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राजधर्म से वनधर्म की ओर संक्रमण—यह सोपान ‘वैराग्य-प्रवेश’ का द्वार है। अयोध्या का लोक-शोक, मिथिला का शोक, और भरत की निर्मल निष्ठा मिलकर साधक को यह सिखाते हैं कि ईश्वर-इच्छा के सामने सांसारिक व्यवस्था (राज्य, कुल, प्रतिष्ठा) भी अस्थिर है। इस चरण में मुक्ति की सीढ़ी ‘त्याग’ नहीं, बल्कि ‘अनासक्ति सहित कर्तव्य’ है—राम की मौन-लीला, भरत की सत्य-भावना, और वसिष्ठ का धीरज-उपदेश मन को शरणागति की ओर चढ़ाते हैं।
此段主味为悲悯,然悲悯在此不只是哀伤——乃趋向奉爱圆成的方便。天众闻婆罗多之言而欢喜并降花雨,同时开启两重层面:世间有疑惧纷纭,而在天眼中则是法的建立。遮那迦使者之来,使弥提罗与阿逾陀的哀海相连;于是悲悯味成为“共同体”的悲悯——两国两朝,同一罗摩离别。图尔西以海/舟/船夫之譬(纵有智与离欲之舟,亦难渡爱之河)锐化《摩那斯》宗旨:唯理智之知不足恃,唯罗摩之爱乃彼岸。婆悉吒之教在哀痛中立为安忍之柱,而末后以果根为食的安排,使“林之法”转为“道场之法”。此段在阶梯中为中段踏板:引修行者由悲悯趋入归依(śaraṇāgati)。
乔派 270.1-4
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे।साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
असमंजस बस अवध नेवासी।प्रमुदित मन तापस बनबासी।।
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची।प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।
जनक दूत तेहि अवसर आए।मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए।।
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे।बेषु देखि भए निपट दुखारे।।
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता।कहहु बिदेह भूप कुसलाता।।
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा।बोले चर बर जोरें हाथा।।
बूझब राउर सादर साईं।कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।
闻婆罗多纯净之言,诸神欢喜,圣者赞叹,天神降下花雨。阿逾陀居民困惑不已,然心中欢喜,林中苦行者亦充满喜悦。罗怙之主因谦逊而默然,见主之状,全众皆忧。此时遮那迦使者至,仙人婆私吒闻之速召。彼等顶礼瞻视罗摩,见其衣饰,悲痛万分。使者问大仙人消息,仙人言:请告毗提诃王安康。闻言彼等羞愧低头,合掌而言:仆人当恭敬询问,主遣我等为安康故。
朵哈 270
नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ।मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ।।270।।
若拘萨罗之主无安康,则主啊,安康已随主而去。因弥提罗与阿逾陀之特殊因缘,全世界已成孤儿。
乔派 271.1-4
कोसलपति गति सुनि जनकौरा।भे सब लोक सोक बस बौरा।।
जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू।नामु सत्य अस लाग न केहू।।
रानि कुचालि सुनत नरपालहि।सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि।।
भरत राज रघुबर बनबासू।भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू।।
नृप बूझे बुध सचिव समाजू।कहहु बिचारि उचित का आजू।।
समुझि अवध असमंजस दोऊ।चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ।।
नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी।पठए अवध चतुर चर चारी।।
बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ।आएहु बेगि न होइ लखाऊ।।
闻拘萨罗王之遭遇,遮那迦之女与众民皆悲愤癫狂。彼时见毗提诃者,无人信其名实相符。王后闻王之讯,失却知觉,如蛇失珠。婆罗多登基,罗怙上首流放,此使弥提罗主心生绝望。王问智者与大臣:今当何为,请思而告我。知阿逾陀与弥提罗皆乱,众言:去耶留耶?无人明言。王镇定心神,遣智者往阿逾陀。察婆罗多之行善恶,速来勿延。
朵哈 271
गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति।।271।।
使者往阿逾陀,察婆罗多之行,见其所为而归。婆罗多启程往质多罗俱吒,使者归弥提罗。
乔派 272.1-4
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी।जनक समाज जथामति बरनी।।
सुनि गुर परिजन सचिव महीपति।भे सब सोच सनेहँ बिकल अति।।
धरि धीरजु करि भरत बड़ाई।लिए सुभट साहनी बोलाई।।
घर पुर देस राखि रखवारे।हय गय रथ बहु जान सँवारे।।
दुघरी साधि चले ततकाला।किए बिश्रामु न मग महीपाला।।
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा।चले जमुन उतरन सबु लागा।।
खबरि लेन हम पठए नाथा।तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा।।
साथ किरात छ सातक दीन्हे।मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे।।
使者至,遵婆罗多之命,向遮那迦众会如实禀报。闻之,上师、亲族、大臣与王皆忧虑,爱念深重。婆罗多镇定自若,显其伟大,召勇士与御者。设守卫护家、城、国,备马、牛、车及众多辎重。安排妥当即刻启程,王于途中片刻未歇。今晨于波罗耶伽沐浴,众皆渡阎摩那河。彼等言:我等已向主报信,遂以此语顶礼。赐六千基拉塔人为护送,大仙人即刻辞行。
朵哈 272
सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु।।272।।
当贾纳卡听到迎亲队伍到来的消息,阿约迪亚全城欢欣雀跃;但罗怙之子心中感到极大的不安,天神之王也被忧虑的思绪所笼罩。
乔派 273.1-4
गरइ गलानि कुटिल कैकेई।काहि कहै केहि दूषनु देई।।
अस मन आनि मुदित नर नारी।भयउ बहोरि रहब दिन चारी।।
एहि प्रकार गत बासर सोऊ।प्रात नहान लाग सबु कोऊ।।
करि मज्जनु पूजहिं नर नारी।गनप गौरि तिपुरारि तमारी।।
रमा रमन पद बंदि बहोरी।बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।।
राजा रामु जानकी रानी।आनँद अवधि अवध रजधानी।।
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा।भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।।
एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू।देव देहु जग जीवन लाहू।।
狡诈的盖凯伊遭受了耻辱;她能责怪谁,又能把过错推给谁呢?怀着这样的心情,男女百姓再次欢喜起来,日子一天天过去。就这样那一天过去了;黎明时分,人人都开始沐浴。沐浴之后,男女信众敬拜象头神、高丽女神、湿婆大神和太阳神。他们向吉祥天女和毗湿奴的足顶礼,双手合十祈祷道:愿罗摩国王和贾纳基王后给阿约迪亚城带来无尽的喜悦。全体会众再次欢欣鼓舞,祈愿罗摩立婆罗多为王储。以此喜悦的甘露滋养众人,众神赐予世间生命的财富。
朵哈 273
गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।273।।
愿罗摩与上师、会众和兄弟们一起,在城中登基为王;当罗摩在阿约迪亚为王时,愿我们一切心愿都得满足。
乔派 274.1-4
सुनि सनेहमय पुरजन बानी।निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।।
एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन।रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।।
ऊँच नीच मध्यम नर नारी।लहहिं दरसु निज निज अनुहारी।।
सावधान सबही सनमानहिं।सकल सराहत कृपानिधानहिं।।
लरिकाइहि ते रघुबर बानी।पालत नीति प्रीति पहिचानी।।
सील सकोच सिंधु रघुराऊ।सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।।
कहत राम गुन गन अनुरागे।सब निज भाग सराहन लागे।।
हम सम पुन्य पुंज जग थोरे।जिन्हहि रामु जानत करि मोरे।।
听到城中百姓充满爱意的话语,瑜伽士、超脱的牟尼和智者都责备他们。城中百姓就这样完成日常仪式,身体因虔诚而颤动,向罗摩顶礼膜拜。无论高低贵贱,男女老少,各按自己的功德瞻仰圣容。所有人都恭敬地向他致敬,人人赞美这位慈悲的宝库。虽然罗怙之最对他们说话如同孩童,但他遵守礼仪规范,体认他们的爱意。罗怙之主是谦逊与美德的海洋,面容庄严,眼如莲花,性情纯朴仁慈。众人都怀着深情述说罗摩的美德,各自开始赞美自己的福分:世上少有人拥有如我们这般功德,能将罗摩视为己有。
朵哈 274
प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।274।।
听到这一切,弥提罗之主满怀爱意前来;太阳王朝的太阳、世间的太阳,与全体会众一起惊奇地升起。
乔派 275.1-4
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा।आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं।करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।।
राम दरस लालसा उछाहू।पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।।
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही।बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।।
आवत जनकु चले एहि भाँती।सहित समाज प्रेम मति माती।।
आए निकट देखि अनुरागे।सादर मिलन परसपर लागे।।
लगे जनक मुनिजन पद बंदन।रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।।
भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि।चले लवाइ समेत समाजहि।।
罗怙之主与兄弟、大臣、上师和城中百姓相伴,踏上旅程。当贾纳卡之主看见那座山时,立即顶礼膜拜,随即弃车步行。他心中充满瞻仰罗摩的渴望,路途的劳累和痛苦丝毫不觉。他的心在那里,罗摩和毗提诃之女所在之处;心不在焉,身体便不知苦乐。贾纳卡就这样前行,与全体会众一起,心被爱意所醉。当他们走近,看到彼此的情谊,便恭敬地相互问候。贾纳卡开始向牟尼们的足顶礼,罗怙之爱子向仙人们行礼。罗摩与兄弟们拜见国王,便带着全体会众一同出发。
朵哈 275
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।
那道院如同一片大海,宁静安详,充满和平的甘露,圆满清净;罗怙之主向它走去,仿佛被慈悲之河承载着。
乔派 276.1-4
बोरति ग्यान बिराग करारे।बचन ससोक मिलत नद नारे।।
सोच उसास समीर तंरगा।धीरज तट तरुबर कर भंगा।।
बिषम बिषाद तोरावति धारा।भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।।
केवट बुध बिद्या बड़ि नावा।सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।।
बनचर कोल किरात बिचारे।थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।।
आश्रम उदधि मिली जब जाई।मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।
सोक बिकल दोउ राज समाजा।रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।।
भूप रूप गुन सील सराही।रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।
他们正在渡过知识与超脱的溪流;悲伤的话语如同江河溪流般交汇。忧愁与叹息如风中的波浪,忍耐如岸边被风吹折的树木。剧烈的悲伤如激流冲刷,恐惧与迷惑如无尽的漩涡。只有智慧之船的摆渡人才能渡过,其他人无法独自航行。林中的野兽、原住民和基拉塔人都疲惫不堪,行人心灰意冷。当会众抵达道院这片大海时,仿佛大海开始翻涌。两位国王和会众都被悲伤所困,失去了知识、忍耐和羞耻心。他们赞美国王的容貌、美德和品格,却沉浸在悲伤的海洋中哭泣。
阐陀 276
अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा।।
सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की।।
男女众生沉入悲伤的海洋,极度忧愁;他们归咎于一切,愤怒地说:邪恶的创造主做了什么?天神、成就者、苦行者、瑜伽士和牟尼看到毗提诃的境况,图尔西说,无人能够渡过这条爱河。
索拉塔 276
किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह।धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन।।276।।
他在各处给予百姓和伟大的牟尼们无数的教导。国王说:要忍耐。瓦西什塔对毗提诃王说话。
乔派 277.1-4
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा।बचन किरन मुनि कमल बिकासा।।
तेहि कि मोह ममता निअराई।यह सिय राम सनेह बड़ाई।।
बिषई साधक सिद्ध सयाने।त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।।
राम सनेह सरस मन जासू।साधु सभाँ बड़ आदर तासू।।
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू।करनधार बिनु जिमि जलजानू।।
मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए।रामघाट सब लोग नहाए।।
सकल सोक संकुल नर नारी।सो बासरु बीतेउ बिनु बारी।।
पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू।प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।
他的知识如太阳驱散轮回的黑夜,他的话语如光芒使牟尼的莲花盛开;对他而言,妄想和执着怎能靠近?这就是悉多和罗摩爱情的伟大。智者知道,《吠陀》中所说的求道者、成就者和聪慧者是众生的三类。心中充满对罗摩之爱甘露的人,在圣者会众中备受尊敬。没有对罗摩的爱,知识就不会闪耀,如同没有太阳,水莲不会绽放。毗提诃牟尼以多种方式开导他们,众人在罗摩河坛沐浴。所有男女都沉浸在悲伤之中,那一天没有任何庆典。飞禽走兽和鹿群都不进食,亲人们也无心顾及其他。
朵哈 277
दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।।
两群人马,尼弥王与罗怙之主,清晨沐浴。众人皆坐于榕树及其他树下,心中忧愁,身体消瘦。
乔派 278.1-4
जे महिसुर दसरथ पुर बासी।जे मिथिलापति नगर निवासी।।
हंस बंस गुर जनक पुरोधा।जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा।।
लगे कहन उपदेस अनेका।सहित धरम नय बिरति बिबेका।।
कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं।समुझाई सब सभा सुबानीं।।
तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ।नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।।
मुनि कह उचित कहत रघुराई।गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।।
रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू।इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।।
कहा भूप भल सबहि सोहाना।पाइ रजायसु चले नहाना।।
那些居住在达沙拉塔城中的大贵族,以及那些居住在弥提罗王城中的人;遮那迦世系的家族导师,他曾探究世间道路的究竟目标;他们开始讲述许多教诲,包含正法、治国之道、出离与明辨。拘私迦反复讲述古老的故事,以善言教导整个集会。然后罗怙之主对拘私迦说:主啊,没有水,一切都干涸了。圣人说:你说得恰当,罗怙之主说道。白天已过,两个半时辰已逝。见圣人面露难色,提尔胡特王说:此处不宜进食。国王说:该怎么办呢?一切都好。得到许可后,他们去沐浴了。
朵哈 278
तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार।।278।।
那时,林居者带来各种果实、花朵、叶子和根茎,装满大篮,载着丰盛之物。
乔派 279.1-4
कामद मे गिरि राम प्रसादा।अवलोकत अपहरत बिषादा।।
सर सरिता बन भूमि बिभागा।जनु उमगत आनँद अनुरागा।।
बेलि बिटप सब सफल सफूला।बोलत खग मृग अलि अनुकूला।।
तेहि अवसर बन अधिक उछाहू।त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।।
जाइ न बरनि मनोहरताई।जनु महि करति जनक पहुनाई।।
तब सब लोग नहाइ नहाई।राम जनक मुनि आयसु पाई।।
देखि देखि तरुबर अनुरागे।जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।।
दल फल मूल कंद बिधि नाना।पावन सुंदर सुधा समाना।।
蒙罗摩恩典,质多罗俱多山成为满愿者,一瞥之间消除一切忧愁。湖泊、河流、森林、大地各处,仿佛洋溢着喜悦与爱意。藤蔓与树木皆花果累累,飞鸟、麋鹿、蜜蜂和谐鸣唱。那时森林充满欢愉,微风轻拂,令一切众生安适。其美丽难以言喻,仿佛大地正在款待遮那迦。于是众人反复沐浴,罗摩、遮那迦与众圣人得到许可。怀着爱意凝视树木,城民开始在各处安顿。有各种叶果、根茎、块茎,纯净美好,如甘露一般。
朵哈 279
सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।।
罗摩恭敬地派遣使者前往各处,载着满满的物品。敬拜祖先、天神、客人与导师后,他们开始欢庆。
परम्परा में यह अंश ‘भरत-चरित्र’ और ‘वसिष्ठ-धीरज’ के कारण शोक-निवारण, मन की स्थिरता, तथा परिवार/समाज में धर्म-बुद्धि जागरण का फलदायी माना जाता है—विशेषकर वियोग, संकट, और निर्णय-काल में पाठ से धैर्य व शरणागति बढ़ती है।
सामान्यतः ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘राम राम’ जप-संपुट; और भरत-प्रसंग में कई परम्पराएँ ‘भरत चरित्र बिनु बिनु’ नहीं, बल्कि ‘राम-नाम’ को ही सार्वभौम संपुट मानती हैं (स्थान-परम्परा अनुसार भेद)।
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