
Chapter Arc: कर्ण के रथ, घोड़े और हाथियों के नष्ट हो जाने तथा सूतपुत्र के रणभूमि में गिर पड़ने का दृश्य देखकर कौरव-सेना स्तब्ध हो जाती है; दुर्योधन आँसुओं से भरी आँखों और टूटे श्वासों के साथ शोक में डूब जाता है। → कर्ण के रक्त-लिप्त, शर-आच्छादित शरीर को सूर्य के समान पृथ्वी पर पड़ा देख योद्धा चारों ओर घिर आते हैं; दुर्योधन के भीतर हार का भय, क्रोध और असहायता एक साथ उठते हैं, और वह शल्य के वचनों से ‘दैव’ की कठोरता का अर्थ टटोलता है। → शल्य का कटु-यथार्थ: ‘भारत-युद्ध में कर्ण-अर्जुन जैसा संग्राम कभी न हुआ; पर दैव पाण्डवों की रक्षा करता और हमारे वीरों का नाश करता है’—यह वाक्य दुर्योधन के मन में निर्णायक चोट करता है, और वह बार-बार दीर्घ निःश्वास छोड़ता हुआ लगभग मूर्छित-सा हो जाता है। → शल्य दुर्योधन को समझाता है कि अनेक समतुल्य-प्रभावशाली, अवध्य-कल्प वीर भी पाण्डवों द्वारा मारे गए—यह दिष्टि का विधान है; इसलिए शोक से उबर कर शेष युद्ध-व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। → शल्य के ‘प्रत्यागमन’ (रथ/शिविर की ओर लौटने और पुनः व्यवस्था सँभालने) के साथ संकेत मिलता है कि कौरव पक्ष अब नए नेतृत्व/रणनीति की ओर मुड़ेगा—पर दुर्योधन का शोक क्या उसे निर्णय-क्षम रख पाएगा?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६९ “लोक हैं।) अपन क्ाता छा आर: 2 द्विनवतितमो<ध्याय: कौरवोंका शोक
قال سنجيا: أيها الملك، لما رأى الجيوش وقد سُحقت بالسهام في الصدام العنيف بين كَرْنَة وأرجونا، ورأى كَرْنَة ابن أدهيرَثَة مقتولًا وهو على قدميه، انصرف الملك شَلْيَة من ذلك الموضع على عربته، وقد تكسّرت أستارها وسائر عُدّتها.
Verse 2
निपातितस्यन्दनवाजिनागं बलं॑ च दृष्टवा हतसूतपुत्रम् । दुर्योधनो श्रुप्रतिपूर्णनेत्रो दीनो मुहुर्नि:श्वसंश्चार्तरूप:
قال سنجيا: لما رأى جيش الكورو وقد سقطت عرباته وخيوله وفيلته صرعى، ورأى ابن السائق مقتولًا، امتلأت عينا دُريودَهَنَ بالدموع. وأخذ يطلق زفراتٍ عميقة مرارًا، فغدا كئيبًا ذليلًا، تبدو عليه سِماتُ من غلبه الحزن.
Verse 3
कर्ण तु शूरं पतितं पृथिव्यां शराचितं शोणितदिग्धगात्रम् । यदृच्छया सूर्यमिवावनिस्थं दिदृक्षव: सम्परिवार्य तस्थु:
قال سنجيا: كان كَرْنَة، ذلك البطل، مطروحًا على الأرض، جسده مخترقٌ بالسهام ومضمّخٌ بالدم. وكان مضطجعًا هناك كالشمس التي—بمنعطفٍ عجيبٍ من القدر—هبطت إلى التراب؛ فصار منظرًا تشخص إليه الأبصار: وقف الناس حوله يطوّقون جثمانه، يتشوّفون إلى رؤيته.
Verse 4
प्रह्ृष्टवित्रस्तविषण्णविस्मिता- स्तथा परे शोकहता इवाभवन् । परे त्वदीयाश्व॒ परस्परेण यथायथीषां प्रकृतिस्तथाभवन्
قال سنجيا: كان بعضهم طربًا مبتهجًا، وبعضهم مذعورًا، وبعضهم كئيبًا، وبعضهم مأخوذًا بالدهشة؛ وآخرون كأن الحزن قد سحقهم. غير أن رجالَك أنت أيضًا تباينت ردودهم بعضُهم تجاه بعض—كلٌّ بحسب طبيعته—فبان أن اضطراب الحرب يجعل السجية الباطنة تحكم السلوك الظاهر بقدر ما تحكمه الموالاة.
Verse 5
कोई प्रसन्न था तो कोई भयभीत। कोई विषादग्रस्त था तो कोई आश्वर्यवकित तथा दूसरे बहुत-से लोग शोकसे मृतप्राय हो रहे थे। आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमेंसे जिसकी जैसी प्रकृति थी, वे परस्पर उसी भावमें मग्न थे ।।
قال سنجيا: لما رأى الكوروُ كَرْنَ—ذا البأس العظيم—قد صرعه دهننجيا، وقد تناثرت دروعه وحُليّه وثيابه وسلاحه، انكسروا وولّوا هاربين، كقطيع من البقر فقد ثوره القائد، يركض مذعورًا في غابة موحشة.
Verse 6
जिसके कवच, आभूषण, वस्त्र और अस्त्र-शस्त्र छिन्न-भिन्न होकर पड़े थे, उस महाबली कर्णको अर्जुनद्वारा मारा गया देख कौरव-सैनिक निर्जन वनमें साँड़के मारे जानेपर भागनेवाली गायोंके समान इधर-उधर भाग चले ।।
قال سنجيا: ثم إن بهيما، بزئيره المهيب، أطلق صرخة مدوّية كأنها تُرجف السماء والأرض. وكان يصفّق بيديه ويثب بل ويرقص؛ إذ قُتل كَرْنَ، فكان ابتهاج بهيما باعثًا للرعب في قلوب أبناء دِهرتراشترا وجنده.
Verse 7
कर्णके मारे जानेपर धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भयभीत करते हुए भीमसेन भयंकर स्वरसे सिंहनाद करके आकाश और पृथ्वीको कँपाने तथा ताल ठोंककर नाचने-कूदने लगे ।।
قال سنجيا: لما شاع خبر مقتل كَرْنَ، أخذ بهيمسينا—مُفزعًا أبناء دِهرتراشترا—يزأر كزئير الأسد بصوت مروّع حتى خُيّل أن السماء والأرض ترتجفان؛ وضرب ذراعيه ابتهاجًا وراح يرقص ويثب. وكذلك، أيها الملك، نفخ السومَكَةُ والسِرِنْجَيَةُ جميعًا في محاراتهم وتعانقوا؛ فلما قُتل ابن السائق امتلأ الكشاتريا في جيش الباندافا في تلك اللحظة بالسرور الطاغي.
Verse 8
कृत्वा विमर्द महदर्जुनेन कर्णो हत: केसरिणेव नाग: । तीर्णा प्रतिज्ञा पुरुषर्षभेण वैरस्यान्तं गतवांश्षापि पार्थ:
قال سنجيا: بعد قتال عظيم ساحق صنعه أرجونا، قُتل كَرْنَ—كفيلٍ يُصرَع كما يُصرَع الفيل على يد الأسد. وهكذا أوفى بارثا (أرجونا)، ثور الرجال، بنذره وأبلغ العداوة القديمة نهايتها.
Verse 9
मद्राधिपश्चापि विमूढचेता- स्तूर्ण रथेनापकृतध्वजेन । दुर्योधनस्यथान्तिकमेत्य राजन् सबाष्पदु:खाद् वचनं बभाषे
قال سانجيا: أيها الملك! إن شاليا، سيد مَدْرا، قد اضطرب فؤاده أيضًا، فأسرع على عربته التي قُطِع لواؤها حتى دنا من دوريودhana. وبدموع الحزن والأسى نطق بهذه الكلمات—
Verse 10
विशीर्णनागाश्वर॒थ प्रवीरं बल॑ त्वदीयं यमराष्ट्रकल्पम् । अन्योन्यमासाद्य हत॑ महद्वि- नराश्वनागैर्गिरिकूटकल्पै:
قال سانجيا: «يا ملك البشر! لقد تكسّر جيشك—فيلته وخيله وعرباته وأبطالُه المقدمون—وتبدّد. وصار ميدان القتال كأنه مملكة يَما، ربّ الموت. جموعٌ من الرجال والخيول والفيلة العظام كقمم الجبال اندفعت بعضها إلى بعض، وفي ذلك التصادم المتبادل لقيت حتفها.»
Verse 11
नैतादृशं भारत युद्धमासीद् यथा तु कर्णार्जुनयोर्ब भूव । ग्रसस््तौ हि कर्णेन समेत्य कृष्णा- वन्ये च सर्वे तव शत्रवो ये
قال سانجيا: «يا بهاراتا، ما كان قطّ قتالٌ كمثل ما جرى اليوم بين كارنا وأرجونا. لقد اندفع كارنا اندفاعًا حتى كاد يقبض على كريشنا وأرجونا—ومعهما سائر أعدائك الحاضرين—فأوقعهم على شفير الهلاك؛ ومع ذلك لم يخرج من ذلك حسمٌ قاطع.»
Verse 12
दैवं ध्रुवं पार्थवशात् प्रवृत्तं यत् पाण्डवान् पाति हिनस्ति चास्मान् | तवार्थसिद्धयर्थकरास्तु सर्वे प्रसह वीरा निहता द्विषद्धिः
قال سانجيا: «إن القضاء لثابتٌ لا محالة، وهو يجري تحت سلطان ابن بريثا (أرجونا): يحمي الباندافا ويهلكنا. ولهذا قُتل أكثر الأبطال الذين سعوا لتحقيق مقاصدك قسرًا على يد العدو.»
Verse 13
कुबेरवैवस्वतवासवानां तुल्यप्रभावा नृपते सुवीरा: । वीर्येण शौर्येण बलेन तेजसा तैस्तैस्तु युक्ता विविधैर्गुणौचै:
«أيها الملك! إن خيرة أبطال جيشك كانوا ذوي أثرٍ يضاهي كُبيرا ويَما وإندرا؛ قد اجتمع لهم البأسُ والبطولةُ والشجاعةُ والتألّقُ وسائرُ صنوف الخصال الرفيعة.»
Verse 14
अवध्यकल्पा निहता नरेन्द्रा- स्तवार्थकामा युधि पाण्डवेयै: । तनन््मा शुचो भारत दिष्टमेतत् पर्याश्वस त्वं न सदास्ति सिद्धि:
قال سنجيا: إن أولئك الملوك الذين بدا كأنهم لا يُقتلون، والذين قاتلوا طلبًا لتحقيق مقاصدهم الخاصة، قد قُتلوا في المعركة على يد أبناء باندو. لذلك، يا بهاراتا، لا تحزن. فهذا مما قضاه القدر؛ فاشتدّ قلبك، إذ ليس النجاح نصيب الجميع في كل حين.
Verse 15
एतद् वचो मद्रपतेर्निशम्य स्वं चाप्यनीतं मनसा निरीक्ष्य दुर्योधनो दीनमना विसंज्ञ: पुनः पुनर्न्यश्वसदार्तरूप:
قال سنجيا: لما سمع دوريوذانا كلام سيد مادرا، وتأمّل في نفسه طريقه الجائر، استولى عليه اليأس وانكسر باطنه. وكأنه مذهول من شدة الألم، أخذ يطلق زفرات طويلة موجعة مرة بعد مرة.
Verse 91
इस प्रकार श्रीमह्याभारत कर्णपर्वमें कर्णवधविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
قال سنجيا: هكذا ينتهي الفصل الحادي والتسعون من «كرنا بارفا» في المهابهارتا المقدسة، في شأن مقتل كرنا. وتدل صيغة الختام هذه على انقضاء مقطع حاسم من الحرب، حيث تتجمع عواقب الاختيارات الماضية ومطالب الواجب (الدارما) لتبلغ نتيجة لا رجعة فيها.
Verse 92
इति श्रीमहा भारते कर्णपर्वणि शल्यप्रत्यागमने द्विनवतितमो<ध्याय:
هكذا ينتهي الفصل الثاني والتسعون من «كرṇa بارفا» في «شري مهابهارتا»، في القسم المتعلق بعودة شاليا. وتدل صيغة الختام هذه على انتقال في سرد الحرب، مذكِّرة السامع بأن الأحداث تتكشف ضمن إطار نصيّ وأخلاقي منظم، حيث تُسجَّل أفعال ساحة القتال مقرونةً بالمساءلة والعاقبة.
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