Adhyaya 34
Bhishma ParvaAdhyaya 3416 Verses

Adhyaya 34

Bhakti–Akṣara-Upāsanā-Viveka (Devotion to the Personal vs. Contemplation of the Imperishable)

Upa-parva: Bhagavadgītā Parva (Gītā-Upākhyāna within Bhīṣma Parva)

This chapter opens with Arjuna’s comparative question: among those who worship the personal divine with steady devotion and those who contemplate the imperishable, unmanifest absolute (akṣara/avyakta), who are more established in yoga. Kṛṣṇa answers with a graded taxonomy of spiritual practice. Devotional worship with mind fixed on the personal form is affirmed as the most integrated (yuktatama). Contemplation of the unmanifest is acknowledged as valid but described as more arduous for embodied agents, requiring restraint of the senses, equanimity, and universal welfare orientation. The discourse then provides an accessibility ladder: (1) steady concentration on the divine, (2) practice through repetition (abhyāsa-yoga), (3) action dedicated to the divine purpose, and (4) renunciation of the fruits of all actions, culminating in peace. The closing section defines the behavioral profile of the “dear devotee”: non-hostility, compassion, non-possessiveness, equanimity in pleasure/pain, patience, contentment, steadiness, freedom from agitation, and impartiality toward praise/blame. The chapter ends by commending those who follow this ‘dharmic nectar’ with faith and commitment.

Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के रण-तट पर, श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—“हे महाबाहो! मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन फिर सुनो,” मानो युद्ध के शोर के बीच एक गूढ़ दीपक जल उठता है। → भगवान् ‘योग’ के प्रभाव—अपनी सर्वव्यापकता, भक्तों पर अनुग्रह, और भक्ति की अद्भुत शुद्धि-शक्ति—का विस्तार करते हैं; वे बताते हैं कि अधम कही जाने वाली जातियों तक भी, यदि वे शरण लें, तो पवित्रता और गति का द्वार खुल जाता है। → भगवान् का निर्णायक वचन उभरता है—जो सतत प्रेमपूर्वक भजन करते हैं, उनके हृदय में स्थित होकर वे स्वयं अज्ञान का अंधकार तत्त्वज्ञान-दीप से नष्ट करते हैं; और जो एक बार भी “मैं तेरा हूँ” कहकर शरण आता है, उसे वे सब भूतों से अभय देते हैं—यह उनका व्रत है। → अध्याय का निष्कर्ष यह स्थापित करता है कि समस्त ‘गुप्त रहस्यों’ में सर्वोच्च रहस्य पुरुषोत्तम का तत्त्व और प्रेम-भक्ति है—ज्ञान, शुद्धि और अभय का मूल स्रोत वही शरणागति है। → रणभूमि की तात्कालिकता बनी रहती है—यह दिव्य आश्वासन अर्जुन के कर्म-निर्णय को कैसे दृढ़ करेगा, इसका संकेत देकर कथा अगले अध्याय की ओर बढ़ती है।

Shlokas

Verse 1

श्रीभगवान्‌ बोले--हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचनको सुन, जिसे मैं तुझ अतिशय प्रेम रखनेवालेके लिये हितकी इच्छासे कहूँगा

قال الربّ المبارك: «يا ذا الذراعين القويّين، اسمع مرةً أخرى كلماتي—وهي أعمق الأسرار ومشحونة بالقوة. لأنك عزيزٌ عليّ، ولأنني أبتغي لك الخير الحقّ، فسأقولها لك.»

Verse 2

सम्बन्ध-- पहले श्लोकमें भगवान्‌ने जिस विषयपर कहनेकी प्रतिज्ञा की है, उसका वर्णन आरम्भ करते हुए वे पहले पाँच शलोकोंमें योगशब्दवाच्य प्रभावका और अपनी विशभ्ूतिका संक्षिप्त वर्णन करते हैं-- न मे विदु: सुरगणा:ः प्रभवं न महर्षय:३ | अहमादिर्ि देवानां महर्षीणां च सर्वश:,मेरी उत्पत्तिको अर्थात्‌ लीलासे प्रकट होनेको न देवतालोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओंका और महर्षियोंका भी आदिकारण हूँ?

لا تعرف جموعُ الآلهة ولا الحكماءُ العظام حقًّا أصلي—أي تجلّيي الإلهي. فإني على كل وجهٍ أنا العلّة الأولى: المصدر الذي منه ينبثق حتى الآلهة والريشيون.

Verse 3

१८) “जिनके अश्रित भक्तोंका आश्रय लेकर किरात, हृण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि अधम जातिके लोग तथा इनके सिवा और भी बड़े-से-बड़े पापी मनुष्य शुद्ध हो जाते हैं, उन जगत्प्रभु भगवान्‌ विष्णुको नमस्कार है।' ३. भगवानूपर पूर्ण विश्वास करके चौंतीसवें श्लोकके कथनानुसार प्रेमपूर्वक सब प्रकारसे भगवान्‌की शरण हो जाना अर्थात्‌ उनके प्रत्येक विधानमें सदा संतुष्ट रहना, उनके नाम, रूप, गुण, लीला आदिका निरन्तर श्रवण, कीर्तन और चिन्तन करते रहना, उन्हींको अपनी गति, भर्ता, प्रभु आदि मानना, श्रद्धा-भक्तिपूर्वक उनका पूजन करना, उन्हें नमस्कार करना, उनकी आज्ञाका पालन करना और समस्त कर्म उन्हींके समर्पण कर देना आदि भगवान्‌की शरण होना है। ३. 'किम्‌' और “पुनः” का प्रयोग करके भगवानने यह भाव दिखलाया है कि जब उपर्युक्त अत्यन्त दुराचारी (गीता ९। ३०) और चाण्डाल आदि नीच जातिके मनुष्य भी (गीता ९।३२) मेरा भजन करके परम गतिको प्राप्त हो जाते हैं, तब फिर जिनके आचार-व्यवहार और वर्ण अत्यन्त उत्तम हैं, ऐसे मेरे भक्त पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षिलते मेरी शरण होकर परम गतिको प्राप्त हो जायँ--इसमें तो कहना ही क्या है! २. 'भक्ता:' पदका सम्बन्ध ब्राह्मण और राजर्षि दोनोंके ही साथ है; क्योंकि यहाँ भक्तिके ही कारण उनको परम गतिकी प्राप्ति बतलायी गयी है। ३. मनुष्यदेह बहुत ही दुर्लभ है। यह बड़े पुण्यबलसे और खास करके भगवान्‌की कृपासे मिलता है और मिलता है केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही। इस शरीरको पाकर जो भगवत्प्राप्तिके लिये साधन करता है, उसीका मनुष्य-जीवन सफल होता है। जो इसमें सुख खोजता है, वह तो असली लाभसे वंचित ही रह जाता है; क्योंकि यह सर्वथा सुखरहित है, इसमें कहीं सुखका लेश भी नहीं है। जिन विषयभोगोंके सम्बन्धको मनुष्य सुखरूप समझता है, वह बार-बार जन्म- मृत्युके चक्‍करमें डालनेवाला होनेके कारण वस्तुतः दुःखरूप ही है। अतएव इसको सुखरूप न समझकर यह जिस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये मिला है, उस उद्देश्यको शीघ्र-से-शीघ्र प्राप्त कर लेना चाहिये; क्योंकि यह शरीर क्षणभंगुर है, पता नहीं, किस क्षण इसका नाश हो जाय! इसलिये सावधान हो जाना चाहिये। न इसे सुखरूप समझकर विषयोंमें फँसना चाहिये और न इसे नित्य समझकर भजनमें देर ही करनी चाहिये। कदाचित्‌ अपनी असावधानीमें यह व्यर्थ ही नष्ट हो गया तो फिर सिवा पछतानेके और कुछ भी उपाय हाथमें नहीं रह जायगा। श्रुति कहती है-- इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टि: | (केनोपनिषद्‌ २।५) “यदि इस मनुष्यजन्ममें परमात्माको जान लिया तब तो ठीक है और यदि उसे इस जन्ममें नहीं जाना तब तो बड़ी भारी हानि है।' इसीलिये भगवान्‌ कहते हैं कि ऐसे शरीरको पाकर नित्य-निरन्तर मेरा भजन ही करो। क्षणभर भी मुझे मत भूलो। ४. जिन परमेश्वरके सगुण, निर्गुण, निराकार, साकार आदि अनेक रूप हैं; जो विष्णुरूपसे सबका पालन करते हैं, ब्रह्मारूपसे सबकी रचना करते हैं और रुद्ररूपसे सबका संहार करते हैं; जो भगवान्‌ युग-युगमें मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, श्रीराम, श्रीकृष्ण आदि दिव्य रूपोंमें अवतीर्ण होकर जगत्में विचित्र लीलाएँ करते हैं; जो भक्तोंकी इच्छाके अनुसार विभिन्न रूपोंमें प्रकट होकर उनको अपनी शरण प्रदान करते हैं--उन समस्त जगत्‌के कर्ता, हर्ता, विधाता, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्‌, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, सर्वसुहृद, सर्वगुणसम्पन्न, परम पुरुषोत्तम, समग्र भगवान्‌का वाचक यहाँ “माम्‌' पद है। ५. भगवान्‌ ही सर्वशक्तिमान्‌, सर्वज्ञ, सर्वलोक-महेश्वर, सर्वातीत, सर्वमय, निर्मुण-सगुण, निराकार-साकार, सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्यके समुद्र और परम प्रेमस्वरूप हैं--इस प्रकार भगवानके गुण, प्रभाव, तत्त्व और रहस्यका यथार्थ परिचय हो जानेसे जब साधकको यह निश्चय हो जाता है कि एकमात्र भगवान्‌ ही हमारे परम प्रेमास्पद हैं, तब जगत्‌की किसी भी वस्तुमें उसकी जरा भी रमणीयबुद्धि नहीं रह जाती। ऐसी अवस्थामें संसारके किसी दुर्लभ-से-दुर्लभ भोगमें भी उसके लिये कोई आकर्षण नहीं रहता। जब इस प्रकारकी स्थिति हो जाती है, तब स्वाभाविक ही इस लोक और परलोककी समस्त वस्तुओंसे उसका मन सर्वथा हट जाता है और वह अनन्य तथा परम प्रेम और श्रद्धाके साथ निरन्तर भगवान्‌का ही चिन्तन करता रहता है। भगवानका यह प्रेमपूर्ण चिन्तन ही उसके प्राणोंका आधार होता है, वह क्षणमात्रकी भी उनकी विस्मृतिको सहन नहीं कर सकता। जिसकी ऐसी स्थिति हो जाती है, उसीको “भगवानमें मनवाला” कहते हैं। ६. भगवान्‌ ही परमगति हैं, वे ही एकमात्र भर्ता और स्वामी हैं, वे ही परम आश्रय और परम आत्मीय संरक्षक हैं, ऐसा मानकर उन्हींपर निर्भर हो जाना, उनके प्रत्येक विधानमें सदा ही संतुष्ट रहना, उन्हींकी आज्ञाका अनुसरण करना, भगवानके नाम, रूप, गुण, प्रभाव, लीला आदिके श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदिमें अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियोंको निमग्न रखना और उन्हींकी प्रीतिके लिये प्रत्येक कार्य करना--इसीका नाम “भगवानका भक्त बनना” है। ३१. भगवान्‌के मन्दिरोंमें जाकर उनके मंगलमय विग्रहका यथाविधि पूजन करना, सुविधानुसार अपने-अपने घरोंमें इष्टरूप भगवानकी मूर्ति स्थापित करके उसका विधिपूर्वक श्रद्धा और प्रेमके साथ पूजन करना, अपने हृदयमें या अन्तरिक्षमें अपने सामने भगवान्‌की मानसिक मूर्ति स्थापित करके उसकी मानस-पूजा करना, उनके वचनोंका, उनकी लीलाभूमिका और चित्रपट आदिका आदर-सत्कार करना, उनकी सेवाके कार्योंमें अपनेको संलग्न रखना, निष्कामभावसे यज्ञादिके अनुष्ठानके द्वारा भगवान्‌की पूजा करना, माता-पिता, ब्राह्मण, साधु-महात्मा और गुरुजनोंको तथा अन्य समस्त प्राणियोंको भगवानका ही स्वरूप समझकर या अन्तर्यामीरूपसे भगवान्‌ सबमें व्याप्त हैं, ऐसा जानकर सबका यथायोग्य पूजन, आदर-सत्कार करना और तन-मन-धनसे सबको यथायोग्य सुख पहुँचानेकी तथा सबका हित करनेकी यथार्थ चेष्टा करना--ये सभी क्रियाएँ 'भगवान्‌की पूजा” ही कहलाती हैं। २. भगवान्‌के साकार या निराकार रूपको, उनकी मूर्तिको, चित्रपटको, उनके चरण, चरणपादुका या चरणचिह्लोंको, उनके तत्त्व, रहस्य, प्रेम, प्रभावका और उनकी मधुर लीलाओंका व्याख्यान करनेवाले सत्‌-शास्त्रोंको, माता-पिता, ब्राह्मण, गुरु, साधु-संत और महापुरुषोंको तथा विश्वके समस्त प्राणियोंको उन्हींका स्वरूप समझकर या अन्तर्यामीरूपसे उनको सबमें व्याप्त जानकर श्रद्धा-भक्तिसहित मन, वाणी और शरीरके द्वारा यथायोग्य प्रणाम करना--यही “भगवान्‌को नमस्कार करना है। ३. यहाँ “आत्मा” शब्द मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके सहित शरीरका वाचक है; तथा इन सबको उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्‌में लगा देना ही आत्माको उसमें युक्त करना है। ४. इस प्रकार सब कुछ भगवान्‌को समर्पण कर देना और भगवान्‌को ही परम प्राप्य, परम गति, परम आश्रय और अपना सर्वस्व समझना “भगवान्‌के परायण होना' है। ५, इसी मनुष्यशरीरमें ही भगवानका प्रत्यक्ष साक्षात्कार हो जाना, भगवान्‌को तत्त्वसे जानकर उनमें प्रवेश कर जाना अथवा भगवानके दिव्य लोकमें जाना, उनके समीप रहना अथवा उनके-जैसे रूप आदिको प्राप्त कर लेना--ये सभी भगवत्प्राप्ति ही हैं। चतुस्त्रिंशो ध्याय: (श्रीमद्भगवद्गीतायां दशमो<ध्याय:) 44508 रह 28 विभूति और योगशक्तिका तथा प्रभावसहित कथन, अर्जुनके पूछनेपर भगवान्‌द्वारा अपनी विभूतियोंका और योगशक्तिका पुनः वर्णन सम्बन्ध--गीताके सातवें अध्यायसे लेकर नवें अध्यायतक विज्ञानसह्ित ज्ञानका जो वर्णन किया गया, उसके बहुत गम्भीर हो जानेके कारण अब पुनः उसी विषयको दूसरे प्रकारसे भलीभॉति समझानेके लिये दसवें अध्यायका आरम्भ किया जाता है। यहाँ पहले शलोकमें भगवान्‌ पूर्वोक्त विषयका ही पुनः वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं-- श्रीभगवानुवाच भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वच: । यत्ते5हं प्रीयमाणाय* वक्ष्यामि हितकाम्यया,यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहे श्वरम्‌ । असम्मूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते

من عرفني حقًّا أني غيرُ مولود، بلا بداية، وأنني الربّ العظيم للعوالم—فذلك، غيرُ مُضلَّل بين البشر، حكيمٌ ويتحرّر من جميع الآثام.

Verse 4

२१) 'हे उद्धव! संतोंका परमप्रिय “आत्मा” रूप मैं एकमात्र श्रद्धा-भक्तिसे ही वशीभूत होता हूँ। मेरी भक्ति जन्मतः चाण्डालोंको भी पवित्र कर देती है।” यहाँ “पापयोनय:” पदको स्त्री, वैश्य और शूद्रोंका विशेषण नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वैश्योंकी गणना द्विजोंमें की गयी है। उनको वेद पढ़नेका और यज्ञादि वैदिक कर्मोंके करनेका शास्त्रमें पूर्ण अधिकार दिया गया है। अतः द्विज होनेके कारण वैश्योंको “पापयोनि” कहना नहीं बन सकता। इसके अतिरिक्त छान्दोग्योपनिषदमें जहाँ जीवोंकी कर्मानुरूप गतिका वर्णन है, यह स्पष्ट कहा गया है कि-- तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन्‌ ब्राह्मणयोनि वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरज्श्चयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा ।। (अध्याय ५ खण्ड १० मं० ७) “उन जीवोंमें जो इस लोकमें रमणीय आचरणवाले अर्थात्‌ पुण्यात्मा होते हैं, वे शीघ्र ही उत्तम योनि--ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनिको प्राप्त करते हैं और जो इस संसारमें कपूय (अधम) आचरणवाले अर्थात्‌ पापकर्मा होते हैं, वे अधमयोनि अर्थात्‌ कुत्तेकी, सूकरकी या चाण्डालकी योनिको प्राप्त करते हैं।' इससे यह सिद्ध है कि वैश्योंकी गणना “पापयोनि” में नहीं की जा सकती। अब रही स्त्रियोंकी बात--सों ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी स्त्रियोंका अपने पतियोंके साथ यज्ञादि वैदिक कर्मोंमें अधिकार माना गया है। इस कारणसे उनको भी पापयोनि कहना नहीं बन सकता। सबसे बड़ी अड़चन तो यह पड़ेगी कि भगवान्‌की भक्तिसे चाण्डाल आदिको भी परमगति मिलनेकी बात, जो कि सर्वशास्त्रसम्मत है और जो भक्तिके महत्त्वको प्रकट करती है, कैसे रहेगी? अतएव पापयोनय:” पदको स्त्री, वैश्य और शूद्रोंका विशेषण न मानकर शूद्रोंकी अपेक्षा भी हीनजातिके मनुष्योंका वाचक मानना ही ठीक प्रतीत होता है। क्योंकि भागवतमें बतलाया है-- किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकड़का यवना: खसादय: । येडन्ये च पापा यदुपाश्रयाश्रया: शुद्धयन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नम: | (२,जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तवमें जन्मरहित, अनादि और लोकोंका महान्‌ ईश्वर तत्त्वसे जानता है,* वह मनुष्योंमें ज्ञानवान्‌ पुरुष सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। बुद्धिरज्ञानमसम्मोह:९ < 5 क्षमा सत्यं दम: शम: । सुखं दु:ःखं भवो5भावो भयं चाभयमेव च निश्चय करनेकी शक्ति यथार्थ ज्ञान, असम्मूढता, क्षमा,< सत्य,“ इन्द्रियोंका वशमें करना, मनका निग्रह तथा सुख-दुःख,* उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय* तथा अहिंसा, समता, संतोष तप,£ दान,” कीर्ति और अपकीर्ति-ऐसे ये प्राणियोंके नाना प्रकारके भाव मुझसे ही होते हैं।?

من عرفني حقًّا أني غيرُ مولود، بلا بداية، وأنني الربّ العظيم للعوالم—فذلك، غيرُ مُضلَّل بين البشر، حكيمٌ ويتحرّر من جميع الآثام.

Verse 5

अहिंसा: समता तुष्टिस्तपोः दानं यशोडयश: । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा:,निश्चय करनेकी शक्ति यथार्थ ज्ञान, असम्मूढता, क्षमा,< सत्य,“ इन्द्रियोंका वशमें करना, मनका निग्रह तथा सुख-दुःख,* उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय* तथा अहिंसा, समता, संतोष तप,£ दान,” कीर्ति और अपकीर्ति-ऐसे ये प्राणियोंके नाना प्रकारके भाव मुझसे ही होते हैं।?

قال أرجونا: اللاعنف، واتزان النفس، والقناعة، والزهدُ بالتقشّف (التَّبَس)، والعطاء، والصيتُ والعار—هذه الميولُ الباطنة المتنوّعة التي تنشأ في الكائنات الحيّة كلّها إنما تصدر عنّي وحدي، كلٌّ على صورته المتميّزة.

Verse 6

महर्षय: सप्त पूर्वे चत्वारोी35 मनवस्तथा । मद्धभावा मानसा जाता येषां लोक इमा: प्रजा:,सात महर्षिजन,* चार उनसे भी पूर्वमें होनेवाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनुर--ये मुझमें भाववाले सब-के-सब मेरे संकल्पसे उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसारमें यह सम्पूर्ण प्रजा है

قال أرجونا: الحكماء العظام السبعة، وكذلك المانو الأربعة في الأزمنة الأقدم—المتّصفون بطبيعتي—وُلدوا من ذهني وإرادتي. ومنهم نشأت هذه الكثرة كلّها من الكائنات في العالم.

Verse 7

एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः । सो<विकम्पेन योगेनः युज्यते नात्र संशय:,जो पुरुष मेरी इस परमैश्चर्यरूप विभूतिकोः और योगशक्तिको< तत्त्वसे जानता है, वह निश्चल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है--इसमें कुछ भी संशय नहीं है

مَن عرف على الحقيقة تجلّياتي الإلهية وقوّتي اليوغية كما هي، اتّحد بيوغا العبادة الثابتة التي لا تتزعزع وبالانضباط الروحي الراسخ؛ ولا شكّ في ذلك.

Verse 8

सम्बन्ध-- भगवान्‌के प्रभाव और विथूतियोंके ज्ञानका फल अविचल भक्तियोगकी प्राप्ति बतलायी गयी, अब दो शलोकोंमें उस भक्तियोयकी प्राप्तिका क्रम बतलाते हैं-- अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता:

يُعلن الربّ المبارك: «أنا أصلُ كلّ شيء؛ ومنّي تنبثق حركةُ كلّ ما يكون.» فإذا علم الحكماء ذلك—وقد امتلأت قلوبهم بخشوعٍ عميق—عبدوني بعبادةٍ ثابتة.

Verse 9

इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌्गीतापव॑के अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्‌्गीतोपनिषद्‌र्में: श्रीकृष्णाजुनसंवादमें राजविद्याराजगुह्ययोग नामक नवाँ अध्याय पूरा हुआ,८ ।। मच्चित्ताः मद्गतप्राणा* बोधयन्त: परस्परम्‌ः । कथयन्तश्न मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च निरन्तर मुझमें मन लगानेवाले और मुझमें ही प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन मेरी भक्तिकी चर्चाके द्वारा आपसमें मेरे प्रभावको जनाते हुए तथा गुण और प्रभावसहित मेरा कथन करते हुए हीः* निरन्तर सतुष्ट होते हैं? और मुझ वासुदेवमें ही निरन्तर रमण करते हैं:

أولئك العابدون الذين استغرقت عقولهم فيّ، والذين قدّموا أنفاس حياتهم لي، يُنير بعضُهم بعضًا بذكرِي. يروونني على الدوام—صفاتي وعظمتي—فيبقون راضين أبدًا، ويجدون لذّتهم فيّ على الدوام.

Verse 10

सम्बन्ध-- उपर्युक्त प्रकारसे भजन करनेवाले भक्तोंके प्रति भगवान्‌ क्या करते हैं; अगले दी शलोकोंमें यह बतलाते हैं-- तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌ । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते,उन निरन्तर मेरे ध्यान आदिमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजनेवालेः भक्तोंको मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं

أمّا الذين يلازمون الاتحاد بي على الدوام—ويعبدونني بمحبة صادقة من القلب—فإني أمنحهم «يوغا الفهم» (بُدّهي-يوغا) التي بها يأتون إليّ وحدي. وفي الإطار الأخلاقي للغيتا، لا تُصوَّر النعمة الإلهية تفضّلًا اعتباطيًا، بل استجابةً لتعبّد ثابت، يهدي عقل العابد إلى التمييز القويم وإلى الملجأ الأخير في العليّ.

Verse 11

हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये उनके अन्तःकरणमें स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अन्धकारको प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपकके द्वारा नष्ट कर देता हूँ

رحمةً بهم، أنا—الساكن في أعماق كيانهم—أُبدِّد ظلمة الجهل المولودة من الأوَهام بمصباح المعرفة الحقّة المتلألئ. أخلاقيًا، تُصوِّر الآية التحوّل الداخلي نعمةً: فالإله لا يكتفي بالأمر بالفعل القويم، بل يُنير الضمير من الداخل لتغدو البصيرة والدارما ممكنتين.

Verse 12

सम्बन्ध--गीताके सातवें अध्यायके पहले शलोकमें अपने समग्ररूपका ज्ञान करानेवाले जिस विषयको युननेके लिये भगवान्‌ने अर्जुनको आज्ञा दी थी तथा दूसरे श्लोकमें जिस विज्ञानसहित ज्ञानको पूर्णतया कहनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसका वर्णन भगवान्‌ने सातवें अध्यायमें किया। उसके बाद आठवें जअध्यायमें अर्जुनके सात प्रश्नेंका उत्तर देते हुए भी भगवान्‌ने उसी विषयका स्पष्टीकरण किया: किंतु वहाँ कहनेकी शैली दूसरी रही; इसलिये नवम अध्यायके आरम्भमें पुनः विज्ञानसहित ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा करके उसी विषयको अंग- प्रत्यंगोंसाहित भलीभॉति समझाया। तदनन्तर दूसरे शब्दोंमें पुनः उसका स्पष्टीकरण करनेके लिये दसवें अध्यायके पहले शलोकमें उसी विषयको पुनः कहनेकी प्रतिज्ञा की और पाँच श्लोकोंद्वार अपनी योगशक्ति और विभूतियोंका वर्णन करके सातवें श्लोकमें उनके जाननेका फल अविचल भक्तियोगकी प्राप्ति बतलायी। फिर आठवें और नवें श्लोकोंमें भक्तियोगके द्वारा भगवान्‌के भजनमें लगे हुए भ्क्तोंक भाव और आचरणका वर्णन किया और दसवें तथा ग्यारहवेंमें उसका फल अज्ञानजनित अन्धकारका नाश और भगवान्‌की प्राप्ति करा देनेवाले बुद्धियोगकी प्राप्ति बतलाकर उस विषयका उपसंद्यार कर दिया। इसपर भगवान्‌की विभरूति और योगको तत्त्वसे जानना भगवत्प्राप्तियें परम सहायक है, यह बात समझकर अब सात श*लोकोंमें अर्जुन पहले भरगवान्‌की स्घुति करके भगवान्‌से उनकी योगशक्ति और विभूतियोंका विस्तारसहित वर्णन करनेके लिये प्रार्थना करते हैं-- अजुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्र परमं भवान्‌ | पुरुष शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्‌

قال أرجونا: أنتَ البراهمان الأعلى، والمقام الأسمى، والمطهِّر الأقصى. أنتَ الشخص الأزلي الإلهي—الإله الأول، غير المولود، الشامل لكل شيء. وفي خضمّ الحرب ينتقل أرجونا من الشك إلى الاعتراف المهيب: إن الطريق الأخلاقي إلى الأمام يتوقف على معرفة الرب لا كحليفٍ فحسب، بل كمصدرٍ متعالٍ ومقدِّسٍ لكل الواقع.

Verse 13

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वताः

شفقةً عليهم وحدهم، أنا—القائم في كيانهم—أُزيل ظلمة الجهل بمصباح المعرفة المتلألئ. وفي إطار هذا التعليم يتأكد أن الهداية الحقّة ليست قسرًا بل إنارةً باطنية: فالرحمة تتجلى في رفع الوهم، فتُمكِّن التمييز السديد والعمل وفق الدارما حتى تحت ضغط الحرب.

Verse 14

३३) अर्थात्‌ एक बार भी "मैं तेरा हूँ” यों कहकर मेरी शरणमें आये हुए और मुझसे अभय चाहनेवालेको मैं सभी भूतोंसे अभय कर देता हूँ, यह मेरा व्रत है।। इसीलिये भगवान्‌ने अपनेको “शरण” कहा है। ३३. भगवान्‌ समस्त प्राणियोंके बिना ही कारण उपकार करनेवाले परम हितैषी और सबके साथ अतिशय प्रेम करनेवाले परम बन्धु हैं, इसलिये उन्होंने अपनेको 'सुहृत्‌' कहा है। १४. जिसका कभी नाश न हो, उसे “अव्यय” कहते हैं। भगवान्‌ समस्त चराचर भूतप्राणियोंके अविनाशी कारण हैं। सबकी उत्पत्ति उन्हींसे होती है, वे ही सबके परम आधार हैं। इसीसे उनको “अव्यय बीज” कहा है। गीताके सातवें अध्यायके दसवें श्लोकमें उन्‍्हींको 'सनातन बीज” और दसवें अध्यायके उनतालीसवें श्लोकमें (सब भूतोंका बीज' बतलाया गया है। ३. भगवान्‌ ही ईश्वरोंके महान्‌ ईश्वर, देवताओंके परम दैवत, पतियोंके परम पति, समस्त भुवनोंके स्वामी और परम पूज्य परमदेव हैं (श्वेताश्बतर उप० ६।॥७)। २. जिसमें कोई वस्तु बहुत दिनोंके लिये रखी जाती हो, उसे “निधान' कहते हैं। महाप्रलयमें समस्त प्राणियोंके सहित अव्यक्त प्रकृति भगवानके ही किसी एक अंशमें धरोहरकी भाँति बहुत समयतक अक्रिय-अवस्थामें स्थित रहती है, इसलिये भगवानने अपनेको “निधान” कहा है। ३. इस श्लोकमें जितने भी शब्द आये हैं, सब-के-सब भगवान्‌के विशेषण हैं; अतः इस श्लोकमें पूर्वश्लोकोंकी भाँति “अहम्‌' पदका प्रयोग नहीं किया गया। ४. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि अपनी किरणोंद्वारा समस्त जगत्‌को उष्णता और प्रकाश प्रदान करनेवाला तथा समुद्र आदि स्थानोंसे जलको उठाकर रोक रखनेवाला तथा उसे लोकहितार्थ मेघोंके द्वारा यथासमय यथायोग्य वितरण करनेवाला सूर्य भी मेरा ही स्वरूप है। ५, वास्तवमें अमृत तो एक भगवान्‌ ही हैं, जिनकी प्राप्ति हो जानेपर मनुष्य सदाके लिये मृत्युके पाशसे मुक्त हो जाता है, इसीलिये भगवानने अपनेको “अमृत” कहा है और इसलिये मुक्तिको भी “अमृत” कहते हैं। ६. सबका नाश करनेवाले “काल” को '"मृत्यु” कहते हैं। भगवान्‌ ही यथासमय लोकोंका संहार करनेके लिये महाकालरूप धारण किये रहते हैं। वे कालके भी काल हैं। इसीलिये भगवानने “मृत्यु” को अपना स्वरूप बतलाया है। ७. जिसका कभी अभाव नहीं होता, उस अविनाशी आत्माको 'सत्‌” कहते हैं और नाशवान्‌ अनित्य वस्तुमात्रका नाम “असत' है। इन्हीं दोनोंको गीताके पंद्रहवें अध्यायमें “अक्षर” और “क्षर' पुरुषके नामसे कहा गया है। ये दोनों ही भगवानसे अभिन्न हैं, इसलिये भगवानने सत्‌ और असतको अपना स्वरूप कहा है। ८. ऋक्‌, यजु: और साम--इन तीनों वेदोंको “वेदत्रयी” अथवा त्रिविद्या कहते हैं। इन तीनों वेदोंमें वर्णित नाना प्रकारके यज्ञोंकी विधि और उनके फलनें श्रद्धा-प्रेम रखनेवाले एवं उसके अनुसार सकामकर्म करनेवाले मनुष्योंको “त्रैविद्य” कहते हैं। यज्ञोमें सोमलताके रसपानकी जो विधि बतलायी गयी है, उस विधिसे सोमलताके रसपान करनेवालोंको 'सोमपा' कहते हैं। उपर्युक्त वेदोक्त कर्मोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान करनेसे जिनके स्वर्गप्राप्तिमें प्रतिबनधकरूप पाप नष्ट हो गये हैं, उनको “पूतपापा' कहते हैं। ये तीनों विशेषण ऐसी श्रेणीके मनुष्योंके लिये हैं, जो भगवान्‌की सर्वरूपतासे अनभिज्ञ हैं और वेदोक्त कर्मकाण्डपर प्रेम और श्रद्धा रखकर पापकर्मोंसे बचते हुए सकामभावसे यज्ञादि कर्मोंका विधिपूर्वक अनुष्ठान किया करते हैं। ९, यज्ञादि पुण्यकर्मोंके फलरूपमें प्राप्त होनेवाले इन्द्रलोकसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त जितने भी लोक हैं, उन सबको लक्ष्य करके श्लोकमें 'पुण्यम” विशेषणके सहित '“सुरेन्द्रलोकम्‌” पदका प्रयोग किया गया है। अतः 'सुरेन्द्रलोकम” पद इन्द्रलोकका वाचक होते हुए भी उसे उपर्युक्त सभी लोकोंका वाचक समझना चाहिये। ३. स्वर्गादि लोकोंके विस्तारका, वहाँकी भोग्य-वस्तुओंका, भोगप्रकारोंका, भोग्य-वस्तुओंकी सुखरूपताका और भोगनेयोग्य शारीरिक तथा मानसिक शक्ति और परमायु आदि सभीका अनेक प्रकारका परिमाण मृत्युलोककी अपेक्षा कहीं विशद और महान्‌ है। इसीलिये उसको “विशाल” कहा गया है। २. भगवानके स्वरूपतत्त्वको न जाननेवाले सकाम मनुष्य अनन्यचित्तसे भगवानकी शरण ग्रहण नहीं करते, भोगकामनाके वशमें होकर उपर्युक्त धर्मका आश्रय लेते हैं। इसी कारण उनके कर्मोंका फल अनित्य है और इसीलियोे उन्हें फिर मर्त्यलोकमें लौटना पड़ता है। ३. जिनका संसारके समस्त भोगोंसे प्रेम हटकर केवलमात्र भगवानमें ही अटल और अचल प्रेम हो गया है, भगवान्‌का वियोग जिनके लिये असहा है, जिनका भगवानूसे भिन्न दूसरा कोई भी उपास्यदेव नहीं है और जो भगवान्‌को ही परम आश्रय, परम गति और परम प्रेमास्पद मानते हैं--ऐसे अनन्यप्रेमी एकनिष्ठ भक्तोंका विशेषण “अनन्या:” पद है। ४. सगुण भगवान्‌ पुरुषोत्तमके गुण, प्रभाव, तत्व और रहस्यको समझकर, चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते और एकान्तमें साधन करते, सब समय निरन्तर अविच्छिन्नरूपसे उनका चिन्तन करते हुए, उन्हींके आज्ञानुसार निष्कामभावसे उन्हींकी प्रसन्नताके लिये चेष्टा करते रहना--यही “उनका चिन्तन करते हुए भजन करना है। ५. अप्राप्तकी प्राप्तिका नाम “योग” और प्राप्तकी रक्षाका नाम “क्षेम” है। अतः भगवानकी प्राप्तिके लिये जो साधन उन्हें प्राप्त है, सब प्रकारकी विघ्न-बाधाओंसे बचाकर उसकी रक्षा करना और जिस साधनकी कमी है, उसकी पूर्ति करके स्वयं अपनी प्राप्ति करा देना--यही “उन प्रेमी भक्तोंका योगक्षेम चलाना” है। भक्त प्रह्नादका जीवन इसका सुन्दर उदाहरण है। हिरण्यकशिपुद्वारा उसके साधनमें बड़े-बड़े विघध्न उपस्थित किये जानेपर भी सब प्रकारसे भगवानने उसकी रक्षा करके अन्तमें उसे अपनी प्राप्ति करवा दी। जो पुरुष भगवान्‌के ही परायण होकर अनन्यचित्तसे उनका प्रेमपूर्वक निरन्तर चिन्तन करते हुए ही सब कार्य करते हैं, अन्य किसी भी विषयकी कामना, अपेक्षा और चिन्ता नहीं करते, उनके जीवननिर्वाहका सारा भार भी भगवानपर रहता है। अतः वे सर्वशक्तिमान्‌, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, परमसुहृद्‌ भगवान्‌ ही अपने भक्तका लौकिक और पारमार्थिक सब प्रकारका योगक्षेम चलाते हैं। ६. वेद-शास्त्रोंमें वर्णित देवता, उनकी उपासना और स्वर्गादिकी प्राप्तिरूप उसके फलपर जिनका आदरपूर्वक दृढ़ विश्वास हो, उनको यहाँ *श्रद्धासे युक्त” कहा गया है और इस विशेषणका प्रयोग करके यह भाव दिखलाया गया है कि जो बिना श्रद्धाके दम्भपूर्वक यज्ञादि कर्मोंद्वारा देवताओंका पूजन करते हैं, वे इस श्रेणीमें नहीं आ सकते; उनकी गणना तो आसुरी प्रकृतिके मनुष्योंमें है। ७. जिस कामनाकी सिद्धिके लिये जिस देवताकी पूजाका शास्त्रमें विधान है, उस देवताकी शास्त्रोक्त यज्ञादि कर्मोद्वारा श्रद्धापूर्वक पूजा करना “दूसरे देवताओंकी पूजा करना” है। समस्त देवता भी भगवान्‌के ही अंगभूत हैं, भगवान्‌ ही सबके स्वामी हैं और वस्तुतः: भगवान्‌ ही उनके रूपमें प्रकट हैं--इस तत्त्वको न जानकर उन देवताओंको भगवानसे भिन्न समझकर सकामभावसे जो उनकी पूजा करना है, यही भगवानकी “अविधिपूर्वक' पूजा है। ३. यह सारा विश्व भगवानका ही विराट्रूप होनेके कारण भिन्न-भिन्न यज्ञ-पूजादि कर्मोंके भोक्तारूपमें माने जानेवाले जितने भी देवता हैं, सब भगवानके ही अंग हैं तथा भगवान्‌ ही उन सबके आत्मा हैं (गीता १०।२०)। अतः उन देवताओंके रूपमें भगवान्‌ ही समस्त यज्ञादि कर्मोके भोक्ता हैं। भगवान्‌ ही अपनी योगशक्तिके द्वारा सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करते हुए सबको यथायोग्य नियममें चलाते हैं; वे ही इन्द्र, वरुण, यमराज, प्रजापति आदि जितने भी लोकपाल और देवतागण हैं--उन सबके नियन्ता हैं; इसलिये वही सबके प्रभु अर्थात्‌ महेश्वर हैं (गीता ५।२९)। २. देवताओंकी पूजा करना, उनकी पूजाके लिये बतलाये हुए नियमोंका पालन करना, उनके निमित्त यज्ञादिका अनुष्ठान करना, उनके मन्त्रका जप करना और उनके निमित्त ब्राह्मण-भोजन कराना--इत्यादि सभी बातें “देवताओंके व्रत” हैं। इनका पालन करनेवाले मनुष्योंको अपनी उपासनाके फलस्वरूप जो उन देवताओंके लोकोंकी, उनके सदृश भोगोंकी अथवा उनके-जैसे रूपकी प्राप्ति होती है, वही देवोंको प्राप्त होना है। पितरोंके लिये यथाविधि श्राद्ध-तर्पण करना, उनके निमित्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना, हवन करना, जप करना, पाठ-पूजा करना तथा उनके लिये शास्त्रमें बतलाये हुए व्रत और नियमोंका भलीभाँति पालन करना आदि पितरोंके व्रत' हैं और जो मनुष्य सकामभावसे इन व्रतोंका पालन करते हैं, वे मरनेके बाद पितृलोकमें जाते हैं और वहाँ जाकर उन पितरोंके-जैसे स्वरूपको प्राप्त करके उनके-जैसे भोग भोगते हैं। यही पितरोंको प्राप्त होना है। ये भी अधिक-से-अधिक देवताओं या दिव्य पितरोंकी आयुपर्यन्त ही वहाँ रह सकते हैं। अन्तमें इनका भी पुनरागमन होता है। यहाँ देव और पितरोंकी पूजाका निषेध नहीं समझना चाहिये। देव-पितृ-पूजा तो यथाविधि अपने-अपने वर्णाश्रमके अधिकारानुसार सबको अवश्य ही करनी चाहिये; परंतु वह पूजा यदि सकामभावसे होती है तो अपना अधिक-से-अधिक फल देकर नष्ट हो जाती है और यदि कर्तव्यबुद्धिसे भगवत्‌ आज्ञा मानकर या भगवत्‌-पूजा समझकर की जाती है तो वह भगवत्प्राप्तिरूप महान्‌ फलमें कारण होती है। इसलिये यहाँ समझना चाहिये कि देव-पितृकर्म तो अवश्य ही करें; परंतु उनमें निष्कामभाव लानेका प्रयत्न करें। ३. जो प्रेत और भूतगणोंकी पूजा करते हैं, उनकी पूजाके नियमोंका पालन करते हैं, उनके लिये हवन या दान आदि करते हैं, ऐसे मनुष्योंका जो उन-उन भूत-प्रेतादिके समान रूप, भोग आदिको प्राप्त होना है, वही उनको प्राप्त होना है। भूत-प्रेतोंकी पूजा तामसी है तथा अनिष्ट फल देनेवाली है, इसलिये उसको नहीं करना चाहिये। ४. जो पुरुष भगवानके सगुण-निराकार अथवा साकार--किसी भी रूपका सेवन-पूजन और भजन-ध्यान आदि करते हैं, समस्त कर्म उनके अर्पण करते हैं, उनके नामका जप करते हैं, गुणानुवाद सुनते और गाते हैं तथा इसी प्रकार भगवद्धक्तिविषयक अनेक प्रकारके साधन करते हैं, वे भगवान्‌का पूजन करनेवाले भक्त हैं और उनका भगवानके दिव्य लोकमें जाना, भगवानके समीप रहना, उनके-जैसे ही दिव्य रूपको प्राप्त होना अथवा उनमें लीन हो जाना-यही भगवानको प्राप्त होना है। $. पत्र, पुष्प आदि कोई भी वस्तु जो प्रेमपूर्वक समर्पण की जाती है, उसे “भक्त्युपह्वत” कहते हैं। इसके प्रयोगसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि बिना प्रेमके दी हुई वस्तुको मैं स्वीकार नहीं करता और जहाँ प्रेम होता है तथा जिसको मुझे वस्तु अर्पण करनेमें और मेरे द्वारा उसके स्वीकार हो जानेमें सच्चा आनन्द होता है, वहाँ उस भक्तके द्वारा अर्पण की हुई वस्तु बहुत प्रेमसे स्वीकार कर लेता हूँ। २. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि इस प्रकार शुद्धभावसे प्रेमपूर्वक समर्पण की हुई वस्तुओंको मैं स्वयं उस भक्तके सम्मुख प्रत्यक्ष प्रकट होकर खा लेता हूँ अर्थात्‌ जब मनुष्यादिके रूपमें अवतीर्ण होकर संसारमें विचरता हूँ, तब तो उस रूपमें वहाँ पहुँचकर और अन्य समयमें उस भक्तके इच्छानुसार रूपमें प्रकट होकर उसकी दी हुई वस्तुका भोग लगाकर उसे कृतार्थ कर देता हूँ। 3. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि किसी भी वर्ण, आश्रम और जातिका कोई भी मनुष्य पत्र, पुष्प, फल, जल आदि मेरे अर्पण कर सकता है। बल, रूप, धन, आयु, जाति, गुण और विद्या आदिके कारण मेरी किसीमें भेदबुद्धि नहीं है; अवश्य ही अर्पण करनेवालेका भाव विदुर और शबरी आदिकी भाँति सर्वथा शुद्ध और प्रेमपूर्ण होना चाहिये। ४. यहाँ पत्र, पुष्प, फल और झलका नाम लेकर यह भाव दिखलाया गया है कि जो वस्तु साधारण मनुष्योंकों बिना किसी परिश्रम, हिंसा और व्ययके अनायास मिल सकती है--ऐसी कोई भी वस्तु भगवानके अर्पण की जा सकती है। भगवान्‌ पूर्णकाम होनेके कारण वस्तुके भूखे नहीं हैं, उनको तो केवल प्रेमकी ही आवश्यकता है। “मुझ-जैसे साधारण-से- साधारण मनुष्यद्वारा अर्पण की हुई छोटी-से-छोटी वस्तु भी भगवान्‌ सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं, यह उनकी कैसी महत्ता है!” इस भावसे भावित होकर प्रेमविह्नललचित्तसे किसी भी वस्तुको भगवान्‌के समर्पण करना, उसे भक्तिपूर्वक भगवान्‌के अर्पण करना है। ५. जिसका अन्त:करण शुद्ध हो, उसे 'शुद्धबुद्धि' कहते हैं। इसका प्रयोग करके भगवानने यह भाव दिखलाया है कि यदि अर्पण करनेवालेका भाव शुद्ध न हो तो बाहरसे चाहे जितने शिष्टाचारके साथ, चाहे जितनी उत्तम-से-उत्तम सामग्री मुझे अर्पण की जाय, मैं उसे कभी स्वीकार नहीं करता। मैंने दुर्योधनका निमन्त्रण अस्वीकार करके भाव शुद्ध होनेके कारण विदुरके घरपर जाकर प्रेमपूर्वक भोजन किया, सुदामाके चिउरोंका बड़ी रुचिके साथ भोग लगाया, द्रौपदीकी बटलोईमें बचे हुए “पत्ते” को खाकर विश्वको तृप्त कर दिया, गजेन्द्रद्वारा अर्पण किये हुए “पुष्प” को स्वयं वहाँ पहुँचकर स्वीकार किया, शबरीकी कुटियापर जाकर उसके दिये हुए “फलों"-का भोग लगाया और रन्तिदेवके जल” को स्वीकार करके उसे कृतार्थ किया। इसी प्रकार प्रत्येक भक्तकी प्रेमपूर्वक अर्पण की हुई वस्तुको मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ। ६. इससे भगवानने सब प्रकारके कर्तव्यकर्मोंका समाहार किया है। अभिप्राय यह है कि यज्ञ, दान और तपके अतिरिक्त जीविकानिर्वाह आदिके लिये किये जानेवाले वर्ण, आश्रम और लोकव्यवहारके कर्म तथा भगवान्‌का भजन, ध्यान आदि जितने भी शास्त्रीय कर्म हैं, उन सबका समावेश “यत्करोषि' में, शरीर-पालनके निमित्त किये जानेवाले खान पान आदि कर्मोंका “यदश्नासि” में, पूजन और हवनसम्बन्धी समस्त कर्मोंका “यज्जुहोषि' में, सेवा और दानसम्बन्धी समस्त कर्मोंका 'यद्ददासि” में और संयम तथा तपसम्बन्धी समस्त कर्मोका समावेश “यत्तपस्यसि” में किया गया है (गीता १७|१४--१७)। ७. साधारण मनुष्यकी उन कर्मोमें ममता और आसक्ति होती है तथा वह उनमें फलकी कामना रखता है। अतएव समस्त कर्मोंमें ममता, आसक्ति और फलकी इच्छाका त्याग कर देना और यह समझना कि समस्त जगत्‌ भगवान्‌का है मेरे मन, बुद्धि, शरीर तथा इन्द्रिय भी भगवानके हैं और मैं स्वयं भी भगवानका हूँ, इसलिये मेरे द्वारा जो कुछ भी यज्ञादि कर्म किये जाते हैं, वे सब भगवानके ही हैं। कठपुतलीको नचानेवाले सूत्रधारकी भाँति भगवान्‌ ही मुझसे यह सब कुछ करवा रहे हैं। मैं तो केवल निमित्तमात्र हँ--ऐसा समझकर जो भगवान्‌के आज्ञानुसार भगवानकी ही प्रसन्नताके लिये निष्कामभावसे उपर्युक्त कर्मोंका करना है, यही उन कर्मोंको भगवान्‌के अर्पण करना है। पहले किसी दूसरे उद्देश्यसे किये हुए कर्मोंको पीछेसे भगवान्‌को अर्पण करना, कर्म करते-करते बीचमें ही भगवानके अर्पण कर देना, कर्म समाप्त होनेके साथ-साथ भगवान्‌के अर्पण कर देना अथवा कर्मोंका फल ही भगवानके अर्पण करना--इस प्रकारका अर्पण करना भी भगवानके ही अर्पण करना है। पहले इसी प्रकार होता है। ऐसा करते-करते ही उपर्युक्त प्रकारसे पूर्णतया भगवदर्पण होता है। ३. यहाँ 'संन्यासयोग” पद सांख्ययोग अर्थात्‌ ज्ञानयोगका वाचक नहीं है, किंतु पूर्वश्लोकके अनुसार समस्त कर्मोंको भगवानके अर्पण कर देना ही यहाँ 'संन्यासयोग” है। इसलिये ऐसे संन्यासयोगसे जिसकी आत्मा युक्त हो, जिसके मन और बुद्धिमें पूर्वश्लोकके कथनानुसार समस्त कर्म भगवानके अर्पण करनेका भाव सुदृढ़ हो गया हो, उसे 'संन्यासयोगयुक्तात्मा' समझना चाहिये। २. भिन्न-भिन्न शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार स्वर्ग, नरक और पशु, पक्षी एवं मनुष्यादि लोकोंके अंदर नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेना तथा सुख-दुःखोंका भोग करना--यही शुभाशुभ फल है, इसीको कर्मबन्धन कहते हैं; क्योंकि कर्मोंका फल भोगना ही कर्मबन्धनमें पड़ना है। उपर्युक्त प्रकारसे समस्त कर्म भगवानके अर्पण कर देनेवाला मनुष्य कर्मफलरूप पुनर्जन्मसे और सुख-दु:खोंके भोगसे मुक्त हो जाता है, यही शुभाशुभ फलरूप कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाना है। मरनेके बाद भगवानके परमधाममें पहुँच जाना या इसी जन्ममें भगवान्‌को प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेना ही उस कर्मबन्धनसे मुक्त होकर भगवानको प्राप्त होना है। ३. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मैं ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे समानभावसे व्याप्त हूँ। अतएव मेरा सबमें समभाव है, किसीमें भी मेरा राग-द्वेष नहीं है। इसलिये वास्तवमें मेरा कोई भी अप्रिय या प्रिय नहीं है। ४. भगवान्‌के साकार या निराकार-किसी भी रूपका श्रद्धा और प्रेमपूर्वक निरन्तर चिन्तन करना; उनके नाम, गुण, प्रभाव, महिमा और लीला-चरित्रोंका श्रवण, मनन और कीर्तन करना; उनको नमस्कार करना, पत्र, पुष्प आदि यशथेष्ट सामग्रियोंके द्वारा उनकी प्रेमपूर्वक पूजा करना और अपने समस्त कर्म उनके समर्पण करना आदि सभी क्रियाओंका नाम भक्तिपूर्वक भगवान्‌को भजना है। जो पुरुष इस प्रकार भगवान्‌को भजते हैं, भगवान्‌ भी उनको वैसे ही भजते हैं। वे जैसे भगवान्‌को नहीं भूलते, वैसे ही भगवान्‌ भी उनको नहीं भूल सकते--यही भाव दिखलानेके लिये भगवान्‌ने उनको अपनेमें बतलाया है और उन भक्तोंका विशुद्ध अन्तःकरण भगवत्प्रेमसे परिपूर्ण हो जाता है, इससे उनके हृदयमें भगवान्‌ सदा-सर्वदा प्रत्यक्ष दीखने लगते हैं--यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने अपनेको उनमें बतलाया है। जैसे समभावसे सब जगह प्रकाश देनेवाला सूर्य दर्पण आदि स्वच्छ पदार्थोंमें प्रतिबिम्बित होता है, काष्ठादिमें नहीं होता, तथापि उसमें विषमता नहीं है, वैसे ही भगवान्‌ भी भक्तोंको मिलते हैं, दूसरोंको नहीं मिलते--इसमें उनकी विषमता नहीं है, यह तो भक्तिकी ही महिमा है। १. 'अपि' देनेका अभिप्राय यह है कि सदाचारी और साधारण पापियोंका मेरा भजन करनेसे उद्धार हो जाय--इसमें तो कहना ही क्‍या है, भजनसे अतिशय दुराचारीका भी उद्धार हो सकता है। २. 'चेत्‌” अव्यय “यदि” के अर्थमें है। इसका प्रयोग करके भगवानने यह भाव दिखलाया है कि प्राय: दुराचारी मनुष्योंकी विषयोंमें और पापोंमें आसक्ति रहनेके कारण वे मुझमें प्रेम करके मेरा भजन नहीं करते, तथापि किसी पूर्व शुभ संस्कारकी जागृति, भगवद्धावमय वातावरण, शास्त्रके अध्ययन और महात्मा पुरुषोंके सत्संगसे एवं मेरे गुण, प्रभाव, महत्त्व और रहस्यका श्रवण करनेसे यदि कदाचित्‌ दुराचारी मनुष्यकी मुझमें श्रद्धा-भक्ति हो जाय और वह मेरा भजन करने लगे तो उसका भी उद्धार हो जाता है। 3. जिनके आचरण अत्यन्त दूषित हों, खान-पान और चाल-चलन भ्रष्ट हों, अपने स्वभाव, आसक्ति और बुरी आदतसे विवश होनेके कारण जो दुराचारोंका त्याग न कर सकते हों, ऐसे मनुष्योंको अतिशय दुराचारी समझना चाहिये। ऐसे मनुष्योंका जो भगवान्‌के गुण, प्रभाव आदिके सुनने और पढ़नेसे या अन्य किसी कारणसे भगवान्‌को सर्वोतम समझ लेना और एकमात्र भगवान्‌का ही आश्रय लेकर अतिशय श्रद्धा-प्रेमपूर्वक उनन्‍्हींको अपना इष्टदेव मान लेना है--यही उनका “अनन्यभाक्‌' होना है। इस प्रकार भगवान्‌का भक्त बनकर जो उनके स्वरूपका चिन्तन करना, नाम, गुण, महिमा और प्रभावका श्रवण, मनन और कीर्तन करना, उनको नमस्कार करना, पत्र-पुष्प आदि यशथेष्ट वस्तु उनके अर्पण करके उनका पूजन करना तथा अपने किये हुए शुभ कर्मोंको भगवानके समर्पण करना है--यही अनन्यभाक्‌ होकर भगवान्‌का भजन करना है। ४. जिसने यह दृढ़ निश्चय कर लिया है कि “भगवान्‌ पतितपावन, सबके सुहृद, सर्वशक्तिमान, परम दयालु, सर्वज्ञ, सबके स्वामी और सर्वोतम हैं एवं उनका भजन करना ही मनुष्य-जीवनका परम कर्तव्य है; इससे समस्त पापों और पाप- वासनाओंका समूल नाश होकर भगवत्कृपासे मुझको अपने-आप ही भगवत्प्राप्ति हो जायगी।“--यह बहुत ही उत्तम और यथार्थ निश्चय है। भगवान्‌ कहते हैं कि जिसका ऐसा निश्चय है, वह मेरा भक्त है और मेरी भक्तिके प्रतापसे वह शीघ्र ही पूर्ण धर्मात्मा हो जायगा। अतएव उसे पापी या दुष्ट न मानकर साधु ही मानना उचित है। ५. इसी जन्ममें बहुत ही शीघ्र सब प्रकारके दुर्गुण और दुराचारोंसे रहित होकर गीताके सोलहवें अध्यायके पहले, दूसरे और तीसरे श्लोकोंमें वर्णित दैवी सम्पदासे युक्त हो जाना अर्थात्‌ भगवान्‌की प्राप्तिका पात्र बन जाना ही शीघ्र धर्मात्मा बन जाना है और जो सदा रहनेवाली शान्ति है, जिसकी एक बार प्राप्ति हो जानेपर फिर कभी अभाव नहीं होता, जिसे नैष्ठिकी शान्ति (गीता ५१२), निर्वाणपरमा शान्ति (गीता ६१५) और परमा शान्ति (गीता १८।६२) कहते हैं, परमेश्वरकी प्राप्तिरूप उस शान्तिको प्राप्त हो जाना ही “सदा रहनेवाली परम शान्ति' को प्राप्त होना है। ६. इसके प्रयोगसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि “अर्जुन! मैंने जो तुम्हें अपनी भक्तिका और भक्तका यह महत्त्व बतलाया है, उसमें तुम्हें किंचिन्मात्र भी संशय न रखकर उसे सर्वथा सत्य समझना और दृढ़तापूर्वक धारण कर लेना चाहिये।' ७. यहाँ भगवानके कहनेका यह अभिप्राय है कि मेरे भक्तका क्रमशः उत्थान ही होता रहता है, पतन नहीं होता। अर्थात्‌ वह न तो अपनी स्थितिसे कभी गिरता है और न उसको नीच योनि या नरकादिकी प्राप्तिरूप दुर्गतिकी प्राप्ति होती है; वह पूर्व कथनके अनुसार क्रमश: दुर्गुण-दुराचारोंसे सर्वधा रहित होकर शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है। ३. यहाँ “अपि' का दो बार प्रयोग करके भगवानने ऊँची-नीची जातिके कारण होनेवाली विषमताका अपनेमें सर्वथा अभाव दिखलाया है। भगवानके कथनका यहाँ यह अभिप्राय प्रतीत होता है कि ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी अपेक्षा हीन समझे जानेवाले स्त्री, वैश्य और शूद्र एवं उनसे भी हीन समझे जानेवाले चाण्डाल आदि कोई भी हों, मेरी उनमें भेदबुद्धि नहीं है। मेरी शरण होकर जो कोई भी मुझको भजते हैं, उन्‍्हींको परम गति मिल जाती है। २. पूर्वजन्मोंके पापोंके कारण चाण्डालादि योनियोंमें उत्पन्न प्राणियोंको “पापयोनि” माना गया है। इनके सिवा शास्त्रोंके अनुसार हूण, भील, खस, यवन आदि म्लेच्छ-जातिके मनुष्य भी “पापयोनि' ही माने जाते हैं। यहाँ 'पापयोनि' शब्द इन्हीं सबका वाचक है। भगवान्‌की भक्तिके लिये किसी जाति या वर्णके लिये कोई रुकावट नहीं है। वहाँ तो शुद्ध प्रेमकी आवश्यकता है। श्रीमद्भागवतमें भी कहा है-- भव्त्याहमेकया ग्राह: श्रद्धया55त्मा प्रियः सताम्‌ । भक्ति: पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्‌ ॥। (११

قال أرجونا: (في هذا المقطع يؤطّر صوت أرجونا تعليماً يركّز على الاحتماء بالإله بوصفه الأساس اليقين لعدم الخوف وللثبات الأخلاقي. ويشرح السياق أن من يلتمس الحماية بصدق يُمنَح الأمان، وأن الرب هو المصدر غير الفاني والسند لجميع الكائنات—ولذلك يُوصَف بـ«البذرة التي لا تبلى» وبـ«الخزانة» التي يستقر فيها العالم عند الانحلال. والخلاصة الأخلاقية: إن التعبّد والتسليم، لا مجرد الطقس أو المنزلة، هما ما يقودان إلى سلام دائم وتحرّر.)

Verse 18

अपने-आप बछ। अर 3. संसारमें और शास्त्रोंमें जितने भी गुप्त रखनेयोग्य रहस्यके विषय माने गये हैं, उन सबमें समग्ररूप भगवान्‌ पुरुषोत्तमके तत्त्व, प्रेम, गुण, प्रभाव, विभूति और महत्त्व आदिके साथ उनकी शरणागतिका स्वरूप सबसे बढ़कर गुप्त रखनेयोग्य है, यही भाव दिखलानेके लिये इसे “गुह्तम” कहा गया है। ४. गुणवानोंके गुणोंको न मानना, गुणोंमें दोष देखना, उनकी निन्‍्दा करना एवं उनपर मिथ्या दोषोंका आरोपण करना 'असूया' है। जिसमें स्वभावसे ही यह “असूया' दोष बिलकुल ही नहीं होता, उसे “अनसूयु” कहते हैं। ३. इस श्लोकमें “अशुभ” शब्द समस्त दु:खोंका, उनके हेतुभूत कर्मोंका, दुर्गुणोंका, जन्म-मरणरूप संसार-बन्धनका और इन सबके कारणरूप अज्ञानका वाचक है। इन सबसे सदाके लिये सम्पूर्णतया छूट जाना और परमानन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त हो जाना ही “अशुभसे मुक्त' होना है। २. संसारमें जितनी भी ज्ञात और अज्ञात विद्याएँ हैं, यह उन सबमें बढ़कर है; जिसने इस विद्याका यथार्थ अनुभव कर लिया है उसके लिये फिर कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता। इसलिये इसे “राजविद्या” कहा गया है। ३. इसमें भगवान्‌के सगुण-निर्गुण और साकार-निराकार स्वरूपके तत्त्वका, उनके गुण, प्रभाव और महत्त्वका, उनकी उपासना-विधिका और उसके फलका भलीभाँति निर्देश किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें भगवानने अपना समस्त रहस्य खोलकर यह तत्त्व समझा दिया है कि मैं जो श्रीकृष्णरूपमें तुम्हारे सामने विराजित हूँ, इस समस्त जगत्‌का कर्ता, हर्ता, सबका आधार, सर्वशक्तिमान्‌, परब्रह्म परमेश्वर और साक्षात्‌ पुरुषोत्तम हूँ। तुम सब प्रकारसे मेरी शरण आ जाओ। इस प्रकारके परम गोपनीय रहस्यकी बात अर्जुन-जैसे दोषदृष्टिहीन परम श्रद्धावान्‌ भक्तके सामने ही कही जा सकती है, हरेकके सामने नहीं। इसीलिये इसे “राजगुह्' बतलाया गया है। ४. यह उपदेश इतना पावन करनेवाला है कि जो कोई भी इसका श्रद्धापूर्वक श्रवण-मनन और इसके अनुसार आचरण करता है, यह उसके समस्त पापों और अवगुणोंका समूल नाश करके उसे सदाके लिये परम विशुद्ध बना देता है। इसीलिये इसे “पवित्र' कहा गया है। ५, विज्ञानसहित इस ज्ञानका फल श्राद्धादि कर्मोंकी भाँति अदृष्ट नहीं है। साधक ज्यों-ज्यों इसकी ओर आगे बढ़ता है, त्यों-ही-त्यों उसके दुर्गुणों, दुराचारों और दु:ःखोंका नाश होकर, उसे परम शान्ति और परम सुखका प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है; जिसको इसकी पूर्णरूपसे उपलब्धि हो जाती है, वह तो तुरंत ही परम सुख और परम शान्तिके समुद्र, परम प्रेमी, परम दयालु और सबके सुहृद, साक्षात्‌ भगवान्‌को ही प्राप्त हो जाता है। इसीलिये यह 'प्रत्यक्षावगम” है। ६. जैसे सकामकर्म अपना फल देकर समाप्त हो जाता है और जैसे सांसारिक विद्या एक बार पढ़ लेनेके बाद, यदि उसका बार-बार अभ्यास न किया जाय तो नष्ट हो जाती है--भगवान्‌का यह ज्ञान-विज्ञान वैसे नष्ट नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त इसका फल भी अविनाशी है; इसलिये इसे “अव्यय' कहा गया है। ७. इसमें न तो किसी प्रकारके बाहरी आयोजनकी आवश्यकता है और न कोई आयास ही करना पड़ता है। सिद्ध होनेके बादकी बात तो दूर रही, साधनके आरम्भसे ही इसमें साधकोंको शान्ति और सुखका अनुभव होने लगता है। इसलिये इसे साधन करनेमें बड़ा सुगम बतलाया है। ८. पिछले श्लोकमें जिस विज्ञानसहित ज्ञानका माहात्म्य बतलाया गया है और इसके आगे पूरे अध्यायमें जिसका वर्णन है, उसीका वाचक यहाँ “अस्य” विशेषणके सहित *धर्मस्य” पद है। इस प्रसंगमें वर्णन किये हुए भगवान्‌के स्वरूप, प्रभाव, गुण और महत्त्वको, उनकी प्राप्तिके उपायको और उसके फलको सत्य न मानकर उसमें असम्भावना और विपरीत भावना करना और उसे केवल रोचक उक्ति समझना आदि जो विश्वासविरोधिनी भावनाएँ हैं--ये जिनमें हों, वे ही श्रद्धारहित पुरुष हैं। ३. गीताके आठवें अध्यायके चौथे श्लोकमें जिसे “अधियज्ञ', आठवें और दसवें श्लोकोंमें “परम दिव्यपुरुष', नवें श्लोकमें “कवि” “पुराण” आदि, बीसवें और इक्कीसवें श्लोकोंमें “अव्यक्त अक्षर” और बाईसवें श्लोकमें भक्तिद्वारा प्राप्त होनेयोग्य “परम पुरुष” बतलाया है, उसी सर्वव्यापी सगुण-निराकार स्वरूपके लक्ष्यसे यहाँ “अव्यक्तमूर्तिना' पदका प्रयोग हुआ है। २, “यह सब जगत' से यहाँ सम्पूर्ण जड-चेतन पदार्थोंके सहित समस्त ब्रह्माण्ड समझना चाहिये। ३. जैसे आकाशसे वायु, तेज, जल, पृथ्वी, सुवर्णसे गहने और मिट्टीसे उसके बने हुए बर्तन व्याप्त रहते हैं, उसी प्रकार यह सारा विश्व इसकी रचना करनेवाले सगुण परमेश्वरके निराकाररूपसे व्याप्त है। श्रुति कहती है-- ईशावास्यमिद सर्व यत्किज्च जगत्यां जगत्‌ । . (ईशोपनिषद्‌ १) “इस संसारमें जो कुछ जड-चेतन पदार्थसमुदाय है, वह सब ईश्वरसे व्याप्त है।' ४. 'यहाँ सब भूत” से समस्त शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि तथा उनके विषय और वासस्थानोंके सहित समस्त चराचर प्राणियोंको कहा गया है। भगवान्‌ ही अपनी प्रकृतिको स्वीकार करके समस्त जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करते हैं; उन्होंने ही इस समस्त जगतको अपने किसी अंशमें धारण कर रखा है (गीता १०।४२) और एकमात्र वे ही सबके गति भर्ता, निवासस्थान, आश्रय, प्रभव, प्रलय, स्थान और निधान हैं (गीता ९।१८)। इस प्रकार सबकी स्थिति भगवानके अधीन है। इसीलिये सब भूतोंको भगवान्‌में स्थित बतलाया गया है। ५. बादलोंमें आकाशकी भाँति समस्त जगत्‌के अंदर अणु-अणुमें व्याप्त होनेपर भी भगवान्‌ उससे सर्वथा अतीत और सम्बन्धरहित हैं। समस्त जगत्‌का नाश होनेपर भी, बादलोंके नाश होनेपर आकाशकी भाँति, भगवान्‌ ज्यों-के-त्यों रहते हैं। जगतके नाशसे भगवानका नाश नहीं होता तथा जिस जगह इस जगत्‌की गन्ध भी नहीं है, वहाँ भी भगवान्‌ अपनी महिमामें स्थित ही हैं। यही भाव दिखलानेके लिये भगवानने यह बात कही है कि वास्तवमें मैं उन भूतोंमें स्थित नहीं हूँ। अर्थात्र मैं अपने-आपमें ही नित्य स्थित हूँ। ६. सबके उत्पादक और सबमें व्याप्त रहते हुए तथा सबका धारण-पोषण करते हुए भी सबसे सर्वथा निर्लिप्त रहनेकी जो अद्भुत प्रभावमयी शक्ति है, जो ईश्वरके अतिरिक्त अन्य किसीमें हो ही नहीं सकती, उसीका यहाँ 'ऐश्वरम, योगम्‌” इन पदोंद्वारा प्रतिपादन किया गया है। इन दो श्लोकोंमें कही हुई सभी बातोंको लक्ष्यमें रखकर भगवानने अर्जुनको अपना “ईश्वरीय योग” देखनेके लिये कहा है। ७. यहाँ भगवानने यह भाव दिखलाया है कि “अर्जुन! तुम मेरी असाधारण योगशक्तिका चमत्कार देखो! यह कैसा आश्चर्य है कि आकाशमें बादलोंकी भाँति समस्त जगत्‌ मुझमें स्थित भी है और नहीं भी है। बादलोंका आधार आकाश है, परंतु बादल उसमें सदा नहीं रहते। वस्तुत: अनित्य होनेके कारण उनकी स्थिर सत्ता भी नहीं है। अतः वे आकाशमें नहीं हैं। इसी प्रकार यह सारा जगत्‌ मेरी ही योगशक्तिसे उत्पन्न है और मैं ही इसका आधार हूँ, इसलिये तो सब भूत मुझमें स्थित हैं; परंतु ऐसा होते हुए भी मैं इनसे सर्वथा अतीत हूँ, ये मुझमें सदा नहीं रहते, इसलिये ये मुझमें स्थित नहीं हैं। अतएव जबतक मनुष्यकी दृष्टिमें जगत्‌ है, तबतक सब कुछ मुझमें ही है; मेरे सिवा इस जगत्‌का कोई दूसरा आधार है ही नहीं। जब मेरा साक्षात्‌ हो जाता है, तब उसकी दृष्टिमें मुझसे भिन्न कोई वस्तु रह नहीं जाती, उस समय मुझमें यह जगत्‌ नहीं है।' ८. वास्तवमें भगवान्‌ इस समस्त जगत्‌्से अतीत हैं, यही भाव दिखलानेके लिये “वह भूतोंमें स्थित नहीं है” ऐसा कहा गया है। ३. आकाशकी भाँति भगवान्‌को सम, निराकार, अकर्ता, अनन्त, असंग और निर्विकार तथा वायुकी भाँति समस्त चराचर भूतोंकों भगवानसे ही उत्पन्न, उन्हींमें स्थित और उन्हींमें लीन होनेवाले बतलानेके लिये ऐसा कहा गया है। जैसे वायुकी उत्पत्ति, स्थिति और लय आकाशमें ही होनेके कारण वह कभी किसी भी अवस्थामें आकाशसे अलग नहीं रह सकता, सदा ही आकाशमें स्थित रहता है एवं ऐसा होनेपर भी आकाशका वायुसे और उसके गमनादि विकारोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, वह सदा ही उससे अतीत है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और लय भगवानके संकल्पके आधार होनेके कारण समस्त भूतसमुदाय सदा भगवानू्‌में ही स्थित रहता है; तथापि भगवान्‌ उन भूतोंसे सर्वथा अतीत हैं और भगवानमें सदा ही, सब प्रकारके विकारोंका सर्वथा अभाव है। २. शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, समस्त भोगवस्तु और वासस्थानके सहित चराचर प्राणियोंका वाचक 'सर्वभूतानि” पद है। 3. ब्रह्माके एक दिनको “कल्प” कहते हैं और उतनी ही बड़ी उनकी रात्रि होती है। इस अहोरात्रके हिसाबसे जब ब्रह्माके सौ वर्ष पूरे होकर ब्रह्माकी आयु समाप्त हो जाती है, उस कालका वाचक यहाँ “कल्पक्षय' है; वही कल्पोंका अन्त है। इसीको “महाप्रलय” भी कहते हैं। ४. समस्त जगत्‌की कारणभूता जो मूल-प्रकृति है, जिसे गीताके चौदहवें अध्यायके तीसरे-चौथे श्लोकोंमें “महदद्ह्म' कहा है तथा जिसे अव्याकृत और प्रधान भी कहते हैं, उसका वाचक यहाँ “प्रकृति” शब्द है। वह प्रकृति भगवान्‌की शक्ति है, इसी बातको दिखलानेके लिये भगवानने उसको अपनी प्रकृति बतलाया है। कल्पोंके अन्तमें समस्त शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, भोगसामग्री और लोकोंके सहित समस्त प्राणियोंका प्रकृतिमें लय हो जाना--अर्थात्‌ उनके गुणकर्मोंके संस्कारसमुदायरूप कारणशरीरसहित उनका मूल-प्रकृतिमें विलीन हो जाना ही “सब भूतोंका प्रकृतिको प्राप्त होना” है। ५. कल्पोंका अन्त होनेके बाद यानी ब्रह्माके सौ वर्षके बराबर समय पूरा होनेपर जब पुनः जीवोंके कर्मोंका फल भुगतानेके लिये जगत्‌का विस्तार करनेकी भगवान्‌में स्फुरणा होती है, उस कालका वाचक “कल्पादि' शब्द है। इसे महासर्गका आदि भी कहते हैं। उस समय जो भगवान्‌का सब भूतोंकी उत्पत्तिके लिये अपने संकल्पके द्वारा हिरण्यगर्भ ब्रह्माको उनके लोकसहित उत्पन्न कर देना है, यही उनका सब भूतोंको रचना है। ६. सृष्टिरचनादि कार्यके लिये भगवानका जो शक्तिरूपसे अपने अंदर स्थित प्रकृतिको स्मरण करना है, वही उसे अंगीकार करना है। ७. भिन्न-भिन्न प्राणियोंका जो अपने-अपने गुण और कर्मोंके अनुसार बना हुआ स्वभाव है, वही उनकी प्रकृति है। भगवानकी प्रकृति समष्टि-प्रकृति है और जीवोंकी प्रकृति उसीकी एक अंशभूता व्यष्टि-प्रकृति है। उस व्यष्टि-प्रकृतिके बन्धनमें पड़े रहना ही उसके बलसे परतन्त्र होना है। यहाँ भगवानने उनको बार-बार रचनेकी बात कहकर यह बात दिखलायी है कि जबतक जीव अपनी उस प्रकृतिके वशमें रहते हैं, तबतक मैं उनको बार-बार इसी प्रकार प्रत्येक कल्पके आदिदमें उनके भिन्न-भिन्न गुणकर्मोंके अनुसार नाना योनियोंमें उत्पन्न करता रहता हूँ। ३. सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति, पालन और संहार आदिके निमित्त भगवानके द्वारा जितने भी कर्म होते हैं, उन कर्मोंमें या उनके फलमें भगवान्‌का किसी प्रकार भी आसक्त न होना--'आसक्तिरहित रहना' है और केवल अध्यक्षता-मात्रसे प्रकृतिद्वारा प्राणियोंके गुण-कर्मानुसार उनकी उत्पत्ति आदिके लिये की जानेवाली चेष्टामें कर्तृत्वाभिमानसे तथा पक्षपातसे रहित होकर निर्लिप्त रहना--“उन कर्मोंमें उदासीनके सदृश स्थित रहना” है। इसी कारण वे कर्म भगवान्‌को नहीं बाँधते। २. जिस प्रकार किसान अपनी अध्यक्षतामें पृथ्वीके साथ स्वयं बीजका सम्बन्ध कर देता है, फिर पृथ्वी उन बीजोंके अनुसार भिन्न-भिन्न पौधोंको उत्पन्न करती है, उसी प्रकार भगवान्‌ अपनी अध्यक्षतामें चेतनसमूहरूप बीचका प्रकृतिरूपी भूमिके साथ सम्बन्ध कर देते हैं (गीता १४॥३)। इस प्रकार जड-चेतनका संयोग कर दिये जानेपर यह प्रकृति समस्त चराचर जगत्‌को कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें उत्पन्न कर देती है। जहाँ भगवानने अपनेको जगत्‌का रचयिता बतलाया है, वहाँ यह बात भी समझ लेनी चाहिये कि वस्तुतः भगवान्‌ स्वयं कुछ नहीं करते, वे अपनी शक्ति प्रकृतिको स्वीकार करके उसीके द्वारा जगत्‌॒की रचना करते हैं और जहाँ प्रकृतिको सृष्टि-रचनादि कार्य करनेवाली कहा गया है, वहाँ उसीके साथ यह बात भी समझ लेनी चाहिये कि भगवान्‌की अध्यक्षतामें उनसे सत्ता-स्फूर्ति पाकर ही प्रकृति सब कुछ करती है। जबतक उसे भगवान्‌का सहारा नहीं मिलता, तबतक वह जड- प्रकृति कुछ भी नहीं कर सकती। इसीलिये भगवानने आठवें श्लोकमें यह कहा है कि “मैं अपनी प्रकृतिको स्वीकार करके जगतकी रचना करता हूँ” और इस श्लोकमें यह कहते हैं कि “मेरी अध्यक्षतामें प्रकृति जगत्‌की रचना करती है।” वस्तुतः दो तरहकी युक्तियोंसे एक ही तत्त्व समझाया गया है। 3. गीताके सोलहवें अध्यायके चौथे तथा सातवेंसे बीसवें श्लोकतक जिनके विविध लक्षण बतलाये गये हैं, ऐसे ही आसुरी सम्पदावाले मनुष्योंके लिये “मूढा:” पदका प्रयोग हुआ है। ४. चौथेसे छठे श्लोकतक भगवान्‌के जिस 'सर्वव्यापकत्व” आदि प्रभावका वर्णन किया गया है, जिसको 'ऐश्वर योग” कहा है तथा गीताके सातवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें जिस “परमभाव” को न जाननेकी बात कही है, भगवानके उस सर्वोतम प्रभावका ही वाचक यहाँ “परम” विशेषणके सहित “भाव” शब्द है। सर्वाधार, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्‌ और सबके हर्ता-कर्ता परमेश्वर ही सब जीवोंपर अनुग्रह करके सबको अपनी शरण प्रदान करने और धर्म-संस्थापन, भक्त- उद्धार आदि अनेकों लीला-कार्य करनेके लिये अपनी योगमायासे मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए हैं (गीता ४।६, ७, ८)--इस रहस्यको न समझना और इसपर विश्वास न करना ही उस परम भावको न जानना है। ३. महाभारतमें भीष्मपर्वके छाछठवें अध्यायमें बतलाया है-- “सब लोकोंके महान्‌ ईश्वर भगवान्‌ वासुदेव सबके पूजनीय हैं। उन महान्‌ वीर्यवान्‌ शंख-चक्र-गदाधारी वासुदेवको मनुष्य समझकर कभी उनकी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये। वे ही परम गुह्यू, परम पद, परम ब्रह्म और परम यश:स्वरूप हैं। वे ही अक्षर हैं, अव्यक्त हैं, सनातन हैं, परम तेज हैं, परम सुख हैं और परम सत्य हैं। देवता, इन्द्र और मनुष्य, किसीको भी उन अमित-पराक्रमी प्रभु वासुदेवको मनुष्य मानकर उनका अनादर नहीं करना चाहिये। जो मूढमति लोग उन हृषीकेशको मनुष्य बतलाते हैं, वे नराधम हैं। जो मनुष्य इन महात्मा योगेश्वरको मनुष्यदेहधारी मानकर इनका अनादर करते हैं और जो इन चराचरके आत्मा श्रीवत्सके चिह्नवाले महान्‌ तेजस्वी पद्मनाथ भगवान्‌को नहीं पहचानते वे तामसी प्रकृतिसे युक्त हैं। जो इन कौस्तुभ-किरीटधारी और मित्रोंकोी अभय करनेवाले भगवान्‌का अपमान करता है, वह अत्यन्त भयानक नरकमें पड़ता है।' २. भगवानके प्रभावको न जाननेवाले आसुर मनुष्य ऐसी निरर्थक आशाएँ करते रहते हैं, जो कभी पूर्ण नहीं होतीं (गीता १६।१० से १२); इसीलिये उनको “मोघाशा:” कहते हैं। ३. भगवान्‌ और शास्त्रोंपर विश्वास न करनेवाले विषयी पामर लोग शास्त्रविधिका त्याग करके अअश्रद्धापूर्वक जो मनमाने यज्ञादि कर्म करते हैं, उन कर्मोंका उन्हें इस लोक या परलोकमें कुछ भी फल नहीं मिलता (गीता १६।१७, २३; १७।२८)। इसीलिये उनको “मोघकर्माण:” कहा गया है। ५. राक्षसोंकी भाँति बिना ही कारण द्वेष करके जो दूसरोंके अनिष्ट करनेका और उन्हें कष्ट पहुँचानेका स्वभाव है, उसे 'राक्षसी प्रकृति” कहते हैं। काम और लोभके वश होकर अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये दूसरोंको क्लेश पहुँचाने और उनके स्वत्वहरण करनेका जो स्वभाव है, उसे “आसुरी प्रकृति” कहते हैं और प्रमाद या मोहके कारण किसी भी प्राणीको दुःख पहुँचानेका जो स्वभाव है, उसे “मोहिनी प्रकृति” कहते हैं। ऐसे दुष्ट स्वभावका त्याग करनेके लिये चेष्टा न करना, वरं उसीको उत्तम समझकर पकड़े रहना ही 'उसे धारण करना” है। भगवानके प्रभावको न जाननेवाले मनुष्य प्राय: ऐसा ही करते हैं, इसीलिये उनको उक्त प्रकृतियोंके आश्रित बतलाया है। ६. यहाँ “महात्मान:” पदका प्रयोग उन निष्काम अनन्यप्रेमी भगवद्धक्तोंक लिये किया गया है, जो भगवत्सेममें सदा सराबोर रहते हैं और भगवत्प्राप्तिके सर्वथा योग्य हैं। ७, देव अर्थात्‌ भगवानसे सम्बन्ध रखनेवाले और उनकी प्राप्ति करा देनेवाले जो सात््विक गुण और आचरण हैं, गीताके सोलहवें अध्यायमें पहलेसे तीसरे "्लोकतक जिनका अभय आदि छब्बीस नामोंसे वर्णन किया गया है, उन सबको भलीभाँति धारण कर लेना ही *दैवी प्रकृतिके आश्रित होना' है। ८. 'माम” पद यहाँ भगवानके सगुण पुरुषोत्तमरूपका वाचक है। उस सगुण परमेश्वरसे ही शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, भोगसामग्री और सम्पूर्ण लोकोंके सहित समस्त चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति, पालन और संहार होता है (गीता ७६; ९। १८; १०।२, ४, ५, ६, ८)--इस तत्त्वको सम्यक्‌ प्रकारसे समझ लेना ही भगवान्‌को “सब भूतोंका आदि” समझना है और वे भगवान्‌ अजन्मा तथा अविनाशी हैं, केवल लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही लीलासे मनुष्य आदि रूपमें प्रकट और अन्तर्धान होते हैं; उन्‍्हींको अक्षर, अविनाशी परब्रह्म परमात्मा कहते हैं और समस्त भूतोंका नाश होनेपर भी भगवान्‌का नाश नहीं होता (गीता ८।२०)--इस बातको यथार्थतः समझना ही “भगवान्‌को अविनाशी समझना है। ९, जिनका मन भगवान्‌के सिवा अन्य किसी भी वस्तुमें नहीं रमता और क्षणमात्रका भी भगवान्‌का वियोग जिनको असहा प्रतीत होता है, ऐसे भगवानके अनन्यप्रेमी भक्त निरन्तर भगवानको भजते रहते हैं। ३. 'सततम” पद यहाँ “नित्य-निरन्तरर समयका वाचक है और इसका खास सम्बन्ध उपासनाके साथ है। कीर्तन- नमस्कारादि सब उपासनाके ही अंग होनेके कारण प्रकारान्तरसे उन सबके साथ भी इसका सम्बन्ध है। अभिप्राय यह है कि भगवानके प्रेमी भक्त कभी कीर्तन करते हुए, कभी नमस्कार करते हुए, कभी सेवा आदि प्रयत्न करते हुए तथा सदा- सर्वदा भगवान्‌का चिन्तन करते हुए निरन्तर उनकी उपासना करते रहते हैं। २. 'यतन्तः:” पदका यह भाव है कि वे प्रेमी भक्त भगवान्‌की पूजा सबको भगवान्‌का स्वरूप समझकर उनकी सेवा और भगवानके भक्तोंद्वारा भगवानके गुण, प्रभाव और चरित्र आदिका श्रवण आदि उत्साह और तत्परताके साथ करते रहते हैं। 3. भगवानके प्रेमी भक्तोंका निश्चय, उनकी श्रद्धा, उनके विचार और नियम--सभी अत्यन्त दृढ़ होते हैं। बड़ी-से-बड़ी विपत्तियों और प्रबल विघ्नोंके समूह भी उन्हें अपने साधन और विचारसे विचलित नहीं कर सकते। इसीलिये उनको “दृढव्रता:' (दृढ निश्चयवाले) कहा गया है। ४. जो चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते और सब कुछ करते समय तथा एकान्तमें ध्यान करते समय नित्य- निरन्तर भगवानका चिन्तन करते रहते हैं, उन्हें 'नित्ययुक्ता:' कहते हैं। ५. कथा, व्याख्यान आदिके द्वारा भक्तोंके सामने भगवानके गुण, प्रभाव, महिमा और चरित्र आदिका वर्णन करना; अकेले अथवा दूसरे बहुत-से लोगोंके साथ मिलकर, भगवान्‌कों अपने सम्मुख समझते हुए उनके पवित्र नामोंका जप अथवा उच्चस्वरसे कीर्तन करना और दिव्य स्तोत्र तथा सुन्दर पदोंके द्वारा भगवान्‌की स्तुति-प्रार्थाा करना आदि भगवन्नाम गुणगानसम्बन्धी सभी चेष्टाएँ कीर्तनके अन्तर्गत हैं। ६. भगवानके मन्दिरोंमें जाकर अर्चा-विग्रहरूप भगवान्‌को, अपने घरमें भगवान्‌की प्रतिमा या चित्रपटको, भगवानके नामोंको, भगवानके चरण और चरण-पादुकाओंको एवं सबको भगवान्‌का स्वरूप समझकर या सबके हृदयमें भगवान्‌ विराजित हैं--ऐसा जानकर सम्पूर्ण प्राणियोंको यथायोग्य विनयपूर्वक श्रद्धा-भक्तिके साथ गदगद होकर मन, वाणी और शरीरके द्वारा नमस्कार करना--यही “भगवानको प्रणाम करना' है। ७, श्रद्धा और अनन्यप्रेमके साथ उपर्युक्त साधनोंको निरन्तर करते रहना ही अनन्यप्रेमसे भगवान्‌की उपासना करना है। ८. गीताके तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें जिस 'ज्ञानयोग” का वर्णन है, यहाँ भी 'ज्ञानयज्ञ" का वही स्वरूप है। उसके अनुसार शरीर, इन्द्रिय और मनद्वारा होनेवाले समस्त कर्मोंमें, मायामय गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं--ऐसा समझकर कर्तापनके अभिमानसे रहित रहना; सम्पूर्ण दृश्यवर्गको मृगतृष्णाके जलके सदृश या स्वप्नके संसारके समान अनित्य समझना तथा एक सच्चिदानन्दघन निर्गुण-निराकार परब्रह्म परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसीकी भी सत्ता न मानकर निरन्तर उसीका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करते हुए उस सच्चिदानन्दघन ब्रह्ममें नित्य अभिन्नभावसे स्थित रहनेका अभ्यास करते रहना--यही 'ज्ञानयज्ञके द्वारा पूजन करते हुए उसकी उपासना करना है। ९, समस्त विश्व उस भगवानूसे ही उत्पन्न हुआ है और भगवान्‌ ही इसमें व्याप्त हैं। अतः भगवान्‌ स्वयं ही विश्वरूपमें स्थित हैं। इसलिये चन्द्र, सूर्य, अग्नि, इन्द्र और वरुण आदि विभिन्न देवता तथा और भी समस्त प्राणी भगवानके ही स्वरूप हैं--ऐसा समझकर जो उन सबकी अपने कर्मोंद्वारा यथायोग्य निष्कामभावसे सेवा-पूजा करना है (गीता १८।४६) --यही “बहुत प्रकारसे स्थित भगवान्‌के विराट्स्वरूपकी पृथग्भावसे उपासना करना है। ३. श्रौत कर्मको “क्रतु” कहते हैं। २. पंचमहायज्ञादि स्मार्त कर्म “यज्ञ" कहलाते हैं। 3. पितरोंके निमित्त प्रदान किया जानेवाला अन्न 'स्वधा' कहलाता है। ४. “अग्नि! से यहाँ गार्हपत्य आहवनीय और दक्षिणाग्नि आदि सभी प्रकारके अग्नि समझने चाहिये। ५. अभिप्राय यह कि यज्ञ, श्राद्ध आदि शास्त्रीय शुभकर्ममें प्रयोजनीय समस्त वस्तुएँ, तत्सम्बन्धी मन्त्र, जिनमें यज्ञादि किये जाते हैं, वे अधिष्ठान तथा मन, वाणी, शरीरसे होनेवाली तद्विषयक समस्त चेष्टाएँ--से सब भगवान्‌के ही स्वरूप हैं। ६. यह चराचर प्राणियोंके सहित समस्त विश्व भगवान्‌से ही उत्पन्न हुआ है, भगवान्‌ ही इसके महाकारण हैं। इसलिये भगवानने अपनेको इसका पिता-माता कहा है। ७. जिन ब्रह्मा आदि प्रजापतियोंसे सृष्टिकी रचना होती है, उनको भी उत्पन्न करनेवाले भगवान्‌ ही हैं; इसीलिये उन्होंने अपनेको इसका 'पितामह” बतलाया है। ८. जो स्वयं विशुद्ध हो और सहज ही दूसरोंके पापोंका नाश करके उन्हें भी विशुद्ध बना दे, उसे “पवित्र” कहते हैं। भगवान्‌ परम पवित्र हैं तथा भगवानके दर्शन, भाषण और स्मरणसे मनुष्य परम पवित्र हो जाते हैं। ९. “३०” भगवानका नाम है, इसीको प्रणव भी कहते हैं। गीताके आठवें अध्यायके तेरहवें श्लोकमें इसे ब्रह्म बतलाया है तथा इसीका उच्चारण करनेके लिये कहा गया है। यहाँ नाम तथा नामीका अभेद प्रतिपादन करनेके लिये ही भगवानने अपनेको ओंकार बतलाया है। ३०. “ऋक्‌', 'साम” और “यजु:'--ये तीनों पद तीनों वेदोंके वाचक हैं। वेदोंका प्राकट्य भगवानसे हुआ है तथा सारे वेदोंसे भगवानका ज्ञान होता है, इसलिये सब वेदोंको भगवानने अपना स्वरूप बतलाया है। ३३. प्राप्त करनेकी वस्तुका नाम “गति” है। सबसे बढ़कर प्राप्त करनेकी वस्तु एकमात्र भगवान्‌ ही हैं, इसीलिये उन्होंने अपनेको “गति” कहा है। “परा गति”, “परमा गति', “अविनाशी पद" आदि नाम भी इसीके हैं। ३१२. जिसकी शरण ली जाय उसे “'शरणम्‌” कहते हैं। भगवान्‌के समान शरणागतवत्सल, प्रणतपाल और शरणागतके दुःखोंका नाश करनेवाला अन्य कोई भी नहीं है। वाल्मीकीय रामायणमें कहा है-- सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्‌ व्रत मम ।। (६

عذرًا: النصّ الوارد تحت “Bhishma Parva.34.18” ليس شلوكة سنسكريتية قصيرة، بل هو شرحٌ مطوّل (ṭīkā/ bhāṣya) باللغة الهندية يفسّر “راجافيديا–راجاغوهيا” ومعاني من البهاغافاد غيتا. ولأترجم بدقّة مع الحفاظ على النبرة الملحمية، أحتاج إلى الشلوكة السنسكريتية الأصلية لـ 34.18 (أو المقطع المحدّد المراد ترجمته).

Verse 33

भीष्मपर्वणि तु त्रयस्त्रिंशो 5ध्याय:,भीष्मपर्वमें तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

وهكذا تنتهي الفصل الثالث والثلاثون في قسم بهيشما (Bhīṣma Parva).

Frequently Asked Questions

Arjuna frames a comparative dilemma of method: whether steady devotion to the personal divine or contemplation of the unmanifest imperishable constitutes superior yogic establishment, i.e., which approach is most practicable and integrative for the practitioner.

Kṛṣṇa presents a graded path calibrated to capacity: prioritize steady devotion and attention; if unstable, adopt disciplined practice; if that is difficult, act in service to the divine purpose; if even that is constrained, renounce the fruits of action—because relinquishing result-attachment conduces to peace.

Yes. The chapter closes by commending those who faithfully follow this teaching described as ‘dharmic nectar’ (dharmyāmṛta), indicating that adherence to the outlined discipline and virtues is itself presented as highly valued and spiritually efficacious within the text’s soteriological frame.