्टतरं ततः,आपके सिवा और भी बहुत-से नरेश मेरे ही कारण अपने पुत्रों और बान्धवोंसहित युद्धमें मारे गये हैं। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या होगी?
ইয়াৰ উপৰিও বহু নৃপতি মোৰেই কাৰণে পুত্ৰ আৰু স্বজনসহ যুঁজত নিহত হ’ল; ইয়াতকৈ অধিক শোক আৰু কি হ’ব পাৰে?
Verse 7
वयं हि धार्तराष्ट्रश्न कालमन्युवशंगता: । कृत्वेदं निन्दितं कर्म प्राप्स्याम: कां गतिं नूप ७ ।। नरेश्वर! हम पाण्डव और धूृतराष्ट्रके सभी पुत्र काल और क्रोधके वशीभूत हो यह निन्दित कर्म करके न जाने किस दुर्गतिको प्राप्त होंगे!
হে নৰেশ্বৰ! আমি পাণ্ডৱ আৰু ধৃতৰাষ্ট্ৰৰ পুত্ৰসকল—কাল আৰু ক্ৰোধৰ বশ হৈ এই নিন্দিত কৰ্ম কৰিলোঁ; এতিয়া আমি কোন গতি লাভ কৰিম?
Verse 8
इदं तु धार्तराष्ट्रस्थ श्रेयो मन्ये जनाधिप । इमामवस्थां सम्प्राप्तं यदसौ त्वां न पश्यति,नरेश्वर! मैं राजा दुर्योधनके लिये उसकी मृत्युको श्रेष्ठ समझता हूँ, जिससे कि वह आपको इस अवस्थामें पड़ा हुआ नहीं देखता है
হে জনাধিপ! ধৃতৰাষ্ট্ৰপুত্ৰ দুর্যোধনৰ বাবে মই ইয়াকেই মঙ্গল বুলি মানোঁ—সেয়া মৃত্যুবৰণ কৰিছে, সেয়ে আপোনাক এই অৱস্থাত পৰি থকা দেখা নাপায়।
Verse 9
सो5हं तव हान्तकर: सुहृद्वधकरस्तथा । न शान्तिमधिगच्छामि पश्यंस्त्वां दुःखितं क्षितौ,मैं ही आपके जीवनका अन्त करनेवाला हूँ और मैं ही दूसरे-दूसरे सुहदोंका भी वध करनेवाला हूँ। आपको इस दुःखमयी दुरवस्थामें भूमिपर पड़ा देख मुझे शान्ति नहीं मिलती है
মইয়েই আপোনাৰ প্ৰাণান্তকাৰী, আৰু মইয়েই আন আন প্ৰিয় সুহৃদসকলৰো বধকাৰী। আপোনাক এই দুখময় অৱস্থাত ভূমিত পৰি থকা দেখি মোৰ শান্তি নাহে।
Verse 10
दुर्योधनो हि समरे सहसैन्य: सहानुज: । निहतः क्षत्रधर्मेडस्मिन् दुरात्मा कुलपांसन:,दुरात्मा एवं कुलाड्ार दुर्योधन सेना और बन्धुओं सहित क्षत्रियधर्मके अनुसार होनेवाले इस युद्धमें मारा गया
কুলকলংক দুষ্টাত্মা দুয্যোধন এই সমৰত ক্ষত্ৰধৰ্ম অনুসাৰে, নিজৰ সৈন্য আৰু অনুজসকলসহ নিহত হ’ল।
Verse 11
न स पश्यति दुष्टात्मा त्वामद्य पतितं क्षितौ । अतः: श्रेयो मृतं मन््ये नेह जीवितमात्मन:,वह दुष्टात्मा आज आपको इस तरह भूमिपर पड़ा हुआ नहीं देख रहा है, अतः उसकी मृत्युको ही मैं यहाँ श्रेष्ठ मानता हूँ; किन्तु अपने इस जीवनको नहीं
সেই দুষ্টাত্মা আজি তোমাক এইদৰে পৃথিৱীত পতিত দেখি নাপায়; সেয়ে মোৰ বাবে ইয়াত জীৱন নহয়, মৃত্যুই শ্ৰেয় বুলি মনে হয়।
Verse 12
अहं हि समरे वीर गमित: शत्रुभि: क्षयम् । अभविष्यं यदि पुरा सह भ्रातृभिरच्युत,न त्वामेवं सुदुः:खार्तमद्राक्षं सायकार्दितम् । अपनी मर्यादासे कभी नीचे न गिरनेवाले वीरवर! यदि भाइयोंसहित मैं शत्रुओंद्वारा पहले ही युद्धमें मार डाला गया होता तो आपको इस प्रकार सायकोंसे पीड़ित और अत्यन्त दुःखसे आतुर अवस्थामें नहीं देखता
হে বীৰ, মৰ্যাদাত অচল! যদি মই ভ্ৰাতৃসকলসহ আগতেই শত্ৰুৰ হাতে সমৰত নাশ পাই থাকোঁ, তেন্তে তোমাক এইদৰে শৰবিদ্ধ আৰু অসহ্য দুখত কাতৰ দেখি নাপালোঁহেঁতেন।
Verse 13
।। नूनं हि पापकर्माणो धात्रा सृष्टा: सम हे नृप,नरेश्वर! निश्चय ही विधाताने हमें पापी ही रचा है। राजन! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे परलोकमें भी मुझे इस पापसे छुटकारा मिल सके
হে নৃপ, হে নৰেশ্বৰ! নিশ্চয় বিধাতাই আমাক পাপকর্মী কৰিয়েই সৃষ্টি কৰিছে। ৰাজন, যদি আপুনি মোৰ প্ৰিয় কৰিব খোজে, তেন্তে এনে উপদেশ দিয়ক যাতে পৰলোকতো এই পাপৰ পৰা মোৰ মুক্তি হয়।
Verse 14
अन्यस्मिन्नपि लोके वै यथा मुच्येम किल्बिषात् | तथा प्रशाधि मां राजन् मम चेदिच्छसि प्रियम्,नरेश्वर! निश्चय ही विधाताने हमें पापी ही रचा है। राजन! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे परलोकमें भी मुझे इस पापसे छुटकारा मिल सके
হে ৰাজন, যদি আপুনি মোৰ প্ৰিয় কৰিব খোজে, তেন্তে অন্য লোকতো আমি কেনেকৈ পাপৰ পৰা মুক্ত হ’ব পাৰোঁ—সেইদৰে মোক উপদেশ দিয়ক।
Verse 15
भीष्म उवाच परतन्त्रं कथं हेतुमात्मानमनुपश्यसि । कर्मणां हि महाभाग सूक्ष्म होतदतीन्द्रियम्,भीष्मजी कहते हैं--महाभाग! तुम तो सदा परतन्त्र हो (काल, अदृष्ट और ईश्वरके अधीन हो), फिर अपनेको शुभाशुभ कर्मोंका कारण क्यों समझते हो? वास्तवमें कर्मोंका कारण क्या है, यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म तथा इन्द्रियोंकी पहुँचसे बाहर है
ভীষ্মে ক’লে—হে মহাভাগ! তুমি তো সদায় পৰতন্ত্ৰ—কাল, অদৃষ্ট আৰু ঈশ্বৰৰ অধীন; তেন্তে শুভাশুভ কৰ্মৰ কাৰণ বুলি নিজকে কেনেকৈ ভাবিছা? কৰ্মৰ প্ৰকৃত কাৰণ অতি সূক্ষ্ম আৰু ইন্দ্ৰিয়াতীত।
Verse 16
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं मृत्युगौतम्यो: काललुब्धकपन्नगै:,इस विषयमें विद्वान् पुरुष गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं
ভীষ্মে ক’লে—এই বিষয়ত পণ্ডিতসকলে এক প্ৰাচীন ইতিবৃত্তৰ দৃষ্টান্তো দিয়ে—গৌতমী আৰু মৃত্যুৰ সংলাপ; তাত কাল, ব্যাধ (শিকারি) আৰু সৰ্পো অন্তর্ভুক্ত। এই পৰম্পৰাগত কাহিনী ইয়াত উদাহৰণস্বৰূপে কোৱা হয়।
Verse 17
गौतमी नाम कौन्तेय स्थविरा शमसंयुता । सर्पेण दष्ट॑ स्वं पुत्रमपश्यद्गतचेतनम्
ভীষ্মে ক’লে—হে কৌন্তেয়! গৌতমী নামৰ এগৰাকী বৃদ্ধা নাৰী আছিল, যি শম আৰু সংযমেৰে যুত। তেওঁ নিজৰ পুত্ৰক সৰ্পদংশনে অচেতন হৈ পৰি থকা দেখিলে।
Verse 18
कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें गौतमी नामवाली एक बूढ़ी ब्राह्मणी थी, जो शान्तिके साधनमें संलग्न रहती थी। एक दिन उसने देखा, उसके इकलौते बेटेको साँपने डेस लिया और उसकी चेतनाशक्ति लुप्त हो गयी ।। अथ त॑ स्नायुपाशेन बद्ध्वा सर्पममर्षित: । लुब्धको<र्जुनको नाम गौतम्या: समुपानयत्,इतनेहीमें अर्जुनक नामवाले एक व्याधने उस साँपको ताँतके फाँसमें बाँध लिया और अमर्षवश वह उसे गौतमीके पास ले आया
ভীষ্মে ক’লে—হে কুন্তীনন্দন! পুৰ্বকালত গৌতমী নামৰ এগৰাকী বৃদ্ধা ব্ৰাহ্মণী আছিল, যি শান্তি-সাধনাত ৰত আছিল। এদিন তেওঁ দেখিলে যে তেওঁৰ একমাত্ৰ পুত্ৰক সৰ্পে দংশন কৰিছে আৰু সি চেতনাহীন হৈ পৰিছে। তেতিয়া অর্জুনক নামৰ এজন ব্যাধ ক্রোধে সেই সৰ্পটোক স্নায়ুৰ ফাঁসত বেঁধি গৌতমীৰ ওচৰলৈ লৈ আহিল।
Verse 19
सचाब्रवीदयं ते स पुत्रहा पन्नगाधम: । ब्रृहि क्षिप्रं महाभागे वध्यतां केन हेतुना,लाकर उसने कहा--“महाभागे! यही वह नीच सर्प है, जिसने तुम्हारे पुत्रको मार डाला है। जल्दी बताओ, मैं किस तरह इसका वध करूँ?
আৰু সি ক’লে—“হে মহাভাগে! এইয়েই সেই অধম সৰ্প, যিয়ে তোমাৰ পুত্ৰক হত্যা কৰিছে। সোনকালে কোৱা—কোন হেতুৰে আৰু কেনেদৰে ইয়াক বধ কৰা হ’ব?”
Verse 20
अग्नौ प्रक्षिप्पतामेष च्छिद्यतां खण्डशो5पि वा । न हायं बालहा पापश्चिरं जीवितुमहति
ভীষ্ম ক’লে—“ইয়াক অগ্নিত নিক্ষেপ কৰা হওক, অথবা খণ্ড-খণ্ড কৰি কাটি পেলোৱা হওক। শিশুহন্তা এই পাপী দীৰ্ঘকাল জীয়াই থাকিবলৈ যোগ্য নহয়।”
Verse 21
“मैं इसे आगमें झोंक दूँ या इसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँ? बालककी हत्या करनेवाला यह पापी सर्प अब अधिक समयतक जीवित रहने योग्य नहीं है” ।। गौतम्युवाच विसृजैनमबुद्धिस्त्वमवध्यो<र्जुनक त्वया । को ह्वात्मानं गुरुं कुर्यात् प्राप्तव्यमविचिन्तयन्,गौतमी बोली--अर्जुनक! छोड़ दे इस सर्पको। तू अभी नादान है। तुझे इस सर्पको नहीं मारना चाहिये। होनहारको कोई टाल नहीं सकता--इस बातको जानते हुए भी इसकी उपेक्षा करके कौन अपने ऊपर पापका भारी बोझ लादेगा?
ভীষ্ম ক’লে—“মই ইয়াক অগ্নিত নিক্ষেপ কৰিম নে, নে খণ্ড-খণ্ড কৰি কাটি পেলাম? শিশুহন্তা এই পাপী সাপ এতিয়া আৰু জীয়াই থাকিবলৈ যোগ্য নহয়।” গৌতমী ক’লে—“অর্জুনক, ইয়াক এৰি দে। তই এতিয়া বিবেচনাহীনভাৱে চলিছ; তোৰে এই সাপক বধ কৰা উচিত নহয়। যি অনিবার্য, তাক জানিও অৱহেলা কৰি কোনে নিজৰ ওপৰত পাপৰ গধুৰ বোজা ল’ব?”
Verse 22
प्लवन्ते धर्मलघवो लोके5म्भसि यथा प्लवा: | मज्जन्ति पापगुरव: शस्त्र स्कन्नमिवोदके,संसारमें धर्माचरण करके जो अपनेको हलके रखते हैं (अपने ऊपर पापका भारी बोझ नहीं लादते हैं), वे पानीके ऊपर चलनेवाली नौकाके समान भवसागरसे पार हो जाते हैं; परंतु जो पापके बोझसे अपनेको बोझिल बना लेते हैं, वे जलमें फेंके हुए हथियारकी भाँति नरक-समुद्रमें डूब जाते हैं
ভীষ্ম ক’লে—“ধৰ্মাচৰণে পাপৰ গধুৰ বোজা নোলোৱাকৈ যিসকলে নিজকে হালকা ৰাখে, তেওঁলোকে পানীৰ ওপৰত ভাসি থকা নাওৰ দৰে সংসাৰ-সাগৰ পাৰ হয়। কিন্তু পাপে গধুৰ হোৱা লোক পানীত নিক্ষিপ্ত অস্ত্ৰৰ দৰে নৰক-সাগৰত ডুব যায়।”
Verse 23
हत्वा चैनं नामृतः स्यादयं मे जीवत्यस्मिन् को>त्ययःस्यादयं ते । अस्योत्सर्गे प्राणयुक्तस्य जन्तो- मृत्योलोंक॑ को नु गच्छेदनन्तम्,इसको मार डालनेसे मेरा यह पुत्र जीवित नहीं हो सकता और इस सर्पके जीवित रहनेपर भी तुम्हारी क्या हानि हो सकती है? ऐसी दशामें इस जीवित प्राणीके प्राणोंका नाश करके कौन यमराजके अनन्त लोकमें जाय?
ভীষ্ম ক’লে—“ইয়াক মাৰিলেও মোৰ পুত্ৰ জীয়াই উঠিব নোৱাৰে; আৰু এই সাপ জীয়াই থাকিলে তোৰ কি ক্ষতি? এনে অৱস্থাত প্ৰাণযুক্ত জীৱৰ প্ৰাণ নাশ কৰি কোনে যমৰ অনন্ত লোক—মৃত্যুলোক—লৈ যাব?”
Verse 24
लुब्धक उवाच जानाम्यहं देवि गुणागुणज्ञे सर्वार्तियुक्ता गुरवो भवन्ति । स्वस्थस्यैते तूपदेशा भवन्ति तस्मात क्षुद्रें सर्पमेनं हनिष्ये,व्याधने कहा--गुण और अवगुणको जाननेवाली देवि! मैं जानता हूँ कि बड़े-बूढ़े लोग किसी भी प्राणीको कष्टमें पड़ा देख इसी तरह दुःखी हो जाते हैं। परंतु ये उपदेश तो स्वस्थ पुरुषके लिये हैं (दुःखी मनुष्यके मनपर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता)। अतः मैं इस नीच सर्पको अवश्य मार डालूँगा
ব্যাধে ক’লে—“গুণ-দোষ জানোতা দেবী! মই জানো যে বয়োজ্যেষ্ঠসকলে কোনো প্ৰাণীক কষ্টত দেখিলে কৰুণাৰে ব্যাকুল হয়। কিন্তু এই উপদেশ স্বস্তিত থকা মানুহৰ বাবে; দুঃখে চেপি ধৰা মানুহৰ ওপৰত ইয়াৰ বল নাথাকে। সেয়ে মই এই নীচ সাপক নিশ্চয় বধ কৰিম।”
Verse 25
शमार्थिन: कालगतिं वदन्ति सद्यः शुचं त्वर्थविदस्त्यजन्ति । श्रेय:क्षयं शोचति नित्यमोहात् तस्माच्छुचं मुज्च हते भुजड़े,शान्ति चाहनेवाले पुरुष कालकी गति बताते हैं (अर्थात् कालने ही इसका नाश कर दिया है, ऐसा कहते हुए शोकका त्याग करके संतोष धारण करते हैं)। परंतु जो अर्थवेत्ता हैं --बदला लेना जानते हैं, वे शत्रुका नाश करके तुरंत ही शोक छोड़ देते हैं। दूसरे लोग श्रेयका नाश होनेपर मोहवश सदा उसके लिये शोक करते रहते हैं; अत: इस शत्रुभूत सर्पके मारे जानेपर तुम भी तत्काल ही अपने पुत्र-शोकको त्याग देना
শিকাৰী ক’লে—যিসকলে শান্তি বিচাৰে, তেওঁলোকে ইয়াক কালৰ গতি বুলি বুজি তৎক্ষণাৎ শোক ত্যাগ কৰে। আৰু যিসকলে অৰ্থবিদ, উদ্দেশ্যসাধনত নিপুণ, তেওঁলোকে শত্রুক বিনাশ কৰি সোনকালে দুখ এৰি দিয়ে। কিন্তু যিসকলে নিত্য মোহত আবদ্ধ, তেওঁলোকে কল্যাণ নষ্ট হ’লে সদায় বিলাপ কৰে। সেয়ে এই শত্রু-সাপ নিহত হোৱাৰ পাছত তুমিও তৎক্ষণাৎ পুত্ৰশোক ত্যাগ কৰা।
Verse 26
गौतम्युवाच आर्तिनिवं विद्यते3स्मद्विधानां धर्मात्मान: सर्वदा सज्जना हि । नित्यायस्तो बालको<प्यस्य तस्मा- दीशे नाहं पन्नगस्य प्रमाथे,गौतमी बोली--अर्जुनक! हम-जैसे लोगोंको कभी किसी तरहकी हानिसे भी पीड़ा नहीं होती। धर्मात्मा सज्जन पुरुष सदा धर्ममें ही लगे रहते हैं। मेरा यह बालक सर्वथा मरनेहीवाला था; इसलिये मैं इस सर्पको मारनेमें असमर्थ हूँ
গৌতমী ক’লে—আৰ্য! আমাৰ দৰে লোকৰ কোনো ক্ষতিতেও আর্তি নাজাগে; কিয়নো ধৰ্মাত্মা সজ্জনসকল সদায় ধৰ্মত স্থিৰ থাকে। এই শিশুটিও নিজৰ নিয়ত কালত মৰিবলগীয়া আছিল; সেয়ে এই সাপটোক বিনাশ কৰিবলৈ মই সক্ষম নহয়, আৰু তাক উচিত বুলিও নাভাবোঁ।
Verse 27
न ब्राह्मणानां कोपो$स्ति कुत: कोपाच्च यातनाम् | मार्दवात् क्षम्यतां साथो मुच्यतामेष पन्नग:,ब्राह्मणोंको क्रोध नहीं होता; फिर वे क्रोधवश दूसरोंको पीड़ा कैसे दे सकते हैं; अतः साधो! तू भी कोमलताका आश्रय लेकर इस सर्पके अपराधको क्षमा कर और इसे छोड़ दे
শিকাৰী ক’লে—ব্ৰাহ্মণসকলৰ ক্ৰোধ নাথাকে; ক্ৰোধেই যদি নাথাকে, তেন্তে ক্ৰোধবশে তেওঁলোকে আনক কেনেকৈ যন্ত্ৰণা দিব? সেয়ে, হে সাধু! মৃদুতাৰ আশ্ৰয় লোৱা; এই সাপৰ অপৰাধ ক্ষমা কৰি তাক মুক্ত কৰি দিয়া।
Verse 28
लुब्धक उवाच हत्वा लाभ: श्रेय एवाव्यय: स्या- ल्लभ्यो लाभ्य: स्याद् बलिभ्य: प्रशस्त: । कालाल्लाभो यस्तु सत्यो भवेत श्रेयोलाभ: कुत्सिते5स्मिन्न ते स््थात्,व्याधने कहा--देवि! इस सर्पको मार डालनेसे जो बहुतोंका भला होगा, यही अक्षय लाभ है। बलवानोंसे बलपूर्वक लाभ उठाना ही उत्तम लाभ है। कालसे जो लाभ होता है वही सच्चा लाभ है। इस नीच सर्पके जीवित रहनेसे तुम्हें कोई श्रेय नहीं मिल सकता
শিকাৰী ক’লে—দেৱী! এই সাপটোক মাৰি পেলালে বহুজনৰ হিত হ’ব; সেয়াই অক্ষয় লাভ, স্থায়ী শ্রেয়। বলৱানৰ পৰা বলপ্ৰয়োগে লাভ লোৱাই প্ৰশংসিত শ্ৰেষ্ঠ লাভ। আৰু কাল (বিধি)ৰ পৰা যি লাভ হয় সেয়াই সত্য লাভ। এই নীচ সাপটো জীয়াই থাকিলে তোমাৰ কোনো শ্রেয় নহ’ব।
Verse 29
गौतग्युवाच का नु प्राप्ति्गहा शत्रुं निहत्य का कामाप्ति: प्राप्य शत्रुं न मुक्त्वा । कस्मात् सौम्याहं न क्षमे नो भुजड़े मोक्षार्थ वा कस्य हेतोर्न कुर्यामू,गौतमी बोली--अर्जुनक! शत्रुको कैद करके उसे मार डालनेसे क्या लाभ होता है; तथा शत्रुको अपने हाथमें पाकर उसे न छोड़नेसे किस अभीष्ट मनोरथकी प्राप्ति हो जाती है? सौम्य! क्या कारण है कि मैं इस सर्पके अपराधको क्षमा न करूँ? तथा किसलिये इसको छुटकारा दिलानेका प्रयत्न न करूँ?
গৌতমী ক’লে—আৰ্য! শত্রুক ধৰি আনি মাৰি পেলালে কি লাভ? আৰু শত্রু হাতত পৰিলেও তাক মুক্ত নকৰিলে কোন অভীষ্ট সিদ্ধ হয়? হে সৌম্য! মই এই সাপৰ অপৰাধ কিয় ক্ষমা নকৰিম? আৰু কাৰ বাবে মই তাৰ মুক্তিৰ বাবে চেষ্টা নকৰিম?
Verse 30
लुब्धक उवाच अस्मादेकाद् बहवो रक्षितव्या नैको बहुभ्यो गौतमि रक्षितव्य: । कृतागसं धर्मविदस्त्यजन्ति सरीसूृपं पापमिमं जहि त्वम्,व्याधने कहा--गौतमी! इस एक सर्पसे बहुतेरे मनुष्योंके जीवनकी रक्षा करनी चाहिये। (क्योंकि यदि यह जीवित रहा तो बहुतोंको काटेगा।) अनेकोंकी जान लेकर एककी रक्षा करना कदापि उचित नहीं है। धर्मज्ञ पुरुष अपराधीको त्याग देते हैं; इसलिये तुम भी इस पापी सर्पको मार डालो
শিকাৰীয়ে ক’লে—“হে গৌতমী, এই একটাৰ বিনিময়ত বহু প্ৰাণ ৰক্ষা কৰা উচিত। যি এক জীৱ বহুজনৰ বাবে বিপদ, তাক বচাই ৰখা ন্যায়সঙ্গত নহয়। ধৰ্মজ্ঞানীসকলে অপৰাধীক ত্যাগ কৰে; সেয়ে এই পাপী সৰীসৃপ সাপটোক বধ কৰা।”
Verse 31
गौतम्युवाच नास्मिन् हते पन्नगे पुत्रको मे सम्प्राप्स्यते लुब्धक जीवित वै । गुणं चान्य॑ नास्य वधे प्रपश्ये तस्मात् सर्प लुब्धक मुज्च जीवम्,गौतमी बोली--व्याध! इस सर्पके मारे जानेपर मेरा पुत्र पुनः जीवन प्राप्त कर लेगा, ऐसी बात नहीं है। इसका वध करनेसे दूसरा कोई लाभ भी मुझे नहीं दिखायी देता है। इसलिये इस सर्पको तुम जीवित छोड़ दो
গৌতমীয়ে ক’লে—“হে শিকাৰী, এই সাপটোক বধ কৰিলেও মোৰ পুত্ৰ জীৱনলৈ ঘূৰি নাহে। আৰু ইয়াৰ বধত আন কোনো লাভো মই নেদেখোঁ। সেয়ে, হে শিকাৰী, সাপটোক জীৱন্তে মুক্ত কৰি দিয়া।”
Verse 32
लुब्धक उवाच वृत्रं हत्वा देवराट् श्रेष्ठभाग् वै यज्ञ हत्वा भागमवाप चैव । शूली देवो देववृत्तं चर त्वं क्षिप्रं सर्प जहि मा भूत् ते विशड्का,व्याधने कहा--देवि! वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्र श्रेष्ठ पदके भागी हुए और त्रिशूलधारी रुद्रदेवने दक्षके यज्ञका विध्वंस करके उसमें अपने लिये भाग प्राप्त किया। तुम भी देवताओंद्वारा किये गये इस बर्तावका ही पालन करो। इस सर्पको शीघ्र ही मार डालो। इस कार्यमें तुम्हें शंका नहीं करनी चाहिये
শিকাৰীয়ে ক’লে—“দেৱী! বৃত্রক বধ কৰি দেৱৰাজ ইন্দ্ৰে শ্ৰেষ্ঠ অংশ আৰু মৰ্যাদা লাভ কৰিছিল; আৰু ত্ৰিশূলধাৰী ৰুদ্ৰে দক্ষৰ যজ্ঞ ধ্বংস কৰি তাত নিজৰ অংশ গ্ৰহণ কৰিছিল। তুমিও দেৱতাসকলৰ এই আচৰণ অনুসৰণ কৰা—এই সাপটোক শীঘ্ৰে বধ কৰা; এই কৰ্মত তোমাৰ মনত কোনো সন্দেহ নাথাকক।”
Verse 33
भीष्य उवाच असकृत् प्रोच्यमानापि गौतमी भुजगं प्रति । लुब्धकेन महाभागा पापे नैवाकरोन्मतिम्,भीष्मजी कहते हैं--राजन्! व्याधके बार-बार कहने और उकसानेपर भी महाभागा गौतमीने सर्पको मारनेका विचार नहीं किया
ভীষ্মে ক’লে—“হে ৰাজন, শিকাৰীয়ে বাৰে বাৰে ক’লেও মহাভাগা গৌতমীয়ে সেই পাপী সাপটোক বধ কৰাৰ মনোভাব নকৰিলে।”
Verse 34
ईषदुच्छवसमानस्तु कृच्छात् संस्तभ्य पन्नग: । उत्ससर्ज गिरं मन्दां मानुषीं पाशपीडित:,उस समय बन्धनसे पीड़ित होकर धीरे-धीरे साँस लेता हुआ वह साँप बड़ी कठिनाईसे अपनेको सँभालकर मन्दस्वरसे मनुष्यकी वाणीमें बोला
ভীষ্মে ক’লে—“সেই সময় ফাঁসৰ যন্ত্রণাত পীড়িত সাপটোৱে ক্ষীণ শ্বাস লৈ, বহু কষ্টে নিজকে সামলাই, মৃদু স্বৰে মানুহৰ ভাষাত কথা ক’লে।”
Verse 35
सर्प उवाच को न्वर्जुनक दोषोअत्र विद्यते मम बालिश । अस्वतन्त्र हि मां मृत्युर्विवशं यदचूचुदत्,सर्पने कहा--ओ नादान अर्जुनक! इसमें मेरा क्या दोष है? मैं तो पराधीन हूँ। मृत्युने मुझे विवश करके इस कार्यके लिये प्रेरित किया था
সাপটোৱে ক’লে—হে মূৰ্খ অৰ্জুনক! ইয়াত মোৰ কি দোষ আছে? মই স্বাধীন নহওঁ। মৃত্যুৱে মোক বাধ্য কৰি এই কৰ্মলৈ প্ৰেৰণা দিলে।
Verse 36
तस्यायं वचनाद्ू दष्टो न कोपेन न काम्यया । तस्य तत्किल्बिषं लुब्ध विद्यते यदि किल्बिषम्,उसके कहनेसे ही मैंने इस बालकको डँसा है, क्रोधसे और कामनासे नहीं। व्याध! यदि इसमें कुछ अपराध है तो वह मेरा नहीं, मृत्युका है
তাৰ কথামাত্ৰতে মই এই বালকক দংশন কৰিলোঁ—না ক্ৰোধে, না কামনাত। হে ব্যাধ! ইয়াত যদি কোনো অপৰাধ থাকে, সেয়া মোৰ নহয়; সেয়া মৃত্যুৰ।
Verse 37
लुब्धक उवाच यद्यन्यवशगेनेदं कृतं ते पन्नगाशुभम् । कारणं वै त्वमप्यत्र तस्मात् त्वमपि किल्बिषी,व्याधने कहा--ओ सर्प! यद्यपि तूने दूसरेके अधीन होकर यह पाप किया है तथापि तू भी तो इसमें कारण है ही; इसलिये तू भी अपराधी है
ব্যাধে ক’লে—হে সাপ! যদিও তুমি আনৰ অধীন হৈ এই পাপ কৰিছা, তথাপি ইয়াত তুমিও কাৰণ; সেয়ে তুমিও দোষী।
Verse 38
मृत्पात्रस्य क्रियायां हि दण्डचक्रादयो यथा । कारणत्वे प्रकल्प्यन्ते तथा त्वमपि पन्नग,सर्प! जैसे मिट्टीका बर्तन बनाते समय दण्ड और चाक आदिको भी उसमें कारण माना जाता है, उसी प्रकार तू भी इस बालकके वधमें कारण है
হে সাপ! মাটিৰ পাত্ৰ বনাওঁতে দণ্ড, চক্ৰ আদি সঁজুলিকো যেনেকৈ কাৰণ বুলি গণ্য কৰা হয়, তেনেকৈ এই বালকৰ বধত তুমিও কাৰণ।
Verse 39
किल्बिषी चापि मे वध्य: किल्बिषी चासि पन्नग । आत्मानं कारणं द्वात्र त्वमाख्यासि भुजड्रम,भुजंगम! जो भी अपराधी हो, वह मेरे लिये वध्य है; पन्नग! तू भी अपराधी है ही; क्योंकि तू स्वयं अपने आपको इसके वधमें कारण बताता है
দোষী যি কোনো হওক, সি মোৰ বাবে বধ্য; হে পন্নগ! তুমিও দোষী, কিয়নো ইয়াত তুমিয়েই নিজকে কাৰণ বুলি কৈছা। সেয়ে, হে ভুজঙ্গ, নিজৰ বধৰ দায় তুমিয়েই নিজৰ ওপৰত ল’লা।
Verse 40
सर्प उवाच सर्व एते हास्ववशा दण्डचक्रादयो यथा । तथाहमपि तस्मान्मे नैष दोषो मतस्तव,सर्पने कहा--व्याध! जैसे मिट्टीका बर्तन बनानेमें ये दण्ड-चक्र आदि सभी कारण पराधीन होते हैं, उसी प्रकार मैं भी मृत्युके अधीन हूँ। इसलिये तुमने जो मुझपर दोष लगाया है, वह ठीक नहीं है
সাপ ক’লে—ব্যাধ! যেনেকৈ মাটিৰ পাত্ৰ গঢ়োঁতে দণ্ড, চক্ৰ আদি সকলো সঁজুলি আনৰ অধীন থাকে, তেনেকৈ মইও মৃত্যুৰ অধীন। সেয়ে তুমি মোৰ ওপৰত যি দোষ আৰোপ কৰিছা, সেয়া মোৰ মতে যথার্থ নহয়।
Verse 41
अथवा मततमेतत्ते ते5प्यन्योन्यप्रयोजका: । कार्यकारणसंदेहो भवत्यन्योन्यचोदनात्,अथवा यदि तुम्हारा यह मत हो कि ये दण्ड-चक्र आदि भी एक-दूसरेके प्रयोजक होते हैं; इसलिये कारण हैं ही। किंतु ऐसा माननेसे एक-दूसरेको प्रेरणा देनेवाला होनेके कारण कार्य-कारणभावके निर्णयमें संदेह हो जाता है
অথবা যদি তোমাৰ মত এই হয় যে দণ্ড-চক্ৰ আদি সঁজুলিও পৰস্পৰে পৰস্পৰক প্ৰেৰণা দিয়ে আৰু সেয়ে কাৰণ বুলিয়েই গণ্য—তেন্তে এনে পৰস্পৰ-প্ৰেৰণা মানিলে কাৰ্য-কাৰণৰ নিৰ্ণয়তেই সন্দেহ জন্মে।
Verse 42
एवं सति न दोषो मे नास्मि वध्यो न किल्बिषी । किल्विषं समवाये स्यान्मन्यसे यदि किल्बिषम्,ऐसी दशामें न तो मेरा कोई दोष है और न मैं वध्य अथवा अपराधी ही हूँ। यदि तुम किसीका अपराध समझते हो तो वह सारे कारणोंके समूहपर ही लागू होता है
এনে হ’লে মোৰ কোনো দোষ নাই; মই ন বধ্য, ন পাপী। আৰু যদি তুমি ইয়াত পাপ দেখাই থাকো, তেন্তে সেই পাপ সকলো সহকাৰী কাৰণৰ সমষ্টিৰ ওপৰতেই পৰে।
Verse 43
लुब्धक उवाच कारणं यदि न स्याद् वै न कर्ता स्यास्त्वमप्युत । विनाशकारणं त्वं च तस्माद् वध्योडसि मे मतः,व्याधने कहा--सर्प! यदि मान भी लें कि तू अपराधका न तो कारण है और न कर्ता ही है तो भी इस बालककी मृत्यु तो तेरे ही कारण हुई है, इसलिये मैं तुझे मारने योग्य समझता हूँ
ব্যাধে ক’লে—সাপ! ধৰি লওঁ তুমি ন অপৰাধৰ কাৰণ, ন কৰ্তা; তথাপি এই বালকৰ বিনাশ তোমাৰ দ্বাৰাই ঘটিছে। সেয়ে মোৰ মতে তুমি বধ্য।
Verse 44
असत्यपि कृते कार्य नेह पन्नग लिप्यते । तस्मान्नात्रैव हेतु: स्याद् वध्य: कि बहु भाषसे
ব্যাধে ক’লে—হে পন্নগ! প্ৰয়োজনীয় কাৰ্য সিদ্ধ কৰিবলৈ অসত্যৰ আশ্ৰয় ল’লেও ইয়াত সাপ দোষী নহয়। সেয়ে এই বিষয়ত বধৰ কোনো হেতু নাই; তুমি ইমান দীঘলকৈ কিয় কথা পাতিছা?
Verse 45
सर्प! तेरे मतके अनुसार यदि दुष्टतापूर्ण कार्य करके भी कर्ता उस दोषसे लिप्त नहीं होता है, तब तो चोर या हत्यारे आदि जो अपने अपराधोंके कारण राजाओंके यहाँ वध्य होते हैं, उन्हें भी वास्तवमें अपराधी या दोषका भागी नहीं होना चाहिये। (फिर तो पाप और उसका दण्ड भी व्यर्थ ही होगा) अतः तू क्यों बहुत बकवाद कर रहा है ।। सर्प उवाच कार्याभावे क्रिया न स्यात् सत्यसत्यपि कारणे । तस्मात् समे5स्मिन् हेतौ मे वाच्यो हेतुर्विशेषत:,सर्पने कहा--व्याध! प्रयोजक (प्रेरक) कर्ता रहे या न रहे, प्रयोज्य कर्ताके बिना क्रिया नहीं होती; इसलिये यहाँ यद्यपि हमलोग (मैं और मृत्यु) समानरूपसे हेतु हैं; तो भी प्रयोजक होनेके कारण मृत्युपर ही विशेषरूपसे यह अपराध लगाया जा सकता है। यदि तुम मुझे इस बालककी मृत्युका वस्तुतः कारण मानते हो तो यह तुम्हारी भूल है। वास्तवमें विचार करनेपर प्रेरणा करनेके कारण दूसरा ही (मृत्यु ही) अपराधी सिद्ध होगा; क्योंकि वही प्राणियोंके विनाशमें अपराधी है
সাপ ক’লে—“ফল নাথাকিলে ক্ৰিয়াক ক্ৰিয়া বুলিব নোৱাৰি, কাৰণ উপস্থিত থাকিলেও। সেয়ে এই বিষয়ত মই আৰু মৃত্যু দুয়ো কাৰণ যেন দেখা দিলেও, দোষ বিশেষকৈ সেই প্ৰেৰকৰ ওপৰত পৰে যিয়ে কৰ্মক উচটাই আৰু নিয়ন্ত্ৰণ কৰে। তুমি যদি এই শিশুৰ মৃত্যুৰ সত্য কাৰণ মোকেই ভাবা, তেন্তে সেয়া তোমাৰ ভ্ৰম; বিচাৰ কৰিলে প্ৰেৰক—মৃত্যুই—প্ৰাণিনাশত দোষী, কিয়নো ধ্বংসৰ গতি চলাই নিয়ে সেয়েই।”
Verse 46
यद्य॒हं कारणत्वेन मतो लुब्धक तत्त्वतः । अन्य: प्रयोगे स्यादत्र किल्बिषी जन्तुनाशने,सर्पने कहा--व्याध! प्रयोजक (प्रेरक) कर्ता रहे या न रहे, प्रयोज्य कर्ताके बिना क्रिया नहीं होती; इसलिये यहाँ यद्यपि हमलोग (मैं और मृत्यु) समानरूपसे हेतु हैं; तो भी प्रयोजक होनेके कारण मृत्युपर ही विशेषरूपसे यह अपराध लगाया जा सकता है। यदि तुम मुझे इस बालककी मृत्युका वस्तुतः कारण मानते हो तो यह तुम्हारी भूल है। वास्तवमें विचार करनेपर प्रेरणा करनेके कारण दूसरा ही (मृत्यु ही) अपराधी सिद्ध होगा; क्योंकि वही प्राणियोंके विनाशमें अपराधी है
সাপ ক’লে—“হে ব্যাধ! যদি তুমি মোকেই তত্ত্বতঃ কাৰণ বুলি মানা, তেন্তে ঠিককৈ বিচাৰ কৰা: এই প্ৰাণিহত্যাত দোষী আনজন—যিয়ে কৰ্মক প্ৰেৰণা দিয়ে। যাক চলোৱা হয় সেই কৰ্তা নাথাকিলে ক্ৰিয়া কেতিয়াও নঘটে; সেয়ে কাৰণৰূপে আমি দুয়ো সমান হ’লেও, দোষ বিশেষকৈ প্ৰেৰকৰ ওপৰতেই পৰে। এই শিশুৰ মৃত্যুৰ সত্য কাৰণ মোক ভাবা তোমাৰ মোহ; প্ৰেৰক ত মৃত্যু নিজেই, আৰু সেয়েই প্ৰাণিনাশক।”
Verse 47
लुब्धक उवाच वध्यस्त्वं मम दुर्बुद्धे बालघाती नृशंसकृत् । भाषसे किं बहु पुनर्वध्य: सन् पन्नगाधम,व्याधने कहा--खोटी बुद्धिवाले नीच सर्प! तू बालहत्यारा और क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाला है; अतः निश्चय ही मेरे हाथसे वधके योग्य है। तू वध्य होकर भी अपनेको निर्दोष सिद्ध करनेके लिये क्यों बहुत बातें बना रहा है?
ব্যাধ ক’লে—“হে দুৰ্বুদ্ধি নীচ সাপ! তুমি শিশুহন্তা, নৃশংস কৰ্মকাৰী; সেয়ে মোৰ হাতে বধৰ যোগ্য। বধাৰ্হ হৈয়ো নিজকে নিৰ্দোষ প্ৰমাণ কৰিবলৈ তুমি পুনঃপুনঃ ইমান কথা কিয় কৈ আছা, হে অধম পন্নগ?”
Verse 48
सर्प उवाच यथा हवींषि जुद्दाना मखे वै लुब्धकर्त्विज: । न फल प्राप्रुवन्त्यत्र फलयोगे तथा हाहम्,सर्पने कहा--व्याध! जैसे यजमानके यहाँ यज्ञमें ऋत्विज् लोग अग्निमें आहुति डालते हैं; किंतु उसका फल उन्हें नहीं मिलता। इसी प्रकार इस अपराधके फल या दण्डको भोगनेमें मुझे नहीं सम्मिलित करना चाहिये (क्योंकि वास्तवमें मृत्यु ही अपराधी है)
সাপ ক’লে—“হে ব্যাধ! যেনেকৈ লোভী ঋত্বিজে যজ্ঞত অগ্নিত আহুতি দিয়ে, কিন্তু সেই যজ্ঞৰ ফল তেওঁলোকে নাপায়; তেনেকৈ এই পাপৰ ফল—অৰ্থাৎ দণ্ড—ভোগত মোক অংশীদাৰ কৰা উচিত নহয়। এই মৃত্যুকৰ্মৰ সত্য কৰ্তা ত মৃত্যু নিজেই।”
Verse 49
भीष्म उवाच तथा ब्रुवति तस्मिंस्तु पन्नगे मृत्युचोदिते । आजगाम ततो मृत्यु: पन्नगं चाब्रवीदिदम्,भीष्मजी कहते हैं--राजन! मृत्युकी प्रेरणासे बालकको डँसनेवाला सर्प जब बारंबार अपनेको निर्दोष और मृत्युको दोषी बताने लगा तब मृत्यु देवता भी वहाँ आ पहुँचा और सर्पसे इस प्रकार बोला
ভীষ্ম ক’লে—“ৰাজন! মৃত্যুৰ প্ৰেৰণাত শিশুটিক দংশন কৰা সেই সাপে যেতিয়া এইদৰে পুনঃপুনঃ নিজকে নিৰ্দোষ বুলি কৈ মৃত্যুৰ ওপৰত দোষ আৰোপ কৰিবলৈ ধৰিলে, তেতিয়া মৃত্যুদেৱতা তাত উপস্থিত হৈ সাপক এইদৰে ক’লে।”
Verse 50
मृत्युरुवाच प्रचोदितो5हं कालेन पन्नग त्वामचूचुदम् । विनाशहेतुर्नास्य त्वमहं न प्राणिन: शिशो:,मृत्युने कहा--सर्प! कालसे प्रेरित होकर ही मैंने तुओ इस बालकको डँसनेके लिये प्रेरणा दी थी; अतः इस शिशुप्राणीके विनाशमें न तो तू कारण है और न मैं ही कारण हूँ
মৃত্যুৱে ক’লে—হে সৰ্প! কালৰ প্ৰেৰণা লৈ মই তোমাক দংশন কৰিবলৈ প্ৰেৰিত কৰিছিলোঁ। সেয়ে এই শিশুজীৱৰ বিনাশত ন তুমি প্ৰকৃত কাৰণ, ন মই।
Verse 51
यथा वायुर्जलधरान् विकर्षति ततस्तत: । तद्धज्जलदवत् सर्प कालस्याहं वशानुग:,सर्प! जैसे हवा बादलोंको इधर-उधर उड़ा ले जाती है, उन बादलोंकी ही भाँति मैं भी कालके वशमें हूँ
ভীষ্মে ক’লে—হে সৰ্প! যেনেকৈ বায়ুৱে মেঘক ইফালে-সিফালে টানি নিয়ে যায়, তেনেকৈ মইও সেই মেঘৰ দৰে কালৰ অধীন হৈ বোৱাই যাওঁ।
Verse 52
साच्विका राजसाश्षैव तामसा ये च केचन । भावा: कालात्मका: सर्वे प्रवर्तन्ते ह जन्तुषु,सात्विक, राजस और तामस जितने भी भाव हैं, वे सब कालात्मक हैं और कालकी ही प्रेरणासे प्राणियोंको प्राप्त होते हैं
ভীষ্মে ক’লে—সাত্ত্বিক, ৰাজস, তামস আৰু আন যিকোনো ভাব—সকলো কালাত্মক; কালৰ প্ৰেৰণা লৈহে সিহঁত জীৱসমূহত প্ৰৱৰ্তিত হয়।
Verse 53
जड़मा: स्थावराश्नैव दिवि वा यदि वा भुवि | सर्वे कालात्मका: सर्प कालात्मकमिदं जगत्,सर्प! पृथ्वी अथवा स्वर्गलोकमें जितने भी स्थावर-जड़म पदार्थ हैं, वे सभी कालके अधीन हैं। यह सारा जगत् ही कालस्वरूप है
ভীষ্মে ক’লে—হে সৰ্প! স্বৰ্গতেই হওক বা পৃথিৱীত, যিমান জড় আৰু স্থাৱৰ বস্তু আছে, সকলো কালৰ অধীন। এই সমগ্ৰ জগতেই কালাত্মক।
Verse 54
प्रवृत्तयश्च लोके5स्मिंस्तथैव च निवृत्तय: । तासां विकृतयो याश्व् सर्व कालात्मकं स्मृतम्,इस लोकमें जितने प्रकारकी प्रवृत्ति-निवृत्ति तथा उनकी विकृतियाँ (फल) हैं, ये सब कालके ही स्वरूप हैं
ভীষ্মে ক’লে—এই লোকত যিমান প্ৰৱৰ্ত্তি আৰু নিবৃত্তি আছে, আৰু সিহঁতৰ পৰা যি যি বিকৃতি/ফল জন্মে—সকলোকে কালাত্মক বুলিয়েই ধৰা হয়।
Verse 55
आदित्यश्रन्द्रमा विष्णुरापो वायु: शतक्रतुः । अग्नि:खं पृथिवी मित्र: पर्जन्यो वसवो5दिति:
ভীষ্মে ক’লে—সূৰ্য, চন্দ্ৰ, বিষ্ণু, জল, বায়ু, শতক্ৰতু (ইন্দ্ৰ), অগ্নি, আকাশ, পৃথিৱী, মিত্ৰ, পৰ্জন্য (বৰ্ষা-দেৱ), বসুসকল আৰু অদিতি—এইসকলক জগতত ব্যাপ্ত দিৱ্য শক্তি বুলি বুজিব লাগে।
Verse 56
सरित: सागराश्षैव भावाभावौ च पन्नग । सर्वे कालेन सृज्यन्ते द्वियन्ते च पुन: पुन:
ভীষ্মে ক’লে—হে পন্নগ! নদী আৰু সাগৰ, আৰু ভাৱ-অভাৱ—এই সকলো কালে সৃষ্টি কৰে, আৰু পুনঃ পুনঃ কালে ক্ষয় কৰে।
Verse 57
पन्नग! सूर्य, चन्द्रमा, जल, वायु, इन्द्र, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, मित्र, पर्जन्य, वसु, अदिति, नदी, समुद्र तथा भाव और अभाव--ये सभी कालके द्वारा ही रचे जाते हैं और काल ही इनका संहार कर देता है ।। एवं ज्ञात्वा कथं मां त्वं सदोषं सर्प मन्यसे । अथ चैवंगते दोषे मयि त्वमपि दोषवान्
হে পন্নগ! সূৰ্য, চন্দ্ৰ, জল, বায়ু, ইন্দ্ৰ, অগ্নি, আকাশ, পৃথিৱী, মিত্ৰ, পৰ্জন্য, বসুসকল, অদিতি, নদী, সাগৰ আৰু ভাৱ-অভাৱ—এই সকলো কালে সৃষ্টি কৰে আৰু কালেই সংহাৰ কৰে। এই কথা জানিও, হে সৰ্প! তুমি মোক দোষী কেনেকৈ ভাব? আৰু যদি এনে অৱস্থাতো মোৰ ওপৰত দোষ আৰোপ হ’ব পাৰে, তেন্তে তুমিও দোষী হ’বা।
Verse 58
सर्प! यह सब जानकर भी तुम मुझे कैसे दोषी मानते हो? और यदि ऐसी स्थितिमें भी मुझपर दोषारोपण हो सकता है, तब तो तू भी दोषी ही है ।। सर्प उवाच निर्दोषं दोषवन्तं वा न त्वां मृत्यो ब्रवीम्यहम् । त्वयाहं चोदित इति ब्रवीम्येतावदेव तु,सर्पने कहा--मृत्यो! मैं तुम्हें न तो निर्दोष बताता हूँ और न दोषी ही। मैं तो इतना ही कह रहा हूँ कि इस बालकको डँसनेके लिये तूने ही मुझे प्रेरित किया था
হে সৰ্প! এই সকলো জানিও তুমি মোক দোষী কেনেকৈ ভাব? আৰু যদি এনে অৱস্থাতো মোৰ ওপৰত দোষ আৰোপ হ’ব পাৰে, তেন্তে তুমিও দোষী। সৰ্পে ক’লে—হে মৃত্যু! মই তোমাক ন নিৰ্দোষ বুলোঁ, ন দোষী। মই কেৱল ইমানেই কওঁ—এই বালকক দংশন কৰিবলৈ তুমিয়েই মোক প্ৰেৰণা দিছিলা।
Verse 59
यदि काले तु दोषो<स्ति यदि तत्रापि नेष्यते । दोषो नैव परीक्ष्यो मे न ह्ृत्राधिकृता वयम्,इस विषयमें यदि कालका दोष है अथवा यदि वह भी निर्दोष है तो हो, मुझे किसीके दोषकी जाँच नहीं करनी है और जाँच करनेका मुझे कोई अधिकार भी नहीं है
যদি কালত দোষ থাকে, বা তাতো দোষ বুলি মানি নলয়—তথাপি তেনেই হওক। কাৰো দোষ বিচাৰ কৰা মোৰ কাম নহয়; আৰু ইয়াত বিচাৰ কৰিবলৈ মোৰ অধিকাৰো নাই।
Verse 60
निर्मोक्षस्त्वस्य दोषस्य मया कार्या यथा तथा । मृत्योरपि न दोष: स्यादिति मे<त्र प्रयोजनम्,परंतु मेरे ऊपर जो दोष लगाया गया है, उसका निवारण तो मुझे जैसे-तैसे करना ही है। मेरे कहनेका यह प्रयोजन नहीं है कि मृत्युका भी दोष सिद्ध हो जाय
সাপ ক’লে— মোৰ ওপৰত যি দোষ আৰোপ কৰা হৈছে, সেয়া যিকোনো উপায়ে মই আঁতৰাবই লাগিব। মোৰ কথাৰ উদ্দেশ্য এই নহয় যে মৃত্যুকো দোষী প্ৰমাণ কৰোঁ।
Verse 61
भीष्म उवाच सर्पो3थार्जुनकं प्राह श्रुतं ते मृत्युभाषितम् । नानागसं मां पाशेन संतापयितुमरहसि,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर सर्पने अर्जुनकसे कहा--“तुमने मृत्युकी बात तो सुन ली न? अब मुझ निरपराधको बन्धनमें बाँधकर कष्ट देना तुम्हारे लिये उचित नहीं है
ভীষ্ম ক’লে— যুধিষ্ঠিৰ! তাৰ পাছত সাপে অৰ্জুনকক ক’লে— “মৃত্যুৰ কথা তুমি শুনিলা নহয়? এতিয়া নিৰ্দোষ মোক পাষেৰে বান্ধি কষ্ট দিয়া তোমাৰ পক্ষে শোভন নহয়।”
Verse 62
लुब्धक उवाच मृत्यो: श्रुतं मे वचनं तव चैव भुजड़म । नैव तावददोषत्वं भवति त्वयि पन्नग,व्याधने कहा--पन्नग! मैंने मृत्युकी और तेरी--दोनोंकी बातें सुन लीं; किंतु भुजंगम! इससे तेरी निर्दोषता नहीं सिद्ध हो रही है
ব্যাধ ক’লে— হে পন্নগ! মৃত্যুৰ কথাও আৰু তোমাৰ কথাও মই শুনিলোঁ, ভুজঙ্গ; কিন্তু তাতেই তোমাৰ নিৰ্দোষতা প্ৰমাণ নহয়।
Verse 63
मृत्युस्त्वं चैव हेतुर्हि बालस्यास्य विनाशने । उभयं कारणं मन्ये न कारणमकारणम्,इस बालकके विनाभमें तू और मृत्यु--दोनों ही कारण हो; अतः मैं दोनोंको ही कारण या अपराधी मानता हूँ, किसी एकको अपराधी या निरपराध नहीं मानता
এই শিশুটোৰ বিনাশত তুমি আৰু মৃত্যু— দুয়োটােই কাৰণ। সেয়ে মই দুয়োকেই দায়ী বুলি মানো; এজনকেই দোষী আৰু আনজনক নিৰ্দোষ বুলি নমানো।
Verse 64
धिड़मृत्युं च दुरात्मानं क्रूरं दु:खकरं सताम् | त्वां चैवाहं वधिष्यामि पापं पापस्य कारणम्,श्रेष्ठ पुरुषोंको दुःख देनेवाले इस क्रूर एवं दुरात्मा मृत्युको धिक््कार है और तू तो इस पापका कारण है ही; इसलिये तुझ पापात्माका वध मैं अवश्य करूँगा
সজ্জনক দুখ দিয়া সেই নিষ্ঠুৰ, দুষ্টাত্মা মৃত্যুক ধিক্! আৰু তুমিও এই পাপৰ কাৰণ। সেয়ে, হে পাপাত্মা, মই নিশ্চয় তোমাক বধ কৰিম।
Verse 65
मृत्युरुवाच विवशौ कालवशगावावां निर्दिष्टकारिणौ । नावां दोषेण गन्तव्यौ यदि सम्यक् प्रपश्यसि
মৃত্যুৱে ক’লে—আমি দুয়ো অসহায়, কালৰ অধীন; যি দৰে নিৰ্দেশ দিয়া হয়, সেইদৰে কৰোঁ। তুমি যদি স্পষ্টকৈ চাওঁ, তেন্তে এইটো আমাৰ দোষ বুলি ভাবি আমাৰ ওপৰত দোষাৰোপ নকৰিবা।
Verse 66
मृत्युने कहा--व्याध! हम दोनों कालके अधीन होनेके कारण विवश हैं। हम तो केवल उसके आदेशका पालनमात्र करते हैं। यदि तुम अच्छी तरह विचार करोगे तो हमलोगोंपर दोषारोपण नहीं करोगे ।। लुब्धक उवाच युवामुभी कालवशोौ यदि मे मृत्युपन्नगौ । हर्षक्रोधौ यथा स्यातामेतदिच्छामि वेदितुम्,व्याधने कहा--मृत्यु और सर्प! यदि तुम दोनों कालके अधीन हो तो मुझ तटस्थ व्यक्तिको परोपकारीके प्रति हर्ष और दूसरोंका अपकार करनेवाले तुम दोनोंपर क्रोध क्यों होता है, यह मैं जानना चाहता हूँ
ব্যাধে ক’লে—হে মৃত্যু, হে সৰ্প! যদি তোমালোক দুয়ো কালৰ অধীন, তেন্তে মই জানিব বিচাৰোঁ: উপকাৰীজনৰ প্ৰতি মোৰ মনত হর্ষ কিয় জাগে, আৰু অনিষ্টকাৰী তোমালোক দুয়োৰ প্ৰতি ক্ৰোধ কিয় উঠে? যদি সকলো কালৰ বিধানত বাঁধা, তেন্তে প্ৰশংসা-নিন্দা, আনন্দ-ৰোষ মনত কোন আধাৰত ধৰি থাকে?
Verse 67
मृत्युरुवाच या काचिदेव चेष्टा स्यात् सर्वा कालप्रचोदिता । पूर्वमेवैतदुक्त हि मया लुब्धक कालत:,मृत्युने कहा--व्याध! जगत्में जो कोई भी चेष्टा हो रही है, वह सब कालकी प्रेरणासे ही होती है। यह बात मैंने तुमसे पहले ही बता दी है
মৃত্যুৱে ক’লে—হে ব্যাধ! জগতত যি কোনো চেষ্টাই হওক, সেয়া সকলো কালৰ প্ৰচোদনাতেই ঘটে। এই কথা মই আগতেই তোমাক কৈছোঁ—সকলো কালেই চালায়।
Verse 68
तस्मादुभौ कालवशावावां निर्दिष्टकारिणौ । नावां दोषेण गन्तव्यौ त्वया लुब्धक कहिचित्,अतः व्याध! हम दोनोंको कालके अधीन और कालके ही आदेशका पालक समझकर तुम्हें कभी हमारे ऊपर दोषारोपण नहीं करना चाहिये
সেয়ে, হে ব্যাধ! আমি দুয়ো কালৰ অধীন আৰু কালৰ নিৰ্দেশ অনুসৰি কৰ্মকাৰী—এই কথা বুজি তুমি কেতিয়াও আমাৰ ওপৰত দোষ নাৰোপিবা।
Verse 69
भीष्म उवाच अथोपगम्य कालस्तु तस्मिन् धर्मार्थसंशये । अब्रवीत् पन्नगं मृत्युं लुब्धं चार्जुनकं तथा,भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर धार्मिक विषयमें संदेह उपस्थित होनेपर काल भी वहाँ आ पहुँचा; तथा सर्प, मृत्यु एवं अर्जुनक व्याधसे इस प्रकार बोला
ভীষ্মে ক’লে—হে যুধিষ্ঠিৰ! তাৰ পাছত ধৰ্ম আৰু অৰ্থ সম্পৰ্কে সংশয় উঠাত কাল নিজেই তাত উপস্থিত হ’ল; আৰু সৰ্প, মৃত্যু, লুব্ধক আৰু অৰ্জুনক ব্যাধক এইদৰে ক’লে।
Verse 70
काल उवाच न हाहं नाप्ययं मृत्युर्नायं लुब्धक पन्नग: । किल्बिषी जन्तुमरणे न वयं हि प्रयोजका:,कालने कहा--व्याथ! न तो मैं, न यह मृत्यु और न यह सर्प ही इस जीवकी मृत्युमें अपराधी हैं। हमलोग किसीकी मृत्युमें प्रेरक या प्रयोजक भी नहीं हैं
কাল ক’লে—হে ব্যাধ! ন মই, ন এই মৃত্যু, ন এই সাপ—এই জীৱৰ মৃত্যুত দোষী। আমি কোনোবাৰ মৃত্যুৰ প্ৰেৰক বা কাৰক নহওঁ; তাৰ নিজৰ কৰ্ম আৰু ধৰ্ম-নিয়মৰ পৰিপাকেই ইয়াৰ কাৰণ।
Verse 71
अकरोद् यदयं कर्म तन्नोडर्जुनक चोदकम् | विनाशहेतुर्नान्यो5स्य वध्यते5यं स्वकर्मणा,अर्जुनक! इस बालकने जो कर्म किया है वही इसकी मृत्युमें प्रेरक हुआ है, दूसरा कोई इसके विनाशका कारण नहीं है। यह जीव अपने कर्मसे ही मरता है
কাল ক’লে—হে অৰ্জুনক! ইয়ে যি কৰ্ম কৰিছে, সেই কৰ্মেই ইয়াৰ ফলক প্ৰেৰণা দিছে। ইয়াৰ বিনাশৰ অন্য কোনো কাৰণ নাই; এই জীৱ নিজৰ কৰ্মতেই মৃত্যুলৈ যায়।
Verse 72
यदनेन कृतं कर्म तेनायं निधनं गतः । विनाशहेतु: कर्मास्य सर्वे कर्मवशा वयम्,इस बालकने जो कर्म किया है, उसीसे यह मृत्युको प्राप्त हुआ है। इसका कर्म ही इसके विनाशका कारण है। हम सब लोग कर्मके ही अधीन हैं
কাল ক’লে—ইয়ে যি কৰ্ম কৰিছে, সেই কৰ্মতেই ই মৃত্যু লাভ কৰিছে। ইয়াৰ বিনাশৰ কাৰণ তাৰ কৰ্মেই; আমি সকলোৱে কৰ্মৰ অধীন।
Verse 73
कर्मदायादवॉल्लोक: कर्मसम्बन्धलक्षण: । कर्माणि चोदयन्तीह यथान्योन्यं तथा वयम्,संसारमें कर्म ही मनुष्योंका पुत्र-पौत्रके समान अनुगमन करनेवाला है। कर्म ही दुःख- सुखके सम्बन्धका सूचक है। इस जगतमें कर्म ही जैसे परस्पर एक-दूसरेको प्रेरित करते हैं, वैसे ही हम भी कर्मोंसे ही प्रेरित हुए हैं
কাল ক’লে—এই জগতত কৰ্মেই মানুহৰ দায়াদ; পুত্ৰ-পৌত্ৰৰ দৰে ই তাক অনুসৰণ কৰে। সুখ-দুখৰ সম্পৰ্কৰ লক্ষণো কৰ্মেই। ইয়াত কৰ্মে যেনেকৈ পৰস্পৰে পৰস্পৰক প্ৰেৰণা দিয়ে, তেনেকৈ আমিও কৰ্মৰ দ্বাৰাই চলিত হওঁ।
Verse 74
यथा मृत्पिण्डत: कर्ता कुरुते यद् यदिच्छति । एवमात्मकृतं कर्म मानव: प्रतिपद्यते,जैसे कुम्हार मिट्टीके लोंदेसे जो-जो बर्तन चाहता है वही बना लेता है। उसी प्रकार मनुष्य अपने किये हुए कर्मके अनुसार ही सब कुछ पाता है
যেনেকৈ কুমাৰে মাটিৰ ঢেলাৰ পৰা যি পাত্ৰ ইচ্ছা কৰে, তেনে পাত্ৰ গঢ়ে; তেনেকৈ মানুহে নিজৰেই কৃত কৰ্ম অনুসাৰে ফল ভোগ কৰে।
Verse 75
यथा च्छायातपौ नित्यं सुसम्बद्धौ निरन्तरम् । तथा कर्म च कर्ता च सम्बद्धावात्मकर्मभि:,जैसे धूप और छाया दोनों नित्य-निरन्तर एक-दूसरेसे मिले रहते हैं, उसी प्रकार कर्म और कर्ता दोनों अपने कर्मानुसार एक-दूसरेसे सम्बद्ध होते हैं
যেনেকৈ ৰ’দ আৰু ছাঁ নিত্য-নিৰন্তৰ অবিচ্ছিন্নভাৱে একেলগে জড়িত থাকে, তেনেকৈ কৰ্ম আৰু কৰ্তাও নিজৰ নিজৰ কৰ্মানুসাৰে অটুট বন্ধনত সংযুক্ত থাকে।
Verse 76
एवं नाहं न वै मृत्युने सर्पो न तथा भवान् । नचेयं ब्राह्मणी वृद्धा शिशुरेवात्र कारणम्,इस प्रकार विचार करनेसे न मैं, न मृत्यु, न सर्प, न तुम (व्याध) और न यह बूढ़ी ब्राह्यणी ही इस बालककी मृत्युमें कारण है। यह शिशु स्वयं ही कर्मके अनुसार अपनी मृत्युमें कारण हुआ है
এইদৰে বিচাৰ কৰিলে—ন মই, ন মৃত্যু, ন সাপ, ন তুমি (ব্যাধ), আৰু ন এই বৃদ্ধা ব্ৰাহ্মণী—এই শিশুৰ মৃত্যুৰ প্ৰকৃত কাৰণ নহয়; ইয়াত এই শিশুৱেই নিজৰ পূৰ্বকৰ্মৰ বলে নিজৰ মৃত্যুৰ কাৰণ হৈছে।
Verse 77
तस्मिंस्तथा ब्रुवाणे तु ब्राह्मणी गौतमी नृप । स्वकर्मप्रत्ययाँललोकान् मत्वार्जुनकमब्रवीत्
হে ৰাজন, তেওঁ এইদৰে ক’বলৈ ধৰোঁতেই ব্ৰাহ্মণী গৌতমীয়ে—জীৱসকলে নিজৰ নিজৰ কৰ্মৰ নিশ্চিত ফল অনুসাৰে নিজ নিজ লোক লাভ কৰে বুলি ভাবি—অৰ্জুনকক সম্বোধন কৰিলে।
Verse 78
नरेश्वरर कालके इस प्रकार कहनेपर गौतमी ब्राह्मणीको यह निश्चय हो गया कि मनुष्यको अपने कर्मोंके अनुसार ही फल मिलता है। फिर वह अर्जुनकसे बोली ।। गौतम्युवाच नैव कालो न भुजगो न मृत्युरिह कारणम् । स्वकर्मभिरयं बाल: कालेन निधनं गत:,गौतमीने कहा--व्याध! न यह काल, न सर्प और न मृत्यु ही यहाँ कारण हैं। यह बालक अपने कर्मोसे ही प्रेरित हो कालके द्वारा विनाशको प्राप्त हुआ है
গৌতমীয়ে ক’লে—হে ব্যাধ! ইয়াত ন কাল কাৰণ, ন সাপ, ন মৃত্যু। এই শিশুৱে নিজৰ কৰ্মপ্ৰেৰণাত কালেৰে বিনাশ প্ৰাপ্ত হৈছে।
Verse 79
मया च तत् कृतं कर्म येनायं मे मृत: सुतः । यातु कालस्तथा मृत्युर्मुज्चार्जुनक पन्नगम्,अर्जुनक! मैंने भी वैसा कर्म किया था जिससे मेरा पुत्र मर गया है। अत: काल और मृत्यु अपने-अपने स्थानको पधारें; और तू इस सर्पको छोड़ दे
অৰ্জুনক! মইও তেনে কৰ্ম কৰিছিলোঁ, যাৰ ফলত মোৰ পুত্ৰ মৃত্যুবৰণ কৰিলে। সেয়ে কাল আৰু মৃত্যু নিজ নিজ স্থানলৈ যাওক; আৰু তুমি এই সাপটোক মুক্ত কৰি দিয়া।
Verse 80
भीष्म उवाच ततो यथागतं जम्मुर्मुत्यु: कालो5थ पन्नग: । अभूद् विशोकोअर्जुनको विशोका चैव गौतमी
ভীষ্মে ক’লে—তাৰ পাছত মৃত্যু, কাল আৰু সৰ্প যেনেকৈ আহিছিল তেনেকৈয়ে উভতি গ’ল। অৰ্জুনকৰ শোক দূৰ হ’ল, আৰু গৌতমীৰো শোক নাশ হ’ল।
Verse 81
भीष्मजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर काल, मृत्यु और सर्प जैसे आये थे वैसे ही चले गये; और अर्जुनक तथा गौतमी ब्राह्मणीका भी शोक दूर हो गया ।। एतत् श्र॒ुत्वा शमं गच्छ मा भू: शोकपरो नृप । स्वकर्मप्रत्ययॉल्लोकान् सर्वे गच्छन्ति वै नूप
ভীষ্মে ক’লে—ৰাজন! তাৰ পাছত কাল, মৃত্যু আৰু সৰ্প যেনেকৈ আহিছিল তেনেকৈয়ে গ’ল; আৰু অৰ্জুনক আৰু ব্ৰাহ্মণী গৌতমীৰ শোকো শমিল। এই কথা শুনি তুমি শান্ত হও; হে নৃপ, শোকত পৰি নাথাকিবা। সকলেই নিজৰ নিজৰ কৰ্মফলৰ প্ৰত্যয়ত নিজ নিজ লোকলৈ গমন কৰে।
Verse 82
नरेश्वर! इस उपाख्यानको सुनकर तुम शान्ति धारण करो, शोकमें न पड़ो। सब मनुष्य अपने-अपने कर्मोके अनुसार प्राप्त होनेवाले लोकोंमें ही जाते हैं ।। नैव त्वया कृतं कर्म नापि दुर्योधनेन वै । कालेनैतत् कृतं विद्धि निहता येन पार्थिवा:,तुमने या दुर्योधनने कुछ नहीं किया है। कालकी ही यह सारी करतूत समझो, जिससे समस्त भूपाल मारे गये हैं
হে নৰেশ্বৰ! এই উপাখ্যান শুনি তুমি শান্তি ধাৰণ কৰা; শোকত নপৰা। সকলো মানুহে নিজৰ নিজৰ কৰ্ম অনুসাৰে প্ৰাপ্য লোকলৈহে গমন কৰে। এই কাম ন তুমি কৰিছা, ন দুঃৰ্যোধনে; জানি থোৱা, এই সকলো কালে কৰাইছে—যাৰ দ্বাৰা পৃথিৱীৰ ভূপালসকল নিহতা হৈছে।
Verse 83
वैशम्पायन उवाच इत्येतद् वचन श्रुत्व बभूव विगतज्वर: । युधिष्ठिरो महातेजा: पप्रच्छेद॑ च धर्मवित्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मकी यह बात सुनकर महातेजस्वी धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिरकी चिन्ता दूर हो गयी; तथा उन्होंने पुनः इस प्रकार प्रश्न किया
বৈশম্পায়নে ক’লে—জনমেজয়! ভীষ্মৰ এই বাক্য শুনি মহাতেজস্বী ধৰ্মজ্ঞ যুধিষ্ঠিৰৰ অন্তৰৰ জ্বৰ দূৰ হ’ল; তাৰ পাছত তেওঁ পুনৰ প্ৰশ্ন কৰিলে।
Whether retaliatory punishment of an immediate agent (the serpent) is ethically justified when the harm is irreversible, and when deeper causality may lie in karma and time rather than in a single proximate actor.
Cultivate śama by distinguishing instrumental conditions from ultimate moral causality: outcomes unfold through karma within kāla, so grief and blame should be processed through ethical discernment, restraint, and non-vengeance.
A brief narrative meta-effect functions as the closure: after hearing Bhīṣma’s exemplum, Yudhiṣṭhira becomes ‘vigatajvara’ (freed from feverish agitation) and proceeds with further dharma-questions, indicating the intended calming and instructional result rather than a formal phalaśruti.