Ayodhya KandaPrakarana 322 Verses

Prakarana 32

यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ से ‘सेवा-धर्म’ की ओर ले जाता है। अयोध्या-काण्ड में राम का वनगमन केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि भक्त के भीतर ‘अहं-राज्य’ का विसर्जन है। भरत-चरित्र इस चरण का द्वार है: निष्काम कर्तव्य, भ्रातृ-प्रेम, और लोक-कल्याण के लिए स्व-सुख का त्याग। यहाँ ‘राजधर्म’ भी साधना बनता है—पादुका-शासन के माध्यम से ईश्वर-आज्ञा का सामाजिक रूपांतरण।

《阿逾陀篇》之主味为悲悯,其旨不在扩张哀伤,而在净化哀伤。罗摩入林后,“法”的中心由王座移至“奉行命令”。图尔西在此以一轴贯穿政治伦理、界限与爱:罗摩的谦顺、婆罗多的无欲、以及师言之至上。所引片段中,阿特利道场的“福德地理”(婆罗多井)象征普世安乐——信爱的清水成为公共之惠。继而婆罗多巡行林野、在诸圣地沐浴礼拜,终向罗摩求“王命”,皆为修行者的内在旅程:先净洁(śucitā),次净眼(divya-darśana),终立本分(守护阿逾陀)。由是此篇在阶梯上,使“离别之信爱”转成“服务之信爱”。

Verses

Verse 633 (चौपाई)

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।। नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।। जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे।। सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा।। ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।। राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।। भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।। बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।

(原文已被过滤,未提供具体经句,故无法据实译出。请补充此段乔帕伊原文/转写,我将按偈颂节奏译为中文。)

Verse 634 (दोहा/सोरठा)

नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।। मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।।

(原文已被过滤,未提供具体经句,故无法据实译出。请提供此段多哈/索罗塔原文,以便准确传达其义理与韵致。)

Read Ramcharitmanas in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App