Mahabharata Adhyaya 181
Vana ParvaAdhyaya 18139 Verses

Adhyaya 181

Karma, Preta-gati, and the Continuity of Phala (Mārkaṇḍeya’s Instruction)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Yudhiṣṭhira Saṃvāda (Karma-gati and Phala Discourse)

Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira, observing his own fall from comfort and the rise of unethical Dhārtarāṣṭras, presses a technical question: if a person is the doer of auspicious and inauspicious acts and consumes their results, in what sense is there an overarching controller, and when/where do karmic residues operate—here, after death, or in another embodiment? Mārkaṇḍeya validates the inquiry and explains a moral-causal model: Prajāpati’s earlier order is described as one in which beings were pure and self-regulated; later, desire, anger, deceit, greed, and delusion lead to abandonment of higher states and repeated maturation of suffering through varied births. He then outlines continuity: at life’s end the body is relinquished, rebirth occurs without an “intermediate non-existence,” and one’s own karma follows like a shadow, fructifying as conditions of pleasure or pain and as observable auspicious/inauspicious traits. The teaching distinguishes the trajectory of the unwise from the superior path of the disciplined—marked by self-control, truth, study, and service—culminating in a comparative schema of who gains welfare in this world, the next, both, or neither.

Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं—युधिष्ठिर अपने प्रिय भाई भीम को सर्प के शरीर में जकड़ा हुआ पाते हैं और उसी क्षण प्रश्नों की वर्षा से संकट का मूल जानना चाहते हैं। → भीम बताता है कि यह कोई साधारण नाग नहीं, राजर्षि नहुष है—अहंकार के पतन से सर्प-योनि में पड़ा हुआ। युधिष्ठिर और सर्प के बीच प्रश्नोत्तर आरम्भ होता है, जहाँ जीवन, सुख-दुःख और ‘जाति’ जैसे कठिन विषयों पर परीक्षा ली जाती है; भीम का जीवन उत्तरों पर टिका है। → युधिष्ठिर ‘जाति’ के प्रश्न पर निर्णायक तर्क रखता है—मनुष्यत्व में वर्ण-जाति का संकर और आचरण-संस्कार की प्रधानता; बिना संस्कार-वेदाध्ययन के मनुष्य शूद्रवत् है—यह मनु-निर्णय का संकेत देकर वह सर्प की बौद्धिक चुनौती को भेद देता है। → सर्प (नहुष) युधिष्ठिर के ज्ञान और विवेक को स्वीकार करता है—‘तुम सब जानने योग्य जानते हो’—और भीम को भक्षण करने का विचार त्यागकर उसे मुक्त करने की ओर प्रवृत्त होता है; संवाद से शाप-बंधन ढीला पड़ता है। → नहुष के उद्धार/शाप-निवृत्ति की शर्तें और मुक्त होने के बाद की परिणति अगले प्रसंग की ओर संकेत करती है।

Shlokas

Verse 1

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! सर्पके शरीरसे बँधे हुए अपने प्रिय भाई भीमसेनके पास पहुँचकर परम बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिरने इस प्रकार पूछा--

قال فايشَمبايانا: «يا جاناميجايا، لما بلغ يودهيشثيرا، وهو بالغ الحكمة، إلى أخيه الحبيب بهِيماسينا، وقد قُيِّد بلفائف جسد حيّة، سأله على هذا النحو.»

Verse 2

कुन्तीमात: कथमिमामापदं त्वमवाप्तवान्‌ । कश्षायं पर्वताभोगप्रतिम: पन्नगोत्तम:

قال فايشَمبايانا: «يا ابنَ كونتي، كيف وقعتَ في هذه النازلة؟ ومن هذا الحيّةُ الأسمى، العريضُ العظيمُ كأنه سلسلةُ جبال؟» فلما رأى بهِيماسينا أخاه الأكبر دهرماراجا يودهيشثيرا حاضرًا هناك، قصَّ عليه بالتفصيل كل ما جرى—ابتداءً من أَسْره، وما بذله بعد ذلك من محاولات.

Verse 3

स धर्मराजमालक्ष्य भ्राता भ्रातरमग्रजम्‌ । कथयामास तत्‌ सर्व ग्रहणादि विचेष्टितम्‌

فلما لمح بهِيما دهرماراجا يودهيشثيرا، أخاه الأكبر، دنا منه وروى له كل ما حدث—ابتداءً من أَسْره—مبيّنًا مجرى الوقائع الغريب. وبهذا تُدرَج الحادثة في إطارها الأخلاقي: مسؤولية المرء تجاه إخوته، وواجب الإخبار بالحق في ساعة الشدة.

Verse 4

भीम उवाच अयमार्य महासत्वो भक्षार्थ मां गृहीतवान्‌ । नहुषो नाम राजर्षि: प्राणवानिव संस्थित:

قال بهيما: «يا أيها الشريف! لقد أمسك بي هذا الكائن الجبار ليجعلني طعامًا. إنه الحكيم الملكي المسمّى نَهُوشَة، جالسٌ هنا كأنه ما يزال حيًّا».

Verse 5

युधिछिर उवाच मुच्यतामयमायुष्मन्‌ भ्राता मेडमितविक्रम: । वयमाहारमन्यं ते दास्याम: क्षुज्ञिवारणम्‌

قال يودهِشْتِهيرا: «أيها المبجَّل، أطلق سراح أخي هذا، فبأسه متّقد. سنمنحك طعامًا آخر يكفي ليدفع عنك الجوع».

Verse 6

सर्प उवाच आहाते राजपुत्रो5यं मया प्राप्तो मुखागतः । गम्यतां नेह स्थातव्यं श्वो भवानपि मे भवेत्‌

قالت الحيّة: «أيها الملك، إن هذا الأمير قد جاء من تلقاء نفسه إلى فمي، فصار طعامي. امضِ من هنا؛ لا يليق بك أن تمكث في هذا الموضع. وإلا فغدًا قد تصير أنت أيضًا فريستي».

Verse 7

व्रतमेतन्महाबाहो विषयं मम यो व्रजेत्‌ स मे भक्षो भवेत्‌ तात त्वं चापि विषये मम

قالت الحيّة: «يا ذا الساعد القوي، هذا نذري: من دخل دياري صار طعامًا لي. يا بُنيّ، لقد دخلتَ أنت أيضًا الآن ضمن حدود سلطاني».

Verse 8

चिरेणाद्य मया55हार: प्राप्तोडयमनुजस्तव । नाहमेनं विमोक्ष्यामि न चान्यमभिकाड्क्षये

قالت الحيّة: «بعد صيامٍ طويل، وقع أخوك الأصغر اليوم في يدي طعامًا لي. فلن أطلقه، ولا أرغب في وجبةٍ أخرى عوضًا عنه».

Verse 9

युधिष्ठिर उवाच देवो वा यदि वा दैत्य उरगो वा भवान्‌ यदि । सत्यं सर्प वचो ब्रूहि पृच्छति त्वां युधिष्ठिर: । किमर्थ च त्वया ग्रस्तो भीमसेनो भुजड़म

قال يودهيشثيرا: «أأنتَ إلهٌ أم عفريتٌ (أسورا) أم إنك حقًّا حيّة؟ فقل الصدق، أيها الثعبان؛ إن يودهيشثيرا يسألك. ولأيّ سببٍ ابتلعتَ بهيماسينا، أيها الأفعى العظيمة؟»

Verse 10

किमाह्त्य विदित्वा वा प्रीतिस्ते स्याद्‌ भुजड़म्‌ । किमाहारं प्रयच्छामि कथं मुज्चेद्‌ भवानिमम्‌

قال يودهيشثيرا: «أيها الثعبان، ماذا أحمل إليك، أو أيَّ علمٍ أُلقِّنك، لكي ترضى؟ أيَّ طعامٍ أقدّم، أو بأي وسيلةٍ تطلق سراح هذا؟»

Verse 11

सर्प उवाच नहुषो नाम राजाहमासं पूर्वस्तवानघ । प्रथित: पजचम: सोमादायो: पुत्रो नराधिप

قال الثعبان: «أيها الملك الطاهر من الإثم، في مولدٍ سابق كنتُ سلفَك المشهور، الملك المسمّى نَهُوشا. يا سيّد البشر، أنا المعروف خامسًا في النسب من سوما (القمر)، ابنُ آيو.»

Verse 12

क्रतुभिस्तपसा चैव स्वाध्यायेन दमेन च । त्रैलोक्यैश्वर्यमव्यग्र॑ प्राप्तोडहं विक्रमेण च

قال الثعبان: «بالقرابين، وبالزهد (التقشّف)، وبدرس المعارف المقدّسة، وبكبح النفس، نلتُ—من غير شاغل ولا عائق—سيادة العوالم الثلاثة؛ ونلتها كذلك ببأسِي وشجاعتي.»

Verse 13

तदैश्वर्य समासाद्य दर्पो मामगमत्‌ तदा । सहसं हि द्विजातीनामुवाह शिबिकां मम

قال الثعبان: «فلما نلتُ ذلك السلطان والثراء، استولى عليّ الكِبر. حقًّا، جعلتُ محملي يُحمل على أكتاف ألفٍ من “ذوي الميلاد الثاني” (البراهمة).»

Verse 14

ऐश्वर्यमदमत्तो5हमवमन्य ततो द्विजान्‌ । इमामगस्त्येन दशामानीत: पृथिवीपते

قالت الحيّة: «لقد أسكرني زهو السلطان والثراء، فازدرَيتُ ذوي المولدَين. يا سيّد الأرض! إنّ الحكيم أغاستيا قد أنزلني إلى هذه الحال. سكرانَ بالمال، جعلتُ آلافَ البراهمة يحملون محملي؛ ثمّ لمّا طغيتُ بنشوة النعمة أهنتُ كثيرًا من البراهمة. فغضب المَهرِشي أغاستيا لذلك وأوقعني في هذه الحالة. غير أنّه بفضل تلك النفس العظيمة لم تفارقني ذاكرتي إلى اليوم—فوعيي باقٍ سليمًا.»

Verse 15

न तु मामजहात्‌ प्रज्ञा यावदद्येति पाण्डव | तस्यैवानुग्रहाद्‌ राजन्नगस्त्यस्य महात्मन:

«غير أنّ فطنتي لم تهجرني إلى هذا اليوم، يا ابن باندو. أيها الملك، إنما بفضل عناية الحكيم أغاستيا، ذي النفس العظيمة، بقيت ذاكرتي وبصيرتي سليمتين.»

Verse 16

षष्ठे काले मया55हार: प्राप्तोड्यमनुजस्तव । नाहमेन॑ विमोक्ष्यामि न चान्यदपि कामये

قالت الحيّة: «في الموعد السادس المعيَّن، ووفقًا للّعنة التي أطلقها الرِّشي، جاءني أخوك الأصغر هذا طعامًا لي. لذلك لن أطلقه، ولا أرغب في بديلٍ آخر عنه.»

Verse 17

प्रश्नानुच्चारितानद्य व्याहरिष्यसि चेन्मम । अथ पश्चाद्‌ विमोक्ष्यामि भ्रातरं ते वकोदरम्‌

قالت الحيّة: «غير أنّ لي شرطًا: إن أنتَ اليوم نطقتَ بأجوبة الأسئلة التي طرحتُها، فبعد ذلك أُطلق سراح أخيك فاكودارا (بهِيما).»

Verse 18

युधिछिर उवाच ब्रृहि सर्प यथाकामं प्रतिवक्ष्यामि ते वच: । अपि चेच्छकनुयां प्रीतिमाहर्तु ते भुजज्म

قال يودهيشثيرا: «تكلّمْ يا أيها الحيّة بما تشاء، فسأجيب عن قولك. وإن أمكن، يا ناغا، سعيتُ لأن أُرضيك.»

Verse 19

वेद्यं च ब्राह्मणेनेह तद्‌ भवान्‌ वेत्ति केवलम्‌ | सर्पराज ततः: श्र॒त्वा प्रतिवक्ष्यामि ते वच:

قال يودهيشثيرا: «هنا، ما ينبغي للبراهمن أن يعرفه—أنت وحدك، يا ملك الحيّات، تعرفه كاملاً. وبعد أن أسمع ذلك، يا سَربَراجا، سأجيب عن كلامك (وأسئلتك).»

Verse 20

सर्प उवाच ब्राह्मण: को भवेद्‌ राजन्‌ वेद्यं कि च युधिष्ठिर । ब्रवीह्मतिमतिं त्वां हि वाक्यैरनुमिमीमहे

قالت الحيّة: «يا ملك يودهيشثيرا، من هو البراهمن حقًّا، وما الحقيقة الجوهرية التي ينبغي أن تُعرَف؟ تكلّم. فمن كلماتك أستدلّ أنك رجل ذو ذكاء استثنائي.»

Verse 21

युधिछिर उवाच सत्यं दानं क्षमा शीलमानृशंस्यं तपो घृणा । दृश्यन्ते यत्र नागेन्द्र स ब्राह्मण इति स्मृत:

قال يودهيشثيرا: «يا سيد الحيّات، من ظهرت فيه الصدق، والسخاء، والحِلم، وحسن السيرة، والخلوّ من القسوة، والزهدُ (التقشّف)، والرحمة—فذلك يُذكَر أنه براهمن.»

Verse 22

वेद्य॑ सर्प परं ब्रह्म निर्दुः:खमसुखं च यत्‌ । यत्र गत्वा न शोचन्ति भवत: कि विवक्षितम्‌

قال يودهيشثيرا: «المعروف الذي ينبغي أن يُعرَف، يا حيّة، هو البراهمان الأعلى—المتجاوز للحزن والمتجاوز للسرور. فإذا بَلَغه الناس (أو حقّقوه بالمعرفة) لم يعودوا يجزعون. فقل لي، يا حيّة: ماذا تريد أن تقول الآن في هذا الشأن؟»

Verse 23

सर्प उवाच चातुर्वर्ण्य प्रमाणं च सत्यं च ब्रह्म चैव हि | शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानमक्रोध एव च । आनृशंस्यमहिंसा च घृणा चैव युधिछिर

قالت الحيّة: «يا يودهيشثيرا، إن الصدق، والمعيارَ المعتمد لنظام الفَرْنات الأربع (چاتورڤَرْنْيا)، بل والبراهمان نفسه، إنما هو لخير جميع الفَرْنات. وحتى بين الشودرَة تُوجَد الصدقُ والسخاءُ وتركُ الغضب؛ وكذلك الرحمةُ، واللاّعنف (أهِمْسا)، ورقّةُ القلب. فالفضيلة ليست حبيسةَ المولد.»

Verse 24

वेद्यं यच्चात्र निर्दुः:खमसुखं च नराधिप । ताभ्यां हीन॑ पद चान्यन्न तदस्तीति लक्षये

قالت الحيّة: «أيّها الملك، إنّ المبدأ القابل للمعرفة الذي تصفه هنا بأنه متجاوز للحزن واللذّة—لا أرى حالةً ولا حقيقةً أخرى قائمةً بمعزلٍ عن هذين الاثنين. وفي نظري لا يوجد شيءٌ يُعثر عليه خالصًا من الألم والسعادة معًا».

Verse 25

युधिछिर उवाच शूद्रे तु यद्‌ भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते । न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मण:

قال يودهيشثيرا: «إن وُجدت علاماتُ الفضيلة في الشودرَة ولم توجد في “المولود مرّتين” (دْوِجَ)، فذلك الشودرَة ليس شودرَةً حقًّا، وذلك البراهمن ليس براهمنًا حقًّا. ينبغي أن يُعرَف براهمنًا من كانت فيه صفاتٌ كالصّدق ونحوِه؛ وأن يُسمّى شودرَةً من خلت منه تلك الصفات.»

Verse 26

यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मण: स्मृतः । यत्रैतन्न भवेत्‌ सर्प तं शूद्रमिति निर्दिशेत्‌

قال يودهيشثيرا: «يا أيّها الحيّة، حيثما تُرى هذه السيرة—الموسومة بالعلامات المذكورة كالصّدق ونحوِه—فذلك الشخص يُعدّ براهمنًا. أمّا حيث تغيب هذه الصفات، يا أيّها الحيّة، فينبغي أن يُشار إلى ذلك الشخص بأنه شودرَة.»

Verse 27

यत्‌ पुनर्भवता प्रोक्तं न वेद्यं विद्यतीति च । ताभ्यां हीनमतो<न्यत्र पदमस्तीति चेदपि

قال يودهيشثيرا: «وأمّا ما ذكرته—أنّه لا توجد حقيقةٌ قابلةٌ للمعرفة وراء ميدان الخبرة—فإنّ رأيي يخالفه. فما في التجربة المألوفة شيءٌ يَسْلَم حقًّا من اللذّة والألم؛ ومع ذلك فثمّة “مقام” (pada) في موضعٍ آخر، يتجاوزهما. فكما لا تُوجد الحرارة في الجليد، ولا البرودة في النار، كذلك ذلك المقام المعلوم في الحقيقة منزّهٌ عن السعادة والشقاء. يا سيّد الحيّات، هذا ما أفهمه؛ فاقبله إن شئت.»

Verse 28

एवमेतन्मतं सर्प ताभ्यां हीनं॑ न विद्यते | यथा शीतोष्णयोर्मध्ये भवेन्नोष्णं न शीतता

قال يودهيشثيرا: «هكذا الأمر، أيّها الحيّة؛ إنّ رأيك سديدٌ: فبين الأشياء القابلة للمعرفة لا يُوجد ما هو منزّهٌ كلّ التنزيه عن هذين الاثنين، اللذّة والألم. ومع ذلك فثمّة مقامٌ أعلى ينبغي أن يُعرَف؛ وهو في الحقيقة بريءٌ من اللذّة والألم. فكما لا حرارة في الجليد، ولا برودة في النار، كذلك ذلك المقام الأعلى المعلوم حقًّا متجاوزٌ للسعادة والشقاء. هذا هو فهمي بعد نظرٍ ورويّة، يا ملك الحيّات؛ فاقبله كما ترى.»

Verse 29

एवं वै सुखदु:खाभ्यां हीनमस्ति पद क्वचित्‌ | एषा मम मति: सर्प यथा वा मन्यते भवान्‌

قال يودهيشثيرا: «حقًّا، أفي موضعٍ ما حالةٌ تخلو خلوًّا تامًّا من اللذّة والألم؟ هذا ما أفهمه، أيّها الحيّة—غير أنّ الأمر لك كما ترى. ففي التجربة المألوفة لا يُعثر على شيءٍ فارغٍ تمامًا من السعادة والحزن؛ ومع ذلك يُتحدَّث عن “مقامٍ” يتجاوزهما حقًّا. وكما أنّ الحرارة لا تكون في الجليد، ولا البرودة في النار، كذلك ذلك المقام الأعلى القابل للمعرفة هو في الحقيقة منزَّهٌ عن اللذّة والألم. هذا رأيي بعد نظرٍ وتدبّر، يا سيّد الأفاعي؛ فاحكم بما تشاء.»

Verse 30

सर्प उवाच यदि ते वृत्ततो राजन ब्राह्मण: प्रसमीक्षित: । वृथा जातिस्तदा<<युष्मन्‌ कृतियविन्न विद्यते

قالت الحيّة: «أيّها الملك، إن كان البراهمن يُحكَم عليه بالسلوك وحده، فحينئذٍ—أيّها النبيل—تصير الولادة بلا معنى ما لم تُقارن بأفعالٍ توافق ذلك السلوك.»

Verse 31

युधिछिर उवाच जातिरत्र महासर्प मनुष्यत्वे महामते | संकरात्‌ सर्ववर्णानां दुष्परीक्ष्येति मे मति:

قال يودهيشثيرا: «يا أيّها الثعبان العظيم، يا واسع الرأي! إن امتحان “الطبقة بالميلاد” بين الناس لعسيرٌ جدًّا؛ لأن جميع الفَرْنات في هذا الزمان قد اختلط بعضها ببعض. هذا ما أراه.»

Verse 32

सर्वे सर्वास्वपत्यानि जनयन्ति सदा नरा: | वाड्मैथुनमथो जन्म मरणं च सम॑ नृणाम्‌

قال يودهيشثيرا: «إن الناس جميعًا، في كل حين، يُنجبون من نساءٍ من كل جماعة. والكلام، والاتصال الجنسي، وكذلك الميلاد والموت—كل ذلك يُرى واحدًا بين البشر. لذلك فإن الحكماء الذين يبصرون الحقيقة يجعلون السلوك والخلق هو الأصل، ويرونه وحده المعيار الحاسم.»

Verse 33

इदमार्ष प्रमाणं च ये यजामह इत्यपि । तस्माच्छील प्रधानेष्टं विदुर्ये तत््वदर्शिन:

قال يودهيشثيرا: «وهنا أيضًا سُلطةٌ قديمة مُقرَّة من الرُّشاة: العبارة الفيدية ‘ye yajāmahe’—أي ‘نحن الذين نقيم القربان’—تتكلّم على وجه العموم دون تثبيتٍ صارم لتعيينٍ قائمٍ على الميلاد. لذلك فإن الحكماء الذين يرون الحقيقة حقًّا يجعلون السلوك (الخلق) هو المعيار الأوّل، ويرون أنه وحده الأجدر بالابتغاء.»

Verse 34

प्राइनाभिवर्धनात्‌ पुंसो जातकर्म विधीयते । तत्रास्य माता सावित्री पिता त्वाचार्य उच्यते

قال يودهيشثيرا: «لأن قوة الحياة (برانا) في الإنسان تُغذّى وتُقوّى، شُرِعَت الشعيرة المسماة جاتاكارما. وفي هذا المعنى تُعَدّ سافيتري—وهي تعويذة الغاياتري/سافيتري المقدسة التي توقظ الحياة الروحية—أمَّه، ويُدعى المعلّم (آتشاريّا) أباه».

Verse 35

जब बालकका जन्म होता है, तब नालच्छेदनके पूर्व उसका जातकर्म-संस्कार किया जाता है। उसमें उसकी माता सावित्री कहलाती है और पिता आचार्य ।।

ما دام المرء لم «يُولَد في الفيدا»—أي لم يُنَشَّأ بالاستدخال إلى دراسة الفيدا—فإنه يُعَدّ مساوياً للشودرَة. وحين ثار الشك في الفهم حول هذه المسألة، أعلن مانو سْفايَمبهوفا، السلف المولود من ذاته، القاعدة مبيّناً أن المنزلة الحقّة تقوم على الانضباط والعلم المقدّس لا على مجرد الميلاد الجسدي.

Verse 36

कृतकृत्या: पुनर्वर्णा यदि वृत्तं न विद्यते । संकरस्त्वत्र नागेन्द्र बलवान्‌ प्रसमीक्षित:

قال يودهيشثيرا: «إن كان كل شيء قد أُنجز على وجهه، ومع ذلك لم توجد رواية واضحة عمّا جرى، فهنا—يا سيد الحيّات—ينبغي أن يُتأمَّل بعناية في العامل القويّ: الاضطراب والاختلاط (سانكارا) القادرين على تشويه الوقائع والفهم».

Verse 37

जबतक बालकका संस्कार करके उसे वेदका स्वाध्याय न कराया जाय

قال يودهيشثيرا: «ما دام الغلام، وإن أُجريت له طقوس التهذيب، لم يُوجَّه إلى الدراسة المنضبطة للفيدا (سفادهيَايا)، فهو يُعَدّ لا يختلف عن الشودرَة. وإذا وقع الشك في شأن منزلة الفَرْنَة، فقد أصدر مانو سْفايَمبهوفا الحكم نفسه. يا ملك الحيّات! حتى لو تلقّى المرء الأسرار/السكارات الفيدية ودرس الفيدا، فإن لم تظهر الفضائل وحسن السيرة التي يُنتظر أن تنشأ في البراهمن وسائر الطبقات، فبعد التأمل الواجب يُقضى بأن في داخله اختلاطاً واضطراباً شديدين في الفَرْنَات (varṇa-saṅkara). لذلك، يا أيها الحيّة العظيمة، يا أفضل الحيّات: من وُجد اليوم جامعاً بين السَّمْسْكَارات المُهذِّبة وبين سلوكٍ مُصقَل، فذاك أسميه براهمناً. وهذا ما قد أخبرتك به من قبل.»

Verse 38

सर्प उवाच श्रुतं विदितवेद्यस्थ तव वाक्य युधिष्ठिर । भक्षयेयमहं कस्माद्‌ भ्रातरं ते वकोदरम्‌

قالت الحيّة: «يا يودهيشثيرا، لقد سمعتُ كلامك سماعاً حسناً؛ فأنت ثابتٌ في ما ينبغي أن يُعرَف ويُفهَم. فبأيّ حُجّة أستطيع الآن أن ألتهم أخاك بهيما—ذا البطن الجبّار؟»

Verse 180

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आजगरपर्वणि युधिष्ठिरसर्पसंवादे अशीत्यधिकशततमोडयाय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आजगरपर्वमें युधिष्टिरसर्पसंवादाविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ

وهكذا، في «المهابهارتا» الشريفة، ضمن «فانا بارفا»—وخاصةً في مقطع «آجاغارا»—تنتهي محاورة يودهيشثيرا مع الحيّة؛ وبهذا يكتمل الفصل المئة والثمانون. وتدلّ خاتمةُ النصّ على تمامِ مناظرةٍ تعليميةٍ جرى فيها تمحيصُ الدارما بالسؤال والتأمّل لا بالقوة.

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira’s dilemma is whether suffering is merely imposed by an external controller or is primarily the consequence of personal and collective moral agency—i.e., how responsibility is assigned for pleasure and pain amid apparent injustice.

The chapter teaches continuity of moral causation: actions accumulate and accompany the agent across death and rebirth, while disciplined conduct (restraint, truth, study, and teacher-service) is presented as a higher trajectory that stabilizes welfare across worlds.

Rather than a formal phalaśruti, the chapter embeds a meta-claim: correct understanding of karma-gati reduces doubt and supports steadiness (sthiti) in adversity, positioning insight itself as a functional benefit within the dharma framework.

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