यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ और ‘प्रेम-परख’ का द्वार है: राजसुख, नीति, और लोक-लाज के बीच भक्त-हृदय का निर्णय। अयोध्या काण्ड में राम-राज्य की आकांक्षा टूटकर ‘राम-आज्ञा’ के आगे झुकती है; साधक के भीतर ‘अहं-राज’ का विसर्जन होकर ‘शरणागति’ का राज्य आरम्भ होता है। इस खंड का आध्यात्मिक प्रयोजन है—विरह को वैराग्य में, और वैराग्य को सेवा-भक्ति में रूपान्तरित करना, जैसा कि भरत के चरित्र में प्रत्यक्ष है।
此段捕捉《阿逾陀篇》的情感峰顶:此处“离别”(viraha)不再只是哀伤,而化为修持。主味为悲悯与寂静的合流:婆罗多为罗摩离别所灼,但此灼并非出于世人讥毁或来世恐惧,唯是纯爱。于仙众会集(婆罗陀婆阇道场)的善友相应中,此爱以“名誉之月”(kīrti-bidhu)之喻而愈显清辉——罗摩之爱如灵鹿所栖之处,名誉便如明月无双。图罗西借由神通所成的富丽供养,微妙立义:苦行之力可致威德(aiśvarya),然婆罗多所求非威德,而是“得见罗摩之足”(Rām-pad-darśan)——此即无求之信爱(niṣkāma-bhakti)。继而天师之教说明:无相无染(nirguṇa-alēp)的罗摩何以示现有相(saguṇa)——只因 भक्त之爱。于是本段在阶梯次第中引行者由“哀”入“侍奉”,由“侍奉”进“归命”。
Verse 429 (चौपाई)
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा।। तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ।।।। सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।। सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।। तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा।। भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ।। सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।। धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा।।
Verse 430 (दोहा/सोरठा)
पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन। करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन।।210।।
Verse 431 (चौपाई)
मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।। एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई।। तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ।। मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू।। नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू।। सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए।। राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू।। राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही।।
Verse 432 (दोहा/सोरठा)
अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात। बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात।।211।।
Verse 433 (चौपाई)
एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।। एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं।। मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला।। कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु।। मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा।। मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ।। भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई।। तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी।।
Verse 434 (दोहा/सोरठा)
करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु। कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।212।।
Verse 435 (चौपाई)
सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।। जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी।। सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा।। भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए।। चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।। भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए।। मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता।। सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाई।।
Verse 436 (दोहा/सोरठा)
राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज। पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज।।213।।
Verse 437 (चौपाई)
रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।। कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई।। मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू।। अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना।। भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे।। दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें।। सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं।। प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही।।
Verse 438 (दोहा/सोरठा)
बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह। बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह।।214।।
Verse 439 (चौपाई)
मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।। सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी।। आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना।। सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना। असन पान सुच अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से।। सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें।। रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।। स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।
Verse 440 (दोहा/सोरठा)
संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।। तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।
Verse 441 (चौपाई)
कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा।। रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी।। पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें।। रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू।। नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया।। लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी।। राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं।। दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला।।
Verse 442 (दोहा/सोरठा)
किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात। तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात।।216।।
Verse 443 (चौपाई)
जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।। ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू।। यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं।। बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ।। भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता।। सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं।। देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू।। गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई।।
Verse 444 (दोहा/सोरठा)
रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि। बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि।।217।।
Verse 445 (चौपाई)
बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने।। मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया।। तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी।। सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ।। जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई।। लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा।। भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही।।
Verse 446 (दोहा/सोरठा)
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु। अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु।।218।।
Verse 447 (चौपाई)
सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा।। मानत सुखु सेवक सेवकाई। सेवक बैर बैरु अधिकाई।। जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू।। करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा।। तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा।। अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस।। राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी।। अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई।।
Verse 448 (दोहा/सोरठा)
राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल। भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल।।219।।
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