Ayodhya KandaPrakarana 2720 Verses

Prakarana 27

त्याग-धर्म का सोपान: राजधर्म, कुलधर्म और निजी प्रेम (स्नेह) के टकराव में ‘राम-आज्ञा’ को परम मानकर अहं-क्षय, शरणागति और निष्काम सेवा की सिद्धि। अयोध्या काण्ड साधक को ‘घर’ (सामाजिक भूमिका) के भीतर ही वैराग्य और समर्पण का अभ्यास कराता है—यही इस सोपान का द्वार है।

在这组分段经文(多哈260–269)中,《阿逾陀篇》的中心情味由“悲悯—绮情(亲爱)”升起,而终归安住于“寂静之信爱”(śānta-bhakti)。婆罗多的自责哀诉(母过、命运不均)与对师言的归顺,使“仆与主”(sevaka-sāhib)的关系呈现为一场法义省察。议会如霜般凝滞,众目化作“情水”(neh-jal)——这些修辞标示着情感的转折:由哀而净,由责而见己过,终至立誓以“罗摩之旨意”(Rām-rajāyas)为至上。天界议会的插叙,又将此人间戏剧安置于宇宙的法之筹划中:罗摩“为 भक्त所系”(bhakta-bas),而婆罗多之 भक्त爱乃世界安泰之根。故《阿逾陀篇》在阶梯次第中成为“舍弃的道德峰顶”——于居家之法(gṛhastha-dharma)中印证出离(vairāgya)的真实。

Verses

Verse 531 (चौपाई)

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।। लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।। पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें।। कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा। मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।। मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।। सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।। मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।

Verse 532 (दोहा/सोरठा)

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन। दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।

Verse 533 (चौपाई)

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा। यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा।। मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।। फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।। सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।। बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।। हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।। गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।

Verse 534 (दोहा/सोरठा)

साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ। प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।261।।

Verse 535 (चौपाई)

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।। देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।। महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।। सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।। बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ।। बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।। अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।। जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।

Verse 536 (दोहा/सोरठा)

तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि। तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।262।।

Verse 537 (चौपाई)

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।। सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू।। कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।। बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।। तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी।। तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे।। उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।। दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।

Verse 538 (दोहा/सोरठा)

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।263।।

Verse 539 (चौपाई)

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।। तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ।। मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।। हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।। तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें।। राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।। तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू।। ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।।

Verse 540 (दोहा/सोरठा)

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु। सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।264।।

Verse 541 (चौपाई)

सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।। बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।। बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं। सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।। सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।। लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।। आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा।। हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि।।

Verse 542 (दोहा/सोरठा)

सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु। सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।265।।

Verse 543 (चौपाई)

सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।। भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई।। देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ।। मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं।। सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।। निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।। करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।। निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।।

Verse 544 (दोहा/सोरठा)

कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ। करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।266।।

Verse 545 (चौपाई)

कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।। गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।। अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें।। मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई।। पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।। यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई।। जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं।। देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।

Verse 546 (दोहा/सोरठा)

जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच। मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।।

Verse 547 (चौपाई)

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।। अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई।। जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।। सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।। स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।। यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु।। देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी।। तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।

Verse 548 (दोहा/सोरठा)

सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ।।268।।

Verse 549 (चौपाई)

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।। जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई।। देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।। कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।। उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।। अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।। अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।। प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।।

Verse 550 (दोहा/सोरठा)

प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब। सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।।

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