
Adhyāya 41 — Yudhiṣṭhira’s Gurv-anumati and Strategic Counsel (युधिष्ठिरस्य गुर्वनुमतिः)
Upa-parva: Gurv-anumati (Elders’ Permission) Episode within Bhīṣma-parva
Sañjaya reports a renewed martial uproar as the Pāṇḍava side sights Arjuna with Gāṇḍīva; conches, drums, and horns intensify, and celestial observers (devas, gandharvas, pitṛs, siddhas, cāraṇas, and ṛṣis) assemble to witness the impending violence. Yudhiṣṭhira, seeing the armies in motion, removes armor and weaponry, descends from his chariot, and proceeds on foot with folded hands toward the enemy host. His brothers question the action; he remains silent until Kṛṣṇa explains the intent: to honor and obtain permission from revered elders (Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Śalya) before fighting, citing a traditional risk of censure when elders are not duly acknowledged. The Kaurava soldiers misinterpret his approach as fear and discuss it publicly, producing both derision and suspense about what will be said. Yudhiṣṭhira reaches Bhīṣma, touches his feet, requests consent and blessings to fight, and asks for a method to overcome him. Bhīṣma grants blessings yet claims invincibility while his death-time has not arrived. Yudhiṣṭhira repeats the protocol with Droṇa, who blesses him and states that victory is impossible while Droṇa fights; he can be brought down only if he lays down weapons upon hearing credible grievous news from a trustworthy source. Yudhiṣṭhira approaches Kṛpa (Gautama), who declares himself not killable in battle and blesses him. He then approaches Śalya, who permits him and agrees to reduce Karṇa’s martial “tejas” in their confrontation. Kṛṣṇa also negotiates with Karṇa to stand aside while Bhīṣma leads. The Kaurava prince Yuyutsu transfers allegiance to the Pāṇḍavas. The chapter ends with re-arming, re-forming battle arrays, and renewed signals of morale and approval.
Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के रण-कोलाहल के बीच श्रीकृष्ण अर्जुन के भीतर उठते प्रश्न को पकड़ते हैं—जीव को बाँधने वाली शक्ति क्या है, और उससे परे जाने का उपाय कौन-सा ज्ञान है? → भगवान प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रज, तम—का नाम लेकर उनके बंधन-स्वरूप और लक्षण स्पष्ट करते हैं: तम का अज्ञानजन्य मोह, प्रमाद-आलस्य-निद्रा; रज का लोभ, प्रवृत्ति, कर्मारम्भ, अशम, स्पृहा। अर्जुन के लिए यह केवल सिद्धान्त नहीं, युद्धभूमि में तत्काल निर्णयों का दर्पण बन जाता है। → ‘महत्-ब्रह्मरूप मूल प्रकृति’ को समस्त भूतों की योनि बताकर कृष्ण स्वयं को चेतन-बीज स्थापित करने वाला बताते हैं—यहीं से गुणों का खेल, देह-धारण और पुनर्जन्म की धारा समझ में आती है; और उसी के साथ यह भी कि इस ज्ञान का आश्रय लेने वाले ‘सर्गेऽपि नोपजायन्ते, प्रलये न व्यथन्ति’—सृष्टि में फिर बँधते नहीं, प्रलय में विचलित नहीं होते। → अध्याय गुण-वृद्धि के संकेतों और उनके फल (मृत्यु के समय किस गुण की प्रधानता किस गति की ओर ले जाती है) की ओर संकेत देकर यह निष्कर्ष बैठाता है कि बंधन का कारण गुण-संग है, और मुक्ति का द्वार गुणों को जानकर उनसे असंग होना। → गुणों की प्रधानता के अनुसार मृत्यु के बाद की गति/लोक-प्राप्ति का निर्णायक विवरण अगले प्रवाह में और तीक्ष्ण रूप से खुलने को खड़ा रहता है।
Verse 1
५)। इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये भगवानने गीताके चौदहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें सत्त्व, रज और तम--इस प्रकार तीनों गुणोंका नाम देकर तीनोंको प्रकृतिसम्भव बतलाया है। २. यहाँ “प्रकृति” शब्द ईश्वरकी अनादिसिद्ध मूल प्रकृतिका वाचक है। गीताके चौदहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें इसीको महदब्रह्मके नामसे कहा गया है। सातवें अध्यायके चौथे और पाँचवें श्लोकोंमें अपरा प्रकृतिके नामसे और इसी अध्यायके पाँचवें श्लोकमें क्षेत्रके नामसे भी इसीका वर्णन है। भेद इतना ही है कि वहाँ सातवें अध्यायमें उसके कार्य-- मन, बुद्धि, अहंकार और पंचमहाभूतादिके सहित प्रकृतिका वर्णन है और यहाँ केवल “मूल प्रकृति" का वर्णन है। ३. जीवका जीवत्व अर्थात् प्रकृतिके साथ उसका सम्बन्ध किसी हेतुसे होनेवाला--आगन्तुक नहीं है, यह अनादिसिद्ध है और इसी प्रकार ईश्वरकी शक्ति यह प्रकृति भी अनादिसिद्ध है--ऐसा समझना चाहिये। ४. आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी--ये पाँचों सूक्ष्म महाभूत तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--ये पाँचों इन्द्रियोंके विषय; इन दसोंका वाचक यहाँ “कार्य” शब्द है। बुद्धि, अहंकार और मन--ये तीनों अन्तःकरण; श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और प्राण--ये पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ एवं वाकू, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा--ये पाँचों कर्मेन्द्रियाँ; इन तेरहका वाचक यहाँ “करण” शब्द है। ये तेईस तत्त्व प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृति ही इनका उपादान कारण है; क्योंकि प्रकृतिसे महत्तत्त्व, महत्तत््व्से अहंकार, अहंकारसे पाँच सूक्ष्म महाभूत, मन और दस इन्द्रिय तथा पाँच सूक्ष्म महाभूतोंसे पाँचों इन्द्रियोंके शब्दादि पाँचों स्थूल विषयोंकी उत्पत्ति मानी जाती है। सांख्यकारिकामें भी कहा है-- प्रकृतेर्महांस्ततो5हड्कारस्तस्माद् गणश्व॒ षोडशक: । तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्य: पञ्च भूतानि ।। (सांख्यकारिका २२) “प्रकृतिसे महत्तत्त्व (समष्टिबुद्धि)-की यानी बुद्धितत््वकी, उससे अहंकारकी और अहंकारसे पाँच तन्मात्राएँ, एक मन और दस इन्द्रियाँ--इन सोलहके समुदायकी उत्पत्ति हुई तथा उन सोलहमेंसे पाँच तन्मात्राओंसे पाँच स्थूल भूतोंकी उत्पत्ति हुई।' गीताके वर्णनमें पाँच तन्मात्राओंकी जगह पाँच सूक्ष्म महाभूतोंका नाम आया है और पाँच स्थूल भूतोंके स्थानमें पाँच इन्द्रियोंक विषयोंका नाम आया है, इतना ही भेद है। ५. प्रकृति जड है, उसमें भोक्तापनकी सम्भावना नहीं है और पुरुष असंग है, इसलिये उसमें भी वास्तवमें भोक्तापन नहीं है। प्रकृतिके संगसे ही पुरुषमें भोक्तापनकी प्रतीति-सी होती है और यह प्रकृति-पुरुषका रंग अनादि है, इसलिये यहाँ पुरुषको सुख-दु:खोंके भोक्तापनमें हेतु यानी निमित्त माना गया है। ३. प्रकृतिसे बने हुए स्थूल, सूक्ष्म और कारण--इन तीनों शरीरोंमेंसे किसी भी शरीरके साथ जबतक इस जीवात्माका सम्बन्ध रहता है, तबतक वह प्रकृतिमें स्थित (प्रकृतिस्थ) कहलाता है, अतएव जबतक आत्माका प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहता है, तभीतक वह प्रकृतिजनित गुणोंका भोक्ता है। २. मनुष्यसे लेकर उससे ऊँची जितनी भी देवादि योनियाँ हैं, सब सत्-योनियाँ हैं और मनुष्यसे नीची जितनी भी पशु, पक्षी, वृक्ष और लता आदि योनियाँ हैं, वे असत् हैं। सत्तव, रज और तम--इन तीनों गुणोंके साथ जो जीवका अनादिसिद्ध सम्बन्ध है एवं उनके कार्यरूप सांसारिक पदार्थोंमें जो आसक्ति है, वही गुणोंका संग है; जिस मनुष्यकी जिस गुणमें या उसके कार्यरूप पदार्थमें आसक्ति होगी, उसकी वैसी ही वासना होगी, वासनाके अनुसार ही अन्तकालनमें स्मृति होगी और उसीके अनुसार उसे पुनर्जन्म प्राप्त होगा। इसीलिये यहाँ अच्छी-बुरी योनियोंकी प्राप्तिमें गुणोंक संगको कारण बतलाया गया है। ३. प्रकृतिजनित शरीरोंकी उपाधिसे जो चेतन आत्मा अज्ञानके कारण जीवभावको प्राप्त-सा प्रतीत होता है, वह क्षेत्रज्ञ वास्तवमें इस प्रकृतिसे सर्वधा अतीत परमात्मा ही है; क्योंकि उस परब्रह्म परमात्मामें और क्षेत्रज्ञमें वस्तुत: किसी प्रकारका भेद नहीं है, केवल शरीररूप उपाधिसे ही भेदकी प्रतीति हो रही है। ४. इस कथनसे इस बातका प्रतिपादन किया गया है कि भिन्न-भिन्न निमित्तोंसे एक ही परब्रह्म परमात्मा भिन्न-भिन्न नामोंसे पुकारा जाता है। वस्तुदृष्टिसे ब्रह्ममें किसी प्रकारका भेद नहीं है। ५. जितने भी पृथक्-पृथक् क्षेत्रज्ञोंकी प्रतीति होती है, सब उस एक परब्रह्म परमात्माके ही अभिन्न स्वरूप हैं; प्रकृतिके संगसे उनमें भिन्नता-सी प्रतीत होती है, वस्तुत: कोई भेद नहीं है और वह परमात्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और अविनाशी तथा प्रकृतिसे सर्वधा अतीत है--इस बातको संशयरहित यथार्थ समझ लेना एवं एकीभावसे उस सच्चिदानन्दघनमें नित्य स्थित हो जाना ही 'पुरुषको तत्त्वसे जानना” है। तीनों गुण प्रकृतिसे उत्पन्न हैं, यह समस्त विश्व प्रकृतिका ही पसारा है और वह नाशवान्, जड, क्षणभंगुर और अनित्य है--इस रहस्यको समझ लेना ही “गुणोंके सहित प्रकृतिको तत्त्वसे जानना है। ६. वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र--किसी भी वर्णमें एवं ब्रह्मबचर्यादे किसी भी आश्रममें रहता हुआ तथा उन-उन वर्णाश्रमोंके लिये शास्त्रमें विधान किये हुए समस्त कर्मोंको यथायोग्य करता हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। यहाँ *सर्वथा वर्तमान:” का अर्थ निषिद्ध कर्म करता हुआ नहीं समझना चाहिये; क्योंकि आत्मतत्त्वको जाननेवाले ज्ञानीमें काम-क्रोधादि दोषोंका सर्वथधा अभाव हो जानेके कारण (गीता ५।२६) उसके द्वारा निषिद्ध कर्मका बनना सम्भव नहीं है। इसीलिये उसके आचरण संसारमें प्रमाणरूप माने जाते हैं (गीता ३।२१)। पापोंमें मनुष्यकी प्रवृत्ति काम-क्रोधादि अवगुणोंके कारण ही होती है; अर्जुनके पूछनेपर भगवानने तीसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें इस बातको स्पष्टरूपसे कह भी दिया है। ७. प्रकृति और पुरुषके तत्त्वको जान लेनेके साथ ही पुरुषका प्रकृतिसे सम्बन्ध टूट जाता है; क्योंकि प्रकृति और पुरुषका संयोग स्वप्नवत्ू, अवास्तविक और केवल अज्ञानजनित माना गया है। जबतक प्रकृति और पुरुषका पूर्ण ज्ञान नहीं होता, तभीतक पुरुषका प्रकृतिसे और उसके गुणोंसे सम्बन्ध रहता है और तभीतक उसका बार-बार नाना योनियोंमें जन्म होता है (गीता १३।२१)। अतएव इनका तत्त्व जान लेनेके बाद पुनर्जन्म नहीं होता। ३. गीताके छठे अध्यायके ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें श्लोकोंमें बतलायी हुई विधिके अनुसार शुद्ध और एकान्त स्थानमें उपयुक्त आसनपर निश्चलभावसे बैठकर इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर, मनको वशमें करके तथा एक परमात्माके सिवा दृश्यमात्रको भूलकर निरन्तर परमात्माका चिन्तन करना ध्यान है। इस प्रकार ध्यान करते रहनेसे बुद्धि शुद्ध हो जाती है और उस विशुद्ध सूक्ष्मबुद्धिसे जो हृदयमें सच्चिदानन्द्घन परत्रह्म परमात्माका साक्षात्कार किया जाता है, वही ध्यानद्वारा आत्मासे आत्मामें आत्माको देखना है। परंतु भेदभावसे सगुण-निराकारका और सगुण-साकारका ध्यान करनेवाले साधक भी यदि इस प्रकारका फल चाहते हों तो उनको भी अभेदभावसे निर्मुण-निराकार सच्चिदानन्दघन ब्रह्मकी प्राप्ति हो सकती है। २. सम्पूर्ण पदार्थ मृगतृष्णाके जल अथवा स्वप्नकी सृष्टिके सदृश मायामात्र हैं; इसलिये प्रकृतिके कार्यरूप समस्त गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं--ऐसा समझकर मन, इन्द्रिय और शरीरद्वारा होनेवाले समस्त कर्मोमें कर्तापनके अभिमानसे रहित हो जाना तथा सर्वव्यापी सच्चिदानन्द्घन परमात्मामें एकीभावसे नित्य स्थित रहते हुए एक सच्चिदानन्द्घन परमात्माके सिवा अन्य किसीकी भी भिन्न सत्ता न समझना--यह '“सांख्ययोग” नामक साधन है और इसके द्वारा जो आत्मा और परमात्माके अभेदका प्रत्यक्ष होकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका अभिन्नभावसे प्राप्त हो जाना है, वही सांख्ययोगके द्वारा आत्माको आत्मामें देखना है। यह साधन साधनचतुष्टयसम्पन्न अधिकारीके द्वारा ही सुगमतासे किया जा सकता है। इसका विस्तार “गीतातत्त्व- विवेचनी'” में देखना चाहिये। ३. जिस साधनका गीताके दूसरे अध्यायमें चालीसवें श्लोकसे उक्त अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त फलसहित वर्णन किया गया है, उसका वाचक यहाँ “कर्मयोग'” है। अर्थात् आसक्ति और कर्मफलका सर्वथा त्याग करके सिद्धि और असिद्धिमें समत्व रखते हुए शास्त्रानुसार निष्कामभावसे अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार सब प्रकारके विहित कर्मोंका अनुष्ठान करना कर्मयोग है और इसके द्वारा जो सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माको अभिन्नभावसे प्राप्त हो जाना है, वही कर्मयोगके द्वारा आत्मामें आत्माको देखना है। ४. बुद्धिकी मन्दताके कारण जो लोग पूर्वोक्त ध्यानयोग, सांख्ययोग और कर्मयोग--इनमेंसे किसी भी साधनको भलीभाँति नहीं समझ पाते, ऐसे साधकोंका वाचक यहाँ “एवम् अजानन्तः” विशेषणके सहित “अन्ये” पद है। तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुषोंका आदेश प्राप्त करके अत्यन्त श्रद्धा और प्रेमके साथ जो जबालाके पुत्र सत्यकामकी भाँति उसके अनुसार आचरण करना है, वही दूसरोंसे सुनकर उपासना करना है। ५. तेईसवें श्लोकमें जो बात “न स भूयोडभिजायते' से और चौबीसवेंमें जो बात “आत्मनि आत्मानं पश्यन्ति” से कही है, वही बात यहाँ *मृत्युम् अतितरन्ति” से कही गयी है। ३. इस अध्यायके पाँचवें श्लोकमें जिन चौबीस तत्त्वोंके समुदायको क्षेत्रका स्वरूप बतलाया गया है, गीताके सातवें अध्यायके चौथे-पाँचवें श्लोकोंमें जिसको “अपरा प्रकृति” कहा गया है, वही “क्षेत्र” है और उसको जो जाननेवाला है, जिसको गीताके सातवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें “परा प्रकृति” कहा गया है, वह चेतनतत्त्व ही 'क्षेत्रज्ञ' है, उसका यानी 'प्रकृतिस्थ” पुरुषका जो प्रकृतिसे बने हुए भिन्न-भिन्न सूक्ष्म और स्थूल शरीरोंके साथ सम्बन्ध होना है, वही क्षेत्र तथा क्षेत्रञ॒का संयोग है और इसके होते ही जो भिन्न-भिन्न योनियोंद्वारा भिन्न-भिन्न आकृतियोंमें प्राणियोंका प्रकट होना है, वही उनका उत्पन्न होना है। २. यहाँ 'परमेश्वर' शब्द प्रकृतिसे सर्वया अतीत उस निर्विकार चेतनतत्त्वका वाचक है, जिसका वर्णन 'क्षेत्रज्' के साथ एकता करते हुए इसी अध्यायके बाईसवें श्लोकमें उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्माके नामसे किया गया है। समस्त प्राणियोंके जितने भी शरीर हैं, जिनके सम्बन्धसे वे विनाशशील कहे जाते हैं, उन समस्त शरीरोंमें उनके वास्तविक स्वरूपभूत एक ही अविनाशी निर्विकार चेतनतत्त्व परमात्माको जो विनाशशील बादलोंमें आकाशकी भाँति समभावसे स्थित और नित्य देखना है--वही उस “परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें विनाशरहित और समभावसे स्थित देखना है। 3. एक ही सच्चिदानन्दघन परमात्मा सर्वत्र समभावसे स्थित है, अज्ञानके कारण ही भिन्न-भिन्न शरीरोंमें उसकी भिन्नता प्रतीत होती है--वस्तुतः उसमें किसी प्रकारका भेद नहीं है--इस तत्त्वको भलीभाँति समझकर प्रत्यक्ष कर लेना ही 'सर्वत्र समभावसे स्थित परमेश्वरको सम देखना” है। जो इस तत्त्वको नहीं जानते, उनका देखना सम देखना नहीं है; क्योंकि उनकी सबमें विषमबुद्धि होती है, वे किसीको अपना प्रिय, हितैषी और किसीको अप्रिय तथा अहित करनेवाला समझते हैं एवं अपने-आपको दूसरोंसे भिन्न, एकदेशीय मानते हैं। अतएव वे शरीरोंके जन्म और मरणको अपना जन्म और मरण माननेके कारण बार-बार नाना योनियोंमें जन्म लेकर मरते रहते हैं, यही उनका अपनेद्वारा अपनेको नष्ट करना है; परंतु जो पुरुष उपर्युक्त प्रकारसे एक ही परमेश्वरको समभावसे स्थित देखता है, वह न तो अपनेको उस परमेश्वरसे भिन्न समझता है और न इन शरीरोंसे अपना कोई सम्बन्ध ही मानता है। इसलिये वह शरीरोंके विनाशसे अपना विनाश नहीं देखता और इसीलिये वह अपनेद्वारा अपनेको नष्ट नहीं करता। अभिप्राय यह है कि उसकी स्थिति सर्वज्ञ, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मामें अभिन्नभावसे हो जाती है, अतएव वह सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाता है। ४. गीताके तीसरे अध्यायके सत्ताईसवें, अट्टाईसवें और चौदहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकोंमें समस्त कर्मोंको गुणोंद्वारा किये जाते हुए बतलाया गया है तथा पाँचवें अध्यायके आठवें, नवें श्लोकोंमें सब इन्द्रियोंका इन्द्रियोंके विषयोंमें बरतना कहा गया है और यहाँ सब कर्मोंको प्रकृतिद्वारा किये जाते हुए देखनेको कहते हैं। इस प्रकार तीन तरहके वर्णनका तात्पर्य एक ही है; क्योंकि सत्त्व, रज और तम--ये तीनों गुण प्रकृतिके ही कार्य हैं तथा समस्त इन्द्रियाँ और मन, बुद्धि आदि एवं इन्द्रियोंके विषय--ये सब भी गुणोंके ही विस्तार हैं। अतएव इन्द्रियोंका इन्द्रियोंक विषयोंमें बरतना, गुणोंका गुणोंमें बरतना और गुणोंद्वारा समस्त कर्मोंको किये जाते हुए बतलाना भी सब कर्मोंको प्रकृतिद्वारा ही किये जाते हुए बतलाना है। अत: सभी जगहोंके कथनका अभिप्राय आत्मामें कर्तापनका अभाव दिखलाना है। आत्मा नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और सब प्रकारके विकारोंसे रहित है; प्रकृतिसे उसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। अतएव वह न किसी भी कर्मका कर्ता है और न कर्मोंके फलका भोक्ता ही है--इस बातका अपरोक्षभावसे अनुभव कर लेना “आत्माको अकर्ता समझना' है तथा जो ऐसा देखता है, वही यथार्थ देखता है। $. जैसे स्वप्नसे जगा हुआ मनुष्य स्वप्रकालमें दिखलायी देनेवाले समस्त प्राणियोंके नानात्वको अपने-आपमें ही देखता है और यह भी समझता है कि उन सबका विस्तार मुझसे ही हुआ था; वस्तुतः स्वप्नकी सृष्टिमें मुझसे भिन्न कुछ भी नहीं था, एक मैं ही अपने-आपको अनेक रूपमें देख रहा था--इसी प्रकार जो समस्त प्राणियोंको केवल एक परमात्मामें ही स्थित और उसीसे सबका विस्तार देखता है, वही ठीक देखता है और इस प्रकार देखना ही सबको एकमें स्थित और उसी एकसे सबका विस्तार देखना है। २. इस अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें जिसको “परमेश्वर', अद्टाईसवेंमें ईश्वर", उनतीसवेंमें आत्मा और तीसेंमें “ब्रह्म' कहा गया है, उसीको यहाँ “परमात्मा” बतलाया गया है अर्थात् इन सबकी अभिन्नता--एकता दिखलानेके लिये यहाँ “अयम्' पदका प्रयोग किया गया है। 3. जिसका कोई आदि यानी कारण न हो एवं जिसकी किसी भी कालनमें नयी उत्पत्ति न हुई हो और जो सदासे ही हो, उसे “अनादि' कहते हैं। प्रकृति और उसके गुणोंसे जो सर्वथा अतीत हो, गुणोंसे और गुणोंके कार्यसे जिसका किसी कालमें और किसी भी अवस्थामें वास्तविक सम्बन्ध न हो, उसे “निर्गुण" कहते हैं। अतएव यहाँ “अनादि” और “निर्गुण'-- इन दोनों शब्दोंका प्रयोग करके यह दिखलाया गया है कि जिसका प्रकरण चल रहा है, वह आत्मा “अनादि' और “निर्मुण' है; इसलिये वह अकर्ता, निर्लिप्त और अव्यय है--जन्म, मृत्यु आदि छ: विकारोंसे सर्वथा अतीत है। ४. जैसे आकाश बादलोंमें स्थित होनेपर भी उनका कर्ता नहीं बनता और उनसे लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा कर्मोंका कर्ता नहीं बनता और शरीरोंसे लिप्त भी नहीं होता। ५. आकाशके दृष्टान्तसे आत्मामें निर्लेपता सिद्ध की गयी है। अभिप्राय यह है कि जैसे आकाश वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीमें सब जगह समभावसे व्याप्त होते हुए भी उनके गुण-दोषोंसे किसी तरह भी लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा भी इस शरीरमें सब जगह व्याप्त होते हुए भी अत्यन्त सूक्ष्म और गुणोंसे सर्वथा अतीत होनेके कारण बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शरीरके गुण-दोषोंसे जरा भी लिपायमान नहीं होता। ६, इस श्लोकमें रवि (सूर्य)-का दृष्टान्त देकर आत्मामें अकर्तापनकी और “रवि:' पदके साथ “एक: विशेषण देकर आत्माके अद्वैतभावकी सिद्धि की गयी है। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार एक ही सूर्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा समस्त क्षेत्रको--यानी इसी अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकोंमें विकारसहित क्षेत्रके नामसे जिसके स्वरूपका वर्णन किया गया है, उस समस्त जडवर्गरूप समस्त जगत्को प्रकाशित करता है, सबको सत्ता- स्फूर्ति देता है तथा भिन्न-भिन्न अन्तःकरणोंके सम्बन्धसे भिन्न-भिन्न शरीरोंमें उसका भिन्न-भिन्न प्राकट्य होता-सा देखा जाता है ऐसा होनेपर भी वह आत्मा सूर्यकी भाँति न तो उनके कर्मोंको करनेवाला और न करवानेवाला ही होता है तथा न द्वैतभाव या वैषम्यादि दोषोंसे ही युक्त होता है। वह अविनाशी आत्मा प्रत्येक अवस्थामें सदा-सर्वदा शुद्ध, विज्ञानस्वरूप, अकर्ता, निर्विकार, सम और निरंजन ही रहता है। ३. इस अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवानने जिसको अपने मतसे “ज्ञान” कहा है और गीताके पाँचवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें जिसको अज्ञानका नाश करनेमें कारण बतलाया है, जिसकी प्राप्ति अमानित्वादि साधनोंसे होती है, इस श्लोकमें 'ज्ञानचक्षुषा' पदमें आया हुआ "ज्ञान शब्द उसी “तत्त्वज्ञान” का वाचक है। उस ज्ञानके द्वारा जो भलीभाँति तत्त्वसले यह समझ लेना है कि महाभूतादि चौबीस तत्त्वोंके समुदायरूप समष्टिशरीरका नाम क्षेत्र” है; वह जाननेमें आनेवाला, परिवर्तनशील, विनाशी, विकारी, जड, परिणामी और अनित्य है तथा 'क्षेत्रज्ञ” उसका ज्ञाता (जाननेवाला), चेतन, निर्विकार, अकर्ता, नित्य, अविनाशी, असंग, शुद्ध, ज्ञानस्वरूप और एक है। इस प्रकार दोनोंमें विलक्षणता होनेके कारण क्षेत्रज्ञ क्षेत्रसे सर्वथा भिन्न है। जो उसकी क्षेत्रके साथ एकता प्रतीत होती है, वह अज्ञानमूलक है। वास्तवमें क्षेत्रज्षका उससे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। यही ज्ञानचक्षुके द्वारा 'क्षेत्र” और क्षेत्रज्ञ" के भेदको जानना है। इस श्लोकमें “भूत” शब्द प्रकृतिके कार्यरूप समस्त दृश्यवर्गका और “प्रकृति' उसके कारणका वाचक है। अतः कार्यसहित प्रकृतिसे सर्वथा मुक्त हो जाना ही “भूतप्रकृतिमोक्ष' है तथा उपर्युक्त प्रकारसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको जाननेके साथ-साथ जो क्षेत्रज्ञका प्रकृतिसे अलग होकर अपने वास्तविक परमात्मस्वरूपमें अभिन्न-भावसे प्रतिष्ठित हो जाना है, यही कार्यसहित प्रकृतिसे मुक्त हो जानेको जानना है। अभिप्राय यह है कि जैसे स्वप्नमें मनुष्यको किसी निमित्तसे अपनी जाग्रत्-अवस्थाकी स्मृति हो जानेसे यह मालूम हो जाता है कि यह स्वप्न है, अतः अपने असली शरीरमें जग जाना ही इसके दुःखोंसे छूटनेका उपाय है--इस भावका उदय होते ही वह जग उठता है; वैसे ही ज्ञानयोगीका क्षेत्र और क्षेत्रजञ्की विलक्षणताको समझकर साथ-ही-साथ जो यह समझ लेना है कि अज्ञानवश क्षेत्रको सच्ची वस्तु समझनेके कारण ही इसके साथ मेरा सम्बन्ध-सा हो रहा था। अतः वास्तविक सच्चिदा-नन्दघन परमात्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ही इससे मुक्त होना है; यही उसका कार्यसहित प्रकृतिसे मुक्त होनेको जानना है। अष्टात्रिशोड ध्याय: (श्रीमद्भगवदगीतायां चतुर्दशो5ध्याय:) ज्ञानकी महिमा और प्रकृति-पुरुषसे जगत्की उत्पत्तिका, सत्त्व, रज, तम--तीनों गुणोंका, भगवत्प्राप्तिके उपायका एवं गुणातीत पुरुषके लक्षणोंका वर्णन सम्बन्ध-गीताके तेरहवें अध्यायमें क्षेत्र” और क्षेत्रज्ञ" के लक्षणोंका निर्देश करके उन दोनोंके ज्ञानको ही ज्ञान बतलाया और उसके अनुसार क्षेत्रके स्वरूप, स्वभाव, विकार और उसके तत्त्वोंकी उत्पत्तिके क्रम आदि तथा क्षेत्रज्षके स्वरूप और उसके प्रभावका वर्णन किया। वहाँ उन्नीसवें शलोकसे प्रकृति-पुरुषके नामसे प्रकरण आरम्भ करके गुणोंको प्रकृतिजन्य बतलाया और इक्कीसवें शलोकमें यह बात भी कही कि पुरुषके बार-बार अच्छी-बुरी योनियोंगें जन्म होनेगें गुणोंका संग ही हेतु है। इससे गुणोंके भिन्न-भिन्न स्वरूप कया हैं. ये जीवात्माको कैसे शरीरमें बाँधते हैं. किस गुणके संगरसे किस योनिमें जन्म होता है; गुणोंये छूटनेके उपाय कया हैं; गुणोंसे छूटे हुए पुरुषोंके लक्षण तथा आचरण कैसे होते हैं“-ये सब बातें जाननेकी स्वाभाविक ही इच्छा होती है; अतएव इसी विषयका स्पष्टीकरण करनेके लिये इस चौदहवें अध्यायका आरम्भ किया गया है। तेरहवें अध्यायमें वर्णित ज्ञानकों ही स्पष्ट करके चौदहवें अध्यायमें विस्तारपूर्वक समझाते हैं-- श्रीभगवानुवाच परं भूय: प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्: | यज्ज्ञात्वा मुनय: सर्वे परां सिद्धिमितो गता:,श्रीभगवान् बोले--ज्ञानोंमें भी अति उत्तम उस परम ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसारसे मुक्त होकर परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं?
قال الربّ المبارك: «سأبيّن مرةً أخرى ذلك العلم الأسمى، أرفعَ العلوم؛ فبمعرفته عبر جميع الحكماء هذا العالم وبلغوا الكمال الأعلى».
Verse 2
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागता:3 | सर्गेडपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च
«مَن اتّكأ على هذا العلم وبلغ حالًا شبيهًا بحالي، لا يُولد من جديد حتى عند بدء الخلق، ولا يضطرب عند زمن الفناء».
Verse 3
इस ज्ञानको आश्रय करके* अर्थात् धारण करके मेरे स्वरूपको प्राप्त हुए पुरुष सृष्टिके आदिमें पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकालमें भी व्याकुल नहीं होते+ ।। मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् । सम्भव: सर्वभूतानां ततो भवति भारत
«رحمي هو البراهمان العظيم (براكريتي)؛ فيه أضع البذرة. ومن ذلك الاتحاد—يا بهاراتا—ينشأ أصلُ جميع الكائنات.» وأخلاقيًّا، تُؤطِّر الآية الحياة كلّها بوصفها صادرةً عن منبعٍ واحد مؤسَّسٍ في الإلهي، فتبعث على التواضع، وتوقير الوجود، وتحمل المسؤولية في الفعل حتى تحت وطأة الحرب.
Verse 4
हे अर्जुन! मेरी महत्-ब्रह्मरूप मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतोंकी योनि है अर्थात् गर्भाधानका स्थान है* और मैं उस योनिमें चेतनसमुदायरूप गर्भको स्थापन करता हूँ*। उस जड-चेतनके संयोगसे सब भूतोंकी उत्पत्ति होती है: ।। सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या: । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता,हे अर्जुन! नाना प्रकारकी सब योनियोंमें जितनी मूर्तियाँ अर्थात् शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं,“ प्रकृति तो उन सबकी गर्भ धारण करनेवाली माता है और मैं बीजको स्थापन करनेवाला पिता हूँ:
يا أرجونا! أيًّا تكن الكائنات المتجسِّدة التي تنشأ في شتّى الأرحام وصور الميلاد، فاعلم أنّ البراكريتي (الطبيعة الأولى) العظيمة هي رحمها الأكبر، وأنّي أنا الأب الذي يهب البذرة. ومن اقتران المادة بالوعي يخرج جمهور الكائنات؛ فليُرَ كلُّ حيٍّ متجذِّرًا في أصلٍ كونيٍّ واحد، ولْيُعمَلْ بلا حقدٍ ولا كبرياء.
Verse 5
ऑपन-- माल बक। अि<-छऋाज ३. जैसे खेतमें बोये हुए बीजोंका उनके अनुरूप फल समयपर प्रकट होता है, वैसे ही इस शरीरमें बोये हुए कर्म- संस्काररूप बीजोंका फल भी समयपर प्रकट होता रहता है। इसके अतिरिक्त इसका प्रतिक्षण क्षय होता रहता है, इसलिये भी इसे क्षेत्र” कहते हैं और इसीलिये गीताके पंद्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें इसको “क्षर” पुरुष कहा गया है। २. इससे भगवानने अन्तरात्मा द्रष्टाका लक्ष्य करवाया है। मन, बुद्धि, इन्द्रिय, महाभूत और इन्द्रियोंके विषय आदि जितना भी ज्ञेय (जाननेमें आनेवाला) दृश्यवर्ग है--सब जड, विनाशी, परिवर्तनशील है। चेतन आत्मा उस जड दृश्यवर्गसे सर्वथा विलक्षण है। यह उसका ज्ञाता है, उसमें अनुस्यूत है और उसका अधिपति है। इसीलिये इसे क्षेत्रज्ञ” कहते हैं। इसी ज्ञाता चेतन आत्माको गीताके सातवें अध्यायमें “परा प्रकृति” (७।५), आठवेंमें “अध्यात्म” (८।३) और पंद्रहवें अध्यायमें “अक्षर पुरुष” (१५।१६) कहा गया है। यह आत्मतत्त्व बड़ा ही गहन है, इसीसे भगवानने भिन्न-भिन्न प्रकरणोंके द्वारा कहीं स्त्रीवाचक, कहीं नपुंसकवाचक और कहीं पुरुषवाचक नामसे इसका वर्णन किया है। वास्तवमें आत्मा विकारोंसे सर्वथा रहित, अलिंग, नित्य, निर्विकार एवं चेतन--ज्ञानस्वरूप है। 3. इससे “आत्मा” और “परमात्मा” की एकताका प्रतिपादन किया गया है। आत्मा और परमात्मामें वस्तुतः कुछ भी भेद नहीं है, प्रकृतिके संगसे भेद-सा प्रतीत होता है; इसीलिये गीताके दूसरे अध्यायके चौबीसवें और पचीसतवें श्लोकोंमें आत्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए जिन शब्दोंका प्रयोग किया है, बारहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें निर्गुण-निराकार परमात्माके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी प्रायः उन्हींके भावोंके द्योतक शब्दोंका प्रयोग किया गया है। ४. 'यत्” पदसे भगवानने क्षेत्रका स्वरूप बतलानेका संकेत किया है और उसे पाँचवें श्लोकमें बतलाया है। ५. 'यादृक्' पदसे क्षेत्रका स्वभाव बतलानेका संकेत किया है और उसका वर्णन छब्बीसवें और सत्ताईसवें श्लोकोंमें समस्त भूतोंको उत्पत्ति-विनाशशील बतलाकर किया है। ६. “यद्विकारि' पदसे क्षेत्रके विकारोंका वर्णन करनेका संकेत किया है और उनका वर्णन छठे श्लोकमें किया है। ७. जिन पदार्थोंके समुदायका नाम क्षेत्र" है, उनमेंसे कौन पदार्थ किससे उत्पन्न हुआ--यह बतलानेका संकेत “यतः च यत' पदोंसे किया है और उसका वर्णन उन्नीसवें श्लोकके उत्तरार्द्धमें तथा बीसवेंके पूर्वार्द्धमें किया गया है। ८. 'सः” पद '“क्षेत्रज्ञ” का वाचक है तथा “य:” पदसे उसका स्वरूप बतलानेका संकेत किया गया है और आगे चलकर उसके प्रकृतिस्थ एवं वास्तविक दोनों स्वरूपोंका वर्णन किया गया है--जैसे उन्नीसवें श्लोकमें उसे “अनादि' बीसतेंमें 'सुख-दु:खोंका भोक्ता” एवं इक्कीसवेंमें 'अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म ग्रहण करनेवाला” बतलाकर तो प्रकृतिस्थ पुरुषका स्वरूप बतलाया गया है और बाईसवेंमें तथा सत्ताईसवेंसे तीसवेंतक परमात्माके साथ एकता करके उसके वास्तविक स्वरूपका निरूपण किया गया है। ९. “यत्प्रभाव:' से क्षेत्रज्ञका प्रभाव बतलानेके लिये संकेत किया गया है और उसे इकतीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक बतलाया गया है। ३१. 4विविधैः विशेषणके सहित “छन्दोभि:” पद ऋक्, यजुट, साम और अथर्व--इन चारों वेदोंके संहिता” और “ब्राह्मण” दोनों ही भागोंका वाचक है; समस्त उपनिषद् और भिन्न-भिन्न शाखाओंको भी इन्हींके अन्तर्गत समझ लेना चाहिये। २. “ब्रह्मसूत्रपदै:” पद “वेदान्तदर्शन” के जो “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” आदि सूत्ररूप पद हैं, उन््हींका वाचक प्रतीत होता है; क्योंकि उपर्युक्त सब लक्षण उनमें ठीक-ठीक मिलते हैं। यहाँ इस कथनका यह भाव है कि श्रुति-स्मृति आदियमें वर्णित जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा युक्तिपूर्वक समझाया गया है, उसका निचोड़ भी भगवान् यहाँ संक्षेपमें कह रहे हैं। 3. मन्त्रोंके द्रष्टा एवं शास्त्र और स्मृतियोंके रचयिता ऋषिगणोंने “क्षेत्र” और '“क्षेत्रज्' के स्वरूपको और उनसे सम्बन्ध रखनेवाली सभी बातोंको अपने-अपने ग्रन्थोंमें और पुराण-इतिहासोंमें बहुत प्रकारसे वर्णन करके विस्तारपूर्वक समझाया है; उन्हींका सार यहाँ बहुत थोड़े शब्दोंमें भगवान् कहते हैं। ४. स्थूल भूतोंके और शब्दादि विषयोंके कारणरूप जो पंचतन्मात्राएँ यानी सूक्ष्मपंचमहाभूत हैं--गीताके सातवें अध्यायके चौथे श्लोकमें जिनका 'भूमि:', “आप:', “अनलः', वायु: और “खम्' के नामसे वर्णन हुआ है--उन्हीं पाँचोंका वाचक यहाँ “महाभूतानि” पद है। ५, इसीसे मिलता-जुलता वर्णन सांख्यकारिका और योगदर्शनमें भी आता है, जैसे-- मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृति: पुरुष: ।। (सांख्यकारिका ३) अर्थात् एक मूल प्रकृति है, वह किसीकी विकृति (विकार) नहीं है। महत्तत््व, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धतन्मात्रा)--ये सात प्रकृति-विकृति हैं अर्थात् ये सातों पंचभूतादिके कारण होनेसे “प्रकृति भी हैं और मूल प्रकृतिके कार्य होनेसे “विकृति' भी हैं। पंचज्ञानेन्द्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय और मन--ये ग्यारह इन्द्रिय और पंचमहाभूत --ये सोलह केवल विकृति (विकार) हैं, वे किसीकी प्रकृति अर्थात् कारण नहीं हैं। इनमें ग्यारह इन्द्रिय तो अहंकारके तथा पाँच स्थूल महाभूत पंचतन्मात्राओंके कार्य हैं; किंतु पुछ्ष न किसीका कारण है और न किसीका कार्य है, वह सर्वथा असंग है। योगदर्शनमें कहा है--'विशेषाविशेषलिंगमात्रालिंगानि गुणपर्वाणि।। (२।१९) विशेष यानी पंचज्ञानेन्द्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय, एक मन और पंच स्थूल भूत; अविशेष यानी अहंकार और पंचतन्मात्राएँ; लिंगमात्र यानी महत्तत््व और अलिंग यानी मूल प्रकृति--ये चौबीस तत्त्व गुणोंकी अवस्थाविशेष हैं; इन्हींको “दृश्य” कहते हैं। योगदर्शनमें जिसको “दृश्य” कहा है, उसीको गीतामें क्षेत्र” कहा गया है। ६. यह समष्टि अन्तःकरणका एक भेद है। अहंकार ही पंचतन्मात्राओं, मन और समस्त इन्द्रियोंका कारण है तथा महत्तत्त्वका कार्य है; इसीको “अहंभाव' भी कहते हैं। यहाँ “अहंकार” शब्द उसीका वाचक है। ७. जिसे “महत्तत्त्व” (महान) और “समष्टि बुद्धि" भी कहते हैं, जो समष्टि अन्तःकरणका एक भेद है, निश्चय ही जिसका स्वरूप है--उसको यहाँ “बुद्धि' कहा गया है। ३. यहाँ “अव्यक्त' का अर्थ मूल प्रकृति समझना चाहिये, जो महत्तत््व आदि समस्त पदार्थोंकी कारणरूपा है, सांख्यशास्त्रमें जिसको “प्रधान” कहते हैं, भगवानने गीताके चौदहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें जिसको “महदब्रह्म” कहा है तथा इस अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें जिसको “प्रकृति' नाम दिया गया है। २. वाक्, पाणि (हाथ), पाद (पैर), उपस्थ और गुदा--ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं तथा श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और प्राण-- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ये सब मिलकर दस इन्द्रियाँ हैं। इन सबका कारण अहंकार है। 3. यहाँ “एक” शब्दसे उस मनको ही बतलाया गया है जो समष्टि अन्तःकरणकी मनन करनेवाली शक्तिविशेष है, संकल्प-विकल्प ही जिसका स्वरूप है। यह भी अहंकारका कार्य है। ४. यहाँ “पञ्च इन्द्रियगोचरा:” पदोंका अर्थ शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध समझना चाहिये, जो कि पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके स्थूल विषय हैं। ये सूक्ष्म भूतोंके कार्य हैं। ५. जिन पदार्थोंको मनुष्य सुखके हेतु और दुःखनाशक समझता है, उनको प्राप्त करनेकी जो आसक्तियुक्त कामना है --जिसके वासना, तृष्णा, आशा, लालसा और स्पृहा आदि अनेकों भेद हैं--उसीका वाचक यहाँ “इच्छा” शब्द है। ६. जिन पदार्थोंको मनुष्य दु:खमें हेतु या सुखमें बाधक समझता है, उनमें जो विरोधबुद्धि होती है--उसका नाम “द्वेष' है। इसके स्थूल रूप वैर, ईर्ष्या, घृणा और क्रोध आदि हैं। ७. अनुकूलकी प्राप्ति और प्रतिकूलकी निवृत्तिसे अन्त:करणमें जो प्रसन्नताकी वृत्ति होती है, उसका नाम “सुख” है। ८. प्रतिकूलकी प्राप्ति और अनुकूलके विनाशसे जो अन्तःकरणमें व्याकुलता होती है, जिसे व्यथा भी कहते हैं-- उसका वाचक “दुःख” है। ९. अन्तःकरणमें जो ज्ञानशक्ति है, जिसके द्वारा प्राणी सुख-दुःख और समस्त पदार्थोंका अनुभव करते हैं, जिसे गीताके दसवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें “चेतना” कहा गया है--उसीका वाचक यहाँ “चेतना” है, यह भी अन्त:करणकी वृत्तिविशेष है; अतएव इसकी भी गणना क्षेत्रके विकारोंमें की गयी है। १०, गीताके अठारहवें अध्यायके तैंतीसवें, चौंतीसवें और पैंतीसवें श्लोकोंमें जिस धारणशक्तिके साच्चिक, राजस और तामस--तीन भेद किये गये हैं, उसीका वाचक यहाँ 'धृति” है। अन्तःकरणका विकार होनेसे इसकी गणना भी क्षेत्रके विकारोंमें की गयी है। ३१. यहाँतक विकारोंसहित क्षेत्रका संक्षेपसे वर्णन हो गया अर्थात् पाँचवें श्लोकमें क्षेत्रका स्वरूप संक्षेपमें बतला दिया गया और छठेमें उसके विकारोंका वर्णन संक्षेपमें कर दिया गया। ३२. अपनेको श्रेष्ठ, सम्मान्य, पूज्य या बहुत बड़ा समझना एवं मान-बड़ाई, प्रतिष्ठा-पूजा आदिकी इच्छा करना अथवा बिना ही इच्छा किये इन सबके प्राप्त होनेपर प्रसन्न होना--यह मानित्व है। इन सबका न होना ही “अमानित्व' है। ३१3. मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और पूजाके लिये, धनादिके लोभसे या किसीको ठगने आदिके अभिप्रायसे अपनेको धर्मात्मा, दानशील, भगवद्धक्त, ज्ञानी या महात्मा विख्यात करना और बिना ही हुए धर्मपालन, उदारता, दातापन, भक्ति, योगसाधना, व्रत-उपवासादिका अथवा अन्य किसी भी प्रकारके गुणका ढोंग करना--दम्भित्व है। इसके सर्वधा अभावका नाम “अदम्भित्व है। ३. किसी भी प्राणीको मन, वाणी या शरीरसे किसी प्रकार भी कभी कष्ट देना--मनसे किसीका बुरा चाहना, वाणीसे किसीको गाली देना, कठोर वचन कहना, किसीकी निन्दा करना या अन्य किसी प्रकारके दुःखदायक और अहितकारक वचन कह देना; शरीरसे किसीको मारना, कष्ट पहुँचाना या किसी प्रकारसे हानि पहुँचाना आदि जो हिंसाके भाव हैं, इन सबके सर्वथा अभावका नाम “अहिंसा” अर्थात् किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना है। २. अपना अपराध करनेवालेके लिये किसी प्रकार भी दण्ड देनेका भाव मनमें न रखना, उससे बदला लेनेकी अथवा अपराधके बदले उसे इस लोक या परलोकमें दण्ड मिले--ऐसी इच्छा न रखना और उसके अपराधोंको वस्तुतः अपराध ही न मानकर उन्हें सर्वथा भुला देना 'क्षमाभाव” है। गीताके दसवें अध्यायके चौथे श्लोकमें इसकी कुछ विस्तारसे व्याख्या की गयी है। ३. जिस साधकमें मन, वाणी और शरीरकी सरलताका भाव पूर्णरूपसे आ जाता है, वह सबके साथ सरलताका व्यवहार करता है; उसमें कुटिलताका सर्वथा अभाव हो जाता है अर्थात् उसके व्यवहारमें दाव-पेंच, कपट या टेढ़ापन जरा भी नहीं रहता; वह बाहर और भीतरसे सदा समान और सरल रहता है। ४. विद्या और सदुपदेश देनेवाले गुरुका नाम “आचार्य” है। ऐसे गुरुक पास रहकर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक मन, वाणी और शरीरके द्वारा सब प्रकारसे उनको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करना, नमस्कार करना, उनकी आज्ञाओंका पालन करना और उनके अनुकूल आचरण करना आदि “आचार्योपासन'” यानी गुरु-सेवा है। ५. सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहारसे द्रव्यकी शुद्धि होती है, उस द्रव्यसे उपार्जित अन्नसे आहारकी शुद्धि होती है। यथायोग्य शुद्ध बर्तावसे आचरणोंकी शुद्धि होती है और जल-मिट्टी आदिके द्वारा प्रक्षालनादि क्रियासे शरीरकी शुद्धि होती है। यह सब बाहरकी शुद्धि है। राग-द्वेष और छल-कपट आदि विकारोंका नाश होकर अन्त:करणका स्वच्छ हो जाना भीतरकी शुद्धि है। दोनों ही प्रकारकी शुद्धियोंको 'शौच” कहा जाता है। ६. बड़े-से-बड़े कष्ट, विपत्ति, भय या दुःखके आ पड़नेपर भी विचलित न होना एवं काम, क्रोध, भय या लोभ आदिसे किसी प्रकार भी अपने धर्म और कर्तव्यसे जरा भी न डिगना तथा मन और बुद्धिमें किसी तरहकी चंचलताका न रहना “अन्तःकरणकी स्थिरता' है। ७. यहाँ “आत्मा” से अन्त:करण और इन्द्रियोंक सहित शरीरको समझना चाहिये। अत: इन सबको भलीभाँति अपने वशमें कर लेना ही इनका निग्रह करना है। ८. इस लोक और परलोकके जितने भी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धरूप विषय-पदार्थ हैं--अन्तः:करण और इन्द्रियोंद्रारा जिनका भोग किया जाता है और अज्ञानके कारण जिनको मनुष्य सुखके हेतु समझता है, किंतु वास्तवमें जो दु:ःखके कारण हैं--उन सबमें प्रीतिका सर्वथा अभाव हो जाना *“इन्द्रियार्थैषु वैराग्यम्” है। ९. मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर--इन सबमें जो “अहम्' बुद्धि हो रही है--अर्थात् अज्ञानके कारण जो इन अनात्मवस्तुओंमें आत्मबुद्धि हो रही है--इस देहाभिमानका सर्वथा अभाव हो जाना “अनहंकार” कहलाता है। १०, जन्मका कष्ट सहज नहीं है; पहले तो असहाय जीवको माताके गर्भमें लंबे समयतक भाँति-भाँतिके क्लेश होते हैं, फिर जन्मके समय योनिद्वारसे निकलनेमें असहा यन्त्रणा भोगनी पड़ती है। नाना प्रकारकी योनियोंमें बार-बार जन्म ग्रहण करनेमें ये जन्म-दु:ख होते हैं। मृत्युकालमें भी महान् कष्ट होता है। जिस शरीर और घरमें आजीवन ममता रही, उसे बलात् छोड़कर जाना पड़ता है। मरणसमयके निराश नेत्रोंकोी और शारीरिक पीड़ाको देखकर उस समयकी यन्त्रणाका बहुत कुछ अनुमान लगाया जा सकता है। बुढ़ापेकी यन्त्रणा भी कम नहीं होती; इन्द्रियाँ शिथिल और शक्तिहीन हो जाती हैं, शरीर जर्जर हो जाता है, मनमें नित्य लालसाकी तरंगें उछलती रहती हैं, असहाय अवस्था हो जाती है। ऐसी अवस्थामें जो कष्ट होता है, वह बड़ा ही भयानक होता है। इसी प्रकार बीमारीकी पीड़ा भी बड़ी दुःखदायिनी होती है। शरीर क्षीण हो गया, नाना प्रकारके असह्ा कष्ट हो रहे हैं, दूसरोंकी अधीनता है। निरुपाय स्थिति है। यही सब जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिके दु:ख हैं। इन दु:खोंको बार-बार स्मरण करना और इनपर विचार करना ही इनमें दु:ःखोंको देखना है। जीवोंको ये जन्म, मृत्यु, जरा व्याधि प्राप्त होते हैं--पापोंके परिणामस्वरूप; अतएव ये चारों ही दोषमय हैं। इसीका बार-बार विचार करना इनमें दोषोंको देखना है। ३. यद्यपि आठवें श्लोकमें इन्द्रियोंके अर्थोमें वैराग्य होनेकी बात कही जा चुकी, किंतु स्त्री, पुत्र, गृह, शरीर और धन आदि पदार्थोंके साथ मनुष्यका विशेष सम्बन्ध होनेके कारण प्राय: इनमें उसकी विशेष आसक्ति होती है; इसीलिये इनमें आसक्तिका सर्वथा अभाव हो जानेकी बात विशेषरूपसे पृथक् कही गयी है। २. अहंकारके अभावकी बात पूर्वश्लोकके “अनहंकार:' पदमें स्पष्टठ:ः आ चुकी है, इसीलिये यहाँ “अनभिष्वड्र” का अर्थ “ममताका अभाव' किया गया है। ३. अनुकूलके संयोग और प्रतिकूलके वियोगसे चित्तमें हर्ष आदि न होना तथा प्रतिकूलके संयोग और अनुकूलके वियोगसे किसी प्रकारके शोक, भय और क्रोध आदिका न होना--सदा ही निर्विकार, एकरस, सम रहना--इसको “प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें समचित्तता” कहते हैं। ४. जहाँ किसी प्रकारका शोर-गुल या भीड़भाड़ न हो, जहाँ दूसरा कोई न रहता हो, जहाँ रहनेमें किसीको भी आपत्ति या क्षोभ न हो, जहाँ किसी प्रकारकी गंदगी न हो, जहाँ काँटे-कंकड़ और कूड़ा-कर्कट न हों, जहाँका प्राकृतिक दृश्य सुन्दर हो, जल, वायु और वातावरण निर्मल और पवित्र हों, किसी प्रकारकी बीमारी न हो, हिंसक प्राणियोंका और हिंसाका अभाव हो और जहाँ स्वाभाविक ही सात्तविकताके परमाणु भरे हों, ऐसे देवालय, तपोभूमि, गंगा आदि पवित्र नदियोंके तट और पवित्र वन, गिरि-गुहा आदि निर्जन एकान्त और शुद्ध देशको “विविक्तदेश” कहते हैं तथा ज्ञानको प्राप्त करनेकी साधनाके लिये ऐसे स्थानमें निवास करना ही उसका सेवन करना है। ५. यहाँ “जनसंसदि” पद “प्रमादी' और “विषयासक्त” सांसारिक मनुष्योंके समुदायका वाचक है। ऐसे लोगोंके संगको साधनमें सब प्रकारसे बाधक समझकर उससे विरक्त रहना ही उसमें प्रेम नहीं करना है। संत, महात्मा और साधक पुरुषोंका संग तो साधनमें सहायक होता है; अतः उनके समुदायका वाचक यहाँ “जनसंसदि” नहीं समझना चाहिये। ६. भगवान् ही सर्वश्रेष्ठ हैं और वे ही हमारे स्वामी, शरण ग्रहण करनेयोग्य, परम गति, परम आश्रय, माता-पिता, भाई- बन्धु, परम हितकारी, परम आत्मीय और सर्वस्व हैं; उनको छोड़कर हमारा अन्य कोई भी नहीं है--इस भावसे जो भगवानके साथ अनन्य सम्बन्ध है, उसका नाम “अनन्य योग' है तथा इस प्रकारके सम्बन्धसे केवल भगवानमें ही अटल और पूर्ण विशुद्ध प्रेम करके निरन्तर भगवान्का ही भजन, ध्यान करते रहना ही अनन्य योगके द्वारा भगवानमें अव्यभिचारिणी भक्ति करना है। ७, आत्मा, नित्य, चेतन, निर्विकार और अविनाशी है; उससे भिन्न जो नाशवान्ू, जड, विकारी और परिवर्तनशील वस्तुएँ प्रतीत होती हैं--वे सब अनात्मा हैं, आत्माका उनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है--शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे इस प्रकार आत्मतत्त्वको भलीभाँति समझ लेना ही “अध्यात्मज्ञान' है और बुद्धिमें ठीक वैसा ही दृढ़ निश्चय करके मनसे उस आत्मतत्त्वका नित्य-निरन्तर मनन करते रहना “अध्यात्मज्ञानमें नित्य स्थित रहना' है। ८. तत्त्वज्ञानका अर्थ है--सच्चिदानन्दघन पूर्ण ब्रह्म परमात्मा; क्योंकि तत्त्वज्ञानसे उन्हींकी प्राप्ति होती है। उन सच्चिदानन्दघन गुणातीत परमात्माका सर्वत्र समभावसे नित्य-निरन्तर अनुभव करते रहना ही उस अर्थका दर्शन करना है। ३. 'अमानित्वम' से लेकर “तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम” तक जिनका वर्णन किया गया है, वे सभी ज्ञानप्राप्तिके साधन हैं; इसलिये उनका नाम भी “ज्ञान” रखा गया है। अभिप्राय यह है कि दूसरे श्लोकमें भगवानने जो यह बात कही है कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका जो ज्ञान है, वही मेरे मतसे ज्ञान है--इस कथनसे कोई ऐसा न समझ ले कि शरीरका नाम “क्षेत्र” है और इसके अंदर रहनेवाले ज्ञाता आत्माका नाम क्षेत्रज” है--यह बात हमने समझ ही ली; बस, हमें ज्ञान प्राप्त हो गया; किंतु वास्तवमें सच्चा ज्ञान वही है जो उपर्युक्त बीस साथनोंके द्वारा क्षेत्र-क्षेत्रञके स्वरूपको यथार्थरूपसे जान लेनेपर होता है। इसी बातको समझानेके लिये यहाँ इन साधनोंको “ज्ञान” के नामसे कहा गया है। अतएव ज्ञानीमें उपर्युक्त गुणोंका समावेश पहलेसे ही होना आवश्यक है, परंतु यह आवश्यक नहीं है कि ये सभी गुण सभी साधकोंमें एक ही समयमें हों। अवश्य ही, इनमें जो “अमानित्व', “अदम्भित्व” आदि बहुत-से सबके उपयोगी गुण हैं, वे तो सबमें रहते ही हैं। इनके अतिरिक्त “अव्यभिचारिणी भक्ति', 'एकान्तदेशसेवित्व', “अध्यात्मज्ञाननित्यत्व', “तत्त्वज्ञानार्थदर्शन'---इनमें अपनी-अपनी साधन- शैलीके अनुसार विकल्प भी हो सकता है। २. उपर्युक्त अमानित्वादि गुणोंसे विपरीत जो मान-बड़ाईकी कामना, दम्भ, हिंसा, क्रोध, कपट, कुटिलता, द्रोह, अपवित्रता, अस्थिरता, लोलुपता, आसक्ति, अहंता, ममता, विषमता, अश्रद्धा और कुसंग आदि दोष हैं, वे सभी जन्म- मृत्युके हेतुभूत अज्ञानको बढ़ानेवाले और जीवका पतन करनेवाले हैं; इसलिये वे सब अज्ञान ही हैं। अतएव उन सबका सर्वथा त्याग करना चाहिये। ३. यहाँ 'ज्ञेयम' पद सच्चिदानन्दघन निर्गुण और सगुण ब्रह्मका वाचक है, क्योंकि इसी प्रकरणमें स्वयं भगवानने ही उसको निर्गुण और गुणोंका भोक्ता बतलाया है। ४. यहाँ “परम्' विशेषणके सहित “ब्रह्म” पदका प्रयोग, वह ज्ञेय तत्त्व ही निर्मुण, निराकार, सच्चिदानन्दघन परबत्रह्म परमात्मा है, यह बतलानेके उद्देश्यसे किया गया है। “ब्रह्म” पद वेद, ब्रह्मा और प्रकृतिका भी वाचक हो सकता है; अतएव ज्ञेयतत्त्वका स्वरूप उनसे विलक्षण है, यह बतलानेके लिये “ब्रह्म” पदके साथ “परम्” विशेषण दिया गया है। ५. जो वस्तु प्रमाणोंद्वारा सिद्ध की जाती है, उसे 'सत्” कहते हैं। स्वतः प्रमाण नित्य अविनाशी परमात्मा किसी भी प्रमाणद्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता; क्योंकि परमात्मासे ही सबकी सिद्धि होती है, परमात्मातक किसी भी प्रमाणकी पहुँच नहीं है। वह प्रमाणोंद्वारा जाननेमें आनेवाली वस्तुओंसे अत्यन्त विलक्षण है, इसलिये परमात्माको “सत्” नहीं कहा जा सकता तथा जिस वस्तुका वास्तवमें अस्तित्व नहीं होता, उसे 'असत्” कहते हैं; किंतु परब्रह्म परमात्माका अस्तित्व नहीं है, ऐसी बात नहीं है। वह अवश्य है और वह है--इसीसे अन्य सबका होना भी सिद्ध होता है; अतः उसे “असत्' भी नहीं कहा जा सकता। इसीलिये परमात्मा 'सत्” और “असतः' दोनोंसे ही परे है। यद्यपि गीताके नवम अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें तो भगवानने कहा है कि 'सत्' भी मैं हूँ और “असत' भी मैं हूँ और यहाँ यह कहते हैं कि उस जाननेयोग्य परमात्माको न 'सत्” कहा जा सकता है और न “असत्; किंतु वहाँ विधिमुखसे वर्णन है, इसलिये भगवान्का यह कहना कि 'सत' भी मैं हूँ और “असत' भी मैं हूँ, उचित ही है। पर यहाँ निषेधमुखसे वर्णन है, किंतु वास्तवमें उस परत्रह्म परमात्माका स्वरूप वाणीके द्वारा न तो विधिमुखसे बतलाया जा सकता है और न निषेधमुखसे ही। उसके विषयमें जो कुछ भी कहा जाता है, सब केवल शाखाचन्द्रन्यायसे उसे लक्ष्य करानेके लिये ही है, उसके साक्षात् स्वरूपका वर्णन वाणीद्वारा हो ही नहीं सकता। श्रुति भी कहती है--“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' (तैत्तिरीय उप० २।९), अर्थात् 'मनके सहित वाणी जिसे न पाकर वापस लौट आती है (वह ब्रह्म है)।' इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये यहाँ भगवानने निषेधमुखसे कहा है कि वह न 'सत्' कहा जाता है और न “असत' ही। अर्थात् मैं जिस ज्ञेयवस्तुका वर्णन करना चाहता हूँ, उसका वास्तविक स्वरूप तो मन-वाणीका अविषय है; अत: उसका जो कुछ भी वर्णन किया जायगा, उसे उसका तटस्थ लक्षण ही समझना चाहिये। ३. यह श्लोक श्वेताश्वतरोपनिषद् (३।१६)-में अक्षरश: आया है। २. वह परब्रह्म परमात्मा सब ओर हाथवाला है। उसे कोई भी वस्तु कहींसे भी समर्पण की जाय, वह वहींसे उसे ग्रहण करनेमें समर्थ है। इसी तरह वह सब जगह पैरवाला है। कोई भी भक्त कहींसे उसके चरणोंमें प्रणामादि करते हैं, वह वहीं उसे स्वीकार कर लेता है। वह सब जगह आँखवाला है। उससे कुछ भी छिपा नहीं है। वह सब जगह सिरवाला है। जहाँ कहीं भी भक्तलोग उसका सत्कार करनेके उद्देश्यसे पुष्प आदि उसके मस्तकपर चढ़ाते हैं, वे सब ठीक उसपर चढ़ते हैं। वह सब जगह मुखवाला है। उसके भक्त जहाँ भी उसको खानेकी वस्तु समर्पण करते हैं, वह वहीं उस वस्तुको स्वीकार कर सकता है। अर्थात् वह ज्ञेयस्वरूप परमात्मा सबका साक्षी, सब कुछ देखनेवाला तथा सबकी पूजा और भोग स्वीकार करनेकी शक्तिवाला है। वह परमात्मा सब जगह सुननेकी शक्तिवाला है। जहाँ कहीं भी उसके भक्त उसकी स्तुति करते हैं या उससे प्रार्थना अथवा याचना करते हैं, उन सबको वह भलीभाँति सुनता है। ३. आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीका कारण होनेसे उनको व्याप्त किये हुए स्थित है, उसी प्रकार वह ज्ञेयस्वरूप परमात्मा भी इस चराचर जीवसमूहसहित समस्त जगत्का कारण होनेसे सबको व्याप्त किये हुए स्थित है, अत: सब कुछ उसीसे परिपूर्ण है। ४. अभिप्राय यह है कि तेरहवें श्लोकमें जो उसको सब जगह हाथ-पैरवाला और अन्य सब इन्द्रियोंवाला बतलाया गया है, उससे यह बात नहीं समझनी चाहिये कि वह ज्ञेय परमात्मा अन्य जीवोंकी भाँति हाथ-पैर आदि इन्द्रियोंवाला है; वह इस प्रकारकी इन्द्रियोंसे सर्वथा रहित होते हुए भी सब जगह उन-उन इन्द्रियोंके विषयोंको ग्रहण करनेमें समर्थ है। इसलिये उसको सब जगह सब इन्द्रियोंवाला और सब इन्द्रियोंसे रहित कहा गया है। श्रुतिमें भी कहा है-- अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षु: स शृणोत्यकर्ण: । (श्वेताश्चवतरोपनिषद् ३।१९) “वह परमात्मा बिना पैर-हाथके ही वेगसे चलता और ग्रहण करता है तथा बिना नेत्रोंक देखता और बिना कानोंके ही सुनता है।” अतएव उसका स्वरूप अलौकिक है, इस वर्णनमें यही बात समझायी गयी है। ५. अभिप्राय यह है कि वह परमात्मा सब गुणोंका भोक्ता होते हुए भी अन्य जीवोंकी भाँति प्रकृतिके गुणोंसे लिप्त नहीं है। वह वास्तवमें गुणोंसे सर्वथा अतीत है, तो भी प्रकृतिके सम्बन्धसे समस्त गुणोंका भोक्ता है। यही उसकी अलौकिकता | ६. श्रुतिमें भी कहा है--“तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके | तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्मत: ।। * (ईशोपनिषद् ५) अर्थात् वह चलता है और नहीं भी चलता है, वह दूर भी है और समीप भी है, वह इस सम्पूर्ण जगत्के भीतर भी है और इन सबके बाहर भी है। ७. वह परमात्मा चराचर भूतोंके बाहर और भीतर भी है, इससे कोई यह बात न समझ ले कि चराचर भूत उससे भिन्न होंगे। इसीको स्पष्ट करनेके लिये कहते हैं कि चराचर भूत भी वही है। अर्थात् जैसे बरफके बाहर-भीतर भी जल है और स्वयं बरफ भी वस्तुतः जल ही है--जलसे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ नहीं है, उसी प्रकार यह समस्त चराचर जगत् उस परमात्माका ही स्वरूप है, उससे भिन्न नहीं है। <. जैसे सूर्यकी किरणोंमें स्थित परमाणुरूप जल साधारण मनुष्योंके जाननेमें नहीं आता--उनके लिये वह दुर्विज्ञेय है, उसी प्रकार वह सर्वव्यापी परब्रह्मय परमात्मा भी उस परमाणुरूप जलकी अपेक्षा भी अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण साधारण मनुष्योंके जाननेमें नहीं आता; इसलिये वह अविज्ञेय है। १. सम्पूर्ण जगत्में और इसके बाहर ऐसी कोई भी जगह नहीं है जहाँ परमात्मा न हों। इसलिये वह अत्यन्त समीपमें भी है और दूरमें भी है; क्योंकि जिसको मनुष्य दूर और समीप मानता है, उन सभी स्थानोंमें वह विज्ञानानन्दधन परमात्मा सदा ही परिपूर्ण है। इसलिये इस तत्त्वको समझनेवाले श्रद्धालु मनुष्योंके लिये वह परमात्मा अत्यन्त समीप है और अश्रद्धालुके लिये अत्यन्त दूर है। २. इस वाक्यसे उस जाननेयोग्य परमात्माके एकत्वका प्रतिपादन किया गया है। अभिप्राय यह है कि जैसे महाकाश वास्तवमें विभागरहित है तो भी भिन्न-भिन्न घड़ोंके सम्बन्धसे विभक्त-सा प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा वास्तवमें विभागरहित है, तो भी समस्त चराचर प्राणियोंमें क्षेत्रज्॒रूपसे पृथक्-पृथक्के सदृश स्थित प्रतीत होता है; किंतु यह भिन्नता केवल प्रतीतिमात्र ही है, वास्तवमें वह परमात्मा एक है और वह सर्वत्र परिपूर्ण है। ३. यहाँ “तमसः” पद अन्धकार और अज्ञान अर्थात् मायाका वाचक है और वह परमात्मा स्वयंज्योति तथा ज्ञानस्वरूप है; अन्धकार और अज्ञान उसके निकट नहीं रह सकते, इसलिये उसे मायासे अत्यन्त परे--इनसे सर्वथा रहित--बतलाया गया है। ४. उसे पुन: 'ज्ञेय” कहकर यह भाव दिखलाया गया है कि जिस ज्ञेयका बारहवें श्लोकमें प्रकरण आरम्भ किया गया है, उस परमात्माका ज्ञान प्राप्त कर लेना ही इस संसारमें मनुष्य-शरीरका परम कर्तव्य है; इस संसारमें जाननेके योग्य एकमात्र परमात्मा ही है। अतएव उसका तत्त्व जाननेके लिये सभीको पूर्णरूपसे उद्योग करना चाहिये, अपने अमूल्य जीवनको सांसारिक भोगोंमें लगाकर नष्ट नहीं कर डालना चाहिये। ५. चन्द्रमा, सूर्य, विद्युत, तारे आदि जितनी भी बाहा ज्योतियाँ हैं; बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ आदि जितनी आध्यात्मिक ज्योतियाँ हैं तथा विभिन्न लोकों और वस्तुओंके अधिष्ठातृदेवतारूप जो देवज्योतियाँ हैं--उन सभीका प्रकाशक वह परमात्मा है तथा उन सबमें जितनी प्रकाशनशक्ति है, वह भी उसी परब्रह्म परमात्माका एक अंभशमात्र है। ६. अभिप्राय यह है कि पूर्वोक्त अमानित्वादि ज्ञान-साथनोंके द्वारा प्राप्त तत्त्वज्ञानसे वह जाना जाता है। ७. वह परमात्मा सब जगह समानभावसे परिपूर्ण होते हुए भी, हृदयमें उसकी विशेष अभिव्यक्ति है। जैसे सूर्यका प्रकाश सब जगह समानरूपसे विस्तृत रहनेपर भी दर्पण आदिमें उसके प्रतिबिम्बकी विशेष अभिव्यक्ति होती है एवं सूर्यमुखी शीशेमें उसका तेज प्रत्यक्ष प्रकट होकर अग्नि उत्पन्न कर देता है, अन्य पदार्थोंमें उस प्रकारकी अभिव्यक्ति नहीं होती, उसी प्रकार हृदय उस परमात्माकी उपलब्धिका स्थान है। ज्ञानीके हृदयमें तो वह प्रत्यक्ष ही प्रकट है। यही बात समझानेके लिये उसको सबके हृदयमें विशेषरूपसे स्थित बतलाया गया है। ८. इस अध्यायके पाँचवें और छठे श्लोकोंमें विकारोंसहित क्षेत्रके स्वरूपका वर्णन किया गया है, सातवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक ज्ञानके नामसे ज्ञानके बीस साधनोंका और बारहवेंसे सत्रहवेंतक ज्ञेय अर्थात् जाननेयोग्य परमात्माके स्वरूपका वर्णन किया गया है। ९, क्षेत्रको प्रकृतिका कार्य, जड, विकारी, अनित्य और नाशवान् समझना, ज्ञानके साधनोंको भलीभाँति धारण करना और उनके द्वारा भगवानके निर्गुण, सगुणरूपको भलीभाँति समझ लेना--यही क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेयको जानना है तथा उस ज्ञेयस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाना ही भगवान्के स्वरूपको प्राप्त हो जाना है। ३. इसी अध्यायके छठे श्लोकमें जिन इच्छा-द्वेष, सुख-दुःख आदि विकारोंका वर्णन किया गया है--उन सबका वाचक यहाँ “विकारान्” पद है तथा सत्त्व, रज और तम--इन तीनों गुणोंका और इनसे उत्पन्न समस्त जड पदार्थोंका वाचक “गुणान' पद है। इन दोनोंको प्रकृतिसे उत्पन्न समझनेके लिये कहकर भगवानूने यह भाव दिखलाया है कि सत्त्व, रज और तम--इन तीनों गुणोंका नाम प्रकृति नहीं है; प्रकृति अनादि है। तीनों गुण सृष्टिके आदिमें उससे उत्पन्न होते हैं (भागवत २,सम्बन्ध-- जीवोंके नाना प्रकारकी योनियोंगें जन्म लेनेकी बात तो चौथे #लोकतक कही गयी, किंतु वहाँ गुणोंकी कोई बात नहीं आयी। इसलिये अब वे गुण क्या हैं? उनका संग क्या है? किस गुणके संगसे अच्छी योनियें और किस गुणके संगसे बुरी योनि्ें जन्म होता है?--इन सब बातोंको स्पष्ट करनेके लिये इस प्रकरणका आरम्भ करते हुए भगवान् अब पहले उन तीनों गुणोंकी प्रकृतिये उत्पत्ति और उनके विभिन्न नाम बतलाकर फिर उनके स्वरूप और उनके द्वारा जीवात्माके बन्धन-प्रकारका क्रमशः पृथक्ू-पृथक् वर्णन करते हैं-- सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा: । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण--ये प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुणर अविनाशी जीवात्माको शरीरमें बाँधते हैं:
يا أرجونا عظيمَ الساعد! إنّ الصفات الثلاث الأصول—سَتْفَا (الصفاء والوضوح)، ورَجَس (الدافع القَلِق)، وتَمَس (الخمول والظلمة)—تنشأ من الطبيعة الأولى (براكريتي). وبأثرها تُقيِّد النفسَ المتجسِّدة غير الفانية (الدهين) بالحياة داخل الجسد، فتُشكِّل المزاج والاختيار، ومن ثمّ الوجهة الأخلاقية للأفعال، حتى في خضمّ ضغط الحرب والواجب.
Verse 6
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् | सुखसज्ञेन बध्नाति ज्ञानसड्रेन चानघ,हे निष्पाप! उन तीनों गुणोंमें सत्त्वगुण तो निर्मल होनेके कारण प्रकाश करनेवाला और विकाररहित हैः, वह सुखके सम्बन्धसे और ज्ञानके सम्बन्धसे अर्थात् उसके अभिमानसे बाँधता हैः
يا من لا إثمَ عليه! من بين الغونات الثلاث، فإنّ سَتْفَا—لطهارتها—مُنيرةٌ لا عِلّةَ فيها. وهي تُقيِّد بالارتباط باللذّة، وبالارتباط بالمعرفة—أي بالاعتداد بتلك المعرفة.
Verse 7
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासड्रसमुद्धवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसड्रेन देहिनम्,हे अर्जुन! रागरूप रजोगुणको कामना और आसक्तिसे उत्पन्न जान*। वह इस जीवात्माको कर्मोके और उनके फलके सम्बन्धसे बाँधता है:
اعلم أنّ رَجَس ذو طبيعة الشغف، مولودٌ من التعلّق والظمأ (التَّرَصُّد والرغبة). يا ابنَ كونتي، إنّه يُقيِّد النفسَ المتجسِّدة بالتعلّق بالفعل وبثمار الفعل، فيُبقيها أسيرة السعي القَلِق بدل ثبات البصيرة.
Verse 8
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत,हे अर्जुन सब देहाभिमानियोंको मोहित करनेवाले5 तमोगुणको तो अज्ञानसे उत्पन्न जानः। वह इस जीवात्माको प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा बाँधता है?
اعلم أنّ تَمَس مولودٌ من الجهل، وهو القوّة التي تُضلِّل جميع الكائنات المتجسِّدة. يا بهاراتا، إنّه يُقيِّد النفسَ بالغفلة والكسل والنوم، فيُعتم التمييز ويُوهِن العزم الأخلاقي.
Verse 9
सम्बन्ध-- इस प्रकार सत्त्व, रज और तम--इन तीनों गुणोंका स्वरूप और उनके द्वारा जीवात्माके बाँधे जानेका प्रकार बतलाकर अब उन तीनों गुणोंका स्वाभाविक व्यापार बतलाते हैं-- सत्त्वं सुखे संजयति रज: कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तम: प्रमादे संजयत्युत,हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुखमें लगाता है: और रजोगुण कर्ममें- तथा तमोगुण तो ज्ञानको ढककर प्रमादमें भी लगाता हैः
قال أرجونا: يا بهارتا! إن صفة السَّتْفَة (sattva) تُقيِّد الإنسان بالسعادة؛ وصفة الرَّجَس (rajas) تُقيِّده بالفعل والحركة القلِقة؛ أمّا التَّمَس (tamas) فإذ يحجب التمييز ويُغَشِّي البصيرة، يُقيِّده بالغفلة والوهم واللامبالاة. ويُبيّن هذا التعليم كيف تجذب كلُّ صفةٍ فطريةٍ الذهنَ إلى نمطها الخاص من العيش، فتُشكِّل السلوك والمسؤولية الأخلاقية.
Verse 10
सम्बन्ध-- सत्त्त आदि तीनों गुण जिस समय अपने-अपने कार्यमें जीवको नियुक्त करते हैं. उस समय वे ऐसा करनेगें किस प्रकार समर्थ होते हैं->- यह बात अगले शलोकमें बतलाते हैं-- रजस्तमश्नाभि भूय सत्त्वं भवति भारत । रज: सत्त्वं तमश्नैव तम: सत्त्वं रजस्तथा,हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण*, सत्त्नुण और तमोगुणको दबाकर रजोगुण,“--वैसे ही सत्त्गुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण” होता है अर्थात् बढ़ता है;
قال أرجونا: يا بهارتا، إذا غلبت السَّتْفَة (sattva) الرَّجَس (rajas) والتَّمَس (tamas) صارت هي الغالبة. وكذلك إذا غلبت الرَّجَس السَّتْفَة والتَّمَس صارت الرَّجَس هي الغالبة؛ وإذا غلب التَّمَس السَّتْفَة والرَّجَس صار التَّمَس هو الغالب. وهكذا تتشكل الحياة الباطنة للإنسان بحسب الصفة التي تنال السيادة، فتؤثر في الحكم والسلوك وصفاء البصيرة الأخلاقية.
Verse 11
सम्बन्ध-- इस प्रकार अन्य दो गुणोंको दबाकर प्रत्येक गुणके बढ़नेकी बात कही गयी। अब प्रत्येक गुणकी वृद्धिके लक्षण जाननेकी इच्छा होनेपर क्रमशः सत्त्गगुण, रजोगुण और तमोगुणकी वृद्धिके लक्षण बतलाये जाते हैं-- सर्दद्वारेषु देहेडस्मिन् प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद् विवृद्धं सत्त्वमित्युत,जिस समय इस देहमें: तथा अन्तःकरण और इन्द्रियोंमें चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हैः
قال أرجونا: إذا نهض في هذا الجسد نورٌ صافٍ عند كل «باب»—أي في الذهن ومن خلال الحواس—متجليًا في التمييز والمعرفة الحقّة، فاعلموا عندئذٍ أن صفة السَّتْفَة (sattva) قد اشتدّت ونمت.
Verse 12
लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ,हे अर्जुन रजोगुणके बढ़नेपर लोभ प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धिसे कर्मोंका सकामभावसे आरम्भ, अशान्ति और विषयभोगोंकी लालसा--ये सब उत्पन्न होते हैं*
قال أرجونا: يا أكرمَ آلِ بهارتا! إذا اشتدّت صفة الرَّجَس (rajas) نشأت: الطمع، والنشاط القَلِق، والشروع في الأعمال بدافع المصلحة الذاتية وطلب الثمرة، واضطراب الباطن، والتعلّق بلذّات الحواس. تلك علامات الرَّجَس إذا قوي.
Verse 13
इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्ः श्रीकृष्णाजुनसंवादमें क्षेत्रक्षेत्रञविभागययोग नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ,अप्रकाशो5प्रवृत्तिश्न॒ प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन
قال أرجونا: إذا غلبت صفة الظلمة، التَّمَس (tamas)، يا بهجةَ آلِ كورو، ظهرت هذه العلامات: انعدام الوضوح والنور، العزوف عن الفعل القويم، الغفلة (برماد)، والوهم والضلال (موها).
Verse 14
१३ ।। सम्बन्ध-- इस प्रकार तीनों गुणोंकी वृद्धिके भिन्न-भिन्न लक्षण बतलाकर अब दो शलोकोमें उन गुणोंमेंसे किस गुणकी वृद्धिके समय मरकर मनुष्य किस गतिको प्राप्त होता है; यह बतलाया जाता है-- यदा सच्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभूत् । तदोत्तमविदां लोकानमलानू् प्रतिपद्यते,जब यह मनुष्य सत्त्वगुणकी वृद्धिमें मृत्युको प्राप्त होता है? तब तो उत्तम कर्म करनेवालोंके निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होता है
قال أرجونا: إذا لقي الكائن الحيّ الموتَ في وقتٍ تغلب فيه صفة السَّتْفَا (الصفاء والانسجام)، فإنه يبلغ العوالم الطاهرة التي لا دَنَسَ فيها، عوالمَ أهل المعرفة والساعين إلى الخير الأسمى—مقاماتٍ تتلألأ بضياء الاستحقاق وحُسن السلوك. والعبرة الأخلاقية أن الهيئة الباطنة التي يربّيها المرء عند ختام حياته ترسم مسار الوعي بعد الموت.
Verse 15
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसज्;िषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते,रजोगुणके बढ़नेपर मृत्युको प्राप्त होकर कर्मोकी आसक्तिवाले मनुष्योंमें उत्पन्न होता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरा हुआओं मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियोंमें उत्पन्न होता है
من مات وهو تحت سلطان الرَّجَس (الهيجان والشهوة) وُلِد من جديد بين أناسٍ تدفعهم الأفعال والتعلّق بثمارها. وكذلك من فارق الحياة تحت قبضة التَّمَس (الظلمة والجمود) وُلِد في أرحامٍ وضيعةٍ مُضلَّلة—كأرحام الحشرات والبهائم. فالبيت يجعل التناسخ ثمرةً أخلاقيةً لصفة الذهن الغالبة عند الموت.
Verse 16
सम्बन्ध-- सत्त्त., रज और तम--इन तीनों गुणोंकी वृद्धियें मरनेके भित्न- भिन्न फल बतलाये गये: इससे यह जाननेकी इच्छा होती है कि इस प्रकार कभी किसी गुणकी और कभी किसी गुणकी वृद्धि क्यों होती है; इसपर कहते हैं-- कर्मण:” सुकृतस्याहुः साच्विकं निर्मल फलम् । रजसस्तु फल॑ दुःखमज्ञानं तमस: फलम्,श्रेष्ठ कर्मका तो सात्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है।* राजस कर्मका फल दुःख* एवं तामस कर्मका फल अज्ञान* कहा है
قال أرجونا: «يقولون إن ثمرة العمل المُحسَن هي سَتْفِيّة—نقيّة مُجلِّية. وثمرة الرَّجَس هي الألم، وثمرة التَّمَس هي الجهل.» وفي المعنى الأخلاقي يربط البيت بين صفة الفعل والنية وبين نوع العاقبة التي تُنبتها.
Verse 17
सम्बन्ध--ग्यारहवें. बारहवें और तेरहवें शलोकोरमें सत्व, रज और तमोगुणकी वृद्धिके लक्षणोंका क्रमसे वर्णन किया गया; इसपर यह जाननेकी इच्छा होती है कि ज्ञान” आदिकी उत्पत्तिको सत्त्त आदि गुणोंकी वृद्धिके लक्षण क्यों माना गया। अतएव कार्यकी उत्पत्तिये कारणकी सत्ताको जान लेनेके लिये ज्ञान आदिकी उत्पत्तिगें सत्त आदि गुणोंको कारण बतलाते हैं-- सत्त्वात् संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च | प्रमादमोहौ तमसो भवतोऊज्ञानमेव च,सत्त्वगुणसे ज्ञानः उत्पन्न होता है और रजोगुणसे निस्संदेह लोभः तथा तमोगुणसे प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी होता है
قال أرجونا: من السَّتْفَا تنشأ المعرفة الصافية، ومن الرَّجَس تنشأ—لا ريب—الشهوةُ والجشعُ والتشبّث، ومن التَّمَس تولد الغفلةُ والضلال—بل الجهلُ نفسه. أخلاقياً يرسم البيت خريطة النفس: الصفاء يعين على التمييز، والهيجان يوقِد التملّك، والجمود يُنبت الالتباس والإهمال.
Verse 18
ऊर्ध्व॑ गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसा: । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा:,* सत्त्वगुणमें स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकोंको जाते हैं, रजोगुणमें स्थित राजस पुरुष मध्यमें अर्थात् मनुष्यलोकमें ही रहते हैं और तमोगुणके कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादिमें स्थित तामस पुरुष अधोगतिको अर्थात् कीट, पशु आदि नीच योनियोंको तथा नरकोंको प्राप्त होते हैं*
الراسخون في السَّتْفَا يصعدون إلى العوالم العليا؛ والمغلوبون بالرَّجَس يقيمون في الوسط، في حال الإنسان؛ أمّا الذين يلازمون أدنى أنماط السلوك المولودة من التَّمَس فإنهم يهبطون، ساقطين إلى مراتب وجودٍ وضيعة. فالبيت يجعل من نفسية الأخلاق قدَراً: صفة الذهن والعمل الغالبة ترسم مسار المصير.
Verse 19
सम्बन्ध--गीताके तेरहवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें जो यह बात कही थी कि गुणोंका संग ही इस मनुष्यके अच्छी-बुरी योनियोंकी प्राप्तिरूप पुनर्जमका कारण हैः उसीके अनुसार इस जध्यायमें पॉचवेंसे अठारहवें #लोकतक गुणोंके स्वरूप तथा गुणोंके कार्यद्वारा बाँधे हुए मनुष्योंकी यति आदिका विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया गया। इस वर्णनसे यह बात समझायी गयी कि मनुष्यको पहले तम और रजोगुणका त्याग करके सत्त्वगगुणमें अपनी स्थिति करनी चाहिये और उसके बाद सत्त्वगुणका भी त्याग करके गुणातीत हो जाना चाहिये। अतएव गुणातीत होनेके उपाय और गुणातीत अवस्थाका फल अगले दो श्लोकोद्वारा बतलाया जाता है-- नान्यं गुणेभ्य: कर्तारें यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्व परं वेत्ति मद्भावं सोडधिगच्छति
قال أرجونا: حين يُبصر المرء بوضوحٍ أنّه لا فاعل للأعمال سوى الغونات الثلاث (guṇa)، ويدرك كذلك الحقيقة التي تتجاوز تلك الغونات، فإنه يبلغ حالتي—حريةً تتخطّى كل تقييدٍ واتحادًا بالذات الإلهية.
Verse 24
२२ तथा ११
يبدو أنّ الإحالة المقدَّمة غير مكتملة، أو أنها مجرّد علامة إحالة متقاطعة، وليست نصّ البيت كاملًا. ومن دون الـpāṭha السنسكريتي الكامل لِـBhīṣma-parvan، الأدهيايا 41، الآية 24 (على لسان أرجونا)، لا يمكن إخراج ترجمة أمينة تحفظ البعد السردي والأخلاقي.
Verse 37
भीष्मपर्वमें सैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
وهكذا ينتهي الفصل السابع والثلاثون من بهيشما بارفا. وهذه خاتمة (colophon) تُثبت تمام الفصل، وليست بيتًا على لسان أحد؛ إنها علامة توقّف في السرد وإغلاق لما سبق من تعليم أو حدث.
The dilemma is how to lawfully engage revered elders and teachers in combat: Yudhiṣṭhira must fulfill kṣatra-dharma while maintaining ritual-ethical legitimacy through salutation, consent, and blessing, even at the risk of being misread tactically.
Legitimate action in high-stakes conflict is framed as requiring procedural ethics—honoring teachers/elders and aligning force with recognized norms—while also acknowledging that strategic knowledge (counsel on vulnerabilities) often travels through relationships of respect.
No explicit phalaśruti is presented; the chapter’s meta-level function is archival and normative, illustrating that adherence to propriety (maryādā) is treated as consequential for moral standing and for the credibility of counsel within the epic’s broader soteriological and ethical frame.